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2019 में मोदी के सामने कोई नहीं, 2024 में ‘मोदी बनाम कौन’ लाइएगा : PM मोदी

प्रधानमंत्री मोदी ने आज समाचार चैनल रिपब्लिक भारत को दिए एक साक्षात्कार में कहा है कि भाजपा नीत राजग न केवल 2019 के आम चुनाव जीतेगी, बल्कि 2014 की तुलना में अधिक सीटों के साथ जीत हासिल करेगी। विपक्षी दलों के गठबंधन महागठबंधन पर बात करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि आज विपक्ष 2014 की तुलना में अधिक बिखरा हुआ है।

“बंगाल, केरल और ओडिशा में, क्या विपक्षी दलों के बीच कोई आपसी समझ या समझौता है? फिर गठबंधन कैसे काम कर रहा है? यह अभी तक तो नहीं है। अगर इस देश के लोगों ने हमें बहुमत देने का फैसला किया है, तो विपक्षियों के चुनाव के बाद सहयोगी बनने का फैसला करने पर भी हमें कौन बाहर रख सकता है? 2019 में मोदी के सामने कोई नहीं कॉन्ग्रेस 2024 की तैयारी करे।

देश ने पूर्ण बहुमत सुनिश्चित करने और राजग सरकार को बहाल करने का अपना निर्णय ले लिया है, अब इस पर कोई सवाल ही नहीं है, पीएम मोदी ने कहा कि भाजपा, साथ ही साथ उसके सभी सहयोगी दल निश्चित रूप से 2014 की तुलना में अधिक सीटें जीतेंगे।

सत्तारूढ़ दल होते हुए भी, विपक्ष के साथ मिलकर काम करना एक प्रधानमंत्री के रूप में उनकी जिम्मेदारी है। “यह कॉन्ग्रेस हो या ममता या मायावती, मैं उनके साथ मिलकर काम करने के लिए प्रतिबद्ध हूँ।” उन्होंने कहा कि देश की जनता सरकार को मजबूत जनादेश और पूर्ण बहुमत देने के पक्ष में है।

कॉन्ग्रेस के झूठे वादों पर चुटकी लेते हुए पीएम मोदी ने कहा, ”वे दशकों से गरीबी की बात कर रहे हैं। नेहरू, इंदिरा, राजीव, सोनिया और अब राहुल भी ऐसा ही बोल रहे हैं। उन्होंने कहा कि अगर देश के लोग विपक्ष द्वारा किए गए सभी वादों को पढ़ते हैं, तो वे खुद सहमत होंगे कि उन्हें कभी भी ये मौका नहीं दिया जाना चाहिए कि वो सरकार बनाएँ।”

अर्नब गोस्वामी ने जब उनके प्रतिद्वंद्वी पर सवाल किया तो मोदी ने कहा कि ‘मोदी बनाम ये और वो’ करना मीडिया का पुराना शगल है। इसी बात पर उन्होंने कहा कि फिलहाल तो मोदी के सामने कोई नहीं दिखता, 2024 में कोई आएगा तो देखा जाएगा।

पिछले 15 साल के सारे चुनाव और बेगूसराय का वोटिंग पैटर्न कन्हैया को बनाते हैं नंबर 3

मैंने आज तक चुनाव विशेषज्ञ तो छोड़िए अपने पंचायत का विशेषज्ञ होने का दावा नहीं किया है। उसका कारण बहुत ही सीधा है कि चुनावों के विश्लेषण में, खासकर तब जब जाति, पार्टी, क्षेत्र, वोटिंग पैटर्न, पर्सनल रुतबा, गठबंधन, विरोधी प्रत्याशी से लेकर चुनावों के पहले चैनलों के स्टूडियो से कैसी कैम्पेनिंग चल रही है, इतने सारे वैरिएबल्स होते हैं, तो गणित में कमजोर विद्यार्थी दिमाग लगाने की सोचता भी नहीं।

वैसे भी, पिछले पंद्रह सालों से तो यही देख रहा हूँ कि एक-दो सर्वे या एग्जिट पोल के अलावा, सारे गलत साबित होते हैं। जो सही भी साबित होते हैं, उनके तर्क आपको उनके सही साबित होने से पहले तक कन्विन्सिंग नहीं लगेंगे। फिर, जब कोई हार या जीत जाता है, तो उसके उलट रिजल्ट बताने वाले अभय राजनीत दूबे टाइप के विशषज्ञ आपको बताते हैं कि किस जाति या समुदाय के लोगों का वोट, पार्टी के किस नेता के किस बयान के कारण पलट गया और उसका परिणाम ऐसा आया।

यहाँ ज़मीनी वोटर इतना शातिर होता है कि आप उनसे पूछिए, “क्या चचा, किसको वोट दिए?” “दे दिए किसी को… किसी को तो दिए ही हैं।” चचा का यह जवाब सुनकर आप घूम जाएँगे। चचा ज्यादा शातिर हुए या आपने ज्यादा पूछा तो किसी भी रैंडम पार्टी का नाम लेकर निकल लेंगे। ऐसे में एग्जिट पोल के परिणामों पर विश्वास करना मूर्खता है। 

एग्जिट पोल या भविष्यवाणी करने वालों पर एक और कारण से विश्वास नहीं किया जा सकता। वह कारण है ऐसे सर्वेक्षणों के सैंपल साइज का। जहाँ पहले और दूसरे नंबर पर आने वाले प्रत्याशियों की जीत में अंतर हजार और दो हजार वोटों का रहता हो, वहाँ एक प्रतिशत मतदाता से मतदान केन्द्र के बाहर खड़े होकर पार्टी का नाम पूछकर सटीक गणना करने की बात कहना ज़्यादती है। 

अब आते हैं हमारे केस स्टडी कन्हैया कुमार पर। इस पर मैंने काफी समय से उकसाए जाने के बावजूद लिखना उचित नहीं समझा था, लेकिन अज्ञानी लोग दिल्ली में बैठकर बेगूसराय के जातीय समीकरणों पर जब ज्ञान देते हैं, तो मुझसे रहा नहीं जाता। मेरा घर बेगूसराय है, और वहाँ की राजनीति की समझ दिल्ली में बैठे फेसबुकिया बुद्धिजीवियों से थोड़ी ज़्यादा है मुझे। 

बेगूसराय से पिछले कुछ समय से भाजपा या भाजपा गठबंधन के उम्मीदवार जीतते रहे हैं। 2004, 2009, 2014 में बेगूसराय से क्रमशः जद(यू) (भाजपा से गठबंधन) से राजीव रंजन सिंह, मोनाजिर हसन और भाजपा के भोला सिंह ने संसद में जगह बनाई। अगर हाल के विधायकों की बात करें तो बेगूसराय में सात विधानसभा क्षेत्र हैं जिसमें से तीन पर राजद (लालू की पार्टी), दो पर कॉन्ग्रेस और दो पर जद(यू) (नितिश की पार्टी) के विधायकों ने जीत हासिल की। सातों सीटों पर भाजपा या रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा दूसरे नंबर पर रहे। यहाँ पर यह जानना ज़रूरी है कि कॉन्ग्रेस और लालू पार्टी का गठबंधन था। यानी, पाँच सीटें उनको गईं। 

