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कॉन्ग्रेस को दुकान बंद कर देनी चाहिए: AAP की जीत पर ख़ुश चिदंबरम को प्रणब मुखर्जी की बेटी ने लताड़ा

दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम क्या आए, कॉन्ग्रेस पार्टी का तो सूपड़ा ही साफ़ हो गया। 70 में से कुल 67 सीटों पर कॉन्ग्रेस उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। चाँदनी चौक से अलका लाम्बा 4000 वोटों के लिए भी तरस गईं और उन्हें मात्र 5% वोटों से संतोष करना पड़ा। वहीं गाँधी नगर से लड़ रहे दिल्ली कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली को 21,913 वोट मिले। इन दोनों ही नेताओं को तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा। आम आदमी पार्टी और भाजपा के मुकाबले में कॉन्ग्रेस कहीं नहीं ठहरी।

पार्टी की बुरी हार के बावजूद कॉन्ग्रेस नेता ख़ुश नज़र आ रहे हैं। पी चिदंबरम और अधीर रंजन सरीखे नेताओं ने सीएम केजरीवाल की तारीफों के पुल बाँधे। चिदंबरम ने कहा कि आप की जीत हुई, बेवकूफ बनाने तथा फेंकने वालों की हार। उन्होंने केजरीवाल की जीत को ध्रुवीकरण, विभाजनकारी और खतरनाक एजेंडे की हार बताया। बकौल चिदंबरम, दिल्ली की जनता ने 2021 और 2022 में अन्य राज्यों जहाँ चुनाव होंगे, वहाँ के लिए मिसाल पेश की है। उन्होंने दिल्ली की जनता को सलाम किया।

कॉन्ग्रेस पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता शर्मिष्ठा मुखर्जी को चिदंबरम की ये बातें पसंद नहीं आईं। कॉन्ग्रेस अपनी बुरी हार के बावजूद ख़ुश हो रही है, ये उन्हें नागवार गुजरा। उन्होंने पूर्व केन्दीय गृह मंत्री पी चिदंबरम से पूछ डाला कि क्या भाजपा ने क्षेत्रीय दलों को भाजपा को हराने का ठेका दे दिया है? उन्होंने पूछा कि वो इस सम्बन्ध में जानकारी चाहती हैं। शर्मिष्ठा ने कहा:

“अगर कॉन्ग्रेस ने क्षेत्रीय दलों को भाजपा को हराने का ठेका नहीं दिया है, तो फिर हम आम आदमी पार्टी की जीत पर ख़ुश क्यों हो रहे हैं? हमारी बुरी हार हुई है, उसे लेकर हम चिंतित क्यों नहीं हो रहे हैं? अगर कॉन्ग्रेस ने स्थानीय पार्टियों को भाजपा को हराने का ठेका दे दिया है, फिर हमें अपनी दुकान बंद कर देनी चाहिए। भाजपा विभाजनकारी राजनीति से काम कर रही है, केजरीवाल स्मार्ट पॉलिटिक्स खेल रहे हैं। हम क्या कर रहे हैं? हमारे नेताओं को अपने इको चैम्बरों से बाहर निकलना पड़ेगा। अब आत्ममंथन का समय गया। एक्शन का समय है। “

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा दिल्ली महिला कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष भी हैं। बता दें कि इस चुनाव में कॉन्ग्रेस का वोट शेयर मात्र 4.26% रह गया है। पार्टी के नेता आपस में लड़ते रहे और चुनाव की तैयारी भी नहीं की। कीर्ति झा आज़ाद और सुभाष चोपड़ा जैसों को चेहरा बनाया गया लेकिन वो निष्क्रिय रहे। लेकिन, फिर भी पार्टी नेता ख़ुश हो रहे हैं क्योंकि भाजपा की हार हुई है। भाजपा 38.51% वोट शेयर के साथ अभी भी राज्य में मजबूत पार्टी बनी हुई है।

क्या है कॉन्ग्रेस का भविष्य: सीट शून्य, वोट शेयर 4%, 67 की जमानत जब्त, दूसरों की हार पर ख़ुशी

दिल्ली की राजनीति में कॉन्ग्रेस की ‘दमदार’ वापसी, EVM पर दिग्विजय सिंह ने सवाल उठा किया एकमात्र काम

AAP विधायक के काफिले पर 4 राउंड फायरिंग, 1 की मौत: मंदिर में दर्शन कर लौट रहे थे नरेश यादव

साउथ-वेस्ट दिल्ली के किशनगढ़ में आम आदमी पार्टी के नव-निर्वाचित विधायक के काफिले पर फायरिंग की गई। इस गोलीबारी में एक व्यक्ति की मौत हो गई। ये हमला AAP विधायक नरेश यादव के काफिले पर मंगलवार (11 फरवरी 2020) की रात हुआ। नरेश यादव लगातार दूसरी बार विधायक चुने गए हैं। महरौली क्षेत्र से उन्होंने इस बार 62301 मत पाकर भाजपा की कुसुम खत्री को मात दी है। जीत के बाद यादव अपने क्षेत्र में स्थित एक मंदिर में पूजा-अर्चना करने गए थे। वहाँ से लौटने के क्रम में उनके काफिले पर हमला हुआ।

एक अन्य व्यक्ति के घायल होने की भी ख़बर है, जो नरेश यादव के साथ ही था। आम आदमी पार्टी ने अपने अधिकारी ट्विटर हैंडल से जानकारी दी कि मंदिर से लौटते समय विधायक नरेश यादव के काफिले पर फायरिंग हुई, जिसमें गोली लगने से एक समर्थक की मौत हो गई। मीडिया में चल रही ख़बरों के अनुसार, अज्ञात लोगों ने विधायक व उनके समर्थकों पर 4 राउंड फायरिंग की। एक घायल को नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। AAP नेता संजय सिंह ने बताया कि मृतक का नाम अशोक मान है।

आम आदमी पार्टी ने कहा कि अशोक के रूप में उसने अपने परिवार के एक सदस्य को खो दिया है। अज्ञात अपराधी कार से आए थे। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में ये भी कहा जा रहा है कि एक ही अपराधी था, जो पैदल आया था। पुलिस ने मौके पर पहुँच कर छानबीन की। विधायक यादव ने कहा कि ये घटना दुखद है। उन्होंने कहा कि उन्हें ये तक नहीं पता है कि उन पर हमला क्यों किया गया और इसके पीछे कौन लोग शामिल थे।

