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केरल बाढ़ के नाम पर वामपंथियों ने जनता से पैसा लिया, लेकिन CM राहत कोष में नहीं दिया: RTI से खुलासा

केरल बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष में फंड जमा करवाने के नाम पर वामपंथियों का असली चेहरा उजागर हुआ है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक कोच्चि म्यूजिक फाउंडेशन ने 1 नवंबर 2019 को बाढ़ पीड़ितों को राहत प्रदान करने हेतु एक कॉन्सर्ट किया था। इसका उद्देश्य पैसा इकट्ठा कर बाढ़ प्रभावित लोगों की आर्थिक मदद करना था। मगर, ताजा जानकारी के अनुसार इस कॉन्सर्ट के तीन महीने बीत जाने के बाद भी सीएमडीआरएफ (मुख्यमंत्री राहत कोष) में कोई पैसा जमा नहीं हुआ। एक आरटीआई के जरिए इस तथ्य का खुलासा हुआ, जिसमें राज्य आर्थिक विभाग ने स्वंय इसकी पुष्टि की।

दरअसल, सोमवार को वामपंथी नेता सीताराम येचुरी ने आरएसएस और भाजपा पर निशाना साधने के लिए ट्वीट किया। अपने ट्वीट में येचुरी ने कहा कि आरएसएस और भाजपा राजनैतिक फायदा पाने के लिए हमारे लोकतंत्र की विश्वसनीयता को खतरनाक कानूनों का प्रयोग करके नष्ट कर कर रहे हैं। फिर चाहे कफील खान पर एनएसए हो या कश्मीरी पॉलिटिकल लीडर्स पर पीएसए।

इस ट्वीट के बाद त्रिपुरा के बिपलब कुमार देब ने उस पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने येचुरी के ट्वीट को इंगित करते हुए उन पर तंज कसा और कहा कि अगर ये ट्वीट एक किताब होती, तो ये FICTION AND FANTASY (उपन्यास, कल्पना) की श्रेणी में आती।

अब हालाँकि, इस ट्वीट के बाद बहुत लोगों ने उस पर वामपंथियों की टांग खींची और खिल्ली उड़ाई। मगर, एक यूजर ने त्रिपुरा सीएम के सामने सीपीआईएम समर्थकों का असली चेहरा उजागर किया। उस यूजर ने टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा 6 फरवरी को की गई एक खबर का हवाला देकर लिखा, “बिपलब जी, सीपीआईएम समर्थक एक्टर और डायरेक्टर्स ने केरल बाढ़ पीड़ितों के लिए एक म्यूजिक फेस्टिवल का आयोजन 1 नवंबर को किया था। मगर उससे इकट्ठा हुआ रुपया मुख्यमंत्री राहत कोष में नहीं दिया गया। इसका खुलासा आरटीआई से हुआ।”

गौरतलब है कि इस टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार राज्य के आर्थिक विभाग ने 6 फरवरी को एक आरटीआई के जवाब में बताया है कि करुणा म्यूजिक कॉन्सर्ट के नाम पर कोच्चि म्यूजिक फाउंडेशन की ओर से किसी तरह की कोई डोनेशन CMDRF को प्राप्त नहीं हुई है।

यहाँ बता दें कि इस कॉन्सर्ट को करवाने वाले मुख्य प्रबंधक मलयायम फिल्म इंडस्ट्री के मशहूर गायक बिजिबल हैं। ये वही बिजिबल हैं, जो इन दिनों सीपीआईएम के साथ खड़े होकर सीएए के विरोध प्रदर्शन में अपना समर्थन दे रहे हैं। इन्होंने इस तथ्य का खुलासा होने के बाद माना कि उन्होंने इस कॉन्सर्ट के जरिए उम्मीद से ज्यादा पैसे एकत्रित किए थे, लेकिन अभी तक उन्होंने इसे मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा नहीं करवाया है। सवाल पूछे जाने पर उन्होंने कहा है कि वह कॉनसर्ट से प्राप्त हुए फंड को इस साल मार्च तक जमा करवाएँगे। खबर के अनुसार, बिजिबल ने बातचीत में टाइम्स को बताया कि उन्हें इस कॉन्सर्ट के टिकट बिक्री से जीएसटी हटाकर 6,30,000 रुपए का राजस्व प्राप्त हुआ था।

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’75 कब्र के ऊपर राम मंदिर, क्या यह सही होगा?’ – अयोध्या मामले में ‘भावनात्मक’ पेंच की साजिश!

