कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने मुफ्त रेवड़ियों के वादे किए, लेकिन सत्ता में आने के दो साल बाद भी यह बोझ आम आदमी की झेल रहा है। सरकारी कर्मचारियों का वेतन लटका हुआ है। हालात यह है कि लाखों कर्मचारी अप्रैल का आधा महीना गुजरने के बाद भी मार्च 2026 के वेतन का इंतजार कर रहे हैं।
मामला सीधे तौर पर राज्य के करीब 6 लाख कर्मचारियों से जुड़ा है, जिन्हें हर महीने की तरह अप्रैल के पहले हफ्ते में वेतन मिल जाना चाहिए था। लेकिन इस बार 10 अप्रैल तक भी बड़ी संख्या में कर्मचारियों को सैलरी नहीं मिली।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह समस्या एक-दो विभाग तक सीमित नहीं है। शिक्षा, राजस्व, पुलिस, स्वास्थ्य और अन्य विभागों के कर्मचारी इस देरी से प्रभावित हुए हैं। यानी पूरा प्रशासनिक ढाँचा ही इसकी चपेट में आ गया है।
सरकारी कर्मचारियों को वेतन न मिलने की वजह?
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, इस देरी की दो बड़ी वजहें सामने आ रही हैं। पहली- फंड की कमी और दूसरी- ट्रेजरी और प्रोसेसिंग सिस्टम से जुड़ी तकनीकी दिक्कतें। अधिकारियों का कहना है कि वित्तीय वर्ष खत्म होने के समय भुगतान का दबाव बढ़ जाता है, जिससे देरी हो जाती है।
लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं होता। राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार पर पर आरोप सामने आए हैं कि सरकार ने करीब ₹6000 करोड़ की रकम अपनी गारंटी स्कीम्स, खासकर ‘गृहलक्ष्मी योजना’ की ओर डायवर्ट की है, जिससे वेतन भुगतान पर असर पड़ा।
वहीं राज्य के वित्तीय विभाग के अधिकारियों से एक और अहम बात सामने आई है। कई जगह ड्रॉइंग एंड डिस्बर्सिंग ऑफिसर (DDOs) ने समय पर बिल प्रोसेस नहीं किए, जिसकी वजह से भुगतान और अटक गया। यानी समस्या सिर्फ पैसे की नहीं, बल्कि प्रशासनिक ढिलाई की भी है।
वेतन में देरी का असर?
हालाँकि, कर्मचारी संगठनों का कहना है कि हर साल मार्च-अप्रैल के दौरान 2-3 दिन की देरी सामान्य मानी जाती है, लेकिन इस बार 10 दिन से ज्यादा देरी हो चुकी है, जो असामान्य है। यही वजह है कि कर्मचारियों में नाराजगी बढ़ रही है।
जमीनी स्तर पर इसका सीधा असर दिख रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि सैलरी न मिलने से EMI, बच्चों की फीस, किराया और रोजमर्रा के खर्च प्रभावित हो रहे हैं। कई लोगों को उधार लेने की नौबत आ गई है।
कुल मिलाकर, यह सिर्फ वेतन में देरी का मामला नहीं है, बल्कि राज्य की वित्तीय स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। एक तरफ सरकार की गारंटी योजनाओं पर हजारों करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं, दूसरी तरफ 6 लाख कर्मचारियों की सैलरी समय पर नहीं देना प्रशासनिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर चिंता बढ़ाने वाला संकेत है।
राज्य में जीत को कॉन्ग्रेस ने किए थे ‘रेवड़ी’ वादे
2023 में विधानसभा चुनाव जीतने के लिए कॉन्ग्रेस ने पाँच गारंटी दी थी। इन्हें ‘रेवड़ी’ कहा गया था। कॉन्ग्रेस ने 2023 विधानसभा चुनाव में वादा किया था कि सत्ता में आने पर वह हर घर को 200 यूनिट मुफ्त बिजली देगी। इसे गृह ज्योति योजना का नाम दिया गया था। इसके अलावा गृह लक्ष्मी नाम की योजना का भी एक वादा किया गया था। इसके अंतर्गत कॉन्ग्रेस ने वादा किया था कि वह राज्य की महिलाओं को ₹2000 प्रतिमाह देगी।
कॉन्ग्रेस ने कर्नाटक की आर्थिक स्थिति और मुफ्त सुविधाओं के वादों से अर्थव्यस्था पर पड़ने वाले बोझ को दरकिनार करते हुए हर परिवार को 10 किलो अनाज देने का भी वादा किया था, इसे अन्न भाग्य योजना का नाम दिया गया था। कॉन्ग्रेस ने राज्य में महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा का भी वादा किया था। इसके अलावा राज्य के बेरोजगार युवाओं को भी ₹1500 देने की बात कही गई थी। इनमें से कुछ योजनाएँ पूरी तरह से लागू कर दी गई हैं तो कुछ को आंशिक रूप से लागू किया गया है।
कॉन्ग्रेस के इन ‘रेवड़ी’ वादों का असर अब राज्य के खजाने पर दिख रहा है और वह राजस्व बढ़ाने के लिए नई-नई जुगत भिड़ा रही है। वह राज्य की आम जनता को अब नए कर और बढ़े करों से लादना चाह रही है। साथ ही वह कमाई के नए जुगाड़ भी लगा रही है। सरकारी कर्मचारियों का लटका वेतन भी इसी का असर है।
डीजल-पेट्रोल के बाद पानी और बसों के किराए बढ़ाने की तैयारी
इससे पहले भी कॉन्ग्रेस सरकार ने अपना खजाना भरने के लिए जनता पर बोझ डाला है। राज्य सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए थे। कॉन्ग्रेस सरकार ने राज्य में पेट्रोल और डीजल पर सेल्स टैक्स बढ़ाया था। इसके अंतर्गत पेट्रोल और डीजल के दाम राज्य क्रमशः ₹3 और ₹3.50 बढ़ गए थे। इसको लेकर कॉन्ग्रेस सरकार की खूब आलोचना हुई थी। यह निर्णय लोकसभा चुनाव के आने के तुरंत बाद लिया गया था।
पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ाने से भी कॉन्ग्रेस सरकार का खजाना पूरा नहीं पड़ा कि फिर कॉन्ग्रेस सरकार में उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने बेंगलुरु में पानी आपूर्ति के दाम बढ़ाने का ऐलान कर दिया था। उपमुख्यमंत्री शिवकुमार का दावा है कि बेंगलुरु का जल आपूर्ति विभाग अपना बिजली का बिल और कर्मचारियों की तन्ख्वाह तक नहीं दे पा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया कि कावेरी नदी से पानी लेने वाले बाशिंदों के लिए पानी की कीमतें 40% बढ़ाए जाने की तैयारी की।
17 अप्रैल 2026 को भारत के संसदीय इतिहास में याद रखा जाएगा। देश के चुनावी ढाँचे में अहम बदलाव करने के लिए लाए गए 3 संविधान संशोधन बिल को विपक्ष ने पारित नहीं होने दिया। महिलाओं के लिहाज से नारी शक्ति वंदन अधिनियम अहम था। अगर यह पारित हो जाता और कानून का रूप अख्तियार कर लेता तो 2029 का लोकसभा चुनाव का परिदृश्य ही बदल जाता।
विधेयक के पक्ष में 278 वोट और विरोध में 211 वोट पड़े। इस दौरान 489 सदस्य उपस्थित थे और सभी ने मतदान किया। संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत किसी भी संवैधानिक संशोधन के लिए, उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन जरूरी है।
Lok Sabha Speaker Om Birla says, "The Constitution (131st Amendment) Amendment Bill did not pass as it did not achieve a 2/3 majority during voting in the House." https://t.co/ucLnUltYnjpic.twitter.com/xcBUJ3RhAv
यह वोट केंद्र सरकार द्वारा संविधान (106वाँ संशोधन) अधिनियम, 2023 को अधिसूचित किए जाने के एक दिन बाद हुआ। इस अधिनियम के तहत 16 अप्रैल से लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान करने वाला कानून लागू हो गया है।
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इसके साथ जुड़े परिसीमन विधेयक 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026 को वापस लेने का प्रस्ताव रखा। ये विधेयक 131वें संशोधन से जुड़े हुए थे। सीटों की सीमा और जनगणना के मानदंडों में बदलाव करने का संवैधानिक अधिकार न होने के कारण, ये सहायक विधेयक कानूनी रूप से टिकने लायक नहीं रह गए थे।
यह सरकार की योजनाओं के लिए एक बड़ा झटका है। लोकसभा सीटों में बढ़ोतरी को रोक दिया गया है और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने महिला आरक्षण अधिनियम के कार्यान्वयन को अनिश्चितता के अँधेरे में डाल दिया गया है।
131वाँ संशोधन विधेयक क्या है?