विधायक ने बताया कि सबकुछ अचानक से हो गया। उनकी गाड़ी पर भी हमला किया गया। विधायक ने आशा जताई कि पुलिस दोषियों को खोज निकालने में समर्थ होगी। जब गोलीबारी हुई, तब विधायक का काफिला फोर्टिस अस्पताल के नजदीक स्थित रेड लाइट के पास रुका हुआ था।

दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने बड़ी जीत दर्ज की है। अरविन्द केजरीवाल फिर से मुख्यमंत्री की शपथ लेंगे। उनकी पार्टी ने 70 में से 62 सीटें जीतीं। सीटों के मामले में मुकाबला एकतरफा रहा और भाजपा को मात्र 8 सीटों से संतोष करना पड़ा। वहीं कॉन्ग्रेस पार्टी का पूरी तरह सूपड़ा साफ़ हो गया।

गोलीबारी की घटना में एक व्यक्ति को गिरफ़्तार किया गया है। पुलिस ने बताया है कि इस घटना का राजनीति से कुछ लेनादेना नहीं है और ये व्यक्तिगत दुश्मनी में हुई वारदात है। इस मामले में आगे की जाँच की जा रही है।

राहुल गाँधी ने मोदी के लिए कहा ‘डंडे मारेंगे’, समुदाय विशेष ने धुनिया बन कॉन्ग्रेस को धुना

गोपालदास ‘नीरज’ ने लिखा है;
ज्यों लूट ले कहार ही दुल्हन की पालकी
हालत यही है आजकल हिन्दुस्तान की

कहार की जगह भारतीय सियासत के वोट बैंक (मुस्लिमों) और दुल्हन की जगह कॉन्ग्रेस को रख दें तो ऐसा लगता है कि कभी जो पंक्तियॉं हिन्दुस्तान के नाम लिखी गई थी, वह देश की सबसे पुरानी पार्टी के हाल पर बिल्कुल फिट बैठती है। इस वोट बैंक के लिए कॉन्ग्रेस ने क्या-क्या नहीं किए। शाहबानो से इंसाफ छीन लिया। अयोध्या में जन्मभूमि से राम की मूर्ति हटवानी चाही। गॉंधी की प्रतिमा से किनारा कर कश्मीर को जिहाद की आग में जलने दिया। सियासत में टोपी और चादर का रंग घोला। देश के संसाधनों पर पहला हक उनका बताया। बहुसंख्यकों की भावनाओं को बार-बार लात मारी। काल की गति देखिए उसी वोट बैंक ने दिल्ली में 15 साल तक सरकार चलाने वाली कॉन्ग्रेस को अब की दफन कर दिया।

असल में 70 सदस्यीय दिल्ली विधानसभा के नतीजों को अगर सीटों के लिहाज से देखेंगे तो कुछ हाथ नहीं आएगा। क्योंकि, 2015 के विधानसभा चुनावों में भी कॉन्ग्रेस 0 थी, आज भी 0 है। लेकिन, जब वोट शेयर के हिसाब से इन नतीजों को समझेंगे तो एहसास होगा कि यह आप के पक्ष में प्रचंड जनादेश नहीं है, जिस तरह इसे प्रचारित किया जा रहा। इसका विकास से कोई लेना-देना नहीं है। न ही यह फ्री बिजली-पानी की राजनीति पर मुहर है। असल में यह ध्रुवीकरण की जीत है। बिना लड़े हथियार डालने की राजनीति का फलाफल है। ध्रुवीकरण से न केवल वोटों में कॉन्ग्रेस की हिस्सेदारी सिमट कर पॉंच फीसदी से कम हो गई है, बल्कि उसके 66 उम्मीदवारों में से 63 की जमानत जब्त हो गई।

2015 में भले कॉन्ग्रेस का खाता नहीं खुला था, लेकिन उसे 9.7 फीसदी वोट मिले थे। उस चुनाव में उसके परंपरागत वोटरों का बड़ा तबका आप के साथ चला गया था, जिसकी वजह से 70 में से 67 सीटें आप को मिली। सत्ता पर लंबे समय तक काबिज रहने पर एंटी इंकबेंसी फैक्टर के कारण अमूमन ऐसा होता है। लेकिन, समय के साथ ऐसे वोटर फिर पुरानी पार्टी की ओर लौट जाते हैं। इसका एहसास 2017 के दिल्ली नगर निगम के चुनावों और 2019 के आम चुनावों में हुआ भी था। निगम चुनावों में कॉन्ग्रेस को 21.1 फीसदी वोट मिले थे और वोट शेयर के लिहाज से आप से वह केवल पॉंच फीसदी पीछे रह गई थी। 2019 के लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस ने करीब 22.5 फीसदी वोट हासिल किए जो आप से करीब साढ़े चार फीसदी ज्यादा थे।

लेकिन, विधानसभा चुनाव में तस्वीर पूरी तरह बदल गई। कॉन्ग्रेस इस चुनाव में कहीं नजर नहीं आई। न प्रचार में और नतीजों की तो पूछिए मत। गौर करने की बात यह है कि राजनीति में चुनावी परिदृश्य से गायब होना खुदकुशी मानी जाती है। कुछ जानकार मानते हैं कि मोदी को रोकने के लिए कॉन्ग्रेस ने खुद यह चुनाव किया। लेकिन, कॉन्ग्रेस को यह याद रखना चाहिए था कि दिल्ली की सत्ता में आप उसे हराकर आई न कि बीजेपी को। इसलिए यह बीजेपी से अधिक कॉन्ग्रेस की साख का सवाल था। लेकिन, दिवंगत हो चुकी शीला दीक्षित की तस्वीर लगाकर प्रचार करने वाली कॉन्ग्रेस ने प्रदेश में पार्टी का प्रभार उस पीसी चाको के ही हाथों में छोड़ रखा था जो लोकसभा चुनाव के पहले भी पार्टी को आप की पिछलग्गू बनाना चाहते थे। फिर चुनाव के दौरान उसके समर्पण और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी के बयानों ने उसे दफन ही कर दिया। राहुल गॉंधी ने 6 फरवरी की रैली में कहा, “ये जो नरेंद्र मोदी भाषण दे रहा है, 6 महीने बाद ये घर से बाहर नहीं निकल पाएगा। हिंदुस्तान के युवा इसको ऐसा डंडा मारेंगे…”

