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जामिया विडियो: वामपंथियों की ऐसे लीजिए कि वो ‘दुखवा मैं का से कहूँ’ मोड में आ जाएँ

पिछले दो दिनों में कुछ विडियो आए। जामिया मिल्लिया इस्लामिया से था, मिल्लिया जैसी कोई बात तो दिसंबर के दंगों के बाद दिखी नहीं। दिसंबर में जामिया नगर इलाके में जहाँ यह इस्लामिया यूनिवर्सिटी है, वहाँ कट्टरपंथी संगठन के फसादियों ने न सिर्फ यूनिवर्सिटी इलाके में अपने 150 गुर्गे छोड़ दिए, बल्कि नई जानकारियों के अनुसार इस पूरे प्रकरण में जामिया इस्लामिया के कई छात्रों की संलिप्तता भी बताई जा रही है।

साथ ही, साठ दिनों के बाद क्लिप और क्रॉप किए हुए विडियो का एक-एक कर बाहर आना यही बताता है कि सब कुछ सही तो नहीं ही है। पहले विडियो में, जो कि मात्र 29 सेकेंड का था, पुलिस को लाइब्रेरी में घुसते ही लाठी मारते दिखाया गया; दूसरा 44 सेकेंड का था, जिसमें पुलिस बाहर से फसादियों का पीछा करते हुए घुसती दिखती है, फिर उन्हें पहचानने के बाद लाठी चार्ज करती है। उसके बाद तीसरा विडियो भी आया जो 2 मिनट 20 सेकेंड का था, जिसमें उत्पाती लम्पट फसादी लाइब्रेरी में घुसते, गेट को टेबल आदि से जाम करते, दीवारों से कूदते दिखे।

इसके बाद एक और विडियो आया जिसमें पुलिस इन फसादियों से शांत होने की अपील कर रही है, और यूनिवर्सिटी के भीतर से पत्थरबाजी ऐसे जारी है जैसे इन्होंने बाकायदा ट्रेनिंग ले कर ‘डिप्लोमा इन पत्थरबाजी’ की हुई है। पुलिस आँसू गैस के गोले दाग रही है। एक और विडियो किसी मकतूब मीडिया ने जारी किया जिसमें सिर्फ पुलिस का लाठी चार्ज ही है, और एक जगह पुलिस का जवान सीसीटीवी कैमरे की तरफ लाठी चलाता दिख रहा है।

सीसीटीवी पर लाठी मारने वाले अमूमन मूर्ख होते हैं क्योंकि कैमरा तोड़ने से पहले की रिकॉर्डिंग डिलीट नहीं हो जाती। खैर, ये सामान्य बात जब जेएनयू जैसी संस्थाओं के बुजुर्ग कामपंथी वामभक्त छात्र-छात्राएँ नहीं समझ पाते, तो पुलिस का जवान तो फिर भी उनसे कम पढ़ा लिखा ही होता है। दूसरी बात, इन वामपंथी लम्पटों से किसी ने सवाल नहीं पूछा कि उन्होंने जनवरी के पहले सप्ताह में जेएनयू के कई जगहों के कैमरे और सर्वर रूम को क्यों तोड़ा, पर हाँ पुलिस ने कैमरा क्यों तोड़ा, यह सवाल बराबर ट्रेंड होगा। लेकिन आप चिंता न करें, इन कामियों के सवालों का जवाब देने की कोई आवश्यकता नहीं, इनसे जेएनयू के दंगाई कामपंथियों और जामिया के फसादियों वाले सवाल पूछते रहिए।

सॉल्टन्यूज और न्यूजलौंडी की करतूत

वामियों के पैगंबर रवीश कुमार की करतूत आप देखिए कि पहले कटा हुआ दिखाया, फिर जब नग्नता पकड़ी गई तो कहने लगे कि सारे फ्लोर के विडियो की जाँच होनी चाहिए। उसके बाद और फुटेज में जब जामिया इस्लामिया के फसादी और दंगाई छात्रों का सच बाहर आने लगा, तो चुप हो कर अशोका होटल की सीढ़ियों के पास रखे गुलाबों की बात करते पाए गए।

इसके बाद कामपंथी तंत्र के गंजे और झबरे ने बाकी का काम ठेके पर उठाया, और बताने लगे कि लम्बे वालों वाला पीएचडी छात्र हाथ में वॉलेट लिए हुए है, जिसे हमने (और कई अन्य मीडिया वालों ने) पत्थर कह कर रिपोर्ट कर दिया था। आपको लगेगा कि इसमें समस्या क्या है, फॉल्ट न्यूज और न्यूजलौंडी तो सत्य बता रहे हैं।

नहीं, वो सत्य बता नहीं रहे हैं बल्कि कामपंथी वामभक्तों की लम्पटई की ट्रेनिंग के प्रयोग से मुद्दे से आपको भटका रहे हैं। लाइब्रेरी पढ़ने की जगह होती है, वहाँ मास्क लगा कर ये दसियों फसादी कैसे घुसे? ये कहाँ से आए थे? जब ऑल्ट न्यूज के गंजे और न्यूजलौंडी के झबरे कि टीम ‘हाय रिजॉल्यूशन’ तस्वीरों की बात करती है, तो वो अब और भी अल्ट्रा एचडी फुटेज ला कर देखे कि इन फसादियों के हाथों पर बाहर की धूल या पत्थर पकड़ने से लगे बालू के कण हैं कि नहीं?

साबित करना है और फोरेंसिक साइंस के एक्सपर्ट बने फिरते हो तो बताओ न कि वो कहाँ से आया था, उसके हाथ में किताब क्यों नहीं है, वो बाकियों को लाइब्रेरी में क्यों घुसा रहा था? क्या लाइब्रेरी किसी के बाप की जागीर है कि कोई भी बाहर दंगे करने के बाद प्राइवेट प्रॉपर्टी समझ कर घुस जाएगा? मैं ये इसलिए पूछ रहा हूँ क्योंकि इन दंगाइयों और आतंकियों के हिमायतियों ने पब्लिक फंड से चलने वाले विश्वविद्यालयों को सिनेमा हॉल का पब्लिक ट्वॉयलेट बना दिया है, जहाँ असलम लव्स सलमा की जगह खिलाफत, तेरा मेरा रिश्ता क्या, अफजल तेरे अरमानों को, हिंदुओं कैलाश जाओ से ले कर स्वास्तिक को जलाने की इबारत दीवारों पर है।

