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पालघर मॉब लिंचिंग: अखिल भारतीय संत समिति ने की CBI जाँच की माँग, कहा- महाराष्ट्र के गृहमंत्री पर भरोसा नहीं

महाराष्ट्र के पालघर में जूना अखाड़े के दो संन्यासियों की मॉब लिंचिंग पर अखिल भारतीय संत समिति ने केंद्रीय गृह मंत्री को पत्र लिखा है। पत्र लिखकर अखिल भारतीय संत समिति ने पालघर मॉब लिंचिंग की सीबीआई जाँच कर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की है। पत्र में हत्या के पीछे बड़ी साजिश की आशंका जताई गई है। यह पत्र अखिल भारतीय संत समिति के महामंत्री स्वामी जितेंद्र नंद सरस्वती ने लिखा है।

अखिल भारतीय संत समिति महाराष्ट्र के पालघर जिले के गडचिंचले गाँव में जूना अखाड़े के दो संतों की निर्मम हत्या पर दुखी है। इस घटना से पूरे विश्व का हिंदू समाज मर्माहत है लेकिन घटना के समय और परिस्थितियों को लेकर संघ समिति के मन में कई सवाल है। क्योंकि गुजरात और महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित गडचिंचले का पूरा इलाका क्रिस्टो क्रिश्चियन एवं नक्सलियों के कारण कुख्यात माना जाता है।

क्षेत्र में दो पूज्य संतों और उनके ड्राइवर की निर्मम हत्या का होना महाराष्ट्र के अंदर कानून व्यवस्था पर प्रश्न खड़े करता है। इसलिए माननीय गृह मंत्री भारत सरकार से आग्रह है कि संत समिति द्वारा सुझाए बिंदुओं पर केंद्रीय जाँच एजेंसी सीबीआई द्वारा जाँच कराकर दोषियों पर सख्त कार्रवाई करवाने की कृपा करें।

उन्होंने कहा कि जूना अखाड़े के संत कल्पवृक्ष गिरि, सुशील गिरि उत्कृष्ट कोटि के संत थे। उन्हें जिस तरह से पुलिस की मौजूदगी में पीट-पीट कर मौत के घाट उतारा गया, वह अमानवीय व क्रूरता की इंतहा है। यह घटना महाराष्ट्र पुलिस की विफलता का आइना है। ऐसे में इसकी जाँच स्थानीय एजेंसी से कराए जाने का कोई तुक नहीं है। इनके अलावा अन्य संतों ने दोषियों को फाँसी देने की माँग की है।

पालघर मॉब लिंचिंग पर महाराष्ट्र के गृहमंत्री पर भरोसा नहीं

पत्र में आगे लिखा गया है कि अखिल भारतीय संत समिति जूना अखाड़े के साथ खड़ी है वो चाहे जो भी निर्णय ले। महाराष्ट्र सरकार ने न्याय पूर्ण कार्रवाई नहीं की तो अखिल भारतीय संत समिति देशभर में आंदोलन खड़ा करेगी। संपूर्ण मामले में महाराष्ट्र के मंत्री अनिल देशमुख की भूमिका संदिग्ध है। इसलिए विश्वास नहीं कर सकते क्योंकि घटना को एक ही समुदाय का मामला बताते हुए ट्वीट करना एकपक्षीय है। इसलिए मामले की सीबीआई जाँच कराने की कृपा करें।

बता दें कि गुरुवार (अप्रैल 16, 2020) को मॉब लिंचिंग कर हत्या की घटना का वीडियो 3 दिन बाद रविवार को वायरल हुआ, जिसके बाद लोगों को सच्चाई पता चली थी। पालघर मॉब लिंचिंग का ये वीडियो दिल दहला देने वाला है। उस वीडियो को देख कर कोई भी काँप उठे। इस वीडियो में दिख रहे एक संदिग्ध व्यक्ति की पहचान को लेकर भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने जानकारी माँगी थी। पता चला है कि वो शरद पवार की पार्टी का आदमी है। उसका नाम काशीनाथ चौधरी बताया गया। लेकिन, मीडिया का एक बड़ा वर्ग इस पर चुप है।

अनाज के अभाव में बिहार के बच्चे खा रहे मेंढक, Scroll ने किया दावा: फर्जी साबित हुई रिपोर्ट

बिहार के जहानाबाद में कुछ बच्चे खाना न मिलने के कारण लॉकडाउन में मेंढक खाने को मजबूर हैं। वामपंथी मीडिया पोर्टल स्क्रॉल ने ‘newsd’ नाम के यूट्यूब चैनल की एक वीडियो शेयर करते हुए यह दावा किया। जिसके बाद वहाँ के जिलाधिकारी ने खुद इस दावे की जाँच की और इन अफवाहों का खंडन करके स्क्रॉल के प्रोपगेंडे को ध्वस्त किया।

बिहार सरकार के सूचना और जनसंपर्क विभाग ने जानकारी साझा की कि वीडियो द्वारा किए गए दावों की जाँच करने पर, यह पाया गया कि बच्चों के घरों में पर्याप्त भोजन इकट्ठा था और इनमें से किसी के पास मेंढक पकड़ने या खाने का कोई कारण नहीं था। उन्होंने कहा कि इस वीडियो को कुछ लोगों ने जिला प्रशासन की छवि धूमिल करने के लिहाज से बनाया था।

इस स्पष्टीकरण के बाद पीआईबी फैक्ट चेक की टीम ने भी स्क्रॉल द्वारा शेयर की गई वीडियो को फर्जी और असत्यापित बताया। इसके अलावा बिना तथ्यों की जाँच परख के निराधार दावे करने पर पीआईबी ने लिखा, “स्क्रॉल- एक प्रमुख मीडिया चैनल ने जहानाबाद में बच्चों के मेंढक खाने को लेकर झूठा दावा किया कि उनके पास खाने को कुछ नहीं है। इसके बाद वीडियो वायरल हुआ। मगर डीएम जहानाबाद की जाँच में ये दावा झूठा पाया गया और ये भी पता चला कि इन बच्चों के घरों में खाने को पर्याप्त सामग्री थी।”