राहुल भूल गए कि कॉन्ग्रेस दिल्ली का विधानसभा चुनाव लड़ रही थी, जहॉं वह आप से मुकाबिल थी। इसका असर यह हुआ कि निगम और आम चुनावों में कॉन्ग्रेस की ओर वोटरों के लौटने का जो सिलसिला शुरू हुआ था वह थम गया। नतीजतन, उसके ज्यादातर उम्मीदवार कुल वैध मतों का छठा भाग भी हासिल नहीं कर पाए जो जमानत बचाने के लिए जरूरी होता है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा की बेटी शिवानी चोपड़ा की कालकाजी सीट से जमानत जब्त हो गई। प्रचार समिति के अध्यक्ष कीर्ति आज़ाद की पत्नी पूनम आजाद भी संगम विहार से जमानत नहीं बचा पाईं। उन्हें केवल 2,604 वोट यानी मात्र 2.23 फीसदी वोट ही मिले।

पॉंच मुस्लिम चेहरों को टिकट देने के बावजूद इस बिरादरी ने भी ‘हाथ’ का साथ देना गॅंवारा नहीं किया। कॉन्ग्रेस के पॉंचों मुस्लिम उम्मीदवार जमानत गॅंवा बैठे। सीलमपुर से मतीन अहमद को 15.61 फीसदी वोट मिले। 2013 के विधानसभा में यहॉं कॉन्ग्रेस कैंडिडेट को 46.52 और 2015 में 21.28 फीसदी वोट मिले थे। ओखला सीट, जिसमें शाहीन बाग आता है कॉन्ग्रेस के परवेज हाशमी महज 2.6 फीसदी वोट ही ला पाए। यहॉं 2013 में कॉन्ग्रेस को 36.34 तो 2015 में 12.08 फीसदी वोट मिले थे। बल्लीमारान से हारून युसूफ 4.73 फीसदी वोट मिले हैं। 2013 में उन्हें 36.18 तो 2015 में 13.80 फीसदी वोट मिले थे। कॉन्ग्रेस के दो अन्य मुस्लिम उम्मीदवारों मुस्तफाबाद से अली मेहदी को 2.89 तो मटियामहल से मिर्जा जावेद को 3.85 प्रतिशत वोट मिले हैं। इन सीटों पर क्रमशः 2013 में 38.24, 27.68 तो 2015 में 31.68 तथा 26.75 फीसदी वोट मिले थे। कुछ इसी तरह चांदनी चौक और बाबरपुर की सीट जहॉं अच्छी-खासी संख्या में मुस्लिम वोटर हैं, कॉन्ग्रेस कैंडिडेट को क्रमश: 5.03 और 3.59 फीसदी वोट ही मिले हैं।

वैसे, मुस्लिम मतदाताओं के ध्रुवीकरण का अंदाजा 8 फरवरी को ही लग गया था। दिल्ली के अन्य हिस्सों में मतदान धीमा था लेकिन मुस्लिम बहुल इलाकों में सुबह से ही लंबी कतारें लगी थी। सीलमपुर में तो रिकॉर्ड मतदान हुआ। लेकिन, नतीजों ने साफ कर दिया है कि सामान्य मुस्लिमों की नजर में अब कॉन्ग्रेस और उसके नेतृत्व की साख नहीं बची है। यही कारण है कि उन 16 सीटों पर जहॉं 15 से 50 फीसदी मुस्लिम आबादी है 12 आप के पास चली गईं। 4 पर भाजपा जीत गई। उन दर्जनभर सीटों पर जहॉं कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार अपने बलबूते मजबूती से लड़ रहे थे वहॉं भी प्रचार के दौरान साथ दिखने वाले लोगों ने मतदान के दिन कॉन्ग्रेस से किनारा कर लिया। यह मुमकिन केवल कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के सरेंडर से हुआ। इसका ही नतीजा है कि बीजेपी का वोट 2015 के 32.7 फीसदी से बढ़कर 38.51 फीसदी हो गया। इनमें एक बड़ा हिस्सा उन वोटरों का है जिसने 1998, 2003 और 2008 के विधानसभा चुनावों में बड़े उत्साह से कॉन्ग्रेस के लिए वोट किया था।

अब कॉन्ग्रेस के इस आत्मघाती कदम को भाजपा को रोकने के नाम पर जोर-शोर से प्रचारित किया जाएगा। लेकिन, खुदकुशी से पहले कॉन्ग्रेस को याद रखना चाहिए था कि राजनीति में जीत से ज्यादा बड़ा सत्य जमीन पर दिखना है। दिल्ली की राजनीति में कॉन्ग्रेस ने यह जमीन खो दी है। वह उस जगह पर पहुॅंच गई जहॉं से मुख्य लड़ाई में लौटना उसके लिए मुमकिन नहीं दिखता।

इस नियति को कॉन्ग्रेस ने खुद चुना है। उसने अतीत के अपने अनुभवों से नहीं सीखा है। वरना वह समझ सकती थी कि इसी तरह के सरेंडर ने यूपी और बिहार में उसे साफ किया। लेकिन, शीर्ष नेतृत्व की मोदी घृणा ने उसे इतना कुंठित कर रखा है कि अब वह आप की जीत में ही अपने लिए संभावनाएँ तलाश रही है। यही कारण है कि नतीजों के बाद चाको ने कहा, “इस चुनाव में दिल्ली की जनता ने ध्रुवीकरण की राजनीति करने तथा करंट लगाओ और गोली मारने की बात करने वाली बीजेपी को जिस तरह से खारिज किया है और विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा गृहमंत्री अमित शाह को करारी शिकस्त दी है हम उसका स्वागत करते हैं।”

शायद इसी दिन की कल्पना कर गोपालदास ‘नीरज’ ने लिखा होगा,
औरों के घर की धूप उसे क्यूँ पसंद हो
बेची हो जिसने रौशनी अपने मकान की

लेकिन कॉन्ग्रेस चाहे तो प्रेरणा भी गोपालदास ‘नीरज’ के ही लिखे से ले सकती है। उन्होंने यह भी कहा है,
हारे हुए परिन्दे ज़रा उड़ के देख तो
आ जाएगी जमीन पे छत आसमान की