सालों बाद अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा सुलझा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सरकार ने राम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट का गठन भी कर दिया। मगर राम मंदिर निर्माण का कार्य शुरू होने से पहले अब एक और पेंच फँसता दिखाई दे रहा है या पेंच फँसाने की साजिश के तहत कोशिश की जा रही है। इस के तहत अयोध्या के 9 मुस्लिम निवासियों ने नव-नियुक्त श्री राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र को पत्र लिखा है, जिसमें अपील की गई है कि बाबरी स्थल के आसपास के 1,480 वर्ग मीटर के क्षेत्र में समुदाय विशेष के कब्रिस्तान पर नए राम मंदिर का निर्माण न करें।

पत्र में कहा गया है कि सरकार द्वारा 67 एकड़ की जमीन राम मंदिर के लिए उपयोग करना मुस्लिमों के दावे को ‘पूरी तरह से छीनना’ और कानून के विपरीत है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार चिट्ठी में कहा गया है, “आज भले ही मौके पर कब्र न दिख रही हो लेकिन वहाँ की 4-5 एकड़ जमीन पर मुस्लिमों की कब्रें थीं, ऐसे में वहाँ मंदिर का कैसे निर्माण किया जा सकता है। 1949 में जब वहाँ अंदर भगवान राम की मूर्तियाँ रखी गईं से लेकर 1992 तक जब ढाँचा ढहाया गया, उस जगह का इस्तेमाल अलग तरह से होता रहा है।”

9 मुस्लिम नागरिकों ने अपने वकील के माध्यम से ट्रस्ट को भेजी गई चिट्ठी में कहा, “केंद्र सरकार की ओर से साल 1993 में अयोध्या में अधिग्रहित की गई 67 एकड़ जमीन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राम मंदिर निर्माण के लिए दी गई है। लेकिन इस जमीन पर मुस्लिमों की कब्रें थीं। केंद्र ने इस पर विचार ही नहीं किया कि मुस्लिमों की कब्र पर भव्य राम मंदिर नहीं बन सकता। यह धर्म के खिलाफ है।”

चिट्ठी में ट्रस्टी से कहा गया है, “आप सभी समाज के जागरूक लोग हैं। आप हिंदू/सनातन धर्म के ज्ञाता हैं। आपको इस पर जरूर विचार करना चाहिए कि क्या राम मंदिर की नींव मुस्लिमों की कब्र पर रखी जा सकती है। इसका फैसला ट्रस्ट के मैनेजमेंट को करना होगा।” इसके साथ ही चिट्ठी में ऐतिहासिक तथ्यों का हवाला देते हुए कहा गया है कि साल 1855 के दंगों में 75 मुस्लिम मारे गए थे और सभी को यहीं दफन किया गया था।

बता दें कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट गठन के ऐलान के बाद से ही हलचल तेज है। बजट सत्र 2020 के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में ऐलान किया था कि अयोध्या में अधिग्रहीत 67 एकड़ जमीन राम मंदिर ट्रस्ट को दी गई है।

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सस्ते डाटा प्लान से गूगल पस्त, साल के अंत तक 400 रेलवे स्टेशनों पर बंद करेगी फ्री Wi-Fi

रेलवे स्टेशनों पर फ्री वाईफाई सुविधा को इस साल के अंत तक बंद करने का गूगल ने ऐलान किया है। 2015 में उसने इसकी शुरुआत की थी। करीब 400 भारतीय रेलवे स्टेशनों पर गूगल यह सुविधा मुहैया कराती है। गूगल के पेमेंट्स एंड नेक्स्ट बिलियन यूजर्स के वाइस प्रेसीडेंट सीजर सेनगुप्ता ने बताया कि बताया कि भारत में मोबाइल इंटरनेट डेटा के दुनिया में सबसे सस्ता होने और इस प्लान के वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर न हो पाने के कारण इस कार्यक्रम को बंद करने का फैसला किया गया है।

