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जब पैदा होते ही अपराधी घोषित हो जाते थे बच्चे… अंग्रेजों का वो कानून, जिसने 160 जनजातियों को हाशिए पर धकेला

भारत में अंग्रेजों के काल को अंधकार युग के रूप में देखा जाता है क्योंकि यही वो समय था जब यहाँ के किसानों और लघु व्यवसायियों की कमर तोड़ डाली गई। अंग्रेजों ने आदिवासियों और जनजातियों को ही अपराधी घोषित कर दिया। इसके लिए अंग्रेजों द्वारा ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act, 1871)’ लाया गया। भारत में जितने भी संसाधन थे, जिनके इस्तेमाल से यहाँ के ग्रामीण फलते-फूलते थे, उन सब पर अंग्रेजों का कब्ज़ा हो गया।

कपड़ा उद्योग के मामले में भारत का कोई सानी न था। कहा जाता है कि इसे बर्बाद करने के लिए कई शिल्पकारों के अंगूठे तक काट डाले गए थे। किसानों से जबरदस्ती नील की खेती कराई जाती, जिससे अंग्रेजों को तो फायदा था, लेकिन कृषकों की जमीनें किसी लायक नहीं बचती थीं। देश के प्राकृतिक संसाधनों का जम कर दोहन किया गया। बीमारियाँ फैलती रहीं, महामारियों से लाखों लोग मरते रहें, अंग्रेज उनका शोषण करते रहे।

इसी क्रम में आज हम बात करेंगे अंग्रेजों के इसी ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act, 1871)’ की, जिसे कई क़ानूनों को मिला कर बनाया गया था। इसके तहत भारत की कई जनजातियों को ‘आदतन अपराधी’ घोषित कर दिया गया। इनमें से 160 संजातीय भारतीय समुदायों के लोगों के खिलाफ एक प्रकार का गैर-जमानती वॉरंट जारी कर दिया गया। उन्हें हर सप्ताह थाने में बुलाया जाने लगा। वो अपनी मर्जी से हिल-डुल भी नहीं सकते थे, उनकी गतिविधियों पर कुछ इस तरह से अतिक्रमण हुआ।

कैसे बना ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act, 1871)’?

दरअसल, अंग्रेजों ने ये सब पंजाब और उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों से शुरू किया, जहाँ सबसे पहले कुछ जनजातियों को अपराधी घोषित कर दिया गया। 19वीं शताब्दी के मध्य से ही घुमंतू या विमुक्त जनजातियों को प्रतिबंधित करने का सिलसिला चल निकला था। पुलिस ने इनकी गतिविधियों को सीमित कर रखा था और ब्रिटिश प्रशासन का कहना था कि इससे ‘काफी अच्छे परिणाम’ निकल कर सामने आ रहे हैं।

हालाँकि, अंग्रेजों के द्वारा ये तब शुरू हुईं जब 1860 के दशक में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस-प्रशासन की इन हरकतों को अवैध घोषित कर दिया। इसके बाद इन प्रांतों की सरकारें तत्कालीन भारत सरकार (ब्रिटिश सरकार) के पास पहुँचीं और उन्हें ऐसे क़ानून बनाने को कहा, जिससे न सिर्फ इन घुमंतू व विमुक्त जनजातियों की गतिविधियों पर लगाम लगे, बल्कि इसका उल्लंघन करना भी दंडनीय अपराध माना जाए।

फिर इस सम्बन्ध में क़ानून बनाने के लिए एक समिति का गठन किया गया लेकिन उस समिति ने कोर्ट द्वारा उठाई गई आपत्तियों को दरकिनार कर दिया। कोर्ट की आपत्ति थी कि इससे पुलिस बेवजह लोगों को परेशान करेगी लेकिन अंग्रेजों ने कहा कि ‘अपराधी पुलिस को परेशान करें, इससे अच्छा है कि पुलिस से अपराधी परेशान हों’। साथ ही इस बात को भी नज़रअंदाज़ कर दिया गया कि पहले से ही इसे लेकर कई क़ानून बने हुए थे।

इसके साथ ही इस क़ानून को बना कर इसे नॉर्थ-वेस्ट प्रोविंस के साथ-साथ अवध और पंजाब में लागू किया गया। जिन प्रक्रियाओं को कोर्ट ने अवैध घोषित कर दिया था, उन्हें ही क़ानूनन सही बनाने के लिए एक तरह से इसका बिल ड्राफ्ट किया गया, और उसे एक्ट में बदला गया। जनजातीय समूहों के लोगों को पुलिस थाने जाकर खुद को रजिस्टर कराने का आदेश दिया गया। उन्हें पुलिसिया लाइसेंस के बिना गाँव से बाहर कहीं भी जाने से प्रतिबंधित कर दिया गया।

ये लाइसेंस भी जिले के कुछ ही क्षेत्रों तक सीमित हुआ करता था। जब वो एक गाँव से दूर गाँव जाते थे तो रास्ते पर पड़ने वाली हर पुलिस चौकी पर उन्हें ये लाइसेंस दिखाने होते थे। रहने का गाँव बदलने के लिए भी पुलिस की अनुमति लेनी पड़ती थी। एक बार चेतावनी के बाद दोबारा अगर इन ‘आपराधिक जनजातीय समुदायों’ का कोई भी व्यक्ति बिना लाइसेंस के पाया जाता था तो उसे 3 साल तक की कड़ी जेल की सज़ा दिए जाने का प्रावधान था।

‘आपराधिक जनजाति अधिनियम’: क्या था इस अत्याचारी क़ानून में?

यहाँ तक कि इस क़ानून में ज़मींदारों तक को नहीं बख्शा गया था। उन पर जिम्मेदारी डाल दी गई कि वो ‘क्रिमिनल ट्राइब्स’ के लोगों को चिह्नित कर उनका रजिस्ट्रेशन करवाएँ और उन्हें ढूँढ कर भी निकालें। फिर बाद में इसे मद्रास प्रान्त में लागू करने की ओर सरकार बढ़ी, जहाँ घुमंतू जनजातियों के पक्ष में प्रान्त के अधिकारियों के होने के बावजूद उनकी एक न सुनी गई। 1876 में इसे बंगाल में लागू किया गया और उसके बाद इन जनजातियों को एक ‘आपराधिक गैंग’ ही घोषित कर दिया गया।

असल में ब्रिटिश सरकार की दमनकारी आर्थिक नीतियों ने इन जनजातियों के व्यापर को भी ठप्प कर दिया था। उनकी नमक वाली नीति से भी इन पर खासा दुष्प्रभाव पड़ा था। 1911 में इस क़ानून को पुलिस कमीशन की रिपोर्ट के बाद और सख्त कर दिया गया, जिसमें सिफारिश की गई थी कि पुलिस को इन जनजातियों के खिलाफ सख्ती के लिए और शक्तियाँ दी जाएँ। प्रांतीय सरकारों को भी ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम’ के तहत किसी भी जनजाति को ‘अपराधी’ घोषित करने की शक्ति दे दी गई।

इस क़ानून को लागू करने से पहले जिस ब्रिटिश अधिकारी टीवी स्टीफेंस ने पैरवी की थी, उसका तर्क भी काफी अजीब था। उसका कहना था कि भारत में एक जाति के लोग सदियों से एक ही प्रकार के कारोबार करते आ रहे हैं, जैसे बुनाई, शिल्पकारी और लोहार वाले काम। उसका कहना था कि इसी तरह से कुछ जनजातियाँ ज़रूर ऐसी हैं, जिनके लोग अपराध को ही अपना प्रोफेशन मानते हैं क्योंकि उनके बाप-दादा भी यही करते आ रहे थे।

अंग्रेजों का मानना था कि ये जनजाति समूहों के लोग भी सदियों से अपराध ही करते आ रहे हैं और आगे भी इनके वंशज गैर-क़ानूनी कार्य ही करते रहेंगे। इससे हुआ ये कि इन समुदायों में बच्चे का जन्म होते ही वो ‘जन्मजात अपराधी’ हो जाता था, बिना कुछ किए ही। लेकिन, 20वीं शताब्दी आते-आते अंग्रेजों ने सारी हदें पार कर दी। बच्चों को उनके परिवार और माता-पिता से दूर कर के कहीं और बसाया जाने लगा।

इस बसावट को ‘सुधार’ का नाम दिया गया। आज जब चीन के शिनजियांग में उइगर परिवार के बच्चों को उनके परिवार और क्षेत्र से शुरू में ही दूर कर दिया जाता है, ऐसे में हम सोच सकते हैं कि उस वक़्त अंग्रेज कैसे यह करते रहे होंगे। आगे कभी कोई विद्रोह ही न हो, इसके लिए इन लोगों के फिंगरप्रिंट्स तक ले लिए गए। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इसे सिविल लिबर्टी का हनन करार दिया था। ये था अंग्रेजों का अत्याचारी ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act, 1871)’।

ट्रांसजेंडर समुदाय को भी बना दिया गया अपराधी

इस क़ानून का सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव जिन लोगों पर पड़ा, उनमें ट्रांसजेंडर समुदाय के लोग भी शामिल थे। आज जब आधुनिकता के नाम पर अंग्रेज इसकी पैरवी करते नहीं थकते तो उन्हें अपना ये काला इतिहास भी याद करना चाहिए। इन्हें ‘Enunch’ समुदाय बता कर इनकी धर-पकड़ तेज़ कर दी गई। हालाँकि, आज़ादी के बाद मद्रास प्रान्त में तत्कालीन कम्युनिस्ट नेताओं ने इसका विरोध किया, जिसके बाद वहाँ इस क़ानून को रद्द किया गया।

1950 में एक समिति बना कर इसकी जाँच करने को कहा गया कि इस क़ानून की देश को ज़रूरत है भी या नहीं। जाँच में पाया गया कि ये पूरा का पूरा क़ानून ही भारतीय संविधान का उल्लंघन करता है। कई अन्य क़ानूनों के जरिए आदतन अपराधियों पर लगाम लगाने की कोशिश की गई लेकिन अंग्रेजों के ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act, 1871)’ का दंश ऐसा था कि वो समाज से और भी ज्यादा कट गए, अलग रहने लगे।

गरीबी तो थी ही, ऊपर से इनमें से कई समूहों को सालों तक एससी-एसटी समुदाय में भी नहीं गिना गया, जिससे इन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिल सके। आज जिस जाति-व्यवस्था या ‘ब्राह्मणों’ को अन्य जातियों से भेदभाव के लिए दोष दिया जाता है, उन्हें समझना चाहिए कि यही वो क़ानून था, जो अंग्रेजों का था, और जिसने जाति-समुदाय के आधार पर लोगों को जन्म से ही अपराधी घोषित करना शुरू कर दिया था। इससे बड़ा भेदभाव क्या होगा?

