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‘प्रदर्शन का विडियो FB पर क्यों डाला’ – जामिया की पूर्व छात्रा सीमा रिजवी पर हमला, बेटी को किडनैप करने की धमकी

जामिया की पूर्व छात्रा सीमा रिजवी ने जामिया नगर पुलिस स्टेशन में एक शिकायत दर्ज कराई है। सीमा ने यह शिकायत जामिया कोऑर्डिनेशन कमिटी (JCC) के कुछ सदस्यों के खिलाफ करवाई है। अपनी शिकायत में सीमा ने कहा कि इन लोगों ने उनके ऊपर हमला किया और साथ ही उनकी बेटी को किडनैप करने की धमकी दी। सीमा का कहना है कि उन लोगों ने यह धमकी इसलिए दी है क्योंकि उन्होंने CAA विरोधी प्रदर्शन की वीडियो फेसबुक पर डाल दी थी। अब यह वीडियो हटा ली गई है।

जानकारी के मुताबिक सीमा रिजवी ने 4 फरवरी 2020 को शिकायत दर्ज कराई थी। इसकी एक कॉपी ऑपइंडिया के पास है। इसमें सीमा ने आरोप लगाया कि जामिया में CAA विरोध प्रदर्शन में एक भीड़ ने उन्हें RSS कार्यकर्ता बताते हुए उनके ऊपर हमला किया। सीमा ने कहा, “मैं विरोध प्रदर्शन के बाद गेट नंबर 7 से निकल रही थी, जो कि जामा मस्जिद के नजदीक है, तभी कुछ लोगों ने मेरे ऊपर हमला किया। इसमें JCC के कई सदस्य शामिल थे। उन लोगों ने मुझे RSS कार्यकर्ता बताया क्योंकि मैंने इस विरोध प्रदर्शन की वीडियो अपने फेसबुक प्रोफाइल से शेयर की थी।” रिजवी ने आरोप लगाया कि उन्हें मुस्लिमों द्वारा मारपीट और प्रताड़ित करने के बाद जान से मारने की धमकी दी गई और वीडियो डिलीट करने के लिए कहा गया।

इसके साथ ही रिजवी ने आरोप लगाया कि भीड़ द्वारा उन्हें जामिया यूनिवर्सिटी के अंदर ले जाया गया और एक कमरे में बंद कर दिया गया। इसके बाद भीड़ ने उन्हें धमकाया और मारपीट की। सीमा ने यह भी कहा कि JCC के सदस्यों की भीड़ ने विरोध करने पर उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी। सीमा ने कहा, “उन्होंने मेरी 10 साल की बेटी को लेकर भी धमकियाँ दीं। लगातार मेरे बाल खींचे। किडनैप करने की धमकी दी।”

सीमा रिजवी ने जिन JCC सदस्यों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है, उसमें सफूर जर्फर, गोहे आयशा अंसारी, सैफ-उल-इस्लाम, सलीम उमर, मोहम्मद गफ्फार खान, अबू दर्दा खान और इन्तेमाम के नाम शामिल हैं। जामिया नगर पुलिस स्टेशन ने इसके खिलाफ आईपीसी की धारा 342, 354, 323, 506, 509 और 34 के तहत मामला दर्ज किया गया है। उल्लेखनीय है कि CAA के पास होने के साथ ही जामिया नगर में हिंसा भड़क गई थी, जिस के बाद दंगे पर काबू पाने के लिए पुलिस को कैंपस के अंदर जाना पड़ा था।

जामिया का कटा विडियो: रवीश ने जानबूझ कर क्यों दिखाया एडिटेड विडियो? समझिए क्रोनोलॉजी

रामलीला मैदान में ‘मोर’ नाचा, किसने देखा: सबने देखा और मजे लिए भरपूर…

दिल्ली के रामलीला मैदान में अरविंद केजरीवाल ने रविवार 16 फरवरी 2020 को अपने कैबिनेट सहयोगियों के साथ शपथ ली। इस दौरान समारोह स्थल से एक वीडियो आया और आते ही चर्चा का केंद्र बन गया। यह वीडियो उदयवीर नाम के शख्स का था। उदयवीर मोर बनकर आए थे और झाड़ू से बने उनके पंख में केजरीवाल नजर आ रहे थे।

जमाना सोशल मीडिया का है, सो लोगों की नजर में चढ़ने का उदयवीर का यह तरीका तो काम कर गया। लेकिन, ट्विटर यूजर्स ने मजे भी जमकर लिए। इस बेतरतीब प्रयोग से न केवल उदयवीर खुद हॅंसी के पात्र बने बल्कि आप के चुनाव निशान झाड़ू और उसके मुखिया केजरीवाल पर चुटकी लेने का मौका भी यूजर्स को दे गए।

ट्विटर पर आई यूजरों की प्रतिक्रियाओं ने दिल्ली में फ्री योजनाओं से लेकर पार्टी के चुनाव निशान तक पर सवाल खड़े कर दिए। साथ ही लोगों को गुलामी से लेकर दिल्ली की फ्री वाली आज़ादी तक की याद दिला दी।

@TheBhopaali नाम के यूजर ने लिखा लगता है केजरीवाल जी ने टिकटॉक वालों को भी बुलाया है, उनका आना शुभा माना जाता है, नेक लेकर जाएँगे। @FaceLessOK नाम के यूजर ने लिखा, “सही प्रतिनिधित्व कर रहा है आम आदमी पार्टी का।”

@Saffron2024 नाम के यूजर ने लिखा, “नाथू मुझे दो गोली एक्स्ट्रा मार लियो, पर पहले इसका भेजा खोल।” वहीं @bokachov ने लिखा “लोग उड़ता तीर लेते हैं, इस बेचारे ने तो पूरा तरकश ले लिया अपने पिछवाड़े में !”