131वाँ संशोधन विधेयक मूल रूप से भारत के चुनावों के स्वरूप को पूरी तरह से बदलने की एक योजना थी। लोकसभा में सीटों की संख्या 1971 की जनगणना के आधार पर तय की गई थी, जो आज भी जारी है। यह विधेयक के पारित होने से लोकसभा में सीटों की अधिकतम संख्या को 550 से बढ़ाकर 850 हो जाता।
इनमें से 815 सीटें राज्यों से और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों से आती। दरअसल यह उस सिद्धांत का समर्थन करता है, जिसमें प्रत्येक राज्य को उसकी वास्तविक जनसंख्या के अनुपात में सीटें मिलने की बात कही गई है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि देश भर में प्रत्येक नागरिक के वोट का महत्व लगभग समान हो।
केवल सीटें जोड़ने के अलावा, इस विधेयक ने संसद को यह तय करने की शक्ति मिल जाती कि अगला ‘परिसीमन’ (निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करने की प्रक्रिया) कब होगा और किस जनगणना का उपयोग किया जाएगा। इसके साथ आया परिसीमन विधेयक यह स्पष्ट करता था कि वे इस चरण के लिए 2011 की जनगणना का उपयोग करेंगे।
आम नागरिक के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस विधेयक को उन तकनीकी बाधाओं को दूर करने के लिए डिजाइन किया गया था, जो महिलाओं के लिए 33% आरक्षण को रोक रही थीं। इसने आरक्षण की शुरुआत को “2023 के बाद की पहली जनगणना” की शर्त से अलग करने की माँग की, ताकि आरक्षण कानून को 2026-27 की जनगणना के परिणामों का इंतजार किए बिना लागू किया जा सके। इसका उद्देश्य तत्काल परिसीमन प्रक्रिया से जोड़कर महिलाओं को उनका हक दिलाना था।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023
नारी शक्ति वंदन अधिनियम या महिला आरक्षण विधेयक सितंबर 2023 में पारित किया गया था। उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बारे में जानकारी दी थी कि कैसे 1996 से ही देरी हो रही थी। 2023 का यह कानून लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सभी सीटों में से एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम था। इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से जुड़ी महिलाओं के लिए एक उप-कोटा भी शामिल था, जिससे यह पक्का हो सके कि सत्ता के गलियारों में सबसे ज्यादा हाशिए पर पड़ी आवाजों को भी सुना जाए।
लेकिन, 2023 के उस कानून में एक अहम शर्त, अनुच्छेद 334A(1) जोड़ी गई थी। इसमें कहा गया था कि आरक्षण तभी लागू होगा, जब नई जनगणना हो जाएगी और सीटों के बँटवारे (परिसीमन) का काम पूरा हो जाएगा। चूँकि 2021 की जनगणना COVID-19 की वजह से टल गई थी और अब इसकी प्रक्रिया शुरू हो रही है जो 2027 तक पूरी होगी। इसलिए असल में आरक्षण मिलना 2029 के चुनावों या उसके बाद की ही बात लग रही थी।
131वाँ संशोधन सरकार की इस प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाने की एक कोशिश थी। यह एक ऐसा जरूरी बिल था, जो इस रास्ते को साफ कर देता। 131वाँ संशोधन पास न होने देने से, 2023 के कानून के तहत महिला आरक्षण 2034 से पहले लागू नहीं हो पाएगा, क्योंकि इसे 2027 की जनगणना के बाद परिसीमन प्रक्रिया पूरी होने से जोड़ा गया था।
परिसीमन बिल
इसी तरह, 2026 का प्रस्तावित परिसीमन बिल 131वें संशोधन का ही सीधा नतीजा था। परिसीमन वह प्रक्रिया है, जिसमें सीटों की सीमाएँ फिर से तय की जाती हैं, ताकि हर सांसद लगभग बराबर लोगों की नुमाइंदगी कर सके। अभी राज्यों को सीटों का बँटवारा 1971 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही तय है। ऐसा इसलिए किया गया है, ताकि उन राज्यों को नुकसान न हो, जिन्होंने आबादी पर काबू पाने के उपायों को कामयाबी से लागू किया है। लेकिन, 131वें संशोधन का मकसद इस रोक को हटाना था, ताकि भारत की आज की आबादी की असलियत को सीटों के बँटवारे में दिखाया जा सके।
परिसीमन बिल के तहत एक आयोग बनाया जाता, जिसकी अगुवाई सुप्रीम कोर्ट का कोई जज करता। यह आयोग हाल ही में जारी हुए आँकड़ों के आधार पर सीटों की सीमाएँ फिर से तय करता। महिलाओं को नुमाइंदगी देने के लिए यह प्रक्रिया बहुत जरूरी है, क्योंकि कानून के मुताबिक कुछ खास ‘आरक्षित’ सीटों की पहचान करना जरूरी है और यह काम सिर्फ परिसीमन की प्रक्रिया द्वारा ही पूरा किया जा सकता है।
संवैधानिक संशोधन के खिलाफ वोट देकर विपक्ष ने न सिर्फ सीटों की संख्या बढ़ाने का काम रोक दिया है, बल्कि सीटों की सीमाएँ फिर से तय करने का काम भी अटका दिया है। इसी प्रक्रिया के तहत 33% सीटें खास तौर पर महिलाओं के लिए तय की जानी थीं।
विपक्ष का तर्क था कि 2011 की जनगणना के आँकड़ों का इस्तेमाल करने से दक्षिण और उत्तर-पूर्वी राज्यों को नुकसान होगा, क्योंकि इन राज्यों में आबादी बढ़ने की रफ्तार धीमी रही है। लेकिन सरकार सरकार का जवाब था कि आप ऐसा लोकतंत्र नहीं चला सकते, जिसमें कुछ लोगों के वोटों का महत्व दूसरों के वोटों से ज्यादा हो और आप निश्चित रूप से नक्शे को फिर से बनाए बिना महिलाओं के लिए आरक्षण लागू नहीं कर सकते।
After the Constitution (131st Amendment) Bill failed to clear the required 2/3 majority in the Lok Sabha, opposition leaders react
इस बिल के पारित नहीं होने पर विपक्ष के नियत पर सवाल खड़े हो गए हैं। इस कदम से INDI गठबंधन के भीतर ‘महिला-विरोधी’ पूर्वाग्रह का पता चलता है। जहाँ एक ओर विपक्ष ने 2023 में महिलाओं के लिए आरक्षण का समर्थन करने का दावा किया था, वहीं शुक्रवार को उनके कार्यों ने एक अलग ही कहानी बयाँ की। 131वें संशोधन के खिलाफ वोट देकर विपक्ष ने प्रभावी रूप से 70 करोड़ महिलाओं से यह कह दिया है कि उन्हें अपने अधिकारों के लिए अभी और लंबा इंतजार करना होगा। वे 2023 के कानून का समर्थन करने का दावा करते हैं, लेकिन उन्होंने उसी बिल को खारिज कर दिया, जो उस कानून को लागू करने के लिए ज़रूरी था।
विपक्ष का महिला-विरोधी रवैया
Delhi: On the Constitution (131st Amendment) Bill being rejected in the Lok Sabha, Lok Sabha LoP Rahul Gandhi says, "We have clearly stated that this is not a women’s bill; it is an attempt to change the political and electoral structure of the country, and we have stopped it. I… pic.twitter.com/Ob6xbSfEao
बिल के गिर जाने के बाद विपक्ष का जश्न धोखा की तरह है। जहाँ राहुल गाँधी जैसे नेताओं ने इस बिल को ‘असंवैधानिक चाल’ कहा, वहीं विपक्ष का असली डर राजनीतिक सत्ता में आने वाला वह बदलाव था, जो सीटों के विस्तार के साथ आता है। उन्होंने महिलाओं के ऐतिहासिक सशक्तिकरण को रोक दिया।
LoP Rahul Gandhi in Parliament
"This bill has nothing to do with the empowerment of women. This is an attempt to change the electoral map of India"
"You are scared of the erosion of your strength, and you are trying to rejig the Indian political map. You did it in Assam, J&K,… pic.twitter.com/gWiAPiAj3x
महिलाओं का हितैषी बनने की कोशिश करने वाले समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने आरक्षण के भीतर धर्म-आधारित कोटे की असंवैधानिक माँगों को लेकर इस बिल का विरोध किया। इस तरह की राजनीति दिखाती है कि विपक्ष के लिए महिला सशक्तिकरण एक अच्छा नारा तो है, लेकिन जब बात उनके अपने राजनीतिक अस्तित्व की आती है, तो यह एक गौण प्राथमिकता बन जाता है।
प्रधानमंत्री ने दी चेतावनी
18 अप्रैल को कैबिनेट की बैठक में पीएम मोदी ने विपक्षी दलों को महिला आरक्षण बिल में रोड़े अटकाने पर महिलाओं के गुस्से का सामना करने की बात कही। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, PM मोदी ने कहा कि विपक्ष ने एक बहुत बड़ी गलती की है और उन्हें इसके परिणाम भुगतने होंगे। PM ने अपनी कैबिनेट से कहा, “उन्होंने देश की महिलाओं को निराश किया है। यह संदेश हर एक व्यक्ति तक, हर एक गाँव तक पहुँचाया जाना चाहिए।”
उन्होंने सदन में व्यक्तिगत गारंटी देने की बात भी कही थी कि किसी भी राज्य को घाटा नहीं होगा। कोई अन्याय नहीं होगा, भले ही सीटों की संख्या बढ़कर 816 हो जाए।
प्रधानमंत्री की यह निराशा सरकार में कई अन्य लोगों द्वारा भी साझा की जाती है। केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने विपक्ष के इस कदम को ‘कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगियों पर एक काला धब्बा’ करार दिया, जिसे वे कभी मिटा नहीं पाएँगे। गृह मंत्री अमित शाह ने भी विपक्ष के ‘जश्न’ पर निशाना साधते हुए कहा, “देश की आधी आबादी को धोखा देने के बाद… और उनका भरोसा खोने के बाद कोई जीत का जश्न कैसे मना सकता है?”
आज की स्थिति यह है कि हमारी संसद में 33% महिलाओं को देखने का सपना फिर से ठंडे बस्ते में चला गया है। 131वें संशोधन का पारित न होना केवल NDA के लिए एक राजनीतिक नुकसान ही नहीं है, बल्कि भारत की महिलाओं के लिए भी एक बड़ा झटका है। इन्होंने मान लिया था कि आखिरकार इनका ‘टाइम’ आ गया है।
(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
नोएडा में मजदूरों के प्रदर्शन और हिंसा फैलाने में साजिश कर्ताओं में एक और 1 लाख का इनामी आदित्य आनंद को तमिलनाडु से गिरफ्तार कर ट्रांजिट रिमांड पर नोएडा लाया जा रहा है। उससे पूछताछ में हिंसक आंदोलन के कई राज खुले हैं। पता चला है कि मजदूर नेता रुपेश राय और मनीषा के साथ मिलकर उसने मजदूरों को भड़काया।
वह 2022 से ‘मजदूर बिगुल’ नाम के मजदूर संगठन के सोशल मीडिया पेज से जुड़ा हुआ था। इस संगठन के संपादक अनुभव सिन्हा हैं। वह नोएडा की फैक्ट्रियों की रिपोर्टिंग करने लगा। रूपेश राय और आदित्य आनंद की मुलाकात भगत सिंह जन अधिकार यात्रा के दौरान हुई थी। इसके बाद दोनों मजदूर नेताओं से मिलने लगे।
3 दिन की बैठक और रची गई साजिश
रुपेश राय और आदित्य आनंद साथ-साथ फैक्ट्रियों तक जाने लगे। नोएडा के सभी फैक्ट्रियों की पूरी जानकारी और उसके मजदूरों का पूरा डेटा जमा किया गया। इन दोनों ने नोएडा में एक्टिव मजदूर संगठनों ‘मजदूर बिगुल’, नौजवान भारत सभा, एकता संघर्ष समिति, दिशा संगठन, आरडब्लूपीआई के नेताओं के साथ आदित्य आनंद के नोएडा के सेक्टर 37 अरुण विहार के स्थित फ्लैट में बैठक की। ये बैठक तीन दिन 30 मार्च, 31 मार्च और 1 अप्रैल तक चली। बैठक में पूरी योजना बनाई गई।
साजिशकर्ता और सॉफ्टवेयर इंजीनियर आदित्य आनंद ने लोगों को जुटाने के लिए व्हाट्सएप का इस्तेमाल किया। व्हाट्स एप ग्रुप के क्यूआर कोड के जरिए ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ा गया। ये ग्रुप 9-10 अप्रैल को बनाए गए। पहले तो मजदूरों को उनकी माँगों के लिए प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित किया।
