वैश्विक महामारी से निपटने के लिए लड़ रहे लोगों के प्रति आभार जताने के लिए पीएम मोदी ने जनता से एक अपील की। लेकिन, स्वयंभू महिला पत्रकारों को यह फिजूल की कवायद लग रही। इतना ही नहीं वे इस देश की जनता को भी बेवकूफ बता रही हैं।
सबा नकवी खुद को पत्रकार कहती हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि सिंधिया के इस्तीफे से कॉन्ग्रेस से ज्यादा उन्हें दर्द हुआ है। भाजपा के खिलाफ अक्सर जहर उगलने वाली सबा नकवी को उम्मीद है कि कमलनाथ सब ठीक कर देंगे।
सोशल मीडिया पर चाँदबाग की वो वीडियो सैलाब की तरह तैर रही है, जिसमें मुस्लिम महिलाओं ने पुलिस अधिकारियों पर पत्थर से हमला कर उन्हें घायल किया। लेकिन, इसके बाद भी सुशांत सिंह पूछते हैं कि दिल्ली की हिंसक भीड़ में औरतें थीं क्या? मैंने तो नहीं सुना। सोचिए कितना शर्मसार करने वाला है सुशांत का ये ट्वीट।
कट्टरपंथियों के घर के ऊपर युद्ध लड़ने के मकसद से पेट्रोल बम, एसिड, पत्थर और आग लगाने का सामान इकट्ठा दिख रहा है, और फिर भी आपको बताया जा रहा है कि ये 'हिन्दुओं द्वारा मुस्लिमों के सफाए की साजिश है', 'ये मुस्लिमों का पोगरोम है', 'ये मुस्लिमों का नरसंहार है'।
"अगर मैं दिल्ली दंगों में जाऊँगी तो मेरी पहचान हिन्दू बताई जाएगी... क्योंकि मैं हिन्दू हूँ, तो शायद दिल्ली पुलिस मेरे ऊपर शायद उस हक़ से लाठी नहीं मारेगी, जिस बर्बरता और हक़ से उसने एक मुस्लिम पर लाठी चलाई है।"
होली के नाम पर महिलाओं के साथ छेड़छाड़ किया जाता है। ‘होली है’ कहना युद्ध की तरह लगता है। होली में ऊँची जाति वाले निचली जातियों की महिलाओं का यौन उत्पीड़न करते हैं। ये चुनिंदा प्रोपेगेंडा हैं जिनके सहारे हिंदू त्योहार की छवि धूमिल करने का प्रपंच रचा जा रहा है।
हर्ष मंदर के बारे में जाँच-पड़ताल करने पर हमें एक बेहद अज्ञात संगठन API के बारे में पता चला है। कुछ तथ्य मिले हैं जिससे पता चलता है कि यह संगठन इटली सरकार के एक अंग के रूप में काम करता है।
हर्ष मंदर का एक विडियो वायरल हुआ है। इसमें वह सीएए विरोधियों को उकसा रहा है। उनसे कह रहा है कि फैसला न संसद में होगा, न सुप्रीम कोर्ट में होगा, बल्कि फैसला सड़कों पर होगा।
बरखा दत्त ने अपनी सालों से सींची गई प्रोपेगेंडा पत्रकार की भूमिका का बखूबी निर्वाह करते हुए इस हिन्दू विरोधी दंगों की रिपोर्टिंग में भी जानबूझकर हिन्दू विक्टिम्स को दरकिनार किया और सारा फोकस मुस्लिम पीड़ितों पर ही बनाए रखा, जिससे इन दंगों को मुस्लिम नरसंहार साबित किया जा सके, जबकि जमीनी वास्तविकता ठीक इससे उलट है।