नितिश की पार्टी ने भाजपा से गठबंधन नहीं किया था, उसके बावजूद दो सीटें ले आना ठीक परफ़ॉर्मन्स है। अब हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में इस देश की जनता कई जगहों पर अलग तरीके से वोट करती है। मतलब यह कि एक ही समय में वोटिंग होने पर भी जनता ने विधानसभा में एक पार्टी को चुना, तो लोकसभा में दूसरी को। 

2014 के लोकसभा चुनावों की बात करें तो, में नंबर एक पर रहे थे भाजपा से भोला सिंह, नंबर दो पर रहे थे राजद के तनवीर हसन, और नंबर तीन पर रहे थे सीपीआई के राजेन्द्र प्रसाद सिंह। राजेन्द्र प्रसाद सिंह से याद आया कि वामपंथियों ने 1995 में बेगूसराय से पाँच विधानसभा सीटें जीती थीं, जो 2005 में दो पर गईं, 2010 में भी दो पर ही रहीं, और 2015 में शून्य हो गईं। इसके लक्षण 2014 लोकसभा चुनावों में ही दिखे थे जब राजेन्द्र प्रसाद सिंह को तीसरी जगह मिली थी। 

राजेन्द्र प्रसाद सिंह को जानना ज़रूरी है। वो 1995 से 2010 तक बरौनी विधानसभा सीट (अब जिसका नाम तेघड़ा है) से विधायक रहे। बेगूसराय को लेनिनग्राद और मिनी मॉस्को आदि नाम नब्बे के दशक में वामपंथियों की पैठ के कारण मिला था, जिसे बेगूसराय के लोगों ने जल्दी ही पहचाना और नकारना भी शुरु कर दिया। ख़ैर, कहने का मतलब यह है कि तीन बार के विधायक रहे व्यक्ति का जनाधार भी लोकसभा और हाल के विधानसभा चुनावों में काम नहीं आया। इसी पार्टी के टिकट पर अब कन्हैया को उतारा गया है।

अब बात करते हैं बेगूसराय के वोटिंग पैटर्न की। अमूमन बिहार में लोग ये मानकर चलते हैं कि वोट जाति के आधार पर होता है। जबकि, देश का शायद ही कोई ऐसा हिस्सा हो जहाँ जाति (या उसी तरह की किसी बात पर) पर वोट न होता हो। कई वेबसाइट आँख मूँदकर यह लिख देते हैं कि बेगूसराय भूमिहारों का गढ़ है, ये बस कहने की बात है। 

मुस्लिमों का प्रतिशत लगभग 13 है, और 86% हिन्दू हैं। हिन्दुओं में भूमिहार और ब्राह्मण को साथ रख दें तो वो 13-14% तक पहुँचते हैं। इसके अलावा यादवों का प्रतिशत 10 के आस-पास है, और बाकी की जनसंख्या दलित कहलाने वाली जातियों की है। ये सारे प्रतिशत (हिन्दू और मुस्लिम वाले छोड़कर) लगभग में हैं, अंतिम नहीं माने जाएँ। भूमिहारों का गढ़ इसे इसलिए कहा जाता रहा है क्योंकि यहाँ कम संख्या में होने के बावजूद राजनीति में इनकी चलती है, और इस जाति के नेता संसद और विधायक बनकर ऊपर जाते रहे हैं। इसलिए, यह सोचना कि भूमिहार वोट देकर भूमिहार को चुन लेते हैं, गलत आकलन है। 

जब यहाँ भूमिहारों की ही चलती है तो फिर मोनाजिर हसन भाजपा-जदयू के टिकट पर कैसे जीत जाते हैं? वो इसलिए कि यहाँ भूमिहार जाति नहीं, कमल का फूल (या गठबंधन रहे तो तीर छाप) पहचानता है। इसलिए, पिछले चुनावों को ध्यान में रखा जाए तो, यहाँ प्रत्याशी की जाति तभी मायने रखती है जब वो भाजपा या गठबंधन का नहीं रहे। सवर्णों यानी भूमिहार और ब्राह्मणों का वोट वामपंथियों को इसलिए नहीं जाएगा कि वहाँ भूमिहार खड़ा है, बल्कि भूमिहार दूसरे समुदाय को भी वोट देते हैं जब वो तीर छाप पर मोनाजिर हसन के नाम पर खड़ा होता है। 

मैंने ‘मुस्लिमों को भी’ लिखा है, जिसका मतलब यह है कि आमतौर पर ऐसा नहीं होता। जैसा कि मेरी ही गाँव के पंचायत में चार गाँव हैं, जिसमें एक गाँव मुस्लिमों का है, दो गाँव सिर्फ दलितों का और एक भूमिहारों का। वहाँ के चुनावों में भूमिहार कभी भी मुस्लिम प्रत्याशी को वोट नहीं देता, न ही मुस्लिम भूमिहार को। लेकिन, उसी मज़हब का उम्मीदवार कमल छाप या तीर छाप से खड़ा हो, तो भूमिहार पार्टी के प्रत्याशी को वोट देते हैं। 

इसीलिए कहते हैं कि बिहार की राजनीति थोड़ी जटिल है, उसे क्षेत्रों को हिसाब से पढ़ना चाहिए और कोई वहाँ का हो, जिसकी राजनीति में रूचि हो, तो उससे बात करनी चाहिए। हालाँकि, लोग फेसबुक पर बैठकर ही जाति के समीकरण बना लेते हैं और उन्हें न तो जाति की जनसंख्या का पता होता है, न ही इस बात का कि उस क्षेत्र में वोटिंग पैटर्न कैसा रहा है। 

आजकल हवा चल रही है कि कन्हैया कुमार के भूमिहार होने का उसको लाभ मिलेगा। जबकि, पिछले तीन सालों में जितनी बार घर गया हूँ, कन्हैया कुमार को भूमिहार होने पर, जेएनयू कांड के कारण गालियाँ ही पड़ते सुना है। ये मैं सुनी-सुनाई बात नहीं कर रहा, बल्कि लोगों के भीतरी क्षोभ की बात कर रहा हूँ जो कि एक नहीं, कई गाँवों में सुनने को मिला, “ये भूमिहार के नाम पर कलंक है! बेगूसराय से ऐसे लोग कैसे निकल गए! दिल्ली में यही सब पढ़ाता है क्या?”

बेगूसराय राष्ट्रकवि दिनकर की भूमि है। वहाँ के लोग तिरंगा और देश को लेकर हमेशा से संवेदनशील रहे हैं। बहुत लोग ऐसा सोचते हों, पर यह सत्य नहीं है कि बेगूसराय टेलिविज़न चैनल का बहुत बड़ा स्टूडियो है जहाँ कन्हैया माइक लेकर ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ बोल देंगे और बेगूसराय वाले मान लेंगे। ऐसा बिलकुल नहीं है। 

कन्हैया भाजपा के गिरिराज सिंह को दो ही सूरत में टक्कर दे सकता है। पहला यह कि राजद के तनवीर हसन (जो पिछली बार दूसरे नंबर पर रहे थे) बैठ जाते और महागठबंधन कन्हैया को उम्मीदवार बनाकर उतारता। दूसरा, अभी की स्थिति में गिरिराज सिंह स्वयं ही भाजपा की हार के लिए प्रार्थना करें जैसा कि दिल्ली के विधायकों ने दिल्ली विधानसभा चुनावों में किया था। 