@DeemagSePaidal ने लिखा, “देखना कभी नीचे चुभ नहीं जाए झाड़ू, वरना पूर्ण स्वराज मिल जाएगा तुझे आज ही।” @sharmagopal99 नाम के यूजर ने लिखा, “जैसा गुरु वैसे चेले “भांड गिरी करने में गुरु चेलों में होड़ लगी रहती है कि कौन किससे ज्यादा और बढ़िया भांड गिरी कर सकता है”।

एक यूजर ने तो युवक के इंसान होने पर ही सवाल खड़े कर दिए। @kkeep_calm नाम के यूजर ने लिखा “बहुत ही विचित्र प्राणी लग रहा है ये”। एक यूजर ने तो केजरीवाल सरकार की वाई-फाई योजना को ही अपने निशाने पर ले लिया। @ntn_kansal नाम के यूजर ने लिखा, “झाडू घुसा कर मोर बन गया। अब WI FI की दिक्कत नहीं होगी इसके आसपास”।

एक यूजर ने केजरीवाल सरकार की फ्री देने वाली योजनाओं पर निशाना साधा और देश के लोगों को गुलामी लेकर आज़ादी तक की याद दिला दी। @sun_hwr नाम के यूजर ने लिखा, “ये नई तरह की दिल्ली है जहाँ बिजली मुफ़्त, पानी मुफ़्त, आना मुफ़्त, जाना मुफ़्त… बीमार हुए तो एक करोड़ का इलाज भी मुफ़्त… पूरे विश्व को सीखना चाहिए एक राज्य से ? मुफ़्तख़ोर बनाया जाता है मोर को नाचते देखकर लगा अगर मुफ़्त योजना अंग्रेज़ लाते तो ये मोर कभी आज़ाद नहीं होना चाहता।”

आख़िर में एक यूजर के बारे में जानना आपके लिए बहुत जरूरी है @akhaware नाम के यूजर ने तो कमाल ही कर दिया और सब कुछ बिना लिखे ही बोल दिया…, खैर जो भी लिखा अब आप खुद ही देख लीजिए…

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जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों ने एक सीसीटीवी फुटेज जारी किया है। इस वीडियो फुटेज के हवाले से दावा किया जा रहा है कि पुलिस ने यूनिवर्सिटी के भीतर लाइब्रेरी में घुस कर छात्रों की पिटाई की। पुलिस पर तरह-तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं। जैसा कि अपेक्षित था, मीडिया व लिबरलों के गिरोह विशेष ने इस वीडियो को वायरल करने में पूरी ताक़त लगा दी और और साथ ही दिल्ली पुलिस, गृह मंत्रालय, अमित शाह और केंद्र सरकार को लपेटने में लग गए। लेकिन, सच्चाई कुछ और ही प्रतीत हो रही है। वो हमें इसी वीडियो के लम्बे वर्जन को देखने के बाद पता चलता है।

थोड़े लम्बे वीडियो में स्पष्ट दिख रहा है कि ये छात्र पढ़ने के लिए लाइब्रेरी में नहीं बैठे हुए थे। पुलिस ने उन्हीं उपद्रवी छात्रों की पिटाई की, जिन्हें उन्होंने चिह्नित किया। जामिया नगर में हुई हिंसा के दौरान सैकड़ों वाहन फूँक डाले गए थे और पुलिस पर पत्थरबाजी की गई थी। वीडियो में दिख रहा है कि पुलिस जैसे ही लाइब्रेरी में पहुँचती है, उपद्रवी छात्र किताबें खोल कर पढ़ने का नाटक करते हैं। उससे पहले वो हड़बड़ी में किताबें बंद कर के बैठे हुए थे।

ऑपइंडिया पर देखें जामिया लाइब्रेरी काण्ड का पूरा वीडियो जो छिपाया गया

आपको याद होगा कि जामिया मिलिया इस्लामिया के प्रशासन और छात्रों, दोनों ने ही पुलिस को जाँच में सहयोग नहीं किया। जब पुलिस जाँच के लिए सीसीटीवी फुटेज लेने पहुँची, तब छात्रों ने हंगामा किया और पुलिस को वो फुटेज नहीं लेने दिया। आख़िर जामिया के छात्र क्या छिपाना चाहते थे? हमारे कुछ और भी सवाल हैं, जो इस वीडियो को देखने के बाद उभरते हैं:

  1. जामिया का ये वीडियो हिंसा के 60 दिनों बाद क्यों रिलीज किया गया? इतने दिन तक इन्तजार क्यों? उपद्रवी छात्रों और गिरोह विशेष के बीच क्या सेटिंग चल रही थी?
  2. वीडियो को काट-छाँट कर क्यों जारी किया गया? पूरा वीडियो आने से उपद्रवी छात्रों की पोल खुल जाती, क्या इसीलिए वीडियो को अपने हिसाब से काट कर पेश किया गया?
  3. ऊपर हम पूछ चुके हैं कि जामिया का प्रशासन और छात्र पुलिस की जाँच में सहयोग क्यों नहीं कर रहे हैं? सीसीटीवी फुटेज में ऐसा क्या था कि इसे पुलिस को नहीं दिया गया था?
  4. ये वीडियो किसने जारी किया? पुलिस ने तो नहीं किया है। फिर जामिया के छात्रों ने किया? या फिर गिरोह विशेष ने?
  5. पूरी क्रोनोलॉजी कुछ यूँ लग रही है। बसें जलाओ, पत्थरबाजी करो, अराजकता फैलाओ और फिर लाइब्रेरी में छिप कर पढ़ने का नाटक करो। पुलिस चिह्नित कर कार्रवाई करे तो सहानुभूति कार्ड खेलो। कहीं यही क्रोनोलॉजी तो नहीं है?

हालाँकि, फ़िलहाल सोशल मीडिया पर गिरोह विशेष द्वारा दिल्ली पुलिस को बदनाम करने का खेल जारी है। रवीश कुमार से लेकर बरखा दत्त तक इसी काम में लगे हुए हैं। किसी ने पूरा वाला वीडियो शेयर करने की जहमत नहीं उठाई है। आधे-अधूरे वीडियो के आधार पर अफवाहों का बाजार गर्म किया जा रहा है।

15 साल की हिंदू लड़की को अगवा कर जबरन धर्मांतरण करवाया: पाकिस्तान की सड़कों पर उतरे लोग

पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ होने वाले अत्याचार किसी से छिपे नहीं हैं। हिंदू लड़कियों को अगवा कर उनका जबरन धर्मांतरण आम बात हो गई है। बीते दिनों 15 साल की महक को अगवा कर जबरन इस्लाम कबूल करवाया गया था। इस घटना ने पाकिस्तान के लोगों को झकझोर दिया है। महक को न्याय दिलाने के लिए बड़ी संख्या में लोग सड़क पर उतर कर प्रदर्शन कर रहे हैं।

शनिवार (15 फरवरी 2020) को पाकिस्तान के कराची में हिंदू लड़की को न्याय दिलाने के लिए वकीलों के साथ सिविल सोसाइटी के सदस्यों ने प्रदर्शन किया। प्रेस क्लब के सामने जुटे लोग इंसाफ का माँग कर रहे थे। प्रदर्शनकारी ‘वी वांट जस्टिस’ और ‘महक को आज़ाद करो’ के नारे लगा रहे थे।