उसके बाद प्रदर्शन को हिंसक बनाने की साजिश रची। अपर पुलिस अधीक्षक राजकुमार मिश्रा ने इसकी जानकारी देते हुए कहा कि घटना के बाद फरार आदित्य आनंद को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार किया गया। उसने अपनी तकनीकी जानकारी का इस्तेमाल भीड़ को इकट्ठा करने और भड़काऊ भाषण देने में किया।
विदेश भागने के फिराक में था आदित्य आनंद
28 साल का आदित्य आनंद उर्फ रस्टी बिहार के वैशाली का रहने वाला है। उसने 12वीं तक की शिक्षा वहीं ली थी। वह एनआईटी जमशेदपुर से 2020 में बीटेक किया। इसके बाद सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर नोएडा में नौकरी करने लगा। 2022 में वह गुरुग्राम शिफ्ट हुआ लेकिन फिर 2025 से नोएडा के अरुण विहार में किराए के घर में रह रहा था।
नोएडा में हिंसा को लेकर साजिशकर्ता के रूप में सामने आने के बाद सरकार ने उसको पकड़ने के लिए 1 लाख का इनाम रखा। नोएडा में हिंसा के बाद वह चेन्नई भाग गया था। उसकी तलाश में कई राज्यों की पुलिस लगी हुई थी। चेन्नई से होते हुए जब वह तिरुचिरापल्ली जा रहा था, तो एसटीएफ को इसकी जानकारी मिल गई। इसके बाद नोएडा पुलिस ने ही उसे रेलवे स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिया। उसने पहचान छिपाने के लिए अपना हुलिया बदल लिया था।
लंबे बाल काट लिए थे। सिर पर टोपी लगा ली थी। टीशर्ट के ऊपर शर्ट पहना हुआ था। बताया जा रहा है कि वह विदेश भागने की फिराक में था, लेकिन उससे पहले ही पुलिस के हत्थे चढ़ गया। आदित्य को ट्रांजिट रिमांड पर नोएडा लाया जा रहा है। साजिशकर्ता रुपेश राय को 11 अप्रैल को गिरफ्तार किया जा चुका है और पुलिस उसे जेल भेज चुकी है। उसकी एक और सहयोगी मनीषा भी गिरफ्तार हो चुकी है। नोएडा हिंसा मामले में 13 मामले दर्ज किए गए थे। इसको लेकर 1140 लोगों को अब तक गिरफ्तार किया जा चुका है।
रुपेश राय और मनीषा की गिरफ्तारी के बाद 12 अप्रैल को आदित्य आनंद नोएडा से दिल्ली भाग गया और ट्रेन से चेन्नई पहुँच गया। वहाँ वह छिपा हुआ था। उसकी लगातार ट्रैकिंग की जा रही थी। 18 अप्रैल को तिरुचापल्ली में टावर लोकेशन ट्रेस होने के बाद एसटीएफ और नोएडा पुलिस रेलवे स्टेशन, बस अड्डे और दूसरे सार्वजनिक स्थानों पर लग गई। वह रेलवे स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिया गया।
पाकिस्तान कनेक्शन और अंतरराष्ट्रीय साजिश
इस मामले में सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ है कि नोएडा की इस हिंसा के पीछे अंतरराष्ट्रीय साजिश के संकेत मिले हैं। जाँच में पता चला है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर दो सक्रिय हैंडल पाकिस्तान से चलाए जा रहे थे।
वीपीएन (VPN) का इस्तेमाल कर लोकेशन छिपाई गई थी और पिछले 3 महीनों से आईपी एड्रेस पाकिस्तान से जुड़े हुए थे। इन पर एफआईआर दर्ज किया गया। इसके अलावा कई एक्स हैंडल पर सरकार की नजर रही। इन हैंडल्स के माध्यम से नोएडा में कानून-व्यवस्था बिगाड़ा जा रहा था और मजदूरों को हिंसा के लिए उकसाया जा रहा था।
इतना ही नहीं मध्यप्रदेश के शहडोल जिले की हिंसक घटना के वीडियो को नोएडा हिंसा का बताकर सोशल मीडिया अकाउंट्स से प्रसारित किया गया, जिसका यूपी पुलिस ने खंडन किया और लोगों को सचेत रहने की सलाह दी।
9 अप्रैल से मजदूरों ने प्रदर्शन शुरू किया
सैलरी बढ़ाने समेत कई माँगों को लेकर मजदूरों ने 9 अप्रैल 2026 से प्रदर्शन शुरू किया। 13 अप्रैल को ये लोग सड़कों पर उतर गए। पुलिस के साथ उनकी 2-3 जगहों पर झड़प हुई। प्रदर्शनकारियों ने गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया और जमकर तोड़फोड़ की। स्थिति को काबू में करने के लिए पुलिस को आँसू गैस के गोले दागने पड़े। बवाल की वजह से एनएच-9, दिल्ली- मेरठ एक्सप्रेस वे और चिल्ला बॉर्डर पर 5 किलोमीटर तक लंबा जाम लग गया।
वेतन बढ़ोतरी समेत तमाम माँगे मान लिए जाने के बाद भी मजदूरों को भड़काया गया। योगी सरकार ने आंदोलन शुरू होने के दो-तीन दिन बाद ही मजदूरों की ज्यादातर माँगे मान ली थी। जिला प्रशासन ने मजदूरों का आश्वासन भी दिया था। इसके बावजूद आंदोलन जारी रहा।
योगी सरकार ने वेतन वृद्धि के साथ-साथ कई माँगें मान ली थी। उसमें ओवरटाइम करने पर दोगुना भुगतान, समय पर सैलरी सीधे बैंक में देने डालने, 10 तारीख से पहले हर महीना वेतन मिलना चाहिए, सैलरी स्लिप हर मजदूर को हर महीने मिलना चाहिए, 30 नवंबर से पहले बोनस का भुगतान सीधा बैंक खाते में होना चाहिए, साप्ताहिक अवकाश सुनिश्चित हो, अवकाश के दिन काम करने पर दोगुनी मजदूरी देने का आश्वासन दिया गया।
महिला सुरक्षा के लिए आंतरिक शिकायत समितियाँ और कंट्रोल रूम बनाना अनिवार्य, समिति में एक महिला सदस्य जरूर हो। कंट्रोल रूम में शिकायत पेटी लगाई जाए, हेल्पलाइन नंबर जारी की जाए, ताकि उससे भी शिकायत दर्ज कराई जा सके। शिकायतों का तुरंत निपटारा किया जाए। सरकार के निर्देशों का पालन सुनिश्चित कराने के लिए नियमित निगरानी की जाए। नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनी के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।
सीएम योगी ने मजदूरों के विरोध प्रदर्शन को संज्ञान में लेते हुए उच्च स्तरीय बैठक की थी और निर्देश जारी करते हुए कहा था कि मजदूरों के हितों की किसी भी हाल में अनदेखी नहीं की जाएगी। इसके बावजूद सुनियोजित साजिश कर नोएडा में विरोध प्रदर्शन किया गया। दरअसल नोएडा में हिंसा कर यूपी के औद्योगिक माहौल को खराब करने की कोशिश की गई। हिंसक प्रदर्शन को सोशल मीडिया के जरिए फैलाया गया और इसके पाकिस्तानी तार भी सामने आए हैं। इसका मकसद यूपी के विकास को रोक कर राज्य में अव्यवस्था वाली स्थिति का नेरेटिव बनाना भी था।
भारतीय संसद में महिलाओं को आरक्षण देने की कोशिश तब नाकाम हो गई, जब साल 2023 का महिला आरक्षण कानून (106वाँ संशोधन) संसद की कार्यवाही में अटक गया। अगर आज के हालात देखें, तो देश चलाने में महिलाओं की हिस्सेदारी बहुत कम है। लोकसभा में केवल 14% और राज्यसभा में 17% महिलाएँ हैं।
यह संख्या दुनिया के औसत (26%) से भी काफी कम है। सच तो यह है कि बड़े पदों पर महिलाओं का न होना सिर्फ भारत नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की एक पुरानी समस्या है। कहने को तो भारत ने नया कानून पास करके महिलाओं को बराबरी का हक देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है, लेकिन हकीकत यह है कि यह कानून दो साल से सिर्फ कागजों पर ही है और इसके लागू होने का इंतजार खत्म ही नहीं हो रहा।
राजनीति और समाज में महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक देने की यह बहस किसी एक देश की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की है। संयुक्त राष्ट्र ने भी 2030 तक जो लक्ष्य तय किए हैं, उनमें ‘लैंगिक समानता’ (स्त्री-पुरुष को बराबर हक) एक मुख्य लक्ष्य है। यह साफ है कि जब तक देश के नियम बनाने में महिलाओं की बराबर की भागीदारी नहीं होगी, तब तक समानता की बात करना बेकार है।
अच्छी बात यह है कि भारत अकेला ऐसा देश नहीं है जो इसके लिए कानूनी कोशिश कर रहा है। दुनिया के कई अन्य देशों ने भी महिलाओं को राजनीति में आगे लाने के लिए कड़े कदम उठाए हैं। कुछ देशों ने संसद में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित कर दी हैं, तो कुछ ने राजनीतिक पार्टियों के लिए यह जरूरी कर दिया है कि वे चुनाव में एक तय संख्या में महिलाओं को टिकट जरूर दें।
यहाँ उन देशों की लिस्ट दी गई है जिन्होंने महिलाओं को राजनीति में बराबर का हक देने के लिए ठोस कदम उठाए हैं। इन देशों ने अपनी संसद या स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की हैं या चुनाव में उम्मीदवारों के लिए कोटा तय किया है।
नेपाल
नेपाल में महिलाओं के लिए संसद की 33% सीटें आरक्षित हैं। यहाँ के निचले सदन (Lower House) में महिलाओं के लिए 33% और ऊपरी सदन (Upper House) में 2% कोटा तय है। इसके अलावा, स्थानीय स्तर (नगर निकाय/पंचायत) पर भी महिलाओं के लिए 33% भागीदारी अनिवार्य की गई है।
पाकिस्तान
पाकिस्तान में महिलाओं के लिए कोटा तय करने की शुरुआत तो 1965 में ही हो गई थी। लेकिन साल 2002 के बाद से वहाँ की नेशनल असेंबली (संसद) में महिलाओं की कम से कम भागीदारी 17% तय कर दी गई है।
बांग्लादेश
बांग्लादेश की संसद (जातीय संसद) के निचले सदन में कम से कम 14% सीटें महिला उम्मीदवारों के लिए रखी गई हैं। वहीं, स्थानीय स्तर के चुनावों में महिलाओं के लिए यह कोटा 33% तय किया गया है।
श्रीलंका
श्रीलंका ने भी महिलाओं को राजनीति में आगे लाने के लिए कदम उठाए हैं। यहाँ स्थानीय स्तर (Sub-national level) के निकायों में महिलाओं के लिए 25% कोटा तय किया गया है।
संयुक्त अरब अमीरात (UAE)
इस खाड़ी देश ने अपनी नेशनल काउंसिल के निचले सदन में महिलाओं के लिए 50% कोटा तय किया है, जो समानता की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है।
इंडोनेशिया
यहाँ संसद के निचले सदन और स्थानीय स्तर, दोनों ही जगह महिलाओं के लिए कम से कम 30% भागीदारी तय की गई है।
यूनान (ग्रीस)
यूनान की संसद के निचले सदन और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 40% सीटें आरक्षित रखी गई हैं।
इटली
इटली में संसद के दोनों सदनों (ऊपरी और निचले) में महिलाओं के लिए 40% सीटें तय हैं। साथ ही, स्थानीय स्तर पर भी 40% आरक्षण दिया गया है। यहाँ की राजनीतिक पार्टियों ने खुद आगे बढ़कर महिलाओं को टिकट देने का कोटा अपनाया है।
स्पेन
स्पेन में निचले सदन में 40% और ऊपरी सदन में 50% सीटें महिलाओं के लिए हैं। स्थानीय स्तर पर भी 40% सीटें आरक्षित हैं। इटली की तरह यहाँ की पार्टियों ने भी चुनाव में महिलाओं को करीब 44% टिकट देने का नियम खुद बनाया है।
नार्वे
इस देश ने स्थानीय स्तर के चुनावों में महिलाओं के लिए 40% कोटा तय कर रखा है।
दुनिया भर के मौजूदा हालात
हैरानी की बात यह है कि अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी और स्वीडन जैसे बड़े पश्चिमी देशों में महिलाओं के लिए संसद में कोई सीटें आरक्षित नहीं हैं। अगर 1 जनवरी 2026 तक के आँकड़ों को देखें, तो दुनिया के सिर्फ 28 देशों में 30 महिलाएँ सरकार या देश की प्रमुख (जैसे राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री) के तौर पर काम कर रही हैं। संयुक्त राष्ट्र (UN Women) के डेटा के मुताबिक, दुनिया भर के मंत्रालयों में केवल 22.4% महिलाएँ ही कैबिनेट मंत्री के पद पर हैं।
समानता अभी भी कोसों दूर
एक अनुमान के मुताबिक, जिस रफ्तार से अभी सुधार हो रहा है, उस हिसाब से राजनीति में महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक मिलने में 2063 तक का समय लग सकता है। भले ही दुनिया के अमीर और गरीब दोनों तरह के देशों में बराबरी का यह लक्ष्य अभी दूर है, लेकिन सीटों का आरक्षण इस दिशा में एक बड़ा और जरूरी कदम साबित हुआ है।
क्यों जरूरी है महिलाओं की भागीदारी?