‘नहीं, लाइब्रेरी में जो लड़का बाद में किताब खोलता है, उसको हमने आठवें एंगल से जाँचा तो पता चला कि उसके जूते का सोल सफेद है, उसने बाइक में आग नहीं लगाई, आप झूठ बोल रहे हैं।’ जबकि सत्य यह है कि उसने उस बाइक मे आग न लगाई हो, पर उसने किसी और बस या किसी और बाइक मे आग न लगाई हो, वो बाहर से पत्थरबाजी कर के भीतर न आया हो, ये इन न्यूजलौंडियों और सॉल्ट न्यूज के वैज्ञानिक खालू और चचाजान नहीं बता पाएँगे। वो फैक्टचेक दिल्ली पुलिस करेगी।

वामपंथी नैरेटिव फैले इससे पहले इनको तोड़िए

तो आप समझिए कि ये लोग बस डिफ्लेक्ट कर रहे हैं, मुद्दे की जगह कहीं और ले जाना चाह रहे हैं। इनके सवालों का जवाब मत दीजिए, कोई आवश्यकता नहीं। ये बस दुत्कारे जाने योग्य हैं। इनको तो, जहाँ भी दिखें, राह-बेराह थूकिए और निकलिए। वामपंथी विचारधारा और गजवा-ए-हिंद की चाह रखने वालों से इंगेज मत कीजिए, उनकी चर्चा में घुसने की बजाय उनसे हर सवाल पर दस सवाल अपने पूछिए।

ये सवाल मुद्दे से जुड़े भी हो सकते हैं, और मुद्दे से बिल्कुल अलग भी कि माओ ने जो लाखों लोगों को मारा उस पर क्या कहते हो? इनसे धरती पर हुए हर नरसंहार पर रैंडम प्रश्न पूछिए। ये बात जेएनयू की करें तो पूछिए शीतोष्ण कटिबंध पर किस तरह की घास उगती है। ये पूछें कि जामिया में पुलिस ने हिंसा क्यों किया तो आप पूछिए कि भूमध्य रेखा पर रोज बारिश क्यों होती है? उसके बाद जब ये पूछें कि इस चर्चा में ये प्रश्न क्यों आया तो आप कहिए कि उनकी औक़ात नहीं है कि आपसे सवाल पूछ कर जवाब पा जाएँ।

आज रवीश और गिरोह के सदस्य इस पर आख्यान लिखेंगे कि ‘हाथ में पत्थर’ वाली बात मिसलीडिंग है, फेक न्यूज है। लेकिन इससे यह बात कहाँ साबित होती है कि पुलिस ने गलत लोगों पर लाठीचार्ज किया। इससे ये सवाल भी उठता है कि साठ दिन बाद कटे हुए विडियो दिखाने के पीछे का प्रयोजन क्या था? शाहीन बाग के चर्चा में गायब होने के बाद ही ये विडियो, एक खास तरह की विचारधारा वालों के घालमेल से ही क्यों बाहर आया?

ये बात कहाँ साबित हो रही है कि लाइब्रेरी में जो गुंडे और मवाली घुसे थे, वो कहीं आग लगा कर या पत्थर फेंक कर नहीं आए थे? मिसलीडिंग तो यह बात भी है कि इन्हें न जानें क्यों ‘छात्र’ कहा जा रहा है! दंगाइयों को छात्र कह कर क्यों संबोधित किया जा रहा है? ताकि नैरेटिव में इन्हें मासूम समझा जाए? ये आपको मासूम लग रहे हैं? ये पुलिस पर बाहर में पत्थर फेंक रहे थे, संभवतः बसों को इन्हीं मे से किसी ने आग लगाई होगी, यह भी संभव है कि इनमें से कई तो यहाँ के छात्र भी नहीं होंगे, PFI के फसादी होंगे, फिर ये मासूम किस एंगल से हैं? अगर ये मासूम हैं तो मैं वामपंथियों की सबसे सशक्त आवाज हूँ!

आपको भटकाया जा रहा है। जैसे कश्मीरी हिन्दुओं के नरसंहार को ‘पलायन’ जैसे अतिसामान्य शब्द में समेट कर भुलाया जाता रहा है। जैसे आपको कभी बताया नहीं गया कि पलायन किस आतंक, नरसंहार, हिन्दू घृणा का परिणाम था। उसी तरह अब बात इस पर करने की कोशिश होगी कि मीडिया जिसे ‘हाथ में पत्थर’ वाला कह रही है, वो तो वॉलेट लिए हुए था।

ये तो वही बात हुई कि बस में आग लगाए सुलेमान और हम इस बात पर डिबेट कर रहे हों कि मीडिया ने कहा कि उसकी शर्ट का रंग पीला था, लेकिन गंजे के फैक्टचेक टीम ने पाया कि रंग तो सूगापंखी (यानी पैरट ग्रीन) था जो कि चमकीली धूप में पीला दिख रहा था। बस में अभी भी आग लगी हुई है, लगाने वाला लाइब्रेरी में है, उसके बाद वो शायद नेपाल पहुँच चुका होगा, लेकिन नालायक वामपंथी आपको इसमें उलझाए रखेगा कि शर्ट का रंग पीला है जो कि सॉल्ट न्यूज के गंजे ने जाँच कर साबित किया है।

डिफेंसिव होने का नहीं, आगे बढ़ कर अटैक करने का

इसलिए, आप उनके प्रश्न में मत उलझिए क्योंकि इनके कुकर्मों का पैटर्न ही यही है। इन्होंने दोगलई में सुपर स्पेशियालिटी का कोर्स किया हुआ है, इनके क्लिनिक चलते हैं जहाँ से मीडिया के हर कक्ष में इनके लल्लन और ललनाओं की कैम्पस प्लेसमेंट होती है। इसलिए, ये कहें कि उसके हाथ में तो वॉलेट है, तो आप कहिए कि वॉलेट ले कर क्या खजूर खरीदने गया था लाइब्रेरी में? वॉलेट हो या पत्थर, बिना किताब के, इतनी तेजी से, इतने फसादियों के साथ, लाइब्रेरी में हो क्या रहा था?

ये वहाँ के गेट को रीडिंग टेबल आदि से जाम क्यों कर रहे थे कि पुलिस को तोड़ कर घुसना पड़ा? इनसे पूछिए कि जो अभी बस फूँक कर आया होगा, वो उसी लाइब्रेरी में आग लगा देता तो जिम्मेदारी किसकी होती? क्या ये लोग यह सवाल नहीं करते कि लाइब्रेरी जल रही थी, तो पुलिस ने दंगाइयों को भीतर घुसने पर, पीछा कर के पकड़ा क्यों नहीं? ये पूछते कि क्या पुलिस को यह ट्रेनिंग नहीं दी जाती कि जो गुंडा एक जगह आग लगा रहा है, उसके दूसरे जगह आग लगाने की आशंका बढ़ जाती है? यही वामपंथी बेबी और बाबू जलती लाइब्रेरी को देख कर यह पूछते दंगेबाजों के मनोविज्ञान क्या पुलिस के पाठ्यक्रम में नहीं है? और अंत में कह देते कि पुलिस ने ही मोदी के कहने पर आग लगाई है।

इस पर डिफेंसिव होने की आवश्यकता नहीं है। बाहर से ये दंगाई आए, पुलिस ने पीछा किया, पकड़ा और समुचित कार्रवाई की गई। डिफेंसिव इसलिए मत होइए क्योंकि दंगाइयों की भीड़ में कोई एक-दो वाकई पढ़ने वाले हो सकते हैं, लेकिन वो अनुपात तो पुलिस के लिए भी होता है कि पूरे फोर्स में एक-दो बिना देखे लाठी मारता है, सीसीटीवी कैमरा तोड़ता है। पूरी पुलिस को उसके कारण बदनाम किया जा रहा है। यहाँ अनुपात उल्टा है, तो सबको निर्दोष कैसे मान लें?