मुस्लिम अमूमन, अगर उम्मीदवार भाजपा का न हो, तो मुस्लिम को ही वोट करता है। ये बात 2014 से तनवीर हसन के वोटों की संख्या और मुस्लिमों की जनसंख्या का प्रतिशत देखकर लगाया जा सकता है। लगभग तीस लाख की जनसंख्या वाले बेगूसराय में मुस्लिमों की आबादी लगभग चार लाख है, और वोटरों की संख्या क़रीब ढाई लाख होगी। कुल वोटर 18 लाख के लगभग हैं, जिनमें से 60% मतदान होने पर लगभग 10.8 लाख लोगों ने वोट दिया था। 

तनवीर हसन को 3,69,892 वोट मिले थे। एक तो वो राजद (लालू वाली पार्टी) के कैंडिडेट थे, और दूसरे मुस्लिम। तो उनको बेगूसराय के यादवों का भी ठीक ठाक वोट मिला और मुस्लिमों का एकमुश्त अलग से। यही कारण है कि वो दूसरे नंबर पर रहे। वहीं, भाजपा के भोला सिंह को उनसे लगभग 60,000 ज्यादा वोट मिले। नंबर तीन पर दूसरे भूमिहार कैंडिडेट वामपंथी राजेन्द्र प्रसाद सिंह रहे, जिन्हें लगभग 1,92,000 वोट मिले। 

इसके साथ ही, अगर 2009 के चुनावों को भी देखें तो पता चलता है कि वोटिंग प्रतिशत 48 रहने के बाद भी जदयू के मोनाजिर हसन और लोजपा के प्रत्याशी के वोटों को जोड़ दें तो अभी के हिसाब से भाजपा गठबंधन का वोट शेयर लगभग 34% पहुँच जाता है। वहीं वामपंथी पुरोधा शत्रुघ्न प्रसाद सिंह जो कि भूमिहारों के एक क़द्दावर वामपंथी नेता हैं, दूसरे नंबर पर 1.64 लाख वोटों के साथ थे। इसी वामपंथी पार्टी को अगले चुनावों में 1.92 लाख वोट मिले लेकिन वोट शेयर 22% से घटकर 16% हो गया। 

कहने का मतलब यह है कि पूरी दुनिया और भारत देश में वामपंथियों को वोट देने वाले लोग लगातार घट रहे हैं। कन्हैया भी उसी पार्टी के हैं, उसी जाति के हैं, लेकिन उनके पास न तो शत्रुघ्न सिंह का जनाधार है, न ही राजेन्द्र प्रसाद का जो कि अपने क्षेत्र से दशकों से से राजनीति में सक्रिय हैं। ऐसे में सिर्फ भूमिहार और युवक के नाम पर कन्हैया को कितने वोट मिलेंगे, वो देखने वाली बात है। मेरे हिसाब से लाख का आँकड़ा छूना भी एक चुनौती होगा। 

अब इसमें भोला सिंह की जगह भाजपा के ही गिरिराज सिंह को ले आइए, राजद से इस बार भी तनवीर हसन ही लड़ रहे हैं, और वामपंथ ने तीन बार के विधायक और ठीक-ठाक जनाधार वाले नेता की जगह नवयुवक कन्हैया को आगे किया है। वामपंथ के पहले भी प्रत्याशी भूमिहार ही थे, और इस बार भी कम्युनिस्ट होने के बावजूद अपनी भूमिहार का दावा करने वाले भूमिहार कन्हैया कुमार ही हैं। 

मैंने आपके सामने इतने आँकड़े रख दिए। आपको वोटिंग पैटर्न बता दिया। आपको जाति और मज़हब की बात बता दी। कब, कौन जीता यह भी बता दिया। जनसंख्या बता दी, प्रतिशत बता दिया। अब, जब आपसे कोई कहे कि असली टक्कर तो तनवीर हसन और कन्हैया में है तो उनसे कहिए कि लालू के पैर छूने वाले कन्हैया को राजद ने इतना दूर कैसे कर दिया कि असली टक्कर लगाने लगे दोनों?

फिर इनसे पूछिए कि क्या वो बेगूसराय गए कभी या फिर टीवी देखकर (जिस पर बेगूसराय के नाम से सीरियल भी आता है जिसमें वहाँ राजपूतों का वर्चस्व दिखाया गया है, जिनका प्रतिशत शायद दशमलव के बाद शून्य लगाने पर आता हो) पता करते हैं कि बेगूसराय भूमिहारों का गढ़ है और गिरिराज सिंह नाराज हैं, और भूमिहारों का वोट बँट जाएगा! 

भूमिहारों का वोट बँटता नहीं, भाजपा को जाता है। बँटने के बाद भी भाजपा के लिए इतना रहता है कि वो किसी को भी खड़ा कर दे, वो जीत जाते हैं। जो लोग गिरिराज सिंह की नाराज़गी में कहानी ढूँढ रहे हैं, उन्हें ध्यान रखना चाहिए वो सरकार में मंत्री हैं। रूठने पर भी, समझदार और दूरदर्शी आदमी स्थिति का जायज़ा लेता है। खासकर वह आदमी जो सत्ता में हो, वो सत्ता में होना चाहता है। वरना गिरिराज सिंह भी शत्रुघ्न सिन्हा बनकर राहुल गाँधी के बहुमुखी नेतृत्व में नवादा से चुनाव लड़ रहे होते। मुझे बेहतर पता है कि गिरिराज सिंह मेरे गाँव में होने वाले मृतक भोज से लेकर वैवाहिक कार्यक्रमों में तीन साल से कैसे आते हैं। 

इसलिए, जब कोई यह कहता है कि असली टक्कर तो राजद के तनवीर हसन और कन्हैया कुमार में है, वो फेसबुक पर ही चुनावों का विश्लेषण करता है, फेसबुक पर ही सरकार बनाता है, फेसबुक पर ही सरकार को कोसता है, और फेसबुक पर ही अपने नागरिक होने की ज़िम्मेदारी भी निभाता है। अगर, राजद अपने प्रत्याशी को बिठा दे, जो कि करने से रही, तो भी कन्हैया कुमार के लिए जीतना तो छोड़िए, अपनी पार्टी के दो लाख वोटों का आँकड़ा छूने में भी कम से कम लाख वोटों का अंतर रहेगा ही। 

जम्मू-कश्मीर: बड़गाम में हुई मुठभेड़ में सुरक्षाबलों ने किया 2 आतंकियों को ढेर, बरामद हुई अमेरीकी राइफल्स

जम्मू-कश्मीर के बड़गाम में आज (मार्च 29, 2019) सुबह से ही सुरक्षाबल और आतंकियों के बीच मुठभेड़ जारी है। इस मुठभेड़ में अब तक सुरक्षाबलों द्वारा 2 आतंकियों के मारे जाने की खबर है। यह मुठभेड़ सुत्सू गाँव में हुई है। इस मुठभेड़ में चार जवान भी घायल हुए हैं। और एक की हालत अभी बहुत गंभीर बताई जा रही है।

खबरों के मुताबिक खुफिया एजेंसियों से सुरक्षाबलों को कुछ आतंकियों के इलाके में छिपे होने की खबर मिली थी। जिसके बाद सुरक्षाबल ने इलाके को घेर लिया। खुद को चारों ओर से घिरा देखकर आतंकी घबरा गए और फायरिंग शुरू कर दी। सुरक्षाबलों की जवाबी कार्रवाई में दो आतंकी मारे गए।