राजनीति में महिलाओं का आना सिर्फ दिखावे के लिए नहीं है। इसका गहरा असर देश की नीतियों और शासन पर पड़ता है। जब महिलाओं की भागीदारी बढ़ती है, तो नियम-कानून ज्यादा समावेशी और सबके भले के लिए बनते हैं। यह समाज के उन पुराने ढांचों को भी तोड़ता है जहाँ ताकत सिर्फ पुरुषों के हाथ में रही है, और महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में अपना हक माँगने के लिए प्रेरित करता है।
(ये रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
लोकसभा में शुक्रवार (17 अप्रैल 2026) को मोदी सरकार ने महिला आरक्षण कानून और डीलिमिटेशन से जुड़ा 131वाँ संवैधानिक संशोधन विधेयक पेश किया। लेकिन ये बिल पास नहीं हो सका। इसके समर्थन में 298 वोट पड़े और विरोध में 230 वोट। समाजवादी पार्टी के सांसदों ने इस बिल का जबरदस्त विरोध किया। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने जोर देकर कहा कि मुस्लिम महिलाओं को भी आरक्षण मिलना चाहिए। गृह मंत्री अमित शाह ने साफ जवाब दिया कि संविधान में मुस्लिमों के लिए कोई आरक्षण का प्रावधान नहीं है।
ये पार्टी हमेशा से महिला विरोधी ही रही है। समाजवादी पार्टी ने महिला आरक्षण बिल का विरोध पहली बार नहीं किया। पहले भी यूपीए सरकार के समय और उससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में सपा ने इसी तरह विरोध किया था। वाजपेयी सरकार के दौरान 1998 से 2004 तक सपा सांसदों ने संसद में बिल की प्रतियाँ फाड़ डाली थीं। उस समय भी उनकी चिंता मुसलमानों को लेकर थी। सपा का कहना था कि ये बिल मुसलमानों के खिलाफ जा सकता है और अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा।
सपा और आरजेडी सांसदों ने सदन की गरिमा की थी तार-तार
13 जुलाई 1998 को दोपहर करीब 2 बजे तत्कालीन कानून मंत्री एम. थंबी दुरई 12वीं लोकसभा में 81वें संविधान संशोधन विधेयक यानी महिला आरक्षण बिल पेश करने के लिए खड़े हुए। उन्होंने बोलना शुरू किया ही था कि विपक्ष के सांसदों ने विरोध शुरू कर दिया। आरजेडी और सपा के सांसद स्पीकर की तरफ बढ़ आए। सदन में धक्का-मुक्की शुरू हो गई। माहौल गरम हो गया। बिल की प्रतियाँ हवा में उछाली जाने लगीं।
लोकसभा स्पीकर शांत करने की कोशिश कर रहे थे लेकिन कोई नहीं मान रहा था। बीच सदन में हो रही इस धक्का-मुक्की में कानून मंत्री एम. थंबी दुरई की कमीज भी फट गई। संसद की मर्यादा तार-तार हो रही थी। आरजेडी के सांसद सुरेंद्र प्रसाद यादव पर आरोप है कि उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी से बिल की कॉपी छीनकर फाड़ दी थी।
वाजपेयी सरकार महिला आरक्षण बिल को लेकर पूरी तैयारी के साथ आई थी। उन्हें विपक्ष के विरोध का अंदाजा था लेकिन इतना नहीं कि सदन की गरिमा भंग हो जाएगी। सपा और आरजेडी के सांसदों ने मिलकर बिल को फाड़ने का तीखा विरोध जताया। ये घटना सपा के महिला आरक्षण के प्रति रवैये को साफ दिखाती है।
यूपीए शासन में सस्पेंड हुए थे सपा के 4 सांसद, रवैया वही पुराना
यूपीए शासन में भी सपा ने महिला आरक्षण बिल का विरोध किया था। मार्च 2010 में जब ये बिल पेश किया गया तो सपा और आरजेडी के सांसदों ने उग्र विरोध किया। सदन की कार्यवाही बाधित हुई। सभापति की टेबल से कागजात छीनने की कोशिश की गई। सपा के चार सांसद नंद किशोर यादव, कमाल अख्तर, वीरपाल सिंह यादव और आमिर आलम खान सहित कुल सात सांसदों को निलंबित करना पड़ा।
इन पर आरोप था कि उन्होंने तत्कालीन सभापति हामिद अंसारी की मेज से बिल की कॉपी छीनने की कोशिश की। निलंबन के बाद भी ये सांसद सदन से बाहर जाने को तैयार नहीं हुए। मार्शलों को इन्हें जबरन बाहर निकालना पड़ा। ध्यान देने वाली बात ये है कि उस समय सपा यूपीए को बाहर से समर्थन दे रही थी फिर भी महिला आरक्षण बिल का विरोध नहीं छोड़ा।
मुलायम वाला ही है अखिलेश यादव का भी रुख
आज भी सपा का रुख वैसा ही है जैसा मुलायम सिंह यादव के समय में था। अखिलेश यादव ने लोकसभा में बहस के दौरान मुस्लिम और पिछड़ी वर्ग की महिलाओं के लिए अलग आरक्षण की माँग दोहराई। लोग इसे सपा के वोट बैंक के समीकरण से जोड़कर देख रहे हैं। सपा हमेशा से कहती रही है कि बिल से सिर्फ बड़े घर की शहर की महिलाएँ फायदा उठाएँगी। गाँव की गरीब महिलाएँ इससे बाहर रह जाएँगी। लेकिन हकीकत ये है कि सपा ने महिला आरक्षण को लेकर बार-बार अड़ंगा लगाया है।
सपा के इस पुराने रवैये को देखते हुए लोकसभा में 17 अप्रैल को बिल गिरने की घटना कोई नई बात नहीं लगती। 1998 में वाजपेयी सरकार के समय सदन में जो हंगामा हुआ था वो आज भी याद किया जाता है। कानून मंत्री की कमीज फटने जैसी घटना संसद की तस्वीर को कलंकित करती है। 2010 में यूपीए के समय भी सपा ने बिल को पास नहीं होने दिया। हर बार सपा ने मुस्लिम महिलाओं का हवाला दिया लेकिन असल में महिला आरक्षण को रोकने की कोशिश की।
अखिलेश यादव आज भी वही पुरानी लाइन दोहरा रहे हैं। उन्होंने कहा कि बिना मुस्लिम और पिछड़ी महिलाओं को आरक्षण दिए बिल अधूरा है। जबकि गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट कर दिया कि संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। सपा का ये रुख दिखाता है कि पार्टी महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के बजाय अपने वोट बैंक को बचाने में ज्यादा इंट्रेस्टेड है।
सपा का इतिहास महिला आरक्षण विरोध का रहा है। मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश यादव तक एक ही रवैया दिखता है। हर बार मुस्लिम आरक्षण का मुद्दा उठाकर बिल को रोकने की कोशिश की गई। गाँव की गरीब महिलाओं को आरक्षण नहीं मिलेगा ऐसा बहाना बनाया जाता रहा। लेकिन असल में पार्टी की मंशा महिलाओं की 33 प्रतिशत भागीदारी को सीमित रखने की रही है।
कभी मुलायम सिंह यादव ने कहा था- गरीब महिलाएँ आकर्षक नहीं होती
इससे पहले, लोकसभा में सपा सांसद धर्मेंद्र यादव ने 16 अप्रैल 2026 को दावा किया कि सपा महिलाओं का सबसे ज्यादा सम्मान करने वाली पार्टी है। एनसीआरबी रिपोर्ट्स बताती हैं कि 2012-2017 में अखिलेश सरकार के समय यूपी में महिला अपराधों में भारी बढ़ोतरी हुई। 2013 में बलात्कार के 3050 मामले दर्ज हुए। 2017 में यूपी पूरे देश में महिला अपराधों में टॉप पर रहा।
आपको एक बार फिर से याद दिला दें कि सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने बदायूं गैंगरेप के बाद कहा कि लड़कियाँ दोस्ती करती हैं फिर रेप का नाम दे देती हैं। यही नहीं, उन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि ग्रामीण और गरीब महिलाएँ आकर्षक नहीं होती।
अमेरिका में इन दिनों एक ऐसा मुद्दा तेजी से चर्चा में है जिसे कभी सिर्फ रहस्यमयी कहानियों या साजिश की थ्योरी मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता था- UFO यानी अनपहचाने उड़ने वाले ऑब्जेक्ट (Unidentified Flying Object)। अब हालात बदल चुके हैं। यह विषय सिर्फ बंद फाइलों या गुप्त रिपोर्ट्स तक सीमित नहीं रहा बल्कि अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुले मंच पर लाकर इसे बहस का हिस्सा बना दिया है।
डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि UFO से जुड़ी दिलचस्प फाइलों को जल्द सार्वजनिक किया जाएगा। वहीं, दूसरी ओर कुछ ऐसे बयान भी सामने आए हैं जो यह इशारा करते हैं कि इस मामले की हकीकत जितनी दिलचस्प है, उतनी ही संवेदनशील और खतरनाक भी हो सकती है।
UFO को लेकर इस चर्चा के बीच एक और चौंकाने वाला पहलू सामने आया है। पिछले कुछ वक्त में अमेरिका में NASA, परमाणु और रक्षा क्षेत्र से जुड़े कई वैज्ञानिकों की रहस्यमयी गुमशुदगी और अचानक हुई मौतें। इन घटनाओं ने इस पूरे मुद्दे को और ज्यादा उलझा दिया है और कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर अमेरिका में इस समय UFO को लेकर अचानक इतनी हलचल क्यों है? क्या यह सिर्फ तकनीकी रहस्य है, या इसके पीछे कोई बड़ी और छिपी हुई सच्चाई है, जिसे अब सामने लाया जा रहा है? यही समझने की कोशिश इस लेख में की जाएगी।
राष्ट्रपति ट्रंप का बयान और UFO फाइलों के खुलासे की शुरुआत
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए उस बयान से शुरुआत करनी होगी जिसने बहस को अब अचानक तेज कर दिया। ट्रंप ने एक बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा है कि उन्होंने रक्षा विभाग को UFO और अनआईडेंटिफाइड एरियल फिनॉमिना (UAP) से जुड़ी सरकारी फाइलों को जारी करने का निर्देश दिया है।
उन्होंने कहा, “आप लोग इस विषय में काफी दिलचस्पी रखते हैं, इसलिए मैंने सोचा कि यही सही मंच है यह बताने के लिए कि प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। सरकार को कई बेहद दिलचस्प दस्तावेज मिले हैं और अब उनकी रिलीज जल्द शुरू होगी। इससे आप देख सकते हैं कि क्या वह घटना सही है।”
JUST IN: President Trump has directed Secretary of Defense Pete Hegseth to release government documents related to UFOs:
“We found many very interesting documents, I must say. And the first releases will begin very, very soon. So you can go out and see if that phenomena is… pic.twitter.com/rDqUF8iPJk
यह बयान कई वजहों से अहम है। पहली तो ये कि यह सीधे-सीधे इस बात को स्वीकार करता है कि सरकार के पास UFO से जुड़ी जानकारी बड़ी मात्रा में मौजूद है। दूसरी ये कि यह संकेत देता है कि इन फाइलों को अब सार्वजनिक करने का एक सुनियोजित प्रयास चल रहा है। इतिहास को देखें तो अमेरिकी सरकार ने हमेशा UFO से जुड़े मामलों को सीमित तरीके से ही साझा किया है।
20वीं सदी में Project Blue Book जैसे प्रोग्राम चलाए गए, जिनमें हजारों मामलों की जाँच हुई लेकिन अंत में यही कहा गया कि एलियन से जुड़ा कोई ठोस सबूत नहीं मिला। अब अगर दशकों बाद फिर से फाइलें खोलने की बात हो रही है, तो यह अपने आप में बड़ा बदलाव है।
पेंटागन, संसद और UFO वीडियो: जिज्ञासा नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा का बना मुद्दा
ट्रंप के बयान के बाद अमेरिकी संसद की एक टास्क फोर्स ने पेंटागन को पत्र लिखकर 45 से अधिक वीडियो और दस्तावेज माँगे। ये वीडियो 2019 के बाद की घटनाओं से जुड़े हैं और इनमें कथित तौर पर ऐसे ऑब्जेक्ट्स दिखाई देते हैं जो पारंपरिक तकनीक से मेल नहीं खाते।
इनमें ‘सिगार आकार’ की लंबी वस्तुएँ, गोलाकार उड़ती संरचनाएँ और समूह में उड़ने वाले अज्ञात ऑब्जेक्ट्स शामिल हैं। कई मामलों में यह भी दावा किया गया है कि ये वस्तुएँ हवा में स्थिर रह सकती हैं, बिना आवाज के चलती हैं और अचानक तेज गति से दिशा बदल सकती हैं। ऐसी क्षमताएँ जो मौजूदा सार्वजनिक तकनीक से मेल नहीं खातीं।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि इन घटनाओं को सामान्य इलाकों में नहीं बल्कि संवेदनशील क्षेत्रों, जैसे सैन्य ठिकानों, अमेरिकी एयरस्पेस और मिडिल ईस्ट में तैनात बेस के पास देखा गया। यही वजह है कि अब सांसदों ने इसे केवल रहस्य या जिज्ञासा का विषय नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा माना है।
अगर कोई अज्ञात तकनीक अमेरिकी सैन्य क्षेत्रों के आसपास सक्रिय है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि वह किसकी है और उसका उद्देश्य क्या है। हालाँकि, पेंटागन की एजेंसी AARO पहले यह कह चुकी है कि ज्यादातर UFO sightings गलत पहचान का परिणाम हैं।
लेकिन फिर भी इतने बड़े पैमाने पर वीडियो माँगे जाना और उन्हें सार्वजनिक करने की तैयारी, यह एक ऐसा विरोधाभास है जो इस पूरे मामले को और रहस्यमयी बना देता है।