बता दें कि डीएम की ओर से की गई पड़ताल के बाद स्क्रॉल को अपनी रिपोर्ट को अपडेट करना पड़ा और उन्होंने ये भी बताया कि उनके झूठ का पर्दाफाश डीएम की पड़ताल के बाद हुआ।

गौरतलब है कि इससे पहले एनडीटीवी ने भी अरुणाचल प्रदेश को लेकर एक ऐसी झूठी खबर फैलाई थी। अपनी खबर में एनडीटीवी ने दावा किया था कि वहाँ पर लोग सांप का शिकार करके उसे खाने पर मजबूर हैं क्योंकि उनके पास चावल खाने को नहीं है। उन्होंने अपनी बात को सही साबित करने के लिए सोशल मीडिया पर कई वीडियो भी पोस्ट की, जिसमें वहाँ के अनुसूचित जनजाति के लोग 12 फीट का किंग कोबरा लेकर पोज दे रहे हैं। इस वीडियो को लेकर दावा किया कि उन्होंने किंग कोबरा का खाने के लिए शिकार किया।

एनडीटीवी ने किंग कोबरा के शिकारियों को लेकर फैलाया भ्रम

बाद में केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने इस खबर के लिए एनडीटीवी की आलोचना की। उन्होंने कहा कि किंग कोबरा एक संरक्षित प्रजाति है और उसका सेवन करने के लिए कोई जनजाति उसका शिकार नहीं करती। इसके अलावा रिजिजू व अरुणाचल सरकार ने एनडीटीवी पर झूठी खबर फैलाने का भी आरोप लगाया। साथ ही स्पष्ट किया कि वहाँ चावल की कोई कमी नहीं है।

मालेगाँव में मातम मनाने कब्रिस्तान निकली 600 की भीड़, उधर अपने पिता के अंतिम संस्कार में नहीं गए CM योगी

महाराष्ट्र में लॉकडाउन का पालन कराने में सरकार बुरी तरह विफल रही है। चाहे वो पालघर में साधुओं की हत्या का मामला हो या फिर मुंबई के बांद्रा में हज़ारों लोगों का जुटना। अब मालेगाँव से ख़बर आई है, जहाँ जनाजे के लिए 500-600 लोगों की भीड़ जुट गई। ये सभी लोग कब्रिस्तान जा रहे थे। बता दें कि सरकार का आदेश है कि किसी भी प्रकार के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में 5 से ज्यादा लोग नहीं होने चाहिए, बावजूद इसके मालेगाँव में 500 से ज्यादा लोगों की भीड़ जुट गई। पुलिस ने रास्ते में ही उन सबको रोका और भीड़ को किसी तरह तितर-बितर किया। बावजूद इसके 25-30 लोग कब्रिस्तान पहुँच गए।

ये घटना मालेगाँव के आज़ादपुर क्षेत्र की है। पुलिस ने जब इतनी बड़ी भीड़ को देखा तो कहा गया कि 20 लोगों को अंदर जाने की इजाजत दी जा सकती है। महाराष्ट्र पुलिस का दावा है कि इसके बाद अधिकतर लोग अपने घर चले गए, जबकि 20 लोगों को ही सिर्फ़ कब्रिस्तान में जाने की इजाजत दी गई। हालाँकि, ये संख्या अधिक होने की बात भी कही जा रही है। पुलिस सब-इंस्पेक्टर अभिजीत जाधव ने बताया कि एक जनाजा कब्रिस्तान की ओर जा रही थी, जिसमें 500 या 600 की तादाद में लोग मातम मनाने जा रहे थे।

उन्होंने आगे बताया कि पुलिस ने हाथ जोड़ कर उनसे विनती करने हुए कहा कि आपलोग इतनी ज्यादा तादाद में मातम मनाने न जाएँ क्योंकि कोरोना वायरस के संक्रमण का ख़तरा है और अभी पूर्ण लॉकडाउन भी है। उन्होने कहा कि लोगों ने पुलिस की विनती मान ली और फिर ज्यादातर लोग वापस घर लौट गए। भीड़ जहाँ से गुजर रही थी, वहाँ पास में ही रहमानी मस्जिद भी है। पुलिस ने मालेगाँव के लोगों का धन्यवाद करते हुए कहा कि वो जनता के लिए हमेशा खड़ी है और ऐसे ही उनका सहयोग करते रहें।

ये सब तब हो रहा है, जब देश के सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक नई मिसाल पेश की है। सोमवार (अप्रैल 20, 2020) को जब उनके पिता आनंद सिंह बिष्ट के निधन की ख़बर आई, वो यूपी के कोविड-19 टीम के साथ बैठक कर रहे थे। 89 वर्षीय बीमार पिता के निधन के बावजूद उन्होंने बैठक नहीं रोकी। बैठक ख़त्म होने के बाद ही उन्होंने घर-परिवार से बातचीत की। सीएम योगी ने लॉकडाउन के नियमों का पालन करते हुए और यूपी में अपनी मौजूदगी की महत्ता के कारण अपने पिता के अंतिम-संस्कार में भी भाग नहीं लेने का फ़ैसला लिया।

आज़ादपुर में रहमानी मस्जिद के पास से निकली भीड़ (वीडियो साभार: इंडिया टीवी)

इसके लिए उन्होंने बाकायदा अपनी माँ को पत्र लिख कर क्षमा-याचना की। योगी आदित्यनाथ ने अपने परिवार से यह भी अपील की है कि अंतिम-संस्कार में 5 से ज्यादा लोग न जुटें। उन्होंने बताया कि लॉकडाउन ख़त्म होते ही वो अपने परिवार से मिलेंगे और अपनी माँ के दर्शन करेंगे। जब देश का इतना बड़ा नेता इस तरह के आदर्श के मानक स्थापित कर रहा है, तब भी मालेगाँव जैसी घटनाओं का होना ये बताता है कि समाज का एक ख़ास वर्ग बार-बार एक ही ग़लती करने और सरकारी दिशानिर्देशों की धज्जियाँ उड़ाने में अभ्यस्त हो चुका है।

‘ईमानदार मुख्यमंत्री बेटा मेरे जीवन की इकलौती कमाई’ – योगी आदित्यनाथ के पिता आनंद सिंह बिष्ट ने तब कही थी यह बात