प्राप्त जानकारी के अनुसार अब भी इलाके में 2-3 आतंकियों के छिपे होने की संभावना है। इसलिए सुरक्षाबलों का ऑपरेशन अभी जारी है। मुठभेड़ के चलते पूरे इलाके में घेराबंदी कर दी गई है। साथ ही अफवाहों को रोकने के लिए इलाके की इंटरनेट सेवा भी बंद कर दी गई है।

मुठभेड़ में मारे गए आतंकियों को जैश-ए-मोहम्मद का बताया जा रहा है। इनके पासे से दो हथियार भी बरामद हुए हैं। इसमें एक एम-4 स्नाइपर राइफल भी है जो कि अमेरिकी सेना के पास है।

बता दें कि गुरुवार (मार्च 28, 2019) को सुरक्षाबलों द्वारा शोपियाँ और कुपवाड़ा में 4 आतंकियों को मारा गया था। इनमें शोपियाँ जिले से 3 आतंकियों के मरने की खबर थी जबकि कुपवाड़ा जिले में 1 आतंकवादी मारा गया।

BJP ने बिना चुनाव लड़े ही इस राज्य में जीत ली तीन सीटें, पार्टी का विजय अभियान शुरू

आगामी 11 अप्रैल से चुनाव शुरू होने वाला है और सभी राजनीतिक पार्टियाँ जोरों-शोरों से चुनाव जीतने की कोशिश में जुटी है। मगर भारतीय जनता पार्टी की विजय यात्रा मतदान से पहले ही शुरू हो चुकी है। बता दें कि भाजपा ने अरुणाचल प्रदेश में वोटिंग से पहले ही तीन विधानसभा सीटों पर निर्विरोध जीत दर्ज कर ली है। खास बात ये है कि पार्टी ने ये सभी सीटें बिना चुनाव लड़े जीती हैं। इनमें से दो सीटें तो 26 मार्च को ही पार्टी के खाते में आ गई थी, वहीं तीसरी सीट उसे गुरुवार (मार्च 28, 2019) को मिली। गुरुवार को चुनाव आयोग ने दिरांग विधानसभा सीट, यचूली सीट और आलो ईस्ट विधानसभा सीट के नतीजे घोषित कर दिए हैं।

अपर मुख्य चुनाव आयुक्त केंगी दरांग ने बताया कि आलो ईस्ट विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के केंटो जिनी ने निर्विरोध जीत दर्ज की है। उनके खिलाफ कॉन्ग्रेस पार्टी के मिनकिर लोलेन ने नामांकन दाखिल किया था, लेकिन मंगलवार (मार्च 26, 2019) को जाँच के बाद उनका नामांकन रद्द कर दिया गया। वहीं, दिरांग सीट से कॉन्ग्रेस  के प्रत्याशी शेरिंग ग्यूरमे और निर्दलीय प्रत्याशी गोम्बू शेरिंग के गुरुवार (मार्च 28, 2019) के नामांकन वापस लेने के बाद बीजेपी के फुरपा शेरिंग निर्विरोध विजयी घोषित कर दिए गए। इसके अलावा यचूली विधानसभा सीट से ताबा तेदिर ने निर्विरोध जीत दर्ज की है।

इस बारे में केंद्रीय मंत्री और अरुणाचल प्रदेश से भाजपा सांसद किरण रिजिजू ने एक ट्वीट करते हुए लिखा, ‘भाजपा के सभी कार्यकर्ताओं को बधाई। अरुणाचल प्रदेश की 4-दिरांग विधानसभा से भाजपा उम्मीदवार श्री फुरपा शेरिंग निर्विरोध निर्वाचित हो गए हैं। इनके साथ ही भाजपा के 3 विधानसभा उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो गए हैं।’

भाजपा को मिली इस जीत को लेकर भाजपा महासचिव राम माधव ने भी गुरुवार (मार्च 28, 2019) को ट्वीट करते हुए जानकारी दी। उन्होंने लिखा, ‘भारतीय जनता पार्टी ने अरुणाचल प्रदेश में तीसरी विधानसभा सीट जीत ली है। भाजपा उम्मीदवार फुरपा शेरिंग दिरांग सीट से बिना चुनाव लड़े जीत गए हैं। क्योंकि उनके खिलाफ खड़े हो रहे दो अन्य उम्मीदवारों ने अपना नामांकन वापस ले लिया है।’

दरअसल, अरुणाचल प्रदेश में 60 सदस्यीय विधानसभा और लोकसभा की एक सीट के लिए 11 अप्रैल को चुनाव होना था, लेकिन अब केवल 57 विधानसभा सीटों पर और लोकसभा सीट पर ही वोटिंग होगी।

भगोड़े घोटालेबाज नीरव मोदी व माल्या पर ब्रिटिश कोर्ट में आज बड़ा फैसला, ED और CBI की टीम लंदन पहुँची

नीरव मोदी और माल्या की मुसीबतें और बढ़ने वाली हैं। क्योंकि, ब्रिटिश कोर्ट में भारत ने प्रत्यर्पण संबंधी मामलों को लेकर कोशिशें तेज कर दी हैं। ब्रिटेन में दो हाई प्रोफाइल मामलों के लिए कोर्ट तैयार हो चुका है। जहाँ एक तरफ शराब कारोबारी विजय माल्या की हाईकोर्ट में अपील पर न्यायाधीश को फैसला लेना है वहीं दूसरी तरफ वेस्टमिंस्टर कोर्ट में हीरा व्यापारी नीरव मोदी की दूसरी जमानत अर्जी पर शुक्रवार (मार्च 29 , 2019 ) को सुनवाई होनी है।

बता दें कि नीरव मोदी 13 हजार करोड़ रुपए के पीएनबी घोटाले का मुख्य आरोपी है। उसे 20 मार्च को वेस्टमिंस्टर कोर्ट में पेश किया गया था। जहाँ जज ने उसकी पहली जमानत अर्जी को खारिज कर 29 मार्च तक हिरासत में भेज दिया था। नीरव को अभी साउथ वेस्ट लंदन की वेंड्सवर्थ जेल में रखा गया है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, नीरव मोदी को दूसरी जमानत अर्जी पर सुनवाई के लिए शुक्रवार को वेस्टमिंस्टर जेल में पेश किया जाएगा। नीरव मोदी के पक्ष ने पिछली सुनवाई में 5 लाख पाउंड की जमानत पर उसे रिहा करने की अपील की थी। अब इस बार देखना है कि कोर्ट में नीरव की जमानत के लिए क्या पैंतरा अपनाया जाता है। यदि नीरव की जमानत अर्जी दूसरी बार खारिज होती है तो इस दिशा में आगे सुनवाई और पेपर वर्क का दौर चलेगा।

वेस्टमिंस्टर कोर्ट में नीरव की दूसरी जमानत अर्जी पर संभव है कि माल्या के प्रत्यर्पण का आदेश देने वाले जज ही सुनवाई करें। नीरव के खिलाफ वारंट जारी होने के बाद स्कॉटलैंड यार्ड ने उसे 19 मार्च को गिरफ्तार किया था।

बता दें कि केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की टीम इस मामले में सुनवाई से पहले लंदन पहुँच गई हैं। दोनों टीमें भारत का पक्ष रख रही ‘क्राउन प्रॉसीक्यूशन सर्विसेज’ (सीपीएस) के साथ शुक्रवार की सुनवाई में शामिल होंगी।