पढ़ने वाले थे, होंगे, इससे इनकार नहीं है। लेकिन जिस तरह से एक भीड़ कमरे में घुसती, निकलती, भागती, बाहर से कूदती दिखती है, और बाहर के दंगों का संदर्भ लिया जाता है, तो लाइब्रेरी में पढ़ने वाले नगण्य ही रहे होंगे। विडियो में दिख रहा है कि कितने पहले थे, और कितने बाद में। विडियो तो वह भी याद आता है जिसमें लाइब्रेरी के तोड़-फोड़ का विडियो बनाता छात्र दूसरे से कह रहा है कि ‘यार अपनी ही प्रॉपर्टी क्यों बर्बाद कर रहे हो?’

यहाँ डिफेंड मत कीजिए, सवाल पूछिए और बार-बार पूछिए कि वो कहाँ से आए थे? सवाल पूछिए कि जब उसके हाथ में वॉलेट था तो उसने सारे सोशल मीडिया अकाउंट डीएक्टिवेट क्यों कर लिए? सवाल पूछिए कि पत्थर क्या आसमान से गिरे थे पुलिस पर? पुलिस जब अपील कर रही थी कि ‘बच्चों पत्थर मत फेंको’ तो क्या वो बस माहौल बनाने के लिए था? सवाल पूछिए कि वहाँ जब PFI के 150 फसादी मजहबी इलाके में छुपे हुए थे तो क्या पुलिस को खबर की गई?

वामपंथियों के सवालों का जवाब मत दीजिए, सवाल पूछिए। एक पर दस पूछिए। ये सपोले जहर से भरे हुए हैं, जो शरजील पर चुप हैं, भारत के कटे नक्शे पर चुप हैं, स्वास्तिक जलाने पर चुप हैं, हिन्दू घृणा के नारों पर चुप हैं, हिन्दू आस्था के प्रतीकों के अपमान पर चुप हैं… इसलिए इन सपोलों के सवालों पर जवाब देने की आवश्यकता बिलकुल भी नहीं है।

आपने कभी बंदर और साँप की लड़ाई देखी है? बंदर साँप को फन से पकड़ता है और उसे घूरने के बाद मिट्टी में रगड़ता है, फिर छोड़ देता है। साँप को लगता है जान बची, वो धरफरा कर भागता है। बंदर फिर उसे पकड़ता है, उसका फन मिट्टी में रगड़ता है, फिर छोड़ देता है। वामपंथी ऐसे ही सपोले हैं जिनके फनों को कुचलते रहना होगा, थोड़े-थोड़े समय के अंतराल पर। मजे ले-ले कर इन्हें मसलते रहना चाहिए। ये हमेशा उल्टे और बेकार सवाल पूछते हैं। ये मूलतः जाहिल प्रजाति है जो किताबों को पढ़ने का दावा तो करती है, लेकिन समझती नहीं।

एक तरफ हमारे चेहरों को घूरता यथार्थ यह है कि जामिया में दंगे हुए, आगजनी हुई, जम कर पत्थरबाजी हुई और उसमें वहाँ के स्थानीय लोगों से ले कर छात्र तक शामिल थे। इन फसादियों को छुपाने की कोशिश हुई। उन्हें किसने पनाह दी? वो लाइब्रेरी ही क्यों गए? वो कहाँ से आए थे? साथ ही, इसी जगह के लोग बाद में जेएनयू में हुई हिंसा में भी हिस्सेदार बताए जाते हैं जिन्होंने ABVP के छात्र-छात्राओं पर क्रूरतापूर्वक, योजनाबद्ध तरीके से हमला किया जिसमें बच्चों की हाथ टूटी, उँगली टूटी, गर्दन पर लोहे के रॉड से मारा गया, लिंच किया गया क्योंकि उन्होंने गरीब बच्चों की पढ़ाई को ले कर बात उठाई थी और वामपंथियों के वाहियात परीक्षाविरोधी आह्वान को नकारा था।

दूसरी तरफ़ वामपंथियों का अजेंडा तंत्र है जो कपड़े का रंग और जूतों के सोल की बात में उलझा कर दंगों को छुपाने की हर संभव कोशिश कर रहा है। यह तंत्र एक साथ काम करता है जिसमें क्विंट, वायर, रबिसबा, गंजे का सॉल्ट न्यूज और झबरा अभिनंदन की न्यूजलौंडी शामिल है जो बसों में आग लगाने की बात को भुलाना चाह रहा है। इनके हर फेसबुक पोस्ट पर आप सवाल पूछिए, हर ट्वीट के नीचे पूछिए कि ‘अबे, वामपंथी लम्पट जमीर कितने में बेचा?’, ‘दंगा छुपाने का कितना लेते हो’, ‘तुम्हारा वैचारिक बाप कौन है जो तुम्हें ऐसी बेहूदगी से दंगाइयों और फसादियों को डिफेंड करने की तकनीक सिखाता है’।

तब ये रोएँगे कि देखो ये तो गाली देता है (जबकि हम गाली नहीं दे रहे, सवाल पूछ रहे हैं); ये कहेंगे कि इनकी भाषा कितनी खराब है, जबकि सत्य यह है कि भाषा किसी की बपौती नहीं है कि वही तय करेंगे कि आपकी प्रतिक्रिया की भाषा और शैली कैसी हो, शब्द विन्यास क्या हो; फिर आप इन्हें कहिए कि खुद को बाथरूम में बंद करके सिसक-सिसक के रोए या फिर बंद कमरे में पीठ पर कोड़े मारे और कहे, अगले जनम मोहे वामपंथी न कीजो!