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पिता आनंद सिंह बिष्ट ने एम्स में इलाज के दौरान सोमवार (अप्रैल 20, 2020) को 10 बजकर 40 मिनट पर आखिरी साँस ली। सीएम योगी को जब पिता के मौत की सूचना मिली तो वह कोरोना महामारी से निपटने के लिए मीटिंग कर रहे थे। पिता के निधन की सूचना के बाद भी मुख्यमंत्री करीब 45 मिनट तक बैठक करते रहे।

आनंद सिंह बिष्ट के निधन के बाद सीएम योगी आदित्यनाथ के जीवन पर आधारित किताब ‘The Monk Who Became Chief Minister’ लिखने वाले शांतनु गुप्ता ने उनके साथ बिताए गए कुछ खूबसूरत लम्हों को साझा किया है। वो कहते हैं, “जब मैं अप्रैल 2017 में योगी आदित्यनाथ की जीवनी लिखने के लिए रिसर्च कर रहा था, तो इस दौरान मुझे योगी आदित्यनाथ के माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ समय बिताने का सौभाग्य मिला। वे बातचीत इतने सरल, निष्कपट और स्वाभाविक थे कि वो अभी भी मेरे जेहन में ताजा हैं।”

आगे उन्होंने कहा, “अब, जब आनंद जी नहीं रहे, तो मैं उनमें से कुछ वार्तालापों को पाठकों के साथ फिर से जीना और साझा करना चाहता हूँ। यहाँ मैं आनंद जी और उनकी पत्नी सावित्री देवी जी के साथ अपनी बातचीत के कुछ अंश अपनी पुस्तक – ‘The Monk Who Became Chief Minister’ से साझा कर रहा हूँ। इन वार्तालापों के माध्यम से हम आज के योगी के कई लक्षणों और आदतों की झलक देख सकते हैं।”

योगी आदित्यनाथ के बारे में क्या सोचते थे उनके माता-पिता?

शांतनु ने कहा, “मुझसे बात करते हुए आनंद सिंह बिष्ट जी ने बताया कि अजय हमेशा से ही विनम्र और मिलनसार थे। वे काफी कम कम उम्र से ही अखबार पढ़ने के शौकीन थे। बिष्ट जी ने कहा कि यद्यपि वे लगातार पर्यटन पर थे और अक्सर घर से दूर रहते थे, लेकिन उन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर काफी दिया। वो अक्सर सरप्राइज विजिट करके बच्चों की पढ़ाई और उनके मेहनत का निरीक्षण करते थे। उन्होंने कहा कि शायद यही वजह है कि आज पंचूर नाम के एक छोटे से गाँव के अजय, उत्तर प्रदेश के 21 वें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बन गए हैं। यहाँ पर ध्यान देना दिलचस्प है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद, योगी और उनके मंत्रियों ने विभिन्न सरकारी सेवाओं के वितरण की ‘औचक जाँच’ की है।”

आनंद बिष्ट एक गौरवान्वित पिता थे जिन्होंने महसूस किया कि यूपी जैसे राज्य को चलाना हर किसी के वश की बात नहीं है और केवल योगी ही इसे नियंत्रित कर सकते हैं क्योंकि उनमें बचपन से ही निर्णय लेने की अच्छी क्षमता है। आनंद बिष्ट ने मुझे यह भी बताया कि सांसद के रूप में योगी ने हमेशा लोगों के लिए काम किया था और उनका काम किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार से मुक्त था। इसलिए लोग उनसे प्यार करते हैं। उन्होंने आगे कहा कि यूपी का मुख्यमंत्री बनने के बाद लोगों ने उनके बेटे (योगी आदित्यनाथ) के लिए अपनी सिफारिशें भेजनी शुरू कर दीं। उन्होंने कहा कि वह ऐसे लोगों के साथ विनम्रता से पेश आते हैं और उन्हें चाय पर बुलाते हैं। इसके बाद उन्हें काफी विनम्रता से उन्हें बताते हैं कि उनकी कोई सिफारिश नहीं की जाएगी।

आगे शांतनु ने कहा, “योगी आदित्यनाथ की माँ सावित्री देवी जी ने भी मुझे बताया था कि अजय अच्छे छात्र थे और उन्होंने कभी भी खराब संगति नहीं रखी। उन्होंने कहा कि वह एक साधारण लड़का था। उन्हें कभी इस बात का अहसास नहीं था कि वो इतने बड़े पद पर पहुँच जाएँगे। वो कहती हैं कि उन्हें याद है कि वो उनके कितने करीब थे, क्योंकि उनके पिता की अलग-अलग जगहों पर पोस्टिंग होती रहती थी और वह सख्त भी थे, इसलिए सभी बच्चे उनसे थोड़ा डरते थे।”

अपनी आदतों के बारे में बात करते हुए सावित्री देवी जी ने कहा कि उनके घर में हर कोई हमेशा जल्दी उठता था। यहाँ तक ​​कि लगभग 80 वर्ष (2017 में) की आयु में वह सुबह 4 बजे उठकर घर के सारो कामों को पूरा करती थी और फिर खेतों में जाकर छोटे कृषि फार्मों की देखरेख करती थी। 85 साल (2017 में) की उम्र में अजय के पिता भी हर दिन सुबह 4 बजे उठते थे और पूरे घर और आसपास के परिसर की सफाई करते थे। सावित्री देवी जी ने कहा कि बचपन से ही अजय गायों के शौकीन थे। बिष्ट परिवार के पास घर पर गायें थीं और उन्हें चरने के लिए ले जाना स्कूल के बाद अजय की दिनचर्या का हिस्सा था। पंचूर में उनके घर के आसपास के पेड़ों की ओर इशारा करते हुए, सावित्री देवी जी ने मुझे बताया कि अजय ने इनमें से कई पौधे लगाए थे, जब वह छोटा था।