इससे पहले सीपीएस ने पिछली सुनवाई में नीरव मोदी की पहली जमानत अर्जी का विरोध किया था। सीपीएस ने दलील दी थी कि नीरव के पास एक से अधिक पासपोर्ट दर्शाते हैं कि वह लगातार भारत से भागने की फिराक में है। यहाँ तक कि वह भारतीय कोर्ट के कई समन जारी होने के बाद भी पेश नहीं हुआ। उसने कई बार कानून का उल्लंघन किया है। इसके बाद वेस्टमिंस्टर कोर्ट ने उसकी अर्जी खारिज कर दी थी कि इस बार नीरव को रिहा किया तो वापस पकड़ में नहीं आएगा।

ब्रिटेन न्यायपालिका के प्रवक्ता ने माल्या के मामले में कहा कि सभी दस्तावेज तैयार हैं, अब एकल जज के आवंटन और इन कागजों पर संज्ञान लेने का इंतजार है। जज इन दस्तावेजों को देखकर फैसला सुनाएँगे कि क्या माल्या की अर्जी पर आगे सुनवाई की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि इस मामले में निर्णय पर न्यायाधीश के लिए कोई तय समय सीमा नहीं है लेकिन आसार हैं कि अगले कुछ महीनों में इस पर फैसला आ जाएगा। माल्या के भारत को प्रत्यर्पण का हाईकोर्ट आदेश दे चुका है जिस पर सरकार में गृह सचिव साजिद जाविद ने भी पिछले महीने मुहर लगा दी है। माल्या ने इसके खिलाफ अपील की है।

बता दें कि किंगफिशर एयरलाइंस के पूर्व मालिक विजय माल्या भारतीय बैंको से धोखाधड़ी और करीब 9 हजार करोड़ रुपए के धनशोधन मामले में वांछित है। माल्या भारत से भागकर लंदन पहुँचा था जिसके बाद उसके प्रत्यर्पण के लिए भारत ने अर्जी दी थी।

इस मामले में सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एम्मा अर्बुथनॉट ने पिछले साल दिसंबर में अपने फैसले में कहा था कि साक्ष्य बताते हैं कि माल्या ने धोखाधड़ी की है। माल्या को भारतीय कोर्ट में इस धोखाधड़ी पर जवाब देना चाहिए। जज ने माल्या को भारत को प्रत्यर्पित करने का फैसला सुनाया था।

देश के पैसे लूटकर भागने वालों में एक सबसे बड़ा नाम विजय माल्या का है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने माल्या के ख़िलाफ़ बड़ी कार्रवाई करते हुए उसके यूनाइटेड ब्रुअरीज होल्डिंग्स लिमिटेड के 74 लाख शेयरों की बिक्री की। ईडी के मुताबिक इस बिक्री प्रक्रिया में 1,008 करोड़ की राशि प्राप्त हुई है।

ईडी की मानें तो विजय माल्या के ख़िलाफ़ चल रही मनी लॉन्ड्रिंग जाँच के चलते एजेंसियों ने उनके शेयरों को जब्त किया था। जो कि यस बैंक के पास पड़े थे। साथ ही कर्नाटक उच्च न्यायालय ने हाल ही में बैंक को कर्ज वसूली के लिए डेट रिकवरी ट्रिब्यूल को देने का आदेश दिया था।

राजद को लगा डबल झटका; अन्नपूर्णा देवी के बाद गिरिनाथ सिंह हुए BJP में शामिल

लोकसभा चुनाव नजदीक है और इस दौरान दल-बदल का दौर जारी है। इसकी वजह से राजनीतिक गलियारे में उठा पटक का माहौल है। सभी पार्टियाँ पूरे दमखम के साथ चुनावी मैदान में उतरने की कवायद में जुटी है। इसी बीच लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्‍ट्रीय जनता दल को झारखंड में एक बार फिर से करारा झटका लगा है। राजद की प्रदेश अध्यक्ष और राजद सुप्रीमो की बेहद करीबी अन्नपूर्णा देवी के भाजपा ज्वॉइन करने के बाद अब राजद के पूर्व प्रदेश अध्‍यक्ष और वरिष्ठ नेता गिरिनाथ सिंह ने आरजेडी छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया है।

बता दें कि, गिरिनाथ सिंह गुरूवार को केंद्रीय रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण की मौजूदगी में भाजपा में शामिल हो गए। हालाँकि, भाजपा ने अभी तक राँची, चतरा और कोडरमा से उम्मीदवारों की घोषणा नहीं की है। मगर ऐसा माना जा रहा है कि गिरिनाथ सिंह को भाजपा की तरफ से चतरा संसदीय क्षेत्र का टिकट मिल सकता है। वहीं अन्नपूर्णा देवी को कोडरमा से टिकट का प्रबल दावेदार माना जा रहा है।

भाजपा में शामिल होने को राजद के पूर्व अध्यक्ष गिरिनाथ सिंह ने घर वापसी बताया है। गिरिनाथ सिंह ने कहा कि वो तीन चीजों से प्रभावित हो कर भाजपा में आए हैं। उन्होंने कहा कि देश को आज सुरक्षित रखने की जरूरत है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों में देश सुरक्षित है। दूसरी बात है कि भाजपा विश्व की बड़ी पार्टी है। साथ ही उन्होंने कहा कि उन्हें भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की नेतृत्व क्षमता पर विश्वास है। वहीं झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने स्थानीय नीति बना कर राज्य का भला किया। इन्हीं तीन चीजों से प्रभावित होकर वो भाजपा में शामिल हुए।

गौरतलब है कि भाजपा नेताओं से संपर्क रखने की मिल रही खबरों के बाद राजद ने उन्हें पार्टी से छ: साल के लिए निलंबित कर दिया था। हालाँकि, उनका निष्कासन फिर वापस ले लिया गया। मगर गिरिनाथ सिंह ने 25 मार्च को राजद से इस्तीफा दे दिया। वहीं राजद के प्रदेश अध्यक्ष गौतम सागर ने गिरिनाथ सिंह के संबंध में पूछे जाने पर किसी तरह की टिप्पणी करने से इंकार कर दिया।

सोनिया गाँधी जी आपका यह वीडियो किस सन्दर्भ में था? जस्ट किडिंग, हमें तो पता ही है!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मिशन शक्ति की सफलता पर समस्त देशवासियों को बधाई दी। मोदी सरकार के दौरान मिली इस बड़ी सफलता पर खुश होने के बजाए कुछ गिरोहों में दहशत का माहौल देखने को मिला। ‘खानदान विशेष’ के अनुयायियों ने येन केन प्रकारेण ISRO और DRDO की सफलता पर पूर्व प्रधानमंत्री जवाहलाल नेहरू को बधाई दे डाली और इस घटना को प्रधानमंत्री मोदी के चुनाव प्रचार का हिस्सा बताने की पुरजोर कोशिश की।

कॉन्ग्रेस के कुछ परिवार-परस्त पदाधिकारियों ने चमचागिरी की अपनी पिछली हरकतों में नया इतिहास जोड़ते हुए बताया कि NASA में ‘N’ का मतलब नेहरू है। खैर, प्रियंका गाँधी की नजरों में आने के लिए उनकी रैली में आसमान से भीड़ उतार कर ले आने वाली प्रियंका चतुर्वेदी से इस से ज्यादा कोई उम्मीद करनी भी बेकार है।

