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दिल्ली का वो अस्पताल जहाँ कोरोना संभावित 174 मरीज में से 163 निजामुद्दीन वाले: सरकार दर्ज कराएगी FIR

देश की राजधानी दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में मरकज तबलीगी जमात के मुख्यालय में 200 से ज्यादा लोगों के कोरोना संदिग्ध पाए जाने से हड़कंप मच गया है। दिल्ली सरकार ने मरकज के मौलाना के खिलाफ फौरन मुकदमा दर्ज करने को कहा है। उन पर आरोप है कि देश में लॉकडाउन होने के बाद भी उन्होंने इतना बड़ा धार्मिक आयोजन कराया। साथ ही इसके लिए उन्होंने कोई अनुमति भी नहीं ली थी।

दिल्ली मरकज की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि 24 मार्च को हजरत निज़ामुद्दीन थाने के SHO ने मरकज़ परिसर को बंद करने की माँग करते हुए एक नोटिस जारी किया था। 24 मार्च को इसका जवाब आया, जिसमें कहा गया कि मरकज़ को बंद करने के निर्देशों का पालन चल रहा है और पिछले दिन लगभग 1500 लोग वापिस भेज दिए गए हैं।

इसके बाद मरकज़ में विभिन्न राज्यों और देशों के लगभग 1000 विजिटर्स बच गए थे। यह भी बताया गया कि Ld. SDM को लोगों को उनके मूल स्थानों पर वापस भेजने के लिए वाहन के पास देने का अनुरोध किया गया था।

17 वाहनों के रजिस्ट्रेशन नंबर के साथ एक लिस्ट और ड्राइवरों के लाइसेंस का विवरण Ld. SDM को भेजा गया, ताकि फँसे हुए विजिटर्स को उनके मूल स्थान भेजा जा सके।

बताया जा रहा है कि इस मजहबी आयोजन में लगभग 300-400 लोग शामिल हुए थे। कोरोना संक्रमित होने की संभावना के बाद यहाँ मौजूद 163 लोगों को दिल्ली के लोक नायक अस्पताल में भर्ती कराया गया है। अस्पताल की ओर से कहा गया है कि उनके यहाँ कोरोना संक्रमण की संभावना वाले 174 मरीज भर्ती हैं, जिसमें से 163 निजामुद्दीन से ही आए हैं। 

बता दें कि इसमें शामिल होने वाले तेलंगाना के 6 लोगों की कोरोना वायरस से मौत हो गई। तेलंगाना के मुख्यमंत्री कार्यालय की तरफ से इस संबंध में बयान जारी करते हुए कहा गया है कि जिन लोगों ने 13 से 15 मार्च के बीच निजामुद्दीन इलाके के मरकज में मजहबी प्रार्थना सभा में भाग लिया था, उनमें से कुछ लोगों के बीच कोरोना वायरस का संक्रमण फैल गया है। इस मजहबी सभा में शामिल होने वालों में कुछ लोग तेलंगाना के भी थे, उनमें से 6 लोगों की मृत्यु हो गई। 

इधर दिल्ली सरकार ने भी इस पर संज्ञान लेते हुए मरकज के मौलाना के खिलाफ कड़ी कारर्वाई का निर्देश देते हुए कहा कि निजामुद्दीन मरकज के प्रशासकों ने कोरोना वायरस के मद्देनजर लागू लॉकडाउन की शर्तों का उल्लंघन किया और अब इसमें से कई लोगों को कोरोना पॉजिटिव पाया गया है। 

निजामुद्दीन मामले को लेकर दिल्ली सरकार की तरफ से जारी बयान में कहा गया कि 24 मार्च को पूरे देश में कोरोना की वजह से लॉकडाउन की घोषणा की गई थी। इसके बाद होटल, गेस्टहाउस, हॉस्टल और इस तरह के प्रतिष्ठानों के मालिक और प्रशासकों की यह जिम्मेदारी थी कि वह सोशल डिस्टेंशिंग का पूरी तरफ पालन करें। ऐसा लगता है कि यहां इसका पालन नहीं किया जा रहा था। यहाँ प्रशासकों ने कोरोना को लेकर जारी की गई गाइडलाइन का उल्लंघन किया और कोरोना पॉजिटिव रोगियों के कई मामले यहाँ पाए गए हैं। इस प्रतिष्ठान के प्रभारी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। लापरवाही के इस घिनौने कृत्य से कई जीवन खतरे में पड़ गए हैं। लॉकडाउन के दौरान लोगों का इस तरह के जमावड़े से बचना हर नागरिक की जिम्मेदारी थी और यह एक आपराधिक कृत्य के अलावा और कुछ नहीं है।

दिल्ली सरकार की तरफ से कहा गया है जब उन्हें केंद्र की तरफ से पहले कोरोना पॉजीटिव केस के बारे में बताया गया था और सहयोग के लिए कहा गया था, तभी उन्होंने उन सभी मरीजों को, जिनमें इस वायरस के लक्षण देखे गए उसे हॉस्पिटल में एडमिट किया गया और साथ ही जिनमें ये लक्षण नहीं पाए गए, उन्हें भी क्वारंटाइन सेंटर में शिफ्ट कर दिया गया।

मामला सामने आने के बाद दिल्ली पुलिस ने निजामुद्दीन इलाके में स्थित मस्जिद के आसपास के इलाके को खाली करा लिया है। यह मस्जिद निजामुद्दीन दरगाह के पास है। इसके अलावा यहाँ ड्रोन के माध्यम से निगरानी की जा रही है। दिल्ली पुलिस ने मजहबी कार्यक्रम आयोजित करने के मामले में आयोजकों को नोटिस जारी किया है। साउथ-ईस्ट दिल्ली के डीसीपी आरपी मीणा ने इसकी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस मामले की जाँच की जा रही है। जरूरत पड़ने पर पुलिस इनके खिलाफ एक्शन लेगी और FIR दर्ज कर सकती है।

निजामुद्दीन के मरकज में मजहबी कार्यक्रम में आए कुछ लोगों के कोरोना पॉजिटिव मिलने की खबर के बाद दिल्ली पुलिस की टीम वहाँ पहुँची। वहाँ दिल्ली पुलिस के ज्वाइंट CP डीसी श्रीवास्तव भी मौजूद थे। यहाँ से कई लोगों को जाँच के लिए दिल्ली के अलग-अलग हॉस्पिटल ले जाया गया। मौके पर दिल्ली स्वास्थ्य अधिकारियों की टीम भी पहुँची थी, जिन्होंने रिपोर्ट दी थी कि इलाके में कुछ लोगों में कोरोना वायरस के लक्षण दिखाई दिए हैं। बता दें कि निजामुद्दीन स्थित मरकज इस्लाम की शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने वाला विश्व का सबसे बड़ा केंद्र है, जहाँ काफी देशों के लोग आते-जाते रहते हैं।