योगी आदित्यनाथ के पिता से क्यों डरते थे उनके दोस्त

बातचीत के दौरान आनंद बिष्ट ने बताया कि वह एक फॉरेस्ट रेंजर थे और उन्होंने अपने पूरे जीवन में खाकी पोशाक पहनी है। उनकी वर्दी में कंधों पर तीन स्टार थे, जो पुलिस की वर्दी की तरह दिखते थे। और इसके अलावा, उनकी वर्दी में एक UPF (Uttar Pradesh Forest) बैज भी था, जो काफी हद तक UPP (Uttar Pradesh Police) बैज के समान था। और यह कभी-कभी अजय के दोस्तों को डराता था क्योंकि वो गलती से उन्हें पुलिस वाले समझ लेते थे। उन्होंने हँसते हुए कहा कि अब अजय के सीएम बनने के बाद, उनके साथ पूरा समय खाकी पहने बंदूकधारी, असली पुलिसकर्मी, सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत मौजूद रहते हैं।

कोटद्वार में स्नातक करने के बाद अजय ने 1992 में पंडित ललित मोहन शर्मा गवर्नमेंट पीजी कॉलेज, ऋषिकेश से गणित में मास्टर ऑफ साइंस (MSc) में दाखिला लिया। जब वे एमएससी प्रथम वर्ष में थे, तब उन्होंने गोरखपुर जाकर महंत अवैद्यनाथ से मिलना शुरू किया। एक दो बार मिलने के बाद अजय ने गोरखनाथ मठ में महंत अवैद्यनाथ के पूर्णकालिक शिष्य बनने का फैसला किया। नवंबर 1993 में, अजय ने अपने गाँव, अपने माता-पिता, अपने दोस्तों और अपनी पढ़ाई को छोड़ दिया और परिवार में किसी को भी बताए बिना वह गोरखपुर चले गए। 15 फरवरी, 1994 को अजय का उनके गुरु महंत अवैद्यनाथ द्वारा नाथ पंथ योगी के रूप में अभिषेक किया गया था।

जब योगी आदित्यनाथ के माता-पिता को उनके संन्यास के बारे में पता चला

कुछ महीने बाद ही अजय के माता-पिता को उनके संन्यास के बारे में अखबार से पता चला। तब तक उनके माता-पिता को लग रहा था कि वह नौकरी की तलाश में गोरखपुर गए हैं। अजय के महंत बनने की बात पता चलने के बाद अजय के माता-पिता अगली ट्रेन से गोरखपुर पहुँचे और मठ में आनंद सिंह बिष्ट, अजय को संन्यासी की पोशाक में देखकर चौंक गए। महंत अवैद्यनाथ उस समय शहर से बाहर थे। अजय ने अपने माता-पिता को शांत कराया और फिर उन्हें अपने गुरु से फोन पर बात करवाई। महंत अवैद्यनाथ ने अजय के पिता से कहा कि उनके बेटे अजय अब योगी आदित्यनाथ हैं।

महंत अवैद्यनाथ ने आनंद सिंह बिष्ट से अनुरोध किया कि उनके चार बेटों में से एक ने उनके साथ राष्ट्र निर्माण और मजबूत राष्ट्रवाद के लिए आने का फैसला किया है। उन्होंने अजय के पिता से उन्हें देश की सेवा करने की अनुमति देने के लिए आग्रह किया। कुछ समय तक विरोध करने के बाद उनके माता-पिता ने इसकी अनुमति दे दी। 

कुछ महीनों के बाद योगी आदित्यनाथ संन्यासी परंपरा के तहत अपनी माँ से भिक्षा लेने के लिए उत्तराखंड के पंचूर गाँव में वापस आए। उसके बाद से अजय के माता-पिता गोरखनाथ मठ के योगी आदित्यनाथ से दो-दो बार मुलाकात कर चुके हैं। अब वे उन्हें अन्य लोगों की तरह ‘महाराज जी’ कहकर बुलाते हैं। उनके प्रोटोकॉल और उनकी भूमिका की गरिमा का सम्मान करते हैं। योगी आदित्यनाथ अपने गृहनगर उत्तराखंड में केवल परिवार के कुछ महत्वपूर्ण फंक्शन के लिए ही गए हैं। योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर मठ के प्रशासन के तहत, उत्तराखंड में अपने गाँव के पास, महायोगी गुरु गोरखनाथ महाविद्यालय की स्थापना की है।

ईमानदार मुख्यमंत्री बेटा मेरे जीवन की इकलौती कमाई

शांतनु कहते हैं, “अजय के माता-पिता के साथ चर्चा के दौरान मैंने उल्लेख किया कि उत्तराखंड की पहाड़ियों ने गोविंद बल्लभ पंत, हेमवती नंदन बहुगुणा और नारायण दत्त तिवारी को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त किया है और अब इस घर ने उत्तर प्रदेश के लिए चौथे मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ को मौका दिया है। इस पर सावित्री सविता देवी ने गर्व से पुरानी बातें याद करती हुई कहती हैं कि अजय हमेशा लोगों की सेवा करना चाहते थे और अब वह ठीक यही कर रहे हैं। गीली लेकिन दृढ़ आँखों के साथ, आनंद जी ने कहा कि उन्होंने जीवन में बहुत कुछ नहीं कमाया है। उन्होंने जो कमाया है वह एक ईमानदार मुख्यमंत्री बेटा। उन्होंने कहा कि अजय के माता-पिता के रूप में उनका जीवन धन्य है और आज उन्हें उस भिक्षु पर गर्व है जो इतने बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बन गया है। आनंद सिंह बिष्ट जी को मेरा अभिवादन!”

बता दें कि सीएम योगी आदित्यनाथ अंतिम बार अपने पिता के दर्शन भी नहीं कर सके। अपने व्यक्तिगत जीवन के ऊपर अपने कर्तव्य को रखते हुए योगी आदित्यनाथ ने फैसला किया है कि वह लॉकडाउन के नियमों का पालन करेंगे और अपने पिता के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होंगे। उन्होंने अपने पिता के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा, “पूज्य पिताजी के कैलाशवासी होने पर मुझे भारी दुःख एवं शोक है। वह मेरे पूर्वाश्रम के जन्मदाता हैं। जीवन में ईमानदारी, कठोर परिश्रम एवं नि:स्वार्थ भाव से लोक मंगल के लिए समर्पित भाव के साथ कार्य करने का संस्कार बचपन में उन्होंने मुझे दिया।”

महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ न करें कोई नकारात्मक टिप्पणी: IMA ने डॉक्टरों को दी हिदायत