ऐसे समय में, जब नरेंद्र मोदी के साँस लेने से, साँस छोड़ने तक को उनका चुनावी स्टंट घोषित कर लिया जा रहा है, ये बताना जरुरी हो जाता है कि राजनीति के ‘खानदान विशेष’ की फर्स्ट लेडी सोनिया गाँधी ने किस तरह से 2014 के लोकसभा चुनावों के बीच में ही (अप्रैल 14, 2014) देश की जनता और वोटर्स को प्रभावित करने के लिए टूटी-फूटी हिंदी में ही प्रसारण करवाया था।

खानदान विशेष के एहसानों और पुरस्कारों के बोझ तले दबा यह मीडिया गिरोह 2014 में सवाल नहीं पूछ पाया था, शायद तब तक कभी गाँधी परिवार ने इसे एहसास भी नहीं होने दिया था कि मीडिया का काम सवाल पूछना भी हो सकता है। सवाल पूछ सकने की यह वैचारिक क्रांति इस मीडिया गिरोह में 2014 के बाद ही देखने को मिली है, जिसमें कोई मनचला पत्रकार सुबह से शाम तक प्रधानमंत्री का इंटरव्यू लेने का सपना देखता रहता है ताकि उसके न्यूज़ चैनल को TRP मिल सके। इसके लिए उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शुक्रगुजार होना चाहिए, कि पत्रकारिता की हर जिम्मेदारी का स्मरण मीडिया गिरोह को इन्हीं कुछ सालों में हो पाया है। हमने देखा कि बजाए धन्यवाद देने के, यह परिवार परस्त गिरोह लोकतंत्र की हत्या चिल्लाता रहा।   

कुछ लोगों के लिए ये स्वीकार करना मुश्किल होगा, लेकिन ये भी जानना आवश्यक है कि रिमोट कण्ट्रोल के अँधेरे UPA-1 और UPA-2 शासन के दौरान कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष की हैसियत से ज्यादा सोनिया गाँधी अन्य किसी भी आधिकारिक और सरकारी पद पर कभी नहीं रही। लेकिन खुद को सत्ता में और सबसे ऊपर देखने का स्वप्न गाँधी परिवार को विरासत में मिला है और ये भ्रम उनका आज तक भी नहीं टूटा है।

यही वजह है कि गाँधी परिवार के सिपहसालार वैज्ञानिकों की उपलब्धि पर भी बताते हैं कि ये एंटी सैटेलाइट मिसाइल भी वो तभी बना पाए जब नेहरू ने इसरो की स्थापना की थी। ये बात अलग है कि इसरो की स्थापना और पंडित नेहरू के परधाम गमन के बीच 5 साल का अंतर है।

कॉन्ग्रेसाधीन नेहरू-भक्तों को शायद ये बात स्वीकार करने में अभी बहुत वर्ष लगेंगे किये देश किसी खानदान विशेष की बपौती नहीं है और ना ही इसे आजाद कराने में किसी समाजवादी छवि वाले नेता का अकेला हाथ था। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी अगर आज जीवित होते तो शायद ये जरूर कहते कि जब तक इस देश में कॉन्ग्रेस रहेगी तब तक…

मल्लिका दुआ ने पिता पर मोलेस्टेशन का आरोप लगाने वाली महिला पर उठाए सवाल

विनोद दुआ की बेटी मल्लिका दुआ का विवादित चेहरा एक बार फिर सामने आया है। अपने पिता पर आरोप लगाने वाली महिला के ख़िलाफ़ एक बार फिर वो मुखर रूप से नज़र आई हैं। पिता पर लगे आरोपों को मनगढ़ंत बताने वाली मल्लिका दुआ ने पीड़िता को ही कटघरे में रखते हुए उसके ऊपर सवाल उठाए।

24 मार्च के एक ट्वीट में, मल्लिका ने गायिका सोना महापात्रा को ट्वीट किया। अपने ट्वीट में सोना महापात्रा से मल्लिका ने डॉक्यूमेंट्री फ़िल्मकार अर्घ्य बसु की आत्महत्या पर उनकी चुप्पी पर सवाल खड़े किए। 2017 में, फिल्म निर्माता अर्घ्य बसु पर एक निष्ठा जैन द्वारा यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया गया था, जो उनकी पूर्व बैचमेट थी। जैन ने आरोप लगाया था कि जब वे दोनों अध्ययन कर रहे थे, तब बासु ने उनके साथ छेड़छाड़ की थी, लेकिन चूंकि बसु अब एक फैकल्टी बन गए थे, उन्होंने अपना नाम राया सरकार की ‘कॉशनरी लिस्ट‘ में डाल दिया था, जिसे प्रोफेसरों के बीच यौन अपराधी कहा जाता था।

आपको बता दें कि निष्ठा जैन वही महिला हैं जिन्होंने पिछले साल अक्टूबर में विनोद दुआ पर मारपीट और छेड़छाड़ का आरोप लगाया था। इस ख़बर के सुर्खियों में आते ही मल्लिका दुआ तुरंत एक्शन में आ गई थीं। इसके लिए उन्होंने सोना महापात्रा को निशाना बनाया क्योंकि इससे पहले भी महापात्रा ने मल्लिका को उनके पिता का समर्थन करने और उन लोगों का ज़िक्र करने की बात कही थी, जिन्होंने अवसरवादी के रूप में विनोद दुआ पर उत्पीड़न का आरोप लगाया।

मल्लिका दुआ के ट्वीट पर प्रतिक्रिया देते हुए महापात्रा ने स्पष्ट किया कि वह बसु को नहीं जानती थी लेकिन उन्हें बसु की शराब की लत के बारे में अपने कुछ दोस्तों से पता चला था।

साथ ही महापात्रा इस बात से भी आश्चर्यचकित थी कि मल्लिका ने उन्हें ट्विटर पर अनब्लॉक कर दिया था, ताकि वो उन्हें और पीड़िता निष्ठा जैन को ताना दे सकें, जिन्होंने उनके पिता विनोद दुआ पर छेड़छाड़ का आरोप लगाया था। इसके लिए मल्लिका ने महापात्रा पर एक एजेंडा होने का आरोप लगाकर इसे तुच्छ बताया।

मल्लिका ने यहाँ तक ​​कहा कि #MeToo आंदोलन पर उनके रुख़ के कारण सोना महापात्रा के पास काम की कमी है। जो, एक नारीवादी और महिलाओं के अधिकारों के चैंपियन के रूप में एक चौंकाने वाली बात है।

इस घटिया व्यवहार के बाद, मल्लिका ने सोना को फिर से ब्लॉक कर दिया और फिर से उन्हें धमकाने का आरोप लगाया।

इसके बाद मल्लिका, जिन्होंने सोना को ‘अनब्लॉक’ कर दिया था, ने उन्हें ट्विटर पर तमाम तरह के ट्वीट के ज़रिए टिप्पणी करना जारी रखा।

खादी बिक्री ₹3200 करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर

खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार खादी की बिक्री ने चालू वित्त-वर्ष (2018-19) में ₹3200 करोड़ का आँकड़ा छू लिया है, और यह सर्वकालिक उच्चतम स्तर है। यह छलांग कितनी बड़ी है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2013-14 में यही वार्षिक बिक्री केवल ₹1081 करोड़ की थी।

सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्योग मंत्रालय (MSME) के मुताबिक 2017-18 में ₹2510 करोड़ की बिक्री हुई थी।