7 फरेबी पत्रकार: जामिया के एडिटेड विडियो से कर रहे बलजोरी, सोशल मीडिया पर लत्तम-जूत्तम

जामिया का हर वीडियो, हर एंगल: लाइब्रेरी में कब, क्या और कैसे हुआ, साथ में लिबरल गिरोह की नंगई भी

रवीश कुमार नहीं समझ पा रहे जामिया की लाइब्रेरी में क्यों भागे ‘छात्र’: बताने की कृपा करें

400 करोड़ रुपए का हवाला ट्रांजेक्शन, सोनिया गाँधी के करीबी कॉन्ग्रेस नेता अहमद पटेल को IT नोटिस

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के करीबी और पार्टी के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल पर आयकर विभाग का शिकंजा कस गया है। आयकर विभाग ने पटेल को एक समन जारी करते हुए उन्हें 400 करोड़ के हवाला ट्रांजेक्शन मामले में पेश होने का आदेश दिया है। बता दें कि अहमद पटेल अखिल भारतीय कॉन्ग्रेस कमिटी के कोषाध्यक्ष के पद पर हैं।

इसके पहले इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने अहमद पटेल को 11 फरवरी को समन जारी किया था और 14 फरवरी को पेश होने को कहा था, मगर पटेल तबीयत खराब होने की दलील देकर पेश नहीं हुए थे। उन्होंने कहा था कि उन्हें साँस की दिक्कत है और वह फरीदाबाद के मेट्रो अस्पताल में भर्ती हैं। आयकर विभाग ने अब एक बार फिर से उन्हें समन भेजकर पेश होने के लिए कहा है।

अगर इस बार भी वह पेश नहीं होते हैं तो उनके लिए परेशानी बढ़ सकती है। आयकर विभाग ने यह समन आईटी एक्ट के सेक्शन 131 के तहत जारी किया था। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने इस मामले में कॉन्ग्रेस के लेखा डिवीजन के अधिकारियों के दफ्तर में भी छापेमारी की थी।

आयकर विभाग विभिन्न कंपनियों द्वारा भेजे गए हवाला ट्रांजेक्शन की जाँच कर रहा है। आरोप है कि हवाला की रकम कॉन्ग्रेस के खातों में भी आया था। बताया जा रहा है कि अहमद पटेल के पार्टी के कोषाध्यक्ष होने के दौरान करीब 400 करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम कॉन्ग्रेस के खातों में आई थी। पटेल को ये नोटिस मध्य प्रदेश और दक्षिण भारत से कॉन्ग्रेस के खातों में आए पैसों की बाबत दिया गया है ।

गौरतलब है कि पिछले दिनों प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने स्टर्लिंग बायोटेक मनी लॉन्ड्रिंग मामले में अहमद पटेल के बेटे फैसल पटेल को पूछताछ के लिए तलब किया था। आरोप था कि अहमद पटेल के बेटे फैसल और दामाद इरफान सिद्दीकी ने स्टर्लिंग बायोटेक घोटाले की धनराशि का इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग में किया।

बता दें कि संदेसरा बंधुओं ने कारोबार बढ़ाने की बात कहकर स्टर्लिंग बायोटेक के नाम पर आंध्रा बैंक की अगुवाई वाले बैंकों के समूह से 5,383 करोड़ रुपए का लोन लिया था। मगर उन्होंने वापस नहीं किया। बैंकों की शिकायत पर सीबीआई ने अक्टूबर 2017 में स्टर्लिंग बायोटेक के प्रमोटर नितिन संदेसरा, चेतन संदेसरा और दीप्ति संदेसरा के खिलाफ धोखाधड़ी का केस दर्ज किया था।

दाऊद इब्राहिम से शरद पवार और अहमद पटेल के थे क़रीबी संबंध: पूर्व रॉ अधिकारी

₹14,500 करोड़ के बैंक लोन फ्रॉड मामले में अहमद पटेल के बेटे को ED ने फिर किया तलब

कॉन्ग्रेसी अहमद पटेल के करीबी ने किया PNB से भी बड़ा घोटाला, बैंकों को लगाया ₹15000 करोड़ का चूना

महाराष्ट्र के सुपर CM हैं पवार! CAA लागू करने पर उद्धव ठाकरे के बयान को निजी बता किया खारिज

महाराष्ट्र में शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस की महाविकास अघाड़ी सरकार को सत्ता में आए अभी तीन महीने भी पूरे नहीं हुए हैं और हर मसले पर साझेदारों का टकराव सामने आने लगा है। भीमा कोरेगॉंव के बाद अब नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर एनसीपी और शिवसेना की तनातनी सामने आ गई है। एनसीपी के मुखिया शरद पवार ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की बात को उनका निजी नजरिया बताकर खारिज कर दिया है। इससे पहले यह सवाल उठने लगा है कि क्या पवार महाराष्ट्र के सुपर सीएम हैं? उनकी नजर में संवैधानिक तरीके से चुने गए मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की बातों का कोई मोल नहीं है?

कॉन्ग्रेस और एनसीपी CAA का खुलकर विरोध कर रही है। वहीं सीएम उद्धव ठाकरे ने राज्य में CAA लागू करने की तरफ इशारा किया है। शिवसेना ने लोकसभा में इस संबंध में आए बिल का समर्थन भी किया था। हालॉंकि साझेदारों के दबाव की वजह से उसने बिल पर राज्यसभा में हुई वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया।

अब उद्धव ने CAA, NRC और NPR के बारे में बात करते हुए कहा है, “अगर NRC लागू किया जाता है तो यह सिर्फ हिन्दू या मुस्लिमों को ही प्रभावित नहीं करेगा, बल्कि इससे आदिवासी भी प्रभावित होंगे। केन्द्र ने NRC को लेकर अब तक कोई चर्चा नहीं की है। NPR जनगणना है और मैं नहीं मानता हूँ कि इससे कोई प्रभावित होगा, क्योंकि यह तो हर दस साल में होता है।”

आगे उद्धव ठाकरे ने कहा “CAA और NRC दोनों अलग है। NPR भी अलग है। अगर CAA लागू होता है तो इसके लिए किसी को चिंता करने की जरूरत नहीं है। NRC अभी नहीं है और इसे राज्य में लागू नहीं किया जाएगा।”

इसी पर प्रतिक्रिया देते हुए शरद पवार ने कहा, “ये महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे का अपना नजरिया है, लेकिन जहाँ तक एनसीपी की बात है, हमने इसके खिलाफ वोट किया है।”

पवार के अलावा उद्धव सरकार में मंत्री और एनसीपी नेता जितेंद्र अव्हाड ने इस बाबत कहा, “सीएम उद्धव ठाकरे ने कहा है कि महाराष्ट्र सरकार हर 10 साल पर होने वाली जनगणना के लिए आँकड़ा इकट्ठा करने में मदद करेगी लेकिन अगर कोई इससे ज्यादा कुछ करने की कोशिश करेगा तो सरकार इसमें शामिल नहीं होगी।”

