कोरोना के कहर के बीच भी पाकिस्तान ने अपने मुल्क में अल्पसंख्यक समुदायों के साथ अत्याचार और भेदभाव करने वाले रवैये को बरकरार रखा है। खबर आई है कि वहाँ एक ओर प्रधानमंत्री इमरान खान कोरोना से लड़ने के लिए इस्लाम को बड़ी ताकत मान रहे हैं, तो दूसरी ओर राहत कार्य में जुटा उनका प्रशासन हिंदुओं और इसाइयों को दाने-दाने के लिए तरसा रहा है।
एएनआई न्यूज एजेंसी ने पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों की हालत बयां करने वाली एक विडियो जारी की है। इस विडियो में एक व्यक्ति अपनी और अपने समुदाय के लोगों की पीड़ा बताते नजर आ रहा है। हम देख सकते हैं कि विडियो में व्यक्ति लाचार होकर बता रहा है कि सिंध प्रांत में प्रशासन ने हिंदू-ईसाई समुदाय के लोगों को राशन देने से मना कर दिया है। उनकी मदद नहीं की जा रही है। उन्हें खाना नहीं दिया जा रहा है।
#WATCH Pakistan: Members of Hindu&Christian communities say they are denied ration by authorities, in Sindh province. A Hindu local says,”Authorities are not helping us during lockdown, ration is also not being provided to us because we are part of a minority community.” #COVID19pic.twitter.com/ASawThS9XI
व्यक्ति कहता है, ”हम भी यहीं के बाशिंदे हैं। हम भी पाकिस्तानी हैं। तो हमारा भी ख्याल करना चाहिए। जैसे सब लोगों के साथ कॉपरेट करते हैं। हमारे साथ भी करना चाहिए। हमारे पास भी छोटे-छोटे बच्चे हैं। हम भी गरीब लोग हैं। यहाँ के रहने वाले। मगर फिर हमारे साथ कोई कॉपरेट क्यों नहीं करता। दूसरे लोगों को दिया जाता है। हमें नहीं दिया जाता। ये गलत है न!”
पाकिस्तानी हिंदू-ईसाई समुदाय के इस सदस्य के मुताबिक, कोरोना इस समय सबके लिए तबाही बना हुआ है। ये किसी धर्म-मजहब को नहीं देखता। लेकिन फिर भी पाकिस्तानी प्रशासन उनके साथ कोई कॉपोरेट नहीं करता। बस बहुसंख्यक आबादी की मदद करता है।
गौरतलब है कि कोरोना के बढ़ते प्रभाव के कारण इमरान खान ने 30 मार्च को अपने देश की जनता को संबोधित किया था। मगर यहाँ उनकी बातों में गंभीरता बिलकुल नजर नहीं आई थी। उन्होंने इस बातचीत में अपने लोगों को न घर में रहने की गुहार लगाई थी, बल्कि लॉकडाउन के पूरे कॉन्सेप्ट को ही खारिज कर दिया था। इमरान खान ने इस दौरान देशवासियों को मजहब का हवाला दिया था और इमान का पाठ पढ़ाया था। इसके बाद वे अपने मुल्क के लोगों को उन इस्लामिक देशों के बारे में बताते नजर आए थे, जो सबसे ज्यादा खैरात देते हैं। फिर इस लड़ाई को लड़ने के लिए जनता को जागरूक करने से ज्यादा अपने देश के युवाओं पर विश्वास जताया था और कहा था कि अब इन दोनों ताकतों (इमान और युवा) का उन्हें इस्तेमाल करना है ताकि कोरोना से लड़ा जा सके।
कोरोना वायरस पूरी दुनिया में तबाही मचा रहा है। भारत में लॉकडाउन के बावजूद दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित तबलीगी जमात द्वारा ढाई हजार लोगों को जमा कर मजहबी कार्यक्रम करने से कोरोना के मामलों में उछाल आया है। दिल्ली में ही मजनू का टीला इलाक़े में कई लोग फँसे हुए हैं, जो अपने घरों से दूर हैं। मजनू का टीला गुरूद्वारे में कई सिख फँसे हुए हैं। ऐसे में कोरोना वायरस के फैलने का ख़तरा है। पत्रकार आदित्य राज कौल ने वहाँ घिरे लोगों की तस्वीरें ट्वीट की हैं। साथ ही उन्होंने अकाली दल, भाजपा और कॉन्ग्रेस- तीनों ही दलों से सवाल पूछा है कि वो किस चीज का इन्तजार कर रहे हैं?