आज जब हम बिरसा मुंडा जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की पूजा करते हैं, एक समय था जब अंग्रेजों ने आदिवासियों को ही अपराधी घोषित कर डाला था। यहाँ तक कि सिखों के कुछ समूहों को भी आपराधिक जनजाति की श्रेणी में डाल दिया गया था। 1971 वाले क़ानून में प्रांतीय सरकारों को आज़ादी थी कि वो किसी भी जनजाति को गवर्नर जनरल से सिफारिश कर के उसे आपराधिक समूह घोषित करवा दे।

‘जन्मजात अपराधी’ के सिद्धांत वाला अंग्रेजों का काला कानून

प्रांतीय सरकारों से कहा गया कि वो इन जनजातीय समूहों के बारे में रिपोर्ट तैयार कर के भेजने के क्रम में ये भी बताएँ कि ये लोग अपना जीवन-यापन कैसे करते हैं। साथ ही न्यायिक व्यवस्था को इस पर सवाल उठाने नहीं दिए गए, जिससे जजों को इसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार ख़त्म हो गया। बताया गया कि इन समुदायों के लोग वहीं रह सकते हैं, जहाँ स्थानीय प्रशासन कहे। एसपी के पास रजिस्टर में इन लोगों के नाम होते थे, जिसकी सूचना मजिस्ट्रेट को देनी होती थी।

अंग्रेजों के ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम’ का एक अंश (साभार: कोलंबिया यूनिवर्सिटी)

अगर छोटी सी गलती भी हुई तो इसके लिए कम से कम 6 महीने की सजा के साथ-साथ जुर्माने का प्रावधान था। साथ ही गाँव के प्रधानों और जमींदारों को आदेश दिया गया कि वो घुमंतू जनजातियों के लोगों का सारा ब्यौरा सरकार को सौंपें और बताएँ कि वो लोग किसकी जमीन में कितने दिनों से रह रहे हैं। अगर वो ऐसा नहीं करते हैं तो उनके लिए भी सजा का प्रावधान किया गया। परिणाम ये हुआ कि अंग्रेजों के कारण जो सीधे-सादे लोग थे, उनमें भी आपराधिक प्रवृत्ति घर करने लगी।

आज भारत में 313 से भी अधिक घुमंतू जनजातियाँ हैं, जो आज भी अंग्रेजों के इस अत्याचार का दंश झेल रहे हैं। इन्हें समाज से इतना अलग-थलग कर दिया और इतना ज्यादा प्रताड़ित किया गया कि ये मुख्यधारा से ही अलग हो गए। लगभग 6 करोड़ लोग ऐसे हैं, जो इन जनजातीय समूहों का हिस्सा हैं। अंग्रेजों ने अपने उस क़ानून में मुस्लिम समुदाय को भी जोड़ा था, तभी ‘Caste’ की जगह ‘Tribes’ शब्द का इस्तेमाल कर खेल किया गया।

मुस्लिम परिवार की गर्भवती हिन्दू बहू और गोदभराई: Tanishq का नया ‘सेक्युलर’ वीडियो

शुक्रवार (अक्टूबर 9, 2020) को ‘तनिष्क ज्वेलरी’ का एक नया प्रचार वीडियो आया, जिसमें एक गर्भवती हिन्दू महिला की मुस्लिम परिवार में गोदभराई की रस्म दिखाई गई है। इस वीडियो में दिखाया गया है कि गहनों से लदी हुई एक महिला गोदभराई की रस्म के लिए तैयार हो रही है। जानने लायक बात ये है कि ‘तनिष्क ज्वेलरी’ की इस वीडियो में एक जिस जोड़े को दिखाया गया है, वो इंटरफेथ कपल होता है, अर्थात पति-पत्नी अलग-अलग धर्म के होते हैं।

‘लव जिहाद’ की कई खबरों के बीच आए इस वीडियो में महिला को पारम्परिक साड़ी, बिंदी और गहने पहने हुए दिखाया गया है। हालाँकि, उसके साथ परिवार में जो अन्य लोग हैं, वो मुस्लिम हैं। उसके साथ जो बुजुर्ग महिला दिख रही है, उसने बिंदी भी नहीं लगाई है। परिवार के लोग गहनों से लदी हिन्दू महिला को सरप्राइज के लिए बगीचे में लेकर जा रहे होते हैं। बैकग्राउंड में दीपमालाएँ हैं और नटराज की प्रतिमा भी है। मुस्लिम परिवार को एकदम ‘सहिष्णु’ दिखाने का प्रयास किया गया है।

साथ ही मुस्लिम परिवार का बुजुर्ग भी साज-सजावट में व्यस्त रहता है। बैकग्राउंड में एक महिला कहती है, “रिश्ते हैं कुछ नए-नए, धागे हैं कुछ कच्चे-पक्के। अपने बल से इन्हें सहलाएँगे, प्यार पिरोते जाएँगे। एक से दूजा सिरा जोड़ देंगे, एक बँधन बनते जाएँगे।” इस वीडियो में भरा-पूरा मुस्लिम परिवार दिखता है, जहाँ बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक गर्भवती महिला को सरप्राइज देने के लिए बगीचे में इन्तजार कर रहे हैं।

अंत में वो महिला अपनी सास से पूछती है, “ये रस्म तो आपके घर में होती भी नहीं है न?” इस पर उसकी सास उसे जवाब देती है, “पर बिटिया को खुश रखने की रस्म तो हर घर में होती है न?“इसके बाद ‘एक जो हुए हम, तो क्या ना कर जाएँगे।‘ के साथ इस वीडियो में ‘एकता’ की बात की गई है। हालाँकि, ध्यान देने वाली बात है कि इसमें दिखाया गया है कि एक हिन्दू महिला की मुस्लिम परिवार में शादी हुई है, जहाँ लोग उसे खासा प्यार कर रहे हैं।

विडम्बना देखिए कि ये वीडियो तब आया है, जब 19 साल के राहुल राजपूत को दिल्ली के आदर्श नगर में उसकी लड़की दोस्त के भाई मुहम्मद और अफरोज ने सिर्फ इसलिए मार डाला, क्योंकि दोनों आपस में प्यार करते थे। किशोरी ने बताया कि वो कहती रही कि राहुल की तबियत खराब है, उसे मत मारो – लेकिन वो उसे पीटते रहे। किशोरी ने बताया कि उसके भाइयों ने उसकी एक न सुनी। राहुल को धोखे से मिलने के लिए उसके भाइयों द्वारा बुलाया गया था।

हालाँकि, प्रचार वीडियोज में इस तरह की चीजें दिखाना कोई नई बात नहीं है। इसी तरह ‘सर्फ एक्सेल’ के ‘रंग लाए संग’ इस टैग लाइन से जारी किए गए विज्ञापन में हिन्दू-मुस्लिम सेंटीमेंट उछालने की कोशिश की गई थी। इसकी आड़ में बच्चों के कोमल मन में भी ज़हर बोने का सुनियोजित प्रयास किया गया था। इस वीडियो में हिन्दू बच्ची अपने साइकिल के पीछे बैठाकर मस्जिद छोड़ने जाती है। शबाना आजमी ने इस वीडियो में अपनी आवाज़ भी दी थी।

‘बेहूदगी है मिर्जापुर का विरोध, हमें फर्क नहीं पड़ता’: ‘मुन्ना त्रिपाठी’ ने कहा – ‘बाहर निकल कर मत बोल देना, बहुत पड़ेगी’

‘मिर्जापुर’ सीरीज का दूसरा भाग रिलीज होने वाला है और इसे बॉयकॉट करने की अपील की जा रही है। सोशल मीडिया पर अली फजल के बयानों को लेकर इस शो के बॉयकॉट की माँग हो रही है क्योंकि उन्होंने दिल्ली दंगों को लेकर विवादित बयान दिए थे। अब शो में ‘मुन्ना त्रिपाठी’ का किरदार निभाने वाले दिव्येंदु ने कहा है कि ऐसे ट्रेंड्स से इस शो के कास्ट्स, क्रू और फैंस को कोई फर्क नहीं पड़ता है।

उन्होंने कहा कि ‘मिर्जापुर’ शो के बॉयकॉट को लेकर चल रहे अभियान से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है। उन्होंने कहा कि ये कोई दिक्कत वाली बात नहीं है क्योंकि ‘मिर्जापुर’ के काफी फैंस हैं। उन्होंने कहा कि लोगों को इस तरह की ‘बेहूदगी’ नहीं करनी चाहिए। उन्होंने बॉयकॉट की अपील को ‘पेड ट्रेंड्स’ करार दिया और कहा कि वो ‘ऐसे लोगों के दर्द को’ महसूस करते हैं। उन्होंने दावा किया कि लोग ‘मिर्जापुर’ को काफी प्यार करते हैं।

इसके बाद उन्होंने डायलॉग बोलते हुए कहा, “बाहर निकल के मत बोल देना लोगों के सामने.. बहुत पड़ेगी।” उन्होंने ‘मिर्जापुर’ के बारे में कहा कि इसकी शूटिंग करना उनके लिए काफी अच्छा अनुभव रहा, जिसे वो शब्दों में बयान नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि वो उत्तर प्रदेश में जहाँ भी जाते हैं, वहाँ लोग उन्हें ‘मुन्ना भइया’ कह कर पुकारते हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें जितना प्यार और प्रसिद्धि मिल रही है, उससे वो खासे खुश हैं।