बीते दिनों भी सिख समुदाय के लोगों ने सड़कों पर उतरकर विरोध मार्च निकाला था और सरकार से महक को आजाद कराने की माँग की थी। पुलिस और अदालत से न्याय की उम्मीद खो चुके लोग अब महक को न्याय दिलाने के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पाकिस्तान में बीते कुछ महीनों में लगभग 50 अल्पसंख्यक (हिंदू और सिख) लड़कियों के जबरन धर्म परिवर्तन की घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। ‘पाकिस्तानी हिंदूज यूथ फोरम’ और ‘सिंधी हिंदू स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ पाकिस्तान’ नाम से चल रहे फेसबुक पेज के जरिए इसकी जानकारी दी गई है। दरअसल 15 जनवरी को सिंध प्रांत के जैकोबाबाद जिले से कक्षा नौ में पढ़ने वाली 15 वर्षीय महक को अली रजा ने अगवा कर लिया था।

लड़की के अनुसार, उसे इस्लाम कबूल करने के लिए मजबूर किया गया और फिर एक मुस्लिम से निकाह करवा दिया गया। इस मामले में पुलिस ने भी लड़की की कोई मदद नहीं की। जब यह मामला पाकिस्तान की कोर्ट में पहुँचा तो लड़की ने दबाव में आकर अदालत में कहा था कि उसने अपनी मर्जी से इस्लाम कबूल किया है। इसके बाद कोर्ट ने लड़की को आरोपित के साथ रहने का ही आदेश दे दिया था। हालांकि, जैसे ही वह अपने पिछले बयान से मुकर गई, कुछ पाकिस्तानी मौलवियों ने उसके लिए मौत की सजा की माँग की थी।

‘इस्लाम कबूल नहीं, डर कर किया था निकाह’ – नाबालिग हिन्दू लड़की के लिए कट्टरपंथियों ने माँगी मौत की सजा

मैं अली के साथ नहीं रहना चाहती, मुझे इस्लाम कबूल नहीं: 15 साल की लड़की ने कोर्ट में लगाई गुहार

15 साल की हिन्दू लड़की ने अमरोत शरीफ में क़बूल किया इस्लाम, 4 बच्चों के बाप से हुआ निक़ाह

‘आओ मिलकर हम बढ़ें, अधिकार अपने छीन लें’ – नसीरुद्दीन शाह ने CAA विरोधी प्रदर्शन की आग को दी हवा

दिल्ली के शाहीन बाग की तर्ज पर बेंगलुरु के बिलाल बाग में नागरिकता संशोधन कानून (CAA), NRC और NPR के खिलाफ पिछले काफी दिनों से प्रदर्शन के नाम पर हंगामा चल रहा है। यहाँ के विरोध में नसीरुद्दीन शाह, रामचंद्र गुहा और जिग्नेश मेवाणी जैसे लोग भी शामिल हो चुके हैं। इसका एक वीडियो भी सामने आया है। इसमें नसीरुद्दीन शाह प्रदर्शन कर रही महिलाओं को भड़काते हुए नजर आ रहे हैं। इस दौरान वो विवादित बयान देते हुए कहते हैं कि अपने अधिकार छीन लो।

नागरिकता संशोधन कानून को लेकर अफवाह का शिकार हुए लोग प्रदर्शन कर रहे हैं और कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी लोग हैं, जो प्रदर्शन की इस आग को शांत करने की बजाए उसमें घी डालने का काम कर रहे हैं। ऐसे लोगों की कतार काफी लंबी है। कभी कॉन्ग्रेस के नेता इन प्रदर्शनकारियों को भड़काते हैं, तो कभी इनके वरिष्ठ नेता इनके प्रदर्शन में शामिल होकर ‘आजादी’ का नारा लगाते हैं। तो कभी प्रदर्शन के नाम देश तोड़ने की बात कही जाती है। देश विरोधी और हिंदू विरोधी नारे लगाए जाते हैं।

अब इस प्रदर्शनकारियों की भीड़ को बॉलीबुड एक्टर नसीरुद्दीन शाह का साथ मिला है। दिल्ली में अनुराग कश्यप और स्वरा ने आवाज बुलंद की तो बेंगलुरु में नसीरुद्दीन शाह ने विरोध की आवाज को सुर दिया। इस दौरान वो लोगों को भड़काते हुए एक कविता पढ़ते हैं। वो कहते हैं, “वो हर सुंदर कला को और भी सुंदर बनाती हैं। मर्दों की तरह मेहनत वो रात-दिन करती हैं, मगर फिर भी ना कुछ करने की तोहमत लगाई जाती है। दिल में जो डर का किला है, वो तोड़ दो अंदर से तुम, एक ही झटके में अपने आप ही वो ढह जाएगा। आओ मिलकर हम बढ़ें, अधिकार अपने छीन लें। काफिला अब चल पड़ा है। अब न रोक पाएगा।”

नशीरुद्दीन शाह के इस विवादिय बयान पर लोगों ने कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कहा कि अगर बीजेपी CAA नहीं लाती तो हमें पता ही नहीं चलता कि इन गद्दारों के दिल में कितना जहर भरा हुआ है।

एक यूजर ने लिखा, “देखो हिंदुओं तुम्हारे पैसों पर पल कर ये जिहादी के विषैले बोल बाहर आ रहे हैं।”

कुणाल महाजन नाम के एक अन्य यूजर ने लिखा, “ऐसे लोगों के होते हुए हमें पाक या चीन की जरूरत नहीं है, क्योंकि हमारे पास बुद्धिजीवियों, धर्मनिरपेक्षों के साथ ही एक मीडिया गिरोह है, जो देश और इसकी नीतियों के खिलाफ लगातार प्रयासरत रहते हैं। मगर यही गिरोह विदेशी सरजमीं पर पलकें झुकाने तक की हिमाकत नहीं कर पाते हैं।”

नसीरुद्दीन शाह इससे पहले भी CAA विरोधियों के सुर में सुर मिला चुके हैं। वैसे यह कोई पहली बार नहीं है जब उन्होंने विवादित बयान दिया है। इससे पहले उन्होंने ‘मॉब लिंचिंग गिरोह’ का समर्थन किया था। इसके साथ ही उन्होंने ‘अर्बन नक्सल’ के समर्थन में देश विरोधी बयान देते हुए कहा था, “भारत में धर्म के नाम पर घृणा की दीवार एक बार फिर खड़ी हो गई है। जो अन्याय के खिलाफ हैं उन्हें दण्डित किया जा रहा है। जो अधिकार माँग रहे हैं उन्हें जेलों में डाला जा रहा है। कलाकारों, अभिनेताओं, विद्वानों, कवियों को डराया जा रहा है। पत्रकारों को बोलने से रोका जा रहा है।”