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) की महाराष्ट्र इकाई ने राज्य में डॉक्टरों को सूचित किया है कि व्हाट्सएप ग्रुपों में राज्य सरकार के फैसलों के खिलाफ कोई ‘अपमानजनक’ टिप्पणी नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने कहा है कि वो व्हाट्सएप ग्रुप में मैसेज भेज सकते हैं, अपनी प्रतिक्रियाएँ दे सकते हैं, मगर इसकी भाषा ‘गैर-अपमानजनक’ होनी चाहिए।

दरअसल, एक पत्र सामने आया है, जिसमें IMA की महाराष्ट्र इकाई के प्रदेश अध्यक्ष डॉ अविनाश भोंडवे और राज्य सचिव डॉ पंकज बंदरकर के दस्तखत हैं। इसमें डॉक्टरों से कहा गया है कि उन्हें महराष्ट्र साइबर सेल से ‘सूचना’ मिली थी कि व्हाट्सएप ग्रुपों में कुछ डॉक्टर महाराष्ट्र सरकार और उनके अधिकारियों के खिलाफ टिप्पणी कर रहे हैं।

ऑपइंडिया द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह एक आधिकारिक पत्र है जो IMA की महाराष्ट्र इकाई के अध्यक्ष ने अपने व्हाट्सएप ग्रुपों में पोस्ट किया है। पत्र में कहा गया, “मुझे यकीन है, हम IMA के सदस्य समाज के प्रतिष्ठित लोग हैं और हम ऐसी किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं होंगे। हम कोरोना वायरस की महामारी को नियंत्रित करने के लिए अपना अभियान जारी रखेंगे।” पत्र को संगठन के सभी पदाधिकारियों को संबोधित किया गया था और उन्हें व्हाट्सएप ग्रुप पर सरकार की आलोचना के खिलाफ एहतियात बरतने के लिए कहा गया था।

उल्लेखनीय है कि कुछ दिनों पहले ही मुंबई के कस्तूरबा अस्पताल के कर्मचारी ने वीडियो बनाकर अस्पताल के अंदर PPE (Personal Protection Equipment) की कमी को उजागर करने की कोशिश की तो उनके खिलाफ कार्रवाई की गई। स्टाफ यह दिखाने की कोशिश कर रहा था कि PPE किट की कमी है, इसके बावजूद भी वो लोग अपनी जान को जोखिम में डालकर मरीजों का इलाज कर रहे हैं। उन्हें भी इस संक्रमण का खतरा है। आखिर वो भी तो इंसान ही हैं। मगर स्टाफ को PPE किट की बात को उजागर करना भारी पड़ गया।

कोरोना संकट से निपटने में नाकाम महाराष्ट्र सरकार

बता दें कि वुहान कोरोनावायरस संकट से निपटने के लिए महाराष्ट्र सरकार की काफी आलोचना हो रही है। आरोप लगाए गए हैं कि राज्य सरकार अपने प्रदेश में लॉकडाउन लागू कराने में बुरी तरह विफल रही है। हाल ही में, बांद्रा में एक मस्जिद के पास अफवाहों की वजह से प्रवासी मजदूरों का एक विशाल जमावड़ा इकट्ठा हुआ था, जो गलत सूचनाओं के कारण इकठ्ठा हुआ था। परिवार और स्वास्थ्य कल्याण मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार अभी तक राज्य में कोरोना संक्रमण के कुल 4203 मामले सामने आए हैं, जिनमें से 507 डिस्चार्ज हो गए हैं और 223 लोगों की मौत हो चुकी है।

पालघर में मारे गए साधु तो हिन्दू थे ही नहीं: ‘The Wire’ ने शुरू किया लिंचिंग पर प्रपंच फैलाने का गन्दा खेल

प्रोपेगंडा पोर्टल ‘द वायर’ ने पालघर में साधुओं की मॉब लिंचिंग को लेकर झूठ फैलाया है। इस प्रोपेगंडा पोर्टल को अमेरिकी सिद्धार्ध वरदराजन द्वारा चलाया जाता है। वैसे तो उसका फेक न्यूज़ फैलाने का पुराना इतिहास रहा है लेकिन इस बार तो उसने हद ही कर दी। पालघर में साधुओं की हत्या के बाद उसने उन साधुओं की पहचान पर ही प्रश्न खड़ा कर दिया और उनके हिन्दू होने पर भी शक जताया। और इसके दुर्भावना की हद यह है कि द वायर ने महाराष्ट्र के पालघर में जूना अखाड़े से जुड़े दो साधुओं की जघन्य मॉब लिंचिंग को लेकर भी अपना प्रोपेगेंडा नहीं छोड़ा है। ‘द वायर’ इसे लेकर भी घृणित प्रोपेगंडा फैला रहा है। जबकि ये विदित है कि ये साधु दशनामी थे और वो जूना अखाड़ा से जुड़े हुए हैं।

उसने दावा कर दिया कि ये साधु हिन्दू ही नहीं थे। प्रोपेगंडा पोर्टल ने दावा किया कि सोशल मीडिया ने उन्हें ऐसे ही साधु समझ लिया। जूना अखाड़ा के साधु हिन्दू नहीं हैं, इससे बड़ी बात क्या हो सकती है? ‘द वायर’ ने दावा किया कि ये दोनों साधु घुमन्तु प्रजाति के थे, जिसका आधार वाराणसी में है। यानी, उसने अखाड़े की पहचान छिपाने की कोशिश की, जो हिन्दू साधुओं का है।

The Wire doubt Hindu identity of two Juna Akhara sadhus, victims of Palghar lynching
द वायर में प्रकाशित लेख

द वायर ने यहाँ छुपाने का प्रयास किया है कि जूना अखाड़ा एक अन्वेषण हिंदू तपस्वी व्यवस्था है और किसी भी परिस्थिति में इसके बारे में कोई गलत व्याख्या नहीं की जा सकती है, जब तक कि कोई इसके प्रति दुर्भावना से प्रेरित न हो।