रिपोर्ट्स के अनुसार सेनगुप्ता ने कहा कि भारत सरकार, कई राज्य सरकारों और लोकल एजेंसियों द्वारा भी सस्ते दाम पर इंटरनेट सुलभ करवाने की योजनाओं ने उन्हें अप्रासंगिक कर दिया था। गूगल ने कहा है कि वह साल के अंत तक अपने साझेदारों के साथ काम करते हुए इस पूरी प्रक्रिया को सहजता पूर्वक निपटा लेगी। गूगल स्टेशन गूगल, भारतीय रेलवे तथा रेलटेल के मध्य साझेदारी के फलस्वरूप लॉन्च हुआ था। इसका मकसद देश के व्यस्ततम 400 रेलवे स्टेशनों पर तेज गति से फ्री पब्लिक वाईफाई सुविधा उपलब्ध करवाना था। इस प्रोजेक्ट को 2020 के मध्य तक पूरा किया जाना था। सेनगुप्ता ने बताया कि जून 2018 में ही यह लक्ष्य पूरा हो गया था।

गूगल के अधिकारी ने बताया कि हम अपनी क्षमतााओं और संसाधनों को और बेहतर तरीके से उपयोग में लाने के लिए लगातार प्रयास करते रहेंगे। उन्होंने कहा कि हम देश भर में छोटे व्यापारियों और महिलाओं को इंटरनेट प्रयोग करना सीखने में भी मदद कर रहे हैं जिससे उनकी जिंदगी और उनके समुदायों में खुशहाली आ सके। इसके साथ साथ हम अपने उत्पादों जैसे सर्च इंजन, यूट्यूब, मैप्स आदि को भी भारतीयों की यूनिक माँगों के अनुसार ढाल रहे हैं।

धरने पर शहंशाह ने सौम्या से किया निकाह, CAA विरोधी प्रदर्शन के दौरान परवान चढ़ा प्यार

तमिलनाडु के चेन्नई में भी दिल्ली के शाहीन बाग़ की तर्ज पर विरोध प्रदर्शन चल रहा है। वहाँ के ओल्ड वॉशरमैनपेट इलाक़े में स्थित लाला गुंदा क्षेत्र में मुस्लिम महिलाएँ बड़ी संख्या में धरने पर बैठी हुई हैं। कई पुरुष भी महिलाओं का साथ देने और विरोध-प्रदर्शन का बंदोबस्त देखने के लिए वहाँ मौजूद रहते हैं। विगत 5 दिनों से वहाँ का ऐसा ही माहौल है। ये लोग सीएए और एनआरसी के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं। हालाँकि, मुख्यमंत्री पलानीस्वामी ने अपील किया है कि मुस्लिम समुदाय को ग़लत प्रोपेगेंडा को नकार देना चाहिए और सामाजिक समरसता कायम रखने की दिशा में प्रयास करना चाहिए

सोमवार (फरवरी 17, 2020) को भी लाला गुंडा क्षेत्र का विरोध प्रदर्शन चर्चा में रहा। वहाँ सीएए के विरोध में प्रदर्शन के दौरान ही एक युवक और एक युवती ने निकाह करने का फ़ैसला कर लिया। इतना ही नहीं, दोनों का निकाह भी धरनास्थल पर ही हुआ, जहाँ सभी प्रदर्शनकारी मौजूद रहे। मीडिया में चल रही ख़बरों के अनुसार, दोनों की पहले से ही सगाई हो चुकी थी, लेकिन विरोध-प्रदर्शन में हिस्सा लेते-लेते उनका प्यार और परवान चढ़ा, जिसके बाद उन्होंने फट निकाह करने का फ़ैसला लिया।

मोहम्मद शहंशाह और एस सौम्या ने निकाह के दौरान रस्में निभाने की बजाए सीएए और एनआरसी के विरोध की शपथ ली। शहंशाह ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि उसे ये निकाह तो कबूल है लेकिन सीएए कबूल नहीं है। प्रदर्शनकारियों की माँग है कि केरल व अन्य राज्यों की तर्ज पर तमिलनाडु विधानसभा में भी सीएए के ख़िलाफ़ प्रस्ताव पास किया जाए। शुक्रवार को वॉशरमैनपेट में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तीखी झड़प हुई थी, जिसके बाद सीएम ने कहा था कि कुछ लोग माहौल बिगाड़ना चाहते हैं।