दिल्ली सिख गुरुद्वारा कमिटी के अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा ने दिल्ली के सीएम अरविन्द केजरीवाल और पंजाब के उनके समकक्ष कैप्टेन अमरिंदर सिंह से इन लोगों को पंजाब वापस पहुँचाने के लिए व्यवस्था करने को कहा है। उन्होंने कहा है कि अगर इनमें से किसी एक को भी कोरोना हुआ तो इससे हज़ारों को फैलने का ख़तरा है। कौल ने बताया कि मजनू का टीला स्थित गुरुद्वारा में सिख समुदाय के क़रीब 400 लोग फँसे हुए हैं। पूरे देश में लॉकडाउन की घोषणा के बाद से ही ये लोग वहाँ फँसे हुए हैं। क़ौल ने कहा कि न तो केंद्र सरकार और न ही राज्य सरकार ने उनको सही जगह पहुँचाने की व्यवस्था की है।
सिरसा ने कहा कि वो दोनों मुख्यमंत्रियों से हाथ जोड़ कर आग्रह करते हैं कि मजनू का टीला में फँसे लोगों को निकालें। उन्होंने बताया कि उनमें से कई लोगों को सर्दी-बुखार भी है और कई खाँस भी रहे हैं। उन्होंने कहा कि इन सबकी मेडिकल जाँच करानी ज़रूरी है लेकिन बार-बार आग्रह करने के बावजूद कैप्टेन अमरिंदर सिंह कोई जवाब नहीं दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि गुरुद्वारा प्रबंधन कमिटी उन सभी के खाने-पीने का ध्यान रख रही है और उन्हें सारी सुविधाएँ दी जा रही हैं लेकिन उन्हें वहाँ से निकाला जाना सबसे जयादा ज़रूरी है, जिसके लिए दिल्ली व पंजाब की सरकारों को व्यवस्था करनी चाहिए।
God!! Bizarre! Over 400 Sikh Community members are stranded in Majnu Ka Teela Gurudwara in New Delhi ever since nationwide lockdown was announced in India. Neither Central Govt nor State Govt have come to evacuate them back to Punjab. What are Akali, BJP and Congress waiting for? pic.twitter.com/RvEqEWwnfP
मनजिंदर सिंह सिरसा ने बताया कि उन्होंने 29 मार्च को 2 बसों से मजनू का टीला गुरूद्वारे में फँसे कई लोगों को उनके घरों तक पहुँचाया था। लेकिन, उसके बाद दोनों राज्य सरकारों का सहयोग न मिलने के कारण 400 लोग वहीं रह गए और उन्हें घर नहीं पहुँचाया जा सका। दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता तजिंदर पाल सिंह बग्गा ने बताया कि मजनू का टीला में पाकिस्तान से आए हुए हिन्दुओं के लिए भी राशन-पानी की व्यवस्था की जा रही है। उन्होंने इस सम्बन्ध में मनजिंदर सिरसा से बातचीत की। वहाँ रह रहे सभी हिन्दुओं के खाने-पीने की व्यवस्था गुरुद्वारा प्रबंधन कमिटी करेगी। लॉकडाउन के बाद भी ऐसा किया जाता रहेगा।
The situation at Gurdwara Majnu Ka Tila Sahib is alarming. Please do not ignore this tweet
अभी तक पंजाब या दिल्ली सरकार की तरफ़ से इस सम्बन्ध में कोई बयान नहीं आया है। केजरीवल या कैप्टेन की तरफ़ से सोशल मीडिया पर भी कोई रिस्पॉन्स नहीं दिया गया है। मजनू का टीला में फँसे सिखों के खाने-पीने की तो व्यवस्था कर दी गई है लेकिन सबसे ज़रूरी है उनका मेडिकल टेस्ट कर के उनके घर पहुँचाया जाना, ताकि भीड़ न जुटे और इतने लोगों के एक साथ रहने की नौबत न आए।
दिल्ली का निजामुद्दीन भारत में कोरोना वायरस का नया हॉटस्पॉट बन गया है। वहाँ मजहबी कार्यक्रमों में शामिल हुए ढाई हजार लोगों की पहचान में मुश्किलें आ रही है। तमिलनाडु के इरोड जिला प्रशासन ने कहा है कि जो भी लोग वहाँ पर शामिल हुए थे, उन सभी को ख़ुद से आगे आकर कोरोना वायरस की जाँच करानी चाहिए। जिले के 4 ऐसे इलाक़े हैं, जहाँ समुदाय विशेष की जनसंख्या ज्यादा है। उन चारों इलाक़ों में पुलिस ने घेराबंदी कर दी है। दिक्कत ये है कि तबलीगी जमात में शामिल हुए उन्हीं लोगों की जानकारियाँ पता चली हैं, जो ट्रेन या बस से गए थे। जमात की इरोड शाखा को कहा गया है कि वह सभी लोगों के नाम जुटाएँ और पुलिस को दें।
झारखंड में पिछले एक सप्ताह में 37 लोग निजामुद्दीन स्थित तबलीगी जमात के कार्यक्रम में शामिल होकर लौटे हैं। वरिष्ठ अधिकारियों ने आदेश दिया है कि इन सभी की जाँच की जाए। दिल्ली पुलिस ने झारखंड पुलिस को 46 लोगों की सूची दी है, जो तबलीगी जमात के कार्यक्रम में गए थे। राँची के हिन्दपीढ़ी के एक मस्जिद से भी 24 लोगों को बरामद किया गया था, ऐसे में वहाँ इस ख़बर के बाद हड़कंप मचा हुआ है। राँची के अलग-अलग भाग से अब तक 28 विदेशी पकड़े जा चुके हैं।
कर्नाटक सरकार ने बताया है कि 62 इंडोनेशियाई और मलेशियाई लोग तबलीगी जमात की इमारत में जमे हुए थे और उन्होंने कर्नाटक का भी दौरा किया था। उनमें से 12 लोगों को चिह्नित कर लिया गया है और उन्हें क्वारंटाइन सेंटर भेज दिया गया है। राज्य का गृह मंत्रालय पूरे मामले पर नज़र रख रहा है। महाराष्ट्र के अहमदनगर में भी 34 ऐसे लोगों को चिह्नित किया गया है। इनमें से 29 विदेशी हैं। इनमें से 14 के जाँच परिणाम आ गए हैं और 2 कोरोना वायरस पॉजिटिव पाए गए हैं। उन दोनों के अलावा 3 अन्य लोग भी संक्रमित हुए हैं, जो उनके संपर्क में आए।
The address of individuals who travelled via flight and train could only be traced. Tablighi Jamaat representatives from Tamil Nadu in Erode have been asked to give details of those who travelled to Delhi: Erode District Collector.#TamilNaduhttps://t.co/5S0SypMZUf
केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा है कि तबलीगी ने जो भी किया, वो तालिबानी आतंकवाद से कम नहीं है। उन्होंने कहा कि ऐसे आपराधिक कृत्यों को माफ़ नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि तबलीगी जमात ने कई अन्य लोगों की जान पर भी संकट खड़ा कर दिया है। नकवी ने कहा कि ऐसे लोगों और संगठनों के ख़िलाफ़ सख्त क़दम उठाए जाने चाहिए, जो सरकार के आदेशों की अवहेलना करते हैं। इधर दिल्ली में पूरे निजामुद्दीन क्षेत्र को सैनिटाइज्ड करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। पुलिस और साउथ दिल्ली के निगम कर्मचारी मिल कर सैनिटाइजर का स्प्रे करने में लगे हुए हैं।
7 लोगों के ख़िलाफ़ एफआईआर भी दर्ज की गई है। मंगलवार (मार्च 31, 2020) को देश भर में कोरोना संक्रमण के 227 नए मामले आए, जिनमें से अधिकतर तबलीगी जमात से जुड़े हुए हैं। झारखंड और असम में भी अब संक्रमण के पहले मामले की पुष्टि हुई है। दोनों के तार निजामुद्दीन के मरकज से जुड़े हुए हैं।
दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित तब्लीगी जमात के मरकज से निकल देश के अलग-अलग हिस्सों में पहुॅंचे लोगों की तलाश की जा रही है। इसी कड़ी में पता चला है कि छत्तीसगढ़ से भी 100 से ज्यादा लोग जमात के कार्यक्रम में शामिल हुए थे। राज्य सरकार ने इनकी पहचान कर लिए जाने का दावा किया है। इनमें 32 को क्वारंटाइन और 69 को होम आइसोलेशन में रखा गया है।
ऐसे आठ लोग मरकज से निकलकर भिलाई के सुपेला स्थित नूर मस्जिद में छिपे थे। ये सात मार्च को भिलाई पहुॅंचे थे। जानकारी मिलने के बाद जब स्वास्थ्य विभाग की टीम मौके पर पहुॅंची तो इनलोगों ने हंगामा किया। इसके बाद पुलिस ने सख्ती दिखाई और सभी लोगों को क्वारंटाइन सेंटर ले गई। मस्जिद में छिपे लोगों में चार महिलाएँ थी।
खबरों के मुताबिक स्वास्थ्य विभाग की टीम के साथ जब पुलिस मौके पर पहुँची तो सभी लोग मस्जिद में मौजूद थे। पूछताछ के दौरान इन्होंने गुमराह करने की कोशिश की। पहले बताया कि 3-4 फरवरी को निजामुद्दीन में हुई जमात में शामिल हुए थे। बाद में कहा कि 12 फरवरी को उसमें गए थे। साथ ही कहा कि हमने खुद को सेल्फ क्वारंटाइन किया था। इनकी पहचान शेख मेहर, शेख अताउद्दीन, मीर समजद अली, इस्माइल शेख, अनसुरा बीबी, आसमा बीबी, अंजू बीबी और खुदने बीबी के रूप में हुई है। ये सभी पश्चिम बंगाल के मिदनापुर के हैं।
इधर, बिलासपुर की जामा मस्जिद में नौ विदेशी मिले हैं जो खाड़ी देश से आए थे। सभी को आइसोलेशन में रखा गया है। उनके सैंपल जाँच के लिए एकत्र किया गया है। छत्तीसगढ़ सरकार ने इन मामलों की जानकारी देते हुए बताया कि बालोद से 15, बिलासपुर से एक और अंबिकापुर से 5 लोगों के बारे में जानकारी मिली है। अब इन्हें ढूँढकर इनकी जाँच करवाने की प्रक्रिया जारी है। उल्लेखनीय है कि भिलाई मामले में जैसे पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की टीम को लोगों का विरोध झेलना पड़ा, उसी प्रकार का विरोध निजामुद्दीन में पुलिस प्रशासन को झेलना पड़ा था और संदिग्धों को अस्पताल ले जाने आई एंबुलेंस को लौटना पड़ा था।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में कोरोना संक्रमित 8 मामले अब तक सामने आए हैं। इनमें सबसे अधिक राजधानी रायपुर में 4 व राजनांदगांव, दुर्ग, बिलासपुर और कोरबा में एक-एक पॉजिटिव मिले हैं।
पाकिस्तान के पंजाब में स्थित रायविंड सिटी में पूरी तरह लॉकडाउन का ऐलान कर दिया गया है। मुल्क में कोरोना वायरस के संक्रमण के बड़े ख़तरे को देखते हुए जिला प्रशासन ने ये ऐलान किया। शहर की सारी दुकानों को बंद कर दिया गया है। असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर अदनान राशिद ने बताया कि क्षेत्र में कोरोना वायरस से स्थिति लगातार बदतर होती जा रही है, इसी आलोक में ये निर्णय लिया गया है। शुरुआत में इस लॉकडाउन को 3-4 दिनों तक ही रखा गया है। सम्भावना है कि ये अवधि बाद में बढ़ा दी जाएगी। पंजाब के गृह विभाग ने बताया है कि रायविंड में कोरोना वायरस के कई मामले मिलने के बाद स्वास्थ्य मामलों पर कैबिनेट बैठक हुई, जहाँ ये निर्णय लिया गया।
पाकिस्तान में कोरोना वायरस के कारण अब तक 30 लोगों की मौत हो चुकी है और 2000 से भी ज्यादा लोग संक्रमित पाए गए हैं। बता दें कि रविवार (मार्च 5, 2020) को तबलीगी जमात के एक व्यक्ति ने पुलिस अधिकारी अशरफ अली माखी को चाकुओं से गोद डाला था। तबलीगी का सदस्य क्वारंटाइन सेंटर से भाग रहा था और इसी क्रम में उसने एसएचओ माखी पर धड़ाधड़ चाकुओं से वार किया। अधिकारी को जल्दी-जल्दी में लय्याह स्थित डीएचक्यू हॉस्पिटल में दाखिल किया गया, जहाँ उनकी हालत स्थिर बनी हुई है।
रायविंड स्थित मरकज में ठहरे 35 लोगों की स्क्रीनिंग की गई थी, जिनमें से 27 कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए हैं। लाहौर स्गिटर रायविनफ़ में इस्लामी संगठन तबलीगी जमात ने एक मजहबी कार्यक्रम का आयोजन किया था, जिसमें कम से कम 1200 लोग शामिल हुए थे। इसमें भाग लेने के लिए आए लोग तब वहीं पर रह गए जब कार्यक्रमों को कैंसिल कर दिया गया और सरकार ने लॉकडाउन का ऐलान किया। मरकज को सील कर उसे क्वारंटाइन सेंटर बना दिया गया।