‘द वायर’ ने पहले तो जूना अखाड़ा को लेकर बात की थी लेकिन अगली ही रिपोर्ट में वो साधुओं को हिन्दू ही नहीं बताने लगा। अपने ही लेखों में इस तरह के विरोधाभास ‘द वायर’ जैसे मीडिया संस्थान ही रख सकते हैं। फ़रवरी 2019 में आज़मगढ़ के कन्हैया प्रभु नंदगिरि को महामंडलेश्वर बनाया गया था, जो दलित समुदाय से ताल्लुक रखते हैं।

‘द वायर’ ने अखाड़ा को ब्राह्मणवाद के प्रभाव वाला भी बता दिया था लेकिन उसे शायद ये पता नहीं कि वहाँ सभी जाति-संप्रदाय के साधु हैं। या फिर ये भी हो सकता है कि उसे सब पता हो लेकिन जनता को भ्रमित करने के लिए वो झूठ बोल रहा है। जब कुम्भ के समय दलित को महामंडलेश्वर बनाया गया था, तब ‘द वायर’ जैसे प्रपंची पोर्टलों ने इसे चुनाव से पहले दलित वोटों को लुभाने वाला उपक्रम भी करार दिया था। अब आप सोचिए, कि क्या ब्राह्मणवाद पर चलने वाला अखाड़ा दलित को महामंडलेश्वर बना देगा? ऐसा तो नहीं हो सकता।

लाशों पर प्रपंच फैलाने में लगा ‘द वायर’

बता दें कि गुरुवार (अप्रैल 16, 2020) को हुई इस घटना का वीडियो 3 दिन बाद रविवार को वायरल हुआ, जिसके बाद लोगों को सच्चाई पता चली थी। पालघर मॉब लिंचिंग का ये वीडियो दिल दहला देने वाला है। उस वीडियो को देख कर कोई भी काँप उठे। इस वीडियो में दिख रहे एक संदिग्ध व्यक्ति की पहचान को लेकर भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने जानकारी माँगी थी। पता चला है कि वो शरद पवार की पार्टी का आदमी है। उसका नाम काशीनाथ चौधरी बताया गया। लेकिन, मीडिया का एक बड़ा वर्ग इस पर चुप है।

नोट: यह अंग्रेजी में इस मूल लेख का अनुवाद है।

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मो शाहिद समेत 30 गिरफ्तार: खुद गए मरकज, विदेशी जमातियों को भी छिपाया

उत्तर प्रदेश में सरकार और पुलिस विभाग के बार-बार कहने के बावजूद तबलीगी जमात के लोग अब भी कई जिलों में पकड़े जा रहे हैं। ताजा मामला प्रयागराज का आया है। यहाँ पुलिस ने सोमवार (अप्रैल 20, 2020) को देर रात छापेमारी करके 30 लोगों को गिरफ्तार किया। इनमें से 19 लोग जमाती हैं, जिनमें 16 विदेशी (7 इंडोनेशिया और 9 थाईलैंड) के भी हैं। पुलिस ने जिन लोगों को पकड़ा है, उनमें एक इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर भी शामिल हैं।

राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर मोहम्मद शाहिद पर आरोप है कि उन्होंने विदेशी जमातियों को शरण दिलाने और चोरी से छिपकर रहने में मदद की थी। जिसके कारण पुलिस ने उन्हें भी महामारी एक्ट के तहत गिरफ्तार कर लिया। वहीं विदेशियों की गिरफ्तारी फॉरेनर्स एक्ट के तहत हुई। साथ ही जमातियों के साथ इनके 12 मददगार लोगों को भी गिरफ्तार किया गया। कुल मिलाकर तीन थाना क्षेत्रों से 30 लोगों की गिरफ्तारी हुई है।

पुलिस का कहना है कि दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज के तबलीगी जमात में शामिल होने के बाद कई जमाती प्रयागराज आए थे। इनमें वे जमाती भी थे, जो थाईलैंड और इंडोनेशिया के नागरिक थे और टूरिस्ट वीजा पर दिल्ली आए और फिर वहाँ से प्रयागराज आ गए। मगर, प्रदेश सरकार के सख्त निर्देशों के बावजूद कि जो भी जमाती राज्य में हैं वे सामने आ जाएँ, ये जमाती सामने नहीं आए। अब इनकी गिरफ्तारी करेली, शाहगंज और शिवकुटी इलाके से हुई।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इलाहाबाद के प्रोफेसर के बारे में पुलिस को खुफिया सूत्रों ने जानकारी दी थी कि शिवकुटी के रसूलाबाद में रहने वाले राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर शाहिद दिल्ली के मरकज में हुई तबलीगी जमात में शामिल होने गए थे। वहाँ से आने के बाद वह गुपचुप शहर आ गए लेकिन पुलिस या प्रशासन को इसकी सूचना नहीं दी।

इस सूचना के आधार पर पुलिस ने ताबड़तोड़ कार्रवाई करते हुए प्रोफेसर शाहिद को पकड़ा। बाद में उनके परिवार को क्वारंटाइन किया गया और फिर पड़ताल के बाद अन्य 19 जमातियों को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने बताया कि 19 जमातियों में से 16 इंडोनेशिया और थाइलैंड के रहने वाले हैं।

एसएसपी सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज ने इस संबंध में बताया कि पकड़े गए आरोपितों में इंडोनेशिया के 7, थाईलैंड के 9, केरल और पश्चिम बंगाल का एक-एक जमाती शामिल है। उन्होंने बताया कि शाहगंज की अब्दुल्ला मस्जिद और करेली की हेरा मस्जिद से जुड़े कई लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिन्होंने इन जमातियों को संरक्षण दिया। सभी आरोपियों को क्वारंटाइन किया गया है। वहाँ अतिरिक्त पुलिस फोर्स लगाई गई है।

बता दें कि इससे पहले योगी सरकार के मंत्री बृजेश पाठक ने कहा था कि जो लोग कोरोना को छुपा रहे हैं और फैला रहे हैं, उन पर अटेम्पट टु मर्डर का केस दर्ज होना चाहिए। इसके अलावा योगी सरकार ने सख्त आदेश देते हुए कहा था कि पुलिस दो दिन में सभी जमातियों को ढूँढे। उन्होंने कहा था कि अगर दो दिन में जमाती नहीं मिले, तो थानेदारों को खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

शराब तस्करी में कॉन्ग्रेस नेता गिरफ्तार, essential सर्विस वाली गाड़ी से हरियाणा से दिल्ली ला रहा था दारू