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कश्मीर पर भूलों का करना था पिंडदान, कॉन्ग्रेस ने खुद का कर लिया

AAP की जीत के बाद भी तुम मुझे क्लीन चिट नहीं दे रहे, बंगाल हारने का डर है?: EVM का पत्र नेताओं को

नमस्कार भाजपा विरोधी नेताओं,

अब अपने परिचय में विशेष क्या बताऊँ? मैं ईवीएम हूँ। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन। मेरे दो यूनिट हैं- कण्ट्रोल यूनिट और बैलेट यूनिट। कण्ट्रोल यूनिट को पोलिंग अधिकारी के पास रखा जाता है, वहीं बैलेट वाली यूनिट को मतदाताओं के लिए रखा जाता है। लेकिन, इन तकनीकी बातों से आपको क्या मतलब? आप तो नेता हैं न। आप तो मानते हैं कि मैं ब्लूटूथ से भी हैक कर ली जाती हूँ। कुछ दिनों बाद आप ये कहेंगे कि मुझे उँगलियों के इशारों से भी नचाया जाता है। मैं हार का ठीकरा हूँ। मैं जीत में गौण हूँ। फिर भी मैं मौन हूँ।

जब हार होती है तो नायक नहीं, खलनायक हूँ मैं। जब जीत होती है, तो मेरी चर्चा ही नहीं होती। मैंने देखा था आम आदमी पार्टी के नेताओं को। दो दिनों तक उनका नाटक देखा, जब मैं ‘स्ट्रांग रूम्स’ में बंद थी। संजय सिंह प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के कई तरह के दावे कर रहे थे। कह रहे थे कि मुझमें छेड़छाड़ की गई है। केजरीवाल का एक नेता तो मेरे पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने लगा। उसने कहा कि मैं प्रेग्नेंट हूँ। अगर नार्मल डिलीवरी हुई तो AAP जीतेगी और ऑपरेशन हुआ तो भाजपा।

खैर, अरविन्द केजरीवाल जीत गए। किसी ने नहीं कहा कि मैं अग्निपरीक्षा पास कर गई हूँ। किसी ने नहीं कहा कि मेरे साथ छेड़छाड़ नहीं की गई है। किसी ने नहीं कहा कि मैं निष्पक्ष हूँ। कैसे कहेंगे? वो इतने ‘असुरक्षित’ हैं कि उन्हें अगली बार अपनी हार का डर है, कइयों को अगले कुछ चुनावों में भाजपा की जीत का डर है। ऐसे में, मुझे पवित्रता का सर्टिफिकेट देकर वो भला एक मुद्दे को हवा में क्यों उड़ा दें? मुझे फिर दोष दिया जाएगा। मैं मानसिक रूप से इनके लिए तैयार हूँ। बिहार में, बंगाल में, असम में। कहीं भी ऐसा मौक़ा आ सकता है।

भाजपा नेताओं ने भी हार स्वीकार किया। हारे हुए नेताओं को करना ही चाहिए। मनोज तिवारी और अमित शाह ने मुझ पर ऊँगली नहीं उठाई। क्या आप सब भी ऐसा नहीं कर सकते? दिग्विजय सिंह मुझे रोज भर-भर के गालियाँ देते हैं। प्रशांत भूषण का नाम लूंगी तो कहीं वो सुप्रीम कोर्ट में न चले जाएँ। अरे हाँ, केस तो हुआ ही था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वीवीपैट तकनीक का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल किया जाए। मुझे तो वहाँ तक घसीटा गया। जब राफेल फेल हो जाता है, तब मुझ पर ठीकरा फोड़ा जाता है।

नेताओं, दिल्ली विधानसभा में तो एक खिलौने को हैक कर के मुझे हैक करने का दावा किया गया। जब चुनाव आयोग ने मुझे हैक करने की चुनौती दी तो तय समयसीमा तक किसी की हिम्मत नहीं हुई कि वो सामने आ सके। हाँ, एनसीपी और सीपीएम जैसे दलों ने ज़रूर कोशिश की लेकिन अंत में वो भी बहाने बना कर निकल लिए। मैं वो हूँ, जिसके आसानी से हैक किए जाने की बात की जाती है लेकिन कर कोई नहीं पाता। बेइज्जती का जो डर है। आलम देखिए, जिन्होंने मुझे हैक करने का दावा किया था, आज वही मेरे कारण जीत का जश्न मनाने में मशगूल हैं।

संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, हर जगह बलि का बकरा मुझे ही बनाया जाता है। एक दिन पहले मुझे गालियाँ दी जाती हैं, अगले ही दिन मनपसंद परिणाम आते ही उन बातों को भुला दिया जाता है। इस बार मेरी लाज बच गई। चलिए, दिल्ली चुनाव को वणक्कम।

दिल्ली में क्यों नहीं खिल पाया कमल, क्या सचमुच विकास ही था मुद्दा?: ऑपइंडिया का वीडियो विश्लेषण

दिल्ली विधानसभा चुनाव में आख़िर कमल क्यों नहीं खिल पाया? 38% से अधिक वोटिंग प्रतिशत रहने के बावजूद भाजपा सत्ता क्यों नहीं ले पाई? इस बारे में ऑपइंडिया के डिप्टी न्यूज़ एडिटर अजीत झा का कहना है कि कुछ महीनों पहले तक चुनाव को एकतरफा माना जा रहा था। उन्होंने बताया कि मनीष सिसोदिया काफ़ी देर तक पीछे चल रहे थे। अगर उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व काम किया होता तो पटपड़गंज से सिसोदिया और कालकाजी आतिशी मर्लेना को जीतने के लिए इतना संघर्ष न करना होता।

मुफ्त में चीजें देने के बल पर राजनीति हर जगह नहीं चल सकती। ये ट्रेंड दक्षिण भारत से चला लेकिन आज वहीं फेल हो रहा है। ये चुनाव विकास के मुद्दे पर नहीं लड़ा गया, ये स्पष्ट है। फिर मुद्दे क्या थे? चेहरा एक ऐसा ट्रेंड है, जो दिल्ली को प्रभावित करता है। जब चुनाव में कोई बड़ा चेहरा आता है, तो दिल्ली उस पर भरोसा जताती है। शीला दीक्षित और अरविन्द केजरीवाल पर दिल्ली ने लगातार भरोसा जताया। लोकसभा चुनावों में भाजपा के पास मोदी के रूप में बड़ा चेहरा था, तो दिल्ली ने भाजपा को भारी मतों से विजयी बनाया।