मार्च के शुरुआती हफ्ते में भी तबलीगी जमात ने लाहौर में 1.5 लोगों का एक जलसा आयोजित किया था। यह सब कोरोना वायरस के ख़तरों के बावजूद किया गया। इसमें शामिल आए लोगों ने साथ खाना खाया और उनमें से अधिकतर साथ सोए। इस कारण पाकिस्तान में कोरोना वायरस के मामलों में अचानक से इजाफा होना शुरू हो गया। बता दें कि भारत में भी इसी जमात के कारण कोरोना के मामलों में बढ़ोतरी हुई है। दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मरकज की 6 मंजिला इमारत में 2500 लोग कई दिनों तक ठहरे रहे और वहाँ मजहबी कार्यक्रमों को भी नहीं रोका गया, जिससे देश भर में कोरोना के कई नए मामले आए हैं।
बिहार की एक मस्जिद में सामूहिक नमाज रुकवाने पहुॅंची पुलिस टीम पर हमला करने की घटना सामने आई है। मामला मधुबनी जिले का अंधराठाढ़ी ब्लॉक के गीदड़गंज गाँव का है। यहॉं समुदाय विशेष के लोगों ने पुलिस पर मंगलवार (31 मार्च 2020) शाम को हमला कर दिया। पुलिस को सूचना मिली थी कि कुछ जमाती मस्जिद में ठहरे हैं। पुलिस कार्रवाई करने पहुँची तो स्थानीय लोगों ने उन पर पत्थरबाजी और फायरिंग की। पुलिस टीम को करीब एक किलोमीटर दूर तक खदेड़ा गया। कई पुलिसकर्मियों के घायल होने की भी खबर है। पुलिस जीप को हमलावरों ने तालाब में पलट दिया। बताया जाता है कि उपद्रव का फायदा उठा कर मस्जिद में ठहरे जमाती भाग निकले। घटना के बाद से इलाके में तनाव बना हुआ है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अंधरठाढ़ी थाना की मदना पंचायत के गीदड़गंज में सामूहिक रूप से शाम को मजहबी कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा था। पुलिस को भी सूचना मिली थी कि मदना के पूर्व मुखिया एवं राजद प्रखंड अध्यक्ष के घर के पास स्थित मस्जिद में विदेश से आए कुछ लोग हैं। इसकी देखरेख पूर्व मुखिया ही करते हैं।
एसपी सत्यप्रकाश का कहना है कि सूचना मिलने पर पुलिस लोगों से लॉकडाउन का उल्लंघन न करने की अपील करने पहुँची थी। मगर वहाँ के लोगों ने थराव कर दिया। पुलिस ने इन लोगों के ख़िलाफ़ नामजद एफआईआर दर्ज कर ली है। फिलहाल सभी फरार हैं। सभी को गिरफ्तार करके जेल भेजा जाएगा। किसी को भी लॉकडाउन के नियम का उल्लंघन नहीं करने दिया जाएगा। बता दें, एसपी ने गाँव में गोली चलाने पर कोई बात नहीं की। लेकिन, झंझारपुर एसडीपीओ ने ग्रामीणों द्वारा गोली चलाने की पुष्टि की।
जानकारी के मुताबिक, गीदड़गंज गाँव में एक ही समुदाय के लोग रहते हैं। पुलिस पर हमले के बाद इनमें कई फ़रार हैं। बताया जा रहा है कि घटना वर्तमान मुखिया ओजेरा खातून के घर के बगल में घटी। जिसने हमला किया वे पूर्व मुखिया का खास और हिस्ट्रीशीटर है। पुलिस पर हमला करने वालों में मोहम्मद मुसवा एवं अन्य लोगों का नाम निकलकर सामने आया है। पुलिस के अनुसार, जिस दौरान उन पर हमला हुआ उस समय वे किसी तरह से वहाँ जान बचाकर भागे। मगर, स्थिति थमने पर जब झंझारपुर डीएसपी सहित पुलिस दोबारा मौके पर गई तो मस्जिद में रुके लोग फरार हो गए थे।
स्थानीय खबरों की मानें, तो गीदड़गंज गाँव में दो गुट हैं। एक वसीम का। दूसरा कमरुजुम्मा का। वसीम के गुट ने जमातियों की सूचना पुलिस को दी थी। मगर कमरुजुम्मा के गुट ने उन पर हमला कर दिया। इस हमले में सीओ भी घायल हो गए। अभी तक हमले को देखकर इस पूरी घटना को पूर्व नियोजित बताया जा रहा है, क्योंकि लोगों की छतों पर बड़े-बड़े पत्थर रखे थे।
दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित तबलीगी जमात का 6 मंजिला इमारत भारत में कोरोना वायरस के संक्रमण का सबसे बड़ा सोर्स बन कर उभरा है। वहाँ से निकाले गए लोगों में से अब तक 117 में संकमण की पुष्टि हो चुकी है। इनमें से कई ऐसे हैं जिन्होंने तबलीगी जमात के कार्यक्रमों में हिस्सा लिया था। सामने आए तथ्यों से स्पष्ट है कि तबलीगी जमात द्वारा सारे नियम-कायदों और सरकारी दिशा-निर्देशों की धज्जियाँ उड़ा कर मस्जिद में मजहबी कार्यक्रम आयोजित किए गए। बजाए इस घटना की निंदा करने के गिरोह विशेष के कई बड़े पत्रकार इसका बचाव करने में लग गए हैं। इनमें एक नाम राणा अयूब का भी है।
राणा अयूब ने तबलीगी जमात को क्लीन-चिट देने की कोशिश करते हुए एक खबर की लिंक साझा की है। साथ ही दावा किया है कि जब 22 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘जनता कर्फ्यू’ का ऐलान किया, तभी मरकज में सारे कार्यक्रमों को स्थगित कर दिया गया। इसके बाद अयूब ने वहाँ इतनी संख्या में लोगों के छिपे होने के पीछे रेलवे का दोष गिना दिया है, क्योंकि देश भर में रेल सेवा बंद हो गई। उन्होंने लिखा है कि ‘अचानक से’ रेल सेवा बंद किए जाने के कारण कई यात्री मरकज में ही फँस गए। यहाँ सवाल ये उठता है कि अगर वो लोग सरकार के साथ सहयोग कर रहे थे (जैसा कि दावा किया गया है), तो फिर उन्हें लेने भेजी गई एम्बुलेंस को क्यों वापस लौटा दिया गया?