वहीं शो में अहम किरदार निभाने वाले अली फज़ल ने अपने बयान में कहा था, “हमें तय करना होगा कि हम किस तरफ खड़े हैं? क्या हम किसी ट्रेंड की दया पर टिके हुए हैं? नहीं, मैं कला को उस नज़रिए से नहीं देखता हूँ। हम केवल एक ऐप की दया पर निर्भर हैं, जिससे तय होता है कि कौन हमारा शो देखेगा और कौन नहीं। इसका मतलब यह बहुत नीचे गिर चुका है। मेरा मतलब है कि अगर आप ट्रेंड की बात करते हैं तो मैंने कभी किसानों के लिए कोई ट्रेंड नहीं देखा, जो पूरे देश में आंदोलन कर रहे हैं।“

हाल ही में मिर्ज़ापुर 2 का ट्रेलर आया था, जिसके बाद से इसकी चर्चा जारी है। इसके अलावा वेब सीरीज़ शुरुआत से ही विवादों में घिरी हुई है। आगामी 23 अक्टूबर को मिर्ज़ापुर 2 अमेज़न प्राइम पर स्ट्रीम होगी। इस वेब सीरीज़ में पंकज त्रिपाठी, रसिका दुग्गल, विजय वर्मा, कुलभूषण खरबंदा, श्वेता त्रिपाठी, राजेश तैलंग, हर्षिता गौड़, लिलीपुट और मेघना मलिक समेत अन्य कलाकार नज़र आएँगे। हालाँकि, इसका विरोध भी खूब हो रहा है।

‘अल्लाह करे कि चीन की ताकत से हम अनुच्छेद 370 को वापस लाने में सफल हों’: फारूक अब्दुल्लाह

जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्लाह ने ‘लाइन ऑफ एक्चुअल कण्ट्रोल (LAC)’ पर चीन के आक्रामक रवैये के लिए भारत सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के फैसले को जिम्मेदार बताया है। ‘नेशनल कॉन्फ्रेंस’ के अध्यक्ष ने कहा कि चीन ने कभी भी अनुच्छेद 370 को लेकर भारत सरकार के फैसले को स्वीकार नहीं किया है। साथ ही उन्होंने उम्मीद जताई कि चीन की मदद से फिर से अनुच्छेद 370 को वापस लाया जा सकेगा।

‘इंडिया टुडे’ से बात करते हुए फारूक अब्दुल्लाह ने कहा कि LAC पर जो भी हो रहा है, वो अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के कारण हो रहा है क्योंकि चीन ने इस फैसले को कभी स्वीकार नहीं किया है। उन्होंने कहा कि वो इस बात को लेकर आशावान हैं कि चीन की मदद से अनुच्छेद 370 वापस आएगा। फारूक अब्दुल्लाह ने कहा कि उन्होंने कभी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को आमंत्रित नहीं किया लेकिन पीएम ने उन्हें आमंत्रित कर उनके साथ गुजरात में ‘झूला सवारी’ की।

उन्होंने कहा कि भारत सरकार ने अगस्त 5, 2019 को जो भी किया, वो अस्वीकार्य था। बता दें कि इसी दिन संसद में इससे जुड़े बिल को पास कराया गया था। उन्होंने दावा किया कि उन्हें जम्मू कश्मीर की समस्याओं पर संसद में भी बोलने की अनुमति नहीं दी गई। बता दें कि इस अनुच्छेद के कारण जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा मिला था, जिससे वहाँ का अलग संविधान और पैनल कोड चलता था।

फारूक अब्दुल्लाह ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन के राष्ट्रपति को लेकर चेन्नई गए और उन्हें खाना खिलाया। बकौल फारूक अब्दुल्लाह, चीन ने कहा है कि जब तक अनुच्छेद 370 को वापस नहीं लाया जाता, वो नहीं रुकेंगे, क्योंकि ये अब एक खुला मुद्दा बन गया है। उन्होंने कामना की, “अल्लाह की मर्जी से हमारे लोगों को चीन की ताकत का फायदा मिले, जिससे हम अनुच्छेद 370 और 35A को वापस लाने में सफल हों।“

बता दें कि फारूक अब्दुल्लाह और उनके बेटे उमर अब्दुल्लाह सहित कई कश्मीरी नेताओं और अलगाववादियों को अनुच्छेद 370 पर भारत सरकार के फैसले के साथ ही नजरबन्द कर दिया गया था। इसी साल मार्च में इन दोनों को रिहा किया गया है, जिसके बाद वो घूम-घूम कर इसके खिलाफ माहौल बनाने में लगे हुए हैं। भारत-चीन के बीच 5 महीने से चल रहे तनाव के दौरान अब्दुल्लाह ने ऐसा बयान दिया है।

इससे पहले उन्होंने उन्होंने कहा था कि पिछले साल मोदी सरकार ने जो किया, वह ताबूत में आखिरी कील था। उनका कहना था कि कश्मीर के लोग इस बात से खुश हैं कि चीन भारत पर हावी हो रहा है, वो चाहते हैं कि चीन भारत पर कब्जा कर ले। उन्होंने दावा किया कि कश्मीर के लोग खुद को न तो भारतीय मानते हैं और न ही भारत के साथ रहना चाहते हैं। वो कई दिनों से चीन के गुणगान में लगे हुए हैं।

मंदिर में छेड़खानी, मस्जिद मतलब शांति: सलीम-जावेद का रामगढ़, जहाँ ‘रहीम चाचा’ ही एकलौते बेदाग मानुष

भारतीय फिल्म इंडस्ट्री को ऐसी फ़िल्में बनाने के लिए जाना जाता है, जिनमें हिन्दुओं की भावनाओं का तो मजाक उड़ाया ही जाता है, साथ ही इसमें इस्लाम के गुणगान और मुस्लिमों को अच्छे से अच्छा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती। खैर, किसी को अच्छा दिखाने से कोई समस्या न भी हो तो किसी की भावनाओं से खेलना, बार-बार खेलना, निंदा का विषय तो है ही। आज जिस फिल्म की हम बात करने जा रहे हैं, उसका नाम है – ‘शोले’। सलीम-जावेद की लिखी फिल्म ‘शोले’।

जी हाँ, 1975 में आई रमेश सिप्पी की फिल्म ‘शोले’, जिसकी कहानी सलीम-जावेद ने लिखी थी। सलीम खान, सलमान खान के पिता। और जावेद अख्तर के परिचय की कोई ज़रूरत ही नहीं है क्योंकि वो आजकल सोशल मीडिया पर लड़ाई-झगड़ा करने के लिए अच्छे-खासे कुख्यात हो चुके हैं। बॉलीवुड में ‘लुटेरा बनिया, चुगलखोर ब्राह्मण, अच्छा मुस्लिम और गद्दार हिन्दू’ जैसी परिभाषाएँ इन्हीं दोनों की देन है।

कई बार सलीम-जावेद कह भी चुके हैं कि ‘शोले’ में अमजद खान से अच्छा ‘गब्बर सिंह’ का किरदार कोई नहीं निभा पाता। ऐसा लगता भी है कि इस फिल्म के किरदारों में अमजद खान के कैरेक्टर के लिए कहानी में ज्यादा मेहनत की गई है। कहा जाता है कि वो एक बार में ही इस रोल के लिए सलीम-जावेद को पसंद आ गए थे। खैर, किरदारों का तुलनात्मक अध्ययन हम करेंगे लेकिन उससे पहले फिल्म में दिखाई गई कुछ और चीजें हैं, जिन्हें हमें जानना चाहिए।

रामगढ़ गाँव का सबसे अच्छा, सबसे सच्चा व्यक्ति: मौलवी रहीम चाचा

‘शोले’ फिल्म में अगर कोई एक ऐसा किरदार है, जिस में सिर्फ अच्छाइयाँ ही अच्छाइयाँ हैं और एक भी दाग नहीं है, तो वो है रामगढ़ की मस्जिद के मौलवी, जिन्हें लोग ‘रहीम चाचा’ के नाम से जानते हैं। ‘रहीम चाचा’ सबसे शांत, सौम्य और सरल स्वभाव के हैं। जो भी मिलता है, उस पर प्यार बरसाते हैं। पूरा गाँव उनकी हद से ज्यादा इज्जत करता है। सब उनकी बात मानते हैं और ‘रहीम चाचा’ की सभी मदद भी करते हैं।

70 के दशक की फिल्मों में जहाँ एक तरफ ‘हरे कृष्णा, हरे राम’ के नाम पर लूटने के किस्से दिखाए जा रहे थे, वहीं दूसरी तरफ मौलवियों का ऐसा चित्रण हो रहा था – जैसे भारत के गाँवों में सबसे अच्छे वही हों। ‘रहीम चाचा’ की एंट्री वाले दृश्य में ही दर्शा दिया गया है कि सारे गाँव वाले उनकी कितनी इज्जत करते हैं। वो बसंती से कहते हैं कि हमेशा कोई न कोई उन्हें छोड़ने के लिए आ ही जाता है। इससे बताया गया है कि गाँव में सबसे ज्यादा सम्मान ‘रहीम चाचा’ का ही है।

‘शोले’ फिल्म में ‘रहीम चाचा’ का चित्रण ऐसा है, जिससे किसी भी मौलवियों से सहज ही प्रेम हो जाए और उनके लिए मन में सम्मान की भावना अपने-आप ही आ जाए। इस चित्रण को और अच्छे से समझने के लिए हमें उस दृश्य को देखना पड़ेगा, जिसमें ‘रहीम चाचा’ के बेटे अहमद की लाश के पास सारे ग्रामीण खड़े हैं। अहमद अपने मामा के यहाँ बीड़ी की फैक्ट्री में कमाने जाता रहता है, तभी ‘गब्बर सिंह’ उसे मार डालता है और घोड़े के साथ उसकी लाश गाँव में भेजता है।