‘आप मर भी सकते हैं’: UFO की सच्चाई को लेकर चौंकाने वाले दावे
UFO पर चर्चा को और सनसनीखेज बनाने वाले कुछ बयान भी सामने आए हैं। एक अमेरिकी सांसद ने चेतावनी देते हुए कहा कि UFO से जुड़ी जानकारी इतनी संवेदनशील हो सकती है और इसके बारे में जानना लोगों के लिए बहुत खतरनाक हो सकता है और जो इसको जानता है वो निशाने पर आ जाता है।
उन्होंने एक्स पर लिखा, “मैंने ऐसे सबूत देखे हैं जो इतने ज्यादा गोपनीय हैं कि सिर्फ यह जानना भी कि वे मौजूद हैं, आपको एक निशाना बना देता है।”
ऐसे बयान आधिकारिक रिपोर्ट का हिस्सा नहीं होते लेकिन वे यह जरूर दिखाते हैं कि इस विषय को लेकर अंदरखाने किस स्तर की गंभीरता या चिंता हो सकती है। इस तरह के दावे दो तरह के संकेत देते हैं। पहला ये कि जानकारी की चौंकाने वाली हो सकती है और दूसरा यह कि उसका असर केवल वैज्ञानिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक भी हो सकता है।
इसी बीच बराक ओबामा जैसे नेताओं के पुराने बयान भी फिर चर्चा में आ गए हैं, जिनमें उन्होंने UFO के अस्तित्व को पूरी तरह खारिज नहीं किया था लेकिन किसी बड़े एलियन षड्यंत्र से इनकार किया था। यानी एक तरफ आधिकारिक संस्थाएँ सावधानी बरत रही हैं, तो दूसरी तरफ राजनीतिक बयान इस विषय को और रहस्यमयी बना रहे हैं।
वैज्ञानिकों की गुमशुदगी और Daily Mail की रिपोर्ट से बढ़ा संदेह
UFO बहस के बीच जो दूसरी बड़ी कहानी उभरकर आई है, वह है वैज्ञानिकों की रहस्यमयी गुमशुदगी और मौत। Daily Mail की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ महीनों में करीब 11 ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें NASA, एयरफोर्स, न्यूक्लियर और हाई-टेक रिसर्च से जुड़े लोग या तो अचानक गायब हो गए या संदिग्ध परिस्थितियों में उनकी मौत हो गई। इनमें UFO से जुड़े लोग भी शामिल थे।
इनमें रिटायर्ड जनरल विलियम नील मैककासलैंड का मामला सबसे चर्चित है। वे एयर फोर्स रिसर्च लेबोरेटरी के पूर्व प्रमुख रहे हैं और अचानक बिना फोन, बिना ट्रैकिंग डिवाइस के घर से निकलने के बाद लापता हो गए। इसी तरह एयरोस्पेस इंजीनियर मोनिका जैसिंटो रेजा जो एडवांस एयरोस्पेस प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही थीं, एक हाइकिंग ट्रिप के दौरान गायब हो गईं थीं।
आज तक उनका कोई सुराग नहीं मिला। इसके अलावा फ्यूजन एनर्जी, केमिकल बायोलॉजी और अंतरिक्ष अनुसंधान से जुड़े कई वैज्ञानिक या तो मारे गए या रहस्यमयी हालात में उनकी मौत हुई। हर केस में अलग-अलग परिस्थितियाँ बताई जा रही हैं, लेकिन जब इन्हें एक साथ देखा जाता है, तो सवाल उठता है कि यह सिर्फ संयोग है या फिर किसी बड़े पैटर्न का हिस्सा।
इनमें UFO क्षेत्र से जुड़ीं 34 साल की उम्र में मृत मिलीं एमी एस्क्रिड्ज भी शामिल हैं। एंटी-ग्रेविटी टेक पर एक्सपेरिमेंट कर रही एमी ने कहा था कि उनकी जान खतरे में पड़ सकती है। एमी की जून 2022 में अलबामा में कथित तौर पर उनके सिर में गोली लगने से उनकी मौत हो गई। हालाँकि, न तो पुलिस और न ही मेडिकल जाँच करने वालों ने कभी हुई जाँच की कोई जानकारी सबके सामने जारी की है।
अपनी मौत से पहले वह एंटी-ग्रेविटी टेक्नोलॉजी पर रिसर्च कर रही थीं और उसे डेवलप करने की कोशिश कर रही थीं जो ग्रेविटी को कंट्रोल करने या कैंसल करने का एक तरीका है। UFO रिसर्चर्स ने एंटी-ग्रेविटी प्रोपल्शन पर भी काफी चर्चा की और उन्होंने दावा किया है कि यह एडवांस्ड टेक्नोलॉजी ही एलियन स्पेसक्राफ्ट को नामुमकिन स्पीड तक पहुँचने में मदद करती है। कॉन्स्पिरेसी थ्योरिस्ट्स ने यह भी दावा किया है कि US मिलिट्री सालों से इस टेक्नोलॉजी पर एक्सपेरिमेंट कर रही है लेकिन सरकार ने इस बात से इनकार किया है कि एलियन टेक्नोलॉजी मौजूद है।
अमेरिका की सीक्रेट लैब की सीक्रेट फाइल्स
डेली मेल की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि अमेरिका की सबसे गुप्त परमाणु प्रयोगशालाओं में शामिल लॉस एलामोस नेशनल लेबोरेटरी (LANL) के एक वरिष्ठ साइबर सुरक्षा अधिकारी की मौत के बाद उनके पीछे कुछ सीक्रेट फाइलें मिली हैं। इन फाइलों में यह दिखाया गया है कि अमेरिकी सरकार लंबे समय से UFO का अध्ययन कर रही है।
इन सीक्रेट फाइल्स में आंतरिक मेमो, वैज्ञानिक रिपोर्ट और तस्वीरें शामिल हैं। यह लैब उत्तरी न्यू मैक्सिको में स्थित है जो सांता फे से लगभग 35 मील उत्तर-पश्चिम में है। यह जगह UFO से जुड़ी कहानियों के कारण भी चर्चा में रहती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि अधिकारी की मौत के बाद जब उनके बेटे जॉनी जब उनका सामान देख रहे थे तब उन्हें कुछ फाइलें मिलीं जिन पर ‘एटमॉस्फेरिक एनॉमलीज’ (वायुमंडलीय असामान्य घटनाएँ) लिखा हुआ था। इसके बाद एक खोजी पत्रकार जेरेमी कॉर्बेल ने इनका अध्ययन किया और उन्होंने डेली मेल से कहा, “यह हमारे सैन्य तंत्र के अंदर UFO पर किया गया एक असली और उच्च स्तर का वैज्ञानिक अध्ययन है।”
कॉर्बेल ने दावा किया कि इन दस्तावेजों में सरकार के उच्च स्तरीय बैठकों के रिकॉर्ड और UFO के प्रोपल्शन सिस्टम (उड़ान तकनीक) से जुड़े वैज्ञानिक अध्ययन शामिल हैं। कॉर्बेल ने कहा, “लॉस एलामोस हमेशा से एक ऐसी जगह रही है, जहां UFO से जुड़े अध्ययन के तत्व मौजूद थे… ये दस्तावेज 100 प्रतिशत सबूत हैं कि लॉस एलामोस इस विषय को बहुत गंभीरता से ले रहा था।”
साइबर सिक्योरिटी अधिकारी की सीक्रेट फाइल्स का एक हिस्सा (फोटो साभार: डेली मेल/जेरेमी कॉर्बेल)
FBI ने शुरू की जाँच, व्हाइट हाउस की सक्रियता और विदेशी साजिश की आशंका
इन घटनाओं के बाद अमेरिकी सरकार ने जाँच तेज कर दी है और फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (FBI) को इसमें शामिल किया गया है। व्हाइट हाउस ने साफ कहा है कि सभी मामलों को एक साथ जोड़कर देखा जाएगा ताकि यह समझा जा सके कि क्या इनके बीच कोई संबंध है।
पूर्व FBI अधिकारी क्रिस स्वेकर ने यह संभावना जताई है कि विदेशी ताकतें अमेरिकी वैज्ञानिकों को निशाना बना सकती हैं, ताकि संवेदनशील जानकारी हासिल की जा सके। यह थ्योरी पूरी तरह नई नहीं है। कोल्ड वॉर (शीत युद्ध) के समय से ही वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों को टारगेट करने के मामले सामने आते रहे हैं।
हालाँकि अभी तक इस बात का कोई ठोस सबूत नहीं है कि मौजूदा घटनाएँ इसी तरह की किसी साजिश का हिस्सा हैं, लेकिन जिन लोगों को निशाना बनाया गया, उनका काम और प्रोफाइल इस आशंका को पूरी तरह खारिज भी नहीं होने देता।
UFO साइटिंग्स, वायरल वीडियो और सच्चाई बनाम कल्पना की जंग
इसी दौरान UFO साइटिंग्स के कुछ नए वीडियो भी सामने आए हैं, जिनमें सबसे ज्यादा चर्चा राइट-पैटर्सन एयरफोर्स बेस के पास देखी गई रोशनियों की हो रही है। वीडियो में ट्रैंगल पैटर्न में उड़ती लाइट्स दिखाई देती हैं, जो बाद में अलग-अलग दिशाओं में बँट जाती हैं।
(फोटो साभार: Reddit)
कुछ लोगों ने इसे एलियन गतिविधि बताया जबकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह पैराशूट फ्लेयर्स या सैन्य अभ्यास का हिस्सा हो सकता है। एक तरफ वैज्ञानिक और सैन्य विशेषज्ञ तार्किक स्पष्टीकरण देते हैं, तो दूसरी तरफ सोशल मीडिया और कुछ स्वतंत्र शोधकर्ता इसे एलियन या अज्ञात तकनीक से जोड़ते हैं।
अगर आने वाले समय में UFO से जुड़ी फाइलें वास्तव में सार्वजनिक होती हैं और FBI की जाँच में कोई कड़ी सामने आती है, तो यह मामला दुनिया के सबसे बड़े खुलासों में बदल सकता है। फिलहाल यह कहानी एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ सच्चाई और रहस्य के बीच की दूरी अभी भी बनी हुई है।
लोकसभा में समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव ने शुक्रवार (16 अप्रैल 2026) को कहा कि समाजवादी पार्टी महिलाओं का सबसे अधिक सम्मान करने वाली पार्टी है। उन्होंने दावा किया कि सपा महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और हक की सबसे बड़ी हितैषी रही है। लेकिन जैसे ही यह दावा सदन में गूँजा, सत्ता पक्ष की बेंचों से हंसी की लहर उठी। ये बयान उन्होंने उस समय दिया, जब संसद में नारी शक्ति वंदन (संसोधन) अधिनियम 2026 पर चर्चा चल रही थी। महिला आरक्षण से जुड़ा ये बिल लोकसभा में गिर गया, क्योंकि सपा, डीएमके, कॉन्ग्रेस जैसी पार्टियों ने इसका खुला विरोध किया।
बहरहाल, धर्मेंद्र यादव ने जब सपा को सबसे बड़ी महिला हितैषी पार्टी बताया, उसके तुरंत बाद सोशल मीडिया पर पुरानी खबरें, न्यायालय के फैसले और उन दिनों की रिपोर्ट्स वायरल हो गईं। लोग पूछने लगे कि क्या सचमुच सपा महिलाओं की हितैषी है? या फिर यह सिर्फ एक राजनैतिक चेहरा है, जिसके पीछे 2012 से 2017 तक अखिलेश यादव की सरकार में उत्तर प्रदेश की महिलाओं की जो दर्दनाक हालत थी, वह आज भी काले धब्बे की तरह सपा के चेहरे पर चिपकी हुई है।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) और ह्यूमन राइट्स कमीशन की रिपोर्ट्स इस सवाल का जवाब साफ-साफ देती हैं। 2012-2017 के दौरान उत्तर प्रदेश में महिला अपराधों का आँकड़ा चौंकाने वाला रहा। साल 2012 में राज्य में बलात्कार के 1963 मामले दर्ज हुए थे। 2013 में यह संख्या अचानक बढ़कर 3050 हो गई, यानी महज एक साल में 55 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी। कुल महिला अपराध (क्राइम अगेंस्ट वुमेन) 2013 में 32,546 रहे।
साल 2014 में यह संख्या 38,467 तक पहुँच गई। इसके बाद तो 2016 और 2017 में यूपी पूरे देश में महिला अपराधों में सबसे ऊपर रहा। साल 2017 में अकेले यूपी में 56,011 मामले दर्ज हुए, जो पूरे देश के कुल महिला अपराधों का बड़ा हिस्सा था। एनसीआरबी के मुताबिक, उस दौरान यूपी न सिर्फ कुल संख्या में टॉप पर था, बल्कि बलात्कार, अपहरण, दहेज हत्या और छेड़छाड़ जैसे मामलों में भी अग्रणी रहा।
इटावा की घटना है जंगलराज की गवाह
ये आँकड़े सिर्फ कागज पर नहीं थे। ये असल जिंदगियों के टूटने की कहानियाँ थीं। अखिलेश यादव के गृह जिले इटावा में यादवों का आतंक ऐसा था कि बच्चियाँ और महिलाएँ अकेले घर से बाहर निकलने से काँपती थीं। गाँवों में दबंगों का राज था। पुलिस निष्क्रिय थी। न्याय की उम्मीद खत्म हो चुकी थी।
इसी दरमियान 11 मई 2014 को इटावा के सिविल लाइन थाना क्षेत्र के गौरापुरा गाँव में 15 साल की नाबालिग लड़की के साथ हुई घटना ने पूरे प्रदेश को शर्मसार कर दिया। मुख्य आरोपित सनी यादव (शादीशुदा) ने पीड़िता के घर घुसकर उसके साथ दुष्कर्म किया। लड़की ने रोते-रोते अपनी माँ को बताया। पीड़िता की माँ ने तुरंत थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस ने सनी यादव को गिरफ्तार कर लिया। लेकिन यहीं से दबाव शुरू हुआ।
आरोपित के परिवार ने पीड़िता की माँ पर केस वापस लेने का भारी दबाव बनाया। धमकियाँ दी गईं कि अगर जुबान खोली तो बेटी जैसा हाल किया जाएगा। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। हालाँकि इसके बाद जब वो शौच के लिए खेत में गईं, तो उन्हें खेत में ही घेर लिया गया। आरोपित के पिता बसंतलाल यादव और उसके साथियों ने उसे निर्वस्त्र कर दिया। धारदार हथियारों से लहूलुहान कर दिया। महिला को गंभीर हालत में अस्पताल पहुँचाया गया।
उस समय अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे और इटावा उनका पैतृक जिला। फिर भी दबंगों का साहस ऐसा था कि किसी की परवाह नहीं की। पीड़िता की माँ की चीखें आज भी यूपी की महिलाओं के मन में गूंजती हैं, क्या वो राज्य की सरकार थी या सपा का जंगलराज था?