राजस्थान के टोंक में भड़काऊ पोस्ट शेयर करने के आरोप में कॉन्ग्रेस पदाधिकारी के गिरफ्तार होने के बाद अब महाराष्ट्र के एक कॉन्ग्रेस नेता को भी पुलिस ने हरियाणा से गिरफ्तार किया है। अधिकारी की पहचान श्रवण राव के रूप में हुई है। श्रवण पर हरियाणा में शराब तस्करी का आरोप लगा है। भाजपा नेता संबित पात्रा ने इसकी जानकारी अपने ट्विटर पर दी है। 

संबित पात्रा ने ट्वीट कर श्रवण की गिरफ्तारी के बारे में बताते हुए लिखा कि एक ओर भाजपा, RSS और स्वयं सेवी संगठन जरूरतमंदो के लिए कार्यरत हैं, वहीं दूसरी ओर कॉन्ग्रेस के नेशनल सेक्रेट्री (इंचार्ज महाराष्ट्र) और आपदा प्रबंधन के अध्यक्ष श्रवण राव को कल हरियाणा से दिल्ली जाते वक्त शराब तस्करी में गिरफ़्तार किया गया। उनकी गाड़ी पर essential सर्विस (कोरोना महामारी को देखते हुए आवश्यक वस्तुओं या सेवाकार्य में लगे लोगों के लिए) का पास भी लगा हुआ है।

संबित पात्रा ने अपने ट्वीट पर इस जानकारी के साथ एफआईआर की कॉपी भी शेयर की। जिसमें इस बात का उल्लेख था कि सब इंस्पेक्टर को एक मुखबिर ने बताया कि करीब 9 बजकर 10 मिनट के करीब एक सफेद रंग की स्कॉर्पियो गुड़गाँव की तरफ से दिल्ली की तरफ जाएगी। मुखबिर ने पुलिस को बताया कि इस स्कॉर्पियो में दो लड़के बैठे हैं, जो हरियाणा से सस्ती और अवैध शराब लाकर दिल्ली में बेचते हैं। ये लड़के आज भी शराब लेकर जाएँगे, अगर ऐसे में पहले से रेडी रहा जाए तो इन्हें पकड़ा जा सकता है।

संबित पात्रा द्वारा शेयर की गई एफआईआर

सूचना मिलने के बाद पुलिस मौके पर तैनात रही। थोड़ी देर में उन्होंने उसी नंबर वाली गाड़ी को सामने से आते देखा। मुखबीर ने भी इशारा करके बता दिया कि इसी गाड़ी में शराब है। जिसके बाद उन्होंने गाड़ी को रुकवाया। गाड़ी से दो युवक निकले। एक रामगाड़ू श्रवण और दूसरा बस्वराज शिल्ले। जब पुलिस ने गाड़ी की तलाशी ली तो इनकी गाड़ी से 12 बोतल शराब मिली। इसके बाद इन दोनों को गिरफ्त में लेकर गाड़ी में मिली अवैध शराब को और गाड़ी को जब्त किया गया।

गौरतलब है कि संबित पात्रा सहित सोशल मीडिया पर भी कई लोगों का कहना है कि एक ओर जहाँ आरएसएस इस महामारी के बीच जरूरतमंद लोगों की सेवा में जुटी हुई है। वहीं कॉन्ग्रेस के लोग शराब तस्करी जैसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं।

बता दें कि ये पहला मामला नहीं है, जब कानून के उल्लंघन के आरोप में किसी कॉन्ग्रेस नेता या अधिकारी को गिरफ्तार किया गया हो। इससे पहले राजस्थान के टोंक में पुलिसकर्मियों पर हमले वाली घटना पर सफाई देने और आरएसएस पर हमले को वाजिब ठहराने के आरोप में पुलिस ने कॉन्ग्रेस पदाधिकारी को गिरफ्तार किया था। जिसका कहना था कि अगर स्थानीयों को मालूम होता कि वाकई वे लोग (पुलिसकर्मी) बजरंग दल या आरएसएस के नहीं हैं, तो उन पर हमला कभी नहीं होता। रायपुर में भी शराब तस्करी को लेकर एक कॉन्ग्रेस नेता पकड़े गए।

मरीजों से डर नहीं लगता, खाना देखकर दुख होता है: दिल्ली की नर्सों ने जारी किया वीडियो, केजरीवाल सरकार पर सवाल

कोरोना संक्रमण से मरीजों की जान बचाने का बीड़ा उठाने वाले स्वास्थ्यकर्मियों में इन दिनों सभी को भगवान नजर आ रहे हैं। मगर क्या हो अगर ये स्वास्थ्यकर्मी ही अस्पतालों में इलाज करने से मना कर दें? या फिर संक्रमित मरीजों के पास आने से इंकार कर दें?

हालाँकि, किसी भी स्वास्थ्यकर्मियों के द्वारा बेवजह इस तरह का रवैया अभी तक किसी भी जगह से बहुत कम देखने को मिला है। मगर, ये जिम्मेदारी तो सरकार की है कि उनकी इस प्रतिबद्धता के बदले उन्हें हर सुविधा मुहैया कराई जाए और उनके स्वास्थ्य का भी ख्याल रखा जाए। लेकिन दिल्ली सरकार को देखकर लगता है कि वो मरीजों को डॉक्टरों-नर्सों के सहारे और डॉक्टर-नर्सों को भगवान के सहारे छोड़ चुके हैं।

जी हाँ, अभी हाल ही में दिल्ली के अस्पतालों से कुछ ऐसे मामले आए हैं। जिन्होंने दिल्ली सरकार पर सवाल खड़ा कर दिया है। बीते दिनों जीटीबी अस्पताल के स्वास्थ्यकर्मियों ने एक वीडियो के जरिए अपनी परेशानी बताई। उन्होंने वीडियो में बताया कि वे जीटीबी अस्पताल में नर्सिंग ऑफिसर के तौर पर तैनात हैं और उनकी ड्यूटी पिछले कई दिनों और महीने से कोरोना मरीजों के बीच लगी हुई है।