प्रशासन ने दिल्ली में उन मरीजों की जानकारी इकट्ठा की है, जिन्हें ठंड लगने या बुखार की समस्या हुई हो। दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज ने इससे संबंधित लिस्ट अधिकारियों को सौंपी है। निजामुद्दीन मरकज के प्रवक्ता मोहम्मद शोएब ने बताया कि यह लिस्ट प्रशासन को दी गई। इनमें से कई लोगों को उम्र के कारण और बाहर की यात्रा से लौटने के बाद हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। उनका कहना है कि इनमें से किसी के भी कोरोना पॉजिटिव होने की पुष्टि नहीं हुई है।

रामायण-महाभारत से चिढ़ते वो कुंठित हिन्दू-विरोधी पत्रकार, जो साध लेते हैं चुप्पी मस्जिदों व चर्चों के सवाल पर

भारत में जब से चाइनीज कोरोना वायरस (वुहान-2019) का खतरा बढ़ा है, तब से लगातार कुंठित पत्रकार कथित जागरूकता फ़ैलाने के नाम पर मेनस्ट्रीम मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से भाजपा शासित सरकारों और हिन्दू विरोध का घिनौना खेल खेल रहे हैं। चाइनीज वायरस के शुरुआती संक्रमण के दौरान ऐसे कुंठित लोगों ने कथित गो-मूत्र के नाम से हिन्दुओं का खूब मजाक भी उड़ाया। हिन्दुओं को अपमानित करने के उद्देश्य से मीम्स बनाए और स्टोरी प्लांट किया।

ऐसी ख़बरों के माध्यम से इन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि जैसे इस देश के गली-गली में गो मूत्र की दुकान हो और देश में गो मूत्र पीने के लिए हिन्दूवादी संगठन कोई फ़तवा जारी करते हों। इसलिए भारत में कोरोना का संक्रमण रोक पाना असंभव होगा। गोमूत्र से जुड़ी चक्रपाणि जैसे स्वयंभू ठीकेदारों की एक छोटी सी घटना को इन घटिया हिन्दुफोबिया से ग्रसित पत्रकारों ने इतना तूल दिया कि अतिश्योक्ति हो गया। जैसे चक्रपाणि हिन्दू धर्म का एक मात्र प्रतिनिधि हो जबकि ऐसे लोगों को सनातन में आस्था रखने वाले कोई भाव नहीं देते। यहाँ तक कि काशी विद्वत परिषद जैसे संस्थाओं ने उनकी इस हरकत पर लताड़ा भी।

बीबीसी का घोषित हिन्दूफोबिया?

इसी बीच देश चाइनीज वायरस (वुहान 2019) से जूझ रहा है। पूरा देश सामाजिक भेदभावों को भूला कर चाइनीज कोरोना वायरस के संक्रमण से लड़ रहा है। भारत के हजारों मंदिर और कई छोटे-बड़े हिन्दू और सिख स्वयंसेवी संस्थाओं ने इस चाइनीज संक्रमण से दुश्वारियाँ उठा रहे लोगों की मदद के लिए दिन रात तत्पर है। पटना के हनुमान मंदिर से लेकर तिरुपति बाला जी और शिरडी के साईं ट्रस्ट जैसे कई मंदिरों के ट्रस्ट ने अपने दान पात्र से सरकार को मदद दी है।

ऐसे दौर में भी बीबीसी जैसे एजेंडाधारी जिनका मकसद ही हिन्दू घृणा और भारत विरोध हो, कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते। इसी कड़ी में अगर बात करूँ तो बीबीसी हिंदी में राजेश प्रियदर्शी जो कि बीबीसी हिंदी के डिज़िटल एडिटर हैं। जो ‘कोरोना वायरस संक्रमण के आईने में दिखती वर्ण व्यवस्था की गहरी छाया’ ब्लॉग नामक एक लेख में बहुत ही हीन भावना से ग्रसित चाइनीज वायरस की आड़ में हिन्दुओं के बीच लगातार सामाजिक विभेद को हवा देकर एक काल्पनिक लेख लिख कर, अपने उसी एजेंडे को हवा देते हैं। बिना किसी सन्दर्भ के और वर्तमान में इस तरह के किसी विवाद के अस्तित्व की फर्जी बुनियाद पर ऐसे लोग हिन्दुओं को घेरने का काम कर रहे हैं।

बीबीसी का लेख

हिन्दूफोबिया से ग्रसित बीबीसी और इसका पत्रकार राजेश प्रियदर्शी लिखता है, (ऐसा इसलिए कि हिन्दू घृणा से सने ऐसे लोग सम्मान के काबिल नहीं हैं) कि “तिरुपति से लेकर वैष्णो देवी तक लोग मंदिरों में हज़ारों-लाखों रुपए दान करते हैं। विशाल मूर्तियाँ लगाने, भव्य मंदिर बनाने के नाम पर जितना भी चाहिए पैसा आ जाता है, मगर ग़रीबों के लिए हमारी मुट्ठी ज़रा कम ही खुलती है।”

मंदिरों और हिन्दुओं के प्रति घृणा से ग्रस्त बीबीसी जैसे मीडिया संस्थानों ने क्या कभी मस्जिदों और चर्चों से पूछा कि पूरी दुनिया में सैकड़ों इसाई और मुस्लिम मुल्कों से जुड़े मस्जिद और चर्च इस राष्ट्रीय आपदा में कितना सहयोग कर रहे हैं? या कितना दिया? क्या बीबीसी ने यह प्रश्न पूछा कि आत्मा की फसल काटने के लिए पूरी दुनिया से मिशनरी ताकत जब भारतीय हिन्दुओं के धर्म परिवर्तन पर करोड़ों रुपए खर्च करता है तो आज इस आपदा के समय वो क्या कर रहे हैं? 

जवाब बीबीसी जैसी संस्थाएँ नहीं देंगी, अगर नजर दौड़ाएँगे तो आपको हर तरफ दिखेगा कि एक तरफ जहाँ मंदिर बंद हैं और हिन्दुओं की संस्थाएँ कोरोना के समय में लॉकडाउन की वजह से प्रभावित लोगों की सेवा में लगी हुई हैं वही ऐसे कई मस्जिद और चर्च आज कोरोना फैलाने के केंद्र बने हुए हैं। तबलीगी जमात में निजामुद्दीन सहित देश के कई हिस्सों में जिस तरह से कोरोना के प्रसार में योगदान दिया है उस पर ये संस्थाएँ मौन हैं।

हिन्दू सॉफ्ट टारगेट है, इसलिए इनके खिलाफ जो मन होगा वो कोई भी हिन्दू घृणा से सना लिबरल वामपंथी से लेकर, इनके इकोसिस्टम का एक अदना सा बेवकूफ भी बोलने लगेगा। यहाँ तक कि, आपदा के समय को ये लोग हिन्दुओं के बीच विभेद को और गहराने के लिए एक मौके के रूप में देखते हैं?