मुलायम सिंह यादव के बयानों को भूले तो नहीं?
इसी तरह की घटनाएँ सपा शासन में आम थीं। लेकिन सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के बयानों ने महिलाओं के घावों पर नमक छिड़क दिया। अप्रैल 2014 में बदायूँ में दो बहनों के साथ गैंगरेप और हत्या के बाद मुलायम ने मुरादाबाद में कहा, “लड़कियाँ पहले दोस्ती करती हैं। फिर लड़के-लड़की में मतभेद हो जाता है। वे इसे रेप का नाम दे देती हैं। लड़कों से गलती हो जाती है। क्या रेप केस में फाँसी दी जाएगी? लड़के हैं, नादानी में रेप हो जाता है।”
यह बयान पूरे देश में आग की तरह फैला। महिलाएँ सड़कों पर उतर आईं। लेकिन मुलायम ने पीछे हटने की बजाय और विवादित बयान दिए। अगस्त 2015 में उन्होंने कहा, “एक महिला से चार लोग रेप नहीं कर सकते। रेप तो एक ही आदमी करता है, लेकिन एफआईआर में चार लोगों के नाम लिख दिए जाते हैं, जो गलत है। यूपी में तो केवल दो फीसदी रेप होते हैं।” यही नहीं, जुलाई 2014 में उन्होंने कहा, “21 करोड़ की आबादी की तुलना में यूपी में कम रेप होते हैं।” और फिर नवंबर 2014 में बाराबंकी में उन्होंने कहा, “गाँव की गरीब महिलाएँ ज्यादा आकर्षक नहीं होतीं।” उनके कहने का मतलब था कि गाँव की महिलाओं से कौन रेप करेगा?
आजम खान ने बताया था जयप्रदा की चड्ढी का रंग
मुलायम के साथी सपा के वरिष्ठ नेता आजम खान भी महिलाओं के अपमान में आगे रहे हैं। जयाप्रदा (तत्कालीन सपा सहयोगी) के बारे में उन्होंने कहा, “उनकी (जयाप्रदा की) चड्डी का रंग खाकी है।” यह टिप्पणी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में दी गई, लेकिन महिलाओं की गरिमा को तार-तार कर गई।
यही नहीं, इससे पहले साल 2010 में महिला आरक्षण बिल पर मुलायम ने कहा था कि यह बिल नौजवानों को संसद में सीटी बजाने के लिए उकसाएगा। उन्होंने दावा किया कि बिल से सिर्फ बड़े घर की और शहर की लड़कियाँ फायदा उठाएँगी, गाँव की गरीब महिलाएँ तो आकर्षक नहीं होतीं। सपा ने 2010 में बिल का तीखा विरोध किया और सदन में हंगामा किया।
अखिलेश यादव ने भी बाद में ‘कोटा के भीतर कोटा’ की माँग करते हुए बिल का विरोध किया। उन्होंने कहा कि ओबीसी, दलित और मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग आरक्षण नहीं तो बिल अधूरा है। सपा की यह रणनीति महिलाओं की 33 प्रतिशत भागीदारी को सुनिश्चित नहीं होने देने में अहम रही।
गायत्री प्रसाद प्रजापति केस में कोर्ट ने लगाई थी फटकार, उम्रकैद की सजा
सपा सरकार में मंत्रियों और विधायकों के खिलाफ भी गंभीर मामले सामने आए। गायत्री प्रसाद प्रजापति सपा सरकार में खनन मंत्री थे। 2017 में चित्रकूट की एक महिला ने शिकायत की कि प्रजापति ने अपने सरकारी आवास पर उसे और उसकी नाबालिग बेटी के साथ गैंगरेप किया। वीडियो बनाया और धमकाया। पुलिस ने कुछ नहीं किया।
पीड़िता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया। 2021 में लखनऊ की स्पेशल कोर्ट ने प्रजापति समेत दो अन्य को उम्रकैद की सजा सुनाई। कोर्ट ने कहा कि आरोपित ने सरकारी पद का दुरुपयोग कर नाबालिग की गरिमा लूटी। पीड़िता की बेटी की आँखों में आज भी वह रात घूमती होगी, जब उसके घर का माहौल ही उसे सबसे बड़ा खतरा बन गया। वह सोचती होगी कि क्या मंत्री का पद इतना ताकतवर था कि न्याय भी चुप रह गया?
पूर्व विधायक विजय मिश्रा पर 93 केस, रेप केस में सजा
सपा के पूर्व विधायक विजय मिश्रा पर 93 आपराधिक मामले दर्ज हैं। 2023 में भदोही की स्पेशल कोर्ट ने उन्हें 2014 के बलात्कार मामले में 15 साल की सजा सुनाई। पीड़िता एक गायिका थीं। मिश्रा ने उन्हें कार्यक्रम के बहाने बुलाया और बार-बार बलात्कार किया। कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराया। आज वे आगरा सेंट्रल जेल में बंद हैं। इन मामलों ने सपा की ‘महिला हितैषी’ छवि को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।
अपने अतीत को सुधारे समाजवादी पार्टी
आज जब सपा के सांसद लोकसभा में महिलाओं का सम्मान करने का दावा करते हैं, तो पुरानी घटनाएँ और न्यायालय के फैसले उनकी पोल खोल देते हैं। सपा का इतिहास महिला आरक्षण का विरोध, विवादित बयानों और अपराधियों को संरक्षण देने का रहा है। 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित न हो पाने में सपा की भूमिका अहम रही। मुलायम और अखिलेश दोनों ने ‘कोटा के भीतर कोटा’ को बहाना बनाया, लेकिन असल में इनकी मंशा महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को सीमित रखने की रही।
ये घटनाएँ सिर्फ आँकड़े नहीं, बल्कि उन माँ-बेटियों की चीखें हैं, जिन्हें सपा शासन ने कभी सुरक्षा नहीं दी। आज भी जब कोई सपा नेता महिलाओं का सम्मान करने का दावा करता है, तो इटावा की पीड़िता माँ-बेटी, चित्रकूट की नाबालिग और भदोही की गायिका की याद आ जाती है। सपा को अगर वाकई महिलाओं का सम्मान करना है, तो पहले अपने इतिहास का सामना करे।
उत्तर प्रदेश के लखनऊ और गाजियाबाद में एक के बाद एक लगी आग ने झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों को भारी नुकसान पहुँचाया। लखनऊ में इस दुर्घटना में 2 मासूम बच्चों की जीवनलीला समाप्त हो गई। वहीं, दोनों ही घटनाओं में लोगों का घर-बार उजड़ गया।
लखनऊ के विकास नगर में बुधवार (15 अप्रैल 2026) शाम को झुग्गियों में सिलेंडर फटने से आग लगी, जबकि गाजियाबाद के कनवानी गाँव में गुरुवार दोपहर (16 अप्रैल 2026) भड़की आग ने सैकड़ों परिवारों को बेघर कर दिया। इन आपदाओं में प्रशासन की त्वरित कार्रवाई ने बड़ी जनहानि को रोका।
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने दोनों मामलों में पीड़ितों के लिए तत्काल प्रभाव से रिलीफ फंड जारी किया। साथ ही उनके लिए तात्कालिक रहने के इंतजाम समेत अन्य सुविधाओं का भी आदेश दिया।
हालाँकि, इन दोनों घटनाओं को आपस में जोड़कर विपक्ष और वामपंथियों ने इसे योगी सरकार की साजिश बताया और लोगों को भड़काने की कोशिश की।
लखनऊ विकास नगर अग्निकांड से हुई विपदा की शुरुआत
लखनऊ के रिंग रोड स्थित विकास नगर सेक्टर-12 के पास बुधवार शाम को एक छोटी चिंगारी ने भयानक रूप धारण कर लिया। गैस सिलेंडरों के धमाकों के साथ आग की लपटें इतनी तेजी से फैलीं कि 200 से अधिक झुग्गियाँ कुछ ही मिनटों में राख हो गईं। 30 से 50 सिलेंडर फटने से धमाकों की गूंज दूर-दूर तक सुनाई दी।
इस आगजनी में दो साल और महज दो महीने की दो सगी बहनें आग की चपेट में आ गईं। इसके अलावा आग से बचने और आग को बुझाने के प्रयास में लगभग 500 लोग झुलस गए। आसपास के 30 से अधिक घरों को खाली कराना पड़ गया।
हादसे की खबर पर दमकल विभाग, पुलिस, एसडीआरएफ, नगर निगम और नागरिक सुरक्षा की 400 से अधिक सदस्यीय टीम ने त्वरित मोर्चा संभाला और कार्रवाई की। प्रशासन की फौरी कार्रवाई ने सैकड़ों जिंदगियों को बचाया।
आग ने विकास नगर की झुग्गी बस्ती को पूरी तरह तबाह कर दिया। सैकड़ों परिवारों का सब कुछ जलकर राख हो गया। खाने-पीने का सामान, कपड़े, नगदी, दस्तावेज और बच्चों के खिलौने तक सब कुछ खत्म हो गया।
योगी सरकार ने लिया संज्ञान, संभाला मोर्चा