प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पत्थरबाजी की थी, जिसके बाद स्थिति को नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज की नौबत आन पड़ी थी। शुक्रवार की इस घटना के बाद शहंशाह और सौम्या अपने निकाह को लेकर सशंकित थे। लेकिन दोस्तों और रिश्तेदारों ने उन्हें धरनास्थल पर ही ऐसा करने की सलाह दी।

मध्य प्रदेश: हैंडपप से पानी लेने को लेकर विवाद, वन विभाग के अधिकारी ने दलित को मारी गोली

मध्य प्रदेश के शिवपुरी में वन विभाग के गार्ड्स द्वारा मदन वाल्मीकि नामक दलित की गोली मारकर हत्या करने की ख़बर आई है। बताया गया है कि उसकी हत्या तब की गई, जब वह हैंडपंप से पानी भरने को लेकर हुए अपने परिवार और वन अधिकारियों के बीच के विवाद में हस्तक्षेप करने की कोशिश कर रहा था। यह घटना मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले से 60 किलोमीटर दूर फतेपुर नामक गाँव में घटित हुई।

वाल्मीकि की पत्नी सरोज ने आरोप लगाया कि जब उसकी बेटी फतेपुर फॉरेस्ट चेक पोस्ट से कुछ ही दूरी पर स्थित हैंडपंप से पानी लेकर बर्तन धो रही थी, तब उसे फारेस्ट रेंजर सुरेश शर्मा ने जातिसूचक गाली देनी शुरू कर दी। इसका विरोध करने पर एक महिला अधिकारी ने उसकी बेटी को बाल पकड़ घसीटना शुरू कर दिया। यह देख करीब 100 मीटर दूरी पर मौजूद उसका पति बीच-बचाव करने दौड़ा आया जिसकी गोली मार हत्या कर दी गई।

वन विभाग ने शुरुआत में अपने अधिकारियों के बचाव की कोशिश करते हुए कहा कि यह हादसा रविवार को तब हुआ जब ग्रामीणों ने अतिक्रमण विरोधी टीम से राइफल छीनने की कोशिश की। रविवार देर शाम करेरा पुलिस स्टेशन के बाहर ग्रामीणों के प्रदर्शन के बाद रेंजर सुरेश शर्मा समेत 15 लोगों के खिलाफ दफा 302 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज किया गया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अभी तक इस संदर्भ में कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है।

इस घटना की जाँच के लिए वन विभाग ने भी एक टीम का गठन कर दिया है। घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा ने कहा कि दलितों के खिलाफ अपराध कमलनाथ सरकार के दौरान एकदम सामान्य बात हो गई है।

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पुलिस पर हमला बर्दाश्त नहीं, हर बात पर विरोध से कब्रगाह बन जाएगा राज्य: जब रजनी ने मीडिया को डपटा

क्या पुलिसकर्मियों का कोई मानवाधिकार नहीं होता? मीडिया का एक बड़ा वर्ग आजकल पत्थरबाजों, दंगाइयों, उपद्रवियों और प्रदर्शनकारियों को एक श्रेणी में रख कर उन्हें बचाने में लगा हुआ है। जब पुलिस ऐसे उत्पातियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करती है तो उलटा पुलिस को ही दोषी ठहराया जाता है, सरकार को दोष दिया जाता है और दंगाइयों का महिमामंडन किया जाता है। जामिया लाइब्रेरी कांड में भी कुछ ऐसा ही हुआ। कटे-छँटे वीडियो के आधार पर आरोप लगाया गया कि दिल्ली पुलिस पढ़ाई कर रहे छात्रों को पीट रही है। पूरा वीडियो आया तो पता चला कि पुलिस से बचने के लिए दंगाई लाइब्रेरी में घुस गए थे।

आज सुप्रीम कोर्ट ने भी शाहीन बाग़ उपद्रव को लेकर कह दिया कि विरोध प्रदर्शन जायज है, लेकिन इसके लिए सड़क जाम कर के लोगों को परेशानी में नहीं डाला जा सकता। वहीं सुपरस्टार रजनीकांत का भी एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वो अपने बेबाक अंदाज़ में पुलिसकर्मियों पर हमला करनेवालों को लताड़ते हुए नज़र आ रहे हैं। रजनीकांत का ये वीडियो मई 2018 का है लेकिन सीएए विरोधी हिंसा मामले में ये आज भी उतना ही प्रासंगिक है, इसीलिए इसे आपको देखना चाहिए।

