Friday, July 1, 2022
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अभी पप्पू पास नहीं हुआ! पंजाब की पिच पर राहुल गाँधी का इम्तिहान शेष: कैप्टन ही नहीं, दोराहे पर कॉन्ग्रेस भी

सब कुछ खुल कर सामने आ गया है इसलिए कैप्टन के लिए विकल्प बहुत कम रह गए हैं। एक अटकल के जवाब में उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वे अकाली दल के साथ किसी तरह की राजनीति के पक्ष में नहीं हैं, पर यही बात उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के लिए नहीं कही है।

कैप्टन अमरिंदर सिंह के इस्तीफे के बाद पंजाब के मुख्यमंत्री पद के लिए सार्वजनिक तौर पर कई नामों की चर्चा हुई। प्रदेश के सबसे बड़े नेता के इस्तीफे के बाद अटकलें लगनी ही थी। नवजोत सिंह सिद्धू से लेकर अंबिका सोनी और सुनील जाखड़ से लेकर सुखजिंदर रंधावा तक का नाम उछला या उछाला गया पर अंत में चरनजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बना दिया गया। कुछ ख़बरों की मानें तो चन्नी खुद गुलदस्ता लिए रंधावा को बधाई देने निकल पड़े थे। यह पंजाब कॉन्ग्रेस का अपना एचडी देवेगौड़ा मोमेंट था। ऐसा मोमेंट उस रणनीति का परिणाम होता है जिसके तहत पद के लिए ऐसे नेता का नाम आगे कर दिया जाता है कि सब हतप्रभ रह जाते हैं और कुछ समय के लिए किसी भी संभावित विवाद से छुटकारा मिल जाता है। 

ऐसी राजनीतिक चाल के पीछे एक सोच यह भी होती है कि कमज़ोर नेता को पद दे दिया जाए तो उससे कुछ भी करवाया जा सकता है। कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसे मजबूत नेता को हटाने के बाद उत्पन्न हुई परिस्थिति को किसी कमजोर नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करके ही सँभाला जा सकता था और पार्टी ने वही किया। 

पर क्या कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए हर विवाद से छुटकारा मिलना तय है? चन्नी को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद पार्टी के पंजाब प्रभारी हरीश रावत को आनन-फानन में यह घोषणा क्यों करनी पड़ी कि पार्टी अगला विधानसभा चुनाव नवजोत सिंह सिद्धू को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाकर लड़ेगी? प्रश्न यह उठता है कि यदि सिद्धू को मुख्यमंत्री पद के लिए आगे रखकर ही अगला चुनाव लड़ना है तो उन्हें अभी मुख्यमंत्री पद क्यों नहीं दिया गया? शायद ऐसे किसी प्रश्न के कारण ही रावत की घोषणा के बाद पार्टी प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला से भी बयान दिलवाना पड़ा कि पार्टी अगला विधानसभा चुनाव सिद्धू और चन्नी, दोनों को आगे रखकर लड़ेगी। सिद्धू के लिए फिलहाल मामला उतना सीधा नहीं रहा जितना वे समझ रहे थे। 

कैप्टन अमरिंदर सिंह अभी भी कॉन्ग्रेस पार्टी में हैं। साथ ही वे पहले ही कह चुके हैं कि यदि पार्टी सिद्धू को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाती है तो वे इसका विरोध करेंगे, क्योंकि उनके अनुसार सिद्धू वर्तमान पाकिस्तानी जनरल बाजवा के करीब हैं और यह बात राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। हालाँकि सिद्धू को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताकर उन्होंने खतरे की केटेगरी तय करने की जिम्मेदारी सुरक्षा एजेंसियों पर डाल दी। पर यदि पंजाब जैसे महत्वपूर्ण सीमावर्ती प्रदेश का सबसे कद्दावर नेता और कल तक मुख्यमंत्री रहा व्यक्ति ऐसी बात कहता है तो उसे गंभीरता से न लिए जाने का कोई कारण दिखाई नहीं देता। ऊपर से कैप्टन खुद भी सैनिक रह चुके हैं और हल्की बातें करने के लिए नहीं जाने जाते। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह कॉन्ग्रेस पार्टी और सिद्धू के खिलाफ केवल खुद खड़े नहीं हुए हैं, बल्कि पार्टी और सिद्धू के विरोधियों के हाथ भी एक राजनीतिक अस्त्र पकड़ा दिया है। 

नए मुख्यमंत्री ने शपथ लेने के बाद किसानों के बिजली और पानी के बिल माफ करने के वादे के साथ-साथ केंद्र सरकार से कृषि कानूनों को रद्द करने की अपील के साथ अपना कार्यकाल शुरू कर दिया। ऑफिस में उनका पहला दिन और ये बयान बताते हैं कि कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कृषि कानूनों को लेकर खुद जो शोर मचाना बंद कर दिया था, नए मुख्यमंत्री वही शोर फिर से शुरू करके अपनी नियुक्ति को सही साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका पहला दिन कुछ हद तक यह भी इंगित कर रहा है कि पार्टी किस मुद्दे को आगे रखकर चुनाव लड़ना चाहती है। अभी तक के रुझान से स्पष्ट है कि आगामी पंजाब चुनाव मुद्दाविहीन शोर के बारे में अधिक होगा। 

इन सबके बीच जो सबसे बड़ा प्रश्न होगा वह ये होगा कि कैप्टन अमरिंदर सिंह का अगला राजनीतिक कदम क्या होगा? राजनीतिक रूप से वे चाहे जैसा कदम उठाएँ, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि वे निकट भविष्य में पंजाब की राजनीति में प्रासंगिक रहेंगे। उनके और कॉन्ग्रेस हाईकमान के बीच की रस्साकशी नई नहीं है। दरअसल 2019 के समय भी कई लोगों का यह मानना था कि कैप्टन उस समय ही कॉन्ग्रेस से अलग हो सकते थे। यह स्थिति दोबारा खड़ी हो गई है और इस बार तो ऐसे स्तर पर पहुँच चुकी है जहाँ कैप्टन खुद यह कह रहे हैं कि उन्हें लगातार अपमानित किया जा रहा है और उनके इस्तीफे के पीछे यही एक कारण है। पर यह तय है कि इस्तीफे के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी और नवजोत सिद्धू की मुश्किलें कम नहीं हुई हैं। भले ही राहुल गाँधी का नाम कहीं दिखाई या सुनाई नहीं दे रहा है पर आम धारणा यही है कि कैप्टन को हटाने का फैसला उनका है। ऐसे में यह बदलाव भविष्य में उनकी नेतृत्व क्षमता की परीक्षा लेगा। 

अब चूँकि सब कुछ खुल कर सामने आ गया है इसलिए कैप्टन के लिए विकल्प बहुत कम रह गए हैं। एक अटकल के जवाब में उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वे अकाली दल के साथ किसी तरह की राजनीति के पक्ष में नहीं हैं, पर यही बात उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के लिए नहीं कही है। ऐसे में राजनीतिक अटकलों और प्रतिक्रियाओं पर ध्यान कुछ दिनों तक तेज़ रहेगा। कैप्टन ने अभी तक केवल यह कहा है कि वे मित्रों के साथ विचार करने के बाद ही कोई निर्णय लेंगे। एक वरिष्ठ नेता यदि ऐसा कहे तो अधिकतर निष्कर्ष यही रहता है कि किसी नए राजनीतिक समीकरण के अस्तित्व में आने की प्रबल संभावना है। फिलहाल इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बदलाव पंजाब कॉन्ग्रेस में ही नहीं, पंजाब की राजनीति में भी होने वाला है। 

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