दिल्ली के उत्तम नगर में होली के दिन हिंदू युवक तरुण कुमार की मुस्लिमों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। तब किसी वामपंथी ने एक शब्द नहीं बोला। परिवार बेसहारा हुआ, तो कोई लेफ्ट लिबरल गैंग का सदस्य उन्हें सांत्वना देने नहीं पहुँचा। पीड़ित होने के बावजूद उन्हीं पर हत्या के इल्जाम लगे। किसी ने आवाज नहीं उठाई। लेकिन जब हिंदू समाज ने तरुण के परिवार के साथ एकजुटता दिखाई तो इस धड़े का हर व्यक्ति बिलबिला उठा।
आज इस घटना को सवा महीने बीतने के बाद भी ये घृणा दबी नहीं है। ‘द वायर’ ने एक आर्टिकल पब्लिश किया है। इसमें उन्होंने मुद्दा इस चीज को लेकर बनाया है कि उत्तम नगर से थोड़ी दूर स्थित अयप्पा पार्क के पास क्यों हिंदू समाज के लोग अब भी एक्टिव हैं, क्यों आसपास कार्यक्रम करवाकर तरुण के मुद्दे को खत्म नहीं होने दिया जा रहा, क्यों कार्यक्रम में आत्मरक्षा के नाम पर छोटे त्रिशूल दिए जा रहे हैं।
अपनी रिपोर्ट में द वायर ने तरुण की हत्या मामले को एक ‘मामूली विवाद’ बताया है। इसके बाद इस बात पर जोर दिया है कि कैसे मुस्लिम परिवार को आरोपित बनाकर उनके घर पर बुलडोजर चलाया गया और स्थिति ऐसी कर दी गई कि उन्हें घर छोड़कर वहाँ से निकलना पड़ा। आगे ये दिखाने की कोशिश हुई है कि एक तरफ तो मुस्लिम परिवार के साथ ये सब हुआ और दूसरी ओर अब हिंदू समाज के लोग यहाँ कार्यक्रम कर रहे हैं।
द वायर को ‘त्रिशुल दीक्षा’ के जमीन पर मायने अलग लग रहे
द वायर ने इस कार्यक्रम की ग्राउंड रिपोर्ट के आधार पर यह आर्टिकल लिखा है और वह इस आर्टिकल में संगठन के हवाले से बता रहा है कि यह ‘त्रिशूल दीक्षा’ कार्यक्रम है, जो ‘संस्कार, सेवा और सुरक्षा’ का संकल्प दिलाने के लिए होता है। इसके बावजूद वह अपनी कमेंटरी से पीछे नहीं हटता और लिखता है- जमीन पर इसके मायने कहीं अधिक जटिल दिखाई देते हैं। मानो किसी को समझ नहीं आ रहा है कि किस ओर इशारा किया जा रहा है।

इस कमेंटरी के बाद वह VHP (इंद्रप्रस्थ) के प्रचार-प्रसार प्रमुख संजीव कुमार के उस बयान को आगे जोड़ देता है, जो उसके हिसाब से इस कमेंटरी के लिए फिट बैठता है। संजीव कुमार का वो बयान, जिसमें वह कहते हैं कि आने वाले दिनों में पूरी दिल्ली में 30 हजार से अधिक त्रिशूल वितरित किए जाने की संभावना है। यहाँ आर्टिकल पढ़ने वाले आम इंसान के मन में ये नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की गई है कि अभी तो और त्रिशूल बँटने है, जिनसे जमीन पर मायने पूरी तरह बदल जाएँगे।
तरुण की हत्या से कार्यक्रम को जोड़ा
दिलचस्प बात है कि ये बात जानते हुए कि दिल्ली विश्व हिंदू परिषद त्रिशूल वितरण कार्यक्रम पहली बार नहीं करवा रहा, द वायर ने इसे मुद्दा बनाया। उसके लिए गौर करने वाली बात कार्यक्रम की लोकेशन है। उत्तम नगर में होली के दिन हुई तरुण की हत्या, जिसे असहिष्णु इस्लामी कट्टरपंथियों ने अंजाम दी। इसके बाद जब पीड़ित परिवार के न्याय की बात आई, तो हिंदुओं ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया। कहीं कोई हिंसा की खबरें नहीं आई।