इस दृश्य को सिर्फ ‘इतना सन्नाटा क्यों है भाई‘ वाले डायलॉग के लिए ही याद रखा गया है लेकिन इसमें गौर करने लायक और भी बहुत कुछ है। यहाँ ‘रहीम चाचा’ पूरे गाँव में देशभक्त बन कर उभरते हैं और ‘इज्जत की मौत जिल्लत की ज़िंदगी से कहीं अच्छी है‘ जैसे डायलॉग बोलते हुए अफ़सोस जताते हैं कि उनके दो-चार और बेटे होते, जिन्हें वो ‘गाँव के लिए शहीद’ कर देते। यहाँ जय-वीरू के सबसे बड़े ‘Saviour’ वही हैं – ‘रहीम चाचा’।

सबसे बड़ी बात तो ये है कि यहाँ गाँव वाले उस ठाकुर तक से लड़ते हैं, जिसके दो बेटे, एक बहू और एक पोते को ‘गब्बर सिंह’ ने मार डाला है लेकिन उस मौलवी की बात को वो सर-आँखों पर रखते हैं, जिसके एक बेटे की हत्या हो गई है। ये अंतर ही बॉलीवुड की सच्चाई है। साथ ही बैकग्राउंड में लगातार बजती नमाज की आवाज़ और समय होते ही बेटे की लाश छोड़ कर ‘रहीम चाचा’ का नमाज के लिए जाना – गाँव के सबसे ‘अच्छे व्यक्ति’ यहाँ मौलवी साहब ही हैं।

सलीम-जावेद की ‘शोले’: मंदिर मतलब छेड़छाड़, होली मतलब छेड़छाड़

जहाँ एक तरफ ‘रहीम चाचा’ सबसे अच्छे व्यक्ति हैं और मस्जिद सबसे पवित्र जगह, गाँव का शिव मंदिर किसी भी नौटंकी के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। बसंती बताती है कि वो मौसी के कहने से हर सोमवार शिवजी की पूजा करने जाती है, जिससे उसे अच्छा पति मिलेगा। अब इस पर तंज कसते हुए इसे अन्धविश्वास की तरह प्रदर्शित किया गया है या आस्था की तरह, ये तो नहीं पता। लेकिन, इतना ज़रूर है कि मंदिर को ‘लड़की पटाने’ के लिए उपयुक्त जगह बताया गया है।

अगस्त 2014 में अपने पिता और दिवंगत प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की 70वीं जयंती पर राहुल गाँधी ने हिंदुत्व और मंदिरों को महिलाओं के साथ होने वाली छेड़छाड़ के साथ जोड़ा था। ये अचानक नहीं था। बॉलीवुड में सलीम-जावेद जैसों ने ऐसे नैरेटिव बनाने के लिए खासी मेहनत की है। ‘शोले’ भी इसका एक उदाहरण है। ‘बसंती’ के पीछे-पीछे धर्मेंद्र भी पहुँच जाते हैं मंदिर और अपनी टाँगें भगवान शिव की प्रतिमा पर टिका कर पीछे खड़े हो जाते हैं।

मंदिर में शिव प्रतिमा के पीछे खड़े होकर हीरो लड़की के साथ छेड़खानी करता है और लड़की को भी लगता है कि भगवान शिव ही बोल रहे हैं। वो तो भला हो ‘जय’ का, जो समय रहते ‘बसंती’ के सामने इसका खुलासा कर देता है। मंदिरों को इसी तरह की नाटक-नौटंकियों की जगह दिखाने का चलन रहा है, जहाँ जाकर नायक चिल्लाता है। वहीं दरगाह पर जाते ही शांति छा जाती है, लोगों के सिर झुक जाते हैं। ये नैरेटिव बॉलीवुड में कब से चला आ रहा है।

मंदिर तो छेड़छाड़ के लिए ही बने होते हैं: ‘शोले’ फिल्म का दृश्य

अब आते हैं होली पर। आजकल तो होली पर ‘सीमेन भरे बैलून्स’ के भी अफवाह फैला दिए जाते हैं। होली को ‘Regressive’ त्यौहार कहा जाता है। असल में बॉलीवुड के गानों ने ही इन चीजों का सामान्यीकरण किया है। सलीम-जावेद की लिखी फिल्म ‘शोले’ में ‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं‘ गाने में मौलवी साहब भी बड़े प्रेम से बैठ कर रंगों का कार्यक्रम देखते रहते हैं। लेकिन, इस गाने का लिरिक्स या बोल जो है, वो भी गौर करने लायक है।

जारे जा दीवाने तू होली के बहाने तू छेड़ ना मुझे बेसरम पूछ ले ज़माने से ऐसे ही बहाने से लिए और दिए दिल जाते हैं

जा रे जा दीवाने तू होली के बहाने तू
जा रे जा दीवाने तू होली के बहाने तू
छेड़ ना मुझे बेशरम
पूछ ले ज़माने से ऐसे ही
बहाने से लिए और दिए दिल जाते हैं

इस गाने के बोल 40 बार फिल्मफेयर के लिए नॉमिनेट होने वाले आनंद बख्शी ने लिखा है। इसका सीधा अर्थ है कि होली मतलब छेड़छाड़, होली के बहाने ही ‘ऐसी-वैसी’ चीजें दी जा सकती है। ‘होली के बहाने छेड़छाड़‘ वाले इस नैरेटिव को काफी फिल्मों में प्रयोग किया गया है। इसी का बड़ा रूप आज हम ‘सीमेन भरे बैलून्स’ वाले अफवाह के रूप में देखते हैं। होली जैसे हिन्दू त्योहारों को बदनाम किया जाना तभी से चल रहा है।

लाचार ठाकुर, जो अपनी रक्षा भी नहीं कर सकता

एक और चीज जो इस फिल्म में गौर करने लायक है, वो है ठाकुर का चित्रण। ठाकुर में कोई गड़बड़ी नहीं है लेकिन व इतना असहाय है कि वो खुद की रक्षा नहीं कर सकता, तो ग्रामीणों की रक्षा क्या करेगा। ठाकुर जमींदार है, पुलिस अधिकारी है, गाँव में उसका प्रभाव है – लेकिन उसके पूरे परिवार को मौत की नींद सुला दिए जाने के बावजूद ग्रामीणों को उतना दुःख नहीं होता, जितना ‘रहीम चाचा’ के बेटे की मौत के बाद।

‘शोले’ ने इस नैरेटिव को आगे बढ़ाने में सफलता पाई है कि ‘ठाकुर तो अपना भी नहीं धो सकता’ तो वो गाँव वालों की रक्षा क्या करेगा? लाचार ठाकुर को चोर-बदमाशों की ज़रूरत पड़ती है, ताकि वो अपने खिलाफ हुए अत्याचार का बदला ले सके। कहते हैं कि ‘शोले’ के अंत में ठाकुर ने ‘गब्बर सिंह’ को मार डाला था लेकिन एंडिंग बदल कर उसके न्यायप्रिय होने के कारण दिखाया गया कि ठाकुर क़ानून अपने हाथ में नहीं ले सकता।

अधिकतर चीजें हॉलीवुड के ‘वेस्टर्न जॉनर’ की फिल्मों से उठा कर उसमें अच्छे ‘रहीम चाचा’ और ‘मंदिर व हिन्दू त्योहारों में महिलाओं से छेड़छाड़’ वाला एंगल जोड़ते ही वो सलीम-जावेद की फिल्म ‘शोले’ बन जाती है। अमिताभ बच्चन ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन द वेस्ट’ (1968) के चार्ल्स ब्रॉन्सन की तरह माउथ ऑर्गन बजाते हैं, ‘गब्बर सिंह’ का पूरा किरदार और हावभाव ही ‘फॉर अ फ्यू डॉलर्स मोर’ (1965) में जायन मरिया वोलोंटे के किरदार से प्रेरित है।

जब सलीम खान और जावेद अख्तर जैसे लोगों का प्रभाव हो तो फ़िल्में ऐसी ही बनती हैं। तब भारत में विदेशी फ़िल्में नहीं देखी जाती थीं, लोगों के पास इंटरनेट नहीं थे कि वो तुरंत हॉलीवुड फ़िल्में डाउनलोड कर के देख लें – इसका इन दोनों ने खूब फायदा उठाया। कई अन्य फ़िल्में हैं, जिनमें इन दोनों ने हिन्दूफ़ोबिया को आगे बढ़ाया है, जिनकी बात हम इसी सीरीज की अगली कड़ी में करेंगे। बता दें कि अमजद खान ‘शोले’ के बाद इस स्तर का कोई परफॉरमेंस नहीं दे पाए।

जिंदा साधु को ‘मार डाला’ कॉन्ग्रेसी नेता ने, राजनीति के नाम पर फैलाया झूठ

उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के इटियाथोक थानांतर्गत तिर्रे मनोरमा में राम जानकी मंदिर के पुजारी अतुल बाबा उर्फ सम्राट दास को जमीनी विवाद के कारण गोली मार दी गई। घटना शनिवार (अक्टूबर 10, 2020) देर रात करीब 2 बजे घटी। बदमाशों ने जब पुजारी पर हमला किया, उस वक्त वह गहरी नींद में थे। 

मीडिया रिपोर्ट्स में उनकी हालत गंभीर बताई जा रही है। वहीं, सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आई है, जिसमें वह बात करते नजर आ रहे हैं। इस बीच इस पूरे मामले पर कॉन्ग्रेस का फर्जी चेहरा दोबारा उजागर हुआ है।

जी हाँ, कॉन्ग्रेस के महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला ने ट्विटर पर दावा किया है कि गुंडों ने पुजारी की हत्या कर दी है और साथ में लिखा है कि काश हिंदी मडिया के चैनल राजस्थान की तरह यूपी में भी जवाबदेही माँगते।

उन्होंने लिखा, “अब गोंडा, यूपी में मंदिर के पुजारी संत सम्राट दास की गुंडों ने की सरे आम हत्या। काश हिंदी मीडिया के चैनल और साथी राजस्थान की तरह यहाँ भी जबाबदेही माँगते। ओह! भूल हो गई !!! आदित्यनाथ व भाजपा से जबाब माँगना मना है।”

गौरतलब है कि एक ओर जहाँ खबरों में बताया जा रहा है कि हालत गंभीर होने के कारण पुजारी सम्राट दास को जिला अस्पताल से लखनऊ रेफर किया गया है। वहीं उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री के सूचना सलाहकार शलभ मणि त्रिपाठी का दावा है कि सम्राट दास की स्थिति स्थिर है। 

त्रिपाठी ने सुरजेवाला के झूठ की पोल खोलते हुए कल रात 10 बजे पुजारी की वीडियो शेयर की। उन्होंने लिखा, “कॉन्ग्रेस फेक न्यूज की फ़ैक्टरी है,आप जिनकी हत्या की बात कर रहे हैं, वे संत जी पूरी तरह स्वस्थ हैं। शरीर पर मामूली चोट है। वे पुलिस कार्रवाई से पूरी तरह संतुष्ट हैं। ज़मीनी रंजिश में जिन लोगों ने हमला किया, वे गिरफ़्तार हो चुके हैं, पर आपको तो झूठ फैलाना है,अपने कुकर्म ढँकने के लिए !!”