अनुपम खेर जोकर है, मनोरोगी है, मुझे मुस्लिम होने का अहसास कराया जा रहा: नसीरुद्दीन शाह

मुझे लोग ख़ूब गालियाँ दे रहे हैं, खुलेआम घृणा से व्यथित हूँ: नसीरुद्दीन शाह का ‘मॉब लिंचिंग गिरोह’ को समर्थन

पाकिस्तानी हिंदुओं की व्यथा: मृत परिजनों की अस्थियाँ गंगा में विसर्जित करने में वीजा की दिक्कत

पाकिस्तान के हिंदू समुदाय ने भारत सरकार से उन्हें वीजा मिलने में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए गुहार लगाई है। उन्होंने कहा कि वीजा मिलने से वे भारत में अपने मृत संबंधियों के अंतिम संस्कार में हिस्सा ले सकेंगे और साथ ही पाकिस्तान में जिनकी मृत्यु हुई है, उनकी अस्थियाँ गंगा नदी में विसर्जित करने के लिए भारत जा सकेंगे।

द एक्सप्रेस ट्रिब्यून की रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंदू समाज अपने मृतकों की अस्थियों को गंगा में विसर्जित करने को बेहद महत्व देता है। समुदाय के सदस्यों में अस्थियों को हरिद्वार में गंगा में विसर्जित करने की परंपरा रही है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान में हिंदू समुदाय का बड़ा हिस्सा अपने मृतकों को दफनाता है, लेकिन जो सवर्ण जातियों के हिंदू हैं, वे मृतकों का दाह संस्कार करते हैं और अंतिम क्रियाकर्म के बाद अस्थियाँ गंगा में विसर्जित करने भारत जाते हैं।

बताया जा रहा है कि भारत और पाकिस्तान के बीच हाल के तनाव के कारण भारत ने अपनी वीजा नीति सख्त कर दी है। इससे हिंदू समुदाय के लोगों के लिए अपने संबंधियों के अंतिम क्रियाकर्म में शामिल होने के लिए भारत जाना मुश्किल हो गया है। सूत्रों का कहना है कि कई परिवारों ने भारतीय उच्चायोग को वीजा अर्जी दी, लेकिन उनकी अर्जी को या तो खारिज कर दिया गया फिर कई कई आपत्तियों के साथ लौटा दी गईं।

हिंदू समुदाय के नेता व पूर्व सांसद दीवान चंद चावला ने द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के साथ बात करते हुए कहा कि हिंदू आस्था के अनुसार दाह संस्कार के बाद अस्थियों को पवित्र नदियों में प्रवाहित कर देना चाहिए। हिंदू धर्म में गंगा को देवी के रूप में पूजा जाता है और ऐसी मान्यता है कि अगर किसी मृत व्यक्ति की अस्थियाँ इसमें प्रवाहित कर दी जाती है तो उसका अगला जीवन बेहतर होगा। जब अस्थियाँ गंगा में प्रवाहित की जाती हैं तो मृतक के सभी पाप धुल जाते हैं। मृतक की आत्मा को तब तक शांति नहीं मिलती जब तक कि उसकी अस्थियाँ गंगा में विसर्जित नहीं कर दी जातीं। आगे उन्होंने कहा कि फिलहाल हजारों मृत लोगों की अस्थियों को कराची सहित सिंध के विभिन्न मंदिरों में रखा गया है, जिन्हें भारत ले जाया जाना है।

एक अन्य पूर्व सांसद कांजी राम ने इस बात पर दुख जताया कि पाकिस्तान में हिंदू समुदाय को अपनी धार्मिक परंपरा से हटकर अपने मृतकों को दफनाने पर बाध्य होना पड़ रहा है। उन्होंने पाकिस्तान स्थित भारतीय उच्चायोग से हिंदू परिवारों को मानवीय आधार पर वीजा देने का आग्रह किया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान में रहने वाले 80 फीसदी हिंदू दलित या फिर अन्य अल्पसंख्यक समुदाय से हैं। दलित समुदाय के सभी लोग प्राय: मृतकों के दाह संस्कार के बजाए उन्हें दफनाते हैं। कांजी राम ने कहा कि इसकी सबसे बड़ी वजह इनकी गरीबी है। दाह संस्कार में और फिर अस्थियों को भारत ले जाने में होने वाले खर्च को वहन करने की क्षमता नहीं होने के कारण दलित मृतकों को दफनाते हैं। उन्होंने उम्मीद जताई है कि भारत सरकार इसे गंभीरता से लेगी और वीजा प्रदान करेगी, ताकि पाकिस्तानी हिंदू मृतकों की अस्थियाँ हरिद्वार में प्रवाहित कर सकें।

वहीं भारतीय दूतावास द्वारा जारी एडवाइजरी में कहा गया है, “उन सभी पाकिस्तानी आवेदकों के वीजा आवेदनों को स्वीकार किया जाता है, जिनमें हिंदू समुदाय के लोग अपने परिवार के सदस्यों का अंतिम संस्कार करने के लिए हरिद्वार जाना चाहते हैं। मगर इसके लिए आवेदक को उस व्यक्ति का मृत्यु प्रमाण पत्र दिखाना होगा, जिसकी अस्थियों को विसर्जित किया जाना है। इसके अलावा आवेदक के NARDA कार्ड की कॉपी, बिजली बिल या गैस बिल की कॉपी और पोलिया प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना होगा।”

पैगंबर और कुरान की कसम खाई… बस से उतार चेहरे पर 11 गोलियाँ: अशोक रैना को KP होने की मिली ऐसी सजा

कश्मीरी पंडितों के वादी से विस्थापन की त्रासदी को 30 साल पूरे हो गए। इन 30 सालों में कश्मीरी पंडित उस दर्दनाक वक्त को और खूनी माहौल को कभी नहीं भूल सके हैं। 19 जनवरी को कश्मीरी पंडितों के पलायन के रूप में जाना जाता है। 1990 में इसी दिन सैकड़ों कश्मीरी पंडितों को मार दिया गया था। कई जगहों पर सामूहिक नरसंहारों को अंजाम दिया गया था।