मीडिया से बात करते हुए रजनीकांत ने कहा था कि समस्याएँ तभी शुरू हुईं, जब असामाजिक तत्वों ने वर्दीधारियों पर हमला किया। अर्थात, पुलिसकर्मियों को निशाना बनाने से ही समस्या की शुरुआत हुई। सुपरस्टार ने इस सम्बन्ध में बोलते हुए आगे कहा था:

“पुलिसकर्मियों पर हमले किए जाने को कभी सही नहीं ठहराया जा सकता है। वर्दी में ड्यूटी पर लगे पुलिसवालों पर हमले करने के पक्ष में मैं कोई भी तर्क बर्दाश्त नहीं करूँगा। मैं तो कहता हूँ कि इसके बचाव में कोई तर्क हो ही नहीं सकता।”

उस समय जब मीडियाकर्मियों ने इस मसले पर रजनीकांत को घेरना चाहा तो उन्होंने धूर्त पत्रकारों डपटते हुए स्पष्ट कहा कि अगर उनके पास कोई अन्य सवाल है तो पूछें। रजनीकांत ने तभी कहा था कि अगर हर बार पर हर रोज विरोध प्रदर्शन होने लगे तो पूरा तमिलनाडु ही एक कब्रगाह में तब्दील हो जाएगा।

जामिया हिंसा मामले में उनकी बातें प्रासंगिक हैं लेकिन ये भी जानना ज़रूरी है कि उन्होंने मई 2018 में ये बयान क्यों दिया था। मई 22, 2018 को तनिलनाडु के थोट्टुकुंडी में स्टरलाइट फैक्ट्री के विरोध में 20 हज़ार लोग सड़क पर उतरे थे। इसी बीच असामाजिक तत्वों ने पुलिस पर हमला कर दिया, जिसके बाद पुलिस ने गोली चलाई। हिंसा में 13 लोग मारे गए और 100 से अधिक घायल हुए। रजनीकांत घायलों का हलचल जानने अस्पताल पहुँचे थे, तब उन्होंने ये बयान दिया था।

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बंगाल: मदरसों पर ममता बनर्जी मेहरबान, मजहबी शिक्षा लेने को हिंदू बच्चे मजबूर

पश्चिम बंगाल में इस बार 70 हजार छात्र मदरसा बोर्ड की परीक्षा में बैठने वाले हैं। इसमें से करीब 18% छात्र हिंदू हैं। पश्चिम बंगाल मदरसा शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष अबू ताहेर कमरुद्दीन ने बताया कि 2019 में मदरसा बोर्ड की परीक्षा में 12.77% फीसदी हिंदू छात्र शामिल हुए थे। पिछले कुछ सालों से मदरसे में हिंदू छात्रों की संख्या में हर साल 2-3 फीसदी का इजाफा हो रहा है। राज्य के पुरुलिया, बीरभूम और बांकुड़ा में चार बड़े-बड़े मदरसे हैं और हैरत की बात है कि यहाँ तो गैर मुस्लिम छात्रों की संख्या मुस्लिमों से ज्यादा है।

जानकारी के मुताबिक राज्य में सरकारी सहायता प्राप्त 6,000 से ज्यादा मदरसे हैं। मदरसे मजहबी तालीम के केंद्र हैं। अमूमन इसमें मुस्लिम समुदाय के बच्चे ही पढ़ते हैं। लेकिन, बंगाल में हिंदू बच्चों की तादाद भी अच्छी-खासी है और वह साल दर साल आश्चर्यजनक तौर पर बढ़ रही है। अब सवाल उठता है कि आखिर इसके पीछे वजह क्या है?

राज्य में 600 मदरसे हैं, जिसे ममता बनर्जी सरकारी फंड देती हैं। वे किसी भी उद्योग से अधिक मदरसों पर खर्च करती हैं, जबकि स्कूलों के लिए कुछ नहीं किया जा रहा है। उनकी दोयम दर्जे की राजनीति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले साल उनकी सरकार ने मदरसों के विकास के लिए 4,000 करोड़ रुपए का आवंटन किया था, जबकि राज्य के पूरे उच्च शिक्षा सेट-अप के लिए 3,964 करोड़ रुपए आवंटित किए गए। इतनी मेहरबानी मुस्लिम वोट बैंक पर पकड़ मजबूत करने के लिए की जा रही है। ऐसे में हिंदू छात्र मदरसा जाने के लिए मजबूर न हो तो और क्या करें? 