दिल्ली विधानसभा चुनाव में मुस्लिमों में ध्रुवीकरण हुआ और मुस्लिम बहुल इलाक़ों में भाजपा के ख़िलाफ़ वोट गए और मुस्लिमों ने AAP पर भरोसा जताया। जहाँ तक कॉन्ग्रेस की बात है, उसने अगर 2015 वाला परफॉरमेंस ही बरक़रार रखा होता तो शायद नतीजे कुछ और होते। कॉन्ग्रेस हर जगह भाजपा को रोकने के लिए कोशिश कर रही है, जिस चक्कर में वो चौथे नंबर की पार्टी बनने या राजद जैसे दलों का पिछलग्गू बनने में नहीं हिंचकती।

दिल्ली में क्यों नहीं खिला कमल: अजीत भारती और अजीत झा की चर्चा

शीला दीक्षित के निधन के बाद कॉन्ग्रेस को घाटा हुआ क्योंकि उनके नेतृत्व में पार्टी के वोटर लौट रहे थे। कॉन्ग्रेस लगभग 10 सीटों पर मजबूती से लड़ रही थी लेकिन शीर्ष नेतृत्व ने पूरी तरह समर्पण कर दिया। दिल्ली के खेल से कॉन्ग्रेस अब बाहर जा चुकी है। कॉन्ग्रेस ने जो भी राजनीति की, वो सोशल मीडिया पर की। पीसी चाको कॉन्ग्रेस के प्रभारी थे, जिनके शीला दीक्षित से मतभेद रहे हैं। सुभाष चोपड़ा को अध्यक्ष बनाया गया और कीर्ति झा आज़ाद को कैम्पेन कमिटी का अध्यक्ष बना दिया गया। दोनों ही लगभग निष्क्रिय रहे।

प्यार के लिए खतना तक कराया, दर्द सहे: ईसाई युवक को मुस्लिम प्रेमिका के अब्बा ने पीट कर भगाया

बोब्बिली भास्कर ने इस्लाम अपनाया क्योंकि वो एक मुस्लिम लड़की से प्यार करता था। लड़की के पिता ने वादा किया था कि अगर भास्कर ने इस्लाम अपना लिया तो दोनों का निकाह कर दिया जाएगा लेकिन वो बाद में मुकर गया। बोब्बिली ने अपनी कहानी ‘स्वराज्य मैग’ के स्वाति गोयल शर्मा के साथ शेयर की। लड़की के अब्बा ने भास्कर ने कहा कि अगर उसने खतना करा लिया तो वो उसे अपना लेगा। ईसाई समुदाय में जन्मे भास्कर ने लड़की के पिता को ‘अल्लाह की क़सम’ दी और धन्यवाद दिया, लेकिन उसे क्या पता था कि ये सब करने के बाद भी उसे कुछ नहीं मिलेगा।

उसने एक स्थानीय इस्लामी संगठन से ‘धर्मान्तरण सर्टिफिकेट’ भी प्राप्त किया। उसके बाद वो सर्जिकल प्रक्रिया से गुजरा। 25 वर्षीय भास्कर तेलंगाना के विकाराबाद जिले का रहने वाला है। हैदराबाद से वाकिराबाद लगभग 75 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। उसे जून 10, 2019 को ‘मुस्लिम वेलफेयर आर्गेनाईजेशन तन्दुर’ से धर्मान्तरण सम्बन्धी प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ था। उसका इस्लामी नाम मोहम्मद अब्दुल हुनैन रखा गया। उसके खतने की प्रक्रिया भी वाकिराबाद के ही एक हॉस्पिटल में हुई। ये सर्जिकल प्रक्रिया एक मुस्लिम डॉक्टर ने पूरी की।

इस प्रक्रिया के कारण न सिर्फ़ उसे लगातार दर्द रहता है, बल्कि शरीर के साथ-साथ उसके मन पर भी इसका गहरा आघात पड़ा है। उसने कहा कि अगर उसकी गर्लफ्रेंड के परिवार ने उसे बाध्य नहीं किया होता तो वो इस प्रक्रिया से कभी नहीं गुजरता। उसे अपना खतना कराने का काफ़ी पछतावा भी है। उसने कहा कि उसे अभी भी दर्द रहता है। हालाँकि, इसके बाद भी लड़की के अब्बा ने भास्कर से कहा कि वो इस्लामी रहन-सहन अपनाए क्योंकि केवल खतना कराने से कुछ नहीं होगा।

भास्कर पहले शुद्ध शाकाहारी था लेकिन अपनी गर्लफ्रेंड को पाने के लिए उसने माँसाहार शुरू किया। ईसाई होने के कारण पहले वो चर्च जाता था लेकिन फिर वो दिन भर में 5 बार नमाज़ पढ़ने लगा। वो अपनी गर्लफ्रेंड को पाने के लिए इतना बेताब था कि उसने नमाज पढ़ते हुए और इस्लामी आयतें पढ़ते हुए कई वीडियो बनाए और लड़की के परिवार वालों को संतुष्ट करने के लिए उन्हें भेजे। इसके बाद जब वो लड़की के अब्बा के पास पहुँचा और बताया कि वो कैसे एक मुस्लिम बन गया है, उसकी गर्लफ्रेंड के अब्बा ने उसके साथ ऐसा व्यवहार किया जैसे वो उसे जानते ही न हों।

लड़की के परिजनों व रिश्तेदारों ने मिल कर भास्कर की जम के पिटाई की। उसने लड़की के परिजनों के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई लेकिन उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई। उसने अपनी गर्लफ्रेंड निकत सुल्ताना, उसके पिता सलीमुद्दीन के अलावा आसिफ, सिराज और लतीफ़ के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराया, जिन्होंने उसकी पिटाई की थी। भास्कर और निकत एक-दूसरे को 11 सालों से जानते हैं और एक ही स्कूल से पढ़े हैं। उसने बताया कि निकत कुछ दिनों पहले ही उसके पास आई थी और निकाह के लिए गुहार लगा रही थी। उसने बताया कि उसकी गर्लफ्रेंड के परिजनों ने निकत को घर में ही नज़रबंद कर दिया था।

