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रेलवे के खाने में बार-बार छिपकली: बुजुर्ग करता था फ्री खाने के लिए नाटक

रेलवे के खाने में छिपकली पाए जाने की एक भ्रामक खबर का आखिरकार खंडन हो गया है। सुरेंद्र पाल नाम के एक बुजुर्ग की चालाकी पकड़े जाने के बाद रेलवे के ही एक वरिष्ठ कॉमर्सियल मैनजेर ने इस प्रकार की शिकायतों में एक संदेहास्पद और एक समान प्रक्रिया पाने के बाद सम्बंधित अधिकारियों को भी इस बारे में सतर्क किया है।

बसंत कुमार शर्मा, वरिष्ठ DCM, जबलपुर ने PTI से फोन कॉल पर कहा- “यह वही आदमी है। उसने 14 जुलाई को जबलपुर रेलवे स्टेशन पर समोसा खाने की बात कही थी और बताया था कि उसे इसमें छिपकली मिली। इसके बाद गंटकल रेलवे स्टेशन में बिरयानी में छिपकली मिलने की भी शिकायत की थी। मुझे इस बारे में संदेह हुआ और मैंने वरिष्ठ DCM को इस बारे में सतर्क किया। मैंने उन्हें तस्वीरें भी दिखाई। वो एक 70 साल से भी ज्यादा उम्र का आदमी निकला, जो ऐसा फ्री का खाना खाने के लिए करता था।” उन्होंने यह भी बताया कि सुरेंद्र पाल ऐसा काफी समय से करते आ रहा था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, गंटकल स्टेशन पर जब वरिष्ठ अधिकारियों ने पूछताछ की, तो उसने वीडियो बनाते हुए स्वीकार किया कि वो इस ट्रिक के लिए किसी ‘दिमागी बिमारी ठीक करने वाली मछली’ का इस्तेमाल करता था। वीडियो में अधिकारी उसे समझते हुए देखे जा सकते हैं कि रेलवे एक राष्ट्रीय सम्मान का विषय है और जनता से जुड़ी हुई संपत्ति है। अधिकारी उसे रेलवे का नाम ख़राब करने के लिए डाँट भी रहे हैं। साथ ही, सुरेंद्र पाल को हिदायत दी गई कि उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी यदि वह इस प्रकार की हरकतों को भविष्य में नहीं दोहराएगा।

वीडियो में सुरेंद्र पाल अधिकारियों से कह रहा है, “मैंने गलत काम किया है। मैं बुजुर्ग आदमी हूँ और दिमागी रूप से अस्थिर हूँ, मुझे ब्लड कैंसर है। कृपया मुझे छोड़ दो। पंजाब में एक आयुर्वेदिक दवाई मिलती है। मैंने एक मछली इस्तेमाल की, जो दिमाग की कमजोरी और हड्डियों की बिमारी को ठीक करती है।”

पाल ने बताया कि उसके पिता भी एक वरिष्ठ DCM थे, इस पर अधिकारी उसे समझा रहे हैं कि उसे रेलवे के साथ धोखा नहीं करना चाहिए था क्योंकि यह उसके लिए परिवार जैसा है।

हालाँकि, यह पता नहीं लगाया जा सका कि उसे कैंसर है। अक्टूबर तक रेलवे को यात्रियों द्वारा 7,500 से ज्यादा शिकायतें मिलीं, जो खाने की ख़राब गुणवत्ता को लेकर थीं।

सोनभद्र: वनभूमि लूट में सपा-कॉन्ग्रेस नेताओं के नाम, सांसद से लेकर पूर्व विधायक तक शामिल

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में हुए हत्याकांड में प्रदेश सरकार की ओर से की जा रही जाँच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। जानकारी के मुताबिक इस जाँच में सपा और कॉन्ग्रेस के ऐसे जनप्रतिनिधियों के नामों का खुलासा हुआ है, जिन्होंने गरीबों की जमीन को लूटने का काम किया है और घटना होने पर धरना प्रदर्शन करके राजनीति करने की कोशिश की है। इसके अलावा विवादित जमीनों के मामलों में चल रही जाँच में बसपा के कई नेताओं का नाम उजागर हुआ है।