इसके अलावा कई इलाकों में स्कूल नहीं होने की वजह से भी हिंदू छात्र मदरसे को तरजीह देते हैं, या फिर यूँ कहें कि वो मदरसे में जाने के लिए मजबूर हैं। मदरसों के छात्रों को सरकार स्कॉलरशिप भी दे रही है। ऐसे में बीरभूम, बर्धवान और बांकुड़ा जिले में गैर-मुस्लिम छात्रों और अभिभावकों में इन मदरसों के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है।

लेकिन, मुस्लिम वोट बैंक को पनाह देने की नीति से धीरे-धीरे पश्चिम बंगाल मिनी इस्लामिक राज्य बनाने की दिशा में अग्रसर है। मदरसे में भारी फंडिंग करके वहाँ के मुल्लाओं को खुश करने की कोशिश की जा रही है और इसकी वजह से वहाँ के हिंदू दूसरे दर्जे का नागरिक बनकर रह गए हैं।

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महिलाओं के ख़िलाफ़ SC गई थी UPA सरकार, मोदी पर ठीकरा फोड़ राहुल गाँधी ने कराई जगहँसाई

करीब एक दशक पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने सेना में पुरुषों की तरह महिला अधिकारियों के लिए भी स्थायी कमीशन के गठन को कहा था। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। शीर्ष अदालत ने कहा कि शरीर-क्रिया सम्बन्धी बाधाओं और सामाजिक पहलुओं के आधार पर महिलाओं को सेना में परमानेंट कमीशन न देना एक व्यथित करने वाला तर्क है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महिला अधिकारियों ने काफ़ी बहादुरी भरा प्रदर्शन किया है और विभिन्न सम्मान लेकर आई हैं। जस्टिस चंद्रचूड़ ने सेना में महिलाओं को शामिल किए जाने को एक ‘विकासवादी प्रक्रिया’ करार दिया

कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी इस मसले पर भी केंद्र सरकार को घेरने से बाज नहीं आए। लेकिन, इस चक्कर में वे वैसी ही गलती कर बैठे जैसा उन्होंने उत्तराखंड में पदोन्नति के आरक्षण मामले में किया था। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार के समर्थन में फ़ैसला देते हुए पिछले दिनों कहा था कि प्रमोशन में रिजर्वेशन देने के लिए राज्य को मजबूर नहीं किया जा सकता। उत्तरखंड में भाजपा की सरकार है, इसीलिए राहुल ने मोदी-शाह और संघ को निशाने पर लिया। लेकिन वे भूल गए कि यह मामला 2012 का था, जब उत्तराखंड में कॉन्ग्रेस की सरकार थी। अब उन्होंने फिर से अपनी बेइज्जती कराई है।

राहुल गाँधी ने कहा कि केंद्र सरकार महिलाओं को सेना में ‘स्थायी सेवा’ या फिर ‘कमांड पोस्ट’ नहीं देना चाहती थी, इसीलिए उसने सभी महिलाओं का अपमान किया है। उनका निशाना मोदी सरकार पर था। उन्होंने बड़ी बेशर्मी से दावा कर दिया कि एक-एक महिलाओं ने सुप्रीम कोर्ट में खड़े होकर मोदी सरकार को, भाजपा की सरकार को ग़लत साबित कर दिया। हालाँकि, इस दौरान वो ये भूल गए कि इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में मोदी सरकार नहीं, मनमोहन सरकार लेकर गई थी। 2010 में जब हाई कोर्ट ने महिलाओं के पक्ष में फ़ैसला सुनाया था, तभी कॉन्ग्रेस के नेतृत्व में चल रही यूपीए-2 की सरकार इसके विरोध में सुप्रीम कोर्ट पहुँची थी।

यानी राहुल गाँधी अपनी पार्टी के सरकार की करनी के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। अब सवाल उठता है कि मोदी सरकार इस बारे में क्या सोचती है? पीएम मोदी ने अगस्त 15, 2018 को ही अपने सम्बोधन के दौरान इस बारे में घोषणा कर दी थी कि पुरुष अधिकारियों की तरह अब महिला अधिकारियों को भी सेना में ‘परमानेंट कमीशन’ की सुविधा दी जाएगी। 72वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से उन्होंने ऐलान किया था कि पारदर्शी प्रक्रिया के तहत ये सुनिश्चित किया जाएगा कि सेना में महिला अधिकारियों को पुरुष साथियों की तरह सुविधाएँ व अधिकार मिलें।