When Modi announced Janata curfew for March 22, the ongoing programme in the Markaz was discontinued immediately. However, due to sudden cancellation of rail services across the country on March 21, a large group of visitors got stuck in Markaz premises. https://t.co/67gSCCY7AQ
अब हम आपको बताते हैं कि मरकज में कैसे जनता कर्फ्यू और उसके बाद हुए लॉकडाउन के दौरान भी धड़ल्ले से कार्यक्रम चल रहे थे और मौलाना-मौलवी कोरोना वायरस की बात करते हुए न सिर्फ़ तमाम मेडिकल सलाहों की धज्जियाँ उड़ा रहे थे, बल्कि अंधविश्वास भी फैला रहे थे। 24 मार्च को यूट्यूब पर ‘असबाब का इस्तेमाल ईमान के ख़िलाफ़ नहीं- हजरत अली मौलाना साद’ नाम से ‘दिल्ली मरकज’ यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो अपलोड किया गया। इसमें मौलाना ने लोगों को एक-दूसरे के साथ एक थाली में खाने और डॉक्टरों की बात मानने की बजाए अल्लाह से दुआ करने की सलाह दी। यूट्यब पेज पर स्पष्ट लिखा है कि ये कार्यक्रम 23 मार्च को हुआ।
इस वीडियो की डेट देखिए, ये कार्यक्रम मरकज़ की इमारत में मार्च 23, 2020 को हुआ था
इस वीडियो में बीच-बीच में लोगों की खाँसने की आवाज़ भी आ रही है। इसका मतलब है कि समस्या को जानबूझ कर नज़रअंदाज़ किया गया। स्थिति ये है कि तमिलनाडु और तेलंगाना से लेकर दिल्ली तक समुदाय विशेष के कई लोगों में कोरोना वायरस के लक्षण पाए गए हैं, जिन्होंने मरकज के कार्यक्रमों में शिरकत की थी। अगर आप ‘दिल्ली मरकज’ के यूट्यब पेज पर जाएँगे तो आपको पता चलेगा कि 17 मार्च से लेकर अब तक वहाँ 24 से भी अधिक वीडियो अपलोड किए गए हैं। सभी वीडियो में स्थान दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मरकज इमारत को ही बताया गया है। इनमें से कई वहाँ हुए कार्यक्रमों के फुल वीडियो हैं तो कई शार्ट क्लिप्स।
17 मार्च से लेकर अब तक दिल्ली मरकज की इमारत में लगातार कार्यक्रम होते रहे
कोई भी व्यक्ति उन लोगों का खुलेआम बचाव कैसे कर सकता है, जो सार्वजनिक रूप से सरकारी दिशा-निर्देशों और मेडिकल सलाहों को धता बताते हों? ऐसा नहीं है कि उन्हें समझाया नहीं गया था। दिल्ली पुलिस ने 23 मार्च को ही उन्हें समझाया था कि मरकज में हमेशा डेढ़-दो हजार की गैदरिंग होती है, इसे रोकना चाहिए। मौलानाओं को बुला कर कैमरे और सीसीटीवी के सामने ही पुलिस ने समझाया था। पुलिस ने बता दिया था कि सारे धार्मिक स्थान बंद हैं और 5 लोगों से ज्यादा की गैदरिंग पर रोक है। पुलिस ने समझाया था कि ये आपलोगों की सुरक्षा के लिए हैं, हमारी सुरक्षा के लिए नहीं है। मौलानाओं को बताया गया था कि सोशल डिस्टेंसिंग का जितना पालन किया जाएगा, उतना अच्छा रहेगा क्योंकि ये कोरोना वायरस कोई धर्म या मजहब देख कर आक्रमण नहीं करता है। पुलिस ने मौलानाओं को नोटिस थमाते हुए कहा गया था कि सभी दिशा-निर्देशों का पालन किया जाए। उस समय भी मरकज के लोगों ने स्वीकार किया था कि उनकी इमारत में 1500 लोग मौजूद हैं और 1000 लोगों को वापस भेजा जा चुका है। इनमें लखनऊ और वाराणसी से लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों के लोग शामिल हैं। दिल्ली मरकज में हमेशा ऐसे कार्यक्रम चलते रहे हैं और हज़ारों लोग जुटते रहे हैं। पुलिस ने इन्हें सख्त शब्दों में चेतावनी दी थी, लेकिन इसका कोई असर नहीं पड़ा।
#WATCH Delhi Police release a video of its warning to senior members of Markaz, Nizamuddin to vacate Markaz & follow lockdown guidelines, on 23rd March 2020. #COVID19pic.twitter.com/2evZR6OcmB
दिल्ली सरकार ने 13 मार्च को ही आदेश जारी कर 200 लोगों की किसी तरह की गैदरिंग पर रोक लगा दी थी। उस समस्य इस आदेश की समयावधि 31 मार्च तक रखी गई थी। बावजूद इसके मरकज में कार्यक्रम आयोजित किए गए। 16 मार्च को ख़ुद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ऐलान किया कि दिल्ली में कहीं भी 50 लोगों से ज्यादा की भीड़ नहीं जुटेगी। फिर 21 मार्च को 5 से ज्यादा लोगों के जुटान पर रोक लगा दी गई। बावजूद इसके मरकज में हज़ारों लोग रोजाना होने वाले कार्यक्रमों में शिरकत करते रहे। वहाँ लोग रहते रहे। 22 मार्च को जनता कर्फ्यू लगाया गया। इसके एक दिन बाद भी वहाँ 2500 लोग मौजूद थे, जिनमें से 1500 के चले जाने का दावा मौलाना ने किया है। अब सोचिए, इनमें से कई कोरोना कैरियर होंगे, जिन्होंने हजारों-लाखों लोगों तक संक्रमण फैलाया होगा।
25 मार्च को लॉकडाउन के दौरान भी 1000 लोग वहाँ मौजूद थे। 28 मार्च को एसीपी ने दिल्ली मरकज को नोटिस भेजी लेकिन उन्होंने जवाब देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने अपील की थी कि जो जहाँ है वहीं रहे, इसीलिए वहाँ लोग रुके हुए हैं। साथ ही दावा किया गया कि इतने लोग काफ़ी पहले से यहाँ पर मौजूद हैं। उपर्युक्त सभी बातों से स्पष्ट पता चलता है कि दिल्ली मरकज ने हर एक सरकारी आदेश की धज्जियाँ उड़ाई और जान-बूझकर इस संक्रमण के ख़तरे को नज़रअंदाज़ कर पूरे देश को ख़तरे में डाल दिया। अकेले तमिलनाडु में 50 ऐसे लोगों को कोरोना वायरस संक्रमण हो गया है, जो मरकज के कार्यक्रमों में शामिल हुए थे। देशभर में ये संख्या और बढ़ेगी, ऐसी आशंका जताई जा रही है। फिर भी कुछ मजहबी ठेकेदार पत्रकारों की वेशभूषा में इनका बचाव करने में लगे हुए हैं।
दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में आयोजित मरकज़ के कार्यक्रम में शिरकत करने वाले विदेशियों की जानकारी अब सामने आ रही है। बीते दिनों हमने देखा कि पटना, राँची, अहमदनगर, अमीनाबाद जैसे कई जगहों पर मस्जिद से विदेशी मुस्लिम मिले थे। इससे पहले इनकी पूरी पड़ताल खत्म होती दिल्ली के मरकज़ कार्यक्रम की हकीकत सामने आ गई और सारी तस्वीर साफ हो गई। अब ताजा जानकारी के अनुसार, दिल्ली में विदेशियों के मिलने का सिलसिला शुरू हो गया है। उत्तर-पूर्वी दिल्ली के 5 मस्जिदों से 48 विदेशी मुस्लिम मिले हैं। बताया जा रहा है कि इन विदेशी नागरिकों ने भी निजामुद्दीन इलाके में मरकज के कार्यक्रम में हिस्सा लिया था।
दिल्ली पुलिस ने केजरीवाल सरकार को इस संबंध में एक चिट्ठी लिखी है। इसमें पुलिस ने दिल्ली सरकार से 157 विदेशी नागरिकों के मामले में तत्काल कार्रवाई की माँग की है। पुलिस का कहना है कि ये सभी विदेशी नागरिक दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में मरकज में हुए कार्यक्रम में मौजूद थे और फिलहाल दिल्ली की कई मस्जिदों और अन्य जगहों में रुके हुए हैं।
48 foreigners who had attended the Markaz gathering in Nizamuddin, have been located in five mosques of North-East District of Delhi. Their information has been given by Police to the District Commissioner for further action: Delhi Police pic.twitter.com/YkeP76oR4V
वजीराबाद की जामा मस्जिद में 12 विदेशी नागरिक मौजूद थे। इसको लेकर मस्जिद के मौलवी के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। इसी तरह भरत नगर की मस्जिद से आठ विदेशी मिले हैं।
Delhi Police has written a letter to Delhi Government seeking immediate action with regard to persons including 157 foreign nationals associated with Tablighi Jamaat meet in Nizamuddin and presently staying at various mosques and places in Delhi. pic.twitter.com/5OmJx7Pyy1
इस बीच मरकज विवाद पर दिल्ली पुलिस ने एक विडियो जारी किया है। 23 मार्च के इस विडियो में पुलिस के एक अधिकारी वहॉं जुटान को लेकर आपत्ति जता रहे हैं। विडियो से जाहिर है कि दिल्ली पुलिस के बार-बार चेतावनी देने के बावजूद मरकज के जिम्मेदारों लोगों ने वहॉं से लोगों को हटाने को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई।
A case has been registered against the Maulavi of Jama Masjid, Wazirabad. 12 foreigners are inside the mosque, who had earlier attended the Markaz gathering in Nizamuddin. Police will soon remove people from the mosque & quarantine them: Delhi Police pic.twitter.com/uOd2a1yxU7
गौरतलब है कि दिल्ली पुलिस ने मरकज कार्यक्रम की अगुवाई करने वाले मौलाना के खिलाफ कोरोना संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए कोई जनसभा आयोजित नहीं करने और सामाजिक दूरी बनाए रखने संबंधी सरकारी आदेशों के उल्लंघन को लेकर मामला दर्ज किया है। बता दें, 15 मार्च तक निजामुद्दीन में हुए कार्यक्रम में इंडोनेशिया और मलेशिया समेत अनेक देशों के 2,000 से अधिक मुस्लिम आए थे। इन्होंने 1 से 15 मार्च तक हजरत निजामुद्दीन में तबलीगी जमात में भाग लिया था और इसके बाद इनमें से कई अलग-अलग राज्य की ओर रवाना हो गए, जबकि 1400 के करीब लोग वहीं रुके रहे।
पिछले कई सदियों में भारत समेत पूरी दुनिया ने कई महामारियों का कहर देखा। कभी चेचक, कभी प्लेग तो कभी स्पेनिश फ्लू और आज कोरोना। हर बार महामारी शब्द तक पहुँचने के सफर में बीमारियों के शुरुआती बिंदु गंदगी और नासमझी जैसे कारण रहे। मगर, बाद में इनका प्रसार निश्चित ही एक तबके की वजह से हुआ। ये तबका गतिशील लोगों का था। ये तबका धनाकांक्षियों का था। ये तबका प्रवसन की क्षमता रखने वालों का था और इस तबके में नाविक, सैनिक, मिशनरी, प्रवासी, पर्यटक, व्यापारी सब आते थे। इतिहास गवाह रहा है कि जिनमें विदेशी शहरों तक जाने की क्षमता होती है, वही किसी भी महामारी के प्रथम वाहक होते हैं। हाँ बाद में इसका दोष स्थानीय गरीबों एवं मध्य वर्गीय लोगों पर मढ़ दिया जाता है। जैसे कोरोना के समय में हो रहा है।
सबसे पहले बात करें 14 वीं सदी में फैले प्लेग की। ये एक ऐसी बीमारी थी जिसने जब फैलना शरू किया तो यूरोप की आधी संख्या को निगल लिया। बताया जाता है एक समय में करीब 12 जहाज इटली (एक यूरोपीय शहर) के सिसली बंदरगाह पर पहुँचे। मगर, उससे कोई नीचे नहीं उतरा। इसके बाद लोगों ने अंदर जाकर देखा तो वहाँ लगभग सभी जहाज सवार मरे पड़े थे और इनमें से केवल कुछ ही जिंदा थे। शवों से भरा जहाज देखकर पहले तो लोग वहाँ हैरान हुए, मगर बाद में उन शवों को सामूहिक रूप से दफन कर दिया। इस समय तक वहाँ लोगों को ये नहीं मालूम था कि ये संक्रामक बीमारी है और उन शवों को छूने का नतीजा उन्हें लंबे अरसे तक भुगतना पड़ेगा। देखते ही देखते वहाँ के हालात बदतर हो गए। लोगों ने पहले घरों से निकलना बंद किया और बाद में घर के सदस्यों से मिलना-जुलना। उस समय खुद को अलग करने के सिवा कोई वहाँ के लोगों पर कोई चारा नहीं बचा। इस दौरान इस प्लेग को ब्लैक डेथ का नाम दिया गया। बाद में शोधों से पता चला कि ये चीन की देन थी, जो सिल्करूट के जरिए बंदरगाह तक पहुँचे थे।