बीबीसी के राजेश प्रियदर्शी जैसे लोगों को बताना चाहता हूँ क्योंकि इनकी ऑंखें हिन्दुओं में अच्छाई नहीं ढूँढ पाती हैं क्योंकि ये हिन्दू घृणा में अंधी हो चुकी हैं, ऊँचे-ऊँचे मंदिर बनवाते वक्त हिन्दुओं को हेल्थ सर्विस से लेकर कई मानवोपयोगी सेवाएँ याद रहती है। आज मंदिर और ऐसी हिन्दू संस्थाएँ करोड़ों लोगों के सेवा में तत्पर हैं। राजेश प्रियदर्शी एक उदाहरण आपके ही राज्य बिहार से देता हूँ। पटना का हनुमान मंदिर देखा है? ये मंदिर चढ़ावे के पैसे से एक सुन्दर कैंसर अस्पताल और एक दन्त चिकित्सालय बनवाया है।

देश में ऐसे हजारों उदाहरण हैं। हिन्दू इसाई मिशनरी की तरह नहीं कि आत्मा की फसल काटने के लिए ही अस्पताल बनवाएँ l शर्म करो और एक बात जायज समझो कि बेशक योगी जी कुम्भ में तीर्थ यात्रिओं के लिए पुष्प वर्षा करवाएँगे। काँवरियों के पाँव में कंकड़ ना चुभ जाए, इसके लिए सड़कों पर कालीन बिछाएँगे। अयोध्या में सैकड़ों लीटर तेल जला कर दीपोत्सव मनाएँगे। आखिर इन कामों से क्या समस्या है। कुछ भी हिन्दुओं के हित में हो यही नहीं देखा जाता न, यही सरकारें जब हज या मुस्लिम ईसाईयों को सुविधाएँ देती हैं, सैकड़ों योजनाएँ चल रही हैं। तब तो कोई विरोध करते हमने बीबीसी को आज तक नहीं देखा।

ऐसी सरकारें जिन वोटों से चुनकर आती हैं उनमें हिन्दू बहुतायत में हैं। और पैसा भी उन्हीं का है जो टैक्स के रूप में सरकारों को दिया जाता है। जिनके वोट से चुनकर आए हैं तो अगर उसी जनता को खुश करने के लिए सौ-पचास करोड़ खर्च कर ही दिए तो आपको जलन क्यूँ होती है? सिर्फ इसलिए कि ये पर्व और त्यौहार या उत्सव हिन्दुओं से जुड़े हैं।

देख नहीं रहे हैं कि आज योगी के नक़्शे-कदम पर पूरा देश चल रहा है। प्रदेश के लाखों दिहाड़ी मजदूरों के खाते में पैसा पहुँचा रहा हैं। केजरीवाल सरकार के द्वारा साजिशन दिल्ली की सीमा पर परित्यक्त मजदूरों को उन्होंने अपने सीने से लगाया। जलन तो इस काम से भी बीबीसी जैसों को होती होगी कि आखिर व्यवस्था बिगड़ी क्यों नहीं। केजरीवाल से सवाल तो करना नहीं है क्योंकि सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं।

पार्ट टाइम भोजपुरी पत्रकार और इसके जैसे लोग 

चाइनीज वायरस के इस आपदा काल में कुछ पार्ट टाइम भोजपुरी पत्रकार पत्रकारिता के नाम पर हिन्दू घृणा से डिस्टर्ब हो गए हैं। ऐसे डिस्टर्ब लोगों का लक्ष्य चाइनीज कोरोना वायरस (वुहान-2019) से लगातार सफलतापूर्वक लड़ रहे भारत की बड़ाई करना नहीं बल्कि हिन्दुओं और भाजपा सरकार को नीचा दिखाना है। ऐसे लोग आजकल इस बात से चिढ़े हुए हैं कि भारत सरकार ने दूरदर्शन पर रामायण और महाभारत का प्रसारण क्यूँ कर दिया।

अरे, ऐसे पार्ट टाइम भोजपुरी पत्रकार और हिन्दूफ़ोबिया से ग्रसित लिबरल वामपंथ के पुरोधाओं रामायण और महाभारत से भारत की पहचान है। इन दोनों कथाओं को सुन कर ये देश बड़ा हुआ है। भगवान श्री राम और भगवान श्री कृष्ण हमारे अराध्य हैं। अभी-अभी तो हिन्दुओं ने अयोध्या में भव्य श्री राम मंदिर को स्थापना को लेकर सैकड़ों वर्षों से चली आ रही लड़ाई जीता है। और इस लॉकडाउन में देश के करोड़ों हिन्दू तो घर पर हैं ना? वो बैठे-बैठे तुम जैसों का फेक न्यूज देखेंगे? तुम्हारी कुंठाओं को देखकर खुद कुंठित होंगे? सोचो खुद पार्टटाइम भोजपुरिया और फुल टाइम हिन्दूफ़ोबिया और हिन्दुओं से घृणा से सने पत्रकारों? 

तुम्हारा दर्द तो उसी समय स्वाभाविक हो गया था जब हाई टाउन से लेकर मेट्रो शहरो और देश के स्लम तक से थालियाँ पीटने की आवाजों ने तुम्हारे कलेजे का चीथड़ा उड़ा दिया था। और वो ताली और थाली ना सिर्फ एक सांकेतिक समर्थन था बल्कि कोरोना को हम हराएँगे, इसका आगाज था। चलते-चलते इतना बता दूँ कि इसी तरह के लोग देश में लाखों करोड़ों लोगों के मरने की झूठी खबर की भविष्यवाणियाँ कर रहे हैं। और ये वही लोग हैं जिन्हें चाइनीज कोरोना वायरस के खिलाफ भारत का सफल जंग देखा नहीं जा रहा है।

(नोट: यहाँ चाइनीज वायरस (वुहान 2019) शाब्द के इस्तेमाल का अर्थ किसी भी नृजातीय भावना से परे हैयहाँ चाइनीज (वुहान 2019) इसके भौगोलिकता की ओर इशारा कर रहा है।)

इंदौर में भयावह स्थिति: 8 कोरोना+ में से 5 की कोई ट्रेवल हिस्ट्री नहीं, खतरनाक स्थिति की तरफ बढ़ रहा शहर