भास्कर ने जब मुस्लिम समाज के स्थानीय प्रबुद्ध जनों को हस्तक्षेप करने को कहा और अपना दुखड़ा सुनाया तो उन्होंने दोनों पक्षों की बैठक कराई। बैठक में ही उसकी पिटाई की गई। उसने बताया कि तब से निकत के परिवार वालों ने उसकी ग्रलफ्रेंड से उसकी बात नहीं कराई है। अब इस मामले में सुनवाई होनी है। उसने बताया कि उसके खतने में हज़ारों खर्च हो गए और अब वह वकील को रुपए दे रहा है ताकि केस लड़ सके। इस चक्कर में उसके कितने ही रुपए उड़ गए हैं। उसे अब बस निकत के निर्णय का इन्तजार है।

क्या है कॉन्ग्रेस का भविष्य: सीट शून्य, वोट शेयर 4%, 63 की जमानत जब्त, दूसरों की हार पर ख़ुशी

इस बात में कोई दो राय नहीं कि देश की आजादी के बाद से सबसे अधिक समय तक दिल्ली ही नहीं बल्कि पूरे देश पर कॉन्ग्रेस पार्टी ने राज किया है। लेकिन आज आए दिल्ली विधानसभा चुनावों के परिणाम में देश की एक बड़ी पार्टी को लगातार दूसरी बार शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा है।

एक तो हार हुई। ऊपर से 66 उम्मीदवार में से 63 कॉन्ग्रेस प्रत्याशियों की जमानत जब्त होना इस बात की गवाही देता है कि, यह हार से भी बड़ी शर्मनाक हार तो है। साथ ही यह चुनावी परिणाम दर्शाते हैं कि, कॉन्ग्रेस पतन की ओर जा रही है। यही कारण है कि दिल्ली चुनाव परिणामों के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी के नेताओं ने अपनी ही पार्टी के नेताओं पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। दिल्ली कॉन्ग्रेस पार्टी की वरिष्ठ नेत्री और पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की बेटी शर्मिष्टा मुखर्जी ने में दिल्ली हार के लिए पार्टी के सर्वोच्च नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराया है।

इससे भी बड़ी बात यह कि पार्टी के वरिष्ठ नेता इस बाद से दुखी नहीं हैं कि, दिल्ली चुनावों में कॉन्ग्रेस पार्टी की हार हुई है, बल्कि इस बात से ज़्यादा खुश हैं कि दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी सत्ता में नहीं आ सकी। इस पर भी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने चुटकी ली।

दिल्ली में बीजेपी के सत्ता में न आने और अरविंद केजरीवाल के दिल्ली की सत्ता में एक बार फिर से वापसी करने पर कॉन्ग्रेस की खुशी इस बात का इशारा करती है कि, पार्टी दिल्ली पहले ही हार मानकर खुलकर न सही, लेकिन अंदर खाने बीजेपी को किसी भी तरह से दिल्ली की सत्ता में न आने देने के लिए केजरीवाल को जरूर समर्थन दिया होगा।

ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि देश की एक बड़ी पार्टी का चुनावी मैदान में बिना उतरे ही एक राज्य की छोटी सी पार्टी के सामने अपने सारे हथियार डाल देना। यह प्रदर्शित करता है कि राहुल गाँधी किसी भी रूप में अपने आपको मोदी के सामने खड़ा होने की हिम्मत नहीं रखते। इतना ही नहीं राहुल गाँधी की नर्वसता उस दिन साफ़ देखी गई कि, जब राहुल गाँधी दिल्ली की इकलौती अपनी जनसभा में बोल बैठे, “6 महीने बाद मोदी को देश के युवा डंडा मारेंगे।” दिल्ली में कॉन्ग्रेस की इकलौती जनसभा में दिया राहुल गाँधी का यह बयान पार्टी के गले की फाँस बन गया, जिसे लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी के कई बड़े नेताओं को सफाई तक देनी पड़ी।

इसके बाद तो समझो कॉन्ग्रेस चुनाव प्रचार से गायब ही हो गई, लेकिन अच्छी बात यह रही कि कॉन्ग्रेस के नीरस चुनाव प्रचार का दिल्ली का जनता ने भी उसी तरह से सम्मान किया, जिस तरह से राहुल ने अपने भाषणों में देश के प्रधानमत्री नरेन्द्र मोदी का सम्मान किया था। हालाँकि, राहुल गाँधी के साथ पार्टी के पदाधिकारी पिछले साल महाराष्ट्र, राजस्थान और मध्य प्रदेश में बनी अपनी सरकार से जागी उम्मीदें भी अब समाप्त हो चुकी है।

दिल्ली हार के बाद पार्टी नेतृत्व को सदमा लगना लाज़िमी है, क्योंकि दिल्ली में शीला युग की शुरूआत 1998 से मंहगाई के बीच हुए दिल्ली चुनावों में विजय हासिल करने के साथ हुई थी। तब कॉन्ग्रेस पार्टी शीला दीक्षित के नेतृत्व में 70 में से 54 सीटों पर जीतकर आई और सरकार बनाई और वहीं सुषमा स्वराज के नेतृत्व वाली बीजेपी पार्टी को मात्र 15 सीटें लेकर करारी हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद 2003 में हुए विधानसभा चुनावों में एक बार फिर कॉन्ग्रेस को 70 में से 47 सीटें मिलीं, जबकि बीजेपी कुछ बढ़त के साथ 20 पर ही सिमट गई।

आश्चर्य तो तब हो गया कि जब 2008 में हुए विधानसभा चुनावों में शीला ने 43 सीटों के साथ दिल्ली में हैट्रिक लगा दी। कहा जाता है कि कॉन्ग्रेस पार्टी को दिल्ली में लगातार तीसरी बार मिली जीत, शीला दीक्षित की नेतृत्व क्षमता और दिल्ली में कराए विकास कार्यों का ही परिणाम था, लेकिन इसे पार्टी ने अपने हाथों से मिटा दिया।