कश्मीरी पंडितों की महिलाओं, बहनों, बेटियों के साथ गैंगरेप की वारदातों को अंजाम दिया गया था। कई लोगों को लकड़ी चीरने की मशीन से जिंदा चीर दिया गया था। वो खौफ की रातें थीं जब घरों में चिट्ठी फेंक कर भाग जाने को कहा जाता था। मस्जिदों से काफिरों कश्मीर छोड़ो के नारे लगाए जाते थे। कहा जाता था कि हमें कश्मीरी पंडितों की औरतों के साथ कश्मीर चाहिए, मर्द नहीं चाहिए। यहाँ निजाम-ए-मुस्तफा चलेगा। हिंसक और आक्रमक भीड़ सड़कों पर निकलती थी, लूटपाट करती थी और मंदिरों को तोड़ती थी। आखिरकार 19 जनवरी 1990 में कश्मीरी पंडित अपने घरों, सामानों को छोड़ कर कश्मीर से निकल गए और अपने ही देश में शरणार्थी बन गए। इन कश्मीरी पंडितों में से हर एक के पास दर्दनाक कहानी है।

हमें हिंदू औरतें चाहिए… कश्मीर की हर मस्जिद से 19/1/1990 की रात आ रही थी यही आवाज

यह सिलसिला 1990 तक ही सीमित नहीं रहा। ये कश्मीरी पंडित इस दर्दनाक हादसे के सालों बाद बाद भी इस नृशंसता के, इस जिहाद के शिकार हुए। हम बात कर रहे हैं 1997 की। जब अशोक कुमार रैना के चेहरे को 11 गोलियाँ से छलनी करके सिर्फ इसलिए हत्या कर दी गई, क्योंकि वो एक कश्मीरी पंडित थे। जबकि वो वहाँ के मुस्लिम बच्चों को पढ़ाने के लिए जाते थे।

अशोक कुमार रैना और इस घटना के बारे में बताते हुए उनके बेटे विकास रैना कहते हैं कि 1988 में ही कश्मीर में इस्लामिक आतंक का उद्भव हो गया था। इसका मकसद अल्पसंख्यकों खासकर कश्मीरी पंडितों में डर और दहशत पैदा करना था, जिससे कि वो निजाम-ए-मुस्तफा स्थापित कर सकें। इसके लिए उन्होंने कश्मीरी पंडितों को मारना और उत्पीड़ित करना शुरू किया। उन जिहादियों ने आर्मी और एयरफोर्स ऑफिसर्स को भी नहीं छोड़ा, उन्हें भी निशाना बनाया। इसके तहत 1989-1990 में लाखों कश्मीरी पंडितों को उनके कश्मीर से निकाला गया।

विकास रैना द्वारा मैगजीन में लिखी गई आपबीती

विकास कहते हैं, “मुझे आज भी वो दिन याद है, मैं और मेरी बहन सो रहे थे, तभी पापा आए और हमसे कहा कि जल्दी से तैयार हो जाओ। हमलोग कश्मीर छोड़कर जा रहे हैं और फिर हमलोग कुछ दोस्तों की मदद से अपने परिवार के साथ उधमपुर के लिए निकल गए। रास्ते में हमने देखा कि ट्रकों, कारों और बसों आदि में हजारों की संख्या में कश्मीरी पंडित जम्मू की तरफ जा रहे थे। मेरे पापा ने हमसे कहा कि अभी हमलोग कश्मीर से बाहर जा रहे हैं, क्योंकि फिलहाल ये जगह हमारे समुदाय के लिए सुरक्षित नहीं है। जब सब कुछ सामान्य हो जाएगा तो फिर हमलोग वापस आ जाएँगे। और ये दर्दनाक कहानी हर परिवार की है। हम अपने ही देश में शरणार्थी बन गए। हम रिफ्यूजी बनकर उधमपुर में रहने लगे।”

लेख का अगला हिस्सा

विकास आगे कहते हैं कि जिंदगी काफी संघर्ष के साथ बीत रही थी। मगर उन्हें यकीन था कि उनकी जिंदगी बेहतर हो जाएगी, क्योंकि वो अपने पेरेंट्स को हीरो मानते थे और उनका मानना था कि वो उनकी जिंदगी को बेहतर बना देंगे। वो कहते हैं कि उन्होंने अपने ग्रैंडपैरेंट्स और पैरेंट्स की आँखों में हमेशा ही दर्द और वेदना ही देखी। फिर उनके परिवार को पिता अशोक रैना के प्रिंसिपल के पोस्ट पर प्रमोशन की खबर के रूप में एक खुशखबरी मिली। उन्होंने बताया कि अशोक रैना उस समय मात्र 42 साल के थे, तो ये किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं थी। इस उम्र में भी उनके पास 21 साल के लेक्चररशिप का अनुभव था।

लेख का अगला हिस्सा

अशोक रैना की पोस्टिंग कारगिल (लद्दाख) में हुई। इस दौरान उनका परिवार उधमपुर से जम्मू में शिफ्ट हो गया। उन्होंने 1991 से 1994 तक कारगिल में तीन साल की सेवा पूरी की। इसके बाद उनका ट्रांसफर जम्मू में कर दिया गया। अशोक के साथ ही 14 अन्य का भी ट्रांसफर किया गया। विकास कहते हैं कि अशोक रैना को छोड़कर बाकी सभी को जम्मू में ही नियुक्त किया गया, जबकि उन्हें नई नियुक्ति दी गई। उनका ट्रांसफर गुल (रामबन) में कर दिया गया। 

विकास बताते हैं कि जम्मू-कश्मीर सरकार के नियम के अनुसार, जिस किसी की भी पोस्टिंग 3 साल के लिए लद्दाख में हो चुकी होगी, उसे किसी सुरक्षित जगह पर पोस्टिंग दी जाएगी, वो भी उसके पसंद के हिसाब से। लेकिन अशोक रैना के 3 साल लद्दाख में बिताने के बाद भी आतंक प्रभावित क्षेत्र में पोस्टिंग दी गई। उन्होंने इसके लिए शिक्षा मंत्री से भी मिलकर बात की, लेकिन उन्होंने भी उनकी बात को नजरअंदाज कर दिया। उनके मौलिक अधिकार का भी हनन किया गया।