CAA के अलावा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने भीमा-कोरेगाँव पर भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा, “एलगार परिषद और भीमा कोरेगाँव दो अलग-अलग मामले हैं। भीमा-कोरेगाँव मामला दलित लोगों से जुड़ा हुआ है और मामले से संबंधित जाँच अभी तक केंद्र को नहीं दी गई है और इसे केंद्र को नहीं सौंपा जाएगा। केंद्र ने एल्गार परिषद् के मामले को अपने हाथ में लिया है।”

बता दें कि शरद पवार ने इस पर भी सवाल खड़े किए थे। उन्होंने कहा था, “मामले की जाँच NIA को सौंपकर केंद्र सरकार ने ठीक नहीं किया और इससे भी ज्यादा गलत बात यह हुई कि राज्य सरकार ने इसका समर्थन किया।” शरद पवार का कहना था कि कानून-व्यवस्था का मामला राज्य का है और राज्य सरकार को केंद्र के ऐसे निर्णय का समर्थन नहीं करना चाहिए।

शरद पवार की 2 डिमांड पूरी कर देते मोदी-शाह तो उद्धव ठाकरे नहीं बनते महाराष्ट्र के सीएम

उद्धव की कुर्सी पर संकट: शरद पवार ने NCP मंत्रियों को बुलाया, अजित ने कहा- पता नहीं कब तक चलेगी सरकार

…वो मामला, जिससे ढाई महीने पुरानी ठाकरे सरकार संकट में: NCP और कॉन्ग्रेस के सीनियर नेता हुए नाराज

‘आलिया ने किया बुर्के वाली का रोल, तभी लिबरांडुओं ने दिया अवॉर्ड… अगले साल वेश्याओं की दलाली के लिए मिलेगा’

हाल ही में हुए फिल्मफेयर अवॉर्ड समारोह की ख़ासी आलोचना हो रही है। जावेद अख्तर की बेटी ज़ोया अख्तर की फिल्म ‘गली बॉय’ को फिल्मफेयर में 13 अवॉर्ड्स दिया गया, जिसके लिए लोग ख़ासे नाराज़ दिखे। रणवीर सिंह और आलिया भट्ट ने इस फ़िल्म में लीड रोल प्ले किया था और दोनों को ही बेस्ट अभिनेता और अभिनेत्री का अवॉर्ड मिला। आलिया भट्ट ने इस फ़िल्म में बुर्का पहनने वाले एक मुस्लिम युवती का किरदार अदा किया था। फ़िल्म के गाने ‘अपना टाइम आएगा’ को ‘केसरी’ के गाने ‘तेरी मिट्टी’ पर तरजीह दी गई, जिससे गीतकार मनोज मुन्तशिर ने अवॉर्ड शोज को भी अलविदा कह दिया।

अब कंगना रनौत की बहन रंगोली चंदेल ने भी फिल्मफेयर अवॉर्ड्स की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं। इस बार कंगना रनौत को भी ‘मणिकर्णिका’ में रानी लक्ष्मीबाई के उनके किरदार के लिए ‘सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री’ के खिताब के लिए नॉमिनेट किया गया था लेकिन उन्हें ये अवॉर्ड मिल नहीं सका। उनकी बहन रंगोली ने कहा कि आलिया ने ‘गली बॉय’ में एक बुर्के वाली का किरदार निभाया था, ‘लिबरांडुओं’ के लिए इतना ही काफ़ी था और उन्हें लगातार दूसरे साल ‘बेस्ट एक्ट्रेस’ के अवॉर्ड से नवाजा गया।

बकौल रंगोली, आलिया भट्ट अपनी अगली फ़िल्म में एक दलाल (कोठे वाली, वेश्याओं की दलाली करने वाली) का रोल प्ले कर रही हैं, जो गंगू बाई के जीवन पर आधारित है। रंगोली ने हुसैन ज़ैदी की किताब का हवाला देते हुए बताया कि गंगू बड़े गैगस्टर्स को लड़कियाँ सप्लाई करती थी और कहा जाता है कि वो देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की भी दोस्त थी।

रंगोली ने दावा किया कि इस किरदार को प्ले करने के कारण आलिया को अगले वर्ष भी फिल्मफेयर ‘बेस्ट एक्ट्रेस’ का अवॉर्ड दे ही डालेगा। रंगोली ने ट्विटर पर लिखा:

“आलिया भट्ट ‘माँ आनंद शीला’ का रोल भी प्ले करने वाली हैं। वो एक सजायाफ्ता अपराधी रही हैं। उन्होंने हर धर्म की न सिर्फ़ धज्जियाँ उड़ाईं थीं बल्कि अश्लील व्यभिचार को भी फैलाया था। आलिया उनका रोल अदा करती हैं तब तो ये बॉलीवुड के लिबरलों का ‘वेट ड्रीम’ होगा। इस फ़िल्म के लिए भी आलिया भट्ट को अवॉर्ड मिल ही जाएगा। माँ-बाप ने एक्टिंग भले ही न सिखाया हो मगर जिहादी राजनीति में उन्हें पूरी ट्रेनिंग दी गई है। अब तो अनन्या पांडेय भी आ गई हैं, जो इस मामले में आलिया को कड़ी प्रतिस्पर्द्धा दे रही हैं।”

रंगोली चंदेल इससे पहले भी आलिया भट्ट पर निशाना साध चुकी हैं। उन्होंने कहा था कि आलिया ने ‘राजी’ फिल्म में एक मुस्लिम जासूस का किरदार अदा किया था, जो पाकिस्तान जाकर गर्भवती हो जाती है और फिर ‘घर वापस जाने की बातें करने लगी हैं, भले ही इसके लिए नेशनलिज्म और देशभक्ति की माँ-बहन एक हो जाए।‘ रंगोली के आरोपों का अब तक आलिया भट्ट ने कोई जवाब नहीं दिया है।

मोदी ने वो कर दिखाया, जो हमारे लिए किसी ने नहीं किया: भावुक हुई वुहान से लौटी कश्मीरी छात्रा

जम्मू-कश्मीर के कई छात्र चीन में फँसे हुए थे। इन्हें मोदी सरकार सकुशल देश वापस लाने में सफल रही। कोरोना वायरस से प्रभावित इलाक़ों से वापस लौटने के बाद कश्मीरी छात्रों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं है। वे सभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को धन्यवाद देते नहीं थक रहे। ऐसी ही एक छात्र ने मीडिया से बातचीत के दौरान अपने मन की बात साझा की। कश्मीरी छात्रा ने कहा कि बचपन से लेकर अब तक वो हिंसा की कई वारदातों को देख चुकी थीं, लेकिन पहली बार ऐसा हुआ है जब भारत सरकार ने उनके लिए इतना बड़ा क़दम उठाया।