खबरों की मानें तो सोनभद्र की वह जमीन जिसे लेकर खूनी संघर्ष हुआ, उसमें यूपी के पूर्व राज्यपाल चंद्रशेखकर प्रसाद नारायण के चाचा और कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद महेश्वर प्रसाद नारायण का नाम सामने आया है। साथ ही घटना का मुख्य अभियुक्त ग्राम प्रधान समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक रमेश चंद्र दुबे का नजदीकी बताया जा रहा है।

खबरों के मुताबिक वनभूमि की लूट में कई बड़े-बड़े नेताओं के नाम सामने आए हैं। जिनका आगे की जाँच में खुलासा होगा। नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट से प्राप्त जानकारी के अनुसार:-

  • रेनुकूट डिवीजन के गाँव जोगेंद्रा में बसपा सरकार के पूर्व मंत्री ने वन विभाग की 250 बीघा जमीन पर कब्जा किया हुआ है।
  • इसी तरह सोनभद्र जिले के गाँव सिलहट में एसपी के पूर्व विधायक ने 56 बीघे जमीन का बैनामा अपने भतीजों के नाम पर करवाया हुआ है।
  • ऐसे ही ओबरा वन प्रभाग के वर्दिया गाँव में एक कानूनगो के बारे में पता चला है कि उसने पहले अपने पिता के नाम जमीन कराई और बाद में उसे बेच दिया।
  • घोरावल रेंज के धोरिया गाँव में भी ऐसे ही एक रसूखदार ने 18 बीघा जमीन 90 हजार रुपए में खरीदी और फिर इसकी आड़ में बाकी जमीन को भी कब्जा लिया।
  • इससे पहले ओबरा वन प्रभाग के बिल्ली मारकुंडी में जंगल विभाग की जमीन पर पेट्रोल पंप बनाने का मामला पहले ही अदालत में विचारधीन है।

गौरतलब है कि उपर्युक्त सभी मामलों के साथ सरकारी कर्मचारियों की मिलीभगत से वन विभाग की जमीन में आबादी दिखाने के बहुत से मामले सामने आए हैं। साथ ही जाँच में ये भी खुलासा हुआ है कि भारतीय वन अधिनियम-1927 की धारा-4 और धारा-20 में विज्ञापित जमीनों को रसूखदारों के कहने पर चकबंदी में शामिल कर लिया जा रहा है, जबकि नियमानुसार ऐसा नहीं हो सकता।

यहाँ जाँच में ये भी पता चला है कि ऐसे मामलों की संख्या भी कम नहीं है जहाँ व्यक्ति या संस्था अदालत से मुकदमा हार गई है लेकिन फिर भी वन विभाग की जमीन पर अपना कब्जा जमाए हुए है।

इतना ही नहीं, खबरों की मानें तो जब से प्रदेश सरकार ने जमीन पर अंसक्रमणीय से संक्रमणीय अधिकार देने का नियम बनाया है, तब से तमाम लोग मोटी रकम लेकर अपनी जमीनें बेचते हैं और फिर जंगल की जमीन को कब्जाने में जुट जाते हैं। इन मामलों में अब तक सपा-बसपा के कई पूर्व मंत्री और विधायकों के नाम सामने आ चुके हैं।

बताया जा रहा है कि प्रदेश सरकार द्वारा गठित की गई जाँच कमिटी इस सप्ताह मुख्यमंत्री को इस मामले में अपनी रिपोर्ट सौंपेगी, जिसके बाद इन कब्जेदारों पर कार्रवाई होना लगभग तय है।

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जिस युद्धकला पर अंग्रेज़ों ने डाली कुदृष्टि, उसे हिन्दुओं ने नृत्य शैली के रूप में बचाया

मराठी में जिसे ‘दंडपट्ट‘ कहते हैं लगभग वैसी ही तलवार को उड़िया में सिर्फ ‘पट्ट’ कहा जाता है। संभवतः आपने इसे किसी संग्रहालय में देखा भी होगा। इसमें कलाई तक ढकने वाली बंधी मुट्ठी के आगे एक धारदार टुकड़ा लगा हुआ दिखता है। देखने में भले ये ऐसा लगता है जैसे इसका इस्तेमाल घोंपने में होता होगा, लेकिन असल में ये छुरे की तरह नहीं बल्कि काटने में इस्तेमाल होने वाली तलवार है। पैदल सैनिकों का सामना बख्तरबंद घुड़सवारों से हो, तो ये तलवार बहुत काम की होती थी। इसके साथ जो दूसरे किस्म की तलवार इस्तेमाल होती थी, उसे खांडा कहा जाता है। मराठा क्षेत्रों में भी ये अक्सर दिख जाएँगी क्योंकि इन इलाकों में जिन फौजों का सामना करना पड़ता था वो अक्सर बख्तरबंद घुड़सवार हमलावर होते थे।