इसके बाद अशोक के पिता ने उनको वहाँ जाने से मना किया। क्योंकि गुल एक पहाड़ी इलाका है और यह आतंकवादी हिजबुल मुजाहिद्दीन ग्रुप का प्रभाव क्षेत्र था। हालाँकि पिता के मना करने के बाद भी अशोक रैना ने नौकरी ज्वाइन कर ली, क्योंकि वो अपने काम को लेकर काफी समर्पित थे। उन्होंने वहाँ पर जाकर शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना शुरू कर दिया।

अशोक रैना के साथ हुई दर्दनाक वाकये को याद करते हुए विकास कहते हैं, “मेरे पापा गर्मी की छुट्टियों में घर आए हुए थे। वो वापस जाने वाले थे। वो 14 जून 1997 का दिन था, हमें नहीं पता था कि अगला दिन हम सबकी जिंदगी का सबसे काला दिन होगा। अगले दिन मेरे पापा गुल के लिए निकलने वाले थे। शाम में मैं अपनी दादी को लेकर ऑप्टिशियन के पास गया। इसके बाद हमलोग जम्मू के शिव मंदिर गए। मैंने पापा से ढेर सारी बातें की और फिर वापस घर आ गए। घर पर रविंद्र जी और सुशील जी नाम के लेक्चरर आए। वो दोनो भी छुट्टियाँ खत्म होने के बाद वापस से नौकरी ज्वाइन करने के लिए जाने वाले थे, तो वो  पापा के साथ अगले दिन के लिए डिस्कस करने आए थे कि कैसे जाना है।”

जब 23 साल बाद एक कश्मीरी पंडित पड़ोसन दिलशादा से मिलने गई, वही हुआ जो हम सोचते हैं…

विकास आगे कहते हैं, “अगली सुबह 15 जून 1997 को मेरे पापा सुबह-सुबह गुल के लिए निकल गए। उस समय मैं सो ही रहा था। मैंने अपनी माँ से कहा कि उन्होंने मुझे उठाया क्यों नहीं, मैं पापा को गुडबाय बोलना चाहता था। मुझे क्या पता था कि मैं अपने पापा को कभी गुडबाय नहीं बोल पाऊँगा। अगली सुबह 16 जून 1997 को मैं, मेरी माँ और दादी माँ सो रहे थे, तभी तकरीबन 4 बजे डोरबेल बजी। माँ ने दरवाजा खोला तो वहाँ पर कुछ पुलिस ऑफिसर्स थे। उन्होंने माँ से कहा कि जिस बस में मेरे पापा थे, उस पर आतंकवादियों ने हमला कर दिया, जिसमें कई लोग घायल हो गए। मैं और मेरी माँ, चाचा के घर गए और फिर वहाँ से घटनास्थल की तरफ दौड़े। 7 बजे तक सभी लगभग सभी अखबारों में खबर छप गई थी कि आतंकवादियों ने गुल में 3 कश्मीरी पंडितों की हत्या कर दी।” 

विकास आगे उस दिन का दर्दनाक पीड़ा के बारे में बताते हुए कहते हैं, “मैंने अपना होश खो दिया था। वह दु:ख की बेला हम सबके लिए काफी लंबी और पीड़ादायक थी। हमारा परिवार उजड़ गया था, बिखर गए थे हमलोग। शाम में हमारे घर के बार उनकी डेड बॉडी आई। उस समय हमने अंतिम बार अपने पिता को देखा था। मैंने उनके माथे को चूमकर आखिरी गुडबाय बोला। मेरी बहन मुझे पकड़-पकड़ कर रो रही थी। सभी लोग लगातार रोए जा रहे थे और मेरा दिमाग काम करना बंद कर दिया था। मुझे याद है कि चेहरे पर 11 गोलियाँ लगने के बाद भी काफी निश्चलता थी, बॉडी भी सॉफ्ट थी। रात के 10:30 के आस-पास उनका अंतिम संस्कार किया गया। यह इंसानियत की मौत थी।”

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विकास कुछ प्रत्यक्षदर्शी के हवाले से बताते हैं कि आतंकवादियों द्वारा अशोक रैना की बस को गुल से 7 किलोमीटर पहले ही रोक लिया गया था। इसके बाद सभी हिंदुओं को बस से नीचे उतरने के लिए कहा गया। जब कुछ यात्रियों ने इसका विरोध किया तो आतंकवादियों ने कहा कि वो इन लोगों को नुकसान नहीं पहुँचाएँगे, उसके कमांडर सिर्फ इनसे बात करना चाहते हैं। उन आतंकवादियों ने यात्रियों को यकीन दिलाने के लिए पैगंबर मोहम्मद और कुरान की कसम भी खाई थी।

इसके बाद 6 हिंदुओं (4 कश्मीरी पंडित और 2 जम्मू के निवासी) को नीचे उतारा गया। इसमें से 2 यात्री भाग निकले। एक चट्टान कूदकर तो दूसरा पहाड़ों के ऊपर से भाग निकला। बाकी बचे चारों को वहाँ से 30 किलोमीटर दूर एक छोटी सी नदी के पास ले जाया गया और तीनों कश्मीरी पंडितों को गोली मार दिया गया, जबकि चौथे, जो कि जम्मू का था, उसे छोड़ दिया गया। मतलब साफ है- उनका निशाना कश्मीरी पंडित थे। आतंकवादियों ने जिन कश्मीरी पंडितों की हत्या की, उनके नाम हैं- अशोक कुमार रैना (प्रिंसिपल), रविंद्र काबू (लेक्चरर) और सुशील पंडिता (सीनियर टीचर)। विकास कहते हैं कि ये एक पूर्व-नियोजित टारगेटेड हत्या थी। उनके पिता की हत्या इसलिए की गई, क्योंकि वो एक कश्मीरी पंडित थे। उन्होंने कहा कि इस जघन्य अपराध को हिजबुल मुजाहिद्दीन और अमानुल्लाह गुज्जर ग्रुप के बिल्लू गुज्जर ने अंजाम दिया और इस दंश वो आज भी झेल रहे हैं।

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‘पूरी कॉन्ग्रेस पार्टी सिंधिया जी के साथ’ – ज्योतिरादित्य के मीटिंग छोड़ चले जाने के बाद सीनियर नेता का बयान

मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ और कॉन्ग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच चल रही खींचतान अब मुखर होकर सामने आ गई है। शनिवार (फरवरी 15, 2020) को दिल्ली में वैसे तो सरकार और संगठन के बीच आपसी समन्वय को मजबूत बनाने के लिए मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस ने बैठक रखी थी, लेकिन इसमें तल्खी इस कदर दिखी कि सिंधिया बैठक को बीच में छोड़कर चले गए। वहीं कमलनाथ भी सिंधिया को लेकर सख्त दिखे। बैठक खत्म होने के बाद जब उनसे सिंधिया के सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरने के ऐलान को लेकर सवाल किया गया, तो नाराजगी भरे अंदाज में उन्होंने इसका जबाब दिया और कहा, “तो उतर जाएँ।”