कोरोना वायरस से देश में मृतकों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। मध्य प्रदेश के इंदौर में 49 वर्षीय महिला के सोमवार (मार्च 30, 2020) रात दम तोड़ने के बाद राज्य में कोरोना वायरस संक्रमित मरीजों की मौत की संख्या बढ़कर पाँच हो गई है। इनमें से तीन अकेले इंदौर शहर के निवासी थे, जिनमें से दो की मौत पिछले 24 घंटे में हुई। जबकि दो मरीज उज्जैन के थे।

शासकीय महात्मा गांधी स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय के एक अधिकारी ने मंगलवार (मार्च 31, 2020) को बताया कि चंदन नगर क्षेत्र में रहने वाली 49 वर्षीय महिला ने मनोरमा राजे टीबी (एमआरटीबी) चिकित्सालय में आखिरी साँस ली। मृत महिला का नाम जरीन बी बताया जा रहा है। अधिकारी ने बताया कि 23 मार्च को कोरोना वायरस से संक्रमित पाई गई थी। उन्हें 29 मार्च को अरिहंत अस्पताल से एमआरटीबी अस्पताल में शिफ्ट किया गया। 30 मार्च की रात 10.20 बजे मौत हो गई। डॉक्टर ने बताया कि महिला उच्च रक्तचाप और मधुमेह से पहले ही पीड़ित थी। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि कोरोना वायरस संक्रमण के बाद अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ने वाली महिला ने पिछले दिनों कोई यात्रा नहीं की थी। यानी कि इस मृतक महिला की न तो कोई ट्रैवल हिस्ट्री थी और न ही ये किसी संक्रमित मरीजों के संपर्क में आई थी।

सोमवार को इंदौर और उज्जैन में कोरोना के 8 नए मामले सामने आए। महात्मा गाँधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज के कोरोना बुलेटिन के मुताबिक पॉजिटिव पाए गए 8 मरीजों में से सिर्फ 3 मरीज की ही कांटेक्ट हिस्ट्री है, जबकि शेष 5 मरीजों की कोई ट्रेवल हिस्ट्री नहीं है। इंदौर जैसी घनी आबादी वाले शहर के लिए यह भयावह संकेत है। यहाँ अब तक जो मरीज कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं, उनमें से अधिकांश की कोई ट्रैवल हिस्ट्री नहीं है। यह एक गंभीर स्थिति है। देखा जाए तो यह सिर्फ इंदौर के लिए ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए खतरनाक है।

कोरोना संक्रमण से देश में 27 राज्य प्रभावित हैं। इसमें मध्य प्रदेश दसवें नंबर पर है। लेकिन अगर इसके शहरों की बात की जाए तो 24 मार्च तक कोरोना मुक्त रहा इंदौर बीते पाँच दिनों में देश के सबसे संक्रमित शहरों की सूची में आठवें नंबर पर आ गया है। केरल में देश का पहला मरीज 30 जनवरी को सामने आया था। महाराष्ट्र और दूसरी जगहों पर मार्च के पहले और दूसरे हफ्ते में मरीजों का आना शुरू हुआ। इंदौर में मरीज बढ़ने की रफ्तार जो रविवार तक 380% थी, वह अब 540% हो गई है।

मध्‍य प्रदेश के स्वास्थ्य अधिकारी के अनुसार, सोमवार तक मध्य प्रदेश में कोरोना वायरस से 47 लोगों के संक्रमित होने की पुष्टि हुई है। इनमें से सबसे अधिक 27 मरीज इंदौर में हैं, जबकि जबलपुर में आठ, उज्जैन में पाँच, भोपाल में तीन और शिवपुरी एवं ग्वालियर में दो-दो लोग संक्रमित हुए हैं। कोरोना के इन 47 मरीजों में से 43 का इलाज अलग-अलग अस्पतालों में किया जा रहा है। राज्‍य में कोरोना वायरस संक्रमित पाँच लोगों की मृत्यु हो चुकी है।

किसानों की तबाही का कारण बनेगा कोरोना: गाँवों से होकर देश भर में संक्रमण फैलने का ख़तरा

आज कोरोना संकट अंतरराष्ट्रीय आपदा बन चुका है। धीरे-धीरे विश्व के सभी देश इसकी चपेट में आते जा रहे हैं। भारत में भी यह महामारी क्रमशः अपने पाँव पसारती जा रही है। इससे निपटने के लिए प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने 25 मार्च से 14 अप्रैल तक 21 दिन का ‘लॉकडाउन’ लागू कर दिया है। इस ‘लॉकडाउन’ के दौरान सभी देशवासियों को अपने घरों में ही रहने के लिए कहा गया है। साथ ही, यह भी स्पष्ट निर्देश है कि जो अभी जहाँ है, वहीं रहे। कोरोना पर हुए अभी तक के शोधों से यही तथ्य उभरकर सामने आया है कि लोगों की आवाजाही और आपसी मेल-मुलाक़ात को रोककर ही इस महामारी को नियंत्रित किया जा सकता है। ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ से ही बचाव हो सकता है और बचाव ही इस समय सबसे बड़ा इलाज है।

कोरोना संकट विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और विश्व के अत्यंत संपन्न, सक्षम और विकसित देश चीन में शुरू हुआ। उसके बाद कोरोना संक्रमण वायुयान यात्रियों के माध्यम से यूरोप, अमेरिका और एशिया के अन्य देशों में फैलता चला गया है। आज एक अमीर देश में शुरू हुई यह महामारी समृद्ध संवाहकों द्वारा फैलकर न सिर्फ विश्वव्यापी हो गई है, बल्कि इसने गरीबों को भी अपनी चपेट में ले लिया है। उल्लेखनीय है कि पुराने समय में प्लेग आदि संक्रामक रोग गरीबों से अमीरों की ओर संक्रमित होते थे। कोरोना संक्रमण इस मायने में विशेष है कि यह अमीरों से गरीबों की ओर फैल रहा है। इसी का दुखद परिणाम है कि आज भारत देश की राजधानी दिल्ली के बॉर्डरों और बस-अड्डों पर भारत विभाजन के समय जैसे दृश्य नज़र आ रहे हैं।