बता दें, आज जिस कोरोंटाइन शब्द का प्रयोग धड़ल्ले से किया जा रहा है उसके बारे एक व्याख्या नाविकों से जुड़ी है, जो कहती है कि पहले गतिशील वर्ग का ये तबका खुद को महामारियों से बचाने के लिए जहाज खोलने और यात्रा के लिए प्रस्थान से पहले एकांतवास करते थे। उसे ही कोरोंटाइन कहा जाता था। हम कह सकते हैं कि इसका संबंध उनके गतिशील होने से था। मगर, प्लेग जैसी महामारियाँ एक समुदाय और वर्ग तक पहुँचने के बाद थमने का नाम कहाँ लेती हैं और इन्हें फैलाने वाले भी अपनी गलती कब मानते हैं? भारत की बात करें तो 1817 के आसपास प्लेग ने यहाँ भी महामारी का रूप लिया। इसे फैलाने की जिम्मेदार ब्रिटिश सेना की टुकड़ियाँ थी। जो एक राज्य से दूसरे राज्य घूमकर, इसे पसारते रहे। मगर, बाद में ब्रिटिश सैनिकों और व्यापारियों के जरिए ये इंग्लैंड पहुँच गया और वहाँ इसे भारतीय प्लेग नाम दिया गया। सोचिए, जो भारतीय जनता खुद इसकी पैसिव रेसिपिएंट थी, उन्हें इस चरण में जाकर इस बीमारी का प्रथम संवाहक बना दिया गया और उनकी बात दोयम दर्जे का।
ये ध्यान रखने वाली बात है महामारियाँ यात्रा करती हैं। उड़ान भरती हैं। और इसी माध्यम से वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर तबाही मचाती हैं। ये तबाही कभी युद्ध के रूप में जाती है। कभी व्यापार के रूप में। इसका कोई चेहरा नहीं होता। कोई आकार नहीं होता। पहले के समय में ये अच्छी बात थी कि हवाई सुविधा उपलब्ध न होने के कारण इन महामारियों को सुदूर इलाकों तक पहुँने में समय लगता था और कई बार कुछ गाँव-नगर इनके कहर से छूट भी जाते थे। मगर, अब तकनीक के जरिए दुनिया मुट्ठी में होने के कारण संक्रमण का काम आसान हो गया है।
दुनिया में बीमारियों के महामारी बनने तक का सफर उपनिवेशों की खोज और उनपर अपना साम्राज्य स्थापित करने की लड़ाई से शुरू हुआ और व्यापार के फैलाव के साथ इनका प्रसार भी तेज हुआ। इतिहास पर गौर करें, तो जैसे-जैसे उपनिवेशाद के कारण विस्थापन और प्रवसन की प्रक्रियाओं में तेजी आई वैसे-वैसे पूरी दुनिया को महामारियों ने जकड़ लिया। इसी बिंदु को इंगित करवाते हुए प्रोफेसर नोआ हरारी अपनी किताब में भी लिखते हैं कि यूरोपीय सभ्यताओं ने उपनिवेशवाद के दौर में हर जगह की मूल सभ्यताओं में बाहरी जीवाणु और तमाम वैसी बीमारियाँ ले गए जो ऐसी जगहों पर कभी नहीं थी। अपनी किताब “आने वाली कल का संक्षिप्त इतिहास” में वे हवाइयाँ द्वीप का जिक्र करते हैं और लिखते हैं कि 2 सदी पहले 18 जनवरी 1778 में एक ब्रटिश कैप्टेन जेम्ल कुक हवाईयाँ पहुँचा। उस समय वहाँ की संख्या 5 लाख के करीब थी। ये लोग यूरोपीय देशों और अमेरिका से कटकर रहते थे। मगर कुक ने वहाँ पहुँचकर पहली बार फ्लू, ट्यूबरक्लूसिस, सिफिलिस पैथोजन जैसी बीमारियों को फैलाया। इसके बाद अन्य यूरोपीय पर्यटकों ने यहाँ आकर टायफायड और स्मॉलपॉक्स का प्रसार किया। नतीजतन हवाई में 1853 तक केवल 70,000 सर्वाइवर जिंदा बचे।
इसके बाद स्पैनिश फ्लू के फैलने के पीछे भी यही हाल था। नोहा हरारी बताते हैं कि 1918 में अचानक उत्तरी फ्राँस में लोगों के मौत की खबरें आने लगीं। उनमें अजीब तरह का फ्लू देखा गया। बाद में इस फ्लू संक्रमक क्षमता देखकर इसे स्पेनिश फ्लू नामक महामारी का नाम मिला। ये इतनी खतरनाक थी कि इसने दुनिया भर के 5 करोड़ लोगों का निगल लिया था। और इसके फैलने का कारण भी वही लोग थे। जिनमें प्रवसन उस समय सबसे अधिक होता था यानी सैनिक टुकड़ियाँ। कह सकते हैं इस महामारी के तेजी से फैलने के पीछे विश्व युद्ध भी एक बड़ा कारण था।
इसी तरह, चेचक। 5 मार्च 1520 को जहाज़ों का एक छोटा-सा बेड़ा क्यूबा के द्वीप से मैक्सिको की ओर रवाना निकला। इन जहाज़ों में घोड़ों के साथ 900 स्पेनी सैनिक, तोपें और कुछ अफ़्रीकी गुलाम सवार थे। इनमें से एक गुलाम, फ्रांसिस्को दि एगिया था। जो अपनी देह पर चेचक के विषाणु को एक जगह से दूसरी जगह ले जा रहा है। हालाँकि फ्रांसिस्को को इसकी जानकारी नहीं थी, लेकिन उसकी खरबों कोशिकाओं के बीच वो घातक विषाणु कई लोगों को मौत की नींद सुलाने के लिए सफर कर रहा था। फ़्रांसिस्को के मैक्सिको में उतरने के बाद इस विषाणु ने उसके शरीर में तेज़ी के साथ बढ़ना शुरू कर दिया, और अन्ततः उसकी त्वचा पर भयावह फुँसियों के रूप में फूट पड़ा। जब उसमें इसके लक्षण दिखने शुरू हुए तो फ़्रांसिस्को को केम्पोआलान नगर स्थित एक स्थानीय अमेरिकी परिवार के घर पर बिस्तर पर ले जाया गया। जहाँ पहुँचकर उसने सबसे पहले उस परिवार के सदस्यों को संक्रमित कर दिया और उस परिवार ने अपने पड़ोसियों को। दस दिन के भीतर केम्पोआलान एक क़ब्रगाह में बदल गया। बाद में शरणार्थियों ने इस बीमारी को आसपास के नगरों तक फैला दिया। मगर फिर भी, कई प्रायद्वीपों के लोगों ने ये मान लिया कि ये बीमारी कुछ दुष्ट देवताओं की साजिश है जो उड़कर इस बीमारी को फैलाते हैं। यानी उस समय भी ये गतिशील वर्ग (चाहे फ्रांसिसकों या फिर शर्णार्थी) दोषी करार नहीं दिए गए।