बावजूद बिना किसी मतलब के द वायर ने ‘त्रिशूल दीक्षा’ कार्यक्रम और तरुण की हत्या को एक खेमे में रखा। उसने नैरेटिव बनाने के लिए अपराधियों का नाम लिए बिना घटना को ‘मामूली’ करार दिया और इसका ठीकरा हिंदुओं पर फोड़ डाला। इतना ही नहीं द वायर को अपराधियों के घर पर बुलडोजर चलने की भी बड़ी चिंता हुई। लेकिन तरुण को न्याय दिलाने के लिए एक शब्द भी बोलना मुनासिब नहीं समझा।

बात रही उत्तर नगर से कुछ दूर पर कार्यक्रम करने की, तो VHP पदाधिकारियों से बातचीत में द वायर खुद बताता है कि ‘उत्तम नगर को इसलिए चुना गया क्योंकि इस जिले का नंबर आया है, और कोई कारण नहीं है।’
द वायर को पता है कि यह कार्यक्रम पहली बार नहीं करवाया जा रहा है, इसके बावजूद बात को तोड़-मरोड़कर पेश कर अपना नैरेटिव गढ़ लिया और लेख के अंत में जाकर लिखा कि ऐसा कार्यक्रम साल 2024 में भी हुआ था और साल 2025 में भी शस्त्र दीक्षा समारोह के तहत 20 हजार लड़कियों को कटार बाँटी गई थी।
कार्यक्रम में भाषण को ‘उग्र’ और मुस्लिम हेट स्पीच को बताया ‘कथित’
अमूमन द वायर ने इस पूरे कार्यक्रम को अपने नैरेटिव के अनुसार कवर किया। कार्यक्रम में शामिल लोगों की हलचल को कैमरे में अपने अनुरूप कैद किया। मंच से दिए गए भाषण को ‘उग्र’ बताकर पेश किया गया। कार्यक्रम में ‘हनुमान चालीसा’ के पाठ से असहजता सामने रखी। तरुण के परिवार की न्याय की माँग को तक अतिवाद का रूप दिया गया।

इतना ही नहीं जमीनी हकीकत को समझने से भी द वायर पीछे नहीं हटा और इसे ‘कथित’ बताकर लिखा गया। चाहे वो हैदराबाद में अकबरुद्दीन ओवैसी का 15 मिनट का भाषण पर की गई टिप्पणी हो, या दिल्ली के त्रिनगर में मुस्लिमों के डर से पलायन को मजबूर हुए हिंदुओं की बात हो।
द वायर का दोहरा रवैया
वामपंथी ‘द वायर’ का इस कार्यक्रम को कवर करने का मंसूबा आर्टिकल के लिखे गए स्टाइल से ही समझ आता है। वह पढ़ने वाले को सोचने के लिए मजबूर कर देता है कि कैसे कार्यक्रम के नाम पर हिंसा के प्रति उकसाया जा रहा है। जबकि हकीकत भी उसने इसी आर्टिकल के कुछ अंशों में साफ झलका दी है। लेकिन तोड़-मरोड़कर पेश किए जाने के चलते एक आम इंसान की सोच पर असर डालने वाला है।
द वायर की सच्चाई किसी से छिपी नहीं है। आज एक हिंदूवादी कार्यक्रम से असहज होने वाला द वायर कभी किसी मुस्लिम जुलूस पर नहीं बोलता। तब इसे समस्या नहीं होती जब मुस्लिम ‘मुहर्रम’ में तलवार लहराकर सड़कों पर निकलते हैं, हाथों में धारदार हथियार दिखते हैं। ऐसे माहौल में सड़क से गुजरने वाला हर आम इंसान डर जाता है। परिवार में माँ-बाप अपने बच्चे को घर से बाहर निकलने से मना कर देते हैं, लड़कियों को बाहर निकलने से खतरा बताया जाता है।
लेकिन द वायर तब बिलखने लगता है कि जब हिंदू कार्यक्रम आयोजित किया जाता है और तस्वीरें खींचने के लिए हाथ में त्रिशूल थामे जाते हैं और सेवाभाव से इसे लोगों में बाँटा जाता है। जबकि इस कार्यक्रम से न कोई आम इंसान घबराता है। न किसी परिवार में माँ-बाप अपने बच्चे को बाहर निकलने से रोकते हैं और न कोई लड़की किसी खतरे को महसूस करती है। यह एकता का प्रतीक और अपने हितों की बात करने से ज्यादा और कुछ नहीं लगता।