इसके साथ ही देश में चल रही मनमोहन सिंह सरकार में मंत्रियों द्वारा किए गए भ्रष्टाचार और घोटाले एक के बाद एक उजागर होने लगे और देश में तत्कालीन केन्द्र सरकार के ख़िलाफ लोगों में उबाल पैदा होने लगा। इस आक्रोश को हवा तब मिली कि जब अन्ना ने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ और लोकपाल की माँग को लेकर दिल्ली में आंदोलन शुरू कर दिया। इस आंदोलन का असर लोगों पर कुछ इस तरह से हुआ कि दशकों से केन्द्र की सत्ता में काबिज कॉन्ग्रेस सरकार को एक झटके में उखाड़ के फेंका और विकल्प के रूप में जनता ने नरेन्द्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बना दिया।

इसी बीच अन्ना के आंदोलन से एक ऐसा चेहरा लोगों के सामने आया जिसने भ्रष्टाचार की लड़ाई अन्ना के साथ लड़ी और इसी के साथ अन्ना के आंदोलन में अन्ना के सहतयोगी रहे अरविंद केजरीवाल ने अपनी नई पार्टी बनाकर दिल्ली विधासभा का चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया और पहली बार में ही यानि कि, 2013 में हुए विधानसभा चुनावों में केजरीवाल ने कॉन्ग्रेस से मिलकर सरकार तो बना ली, लेकिन आप का कॉन्ग्रेस से गठबंधन अधिक समय नहीं चला और आप ने अपने हाथ खींचते हुए ऐलान किया कि दिल्ली में काम करने के लिए जनता का पूर्ण समर्थन चाहिए।

2015 में फिर से हुए दिल्ली चुनावों में कुछ ऐसा ही परिणाम आया जैसा कि केजरीवाल को अपेक्षा थी। केजरीवाल ने 70 में से 67 सीटों पर अपनी जीत हासिल कर सरकार बना ली। कुछ ऐसा ही हुआ आज आए परिणाम में कि, आप सरकार ने सभी को पछाड़ते हुए दिल्ली में दोबारा पूर्ण बहुमत से अधिक सीटें हासिल की है। वहीं बीजेपी ने जरूर पिछले वर्ष की अपेक्षा बेहतर प्रदर्शन करते हुए सीटों में बढ़ोत्तरी की है।

यह परिणाम कॉन्ग्रेस के लिए बेहद शर्मनाक हैं, क्यों दिल्ली में कॉन्ग्रेस पार्टी की 0 सीटें आना तो उतना शर्मनाक न भी हो, लेकिन 66 में से 63 सीटों पर पार्टी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो जाना ये ज़्यादा शर्मनाक है। इसलिए पार्टी को पतन की ओर जाते देख पार्टी के नेताओं को सदमा लगना लाज़िमी है।

अपनी ‘दीदी’ स्मृति ईरानी की राह पर चले बग्गा, हारने के बावजूद निभाएँगे क्षेत्र की बच्चियों से किया वादा

भाजपा के समर्थक हमेशा कहते हैं कि उनकी पार्टी ‘Party With Difference’ और इसके लिए वो तरह-तरह की दलीलें भी देते हैं। जैसे आम आदमी पार्टी ने चीजें मुफ्त कर दी लेकिन भाजपा ने कभी इस मुद्दे पर चुनाव नहीं लड़ा क्योंकि अन्य राज्यों में ये संभव नहीं है। भाजपा ने राष्ट्रवाद के मुद्दे को नहीं छोड़ा और दुष्प्रचार के बावजूद सीएए, एनआरसी, तीन तलाक़, अनुच्छेद 370 और राम मंदिर पर अपने स्टैंड पर कायम रही। ये सभी चीजें मैनिफेस्टो में थीं और पार्टी ने पूरा किया। तेजिंदर पाल सिंह बग्गा अपनी पार्टी की इसी विचारधारा के साथ आगे बढ़ रहे हैं।

दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता तेजिंदर सिंह बग्गा को पार्टी ने हरि नगर विधानसभा क्षेत्र से मैदान में उतारा था। उन्होंने अपने क्षेत्र के लिए अलग से मैनिफेस्टो जारी किया था, कई वादे किए थे। हालाँकि, तेजिंदर सिंह बग्गा जीत नहीं पाए। उन्हें आम आदमी पार्टी के राजकुमारी ढिल्लों ने 20,220 वोटों से मात दे दी। AAP उम्मीदवार ढिल्लों को जहाँ 57,892 मत मिले, बग्गा को 37,672 वोटों से संतोष करना पड़ा। अन्य सीटों की तरह ही यहाँ भी कॉन्ग्रेस की जमानत जब्त हो गई।

राजकुमारी को 53.67% वोट मिले, वहीं तेजिंदर को 35.07% वोट प्राप्त हुए। दोनों के बीच मतों का अंतर 18.6% का रहा। ट्विटर पर विरोधियों ने बग्गा को ट्रोल करना शुरू कर दिया। उनका मजाक बनाया जाने लगा। लोकतंत्र में जीत-हार होती रहती है लेकिन तेजिंदर सिंह बग्गा को जबरदस्ती व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाया जाए। वो समय-समय पर देश के सशस्त्र बलों के लिए धनराशि दान करते रहते हैं लेकिन उन्हें इसके लिए भी विरोधी निशाना बनाते हैं।

इसी बीच उन्होंने एक ऐसा फ़ैसला लिया, जिससे केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की यादें ताज़ा हो जाती हैं। उन्हें 2014 लोकसभा चुनाव में अमेठी में हार मिली थी लेकिन उन्होंने ज़मीन पर ऐसा काम किया कि तत्कालीन कॉन्ग्रेस अध्यक्ष को 2019 में पटखनी देकर ‘The Giant Slayer’ का खिताब पाया। इसी तरह बग्गा ने भी वादा किया था कि अगर वो चुनाव जीत जाते हैं तो लड़कियों के लिए ‘सेल्फ डिफेंस कोचिंग सेंटर’ की स्थापना करेंगे। दिल्ली में महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों को देखते हुए ये एक बेहतर क़दम है।

अब जब तेजिंदर पाल सिंह बग्गा चुनाव हार गए हैं, फिर भी उन्होंने अपना वादा पूरा करने की ओर क़दम बढ़ा दिए हैं। उन्होंने कहा कि वो बच्चियों से किया वादा पूरा करेंगे और हरि नगर में उनके लिए ‘आत्मरक्षा का प्रशिक्षण देने वाला कोचिंग सेंटर’ खुलेगा। उन्होंने कहा कि भले ही वो हार गए हों, वो अपने क्षेत्र की जनता से किया गया वादा व्यक्तिगत रूप से पूरा करेंगे। अब देखना होगा कि अपनी ‘दीदी’ स्मृति की राह पर चलने वाले बग्गा के इस क़दम का जनता पर क्या असर होता है।