चैनल ‘सीएनएन न्यूज़ 18’ से बातचीत करते हुए कश्मीरी छात्रा ने कहा कि चीन में फँसे भारतीय छात्रों को वापस लेकर आना कोई साधारण बात नहीं थी। ये बहुत बड़ी बात है। उसने कहा कि ऐसा पहली बार हुआ है जब बाहर फँसे कश्मीरियों के लिए भारत सरकार ने इतना बड़ा काम किया है। उसने कहा कि मोदी ने वो कर दिखाया है, जो आज तक किसी ने नहीं किया। जम्मू कश्मीर के कुछ अन्य छात्रों ने भी मोदी सरकार की तारीफ़ की, जिन्हें वहाँ से बचा कर लाया गया।

बता दें कि चीन के हुबेई प्रान्त की राजधानी वुहान में कोरोना वायरस का संक्रमण सबसे ज्यादा है। वहाँ कई भारतीय छात्र फँसे हुए थे, जिनमें से कई कश्मीरी भी थे। जनवरी के अंतिम हफ्ते में जम्मू-कश्मीर के पूर्व वित्त मंत्री अल्ताफ बुखारी ने पीएम मोदी से गुहार लगाई थी कि कश्मीरी छात्रों को वहाँ से वापस लाया जाए। इसके बाद मोदी सरकार ने उन्हें वापस लाने में सफलता प्राप्त की। जम्मू-कश्मीर से वापस लाए गए छात्र-छात्रों का दिल्ली एयरपोर्ट पर और फिर कश्मीर में चेक-अप किया गया। उनमें कोई संक्रमण नहीं दिखा।

जहाँ तक कोरोना वायरस की बात है, अब तक इससे चीन में 1868 लोगों की जान जा चुकी है। यूरोप के फ्रांस में भी कोरोना से पहली मौत की पुष्टि हुई है। स्थिति इतनी भयंकर है कि वुहान में एक हॉस्पिटल के डायरेक्टर की ही इस वायरस से मौत हो गई, जिसके अस्पताल में बड़े पैमाने पर कोरोना से पीड़ित मरीज भर्ती थे। अब तक इस खतरनाक वायरस से 72,436 लोगों के संक्रमित होने की ख़बर है। इस वायरस से प्रभावित हो चुके 12,522 मरीज ठीक भी हो चुके हैं। अब तक 25 देशों में इसके फैलने की रिपोर्ट आई है।

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‘मैं अपने लड़के भेजूँगा और रेप करवा दूँगा’: भरी सभा में चप्पल दिखाने वाले TMC के पूर्व सांसद नहीं रहे

मशहूर अभिनेता और टीएमसी के पूर्व सांसद तापस पॉल का 61 साल की उम्र में मंगलवार (फरवरी 18, 2020) को दिल का दौरा पड़ने के कारण निधन हो गया। उन्होंने साल 2014 में एक सभा को संबोधित करते हुए सीपीएम के लोगों को चप्पल दिखाकर उनकी औरतों के साथ रेप करवाने की धमकी दी थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पॉल अपनी बेटी से मिलने मुंबई गए थे। कोलकाता लौटते समय मुंबई हवाई अड्डे पर उन्हें सीने में दर्द की शिकायत हुई। इसके बाद उन्हें जुहू के एक अस्पताल में भर्ती करवाया गया, जहाँ आज सुबह 4 बजे उनका निधन हो गया। बताया जा रहा है तापस को हृदय संबंधी रोग थे और पिछले दो सालों से उनका इलाज चल रहा था।

उनके निधान पर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सहित कई लोगों ने शोक जताया है। तापस पॉल साल 2014 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की कृष्णानगर सीट से जीत हासिल कर लोकसभा पहुँचे थे। उन्होंने TMC के टिकट पर चुनाव लड़ा था।

22 साल की उम्र से अपनी एक्टिंग करियर की शुरूआत करने वाले तापस पॉल का फिल्मी सफर काफी शानदार रहा। उन्होंने कई सुपरहिट बंगाली फिल्मों में काम किया। लेकिन राजनीति में आने के बाद वे अक्सर विवादों में रहे। दिसंबर 2016 में वह रोज वैली चिटफंड घोटाले में गिरफ्तार भी हुए थे। उन्हें सीबीआई ने अरेस्ट किया था। इसके बाद उन्हें 13 महीने बाद जमानत मिली।

इससे पहले वो साल 2014 में सीपीएम की महिलाओं के लिए ‘रेप करवा दूँगा‘ बयान के कारण काफी विवादों में रहे थे। उस समय कॉन्ग्रेस और लेफ्ट समेत सभी पार्टियों ने उन पर सवाल उठाए थे। इसके बाद उनकी पत्नी नंदिनी को इस बयान के लिए सार्वजनिक रूप से माफी माँगनी पड़ी थी।

दरअसल, उस दौरान एक वीडियो सामने आया था, जिसमें तापस पैर से चप्पल निकाल कर लोगों की ओर दिखाते हुए कह रहे थे, “सीपीएम के लोग देख लो मेरा नाम तापस पाल है, यदि कभी भी तृणमूल के लोगों को छुआ तो घर-द्वार सब नष्ट कर देंगे।” इसके बाद इसी वीडियो में वह यह भी कह रहे थे कि अगर किसी ने औरतों को छुआ तो मैं अपने लड़के भेजूँगा और रेप करवा दूँगा। विडियो में वह खुद कह रहे थे, “मैं चौमाहा गॉंव आज आया हूँ और हर महीने आऊँगा।”

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ब्रिटिश सांसद डेबी अब्राहम्स को दिल्ली हवाई अड्डे से वापस भेजने के सरकार के फैसले के बाद विपक्ष के दो नेताओं में दो फाड़ देखने को मिला। एक ओर जहाँ कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने महिला सांसद के साथ हो रहे इस तरह के बर्ताव पर सवाल उठाए। तो वहीं पार्टी के दिग्गज नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने आज सरकार के इस फैसले का समर्थन करते हुए डेबी को पाकिस्तान का प्रॉक्सी (पक्षधर) बताया। साथ ही अपने ट्वीट में स्पष्ट कहा कि डेबी अब्राहम्स को पाकिस्तान और आईएसआई से संबंध रखने के लिए जाना जाता है।

मंगलवार की सुबह यानी आज कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने सरकार के फैसले को समर्थन दिया। उन्होंने लिखा, “भारत द्वारा डेबी अब्राहम का वापस भेजा जाना वास्तव में आवश्यक था क्योंकि वह केवल सांसद नहीं हैं बल्कि पाक की प्रॉक्सी भी हैं। उन्हें पाकिस्तान सरकार और आईएसआई के साथ संबंध रखने के लिए जाना जाता है। भारत की संप्रभुता पर हमला करने की कोशिश करने वाले हर प्रयास को नाकाम किया जाना चाहिए।”

जबकि, इससे पहले शशि थरूर सरकार के इस फैसले पर आपत्ति जता चुके थे। उन्होंने सोमवार को ही सरकार का फैसला आने के बाद डेबी अब्राहम्स का ट्वीट रीट्वीट करते हुए सवाल किया था, “यदि कश्मीर में सब कुछ ठीक है तो क्या सरकार को आलोचकों को इस स्थिति का गवाह बनने के लिए प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए ताकि वे अपने डर को दूर कर सकें? केवल राजदूतों के प्रतिनिधिमंडलों को घुमाने की बजाए क्या इस विषय पर संसदीय समूह की मुखिया को भेजा जाना फायदेमंद नहीं होता?”

कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर ने सरकार के इस फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया और कहा कि उन्हें लगता है यह दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसे लोगों को भारत में प्रवेश न देने से हमें एक संकीर्ण दिमाग और असहिष्णु वाला देश समझा जाएगा, जो हमारे देश के लिए सही नहीं है, हमारे देश में विविधता है। हमारे पास बाहर से आने वाले लोगों के नकारात्मक दृष्टिकोण को सहन करने की क्षमता है।

इस ट्वीट के बाद जब लोग उन पर सवाल उठाने लगे तो उन्होंने इसे अपने लिए ये सब अनेपक्षित बताया। उन्होंने लिखा “मेरे लिए यह अनेपक्षित है क्योंकि यही लोग मुझको सराह रहे थे, जब मैं बतौर भारतीय सांसद ब्रिटेन गया था और ब्रिटिशों को उनके औपनिवेशिक दुर्व्यवहार से अवगत कराया था। आज ये लोग मुझ पर निशाना साध रहे हैं क्योंकि मैं चाहता हूँ कि एक ब्रिटिश सांसद को उसी तरह से सम्मान दिया जाए।”

गौरतलब है कि अब्राहम्स कश्मीर पर एक संसदीय समूह की अध्यक्षता करती हैं। जिन्हें सोमवार को भारत में प्रवेश की इजाजत न देते हुए नई दिल्ली हवाई अड्डे से बाहर नहीं आने दिया गया। इस पर सरकार ने कहा था उन्हें पहले ही सूचित कर दिया गया था कि उनका वीजा रद्द कर दिया गया है। वहीं सांसद का कहना था कि उनके पास अक्तूबर 2020 तक के लिए वैध ई-वीजा है। लेकिन गृह मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा था कि उन्हें वीजा रद्द होने की जानकारी दी गई थी इसके बावजूद उन्होंने भारत आने का फैसला लिया।

बता दें कि डेबी अब्राहम ने भारत सरकार के फैसले के बाद आरोप लगाया कि उनके पास अक्टूबर 2020 तक का वीज़ा है, लेकिन कश्मीर में मानवाधिकार मामलों पर भारतीय सरकार की आलोचना करने के कारण एवं राजनीतिक टिप्पणियों की वजह से उनकी एंट्री पर रोक लगा दी गई।

बात बिहार की: ‘पिता समान’ नीतीश को PK ने बताया पिछलग्गू, JDU का पलटवार- पगला गए हैं

जदयू से निष्कासित कथित चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने ऐलान किया है कि अब उनका पूरा फोकस आगामी बिहार विधानसभा चुनावों पर है। 2014 में मोदी लहर पर चढ़ कर मीडिया की नज़रों में ‘चाणक्य’ बने प्रशांत किशोर दिल्ली के हालिया चुनावों में अरविंद केजरीवाल की जीत के बाद आसमान की ऊँचाइयों में हैं। उन्होंने ‘बात बिहार की’ कार्यक्रम के जरिए बिहार में 10 लाख युवाओं की एक विशाल टीम बनाने का संकल्प लिया है और साथ ही बेरोजगारी को मुख्य मुद्दा बनाया है। उन्होंने साफ़ इशारा कर दिया है कि वो नीतीश-मोदी के ख़िलाफ़ लॉबिंग के लिए पूरी ताक़त झोंक देंगे।

प्रशांत किशोर ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को ‘पिछलग्गू नेता’ करार देते हुए कहा कि वो उन्हें अब भी अपने पिता के समान मानते हैं लेकिन कोई एक साथ महात्मा गाँधी और नाथूराम गोडसे का समर्थक नहीं हो सकता है। उनका इशारा नीतीश का भाजपा से गठबंधन की ओर था। उन्होंने दावा किया कि जदयू की विचारधारा को लेकर उनके और बिहार के मुख्यमंत्री के बीच कई बार चर्चा हुई और हर बार नीतीश ने गाँधी की राह पर चलने की बात दोहराई थी। किशोर ने दावा किया कि अब जदयू उस पार्टी के साथ गठबंधन में है, जो गोडसे के प्रति नरम रुख रखती है।

इधर जनता दल यूनाइटेड ने प्रशांत किशोर के बयान पर करारा पलटवार किया है। सीधा पार्टी सुप्रीमो को निशाना बनाए जाने से नाराज़ जदयू प्रवक्ता डॉक्टर अजय आलोक ने कहा कि कोई व्यक्ति जब मानसिक रूप से विक्षिप्त हो जाता है, तभी इस तरह की बातें करता है। उन्होंने कहा कि एक तरफ प्रशांत कहते हैं कि नीतीश कुमार उनके पिता समान हैं, वहीं दूसरी तरफ वो उन्हीं के बारे में भला-बुरा कहते हैं। प्रशांत किशोर और जदयू, दोनों ही एक-दूसरे के प्रति आक्रामक हो उठे हैं। किशोर ने कहा था:

“लालू जी के समय और नीतीश जी के कार्यकाल की तुलना करें तो थोड़ा-मोड़ा विकास हुआ है। लेकिन, जब आप दोनों के कार्यकाल की तुलना करते हैं तो ये भी बताइए कि हरियाणा, तमिलनाडु, कर्नाटक और गुजरात की तुलना में बिहार आज कहाँ खड़ा है? अगर झारखण्ड को छोड़ दें तो बिहार आज भी देश का सबसे ग़रीब राज्य है। बिहार आज वहीं खड़ा है, जहाँ ये 2005 में था। नीतीश के गवर्नेंस मॉडल पर सवाल उठाने वाला आज कोई नहीं है। मैं उन सभी लोगों को अपने साथ जोड़ने जा रहा हूँ, जो बिहार को देश के 10 शीर्ष राज्यों की पंक्ति में खड़ा करने का स्वप्न देखते हैं।”

जदयू से निष्काषित किए जाने के सवाल का जवाब देते हुए प्रशांत किशोर ने कहा कि ये नीतीश कुमार के अधिकार-क्षेत्र में आता है और उन्होंने जो ठीक लगा, किया। प्रशांत किशोर ने कहा कि अगर भाजपा के सतह मिल कर सरकार चलाने से बिहार का विकास होता, तब नीतीश के झुकने से उन्हें कोई आपत्ति नहीं होती। उन्होंने अपना मिशन शुरू करने के लिए गुरुवार (फरवरी 20, 2020) का दिन चुना है।