दिल-दिमाग को झकझोर देने वाले भय, भूख और अनिश्चितता के दृश्य। रेहड़ी-ठेले वाले, रिक्शा-ऑटो चलाने वाले, छोटी-मोटी नौकरियाँ करने वाले, फैक्ट्रियों-कारखानों में काम करने वाले असंख्य अस्थायी/दिहाड़ी प्रवासी मजदूर स्त्री-पुरुष कट्टे–बोरियों और गठरियों में अपनी पूरी गृहस्थी समेटे अपने गाँव की ओर पलायन कर रहे हैं। ये हजारों स्त्री-पुरुष भूखे पेट हैं और पैदल हैं। भूख-प्यास से बिलबिलाते और बिलखते छोटे-छोटे बच्चे उनके साथ हैं। ऐसे में न तो उन्हें सोशल डिस्टेंसिंग की परवाह है, न ही उनके लिए वैसा कर पाना संभव ही है। ये लोग बिहार, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान आदि के प्रवासी मजदूर हैं। ऐसे दृश्य दिल्ली के आसपास कुछ ज्यादा जरूर हैं, किन्तु सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं हैं। रोटी-रोजगार के दिल्ली, मुंबई जैसे और भी जितने केंद्र हैं, वहीं भूख, संताप और पलायन के ऐसे हृदयविदारक दृश्य हैं।

ये प्रवासी मजदूर तमाम दुःख और कष्ट झेलकर जैसे-तैसे अपने घर, अपने गाँव पहुँच भी जाएँगे तो कहना मुश्किल है कि उनमें कितने स्वस्थ होंगे और कितने संक्रमित। अगर वे कोरोना संक्रमण के संवाहक बन गए तो जिन गाँवों में वे वापस जा रहे हैं, वहाँ तो तबाही आ जाएगी। कोरोना का कहर एक बार ग्रामीणों पर टूट पड़ा तो फिर क्या होगा, उसका अनुमान लगाना और सोचना तक मुश्किल है। गाँवों में न तो पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएँ हैं, न ही साधन-संसाधन। गरीबी और अभाव इक्कीसवीं सदी के भारत की भी वर्तमान वास्तविकता है। अभाव महज साधनों और सुविधाओं का ही नहीं है, जागरूकता का भी है। अभी भी भारत की दो-तिहाई आबादी गाँवों में ही बसती है।

जागरूकता और पर्याप्त साधनों और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में यह संक्रमण एक गाँव से दूसरे गाँव होता हुआ बड़ी तेजी से पूरे भारत में फ़ैल सकता है। इस पलायन को तत्काल रोककर इस आपदा को गाँवों तक पहुँचने से रोका जाना चाहिए। प्रवासियों को भोजन और भावनात्मक आश्वस्ति देकर ही ऐसा संभव है। दुःखद बात यह है कि सरकारों और नागरिक समाज के अभी तक के प्रयत्न पर्याप्त नहीं हैं। उनकी असफलता और अपर्याप्तता इस त्रासदी को गुणात्मक रूप से बढ़ाएगी। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, और बिहार सरकारों को ज्यादा सजग, सक्रिय और संवेदनशील होने की आवश्यकता है।

‘रोज कुआँ खोदकर पानी पीने वाले लोग’ जिस भी शहर में हैं, उनकी हालत बहुत खराब है, और आगे इससे भी बदतर होने की आशंका है। काम-धंधा ठप्प है। न रोजगार है, न रोटी है। न रहने-सोने का कोई ठौर-ठिकाना। भूख से बिलबिलाते इन पेटों को यह विश्वास देना आपद् धर्म है कि एक समाज के रूप में, एक राष्ट्र के रूप में हम साथ-साथ हैं। इसलिए सरकारों, स्वयंसेवी संस्थाओं  और नागरिक समाज को इस संकट की घड़ी में इन गरीब-वंचित और अभागे लोगों की मदद और भरण-पोषण के लिए आगे आना चाहिए। भूख की भयावह और कारुणिक तस्वीरें मीडिया में दिख रहीं हैं। इस संकट की खासियत यह है कि इसमें सबकी नियति परस्पर सम्बद्ध है। सिर्फ आगा-पीछा हो सकता है। इसलिए इस आपदा से हमें एक परिवार, एक राष्ट्र के रूप में मिलकर लड़ने की आवश्यकता है। संगठित कोशिशें ही मनुष्यता की इस सबसे बड़ी लड़ाई में फलीभूत होंगी।

यूँ तो कोरोना संकट ने वैश्विक अर्थ-व्यवस्था को ही धराशायी कर डाला है। अमेरिका, चीन, इंग्लैंड, जर्मनी, जापान और भारत जैसे देशों की आर्थिक-सामाजिक गतिविधियों को एकदम ठप्प कर दिया है। इसके प्रभावों से अब विश्व का कोई देश और समाज का कोई तबका अछूता और अप्रभावित नहीं है। मगर भारत जैसे विकासशील देशों में गरीबों पर कोरोना का सर्वाधिक कहर टूटेगा क्योंकि यहाँ सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा की न तो समुचित व्यवस्थाएँ हैं, और न ही पर्याप्त संसाधन हैं। कोरोना के चलते कामकाज ठप्प होने से सर्वाधिक गरीब तबका प्रभावित हुआ है। इसी प्रकार संक्रमित होने पर भी सर्वाधिक परेशानी उसे ही होने वाली है क्योंकि अभी तक तो इलाज सरकार की ओर से हो रहा है, परन्तु अगर यह संकट बढ़ता है तो न तो सरकारी अस्पताल और स्वास्थ्य सुविधाएँ पर्याप्त होंगी, न ही रूपए-पैसे के अभाव में गरीब लोग निजी अस्पतालों में इलाज करा सकेंगे। वे दवाई-गोली, खान-पान, आराम और परहेज की भी समुचित व्यवस्था न कर सकेंगे। इस संकट के समाप्त होने के बाद काम-धंधे चौपट होने का भी सबसे ज्यादा असर इसी वंचित वर्ग के ऊपर होगा। असंगठित क्षेत्र में कार्यरत मजदूरों के रोजगार अवसरों की समाप्ति, संगठित क्षेत्र में छँटनी, वेतन में कटौती आदि के शिकार यही लोग होंगे। अगर यह संकट तीन-चार महीने चलता है, तो यह तबका भूख और बेरोजगारी से पूरी तरह तबाह हो जाएगा।

इस साल सर्दियों में हुई बेमौसम भयानक वर्षा और ओलावृष्टि ने भारत के अन्नदाताओं को पहले से ही तबाह कर रखा है। खेतों में ही खड़ी फसलें बर्बाद हो गयीं हैं। जो थोड़ी-बहुत आस-उम्मीद बची थी उसे कोरोना के कहर ने तोड़ डाला। अभी आलू की खुदाई और भराई का समय है, कुछ दिन में सरसों और फिर गेहूँ की कटाई-मढ़ाई का समय आ जाएगा, लेकिन कोरोना के कहर के चलते ये काम कैसा और कितना हो सकेगा, कहना मुश्किल है। फसलों के नुकसान से किसान तो तबाह होगा ही, दाल-रोटी के दाम भी बढ़ जाएँगे और उससे भी सबसे ज्यादा मुश्किलें अगर किसी की बढ़ेंगी तो वह गरीब-वंचित तबका ही होगा।   