इसके अलावा गोंडा पुलिस ने भी रणदीप सुरजेवाला के ट्वीट पर वास्तविक स्थिति बताई है। ये ट्वीट 14 घंटे पुराना है। पुलिस ने बताया कि शिकायत के आधार पर 2 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है और उनसे पूछताछ भी चल रही है। पुलिस ने पुजारी की स्थिति अवगत कराते हुए कहा कि उनका इलाज केजीएमयू लखनऊ में चल रहा है, जहाँ पर स्थिति सामान्य है। पुलिस ने बताया कि टीमें गठित करके अन्य आरोपितों की गिरफ्तारी का प्रयास चल रहा है।

बता दें कि कॉन्ग्रेस के झूठ की पोल खुलने के बाद रणदीप सुरजेवाला के खिलाफ़ एक्शन लेने की माँग की जा रही है। पुजारी की वीडियो शेयर करके कहा जा रहा है, “रणदीप सुरजेवाला ने बिन जानकारी कहा कि उनकी हत्या हो गई है। कॉन्ग्रेस वालों सौ बार झूठ बोलने से सच्चाई नहीं बदल जाती।” वहीं एक दूसरे ट्विटर यूजर का कहना है कि डॉक्टरों ने संत को खतरे से बाहर बताया है। उनका इलाज केजीएमयू अस्पताल में चल रहा है।

क्या है पूरा मामला?

उत्तरप्रदेश की पौराणिक नदी मनोरमा के उद्गम स्थल तिर्रे मनोरमा में राम जानकी मंदिर के पास 120 बीघे भूमि है। पूरा विवाद इसी को लेकर था। बताया जा रहा है कि इस भूमि की आय मंदिर को मिलती है और अतुल बाबा उर्फ सम्राट दास यहाँ के मुख्य पुजारी हैं जबकि मंदिर के महंथ सीताराम दास हैं। 

घटना वाली रात पुजारी सम्राट दास मंदिर के भीतर सोए हुए थे और महंथ बाहर सो रहे थे। तभी करीब 2 बजे अंदर सोए पुजारी सम्राट दास को कुछ लोगों ने मंदिर के भीतर घुसकर गोली मार दी। गोली की आवाज सुनकर महंथ उठे और शोर मचाने लगे।

इसके बाद गाँव के लोग इकट्ठा होना शुरू हुए, मगर तभी सभी आरोपित मौके से फरार हो गए। खून से लथपथ देख पुजारी सम्राट दास को घायल अवस्था में जिला अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उनके सीने में गोली लगने से उनकी हालत काफी बिगड़ गई और उन्हें लखनऊ रेफर कर दिया गया। 

महंथ सीताराम दास का कहना है कि दबंगों ने मंदिर की जमीन कब्जाने के लिए पुजारी को गोली मारी है। प्रधान अमर सिंह समेत कई लोगों पर महंथ ने हमला करने का आरोप लगाया है। पुलिस के आलाधिकारी मामले की जाँच पड़ताल कर रहे हैं व बाकी आरोपितों की तलाश भी जारी है।

ताजा अपडेट के मुताबिक, इस पूरे केस में कोतवाल संदीप सिंह को लाइन हाजिर किया गया है और उनका कार्यभार संदीप दुबे को सौंपा गया है। संदीप सिंह पर कार्रवाई, पूरे मामले में लापरवाही बरतने के कारण हुई है। कहा जा रहा है कि उन्हें मंदिर के महंथ ने पहले ही सूचना दी थी कि कुछ लोगों ने मंदिर के पास बम फोड़ा है। हालाँकि, संदीप सिंह ने उनकी सुनने की बजाय इस बात से इंकार कर दिया कि कोई बम नहीं फूटा। इसके बाद पुजारी को गोली मारने की घटना हो गई।

पालघर, राजस्थान, या दिल्ली.. हिन्दुओं की हत्या पर खबरों से ‘हिन्दू’ क्यों गायब कर देता है पत्रकारिता का समुदाय विशेष

हाल ही में देश की राजधानी में ऑनर किलिंग का मामला सामने आया। मोहम्मद अफरोज और मोहम्मद राज ने अपने साथियों के साथ मिलकर 18 साल के राहुल की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। आरोपित अफरोज को अपनी 16 साल की नाबालिग बहन के एक हिन्दू युवक राहुल के साथ प्रेम प्रसंग से आपत्ति थी। इस पर तमाम समाचार समूहों ने ख़बर प्रकाशित की इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडिया टुडे लेकिन इन समाचार समूहों ने ख़बर के मूल तथ्यों को सामने नहीं रखा। न तो आरोपितों की पहचान को आगे रखा, न ही हत्या की असल वजह को और न मृतक की पहचान को। 

यह सिलसिला नया नहीं है, बीते कुछ समय में इन दिग्गज समाचार समूहों की मज़हबी पत्रकारिता का रवैया कुछ ऐसा ही रहा है। तथ्य खुद में कितना हास्यास्पद है कि जब एक अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्ति की हत्या होती है, तब सारे मीडिया संस्थान हर ज़रूरी/गैर ज़रूरी तथ्य को आगे रखते हैं (भले उससे कितना ही सौहार्द क्यों न बिगड़े)। 

दिल्ली की इसी घटना पर इंडिया टुडे ने ख़बर प्रकाशित की, ख़बर के शीर्षक में ही बताया गया कि वह दिल्ली विश्वविद्यालय का छात्र था। उसकी पीट पीट कर हत्या कर दी गई, इसकी वजह थी एक लड़की से दोस्ती। यहाँ न तो यह बताया गया कि लड़का हिन्दू था और न ही ये बताया गया कि लड़की और उसके हत्यारे भाई का मज़हब क्या था। वहीं दूसरी तरफ 2019 के जून महीने में झारखंड स्थित खारसवान जिले में भीड़ ने एक युवक को बुरी तरह पीटा तब इंडिया टुडे की ख़बर के शीर्षक में उसका मज़हब भी था और पिटाई की तथा कथित वजह भी। 

पत्रकारिता का ऐसा ही मज़हबी नज़रिया पेश किया इंडियन एक्सप्रेस ने। दिल्ली में 18 साल के छात्र (हिन्दू छात्र) की हत्या के मामले में इंडियन एक्सप्रेस ने ख़बर प्रकाशित की। इनके शीर्षक में उस लड़के को छात्र तक नहीं बताया गया था और वजह के लिए शीर्षक में लिखा गया ‘killed over woman’ यानी महिला की वजह से हत्या। महिला कौन थी? हत्या करने वाले कौन थे? हत्या का असल कारण क्या था? कुछ नहीं! जब साल 2018 के अप्रैल महीने में झारखंड के गुमला जिले स्थित सोसो गाँव में एक युवक की तीन युवकों ने हत्या कर दी थी तब इंडियन एक्सप्रेस ने शीर्षक में ही मज़हब बता दिया। इसके अलावा कारण भी बताया कि एक नाबालिग लड़की से रिश्ते के चलते अन्य मज़हब के युवक की हत्या। 

दिल्ली में 18 साल के छात्र (हिन्दू छात्र) की हत्या पर कुछ इस शैली में ही तथ्य पेश किए हिन्दुस्तान टाइम्स ने। हिन्दुस्तान टाइम्स ने ख़बर के शीर्षक में बताया कि उसकी हत्या लड़की के परिजनों ने की जिससे उसका सम्बंध था। लेकिन यहाँ भी दो मूल तथ्य नहीं बताए गए कि हत्या करने वाले कौन थे और उनका मज़हब क्या था? ठीक इसी तरह की एक घटना साल 2018 के मई महीने में राजस्थान के बीकानेर ज़िले में हुई थी, तब हिन्दुस्तान टाइम्स ने पूरी जानकारी शीर्षक में ही दे दी। शीर्षक में मरने वाले युवक का मज़हब बताया गया, मारने वालों का धर्म बताया गया और यहाँ तक कि वजह भी बता दी गई।    

कुछ इस मिजाज़ की ही एक घटना साल 2018 की शुरुआत में हुई थी जिसमें अंकित सक्सेना नाम के 23 वर्षीय युवक और पेशे से फोटोग्राफर की बीच सड़क पर हत्या कर दी गई थी। वजह, क्योंकि उसकी दूसरे मज़हब की लड़की से बात होती थी। हत्या करने वाले कौन थे? जिस लड़की से बात होती उसके परिवार वाले लेकिन इंडिया टुडे की ख़बरों के शीर्षक से इस तरह की हर ज़रूरी बात नदारद थी। बल्कि इंडिया टुडे ने इस ख़बर को ‘घटना से जुड़ी 10 बातें’ या ‘10 बिंदुओं की मदद से घटना को जानें’ बना दिया था। अन्य मीडिया संस्थानों, चाहे वह हिन्दुस्तान टाइम्स (जिन्होंने ख़बर के शीर्षक में बस सक्सेना लिख कर काम चला लिया) हो या इंडियन एक्सप्रेस, एक ने अंकित सक्सेना को फोटोग्राफर बता कर ज़िम्मेदारी पूरी कर दी। किसी ने भी शीर्षक में घटना से जुड़ी बुनियादी जानकारी नहीं रखी। 

आपको चंदन गुप्ता नाम का युवक भी याद ही होगा, जिसकी 26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस के दिन ‘तिरंगा यात्रा’ निकालने के दौरान हत्या कर दी गई थी। इस मामले में भी तमाम समाचार समूहों ने ख़बरें प्रकाशित की लेकिन किसी ने भी तथ्यों को स्पष्ट रूप से रखने का प्रयास नहीं किया। उन्होंने अन्य ख़बरों की तरह शीर्षक में नहीं बताया कि हत्यारों का मज़हब क्या था? जो आरोपित गिरफ्तार किए गए उनका नाम क्या था? वह कौन थे? 