दंडपट्ट (तस्वीर सौजन्य: विकिपीडिया)

पैदल सैनिकों के लिए इस्तेमाल होने वाले संस्कृत शब्द के मामूली से अपभ्रंश से ‘पाइका’ शब्द बना। ये अखाड़े होते थे जो अभी भी ओडिशा में पाए जाते हैं। कलिंग के काल से ही ओडिशा की सैन्य सुरक्षा का काफी हिस्सा इन्हीं ‘पाइका’ अखाड़ों पर निर्भर था। बंगाल के इस्लामिक शासक भी इन्हीं पाइका अखाड़ों के कारण ओडिशा पर विजय नहीं पा सके थे। ऐसे अखाड़ों का नियंत्रण ‘खंडायत’ के हाथ में होता था। इस शब्द में भी फ़ौरन खांडा यानी दूसरी किस्म की तलवार नजर आ जाएगी। सन 1817 में जगबंधु बिद्याधर मोहपात्रा राय के नेतृत्व में पाइका अखाड़ों ने फिरंगियों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूँक दिया था। दूसरे कई विद्रोहों की तरह ही ये विद्रोह भी कुचला गया था।

खांडा (तस्वीर सौजन्य: विकिपीडिया)

गजपति वंश के शासन काल में पाइका अखाड़े अपने चरम पर थे। अंग्रेजों का समय आने तक इनकी क्षमता लगातार इस्लामिक आक्रमणों के कारण काफी कम पड़ चुकी होगी। अंग्रेजों के आक्रमण के बाद से जब हिन्दुओं पर शस्त्र रखने और उनके संचालन की शिक्षा-दीक्षा पर पाबन्दी लगी तो अपनी कला को जीवित रखने के लिए इन्होंने एक अनूठा तरीका चुना। तलवार चलाने की कला, नृत्य के रूप में सिखाई जाने लगी। आज जो कलाएँ बिहार में परी-खांडा और ओडिशा में छाऊ नृत्य के नाम से जानी जाती हैं, ये वही तलवारबाजी के करतब होते हैं। छाऊ शब्द भी सेना की छावनी शब्द से ही बना हुआ है। अभी भी पाइका अखाड़े अपनी कला का प्रदर्शन दुर्गा-पूजा या नवरात्रि के अवसर पर करते हैं।

कल (22 जुलाई 2019) जब जगन्नाथ पुरी के एक पुजारी की तस्वीरें इन्टरनेट पर नजर आने लगीं तो कुछ तथाकथित हिन्दुओं की मासूम, अहिंसक, गाँधीवादी, सेक्युलर भावना बड़ी बुरी तरह आहत हो गईं। गोरे साहबों के जाने के बाद आए भूरे साहबों ने भी भारतीय युद्धकलाओं की हत्या करने में उससे ज्यादा तत्परता दिखाई थी, जितनी उनके गोरे साहब दिखा पाते। इस वजह से शारीरिक शौष्ठव, शस्त्र इत्यादि देखकर उनका छाती कूट कुहर्रम मचाना कोई आश्चर्यजनक भी नहीं। अब अगर वापस पट्ट नाम के इस हथियार की ओर आएँ तो ये सबसे भयावह हथियारों में से एक माना जाता था। ऐसा इसलिए था क्योंकि अक्सर योद्धा इसका प्रयोग अपने अंतिम समय में करना शुरू करते थे।