केंद्र सरकार की 1.70 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा स्वागत योग्य पहल है। परन्तु यह पर्याप्त नहीं है। इसे और भी बढ़ाए जाने की आवश्यकता है। मानव जीवन को रुपए-पैसे से खरीदा नहीं जा सकता, मगर सही समय पर जरूरतमंदों को साधन-सुविधाएँ मुहैया कराकर जिंदगियों को बचाया जरूर जा सकता है। समस्या बढ़ने और आवश्यकता पड़ने पर केंद्र सरकार द्वारा ‘वित्तीय आपातकाल’ भी लगाया जाना चाहिए। साथ ही, सभी राज्य सरकारों को भी अपने स्तर पर ऐसे आर्थिक पैकेज लागू करने चाहिए। इनमें गरीबों-वंचितों (मजदूरों-किसानों) को प्राथमिकता देनी चाहिए। ये जो सामाजिक-आर्थिक विकास की पंक्ति के आखिर में खड़े लोग हैं, दरिद्र नारायण हैं। सिर्फ भूखे पेट नहीं हैं, बल्कि भारत की अर्थ-व्यवस्था के मेरुदंड हैं। अंतिम जन की चिंता करना न सिर्फ राज्य का बल्कि समाज का भी प्राथमिक कर्तव्य है। इसलिए इस संकट-बेला में सभी व्यक्तियों-उद्योगपतियों, कलाकारों, नौकरीपेशाओं; सबको अपनी सामर्थ्य से बढ़कर सहयोग करना चाहिए। हम सबको भी अपने हिस्से का योगदान करना होगा। सिर्फ सरकारों के भरोसे हम इस महामारी से नहीं लड़ सकते हैं।

कोरोना के संदिग्ध मरीज़ों की सूचना देना बबलू को पड़ा महँगा, पीट-पीटकर गाँव वालों ने कर दी हत्या

कोरोना को लेकर लोगों के मन में व्यापक स्तर पर डर बसा हुआ है। लोग खुद को इससे बचाने के लिए हर मुमकिन प्रयास कर रहे हैं। लोगों की कोशिश है कि उन्हें जिन लोगो में इस बीमारी के लक्षण दिखाई दें, वे उससे दूरी बनाएँ और उसकी सूचना फौरन प्रशासन को दें। अब हालाँकि, जागरूकता अभियान के कारण कई जगहों पर लोग इसका अनुसरण कर रहे हैं। लेकिन बिहार के सीतामढ़ी में जागरूक होने के कारण एक व्यक्ति की हत्या कर दी गई। घटना सीतामढ़ी जिले रुन्नीसैदपुर थाना के मधौल गाँव में घटी। यहाँ कोरोना के संदिग्धों की सूचना प्रशासन को देने के कारण एक युवक को मार डाला गया।

न्यूज18 की खबर के अनुसार, आरोपित पक्ष युवक से सिर्फ इसलिए नाराज था क्योंकि उसने उनके कोरोना वायरस से संक्रमित संदिग्ध होने की सूचना मेडिकल हेल्पलाइन नंबर पर दे दी थी। बता दें कि युवक ने महाराष्ट्र से लौटे दो लोगों के कोरोना वायरस के संदिग्ध मरीज होने की सूचना दी थी। जिसके बाद मेडिकल टीम गाँव में पहुँचकर दोनों युवकों को जाँच के लिए ले गए। लेकिन कोरोना वायरस की पुष्टि नहीं होने पर दोनोंं को रिहा कर दिया गया।

अब घर पहुँचते ही दोनों युवकों ने सुरक्षा लिहाज से की गई इस जाँच को शान में गुस्ताखी समझ लिया और अपने परिवार के सदस्यों के साथ लड़के के घर पर पहुँच गए। दोनों ने परिजनों के साथ मिलकर युवक को खूब मारा और उसे पीट-पीटकर जख्मी कर दिया। 

गंभीर हालत देखकर उसे रुन्नीसैदपुर पीएचसी में भर्ती कराया गया। लेकिन वहाँ भी उसका इलाज संभव नहीं हुआ। जिसके बाद उसे मुजफ्फपुर रेफर कर दिया गया। मुजफ्फरपुर एसकेएमसीएच में ले जाने के दौरान उसकी मौत हो गई। मृतक की पहचान बबलू कुमार के रूप में हुई।

मृतक के घरवालों ने इस मामले में मुजफ्फरपुर के अहियापुर थाने में पुलिस को अपना बयान दर्ज करवा दिया है। पोस्टमॉर्टम के बाद बबलू का शव उन्हें सौंपा जाएगा। मृतक के भाई गुड्डू के बयान पर पुलिस ने गाँव के ठगा महतो, सुधीर कुमार, विकास महतो, मदन महतो, दीपक कुमार और मुन्ना महतो को अभियुक्त बनाया है। पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दो आरोपितों सुधीर महतो और मुन्ना महतो को गिरफ्तार कर लिया है। अब इन पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

UP के 157 लोग भी गए थे निजामुद्दीन मरकज, 18 जिलों की पुलिस ने सबको कर लिया ट्रेस, मेडिकल जाँच जारी

दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित तब्लीगी जमात के मरकज यानी इस्लामिक धार्मिक केंद्र के आयोजन में उत्तर प्रदेश के 157 लोगों के शामिल होने की खबर है। इसकी सूचना के बाद शासन में हड़कंप मच गया। इसके बाद तब्लीगी मरकज में गए उत्तर प्रदेश के लोगों के बारे जानकारी जुटाने के लिए डीजीपी मुख्यालय ने एक पत्र जारी कर सभी जिलों से जानकारी माँगी।

डीजीपी ऑफिस ने संबंधित जिलाधिकारियों को निजामुद्दीन मरकज में ठहरे यूपी के लोगों की लिस्ट देकर उनसे संपर्क करने और उनका कोरोना वायरस टेस्ट कराने का निर्देश दिया। 18 जिलों के पुलिस अधीक्षकों से कहा गया है कि जमात में शामिल लोगों की पहचान कर उनकी मेडिकल जाँच कराई जाए। 

आदेश के बाद तेजी से हरकत में आई उत्तर प्रदेश पुलिस ने बताया है कि उन सभी 157 लोगों को ट्रेस कर लिया गया है, जो कि निजामुद्दीन के तब्लीगी जमात में शामिल हुए थे।

पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) हितेश चंद्र अवस्थी की ओर से जारी पत्र के मुताबिक, गाजियाबाद, मेरठ, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली, हापुड़, बिजनौर, बागपत, वाराणसी, भदोही, मथुरा, आगरा, सीतापुर, बाराबंकी, प्रयागराज, बहराइच, गोंडा और बलरामपुर के लोग तब्लीगी जमात में शामिल होने गए थे। इसमें शामिल लोगों की लिस्ट इन जिले के पुलिस अधीक्षकों को भेजी गई है। डीजीपी ने सभी एसपी ने मंगलवार (मार्च 31, 2020) दोपहर 3 बजे तक रिपोर्ट तलब की है। 

बता दें कि दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में हुए तब्लीगी जमात में अलग-अलग राज्यों के लोग शामिल हुए थे। इस आयोजन में लोगों को धर्म की शिक्षा देकर इसके प्रचार-प्रसार के लिए देश के अलग-अलग मस्जिदों में भेजा गया था। दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मरकज में देश विदेश से तकरीबन 1500 से 1700 लोग जुटे थे। लॉकडाउन के बाद भी ये लोग छिपकर मरकज में ही रह रहे थे। निजामुद्दीन स्थित मरकज बिल्डिंग में मौजूद अब तक 24 लोग कोरोना वायरस से पॉजिटिव निकले हैं। दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सतेंद्र जैन ने बताया कि मरकज में शामिल 300 लोगों को अब तक अस्पताल में शिफ्ट किया गया है, जबकि करीब 700 से 800 लोगों को आइसोलेट किया गया है।

उल्लेखनीय है कि निजामुद्दीन का यह मरकज इस्लामी शिक्षा का दुनिया में सबसे बड़ा केंद्र है। यहाँ कई देशों के लोग आते रहते हैं। मरकज से कुछ ही दूर सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह है। तबलीगी जमात के मरकज में 1 से 15 मार्च तक 5 हजार से ज्यादा लोग आए थे। इनमें इंडोनेशिया, मलेशिया और थाईलैंड के लोग भी शामिल थे। केजरीवाल सरकार ने दिल्ली पुलिस से निजामुद्दीन मरकज के मौलाना के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने को कहा है।

पटना, राँची के बाद अब अहमदनगर के मस्जिद से मिले 10 विदेशी, ट्रस्टी हुए गिरफ्तार

पटना, राँची और दिल्ली के बाद महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के नेवासा नगर स्थित एक मस्जिद से 10 विदेशियों को पुलिस ने हिरासत में लिया। इस खबर की जानकारी मराठी समाचार पोर्टल देशदूत में प्रकाशित हुई। देशदूत के मुताबिक इन दसों लोगों को पुलिस ने पकड़ लिया है और मस्जिद के ट्रस्टियों पर महाराष्ट्र आपदा प्रबंधन कानून के तहत मामला दर्ज किया है।

पुलिस कॉन्स्टेबल प्रताप सिंह भगवान ने इस संबंध में एफआईआऱ दर्ज की है। उन्होंने बताया कि 30 मार्च को नेवासा में पट्रोलिंग के दौरान रणजीत देर को एक खबरी से मालूम हुआ कि नेवासा के मरकूस मस्जिद में कुछ विदेशी ठहरे हैं। पुलिस ने जब इस सूचना के आधार पर पड़ताल की तो खबर सच्ची निकली। 

पूछताछ में पता चला कि इनमें से 5 नागरिक पूर्वी अफ्रीका के डिजबूती (जिबूती) शहर के हैं। जबकि एक बेनिन, 3 डेकॉर्ट और एक घाना का है। पुलिस ने मस्जिद के ट्रस्टी जुम्माखान नवाबखान पठान और सलीम बाबूलाल पठान को कोरोना फैलाने के आरोप में और आदेशों का उल्लंघन करने के आरोप में कई धाराओं के तहत गिरफ्तार कर लिया है।

गौरतलब है कि इससे पहले बिहार की राजधानी पटना से भी 12 विदेशियों को छिपाने का मामला सामने आया था। उस दौरान पड़ताल पर मालूम हुआ था कि पकड़े गए सभी लोग तजाकिस्तान के हैं और भारत में धर्म प्रचार करने आए थे। मगर, बिन कोरोना की जाँच करे सबसे छिपकर घूम रहे थे।

पटना में विदेशी मौलवी

इसके बाद झारखंड की राजधानी राँची के स्थित मस्जिद से भी 11 विदेशी मौलवियों को पुलिस प्रशासन ने हिरासत में लिया था। ये भी जाँच में मजहब प्रचारक के तौर पर ही सामने आए थे। इनमें से 3 मौलवी चीन से थे जबकि 4-4 किर्गिस्तान और कजाकिस्तान से थे। 

राँची में विदेशी

इसी तरह दिल्ली में भी कल निजामुद्दीन के पास मरकज भवन में कई विदेशियों के मिलने की सूचना सामने आई। जहाँ मलेशिया, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और किर्गिस्तान समेत कई देशों के करीब 2500 से अधिक लोगों ने 1 से 15 मार्च तक तब्लीग-ए-जमात में हिस्सा लिया और बाद में उनमें से कई यहीं रुके रहे। चिंताजनक बात ये है कि इनमें से 24 की कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई है।

दिल्ली निजामुद्दीन का दृश्य

800 विदेशी इस्लामिक प्रचारक होंगे ब्लैकलिस्ट: गृह मंत्रालय का फैसला, नियम के खिलाफ घूम-घूम कर रहे थे प्रचार

इंडोनेशिया के लगभग 800 इस्लामिक प्रचारकों को ब्लैकलिस्ट करने का निर्णय केंद्रीय गृह मंत्रालय ने लिया है। ये सारे पर्यटक वीजा पर भारत आए थे और इस महीने दिल्ली में तीन दिवसीय मजहबी सम्मेलन में भाग लिया था।

एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने द हिंदू को बताया कि दक्षिण दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में तबलीगी जमात के मुख्यालय अलमी मरकज बंगलेवाली मस्जिद में इस महीने की शुरुआत में देश भर से लगभग 8,000 लोग शामिल हुए थे। अधिकारी ने बताया कि देश भर से कई लोग, जिनका कोरोना टेस्ट पॉजिटिव निकला, उन लोगों ने या तो इस मजहबी सभा में हिस्सा लिया था या फिर इसमें शामिल होने वाले लोगों के संपर्क में आए थे।