चाहे इंडियन एक्सप्रेस हो, इंडिया टुडे हो या हिन्दुस्तान टाइम्स हो। सभी ने बस 5 W 1 H की ज़िम्मेदारी पूरी कर दी। ख़बरें परोसने की यह पूरी प्रक्रिया कितनी अफ़सोसजनक है, सिर्फ अफ़सोस जनक ही नहीं भयावह भी। हमें दंगे होने पर उन्हें भीड़ का धर्म नज़र आता है लेकिन भीड़ का मज़हब नज़र नहीं आता है। धर्म निरपेक्षता की कीमत कितनी महँगी होती है। धीरे – धीरे लोग इसकी भेंट चढ़ जाते हैं, कितना विचित्र है? हत्या करने वाले व्यक्ति का धर्म हो सकता है लेकिन हत्या करने वाले का मज़हब नहीं होता है। 

टिकट नहीं मिला.. निराश क्यों? बिहार चुनाव में वामदल CPI के स्टार प्रचारक बनेंगे कन्हैया कुमार-आइशी घोष

बिहार विधानसभा चुनाव की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है। वैसे-वैसे सूबे में सियासी पारा चढ़ता जा रहा है। सभी राजनीतिक पार्टियों ने चुनाव के लिए अपनी कमर कस ली है और अपने पार्टी के स्टार प्रचारकों को मैदान में उतारना शुरू कर दिया है। जेएनयू के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष और सीपीआई नेता कन्हैया कुमार भी बिहार चुनाव में प्रचार करते हुए नजर आएँगे। जानकारी के मुताबिक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने साफ कर दिया है कि कन्हैया कुमार महागठबंधन के चुनावी अभियान में शरीक होंगे।

बिहार के चुनावी मैदान में इस बार छात्र नेता भी अपना रण कौशल दिखाने वाले हैं। प्राप्त जानकारी के मुताबिक जेएनयू और दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र नेताओं बिहार चुनाव में सक्रिय भूमिका निभाने जा रहे हैं। खबरों के अनुसार जेएनयू के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष और सीपीआई नेता कन्हैया कुमार और वर्तमान अध्यक्ष आइशी घोष भी बिहार चुनाव में प्रचार करने जा रहे हैं। ऐसा कयास भी लगाया जा रहा है कि राजद नेता तेजस्वी यादव और कन्हैया कुमार चुनाव प्रचार के लिए एक मंच पर साथ भी दिख सकते हैं।

लोकसभा चुनाव के दौरान बिहार से सबसे ज्यादा एक बेगूसराय लोकसभा सीट की चर्चा हुई थी। मीडिया का फोकस भी इसी सीट पर था। यहाँ से सीपीआई ने अपने स्टार नेता कन्हैया कुमार को उम्मीदवार बनाया था। कन्हैया मुकाबला बेगूसराय में बीजेपी के फायर ब्रांड नेता गिरिराज सिंह से थे। कन्हैया को जीत दिलाने के जेएनयू के उनके साथी और गुजरात से विधायक जिग्नेश मेवानी समेत तमाम दिग्गज नेताओं ने ताकत झोंक दी थी। लेकिन नतीजे उनके पक्ष में नहीं आए।

2019 में जिस तरीके से कन्हैया कुमार ने एंट्री की थी। उससे लग रहा था कि वह बिहार की राजनीति में एक्टिव रहेंगे। जेएनयू विवाद में नाम सामने आने के बाद जब पहली बार कन्हैया बिहार आए थे, तब वह आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव से आर्शीवाद लेने उनके घर पर गए थे। लेकिन लोकसभा चुनाव में कन्हैया जब मैदान में उतरे, तो आरजेडी ने उनका साथ नहीं दिया।

इस बार लोकसभा चुनाव में कन्हैया की पार्टी का आरजेडी के साथ गठबंधन है। आरजेडी ने सीपीआई को 6 सीट दिए हैं। सीपीआई ने अपने सभी सीटों पर उम्मीदवार उतार दिए हैं।  लेकिन, इस सूची में भाकपा नेता कन्हैया कुमार का नाम नहीं है। सीपीआई उम्मीदवारों की सूची जारी होने के बाद यह साफ हो गया है कि कन्हैया कुमार बिहार चुनाव नहीं लड़ेंगे।

बेगूसराय से लोकसभा चुनाव हार चुके कन्हैया के बछवाड़ा से विधानसभा चुनाव लड़ने की अटकलें थी। 2020 के शुरू से ही कन्हैया कुमार बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर खासे एक्टिव रहे और अक्सर बताते रहे कि चुनावी मुद्दा क्या होने वाला है। कन्हैया कुमार CAA, NPR और NRC के विरोध में बिहार दौरे पर निकले थे और कई जगह उनको लोगों का विरोध भी झेलना पड़ा था।

एक-दो जगह तो काफिले पर लोगों के हमले के बाद पुलिस को उन्हें सुरक्षित निकालने के लिए मशक्कत करनी पड़ी थी। कुछ जगहों पर तो जूते-चप्पल, अंडे, मोबिल और पत्थर वगैरह भी चले थे। कुछ जगहों पर ‘कॉमरेड कन्हैया मुर्दाबाद’ के नारे भी लगाए गए।

‘मानसिक रूप से बीमार लोग राजनीति में आ गए’: NCW ने की महिला से मारपीट करने वाले कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की माँग

राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने रविवार (अक्टूबर 11, 2020) को उत्तर प्रदेश के देवरिया में कॉन्ग्रेस की एक महिला सदस्य से हाथापाई और दुर्व्यवहार करने वाले पार्टी कार्यकर्ताओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई किए जाने और उनकी गिरफ्तारी की माँग की है। 

उत्तर प्रदेश के देवरिया में कॉन्ग्रेसी महीला कार्यकर्ता के साथ मारपीट का मामला सामने आने के बाद राष्ट्रीय महिला आयोग ने इसकी निंदा की है। शर्मा ने कहा कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को पत्र लिखकर आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की माँग की है।

NCW अध्यक्ष रेखा शर्मा ने कहा, “सुबह मैंने एक वीडियो देखा जिसमें एक महिला को एक राजनीतिक दल बैठक में बुरी तरह मारा गया। हम चाहते हैं कि महिलाएँ राजनीति में आए लेकिन ऐसा बर्ताव होगा तो हम कैसे उनको राजनीति में आने के लिए बढ़ावा देंगे। मैं यूपी पुलिस से अपील करती हूँ कि सभी को जल्द गिरफ्तार किया जाए।”

इससे पहले रेखा शर्मा ने मामले का वीडियो शेयर करते हुए लिखा था, “मानसिक रूप से ऐसे बीमार लोग कैसे राजनीति में चले आते हैं? इस मामले में संज्ञान ले रही हूँ।”

उन्होंने एक अन्य वीडियो में कहा, “हमने उस घटना का संज्ञान लिया है जिसमें एक महिला पार्टी कार्यकर्ता को लगभग 25 लोगों द्वारा पीटा गया था। यह एक गंभीर मामला है जब हम कह रहे हैं कि महिलाओं को राजनीति में शामिल होना चाहिए, राजनीति में शामिल एक महिला के साथ ‘गुंडा’ की तरह व्यवहार करते हैं। यही समय है कि उन्हें दंडित किया जाना चाहिए।”

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के टाउन हॉल स्थित कॉन्ग्रेस कार्यालय में शनिवार (10 अक्टूबर 2020) को बैठक आयोजित की गई थी। इस बैठक में कॉन्ग्रेस प्रत्याशी मुकुंद भास्कर मणि का स्वागत होना था। इस दौरान कॉन्ग्रेस की ही तारा यादव का राष्ट्रीय सचिव सचिन नायक से विवाद हो गया। विवाद बहुत जल्द हाथापाई में बदल गया, जिसमें साफ़ देखा जा सकता है कि कई कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने तारा यादव को पीट दिया। यह वीडियो काफी चर्चा में बना हुआ है। 

संगठन की इस बैठक में चुनावी रणनीति पर भी चर्चा होनी थी। तभी पार्टी नेत्री तारा यादव कार्यालय में गुलदस्ता लेकर पहुँची और उनकी सचिन नायक से बहस शुरू हो गई। ख़बरों के मुताबिक़ वह चुनाव के लिए पार्टी टिकट नहीं मिलने की वजह से नाराज़ थीं। 

बहस के दौरान तारा यादव ने कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय सचिव को धक्का दिया, जिसके बाद उन्होंने भी पार्टी नेत्री को थप्पड़ जड़ दिया। वायरल वीडियो में साफ़ देखा जा सकता है कि इसके बाद कई अन्य कार्यकर्ताओं ने उनसे मारपीट शुरू कर दी। जल्द ही वहाँ मौजूद अन्य कार्यकर्ता उन्हें कार्यालय से बाहर लेकर गए। बाहर निकलने के बावजूद कॉन्ग्रेस नेत्री तारा यादव चिल्ला कर विरोध कर रही थीं। इसके अलावा बाहर निकलने पर उन्होंने कहा कि थप्पड़ मार कर सुकून मिल गया।