कई बार दो-दो के जोड़ों में योद्धा पट्ट चलाना शुरू करते, कलाई इसके दस्ते को पकड़ने पर मुड़े नहीं इसलिए ये दो लोगों के सम्मिलित नृत्य जैसा कुछ दृश्य होता होगा। ये एक तथ्य है कि मराठा सैनिक गिरते समय इसका इस्तेमाल करते थे ताकि अपने साथ-साथ ज्यादा से ज्यादा मलेच्छ शत्रुओं को भी लिए जाएँ। दो की जोड़ी में अगर पट्ट चलाया जा रहा हो तो अन्दर प्रवेश करके चलाने वालों पर प्रहार करना बहुत मुश्किल होगा। अब पहली किस्म के खड़ग यानी खांडा से तो खंडायत नाम बना था, दूसरे किस्म के लिए पट्टनायक नाम के बारे में सोचिये।

बाकी जब याद आ जाए कि जाने-माने लेखक देवदत्त पट्टनायक के नाम में आपको नायक शब्द का मतलब तो पता है, तब ये सोचिएगा कि भला ये ‘पट्ट’ क्या होता होगा? तब तक पाइका अखाड़ों और पाइका विद्रोह भी पढ़िएगा। हम बताते चलें कि शेखुलरों के लिए ओडिशा का इतिहास हजम करने में दिक्कत होनी तय है!

हरियाणा: पशु चोरों ने की किसान की हत्या, दो भैंस और एक बछड़ा चोरी

हरियाणा के हिसार के बरवाला इलाक़े में एक किसान की रविवार रात को अज्ञात बदमाशों ने हत्या कर दी। इससे पहले कि वो किसान अपने पशु चोरी करने से अपराधियों को रोक पाता, तब तक चोर उसकी दो भैंस (मुर्राह नस्ल) और एक बछड़े को चोरी कर चुके थे, जाते-जाते किसान की हत्या कर चुके थे। मृतक की पहचान 40 वर्षीय नरेश के रूप में हुई है।

पीड़ित के भाई ने बताया कि हत्या की रात नरेश किराए के खेत में बनाए गए आश्रय में अकेला सो रहा था। अगली सुबह, वह अपने आश्रय में मृत पाया गया। उस पर धारदार हथियार से वार किया गया था और उसके मवेशी ग़ायब थे। उनके बयान के आधार पर, पुलिस ने अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा-460 के तहत मामला दर्ज कर लिया है।

ख़बर के अनुसार, शव की खोज खेत मालिक के एक कार्यकर्ता ने की। उन्होंने तुरंत पुलिस को मामले की सूचना दी और पीड़ित के भाई को घटना के बारे में सूचित किया। पुलिस जल्द ही घटना-स्थल पर पहुँची और मामले में अपनी जाँच शुरू कर दी।

परिजनों के मुताबिक़, परिवार को होने वाला आर्थिक नुकसान 1 लाख रुपए से अधिक का है। उनका दावा है कि एक मुर्राह भैंस 50-60 हज़ार रुपए में आसानी से बेची जा सकती है। वहीं, बछड़े पर उन्होंने दावा किया कि आमतौर पर 15-20 हज़ार रुपए मिल जाते हैं। नरेश का परिवार उनकी आजीविका पर ही निर्भर था। वह 5 बेटियों और दो बेटों के पिता थे। उनकी हत्या से उनके परिवार की आजीविका भी ख़तरे में पड़ गई है।

देश में मवेशी चोरी एक बहुत बड़ी समस्या है। आए दिन मवेशी चोरी होने की ख़बरें सामने आती रहती हैं। ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहाँ पशु तस्कर किसानों और यहाँ तक ​​कि पुलिस पर हमला तक कर देते हैं। ऐसी भी ख़बरें सामने आई हैं, जहाँ मवेशी तस्करों द्वारा बम फेंकने और लोगों पर अँधाधुँध हमला किया गया।

‘गाय अत्यधिक उपयोगी जानवर लेकिन इसे पूजना व्यर्थ है, सुपरवुमन की पूजा कीजिए न कि गायों की’

राजस्थान के शहरी विकास और आवास मंत्री शांति कुमार धारीवाल ने सोमवार (जुलाई 22, 2019) को राजस्थान विधानसभा में विवादास्पद टिप्पणी करते हुए कहा कि गाय एक “अत्यधिक उपयोगी जानवर” है, लेकिन इसकी पूजा करने का कोई मतलब नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि सुपरवुमन की पूजा की जानी चाहिए न कि गायों की। धारीवाल ने वीर सावरकर की किताब का हवाला देते हुए ये बातें कहीं।