जहाँ तक महिलाओं के अधिकार की बात है, पहली मोदी कैबिनेट में जितनी महिलाओं की संख्या थी, उतनी आजादी के बाद से किसी भी सरकार में नहीं रही। उस दौरान पीएम ने इस बात की भी चर्चा की थी कि सुप्रीम कोर्ट में भी 3 महिला जज हैं, जो आजादी के बाद से अब तक सर्वाधिक है।

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मैग्सेसे विजेता को जीप में डाल कर ले गई यूपी पुलिस, भड़काऊ पोस्टर बाँट कर लोगों को उकसा रहा था

उत्तर प्रदेश में सीएए के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन के नाम पर हिंसा की गई, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया और पुल्सकर्मियों के साथ झड़प की गई। योगी सरकार ने फ़ैसला किया कि सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई उपद्रवियों से ही की जाएगी। अब जब प्रदर्शन को कवरेज नहीं मिल रहा है, बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग फिर से जनता को भड़काने में जुट गया है। मीडिया का एक वर्ग तो पहले से ही उलटा-पुल्टा झूठ फैला कर मोदी सरकार को बदनाम करने में लगा है। हालाँकि, योगी आदित्यनाथ की सख्ती के कारण उपद्रवियों के मंसूबे धरे के धरे रह जा रहे हैं।

ताज़ा सूचना के अनुसार, मैग्सेसे विजेता संदीप पांडेय को पुलिस उठा कर ले गई है। पांडेय भड़काऊ पोस्टर बाँट कर लोगों को उकसाने का काम कर रहे थे। वो सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ भड़काऊ बातें लिख कर लोगों में भ्रम फैला रहे थे। बता दें कि पूरे देश में एनआरसी लागू करने के संबंध में अभी कोई फ़ैसला नहीं हुआ है, लेकिन कथित बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग इसके विरोध में लगा हुआ है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उन पर सीआरपीसी की धारा-151 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।

बता दें कि धारा-151 के तहत पुलिस किसी अपराध को रोकने के लिए किसी व्यक्ति को हिरासत में ले सकती है और इसके लिए मजिस्ट्रेट के ऑर्डर की ज़रूरत नहीं पड़ती। अभी तक आधिकारिक रूप से पांडेय की गिरफ़्तारी बारे में कुछ नहीं कहा गया है। उनकी पत्नी ने अरुंधति धुरु ने बताया कि लखनऊ स्थित ठाकुरगंज थाने की पुलिस उन्हें उठा कर ले गई है। अरुंधति ख़ुद भी एक्टिविस्ट होने का दावा करती हैं। पांडेय के दोस्तों ने दावा किया है कि पुलिस उन्हें जीप में डाल कर ले गई है।

संदीप पांडेय जिन भड़काऊ पोस्टरों के जरिए लोगों को उकसा रहे थे, उन पर कई अन्य तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ताओं के हस्ताक्षर थे। उन पोस्टर्स में लिखा था- “देश को लूटने की, बाँटने की और बेचने की राजनीति नहीं चलेगी।” पोस्टर में कई आपत्तिजनक बातें लिखी होने की बात भी पता चली है। मैग्सेसे अवॉर्ड विजेता संदीप पांडेय लोगों से अपील कर रहे थे कि वो देश के संविधान की प्रस्तावना को ‘वास्तविकता में बदलने के लिए’ एकजुट हों।

संदीप पांडेय के साथ-साथ उनके 9 अन्य साथियों को भी पुलिस ले गई है, जो क्षेत्र में शांति भंग करने का प्रयास कर रहे थे। पांडेय बिना अनुमति लखनऊ घंटाघर से लेकर गोमती नगर तक मार्च भी निकालने वाले थे। घंटाघर को यूपी का शाहीन बाग़ बनाने के लिए वहाँ कई मुस्लिम महिलाओं को धरने पर बिठा दिया गया है।

15 मौतें, 705 गिरफ्तारियाँ, 57 पुलिसकर्मियों को लगी गोली: यूपी में CAA पर हिंसा का हर डिटेल