एक समाचार समूह से बात करते हुए उन्होंने कहा था, “पार्टी ने एक गलत व्यक्ति को टिकट दिया है, वह नेता (मुकुंद भास्कर मणि) बलात्कारी है। मैंने राष्ट्रीय सचिव से यही कहा था कि उन्होंने एक गलत व्यक्ति को टिकट दिया है। इस कदम से संगठन की छवि पर प्रभाव पड़ेगा, यह टिकट किसी और को दिया जाना चाहिए। कोई ऐसा जिसका चरित्र और तौर तरीका बेहतर हो, यह बात कहने की वजह से मेरे साथ अभद्र व्यवहार और मारपीट हुई।”     

महिला कार्यकर्ता तारा यादव ने कहा कि इस मामले में प्रियंका गाँधी को कार्रवाई करनी चाहिए। उन्होंने कहा, “एक तरफ, हमारी पार्टी के नेता हाथरस पीड़ित को न्याय मिले इसके लिए लड़ रहे हैं, दूसरी तरफ, एक बलात्कारी को पार्टी का टिकट दिया जा रहा है। यह गलत फैसला है। यह हमारी पार्टी की छवि को खराब करेगा।”

जब प्रतापपुर में गिरी थीं 13 लाशें: लालू के लाडले शहाबुद्दीन के घर छापेमारी की कीमत पुलिस को ही चुकानी पड़ी थी

बिहार में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा, जिसे मोहम्मद शहाबुद्दीन का नाम न सुना हो। खासकर सीवान के लोगों में तो उसका भय अब तक व्याप्त है, जिन्होंने लालू यादव के जंगलराज के दिनों में उसका आतंक को देखा-सुना है। और जो सीवान के हैं, वो टेढ़ीघाट के प्रतापपुर में स्थित शहाबुद्दीन की कोठी के बारे में ज़रूर जानते हैं। कहा जाता है कि वहाँ कितने गायब लोगों के कंकाल हो सकते हैं, इसकी शायद कोई गिनती ही नहीं है। उसी प्रतापपुर में मार्च 15, 2001 में कुछ ऐसा हुआ था, जिसने पूरे देश को थर्रा दिया था। प्रतापपुर में हुए उस मुठभेड़ और मोहम्मद शहाबुद्दीन की कहानी लोग आज भी सुनाते हैं।

सीवान: प्रतापपुर मुठभेड़ और मोहम्मद शहाबुद्दीन

प्रतापपुर में हुई मुठभेड़ में कुल 13 लोग मारे गए थे। देखा जाए तो एक तरह से ये राज्य की तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी और राज्य की पुलिस के बीच का मुठभेड़ थी। शहाबुद्दीन के साथ-साथ राजद के कई ऐसे गुंडे-बदमाश थे, जिन्होंने पुलिस के साथ मुठभेड़ की। दोपहर को शुरू हुई गोलीबारी देर रात तक चली, जिसमें न सिर्फ 12 राजद नेता, बल्कि एक पुलिसकर्मी की भी जान चली गई। ये वो समय था, जब बिहार में लाशें गिरनी आम घटना थी।

लालू यादव तब भाजपा के खिलाफ मोर्चा बनाने में लगे हुए थे क्योंकि केंद्र में जब-जब भाजपा आती है, इन विपक्षी पार्टियों का ‘सेक्युलरिज्म’ का राग जाग उठता है और वो गोलबंदी की बातें करने लगते हैं। इसी तरह जब ये घटना हुई, तब बिहार के तत्कालीन डी-फैक्टो मुख्यमंत्री और राजद सुप्रीमो लालू यादव ‘पीपल्स फ्रंट’ के गठन के लिए दिल्ली जाने वाले थे लेकिन इस घटना के कारण उन्हें यह दौरा स्थगित करना पड़ा।

स्थिति ये हो गई थी कि सीवान में पुलिस की ही सुरक्षा पर ख़तरा उत्पन्न हो गया। इसके बाद सीआरपीएफ की 3 कंपनियों को वहाँ के लिए रवाना किया गया। साथ ही राँची से भारतीय सेना की एक बटालियन को वहाँ भेजा गया। चूँकि सीवान पुलिस शहाबुद्दीन को गिरफ्तार करने में असमर्थ रही थी, इसीलिए अतिरिक्त सुरक्षा बलों को पुलिस की मदद के लिए भेजा गया। साथ ही शांति-व्यवस्था नाम की कोई चीज तो जिले में थी ही नहीं।

लेकिन, ये सब कुछ किया जाता, उससे पहले ही तत्कालीन सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन पुलिस की नाक के नीचे से सीवान जिले से बाहर निकल कर फरार हो चुका था। आखिर हो भी क्यों न, उसके पीछे पूरी बिहार सरकार खड़ी थी। वो लालू यादव का प्यारा था, जिसके लिए राज्य में कुछ भी करने की छूट थी। हत्या, बलात्कार, रंगदारी और अपहरण का तो सीवान गढ़ बन गया था और पूरे बिहार में लीड कर रहा था। रोज न जाने कितने ही लोग गायब हो रहे थे।

दरअसल, इस मुठभेड़ के पीछे मोहम्मद शहाबुद्दीन का वो रवैया था, जो बर्ताव वो पुलिस अधिकारियों के साथ किया करता था। कहते हैं, सीवान में उसने खुलेआम एक डीएसपी को थप्पड़ मार दिया था, जिससे पुलिस भी उससे खासी खफा थी लेकिन प्रशासन के हाथ बँधे हुए थे। एक तो वो सांसद था, ऊपर से बिहार में सत्ता का दुलारा था और खुद एक बहुत बड़ा गुंडा था। हालाँकि, अंत में पुलिस ने भी तंग आकर अपने तरीके से बदला लेने की ठानी।

प्रतापपुर मुठभेड़ का कारण: परीक्षा केंद्रों के निरीक्षण के लिए निकला था मोहम्मद शहाबुद्दीन

प्रतापपुर गाँव सीवान से 17 किलोमीटर दूर था और मोहम्मद शहाबुद्दीन के सारे गैर-क़ानूनी काम वहीं हुआ करते थे। वहाँ अपहरण के बाद लोगों को लाया जाता था। कहा जाता है कि आए दिन सीवान में गायब हुए लोगों को यहीं ठिकाने लगाया जाता था। प्रतापपुर एक तरह से सीवान की ‘राजधानी’ बन गया था, जहाँ से सिर्फ हुक्म चलता था। वहाँ पुलिस की एंट्री की तो अनुमति ही नहीं थी, छापेमारी तो दूर की बात।

उस समय मैट्रिक की परीक्षाएँ चल रही थीं। ये सारा गड़बड़झाला तब शुरू हुआ, जब मोहम्मद शहाबुद्दीन ने परीक्षाओं के दौरान इंस्पेक्शन की ठानी और वो सारे एग्जामिनेशन हॉल्स का दौरा करने लगा। वो और उसके गुंडे ‘कदाचार निवारण उड़न दस्ता’ बना कर ऐसा कर रहे थे। अर्थात, बच्चों की परीक्षाएँ कैसे होनी चाहिए, एक अपराधी इस पर अपना हुक्म चला रहा था। ऐसे ही एक परीक्षा सेंटर पर पुलिसकर्मियों ने उसकी मौजूदगी से ऐतराज जताया।

इसके बाद वहाँ मौजूद डीएसपी और शहाबुद्दीन के बीच कहासुनी शुरू हो गई। एक और बात ध्यान देने लायक है कि मोहम्मद शहाबुद्दीन के साथ उस वक़्त गुंडे-बदमाश ही चलते थे, जो राजद नेता का चोला ओढ़े रहते थे। उन्हीं में से एक अपराधी को डीएसपी ने गिरफ्तार करना चाहा, जिसके बाद शहाबुद्दीन ने उन्हें थप्पड़ जड़ दिया। यानी, एक ऑन ड्यूटी पुलिस अधिकारी के साथ गाली-गलौज किया गया और उस पर हाथ भी उठाया गया।

जिले के अधिकतर पुलिसकर्मी आक्रोशित हो गए। उनके हाथ में हथियार थे लेकिन वो असहाय थे। बड़े अधिकारी ही सारे निर्णय लेते थे और एक तरह से राजद के गुंडे-बदमाशों को क़ानूनी कार्रवाइयों से छूट प्राप्त थी। अपमानित पुलिसकर्मियों ने विरोध प्रदर्शन शुरू किया और डीआईजी को ही स्थानीय सर्किट हाउस में बँधक बना लिया। ये पुलिसकर्मी खुद के अपमान से जलते हुए सांसद के खिलाफ कार्रवाई की माँग कर रहे थे।

यहाँ तक कि डीएम और एसपी की गाड़ियों तक के साथ तोड़फोड़ की गई। इन पुलिसकर्मियों ने अंततः सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन के पैतृक गाँव प्रतापपुर स्थित उसके आवास पर छापेमारी करने का आदेश ले ही लिया और उस पर डीएम-एसपी के हस्ताक्षर भी करा लिए। इन सबके बीच राज्य सरकार को कुछ भी नहीं पता चला क्योंकि अगर वहाँ इसकी जरा भी भनक लगती तो शायद आवाज़ उठाने वाले पुलिसकर्मी ही सस्पेंड कर दिए जाते।