कॉन्ग्रेस नेता की विवादित टिप्पणी पर पलटवार करते हुए भाजपा नेता वासुदेव देवनानी ने कहा कि शांति कुमार धारीवाल के गाय को “जानवर” कहने के बयान ने लोगों की भावनाओं को आहत किया है। उन्होंने कहा कि देश में गाय माता के रूप में पूजनीय है, लोग उन्हें पूजते हैं। ऐसे में गाय और हिंदुत्व पर धारीवाल की टिप्पणी निंदनीय है।

विधानसभा में अपनी बात रखते हुए धारीवाल ने कहा कि राष्ट्रवाद को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि आज दुनिया में जितने भी मुस्लिम देश हैं, वो आपस में लड़ रहे हैं। भारत का मुस्लिम सर्वश्रेष्ठ है और देश के 22 करोड़ मुस्लिमों को साथ लिए बिना राष्ट्रवाद की कल्पना नहीं की जा सकती

गौरतलब है कि, सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (जुलाई 22, 2019) को ही देसी नस्ल की गाय आदि के वध पर चिंता जताया और इस पर प्रतिबंध लगाने की माँग करने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया। कोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए उनसे पूछा कि इस दिशा में क्या कदम उठाए जा रहे हैं। साथ ही मथला चंद्रपति राव द्वारा दायर जनहित याचिका पर न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने सभी राज्यों को गैरकानूनी तरीके से चल रहे बूचड़खानों को बंद करने और उच्चतम न्यायालय के समक्ष अनुपालन रिपोर्ट दायर करने के लिए भी निर्देश देने की माँग की।

‘भारत का दामाद’ बना ब्रिटेन का PM, लेकिन एक दिक्कत है..

लंदन के पूर्व मेयर बोरिस जॉनसन (Boris Johnson) को ब्रिटेन का अगला प्रधानमंत्री चुना गया है। यह जानकारी ब्रिटिश मीडिया के हवाले से एएनआई ने दी है। बोरिस जॉनसन ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरेसा मे की जगह लेंगे। उन्होंने पीएम पद की रेस में जेरमी हंट को हराया। कंजर्वेटिव पार्टी के नेता जॉनसन बुधवार (जुलाई 24, 2019) को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे। बोरिस जॉनसन ब्रिटेन के पूर्व विदेश मंत्री भी रह चुके हैं।

कभी खुद को बताते थे ‘भारत का दामाद’

बोरिस जॉनसन और उनकी पत्नी मैरीना व्हीलर की शादी को करीब 25 साल हो चुके हैं। मैरीना व्हीलर भारतीय मूल की हैं और पेशे से वकील हैं। हालाँकि, दोनों ही वर्ष 2018 में अपने रिश्ते के समाप्त होने की घोषणा कर चुके हैं। सितंबर 2018 को उन्होंने एक दूसरे से तलाक लेने की योजना बनाई थी। दरअसल, ऐसे दावे किए जा रहे थे कि जॉनसन ने अपनी पत्नी को धोखा दिया है।

लंदन के 2008 से 2016 तक मेयर रहने के दौरान जॉनसन ने खुद को ‘भारत का दामाद’ बताने के लिए अपनी पत्नी के भारतीय मूल का होने का कई बार जिक्र किया था। जॉनसन और व्हीलर के चार बच्चे हैं। 

चुनाव के दौरान गर्लफ्रेंड के साथ विवाद को लेकर चर्चा में रहे जॉनसन

एक ओर बोरिस जॉनसन का अपनी भारतीय मूल की पत्नी के साथ तलाक का केस चल रहा है, वहीं अपनी महिला मित्र के साथ विवाद को लेकर भी वो सुर्ख़ियों में रह चुके हैं। दरअसल, चुनाव के दौरान ही लंदन में उनकी महिला मित्र के साथ हुए उनके झगड़े की पुलिस में शिकायत दर्ज कर दी गई थी। पिछले साल जॉनसन का उनकी गर्लफ्रेंड कोरी साइमंड्स के साथ प्रेम संबंध सार्वजनिक हो गया था। जिसके बाद उनकी भारतीय मूल की पत्नी मरीना व्हीलर ने तलाक की अर्जी दी थी।