पार्टी के दोनों वरिष्ठ नेताओं के बीच तल्खी बढ़ने की खबर सामने आने के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता डैमेज कंट्रोल में जुट गए हैं। साथ ही पूरे मामले से कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी को भी अवगत कराया गया है। इस बीच पार्टी के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने कहा, “पूरी कॉन्ग्रेस पार्टी सिंधिया जी के साथ है। हम सबने घोषणा पत्र में मिलकर वादे किए थे। पाँच सालों में कमलनाथ जी सभी वादों को पूरा करेंगे। ज्यादातर वादों पर काम तेजी से चल रहा है।”

वहीं, मध्य प्रदेश के कॉन्ग्रेस प्रभारी महासचिव दीपक बाबरिया ने बताया कि बैठक में पार्टी नेताओं की बयानबाजी और अनुशासनहीनता को लेकर चर्चा हुई है, लेकिन बैठक में सिंधिया के बयानों को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई। इस बीच उन्होंने ज्योतिरादित्य सिंधिया के बैठक छोड़कर जाने के सवाल पर उनका बचाव किया और कहा, “उनकी पहले से ही कोई बैठक तय थी, इसलिए वह जल्दी चले गए। उन्होंने शुक्रवार को मुझे बताया था कि उनकी शनिवार को 12 बजे दूसरी बैठक है, इसलिए वह मीटिंग से जल्दी चले गए।”

हालाँकि बताया जा रहा है कि कमलनाथ के घर पर हुई इस बैठक में सिंधिया के साथ कई मुद्दों पर नोंकझोंक हुई। इस बैठक में कमलनाथ और सिंधिया के अलावा पार्टी के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह, प्रदेश प्रभारी दीपक बाबरिया, जीतू पटवारी, अरूण यादव आदि मौजूद थे। इस बीच पार्टी समन्वय समिति की अगली बैठक में भोपाल में करने को लेकर भी सहमति बनी है।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कमलनाथ सरकार को चेतावनी देते हुए कहा था कि अगर मध्य प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार घोषणा पत्र को पूरी तरह लागू नहीं करती है तो वह सड़क पर उतरेंगे। एक सभा के दौरान उन्होंने कहा था, “घोषणा पत्र का एक-एक अंश पूरा होगा और अगर ऐसा नहीं हुआ तो आपके साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया भी सड़क पर उतरेगा।” इसके बाद इस पर कमलनाथ की भी तल्ख टिप्पणी आई, फिर सिंधिया बीच बैठक से निकल गए और फिर भी कॉन्ग्रेस कह रही है, “सब ठीक है।” 

सिंधिया ने कहा- वादा पूरा नहीं हुआ तो सड़क पर उतरेंगे, जवाब में कमलनाथ बोले – उतर जाएँ

राहुल गाँधी ने कहा था- मंदिर जाने वाले लड़की छेड़ते हैं, कॉन्ग्रेसी मंत्री ने कहा- तीर्थ पर घूमने जाते हैं बुजुर्ग

फैक्ट चेक: पुणे ट्रेन में हुई सागर मरकड की लिंचिंग में क्या कोई मजहबी एंगल भी था?

पुणे की ट्रेन में 26 साल के सागर मरकड की उसकी पत्नी और बच्चे के सामने पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना मुंबई-लातूर-बीदर एक्सप्रेस में गत मंगलवार को घटित हुई, जिसमें एक छोटी सी बहस ने बड़े झगड़े का रूप ले लिया। अंततः 12 लोगों ने 26 वर्षीय सागर की लाठियों से पीट-पीट कर हत्या कर दी।

पीड़ित की पत्नी ज्योति के अनुसार ट्रेन का कोच पूरा भरा हुआ था। बैठने की भी जगह नहीं थी। इस कारण उसके पति ने कुछ औरतों से मेरे लिए बैठने की जगह बनाने की गुजारिश की। उन औरतों ने न केवल जगह बनाने से इंकार कर दिया बल्कि बहस भी शुरू कर दी। इसके बाद इन औरतों और उनके साथ यात्रा कर रहे पुरुषों ने सागर को लाठियों से पीटना शुरू कर दिया जिससे उसके पति की जान चली गई।

ज्योति बताती हैं कि कोच में सबसे मदद माँगने पर भी कोई उनकी हेल्प को आगे नहीं आया। बाद में रेलवे पुलिस उनके बचाव में आगे आई जिसने दौण्ड जंक्शन पर सागर को ट्रेन से उतार कर गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती करवाया, जहाँ डॉक्टरों ने उसको मृत घोषित कर दिया।

आजकल के दौर में जब आम लोगों और मीडिया बीच अविश्वास बढ़ता जा रहा है, ऐसी दुर्घटनाएँ तुरंत अफवाहों को हवा देने वाली साबित होती हैं। मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह सही तथ्यों को सामने लाए। इस दुखद घटना के चर्चा में आने के बाद जब आरोपितों के मुस्लिम होने की अफवाह फैली, सोशल मीडिया यूज़र्स ने इस दुर्घटना पर दुख जताते हुए मीडिया को घेरना शुरू कर दिया कि वह किसी हिन्दू आदमी के मुस्लिम भीड़ द्वारा की गई लिंचिंग पर ही मौन रह जाता है।

हालाँकि इस घटना पर मीडिया के खिलाफ गुस्सा जाहिर करना अनुचित है। लेकिन मेनस्ट्रीम मीडिया इस मामले में इतनी बदनाम हो चुकी है कि कई बार उसको गैर वाजिब आलोचना का शिकार होना पड़ता है। ह्वाट्सएप पर वायरल हुए मैसेज में ‘बुरका’ पहने औरत को शिफ्ट होने को कहने पर उसके साथ चल रहे मुस्लिमों ने सागर नामक हिन्दू की पीट पीट हत्या कर दी की अफवाह चल रही है।