प्रतापपुर मुठभेड़: सीवान से 17 किलोमीटर दूर खेला गया मौत का तांडव

पुलिसकर्मी जैसे ही प्रतापपुर पहुँचे, वहाँ शहाबुद्दीन के गुर्गों ने फायरिंग शुरू कर दी। फिर दोनों तरफ से जबरदस्त गोलीबारी हुई। दोनों तरफ से 1000 राउंड्स से भी ज्यादा की गोलीबारी हुई। इससे आप समझ सकते हैं कि शहाबुद्दीन के घर में हथियार और गोला-बारूद किस कदर भरे रहे होंगे। ये वो दौर था, जब बिहार में एके-47 का उपयोग आम हो गया था और आए दिन हत्याओं में शार्पशूटर अपराधी इसका प्रयोग करते थे।

प्रतापपुर के बगल में ही स्थित है खलीलपुरा गाँव, जहाँ शहाबुद्दीन ने कई अपराधी पाल रखे थे। वहाँ ग्रामीणों ने ही घेर कर सब-इंस्पेक्टर रामसागर सिंह को मार डाला। उधर सीवान शहर में भी शहाबुद्दीन ने अपने गुर्गों को सक्रिय कर दिया और इधर गोलीबारी चल ही रही थी, तब तक पुलिस थाने पर हमला हो गया और पेट्रोल बन लेकर पहुँची भीड़ ने आगजनी शुरू कर दी। एक पुलिस जीप को आग के हवाले कर दिया गया।

गोलीबारी के वक़्त मोहम्मद शहाबुद्दीन अपने प्रतापपुर स्थित उस घर में ही मौजूद था, लेकिन वो मुठभेड़ के दौरान ही किसी तरह वहाँ से भाग निकला और फरार हो गया। हालाँकि, बाद में वो मीडिया चैनल वालों को इंटरव्यू भी दे रहा था। मुठभेड़ के अगले ही दिन उसने ‘स्टार न्यूज़’ से कहा कि उसके लोगों ने ‘आत्मरक्षा’ में गोलीबारी की है और वो किसी भी सूरत में आत्मसमर्पण करने नहीं जा रहा है। ये था लालू राज में अपराधियों की बेखौफी का आलम!

उसके घर से एक एके-47 राइफल, 9mm पिस्टल और कुछ हैंड ग्रेनेड मिले। हालाँकि, उस समय तक वह अपने घर से हथियारों को ठिकाने लगा चुका था, वरना वहाँ से और भी हथियार मिल सकते थे। इसके बाद गाँव में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को रेकी के लिए भेजा गया। राँची से सेना की दो कम्पनी और दानापुर से एक कम्पनी भेजी गई। हालाँकि, आपको ये जान कर आश्चर्य होगा कि ये पहला मौका नहीं था जब शहाबुद्दीन ने पुलिस के साथ गोलीबारी की।

इससे पहले 1996 लोकसभा चुनाव के दौरान मतदान के दिन ही उसके गुर्गों ने तत्कालीन एसपी एसके सिंघल पर फायरिंग कर दी थी। एसके सिंघल फिलहाल बिहार के डीजीपी हैं। गुप्तेश्वर पांडेय के समय-पूर्व सेवानिवृत्ति लेकर राजनीति में जाने के कारण ये पद खाली हुआ, जिसके लिए डीजी होमगार्ड एसके सिंघल बिहार सरकार की पहली पसंद बने। तब सीवान में चुनावों के दौरान शहाबुद्दीन के विपक्षी उम्मीदवारों का पोस्टर तक लगाने की अनुमति नहीं होती थी।

प्रतापपुर मुठभेड़ से बौखलाए मोहम्मद शहाबुद्दीन ने तब सीवान के एसपी बच्चू सिंह मीणा को मार डालने की कसम खाई थी और आसपास के जिलों के पुलिसकर्मियों को भी धमकाया था, जिनकी मदद से उसके घर पर छापेमारी हुई थी। व्यापारियों ने जिला छोड़ना शुरू कर दिया था और कारोबारी तो डर के मारे दुकानें खोलते तक ही नहीं थे। हालाँकि, तब सीवान के डीएम थे मोहम्मद राशिद खान, जिन पर शहाबुद्दीन की करतूतों के समर्थन का आरोप लगा था और पुलिसकर्मी उनसे खासे खफा थे।

हालाँकि, कई लोग इसे तब की राजनीति से भी जोड़ कर देखते हैं क्योंकि प्रतापपुर मुठभेड़ को मुस्लिमों की सुरक्षा का मुद्दा बना दिया गया था और ये वो दौर था, जब रंजन यादव लालू से बगावत पर उतर आए थे। बगावती कैम्प ने इसे ‘अल्पसंख्यकों की सुरक्षा’ से जोड़ा। कुछ नेताओं का कहना था कि रंजन यादव से वफ़ादारी दिखाने के कारण ही मोहम्मद शहाबुद्दीन को मार डालने के लिए ‘साजिश रची गई’ थी।

इसके बाद सरकारी कार्रवाई शुरू हुई और एसपी सहित कई अधिकारियों का तबादला हुआ। बिहार सरकार में मंत्री शिवानंद तिवारी के नेतृत्व में मंत्रियों की टीम ने घटनास्थल का दौरान किया और उन्हें रिपोर्ट तैयार कर सरकार को भेजने की जिम्मेदारी दी गई। तिवारी ने इसे ‘कोल्ड ब्लडेड मर्डर’ करार दिया और एनकाउंटर को फेक बताया। मृतकों के परिजनों को एक सरकारी नौकरी और 2.5 लाख रुपए बतौर मुआवजा दिया गया।

शिवानंद तिवारी ने पुलिस को ही क्रूर बता दिया और दावा किया कि पुलिसकर्मियों ने अपने वरिष्ठों के आदेश की अवहेलना की। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में उलटा अधिकारियों के खिलाफ ही कार्रवाई की अनुशंसा कर दी। मोहम्मद शहाबुद्दीन के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास और अवैध हथियार रखने के मामले दर्ज कर के इतिश्री कर ली गई। पुलिस-प्रशासन को एक बार फिर एक तरह से बता दिया गया, बिहार में अपराध का साम्राज्य है।

मोहम्मद शहाबुद्दीन और सीवान में उसका साम्राज्य

सीवान एक ऐसा शहर है, जहाँ 90 के दशक में और इक्कीसवीं सदी की शुरुआत के दशक में सिर्फ मोहम्मद शहाबुद्दीन की ही तूती बोलती थी। विभिन्न ठेकों का टेंडर हो या फिर मुखिया से लेकर जिला परिषद तक के चुनाव, हर जगह उसकी ही पसंद चलती थी। उसने 1996, 98, 99 और 2004 में यहाँ से सांसद बन कर जीत का चौका लगाया। अब जब शहाबुद्दीन जेल में है, उसकी पत्नी हीना शहाब 2009, 2014 और 2019 का लोकसभा चुनाव हार चुकी हैं।

मोहम्मद शहाबुद्दीन पर सीधा राजद सुप्रीमो और 15 साल तक बिहार में सत्ता के सर्वेसर्वा रहे लालू प्रसाद यादव का हाथ था। वो राजद की नेशनल एग्जीक्यूटिव कमिटी का हिस्सा था। फ़िलहाल वो छोटेलाल गुप्ता नामक वामपंथी नेता का अपहरण कर के उन्हें गायब कराने सहित कई मामलों में जेल की सज़ा भुगत रहा है। ये इतर बात है कि यही वामपंथी दल आज राजद के साथ गठबंधन बना कर विधानसभा चुनाव में उतरने की तैयारी कर रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि शहाबुद्दीन ने सिर्फ लोकसभा चुनाव ही जीता, इससे पहले वो जीरादेई विधानसभा क्षेत्र से 2 बार विधायक चुना जा चुका है। उसे उसके समर्थक ‘साहेब’ कह कर बुलाते हैं। सजायाफ्ता गैंगस्टर शहाबुद्दीन पर अपहरण, हत्या और लूट के इतने मामले दर्ज हैं कि उसके सामने बड़े से बड़े अपराधी भी छोटे लगें। और सबसे बड़ी बात तो ये है कि बिहार का ये गैंगस्टर शिक्षित है, काफी पढ़ा-लिखा है।

आर्ट्स से मास्टर्स की डिग्री लेने वाले मोहम्मद शहाबुद्दीन ने राजनीतिक विज्ञान में पीएचडी की डिग्री ले रखी है। शुरू में उसने जनता दल के टिकट पर दो विधानसभा चुनाव जीते लेकिन लालू प्रसाद द्वारा राजद के गठन के साथ ही उसका प्रभाव बढ़ता ही चला गया। उस समय कहा जाता था कि मोहम्मद शहाबुद्दीन जो भी करे, उसे क़ानूनी कार्रवाइयों से छूट प्राप्त है और उसे सत्ता का पूर्ण संरक्षण मिला हुआ है।

2004 के चुनाव में तो स्थिति ये थी कि शहाबुद्दीन के जेल में होने के बावजूद चुनाव प्रचार के दौरान जिसने भी विपक्षी उम्मीदवारों के पोस्टर-बैनर भी टाँगे वो गायब हो गया। इस चुनाव में न जाने कितने अपहरण और हत्या की वारदातें हुईं। जेल से निकल कर अस्पताल में शिफ्ट होकर शहाबुद्दीन जिससे चाहे उससे मिल सकता था। उसके लिए कोई रोकटोक नहीं थी। उस चुनाव में विपक्ष एक तरह से था ही नहीं।

जब चुनाव हुए तो साइलेंट वोटर्स का भी बोलबाला रहा और जदयू उम्मीदवार ने 2 लाख से भी ज्यादा (33%) मत पाकर शहाबुद्दीन को तगड़ी फाइट दी, भले ही वो जीत गया। शाहबुद्दीन के ईगो को इससे ठेस पहुँची और उसके बाद जदयू कार्यकर्ताओं की हत्याएँ शुरू हो गईं। जिस गाँव में जदयू उम्मीदवार को ज्यादा मत मिले थे, वहाँ का मुखिया ही मारा गया। जदयू उम्मीदवार के घर पर ताबड़तोड़ गोलीबारी हुई। वो जदयू उम्मीदवार आज सीवान के सांसद हैं और भाजपा किसान मोर्चा के उपाध्यक्ष भी।