कश्मीर की स्थायी समस्या जवाहरलाल की ग़लतियों का परिणाम, नेहरू को Thank You बोलिए सुरजेवाला जी

कश्मीर मुद्दे पर ट्रम्प के बयान ने एक संवेदनशील मुद्दे को हवा दे दी है। फ़िलहाल, मीडिया और राजनीति के ट्रोलों ने MEA के स्पष्टीकरण के बावजूद भारत के रुख़ के बारे में झूठ फैलाया, लेकिन कॉन्ग्रेस के नेता शायद अपनी भयंकर ग़लती के इतिहास को भूल गए हैं।

अखिल भारतीय कॉन्ग्रेस कमिटी के सदस्य व राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी रणदीप सुरजेवाला ने कल रात ट्विटर पर दावा किया कि भारत ने कभी भी जम्मू-कश्मीर में तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार नहीं की।

उन्होंने ट्वीट किया, “पीएम मोदी द्वारा जम्मू-कश्मीर में मध्यस्थता करने के लिए एक विदेशी शक्ति से पूछना देश के हितों के साथ एक बड़ा धोखा है।” सुरजेवाला, इसमें एक एक बहुत छोटा सा विवरण देना भूल गए। उन्होंने यह नहीं बताया कि जम्मू और कश्मीर की जो स्थायी समस्या है वो तत्कालीन पीएम जवाहरलाल नेहरू द्वारा की गई ग़लतियों का परिणाम है।

अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान ने जब पहली बार कश्मीर की तत्कालीन स्वतंत्र रियासत पर आक्रमण किया, तो महाराजा हरि सिंह ने अपनी रियासत के भारत में विलय के लिए विलय-पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए भारत से मदद माँगी। भारत ने मदद दी और उस समय भारतीय सेना ने कश्मीर के दो-तिहाई हिस्से को जल्दी से हासिल कर लिया था।

इसके बाद नेहरू ने 1 जनवरी, 1948 को संयुक्त राष्ट्र से शांति वार्ता में हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया था, जबकि उस समय सेना अपने ऑपरेशन में लगी हुई थी। आश्चर्य की बात तो यह है कि इन सबका भारतीय सैनिक के मनोबल पर क्या असर पड़ा होगा, जब उन्हें पता चला होगा कि उनकी सरकार पहले से ही शांति की माँग कर रही है। अगर इस मामले को नेहरू द्वारा संयुक्त राष्ट्र में ले जाने की बजाए सेना को पूरे कश्मीर पर फिर से क़ब्ज़ा करने की अनुमति दे दी जाती तो आज इतिहास कुछ और ही होता।

इस मामले पर हुआ ये कि संयुक्त राष्ट्र ने संघर्ष विराम की बात कह डाली और तभी से कश्मीर मुद्दा एक खुला घाव बन कर रह गया है, जबकि भारत ने यह बात स्पष्ट कर दी है कि उसके द्वारा अमेरिका के साथ ऐसी कोई बातचीत या अनुरोध नहीं किया गया।

ऐसे में तो यही लगता है कि कॉन्ग्रेस शायद अपने उसी इतिहास को फिर से उजागर करने में लगी हुई है। आख़िरकार, कॉन्ग्रेस की तो आदत ही है कि वो हर उपलब्धि का श्रेय नेहरू को ही देने पर तुले रहते हैं। यदि चंद्रयान-2 के लिए नेहरू को धन्यवाद दिया जाना चाहिए, तो उन्हें कश्मीर मुद्दे पर की गई भयंकर भूलों के लिए भी ‘धन्यवाद’ दिया जाना चाहिए।

JNU: पहले पूछा ‘बिहारी हो?’ हाँ कहते ही मारे थप्पड़, उठक-बैठक लगवाई

अक्सर विवादों में रहने वाली जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) में सेंटर ऑफ जर्मन स्टडीज के बीए फर्स्ट ईयर के छात्र से रैगिंग का मामला सामने आया है। JNU में BA फर्स्ट इयर कोर्स में पढ़ने वाले छात्र ने पुलिस से रैगिंग की शिकायत दर्ज कराई है। छात्र का आरोप है कि एक पीएचडी स्काॅलर ने कैंपस में उसके साथ मारपीट की और कान पकड़कर उठक-बैठक भी लगवाई। यह घटना 18 जुलाई की है।

