BHU में जॉइंट एक्शन कमिटी के बैनर तले कुछ वामपंथी संगठन के लोगों ने CAA के विरोध में जुलुस निकाला। लेकिन ठीक उसी समय बहुत से BHU के छात्र ऐसे भी थे, जो देश के इस कानून के साथ थे। ऐसे समर्थक छात्रों ने एक बड़ी सभा की लेकिन दूसरों को गोदी मीडिया कहने वाली मीडिया गिरोह ने यह खबर दबा दी।
कुछ लोगों ने महात्मा गाँधी का नाम भी सुझाया तो छात्रों ने यह कहकर इसे ख़ारिज किया कि वाराणसी में पहले से ही महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ है। उन्होंने कहा कि सावरकर का नाम भी चल सकता है क्योंकि वो भी महामना के सहयोगी रहे हैं।
आधिकारिक रूप से BHU प्रशासन द्वारा SVDV से डॉ. फिरोज खान के इस्तीफे की पुष्टि करते ही छात्रों ने इसे धर्म, सत्य और मालवीय मूल्यों की जीत बताया है। अब उसी BHU के कला संकाय के संस्कृत विभाग में डॉ. फिरोज खान पढ़ाएँगे जिसका यही छात्र तहे-दिल से स्वागत करेंगे।
"BHU प्रशासन छात्रों को गुमराह कर रहा है। पहले तो जिस दिन फिरोज खान मौखिक परीक्षा हुई, उसके दूसरे दिन ही ज्वाइन करा दिया गया रातो रात रजिस्ट्रार के ऑफिस में ही विरोध करने के बाद भी। परंतु अब उनको 1 महीने का टाइम दिया जा रहा है।, कहीं न कहीं ये आंदोलन को ख़त्म करने की साजिश के साथ, छात्रों के सब्र का इम्तिहान भी लिया जा रहा है।"
बीएचयू के संस्थापक महामना पंडित मदन मोहन मालवीय प्रत्येक रविवार को गीता का विशेष रूप से प्रवचन किया करते थे। आज गीता जयंती है और रविवार भी है। इसकी परम्परा धर्म विज्ञान संकाय आज भी निभा रहा है। ख़ुद को हिन्दू धर्म के कार्यक्रमों से दूर रखने वाले कुलपति गीता जयंती में हिस्सा लेने भी नहीं आए।
बीएचयू प्रशासन को उस ऑर्डिनेंस को देश के सामने प्रस्तुत करना चाहिए जिसके जरिए बीएचयू में धार्मिक शिक्षा बीएचयू एक्ट-1951 में संशोधन के पूर्व से दी जा रही थी, इसीलिए संसद को संशोधन के समय लिखना पड़ा कि "religious instruction being given." अर्थात दी जा रही धार्मिक शिक्षा रोकी नहीं जाएगी।
"अगर ग़ैर-हिन्दू BHU का कुलपति नहीं हो सकता और यह वर्तमान एक्ट में है, तो धर्म विज्ञान संकाय के लिए बनाए विशेष अधिनियम एक्ट से बाहर कैसे हो गए? 1904, 1906, 1915, 1951 और 1969 के BHU के एक्ट में अगर धर्म विज्ञान संकाय के लिए विशेष अधिनियम बनाये गए थे तो उसको महामना के उद्देश्यों के विपरीत क्यों बदला गया?"
"उपेक्षा का एकमात्र कारण ऐसे कुलपतियों का यहाँ आना भी रहा जो वामपंथी विचारधारा से प्रेरित थे। जिनकी हिन्दू धर्म और सनातन परम्पराओं में कोई रूचि नहीं रही। कॉन्ग्रेस के शासन के दौरान जब वामपंथ का बोलबाला रहा तभी BHU के संविधान से काफी छेड़छाड़ हुआ।"
"संविधान भी धर्म विशेष संस्थानों के लिए विशेष अधिकार प्रदान करता है और वह अधिकार सभी को मिलना चाहिए। संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय को भी विशेष अधिकार प्राप्त हैं किन्तु जानकारी के अभाव में प्रशासन द्वारा भूल हुई है इसलिए अपनी गलती स्वीकार करते हुए उसे सुधार करने का प्रयास करना चाहिए।"
प्रोफेसर पाठक ने कहा कि जाँच रिपोर्ट कुलपति को सौंपी जाएगी। इंटरनल कंप्लेंट कमिटी की जाँच में क्या निकला, इस सम्बन्ध में अब तक विश्वविद्यालय प्रशासन ने कुछ भी जानकारी नहीं दी है।