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घटना की सूचना मिलते ही केंद्रीय स्तर पर निर्देश जारी कर दिए। उन्होंने अधिकारियों को मौके पर पहुँचकर राहत कार्य युद्ध स्तर पर चलाने का आदेश दिया। यह योगी सरकार की उस शासन शैली का प्रमाण है, जो विपत्ति के क्षणों में कभी पीछे नहीं हटती है।
उप-मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने खुद घटनास्थल का जायजा लिया और उच्च स्तरीय जाँच के आदेश दिए। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी स्थानीय प्रशासन को हरसंभव सहायता के निर्देश दिए। विधायक ओम प्रकाश श्रीवास्तव ने पीड़ित परिवारों से मुलाकात की और सहानुभूति जताई।
यह सब कुछ कुछ ही घंटों के अंदर हुआ, जो कि असल में सरकार की संवेदनशीलता को सामने ला रहा है। विपक्ष अक्सर योगी सरकार पर लापरवाही का आरोप लगाता है लेकिन यह घटना उनके दावों को खोखला साबित करती है। योगी सरकार ने मृतक दो बच्चों के परिजनों को 4-4 लाख रुपए की सहायता राशि तुरंत सौंपी। विधायक ओपी श्रीवास्तव ने चेक सौंपे और हर संभव मदद का भरोसा दिलाया।
विधायक ओम प्रकाश श्रीवास्तव ने बच्चों के परिजनों से मुलाकात कर सहायता राशि का चेक सौंपा
घायलों के लिए मेडिकल खर्च की व्यवस्था की गई और बीमा योजनाओं के तहत लाभ पहुँचाया गया। पिछले वर्षों में योगी जी ने ऐसी कई घटनाओं में त्वरित मुआवजा दिया। यह सहायता न केवल आर्थिक मदद है, बल्कि पीड़ितों के मनोबल को मजबूत करने का एक जरिया भी है।
कम्युनिटी सेंटर में मिली पीड़ितों को छाँव
घायलों को नजदीकी अस्पतालों में भर्ती किया गया। उनके निःशुल्क इलाज और दवाइयों की व्यवस्था सुनिश्चित की गई। एम्बुलेंस की कतारें लगी रहीं और विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीमें तैनात की गईं। बच्चों और बुजुर्गों को प्राथमिकता दी गई। आग बुझाने में दमकल की 20 से अधिक गाड़ियाँ लगीं और पुलिस ने ट्रैफिक नियंत्रण किया। एसडीआरएफ की भूमिका सराहनीय रही।
पीड़ित परिवारों के लिए नजदीकी कम्युनिटी सेंटर और मिनी स्टेडियम में अस्थायी आवास की व्यवस्था की गई। यहाँ भोजन, पीने का पानी, शौचालय और बिजली की सुविधा उपलब्ध कराई गई। घटनास्थल पर नगर निगम और रेरा की टीमों ने खाने के पैकेट बाँटे। बच्चों को किताबें और स्टेशनरी बाँटी गई।
विकास नगर में झुग्गी में रहने वाले बच्चों को प्रशासन की ओर से किताबें बाँटी गई
यह पूरी व्यवस्था सीएम के स्पष्ट निर्देश पर युद्ध स्तर पर चल रही है। सैकड़ों परिवारों को तत्काल आश्रय मिला। जहाँ विपक्ष हमेशा सरकार को नाकाम बताता है लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है।
सरकार ने अग्निकांड की उच्च स्तरीय जाँच के आदेश दिए हैं। झुग्गी बस्तियों में गैस सिलेंडरों का अवैध उपयोग, कबाड़ के ढेर और बिजली चोरी पर सख्ती बढ़ेगी। विकास नगर को पक्की बस्ती में तब्दील करने की योजना पर काम तेज होगा। योगी जी की ‘सुरक्षित यूपी’ अभियान के तहत ऐसी बस्तियों का कायाकल्प होगा। यह घटना एक सबक है, जिससे सरकार सीख रही है।
गाजियाबाद कनवानी अग्निकांड: दूसरी विपत्ति
लखनऊ की घटना के ठीक अगले दिन, गुरुवार दोपहर इंदिरापुरम के कनावनी गाँव में बिजली शॉर्ट सर्किट या कबाड़ गोदाम से आग भड़क उठी। यहाँ 150 से 200 झुग्गियाँ जलकर खाक हो गईं। सिलेंडर फटने से अफरा-तफरी मच गई, हालाँकि गनीमत ये रही कि कोई मौत नहीं हुई।
घटना में 7 से 22 दमकल गाड़ियों ने घंटों के संघर्ष के बाद आग पर काबू पाया। सैकड़ों बेघर हो गए, संपत्ति का भारी नुकसान हुआ। पुलिस और प्रशासन की त्वरित कार्रवाई ने जनहानि रोकी। यह घटना लखनऊ वाली आग से मिलती-जुलती थी। कनवानी की झुग्गी बस्ती में आग ने सब कुछ लील लिया।
अनुमान के अनुसार, परिवारों के घर, सामान, दस्तावेज सबकुछ जल गया। सिलेंडर ब्लास्ट्स के कारण यहाँ भी आग फैली। कोई हताहत न होने से राहत रही, लेकिन बेघर परिवारों का दर्द गहरा है। इलाका घनी आबादी वाला होने से यहाँ खतरा भी अधिक बढ़ गया था।
कनवानी पीड़ितों के लिए राहत पैकेज
सीएम योगी ने कनवानी घटना पर भी तुरंत संज्ञान लिया। उन्होंने हर संभव सहायता के आदेश दिए। डीएम रविंद्र मांदड़ ने मौके पर पहुँचकर जायजा लिया। प्रशासन ने एम्बुलेंस तैनात कीं और अतिरिक्त टीमें लगाईं। स्थिति ससमय नियंत्रित हो गई।
#WATCH | Ghaziabad, Uttar Pradesh: Ghaziabad District Magistrate Ravindra Kumar Mandad says, "There is Kanavani village in the Indirapuram police station area, and here there are about 150 more slum dwellings where a fire had broken out. Scrap work was being done here… 7 fire… https://t.co/P85pjry3Xkpic.twitter.com/iIOvGidFwM
बेघर परिवारों को अस्थायी आश्रय, भोजन और चिकित्सा उपलब्ध कराई गई। मुआवजे की प्रक्रिया शुरू हो गई है। नगर निगम राहत सामग्री बांट रहा है। घायलों का इलाज मुफ्त चल रहा है। यहाँ पर भी योगी सरकार की सक्रियता सराहनीय है।
दोनों अग्निकांड उत्तर प्रदेश की झुग्गी बस्तियों में भले ही एक के बाद एक हुए हों, लेकिन योगी सरकार की प्रतिक्रिया ने साबित किया कि मजबूत नेतृत्व विपदाओं पर विजय पा सकता है।
दोनों घटनाओं में त्वरित राहत, आर्थिक सहायता और जाँच से सरकार ने लोगों का विश्वास जीता। विपक्ष के आरोप खोखले साबित हुए। सरकार मे भविष्य में सुरक्षा मानकों को सशक्त करने की ओर भी काम करना सुनिश्चित किया है। योगी जी का ‘सबका साथ, सबका विकास’ इसी तरह काम कर रहा है।
झुग्गियों में रह कर गुजर बसर करने वालों को विपत्ति ने दुख दिया लेकिन योगी सरकार ने उम्मीद जगाई। उनके लक्ष्य के अनुसार, पीड़ितों का पुनर्वास होगा और यूपी सुरक्षित बनेगा। यह घटनाएँ शासन के लिए एक परीक्षा रहीं, जिसमें योगी मॉडल पूरी तरह से पास हो गया।
आज के डिजिटल दौर में मोबाइल फोन अब सिर्फ कॉल या मैसेज करने का साधन नहीं रह गया है, बल्कि यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का केंद्र बन चुका है। सुबह उठते ही सबसे पहले फोन देखना, रात को सोने से पहले आखिरी बार स्क्रीन स्क्रॉल करना ये आदतें अब इतनी आम हो गई हैं कि हम इन्हें सामान्य मानने लगे हैं।
खासकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब ने हमारे समय, ध्यान और मानसिक ऊर्जा पर गहरा असर डाला है। यही वह जगह है जहाँ ‘डोपामाइन स्क्रॉलिंग’ और ‘डूम स्क्रॉलिंग’ जैसी अवधारणाएँ सामने आती हैं।
डोपामाइन स्क्रॉलिंग एक ऐसी स्थिति है, जब हम बार-बार फोन उठाकर ऐसे कंटेंट को देखते रहते हैं जो हमें तुरंत खुशी या मनोरंजन देता है। दरअसल, हमारे दिमाग में एक केमिकल होता हैडोपामाइन, जो हमें अच्छा महसूस कराता है और यही हमें लगातार स्क्रॉल करते रहने के लिए प्रेरित करता है।
वहीं दूसरी तरफ ‘डूम स्क्रॉलिंग’ एक अलग लेकिन उतनी ही खतरनाक आदत है। इसका मतलब होता है बार-बार मोबाइल या सोशल मीडिया पर नकारात्मक खबरें, डराने वाली जानकारी या बुरी घटनाओं से जुड़ा कंटेंट लगातार देखते रहना भले ही उससे हमें तनाव, डर या चिंता ही क्यों न हो रही हो।
क्या होता है डोपामाइन का असर?