पीड़ित ने जेएनयू की एंटी रैगिंग कमिटी और वसंत कुंज नाॅर्थ थाना पुलिस में शिकायत दर्ज की है। पुलिस ने अभी तक आरोपित के खिलाफ कोई करवाई नहीं की है। रिपोर्ट्स के अनुसार, मामले की जाँच एंटी रैगिंग कमिटी कर रही है। पीड़ित स्टूडेंट ने ट्व‍िटर के जरिए MHRD और जेएनयू के वीसी से भी इसकी शिकायत की है।

‘यह दिल्ली है, यहाँ सलीके से रहा करो’

बिहार के रहने वाले 19 वर्षीय छात्र रवि राज ने बताया कि उसने 10 जुलाई को सेंटर ऑफ जर्मन स्टडीज में दाखिला लिया था। 18 जुलाई की शाम इंग्लिश स्टडीज का एक पीएचडी स्काॅलर विजय दहिया और दो अन्य युवक मिले। विजय ने पूछा- “तुम बिहारी हो?” हाँ में जवाब देते ही वह गाली देने लगा। आरोपित विजय ने रवि राज से कहा- “यह दिल्ली है, सलीके से रहा करो।” इसके बाद विजय ने रवि राज को फिर दाे थप्पड़ मारे, कान पकड़ उठक-बैठक लगवाने के बाद यह हिदायत भी दी कि आगे कभी भी मिलो तो नाक रगड़कर प्रणाम करना।

रवि राज ने 20 जुलाई को इस बारे में ट्वीट भी किया था, जिसमें उसने मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल और नित्यानंद राय समेत जेएनयू के वीसी को भी टैग किया है।

₹14 लाख की मैं गाड़ी खरीदूँगी, मुझे चंदा दो: कॉन्ग्रेस सांसद की डिमांड पर पार्टी में बवाल

केरल में कुछ दिन पहले कॉन्ग्रेस सांसद राम्या हरिदास ने पार्टी के कार्यकर्ताओं से 14 लाख की गाड़ी खरीदने के लिए चंदा देने की गुहार लगाई थी, लेकिन अब प्रदेश के पार्टी अध्यक्ष ने उनकी इस योजना पर रोक लगा दी है।

गौरतलब है कि राम्या हरिदास खेती करने वाले मज़दूरों के घर से आती हैं, इसलिए गाड़ी खरीदने के लिए वह अपने संसदीय क्षेत्र में आने वाले 1400 बूथों से इसके लिए पैसा इकट्ठा करना चाहती थीं। उनका मानना है कि उन्हें मिल रहे वेतन से उनके लिए गाड़ी खरीदना संभव नहीं हो पाएगा। इसलिए वे यूथ कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं से चाहती थीं कि वे कम से कम उन्हें 1000 रुपए दें। ताकि वे मल्टी यूटीलिटी व्हीकल खरीद पाएँ।

राम्या इससे पहले भी चुनाव प्रचार में क्राउड फंडिंग के जरिए 67 लाख रुपए इकट्ठा करने में कामयाब हुई थीं। लेकिन इस बार जब उन्होंने अपनी कार के लिए ऐसा करना चाहा तो पार्टी में ही विवाद हो गया। पार्टी के सदस्य इस फैसले के औचित्य पर सवाल उठाने लगे। मामले ने तूल पकड़ा तो कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मुल्लापल्ली रामचंद्रन ने कड़ी आपत्ति जताई।

इसके बाद राम्या हरिदास ने इस मामले पर कहा, “एक आज्ञाकारी कार्यकारी की तरह मैंने पार्टी अध्यक्ष की बातों को दिल में संजो लिया है। जो मुझे प्यार करते हैं, शायद उन्हें मेरा फैसला सही न लगा हो। मैंने अपने जीवन में बहुत मुश्किलें झेली हैं। ऐसे मौक़ो पर जनता ने जो सांत्वना दी, वही मेरा सहारा था।”

स्टेशन अधीक्षक की गलती से एक ही रेल लाइन पर दो ट्रेन, रेलवे ने दिया जबरन रिटायरमेंट की सजा