इन उदाहरणों से गौर करिए कि पैनडेमिक के पीछे कभी भी गरीब, पिछड़े और आम जीवन व्यतीत करने वालों का हाथ नहीं रहा। इसके पीछे प्राय: धनी, सुदृढ़, प्रवासी, धनाकांक्षी, गतिशील लोग होते थे और आज भी स्थिति वही है। फिर चाहे देश में पहला कोरोना केस बना वुहान से लौटा केरल का छात्र हो या लंदन से लौटी कनिका कपूर। सब एक समृद्ध समाज का हिस्सा हैं। जिनके लिए आज यहाँ कल वहाँ एक आम बात है।
वुहान के अलावा अगर किसी भी देश की गरीब जनता इस समय कोरोना बीमारी का शिकार होती है। तो जाहिर है वह उसकी पैसिव रेसिपिएंट होगी। मगर, धीरे-धीरे उन्हें ही इसका मुख्य संवाहक बना दिया जाएगा। जैसे 18 वीं सदी में भारतीय प्लेग के दौरान किया गया। महामारी तो सैनिकों और औपनिवेशिक गतिविधियों से जुड़े आयरिश लोगों के माध्यम से फैली। लेकिन उसका सारा ठीकरा फूटा भारतीय जनता पर। ऐसे ही यूरोप और अमेरिकी भूखंड में भी हुआ। वहाँ तो कई बार महामारियों के प्रसार के लिए स्थानीय यहूदी समुदाय को जिम्मेदार बताया गया और इसके लिए उन्हें दंड भी दिया गया। कोरोना के समय में यही प्रक्रिया चालू है।
गौरतलब है कि ये पश्चिमी देशों की सनक ने न केवल युद्द, व्यापार, दुनिया की खोज करने वाले अभियानों को बढ़ावा दिया। बल्कि इनके साथ महामारियों को भी एक माध्यम दिया। जिसके जरिए ये सफर करती रहीं और मानवता को चपेट में लेती रहीं। इस गतिशील कहे जाने वाले वर्ग ने विभिन्न जीवनशैलियों का अलग-अलग देशों में लेन-देन कराया मगर साथ ही ये भी साबित किया कि इनके प्रवसन के साथ साथ समाज में सिर्फ़ धन और दूसरे देशों की जीवनशैलियाँ नहीं आतीं बल्कि इनके साथ बीमारी और महामारियाँ भी आती हैं। जो नई धरातल पर, नए लोगों को देखकर नया विस्तार पाती हैं।
याद दिला दें, महात्मा गाँधी ने अपनी दूरदर्शिता से इन्हीं परिणामों को आँका था। उन्होंने बीमारियों को महामारी में तब्दील होते देखा था। उन्होंने महसूस किया था कि एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए सुविधाएँ जितनी विकसित होंगी, उसके साथ ही विकसित होगी महामारी फैलने की तेज रफ्तार। शायद यही कारण था कि उन्होंने रेल कॉन्सेप्त से मन कचोटा। उनका मानना था कि रेल का इस्तेमाल न केवल ब्रिटिश अपनी पकड़ जमाने के लिए करेंगे बल्कि इससे महामारियाँ भी फैलेंगी और व्यापारी ही इसका लाभ उठा पाएँगे। आज हम संदर्भ में कोरोना से जूझते हुए इसकी बात की महत्ता को समझ सकते हैं।
लॉकडाउन के बीच पूरा देश कोरोना वायरस के खिलाफ जंग लड़ रहा है, लेकिन ऐसे में दिल्ली के निजामुद्दीन में हुए एक मजहबी सम्मेलन से निकले जमातियों ने पूरे देश में हड़कंप पैदा कर दिया है। अब देश में लगातार तेजी से बढ़ते मामलों के बीच तमिलनाडु से 50 कोरोना के नए मरीज सामने आए हैं। आश्चर्य की बात यह कि इन 50 नए मरीजों में से 45 मरीज वह हैं, जिन्होंने दिल्ली के निजामुद्दीन में हुए मजहबी सम्मेलन में हिस्सा लिया था। सम्मेलन में तमिलनाडु से शामिल होने वाले 501 जमातियों की पहचान हो गई है।
निजामुद्दीन से निकले जमातियों की जानकारी के बाद सभी राज्य अपने-अपने यहाँ जमातियों की पहचान करने में लगे हुए हैं। वहीं तमिलनाडु के स्वास्थ्य सचिव नीला राजेश ने जानकारी देते हुए बताया कि करीब 1,500 लोगों का एक बड़ा समूह दिल्ली धार्मिक सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए गया था, जिसमें से 1130 लोग तो लौट आए, लेकिन शेष सभी लोग दिल्ली में ही रह गए। साथ ही वापस लौटे लोगों में से 515 लोगों की पहचान कर ली गई है, जिनमें से 45 लोगों के कोरोना पॉजीटिव पाया गया है। इसके अतिरिक्त 5 और अन्य कोरोना के केस सामने आए हैं। दिल्ली से लौटने वाले लोगों की पहचान के बाद सभी को क्वारंटाइन किया जा रहा है।
Out of these people, who attended the conference in Delhi (Markaz, Nizamuddin), 50 have tested positive for #COVID19. Other than that 5 others have also tested positive today. Total number of positive cases in the state now stands at 124: Beela Rajesh, Tamil Nadu Health Secretary https://t.co/BFhQBcDmRl
इसी के साथ तमिलनाडु में कोरोना पॉजिटिव मामलों की संख्या बढ़कर अब 124 हो गई है। अब आशंका जताई जा रही है कि इन आँकड़ों में अभी और इजाफा हो सकता है। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री के. पलानीस्वामी ने कहा था कि तमिलनाडु से हाल ही में एक आयोजन में भाग लेने दिल्ली गए लोगों में से भी कुछ लोग संक्रमित हुए हैं। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु से करीब 1,500 लोगों का समूह दिल्ली गया था।