डोपामाइन (Dopamine) मस्तिष्क में बनने वाला एक प्रमुख न्यूरोट्रांसमीटर (केमिकल मैसेंजर) है, जिसे ‘फील-गुड’ हार्मोन भी कहा जाता है। यह हमें खुशी, उत्साह और संतुष्टि का एहसास कराता है। जब हम कोई मजेदार वीडियो देखते हैं, कोई दिलचस्प पोस्ट पढ़ते हैं या कोई नोटिफिकेशन आता है, तो दिमाग में डोपामाइन रिलीज होता है। यही हमें बार-बार फोन उठाने और स्क्रॉल करते रहने के लिए प्रेरित करता है।
शुरुआत में यह सब बहुत सामान्य लगता है और हम सोचते है, “बस 5 मिनट के लिए इंस्टाग्राम खोलता हूँ” या “एक-दो वीडियो देखकर बंद कर दूँगा।” लेकिन धीरे-धीरे यह 5 मिनट 30 मिनट में और फिर कई घंटों में बदल जाता है।
बिना किसी खास मकसद के स्क्रीन पर अंगुली चलाते रहना, एक वीडियो से दूसरे वीडियो पर जाना और समय का पता ही न चलना यही डोपामाइन स्क्रॉलिंग की असली पहचान है।
सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें यूजर को लगता है कि वह कुछ कर रहा है, लेकिन वास्तव में वह सिर्फ कंटेंट को देख रहा होता है। न कोई सीख, न कोई ठोस फायदा बस दिमाग को बार-बार छोटी-छोटी खुशी की खुराक मिलती रहती है। यही वजह है कि इसे डिजिटल लत भी कहा जाने लगा है।
इस आदत का असर सिर्फ समय की बर्बादी तक सीमित नहीं है। धीरे-धीरे यह हमारे फोकस को कमजोर करता है। लंबे समय तक किसी काम पर ध्यान लगाना मुश्किल हो जाता है।
पढ़ाई, काम या यहाँ तक कि आम बातचीत में भी ध्यान भटकने लगता है। इसके अलावा, लगातार दूसरों की परफेक्ट लाइफ देखकर खुद की जिंदगी से असंतोष बढ़ सकता है, जिससे तनाव, चिंता और कभी-कभी डिप्रेशन जैसी समस्याएँ भी सामने आती हैं।
एक और दिलचस्प पहलू यह है कि यह आदत अक्सर तब बढ़ती है जब हम खाली होते हैं या मानसिक रूप से थके हुए होते हैं। दिमाग तुरंत आसान और त्वरित खुशी चाहता है और सोशल मीडिया उसे वही देता है। लेकिन यह खुशी अस्थायी होती है और इसके खत्म होते ही हम फिर उसी जगह फंस जाते हैं।
बच्चों और युवाओं पर गहरा असर
हालाँकि यह समस्या हर उम्र के लोगों को प्रभावित करती है, लेकिन बच्चों और बड़ों पर इसका असर सबसे ज्यादा गंभीर रूप में सामने आ रहा है। आज के समय में बच्चे बहुत कम उम्र में ही स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के संपर्क में आ जाते हैं। ऐसे में उनका दिमाग, जो अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ होता, इस तरह के डिजिटल रिलेशन से जल्दी प्रभावित हो जाता है।
लगातार स्क्रीन देखने की आदत बच्चों के फोकस को कमजोर कर सकता है। पढ़ाई के दौरान ध्यान भटकना, नींद का प्रभावित होना और परिवार के साथ समय कम बिताना जैसी समस्याएँ आम होती जा रही हैं।
इसके साथ ही मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है, जिसमें चिंता, तनाव और अकेलेपन की भावना शामिल हैं। कई बार बच्चे वास्तविक दुनिया से ज्यादा डिजिटल दुनिया में जुड़ाव महसूस करने लगते हैं, जो उनके सामाजिक विकास के लिए ठीक नहीं है।
मामला क्यों उठा और क्या बोले ब्रिटेन के प्रधानमंत्री
इस बढ़ती समस्या को लेकर अब सरकारें भी सतर्क हो गई हैं। हाल ही में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सवाल खड़े किए। उनका कहना है कि ये प्लेटफॉर्म्स ऐसे एल्गोरिद्म का इस्तेमाल करते हैं, जो यूजर्स को लंबे समय तक स्क्रीन पर बनाए रखने के लिए डिजाइन किए गए हैं।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने जैसे कदमों पर विचार किया जा रहा है। साथ ही उन्होंने एंडलेस स्क्रॉलिंग जैसे फीचर्स को हटाने की जरूरत पर जोर दिया, क्योंकि ये बच्चों को बिना सोचे-समझे घंटों तक स्क्रीन से चिपकाए रखते हैं। उनके अनुसार माता-पिता भी सरकार से इस दिशा में हस्तक्षेप की माँग कर रहे हैं।
दुनिया भर में बढ़ती सख्ती और बदलते नियम
यह मुद्दा अब केवल एक देश तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि दुनिया के कई देशों में इस पर सख्त कदम उठाए जा रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर बैन लागू कर दिया है। इसके अलावा ग्रीस और इंडोनेशिया जैसे देश भी बच्चों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर काबू पाने के लिए नियम लागू कर रहे हैं।
यूरोप के कई देशों जैसे फ्रांस, स्पेन और डेनमार्क में भी न्यूनतम उम्र तय करने और पैरेंटल कंट्रोल को मजबूत करने की दिशा में काम हो रहा है। चीन ने तो पहले ही माइनर मोड लागू कर दिया है, जिसके तहत बच्चों के स्क्रीन टाइम को सीमित किया जाता है।
भारत में भी इस दिशा में कदम उठने लगे हैं, जहाँ कर्नाटक जैसे राज्य ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लागू किया है, जबकि अन्य राज्य भी इस पर विचार कर रहे हैं।
यूट्यूब का नया फीचर
इस बढ़ती चिंता के बीच यूट्यूब ने एक नया फीचर पेश किया है, जो खासतौर पर उसके शॉर्ट वीडियो सेक्शन को लेकर है। इस फीचर के जरिए यूजर अपने शॉर्ट्स देखने के समय को सीमित कर सकता है और चाहें तो इसे पूरी तरह बंद करने जैसा अनुभव भी बना सकता है।
हालाँकि यह पूरी तरह से सख्त प्रतिबंध नहीं है। अगर यूजर चाहे, तो वह एक क्लिक में उस लिमिट को नजरअंदाज कर सकता है और फिर से वीडियो देखना शुरू कर सकता है। यानी यह फीचर ज्यादा एक रिमाइंडर की तरह काम करता है, न कि पक्के तौर पर कंट्रोल की तरह।
लेकिन बच्चों के लिए स्थिति थोड़ी अलग है। अगर उनका अकाउंट गूगल फैमिली लिंक से जुड़ा है, तो इस लिमिट को हटाया नहीं जा सकता। ऐसे में माता-पिता बच्चों के स्क्रीन टाइम पर ज्यादा प्रभावी नियंत्रण रख सकते हैं।
इसकी पूरी प्रक्रिया नीचे विस्तार से दी गई है। सबसे पहले आप अपने फोन/टैबलेट/कंप्युटर में यूट्यूब को खोल लेंगे,
फिर अपने फोन में You पर क्लिक करें,
इसके बाद सेटिंग पर क्लिक करे।
सेटिंग ओपन होने के बाद चौथे ऑप्शन यानी टाइम मैनेजमेंट पर जाएँ।
उसमे लास्ट में डेली लिमिट का ऑप्शन होगा उसमे शॉर्ट्स फीड लिमिट पर क्लिक करे।
फिर आपको वह समय का ऑप्शन देगा, जिसे आप अपने हिसाब से फिक्स कर सकते हैं।
समाधान क्या हो सकता है?
इस पूरी समस्या का समाधान केवल टेक्नोलॉजी या कानून से संभव नहीं है। यह एक ऐसी स्थिति है। जहाँ समाज, परिवार और सरकार तीनों को मिलकर काम करना होगा। बच्चों को शुरू से ही डिजिटल दुनिया के सही उपयोग के बारे में सिखाना जरूरी है।
स्कूलों में भी इंटरनेट के इस्तेमाल का सही ढंग सीखना चाहिए , ताकि बच्चे यह समझ सकें कि सोशल मीडिया कैसे काम करता है और उसका उनके दिमाग पर क्या असर पड़ता है। वहीं कंपनियों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और ऐसे फीचर्स विकसित करने होंगे, जो यूजर की भलाई को ध्यान में रखें।
लगातार तीन लोकसभा चुनावों में हार झेलने के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी की बेचैनी अब साफ नजर आने लगी है। केंद्र की सत्ता से एक दशक से बाहर रहने के बाद पार्टी के नेताओं के बयानों में आक्रामकता और हताशा दोनों दिख रही हैं।
आरोप लग रहे हैं कि कॉन्ग्रेस अब आत्ममंथन की बजाय सड़क पर असंतोष खड़ा कर राजनीतिक जमीन तलाशने में जुटी है। यही वजह है कि नोएडा में मजदूरों के प्रदर्शन के नाम पर हुई हिंसा और आगजनी भी कॉन्ग्रेस को गलत नहीं लग रही। पार्टी प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत का रुख ही देख लीजिए।
उन्होंने उपद्रवियों की भूमिका पर सवाल उठाने के बजाय सीधे मोदी मॉडल को जिम्मेदार ठहरा दिया। यह तब है जब जाँच एजेंसियाँ साफ संकेत दे रही हैं कि हिंसा में मजदूरों के साथ-साथ बाहरी तत्व भी शामिल हो सकते हैं और बड़ी साजिश की आशंका से इनकार नहीं किया जा रहा।
सुप्रिया श्रीनेत का सरकार पर हमला
श्रीनेत ने कहा, “क्या यह सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था सिर्फ अरबपतियों के लिए है? क्या यही नरेंद्र मोदी का क्रूर अमृत काल है, जहाँ देश को लूटकर कुछ लोगों को अमीर बनाया जा रहा है और जो लोग देश बनाते हैं उन्हें बदहाल छोड़ा जा रहा है?”
नरेंद्र मोदी और BJP यह बताते नहीं थकते कि भारत दुनिया की Fastest growing इकॉनमी है, चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, हम विश्वगुरु हैं, वगैरह वगैरह…
इसके साथ ही देश का मीडिया – हर टीवी चैनल, रेडियो, अखबार तुरंत सरकार के सुर में सुर मिलाने लग जाते हैं, लेकिन इसी गाने-बजाने और… pic.twitter.com/WSOui7EQmv
उन्होंने आगे कहा, “मोदी सरकार ने नवंबर 2025 में 4 लेबर कोड बिना किसी चर्चा के लागू कर दिए, जिससे काम के घंटे 12 घंटे तक बढ़ गए। आज उसी आधार पर शोषण हो रहा है। सरकार जब भी कोई नीति लाती है, उसका नुकसान कर्मचारियों और मजदूरों को होता है, जबकि अडानी जैसे लोगों के लिए सब ठीक रहता है।”
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, “अगर सरकार समय रहते ध्यान नहीं देगी तो आने वाले दिनों में हालात और खराब होंगे क्योंकि भाषण से पेट नहीं भरता और नारे से घर नहीं चलते।”
हैरानी की बात यह रही कि कॉन्ग्रेस ने इस पूरी घटना को एक सकारात्मक संकेत की तरह पेश किया। पार्टी की ओर से कहा गया कि “देश कम से कम अब हिलना शुरू हो गया है।”
श्रीनेत ने कहा, “लेकिन इस सबके बीच एक उम्मीद की किरण भी है। लोगों का सब्र टूट चुका है और अब वे अपने हक की माँग कर रहे हैं। आप कुछ भी कहिए, लेकिन देश अब हिलना शुरू हो गया है।”
जाँच एजेंसियों का दावा, साजिश की आशंका
दूसरी तरफ जाँच एजेंसियों का कहना है कि नोएडा हिंसा में बाहरी तत्वों की भूमिका है। मामले में संगठित दुष्प्रचार, अशांति फैलाने की साजिश, यहाँ तक कि पाकिस्तान और नक्सली कनेक्शन तक की जाँच की जा रही है।
लेकिन कॉन्ग्रेस ने इन दावों को खारिज करने की कोशिश की। श्रीनेत ने कहा, “सरकार समाधान ढूँढने की बजाय इसे अंतरराष्ट्रीय साजिश बता रही है। वे पाकिस्तान का हाथ बता रहे हैं। मतलब अपने हक के लिए आवाज उठाना भी अब साजिश हो गया है?”
हिंसा को आंदोलन की तरह पेश करने का आरोप
आलोचकों का कहना है कि कॉन्ग्रेस इस तरह की घटनाओं को एक बड़े जनआंदोलन या क्रांति की शुरुआत के रूप में पेश कर रही है। यानी सड़क पर हो रही हिंसा और तोड़फोड़ को एक राजनीतिक अवसर के रूप में देखा जा रहा है।
उदाहरण के लिए 2019 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ आंदोलन के दौरान सोनिया गाँधी ने ‘आर या पार की लड़ाई’ का नारा दिया था। उन्होंने लोगों से सड़कों पर उतरने और कुर्बानी देने तक की बात कही थी।
शुरुआती शांतिपूर्ण प्रदर्शन जल्द ही चक्का जाम और हिंसा में बदल गए। शरजील इमाम जैसे लोगों ने देश को बांटने और रास्ते जाम करने की बात कही, वहीं उमर खालिद जैसे लोगों पर दंगों के लिए गुप्त बैठकों के जरिए लोगों को भड़काने के आरोप लगे।
बाद में इन प्रदर्शनों ने कई जगह हिंसक रूप ले लिया था। वही 2025 में वक्फ संशोधन बिल के खिलाफ भी विरोध प्रदर्शन हुए, जिनमें कई जगह हिंसा देखने को मिली खासकर पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में उस समय भी कॉन्ग्रेस और अन्य विपक्षी दल सरकार के खिलाफ हमलावर थे।
राहुल गाँधी के चुनावी आरोप
कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी पिछले कुछ समय से लगातार EVM, VVPAT, वोटर लिस्ट और फर्जी वोटरों को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने चुनाव आयोग पर भी आरोप लगाए, लेकिन इन दावों का अब तक कोई ठोस असर नहीं दिखा।
कॉन्ग्रेस ने ‘जितनी आबादी उतना हक’ जैसे नारे के जरिए जाति आधारित राजनीति को भी हवा देने की कोशिश की है। इसमें आरक्षण बढ़ाने और संपत्ति के बंटवारे जैसे मुद्दे शामिल हैं। अब कॉन्ग्रेस मजदूरों के वेतन और अधिकारों के मुद्दे के साथ-साथ लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने यानि डिलिमिटेशन जैसे मुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश कर रही है।
सड़क से सत्ता तक का रास्ता?
कॉन्ग्रेस का मौजूदा रुख यह संकेत देता है कि पार्टी सरकार के खिलाफ जन असंतोष को एक बड़े आंदोलन में बदलने की कोशिश कर रही है। ‘देश हिलना शुरू हो गया है’ जैसे बयान इसी रणनीति की तरफ इशारा करते हैं, जहाँ सड़क पर हो रही हलचल को राजनीतिक बदलाव के अवसर के रूप में देखा जा रहा है जैसा हुमए नेपाल और बांग्लादेश में देखने को मिला भले ही उसमें हिंसा और अराजकता के तत्व क्यों न शामिल हों।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)