बिहार के गोरौल स्टेशन पर होते-होते बचे हादसे में रेलवे ने स्टेशन अधीक्षक को दोषी मानते हुए सेवानिवृत्ति की सजा दी है। जाँच में महकमे ने पाया कि अधीक्षक सुनील कुमार सिंह की भूल से 23 मई को दो ट्रेनों की भिड़ंत का भीषण हादसा हो सकता था। मुजफ्फरपुर-हाजीपुर रेलखण्ड के इस मामले में सोनपुर मण्डल ने जाँच समिति की रिपोर्ट के निष्कर्षों के आधार पर यह निर्णय लिया है।

एक ही लाइन पर दो ट्रेनें

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सोनपुर मण्डल में यह इतनी बड़ी सजा का पहला मामला है। गोरौल स्टेशन पर 23 मई को दो ट्रेनें, सिवान-समस्तीपुर पैसेंजर ट्रेन और बिहार सम्पर्क क्रांति एक्सप्रेस, एक साथ एक ही लाइन पर आ गईं थीं। इसके बाद मामले की जाँच के लिए डीआरएम ने जाँच टीम गठित की थी, जिसकी जाँच में स्टेशन अधीक्षक सुनील कुमार सिंह की लापरवाही की बात सामने आई थी। इसके बाद डीएआर के तहत एक दूसरी टीम का गठन स्टेशन अधीक्षक का पक्ष जानने के लिए किया गया था। उसके सामने उन्होंने खुद को निर्दोष बताया था।

इस टीम ने स्टेशन अधीक्षक के अलावा 26 जून, 2019 को पीछे से आने वाली बिहार सम्पर्क क्रांति के चालकों (लोको पायलट व सहायक लोको पायलट) का भी बयान दर्ज किया था। उसके मुताबिक जिस समस्य एक नंबर लाइन पर पैसेंजर ट्रेन खड़ी थी, उसी दौरान कंट्रोल द्वारा थ्रो पास कराने को कहे जाने के बाद स्टेशन अधीक्षक ने सम्पर्क क्रांति को भी दो नंबर लाइन की बजाय एक नंबर लाइन का ही पास दे दिया था

मच गई थी भगदड़

जब सम्पर्क क्रांति स्टेशन पर सिवान-समस्तीपुर पैसेंजर की ओर बढ़ी तो पैसेंजर के यात्रियों में भगदड़ मच गई थी। जान बचाकर भागते यात्रियों की चपेट में आकर शालू देवी, सविता देवी, चंदन कुमार और शौकत खातून ज़ख़्मी हो गए थे। सम्पर्क क्रांति के चालक रवि शंकर कुमार ने बताया कि अपनी लाइन पर दूसरी गाड़ी खड़ी देखते ही उन्होंने ब्रेक लगा दिया था, जिसके चलते एक्सप्रेस ट्रेन पैसेंजर से 200 मीटर पहले ठहर गई और बड़ा हादसा होते-होते बच गया था। उग्र यात्रियों ने बाद में स्टेशन पर तोड़फोड़ शुरू कर दी थी, जिसमें रिटायर किए गए स्टेशन अधीक्षक सुनील खुद भी ज़ख़्मी हो गए थे।

मोदी सरकार शुरुआत से ही अकुशल कर्मचारियों पर हमलावर रही है। कई बड़े अफसरों के तबादले, निलंबन या जबरन रिटायरमेंट कर सरकारी मशीनरी की गुणवत्ता को सुधारा जा रहा है। रेलवे मंत्री ने भी अपने महकमे में चाबुक चलने को लेकर पहले ही सतर्क कर दिया था।

बीजेपी शासित राज्यों की बात करें तो भ्रष्ट कर्मचारियों पर हर जगह सख्ती दिखाई जा रही है। योगी सरकार की बात करें तो उत्तर प्रदेश में 200 अधिकारी को जबरन रिटायर, 600 पर कार्रवाई, 100 को रडार पर रखा। जिन 100 अधिकारियों पर योगी सरकार की नज़र है, उनमें से अधिकतर IAS और IPS अधिकारी हैं। उधर उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने लापरवाह और मनमानी करने वाले अधिकारियों को चेतावनी देते हुए उन्हें कंपल्सरी रिटायरमेंट का अल्टिमेटम दे दिया है।