पोस्ट डालो, पैसे पाओ: ममता बनर्जी के पक्ष में माहौल बनाने के लिए प्रशांत किशोर की टीम लेकर आई नई स्कीम

अल्लाह मेहरबान तो PK पहलवान: मिलिए, चुनावी कैंपेन की दुनिया के ‘रामविलास’ से

देवी सरस्वती की तस्वीर और ऊँ वाली पुस्तिका बाँटने की सजा, 2 शिक्षकों पर केरल में सरकारी एक्शन

केरल के एक सरकारी स्कूल में दो शिक्षकों ने ‘गणित प्रार्थना’, देवी सरस्वती की तस्वीर और ऊँ छपी पुस्तिका वितरित की। जिसके बाद उन्हें छुट्टी पर भेज दिया गया। यह पुस्तिका तिरुवनंतपुरम के उपनगर अझीकोड स्थित सरकारी स्कूल में वितरित की गई थी, जहाँ पर पढ़ने वाले 80 फीसदी छात्र मुस्लिम समुदाय के हैं। स्कूल प्रशासन ने यह कार्रवाई मुस्लिम छात्रों के अभिभावकों और स्थानीय शिक्षकों के विरोध के बाद की। 

यह पुस्तिका पाँचवीं से सातवीं कक्षा में पढ़ने वाले छात्रों को ‘गणित प्रार्थना’ गतिविधि के तहत वितरित की गई थी और कहा गया था पुस्तिका में लिखी प्रार्थना रोज पढ़ने से गणित पढ़ने-सिखने में उन्हें मदद मिलेगी। इसके विरोध में अभिभावकों और कुछ राजनीतिक दलों ने सोमवार (फरवरी 17, 2020) को स्कूल तक मार्च निकाला और दोनों शिक्षकों को हटाने की माँग की। अभिभावक-शिक्षक संघ (PTA) ने भी इसकी माँग की थी, जिसके बाद प्रधानाध्यापक ने दोनों शिक्षकों को छुट्टी पर जाने के लिए कहा।

सहायक शैक्षिक अधिकारी (AEO) राज कुमार ने शिकायत पर स्कूल का दौरा किया और कहा कि जल्द ही इस मामले में रिपोर्ट सामान्य शिक्षा विभाग के निदेशक को सौंपी जाएगी। इसके साथ ही इसमें PTA और प्रधानाध्यापक की रिपोर्ट भी संलग्न की जाएगी।

अधिकारी ने कहा, “यह एक पब्लिक स्कूल है और आरोप है कि शिक्षकों ने धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल किया, जो कि नियमों के खिलाफ है। हमें स्कूल को बचाने की जरूरत है। इसके लिए हमें सभी की जरूरत है। स्कूल के दो शिक्षकों की ओर से लापरवाही हुई है।” इस बीच प्रार्थना लिखने वाली शिक्षिका राजलक्ष्मी ने पुलिस में शिकायत करते हुए आरोप लगाया है कि उन्हें फोन पर धमकी मिल रही है।

अब ये बात सामने आ रही है कि इस प्रदर्शन के पीछे कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया का हाथ है। इसी संगठन ने ऊँ और माता सरस्वती की तस्वीर पर आपत्ति जताते हुए शिक्षकों पर कार्रवाई करने के लिए स्कूल के अधिकारियों पर दबाव बनाया था। बता दें कि कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया का मूल संगठन इस्लामी कट्टरपंथी पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) है। हाल ही में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ हुए हिंसा में PFI का हाथ सामने आया था। ईडी ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया था कि PFI ने देश में दंगा भड़काने के लिए एक महीने में 120 करोड़ रुपए खर्च किए थे।

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राम जन्मभूमि के 67 एकड़ परिसर में कोई कब्रिस्तान नहीं: मजहब के 9 लोगों की चिट्ठी पर अयोध्या के DM का जवाब

अयोध्या जिला प्रशासन ने मंगलवार (फरवरी 18, 2020) को कहा कि राम जन्मभूमि की 67 एकड़ भूमि के अंतर्गत कोई कब्रिस्तान नहीं है, जहाँ राम मंदिर का निर्माण किया जाना है। जिला प्रशासन ने यह प्रतिक्रिया उस पत्र के जवाब में दी है, जिसमें कहा गया था कि बाबरी स्थल के आसपास के 1,480 वर्ग मीटर के क्षेत्र में समुदाय विशेष के कब्रिस्तान पर नए राम मंदिर का निर्माण न करें।

बता दें कि अयोध्या जमीन विवाद में मुस्लिम पक्ष के वकील रहे एमआर शमशाद ने 15 फरवरी को अयोध्या के 9 मुस्लिमों की तरफ से नव-नियुक्त श्री राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र को पत्र लिखा था। इसमें कहा गया था कि आज भले ही मौके पर कब्र न दिख रही हो लेकिन वहाँ की 4-5 एकड़ जमीन पर मुस्लिमों की कब्रें थीं, ऐसे में वहाँ मंदिर का कैसे निर्माण किया जा सकता है। इसके साथ ही चिट्ठी में ऐतिहासिक तथ्यों का हवाला देते हुए कहा गया कि साल 1855 के दंगों में 75 मुस्लिम मारे गए थे और सभी को यहीं दफन किया गया था।

अयोध्या के डीएम अनुज झा ने इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, “वर्तमान में राम जन्मभूमि के 67 एकड़ के परिसर में कोई कब्रिस्तान नहीं है।” उन्होंने आगे कहा कि अयोध्या मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान इन सभी बातों का जिक्र किया गया था। वकील शमशाद जिस तथ्यों की बात कर रह हैं, वो भी सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान सामने आई थी। 9 दिसंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले में इन सभी तथ्यों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। 

डीएम अनुज झा ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 67 एकड़ जमीन केंद्र को हस्तांतरित की गई थी। राम जन्मभूमि पर कोई कब्रिस्तान मौजूद नहीं है। हम सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन कर रहे हैं।”

उल्लेखनीय है कि पिछले साल तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली 5 सदस्यीय पीठ ने 9 नवंबर को सदियों पुराने मामले पर अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। जिसमें उन्होंने अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया था। इसके अलावा कोर्ट ने अपने फैसले में अयोध्या में ही मस्जिद के लिए 5 एकड़ वैकल्पिक जमीन दी जाने की बात कही थी। पीठ ने केंद्र सरकार से कहा था कि मंदिर निर्माण के लिए तीन महीने के भीतर एक ट्रस्ट बनाया जाना चाहिए।

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