अधिकारी ने कहा, “वे पर्यटक वीजा पर यहाँ आए थे लेकिन मजहबी सम्मेलनों में भाग ले रहे थे, यह वीजा नियमों के शर्तों का उल्लंघन है। हम लगभग 800 इंडोनेशियाई प्रचारकों को ब्लैकलिस्ट करने जा रहे हैं ताकि भविष्य में वे देश में प्रवेश न कर सकें।” बता दें कि भारत और इंडोनेशिया के बीच वीजा की व्यवस्था है। इसके तहत और नागरिकों के लिए पर्यटक वीजा की अनुमति है।

योगी सरकार ने UP में सभी निजी अस्पतालों को तत्काल खोलने के दिए आदेश, नहीं तो होगी कार्रवाई

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन सभी प्राइवेट अस्पतालों को तत्काल खोलने का आदेश दिया है, जो लॉकडाउन के कारण बंद हैं। राज्य सरकार की ओर से सभी जिलों के जिलाधिकारियों को एक आदेश जारी कर कहा गया है कि यदि निजी अस्पताल नहीं खोले गए तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

इस संबंध में मुख्य सचिव आरके तिवारी का कहना है कि उन्हें कई जिलों से इस बात की शिकायत मिली है कि उनके यहाँ प्राइवेट हाॅस्पिटल बंद होने से काफी परेशानी हाे रही है। बड़ी संख्या में लोग उपचार के लिए भटक रहे हैं, जबकि लाॅकडाउन के दाैरान अस्पताल बंद करने का काेई आदेश नहीं था। अस्पतालों में चिकित्सा कर्मचारियों और दवाओं की उपलब्धता आवश्यक है और निर्देशों का उल्लंघन करने वाले अस्पताल संचालकों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। आरके तिवारी ने कहा कि अस्पताल में सोशल डिस्टेसिंग को अपनाकर इलाज किया जा सकता है। 

इस संबंध में कई हाॅस्पिटल के मालिकों का कहना है कि लॉकडाउन के चलते स्टाफ नहीं आ पा रहा है। लिहाजा अस्पताल बंद हैं। जबकि अस्पताल अत्यावश्यक सर्विस के तहत आते हैं। 

वहीं नोएडा के सेक्टर 135 में स्थित में सीजफायर नाम की से जुड़े 16 लोगों में कोरोना संक्रमण की पुष्टि होने के बाद इसे सील कर दिया गया है। स्वास्थ्य विभाग ने कंपनी के खिलाफ FIR दर्ज किया है। सीज फायर कंपनी में बीते दिनों लंदन से एक ऑडिटर आया था और कंपनी ने इसकी बात प्रशासन से छुपाई। वह ऑडिटर पास के ही एक फाइव स्टार होटल में भी ठहरा था। कंपनी की लापरवाही से 11 कर्मचारी समेत कुल 16 लोगों में कोरोना का संक्रमण फैला है।

सोमवार को नोएडा पहुँचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लॉकडाउन के बावजूद वहाँ कोरोना फैलने की वजहों की पड़ताल की तो अधिकारियों के जवाब पर उनका गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने जिलाधिकारी बीएन सिंह से जवाब माँगा तो संतोषजनक जवाब न मिलने पर उन्होंने बैठक में मौजूद अफसरों पर नाराजगी जताई। इस बीच सरकार ने सख्त कदम उठाते हुए नोएडा के डीएम को हटा दिया है और उनकी जगह सुहास एल वाई को गौतम बुद्ध नगर का नया डीएम बनाया गया है। 

निजामुद्दीन मरकज में मौजूद 24 लोग कोरोना+: तेलंगाना में यहीं आए 6 की मौत, अंडमान के सभी 10 मामले यहीं के

दिल्ली के निजामुद्दीन में तब्लीग-ए-जमात में हिस्सा लेने वालों के कारण सरकार की मुश्किलें और कोरोना का कहर राजधानी में बढ़ता चला जा रहा है। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, मरकज भवन में मौजूद 24 लोगों की कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव होने की सूचना है। खुद दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने इसकी जानकारी दी है।

बता दें कि दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन स्थित मरकज में मलेशिया, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और किर्गिस्तान समेत कई देशों के करीब 2500 से अधिक लोगों ने 1 से 15 मार्च तक तब्लीग-ए-जमात में हिस्सा लिया था। अब इनका पता लगने के बाद पूरे इलाके की कड़ी निगरानी की जा रही है और हर संदिग्ध को अस्पताल में एहतियात के तौर पर भर्ती किया जा रहा है। इनमें से 24 लोगों की रिपोर्ट कोरोना पॉजिटिव निकल आई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, निजामुद्दीन के मरकज भवन में मेडिकल टीम और पुलिस मौजूद है। समाचार एजेंसी एएनआइ के अनुसार इस महीने के शुरू में मरकज में लगभग 2500 लोग एक कार्यक्रम में शामिल हुए थे। इनमें से करीब 1400 लोग पूरा कार्यक्रम समाप्त होने के बाद भी यहीं रुके रहे थे। अब सोमवार को खुलासा होने के बाद इनमें से 860 लोगों को बिल्डिंग से अस्पतालों में शिफ्ट किया गया है और 300 को शिफ्ट करना बाकी है। इस समय वहाँ ड्रोन की मदद से निगरानी की जा रही है।

बता दें कि दिल्ली में सोमवार को 25 और नए मरीज सामने आए थे। इनमें 18 कोरोना पीड़ित निजामुद्दीन में तब्लीगी मरकज में शामिल होने वाले निकले। आज के 24 लोग अब इस संख्या में और जुड़ गए। मतलब दिल्ली में कोरोना पॉजिटिव के हालिया मामले में से 50% से ज्यादा मामले सिर्फ इस एक कार्यक्रम में शामिल होने वाले लोग हैं।

जानकारी के मुताबिक, सोमवार को निजामुद्दीन स्थित मरकज में शामिल होने वाले छह लोगों की तेलंगाना में कोरोना वायरस से मौत हो गई। वहीं अंडमान में 10 लोगों की रिपोर्ट में कोरोना वायरस संक्रमण की पुष्टि हुई। इन 10 में 9 लोग वह हैं, जो दिल्ली की मरकज में शामिल हुए थे। 10वीं संक्रमित महिला भी इन्हीं में से एक पत्नी है, जो दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मरकज में शामिल हुए थे।

गौरतलब है कि निजामुद्दीन के मरकज भवन के कारण ना केवल दिल्ली सरकार बल्कि अन्य राज्य सरकारों की मुश्किलें भी काफी बढ़ गई हैं। इस मामले में तेलंगाना के मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से बयान जारी कर कहा गया कि दो लोगों की मौत गाँधी अस्पताल में हुई। एक-एक व्यक्ति की मौत दो निजी अस्पतालों में और एक व्यक्ति की मौत निजामाबाद और एक व्यक्ति की मौत गडवाल शहर में हुई।