फिर उफान मारने लगा केजरीवाल के PM बनने का सपना, फिर मोदी से तुलना करने में जुटा मीडिया

अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी एक बार फिर से राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा लेकर आगे बढ़ रही है। दोपहर तक जैसे ही दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम की तस्वीरें पूरी तरह साफ़ हुई, केजरीवाल की पार्टी ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से अपने नेशनल एम्बिशन को जाहिर कर दिया। सीएम केजरीवाल के भीतर पीएम बनने का सपना बार-बार उफान मारता रहता है, ये किसी से छिपा नहीं है। 2014 के लोकसभा चुनाव में वो वाराणसी में नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ लड़ने पहुँच गए थे, जहाँ उन्हें बुरी हार मिली थी। इसके साथ ही AAP की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा पर भी ताले लग गए थे।

हालाँकि, गोवा से लेकर हरियाणा तक पार्टी ने दाँव-पेंच आजमाए लेकिन सफलता कहीं नहीं मिली। आम आदमी पार्टी हर जगह नोटा और वामपंथियों से ही मुक़ाबला करती रही। ये भी जानने वाली बात है कि राजस्थान और पंजाब में पार्टी ने बेहतर परिणाम की उम्मीद की थी, लेकिन दोनों ही राज्यों में उन्हें जनता का प्यार नहीं मिला। अब आते हैं AAP के ताज़ा ट्वीट पर, जिनमें पार्टी ने लिखा है- “हम राजनीति करने नहीं, राजनीति बदलने आए हैं। क्रांति का हिस्सा बनिए, AAP ज्वाइन कीजिए।

उधर जदयू से निष्काषित किए गए नेता पवन वर्मा ने भी केजरीवाल की तारीफ की है। कहा जा रहा है कि आगामी बिहार चुनावों में पार्टी पूरी ताकत लगाएगी। आम आदमी पार्टी के भीतर राष्ट्रीय पार्टी बनने का भूत फिर से सवार हो गया है। लेकिन, जिस तरह से विपक्षी एकता की रैलियों में केजरीवाल को नज़रन्दाज़ किया जाता है और कुछ में तो वो हिस्सा ही नहीं लेते क्योंकि उन्हें ‘उचित सम्मान’ नहीं मिलता। हमने देखा था जब हाल ही में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी की अध्यक्षता में हुई सीएए विरोधी बैठक में केजरीवाल ने हिस्सा नहीं लिया था।

अब फिर से पत्रकार अरविन्द केजरीवाल को पीएम मोदी के टक्कर का चेहरा बना कर पेश करेंगे। उनका महिमामंडन किया जाएगा, बावजूद इसके कि क्षेत्र और जनसंख्या के हिसाब से देखें तो दिल्ली की उनकी जीत का ये अर्थ कतई नहीं निकलता कि यूपी और बिहार जैसे बड़े राज्यों में भी AAP पाँव पसार ही लेगी। लेकिन, पत्रकारों के एक विशेष वर्ग की कोशिश जारी रहेगी।

‘हम एक बार फिर नकारे गए, आत्ममंथन बहुत हो चुका, अब कार्रवाई का वक्त, शीर्ष पर निर्णय लेने में देरी भी वजह’

दिल्ली में आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार की तीसरी बार वापसी होने वाली है। रुझानों में AAP को 62 सीटें मिलती दिख रही है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी 12 सीटों पर आगे है, लेकिन कॉन्ग्रेस खाता तक नहीं खोल पाई। कॉन्ग्रेस के प्रदर्शन पर अब उनके नेता ही सवाल उठाने लगे हैं।

चुनाव परिणाम आने के बाद कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने ट्वीट किया, “दिल्ली में हम एक बार फिर नकार दिए गए। आत्ममंथन बहुत हो चुका, अब कार्रवाई का वक्त है। शीर्ष पर निर्णय लेने में देरी, रणनीति और राज्य स्तर पर एकता में कमी, हतोत्साहित कार्यकर्ता, जमीनी स्तर पर जुड़ाव में कमी- ये सभी कारक रहे हैं। सिस्टम का हिस्सा होने के नाते, मैं अपने हिस्से की जिम्मेदारी लेती हूँ।”

चुनाव नतीजों में अब तक पार्टी का एक भी जगह पर खाता नहीं खुला है। इस बीच पार्टी के भीतर की अंदरूनी कलह भी सामने आने लगी है। शर्मिष्ठा मुखर्जी ने इस ट्वीट के जरिए दिल्ली की हार पर जमकर सवाल खड़े किए। शर्मिष्ठा ने इसके लिए पार्टी आला कमान को भी जिम्मेदार ठहराया है।

इसके साथ ही कॉन्ग्रेस सांसद प्रताप सिंह बाजवा ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में हार के लिए पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन को दोषी ठहराया है। प्रताप सिंह बाजवा ने मंगलवार (फरवरी 11, 2020) को दिल्ली चुनाव में हार के लिए दिल्ली कॉन्ग्रेस इकाई को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि स्थानीय कॉन्ग्रेस इकाई के बीच मतभेद और आधा-अधूरा प्रचार की वजह से पार्टी की ये हालत हुई है। बाजवा ने कहा कि कॉन्ग्रेस आलाकमान ने दिल्ली की जमीनी स्थिति से अच्छी तरह वाकिफ होने के बावजूद उन्होंने कोई काम नहीं किया और AAP को आसानी से वॉकओवर दे दिया। 

बता दें कि कॉन्ग्रेस पहले से ही हार के लिए आश्वस्त थी। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा था, “ये तो हम पहले से ही जानते थे, लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि भाजपा का क्या परिणाम हुआ? जो इतनी लम्बी-लम्बी बातें करते हैं।” वहीं कॉन्ग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी तो पहले से ही अपनी हार से आश्वस्त नजर आए। उन्होंने कहा, “दिल्ली में कॉन्ग्रेस पार्टी ने सत्ता पर कब्ज़ा करने का कभी नहीं सोचा, हमने सोचा था कि कॉन्ग्रेस कुछ सीटें जीते और दिल्ली में कॉन्ग्रेस पार्टी का अस्तित्व बना रहे।”