वीडियो: CAA विरोध के नाम पर उत्पात मचाने निकली थी दंगाई भीड़, यूपी पुलिस ने खदेड़-खदेड़ कर पीटा

निर्भया गैंगरेप: 27 दिन में तीसरी बार डेथ वारंट, 3 मार्च की सुबह 6 बजे लटकाए जाएँगे 4 दरिंदे

निर्भया गैंगरेप और हत्या मामले में दोषियों के खिलाफ कोर्ट ने आज तीसरी बार डेथ वारंट जारी किया। पटियाला हाउस कोर्ट ने इस दौरान दोषियों को फाँसी दिए जाने का दिन और समय मुकर्रर करते हुए अपना फैसला सुनाया। एडिशनल सेशन जज ने 3 मार्च को सुबह 6 बजे फाँसी देने का आदेश दिया। इसे सुनने के बाद निर्भया की माँ ने कहा कि न्याय में देर होता है, अंधेर नही।

निर्भया की माँ ने कहा, “मैं ज्यादा खुश नहीं हूँ, क्योंकि यह तीसरी बार है जब डेथ वारंट जारी हुआ है। हमने काफी संघर्ष किया है इसलिए इस बात से संतुष्ट हूँ कि आखिरकार डेथ वारंट जारी किया गया। मुझे उम्मीद है कि 3 मार्च को फाँसी हो जाएगी।”

उन्होंने सुनवाई के दौरान अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा, “मामले को 7 साल हो चुके हैं। मैं भी इंसान हूँ, मेरे अधिकारों का क्या होगा? मैं आपके सामने हाथ जोड़ती हूँ, कृपया डेथ वारंट जारी कर दीजिए।”

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा ने तिहाड़ जेल अधीक्षक और निर्भया के माता-पिता की याचिका पर करीब एक घंटे तक चली सुनवाई के बाद नया डेथ वारंट जारी किया। यह तीसरा डेथ वारंट है। इससे पहले 22 जनवरी को और फिर एक फरवरी को फॉंसी के लिए डेथ वारंट जारी हो चुके हैं।

इससे पहले दोषियों के वकील एपी सिंह ने कहा कि अभी कानूनी विकल्प बाकी हैं और इनका इस्तेमाल न किए जाने को इंसाफ देने में नाकामी कहा जाएगा। उन्होंने बताया कि दोषी पवन क्यूरेटिव पिटीशन और मर्सी पिटीशन लगाना चाहता है और दुष्कर्मी अक्षय भी गुनाह के वक्त अपने नाबालिग होने को लेकर नई याचिका दाखिल करना चाहता है। दोषियों के वकील के मुताबिक वह अक्षय के लिए नई दया याचिका लगाएँगें। पवन के पास भी क्यूरेटिव पिटिशन और राष्ट्रपति के पास दया याचिका का विकल्प बचा हुआ है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को स्पष्ट कर दिया था कि निर्भया सामूहिक बलात्कार एवं हत्या मामले में चार दोषियों को अलग-अलग फाँसी दिए जाने की माँग करने वाली केंद्र की याचिका का लंबित रहना दोषियों को फाँसी के लिए निचली अदालत द्वारा नई तारीख जारी करने की राह में आड़े नहीं आएगा।

आज यानी सोमवार को इस सुनवाई के दौरान कोर्ट में ये भी जानकारी दी गई कि गुनहगार विनय शर्मा तिहाड़ में भूख हड़ताल कर रहा है। जबकि दोषी मुकेश सिंह ने कोर्ट से कहा कि वह नहीं चाहता कि वृंदा ग्रोवर उसकी तरफ से पैरवी करें। इसके बाद कोर्ट ने उसके लिए वकील रवि काजी को नियुक्त किया। विनय के वकील ने कोर्ट से कहा कि मेरा मुवक्किल मानसिक रूप से काफी बीमार है, लिहाजा उसे इस वक्त फाँसी नहीं दी जा सकती।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले 14 फरवरी को दोषी पवन ने अदालत से कहा था कि उसने अपने पुराने वकील को हटा दिया है और नए वकील के लिए उसे वक्त की जरूरत है। इसके बाद अदालत ने उसके अधिकारों की बात कहते हुए नया वकील नियुक्त किया था।

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