मोदी सरकार के दौरान लगभग 5x से दौड़ा चरखा

मोदी सरकार के पहले चार वर्षों के दौरान खादी बिक्री में बढ़त की दर 30% के करीब रही, जो पूर्ववर्ती संप्रग सरकार के दस सालों के 6.7 फीसदी से लगभग 5 गुना अधिक है। इसके पीछे मुख्य कारक सरकार और खुद मोदी द्वारा खादी का आक्रामक प्रचार-प्रसार कारण माना जा सकता है, जिसके तहत मोदी ने न खुद कई महत्वपूर्ण मौकों पर खादी के स्टाइलिश परिधान पहने बल्कि अपने समर्थकों से भी कई-कई बार खादी पहनने और खरीदने का आग्रह किया। यहाँ तक कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के 2014 में भारत आगमन पर मोदी ने उन्हें भी खादी की जैकेट पहना दी

केवीआईसी चेयरमैन विनय कुमार सक्सेना के मुताबिक पिछले वित्त वर्ष 201-18 में न केवल सरकारी कम्पनियों ने खादी की बम्पर खरीददारी की बल्कि केवीआईसी ने कई निजी कम्पनियों जैसे रेमण्ड, अरविन्द मिल्स, आदित्य बिरला फैशन आदि के साथ भी आपूर्ति अनुबंध किया। अकेले रेमण्ड ने पिछले वित्त वर्ष में 7.26 लाख मीटर सिलेटी खादी खरीदी। अरविन्द मिल्स ने खादी डेनिम के दस लाख वर्ग मीटर की खरीददारी की। यह कम्पनियाँ खादी को कच्चे मॉल के रूप में खरीद के इनसे बने परिधान अपने ब्राण्ड से बेचतीं हैं।

अगर सरकारी कम्पनियों द्वारा की जा रही खरीद की बात करें तो  वित्त वर्ष 2017-18 में ₹46 करोड़ के परिधानों का आर्डर ONGC से आया तो ₹43 करोड़ के आर्डर के साथ इंडियन ऑइल कारपोरेशन (IOC) भी ज्यादा पीछे नहीं रहा

इसके अतिरिक्त, सक्सेना के अनुसार, आयोग भारतीय डाक विभाग से भी अनुबंध को तेजी से अंतिम चरण में ले जाना चाहता है। इस अनुबंध के पश्चात 83,000 डाकियों का पहनावा भी खादी हो जाएगी।

खादी ग्रामोद्योग भवन में भी भारी बिक्री

दिल्ली के दिल कनाट प्लेस में स्थित खादी ग्रामोद्योग भवन ने भी जम कर खादी की बिक्री की है। केवल अक्टूबर-नवम्बर में ही 20,000 वर्ग फिट में फैला यह भवन 3 बार ₹1 करोड़  से ज़्यादा की बिक्री एक ही दिन में कर ले गया। इसके लिए डिस्काउंट स्कीम का सहारा लिया गया, जिसके नतीजे काफी उत्साहजनक रहे। 2017-18 में खाली इसी स्टोर से ₹103 करोड़ से अधिक की बिक्री हो चुकी है।

इंदिरा की नाक और राहुल का दिमाग वाली प्रियंका जी, भारत कॉन्ग्रेस की बपौती नहीं है

प्रियंका गाँधी को कौन नहीं जानता! गाँधी तो आप राहुल में भी लगा दोगे तो लोग उसे जानने लगते हैं, और इस क़दर जानने लगते हैं कि उसे जन्मजात प्रधानमंत्री समझने लगते हैं। प्रियंका गाँधी आजकल बोल रही हैं, जबकि आम तौर पर वो कहीं भी दिखती या बोलती नहीं। इस बार चुनाव नहीं लड़ रहीं क्योंकि ब्रिटेन के बैकऑप्स सर्विसेज़ और भारत की FTIL, Unitech जैसी संस्थाओं से उनके संबंधों को चुनावी हलफ़नामे में दिखाना पड़ेगा।

ये बात और है कि ‘गाँधी’ उपनाम को ढोने वाली प्रियंका इतनी ज्यादा विनम्र हो गई हैं कि उनके बयान को सुनकर आप भोक्कार पार कर (मतलब कलेजा फाड़ कर) रोने लगेंगे। इंदिरा की नाक के जस्ट नीचे वाले मुखारविंदों से वाड्रा जी की अर्धांगिनी ने कहा है कि अगर पार्टी चाहे तो वो चुनाव लड़ सकती हैं!

ग़ज़ब! मतलब… एकदम ग़ज़ब! प्रियंका गाँधी चुनाव लड़ेंगी या नहीं, ये पार्टी चाहेगी। इस पर विश्लेषण करके मैं अपना और अपने राष्ट्रवादी मित्रों का समय खराब नहीं करूँगा। हाँ, तीन सेकेंड चुप रहूँगा ताकि वो इस पर क़ायदे से हँस लें।

जब व्यक्ति चुप रहने का आदी हो, जितना कहा जाए, लिख कर दिया जाए उतनी ही पढ़ सकती हो, तो उससे जहाँ-तहाँ कुछ भी पूछ दीजिएगा तो अलबला जाएगी। ‘अलबलाना’ बिहार में प्रयुक्त होने वाला शब्द है जिसका मतलब वही है जो ऐसे सवाल पूछने पर प्रियंका गाँधी की प्रतिक्रिया होती है: समझ में नहीं आना कि क्या बोलें, और फिर कुछ भी बोल देना।

कल मोदी जी एक घोषणा की कि भारत के वैज्ञानिकों ने स्वदेशी तकनीक से निर्मित एंटी सैटेलाइट मिसाइल से एक सक्रिय उपग्रह को मार गिराया। उन्होंने कहीं भी, एक भी बार पार्टी या सरकार को बधाई नहीं दी। बल्कि उन्होंने इसके लिए डीआरडीओ, इसरो और वैज्ञानिकों समेत समस्त देश को इस उपलब्धि के लिए शुभकामनाएँ दीं। 

चूँकि, कॉन्ग्रेस स्वयं ही राहुल और प्रियंका जैसे बड़े चैलेंजों से जूझ रहा है, तो उनके पास मुद्दे तो वैसे भी और कुछ बचे नहीं है, इसलिए वो देश की हर उपलब्धि में नेहरू जी को टैग कर देते हैं। कॉन्ग्रेस ने तुरंत ही बता दिया कि इसरो की स्थापना किस सरकार, माफ कीजिएगा, किस पार्टी के शासनकाल में हुई थी, और असली श्रेय किसको जाना चाहिए। 

यहाँ कॉन्ग्रेस कन्वीनिएंटली भूल गई कि कुछ ही दिन पहले तक, और फिर पूछेंगे तो फिर कह देगी, बालाकोट एयर स्ट्राइक के लिए वो सेना का अभिनंदन कर रही थी और यह कैटेगोरिकली कहा था कि इसमें सरकार का कोई हाथ नहीं क्योंकि जेट में सैनिक थे, मोदी नहीं। अब यही कॉन्ग्रेस यह भी बताए कि इसरो की ईंट सोनिया गाँधी ने सर पर ढोई थी, कि राहुल गाँधी पान खाकर डीआरडीओ में स्पैनडैक्स पहनकर जॉगिंग किया करते थे।