महाराष्ट्र के लोकप्रिय अखबार लोकमत के अनुसार लिंचिंग में दर्ज किए गए आरोपियों के नाम ताईबाई मारुति पवार (30), कलावती धोंडिबा चह्वाण (65), रुपाली सोमनाथ चह्वाण (21), गणेश शिवाजी चह्वाण (24), निकिता अशोक काले (35), जमुना दत्ता काले (20), ताई हनुमंत गणपत पवार (30), गंगूबाई नामदेव काले (40), सोनू आपका काले (24) हैं। इनके अलावा सोमनाथ नामक आदमी फरार हो गया है और एक नाबालिग लड़के से भी पुलिस पूछताछ कर रही है।

ठीक यही नाम महाराष्ट्र के दूसरे लोकप्रिय अखबार ‘साकल’ ने भी छापे हैं। इसके अलावा ऑपइंडिया ने स्वयं भी पुलिस से इन नामों की पुष्टि की है। इस हत्या में आरोपितों के मुस्लिम होने की अफवाहें हर लिहाज से गलत हैं, भ्रामक हैं।

इस तरह की अफवाहें इस बात की साक्ष्य हैं कि किस प्रकार लोगों और मीडिया के बीच अविश्वास बढ़ता जा रहा है। कई ऐसे उदाहरण दिए जा सकते हैं जहाँ मीडिया ने अपराधियों के मुस्लिम होने की बात को शरारतपूर्ण ढंग से न सिर्फ छुपाया, बल्कि उसे हिन्दू नाम देने का कुत्सित प्रयास भी किया। बतौर उदाहरण THE NEWS MINUTE ने मुस्लिम दोषी को हिन्दू नाम दिया था। साथ-साथ कई बार मुस्लिम मौलवियों द्वारा हत्या जैसे अपराधों में उन्हें ‘तांत्रिक’ लिखा भ्रम फैलाया गया, क्योंकि ‘तांत्रिक’ का अर्थ हिन्दू धर्म से संबंधित ‘तंत्र विद्या करने वालों’ से लिया जाता है।

जय श्रीराम से चिढ़े ‘मौलाना’ मुलायम के ‘टोंटी चोर’ पुत्र: पुलिस को हड़काया, युवक को सपाइयों ने पीटा

नाम: अखिलेश यादव। परिचय: यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री। पिता: मुलायम सिंह यादव। मुलायम सिंह दर्जनों रामभक्तों की लाश पर चढ़ ‘मुल्ला’ बने थे। बाद में कहा था- और भी मारते। मौलाना मुलायम कहे जाने पर खूब अघाते भी थे। बाद में बेटे अखिलेश ने ही बेदखल कर दिया। अखिलेश यादव चुनाव हारने के बाद जब मुख्यमंत्री आवास से रुखसत होने लगे थे तो नलों की टोंटी तक उखाड़ ले गए थे।

पिता-पुत्र दोनों तुष्टिकरण की राजनीति के जीवंत मिसाल हैं। इसकी मिसाल एक बार फिर शनिवार को तब देखने को मिली जब एक युवक को ‘जय श्रीराम’ कहने पर सपा के कार्यकर्ताओं ने पीट दिया। अखिलेश ने भी उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की। अखिलेश यादव को तो राम का नाम इतना नागवार गुजरा कि इसके लिए एक पुलिस अधिकारी को सरेआम धमका भी दिया।

घटना कन्नौज की है। सपा के महिला सम्मेलन को अखिलेश यादव संबोधित कर रहे थे। तभी जनता के बीच से अचानक से गोविन्द शुक्ला नाम के एक व्यक्ति ने अखिलेश से बेरोजगारी पर सवाल कर दिया। इस पर अखिलेश ने डपटते हुए उससे पलट कर सवाल किया कि तुम किसके आदमी हो? कहीं भाजपा के तो नहीं हो? इतना कहने पर ही शुक्ला ने ‘जय श्रीराम’ का नारा लगा दिया। इसके बाद समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने मौके पर ही उसकी पिटाई कर दी।

रिपोर्ट्स के अनुसार अखिलेश ने पुलिस से इस व्यक्ति को अपनी सुरक्षा में उनके पास लाने को कहा और मंच से ही आरोप लगाया- “दो दिन पहले ही उनके मोबाइल फोन पर एक भाजपा नेता ने उन्हें धमकी दी थी।
एक भाजपा नेता ने मुझे फोन और मैसेज कर जान से मारने की धमकी दी है। मेरी जान को खतरा है। धमकी का मैसेज मोबाइल में सेव है। एक-दो दिन में लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस करूँगा।” उन्होंने कहा, “अब हमारी जन सभा में भी भाजपा वाले अपने लोगों को भेजकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं।”, यादव ने आरोप लगाया कि उन्हें भाजपा वालों से खतरा है।

अखिलेश इतने पर ही नहीं रूके। मंच से ही पुलिस अधिकारी को हड़काते हुए कहा, “मैं पूछना चाहूॅंगा कि कितने स्टार हैं तुम्हारे ऊपर? यह (नारे लगाने वाला) आ कैसे गया यहॉं पर?” फिर कहा, “ऐसा है, जा नहीं सकता है, से काम नहीं चलेगा। आपकी सुरक्षा में ये आया कैसे यहॉं? क्या कर रहे थे आप? जाइए कप्तान साहब को लेकर आइए। अब हम यहॉं से तभी जाएँगे जब आप नारा लगाने वाले का नाम, पता और पिता जी का नाम दे दोगे।”

अखिलेश यादव
अखिलेश की सभा में जय श्रीराम कहने वाले की हुई पिटाई (साभार: हिन्दुस्तान)

अखिलेश यादव के इस बर्ताव की बीजेपी ने आलोचना की है। पार्टी प्रवक्ता शलभ मणि त्रिपाठी ने ट्वीट कर कहा है, “प्रभु राम के नाम से ऐसी नफरत तो मुगलकाल के कट्टरपंथी नवाबों को भी ना थी, हे राम!!”

जय श्रीराम नहीं बोलने पर समुदाय विशेष की पिटाई जैसे फर्जी प्रोपेगेंडा आप अक्सर सुनते रहते हैं। ऑपइंडिया ऐसे दुष्प्रचारों का लगातार तथ्यों के साथ खंडन करता रहता है। लेकिन, सच्चाई यह है कि जय श्रीराम कहने पर जब किसी की पिटाई होती है तो पूरा लिबरल गिरोह मौन हो जाता है। बीते ही साल पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के बारुईपुर में जय श्रीराम बोलने पर भाजपा कार्यकर्ता को कुछ लोगों ने दिनदहाड़े गोली मार दी थी। आरोप टीएमसी कार्यकर्ताओं पर लगा था।

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