बात यहीं खत्म हो जाती तो मुझे यहाँ तक आने की ज़रूरत नहीं पड़ती लेकिन प्रियंका गाँधी ने हाल ही में जिन शब्दों का प्रयोग किया है, वो सुनकर किसी भी नागरिक के तलवे की लहर मगज तक पहुँच जाएगी। उनका कहना है कि भारत में माचिस की डिब्बी से लेकर, मिसाइल तक, जो भी है, वो कॉन्ग्रेस की देन है।

यह बात कई स्तर पर मूर्खतापूर्ण है, या यूँ कहें कि राहुलपूर्ण है, या अब प्रियंकापूर्ण भी कह सकते हैं। पहली बात तो यह है कि कॉन्ग्रेस ने भले ही भारत को अपनी बपौती समझ रखी हो, लेकिन सत्तारूढ़ होने भर से एक पार्टी भारत सरकार नहीं हो जाती। प्रियंका ने यह भी कहा होता कि पहले की सरकारों की देन है, तो भी थोड़ी देर चर्चा हो सकती थी। लेकिन, इसे कॉन्ग्रेस की देन कहना एक एलिटिस्ट, एनटायटल्ड, स्पॉइल्ट ब्रैट टाइप का बयान है जो ये सोच कर चलता है कि जो है, उसी का है।

कॉन्ग्रेस ने पार्टी फ़ंड से इसरो नहीं बनवाया था, न ही डीआरडीओ के कर्मचारियों और वैज्ञानिकों को सोनिया गाँधी के हस्ताक्षर वाले चेक जारी हुआ करते थे। कॉन्ग्रेस के नाम ये संस्थान महज़ संयोग के कारण हैं क्योंकि सबसे पहले सत्ता में वही आई। और सत्ता में वह पहले इसीलिए आई क्योंकि विकल्प नहीं थे।

इसलिए, यह कह देना कि भारत के स्कूल और दुकान सब कॉन्ग्रेस की ही देन हैं, निहायत ही बेवक़ूफ़ी भरी बात है। जो पहली सरकार होगी वो हर बुनियादी व्यवस्था को बनाने का कार्य करेगी। नेहरू ने वही किया। वहाँ उस समय राहुल गाँधी भी संयोगवश होते तो उनके नाम भी भारत को आईआईटी देने की बात लिखी होती। आपकी ही सरकार है, ग़ुलामी से अभी आज़ाद हुई है, और आपको ही सारे पहले कार्य करने हैं, तो क्या वहाँ पर अमित शाह जाकर इसरो की स्थापना करेगा?

इसमें कौन सा विजन है कि आईआईटी खोले, स्पेस प्रोग्राम की शुरूआत की, सड़के बनवाईं, कानून बनाए, विज्ञान पर जोर दिया? ये विजन नहीं, ज़रूरत थी। ये न्यूनतम कार्य हैं जो कोई भी सरकार आज़ादी मिलते ही सबसे पहले करेगी। और, दुनिया में अगर आप उस वक्त थे, और आपको विज्ञान या तकनीक को लेकर सरकारी संरक्षण में कुछ संस्थाएँ खोलने का विचार नहीं आ रहा था, तो आप गुफ़ाओं में रहने वाले कहे जाएँगे।

इसलिए, प्रियंका गाँधी जी, नाक का तो इस्तेमाल आपकी पार्टी वोट जुटाने में कर ही रही है, दिमाग का आप स्वयं कर लीजिए, क्योंकि कुछ चीज़ों का इस्तेमाल पार्टी नहीं करती। कॉन्ग्रेस एक पार्टी है। एक बार फिर से बता रहा हूँ कि कॉन्ग्रेस एक पार्टी है। ‘इंदिरा इज़ इंडिया’ से बाहर आइए, भारत एक रजवाड़ा नहीं है, न ही कॉन्ग्रेस ने अपने पैसों से कोई कार्य किया है। 

भले ही आपके और आपके भाई के नाम से छात्रावासों के नाम हों, और आपके पिता, दादी, परनाना के नाम पर भारत की नालियों से लेकर पुलों, और स्कूलों, कॉलेजों, खेल के मैदानों, हवाई अड्डों और सड़कें हों, लेकिन वो आपको ये कहने का हक़ नहीं देती की सब आपके पारिवारिक उद्यम कॉन्ग्रेस पार्टी प्राइवेट लिमिटेड की निजी संपत्ति है। उस पर ये नाम इसलिए हैं क्योंकि इस पार्टी ने और आपके घरवालों ने इसे अपनी बपौती जागीर समझ रखी थी।

जिस पार्टी के भविष्य के सबसे बड़े गुण दो डिम्पल और ‘साड़ी में बिलकुल इंदिरा गाँधी लगती है’ हो, उसे कोई गगनयान ऊपर नहीं ले जा सकता। कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए मुझे निजी तौर पर दुःख होता है कि पहले उन्हें राहुल गाँधी की नादानियों और मूर्खताओं को डिफ़ेंड करना होता था, अब प्रियंका भी आ गईं। 

भले ही लम्पट पत्रकार गिरोह प्रियंका के जीन्स और टॉप पर आर्टिकल लिखकर उसे कपड़ों के आधार पर ही कुशल प्रशासक बताता रहे, लेकिन सत्य यही है कि कई बार मुँह खोलकर आदमी एक्सपोज हो जाता है। कई बार सिर्फ ग़रीबों के साथ फोटो खिंचाने, अमेठी की झुग्गी से पिता के निकलने की तस्वीर और तीस साल बाद बेटे के निकलने की तस्वीर, कइयों को भावविह्वल कर देती है। कई बार आप साड़ी पहनकर आत्मविश्वास के साथ, सीरियस चेहरा बनाए दादी के दिए ‘गरीबी हटाओ’ के नारे के शिकार हुए ग़रीबों को गौर से सुनती दिखाई देती थी, तो लगता था कि गम्भीर नेत्री है।

लेकिन आपने जब से मुँह खोलना शुरु किया है, सारे लोग कन्फर्म होते जा रहे हैं कि एलिटिज्म, एनटायटलमेंट, और परिवार से होने का घमंड आपमें इतना ज़्यादा है कि भारतीय नागरिक एक बार फिर से आपकी पार्टी को अफोर्ड नहीं कर पाएगी। मोदी ने बार-बार कहा है कि कॉन्ग्रेस को भी कॉन्ग्रेस वाली मानसिकता से मुक्त हो जाना चाहिए। आपको उनकी बात पर ध्यान देना चाहिए।

आपको देखकर बहुतों की उम्मीद जगी थी कि एक सशक्त महिला राजनीति में आ रही है। मैंने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि समाज के हर तबके का प्रतिनिधित्व होता रहे। आप महिलाओं की प्रतिनिधि तो बिलकुल नहीं, बल्कि एक परिवार की अभिजात्य और नकारात्मक मानसिकता का प्रतिनिधित्व ज़रूर कर रही हैं जो बाप-दादी-परनाना की लगाई ईंटों पर तो अपना अधिकार जताता है लेकिन वैसी ही ईंटों पर सैकड़ों दंगों के लगे ख़ून, वैसी ही ईंटों को सोना बनाकर लाखों करोड़ों लूटने की बात, वैसी ही ईंटों पर लिखे घोटालों के नाम, और वैसी ही ईंटों के खोखलेपन से खोखले हुए देश की ज़िम्मेदारी नहीं ले पाता।

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