उनका कहना है कि वे अपना घर छोड़-छोड़कर यहाँ ड्यूटी निभा रहे हैं। लेकिन उन्हें इसका दुख नहीं होता। बल्कि दुख उन्हें खाना देखकर होता है। उनकी शिकायत है कि उन्हें खाना अच्छा नहीं मिल रहा। अगर खाना ठीक से नहीं खाएँगे तो इम्यूनिटी कैसे आएगी और कैसे वो ड्यूटी कर पाएँगे।

वे कहते हैं कि महामारी के बीच उन्हें मरीजों से डर नहीं लगता, उन्हें डर खाना देखकर लगता है। वे कहते हैं कि खाना देखते ही उन्हें बहुत दुख होता है कि वो कर्मचारी हैं और उन्हें क्या खाना मिल रहा है। वीडियो देखें तो मालूम चलता है कि इन कर्मचारियों को सुबह में सिर्फ़ 2 ब्रेड और 2 केले दिए जाते हैं। जिससे उनका पेट नहीं भरता।

जीटीबी में तैनात स्वास्थ्यकर्मी कहते हैं कि पिछले चार दिनों से उन्हें ठंडा खाना मिल रहा है। वे खाने को वीडियो में दिखाते हैं और कहते हैं कि उन्हें सिर्फ़ खाने के नाम पर दाल चावल दिया जा रहा है। उनके मुताबिक उन्हें हर टाइम चाहे लंच हो, डिनर हो या कुछ भी हो, उन्हें यही खाना दिया जाता है।

बता दें कि दिल्ली सरकार की लापरवाही को दर्शाती इस वीडियो को सोशल मीडिया पर धड़ल्ले से शेयर किया जा रहा है। भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने भी इसे शेयर किया है। उन्होंने इस मामले को उजागर करते हुए लिखा है कि दिल्ली में खाना बाँटने का एक और झूठ का पर्दाफाश हुआ है। उन्होंने इसे शेयर करते हुए लिखा कि स्वास्थ्यकर्मी अब भूखे पेट काम करने को मजबूर हैं। क्योंकि दिल्ली सरकार उन्हें खराब खाना दे रही हैं। उनका दावा है कि सरकारी अस्पताल के चिकित्सकों और नर्सों तक को इस समय खाना नहीं मिल रहा। लेकिन विज्ञापन के पैसों के दबाव में दिल्ली का मीडिया ये वीडियो नहीं दिखाएगा।

उल्लेखनीय है कि इस घटना ससे पहले एलएनजेपी अस्पताल के स्वास्थ्यकर्मियों ने भी शिकायत की थी। एक स्वास्थ्यकर्मी ने कहा था कि अस्पताल प्रशासन को उनकी कोई परवाह नहीं हैं। वे लगातार उन्हें बिन सुरक्षा उपकरणों के काम करने को मजबूर कर रहे हैं। न ही उन्हें खाना मिल रहा है और न ही सुविधाएँ। इसके अलावा एक डॉक्टर ने आरोप लगाया था कि कोविड-19 में वे अपनी ड्यूटी पूरा करने के लिए घर नहीं जा रहे हैं, लेकिन यहाँ उन्हें भोजन भी नहीं मिल रहा है। उन्होंने बताया था कि सुविधाओं के अभाव में उनके सहकर्मी ड्यूटी के दौरान बेहोश हो चुके हैं।

चीन को छोड़ भारत आएँगी 1000 कंपनियाँ, कोरोना इफेक्ट के कारण सरकार से चल रही बात

कोरोना वायरस की वजह से दुनिया भर की इकॉनमी रेंगती हुई नजर आ रही है। लेकिन इस माहौल में भी भारत के लिए एक अच्छी खबर है। दरअसल, चीन में सक्रिय करीब 1000 कंपनियाँ अब भारत में मौके की तलाश कर रही हैं।

जानकारी के मुताबिक कोरोना वायरस के कारण चीन में विदेशी कंपनियों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इस माहौल में लगभग 1000 विदेशी कंपनियाँ भारत में एंट्री की सोच रही हैं। इनमें से करीब 300 कंपनियाँ भारत में फैक्ट्री लगाने को पूरी तरह से मूड बना चुकी हैं। इस संबंध में सरकार के अधिकारियों से बातचीत भी चल रही है।

केंद्र सरकार के एक अधिकारी ने इसकी जानकारी दी। अधिकारी के मुताबिक, “वर्तमान में लगभग 1000 कंपनियाँ विभिन्न स्तरों जैसे इन्वेस्टमेंट प्रमोशन सेल, सेंट्रल गवर्नमेंट डिपार्टमेंट्स और राज्य सरकारों के साथ बातचीत कर रही हैं। इन कंपनियों में से हमने 300 कंपनियों को लक्षित किया है।” अधिकारी का कहना है कि कोरोना वायरस के नियंत्रण में आने के बाद स्थिति हमारे लिए बेहतर होगी और भारत वैकल्पिक मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में उभरेगा।

उन्होंने कहा, “हम इस बात को लेकर आशान्वित हैं कि एक बार जब कोरोना वायरस महामारी नियंत्रण में आ जाती है, हमारे लिए कई फलदायक चीजें सामने आएँगी और भारत वैकल्पिक मैन्युफैक्चरिंग गंतव्य के रूप में उभरेगा। जापान, अमेरिका तथा दक्षिण कोरिया जैसे कई देश चीन पर हद से ज्यादा निर्भर हैं और यह साफ दिख रहा रहा है।”

बिजनेस टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, लक्षित 300 कंपनियाँ मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मेडिकल डिवाइसेज, टेक्सटाइल्स और सिंथेटिक फैब्रिक्स के क्षेत्र में सक्रिय हैं और अब भारत में आना चाहती हैं। अगर सरकार की ओर से पॉजिटिव रिस्पॉन्स रहा तो यह चीन के लिए बड़ा झटका होगा। इसके साथ ही चीन के हाथों से मैन्युफैक्चरिंग हब का तमगा छिन जाने का खतरा मंडराने लगेगा।

चीन को चुकानी पड़ सकती है भारी कीमत

बता दें कि चीन एक महत्वपूर्ण अवधि के लिए दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग हब रहा है, मगर अब वुहान कोरोना वायरस महामारी पर अंकुश लगाने में विफल रहने के लिए देश को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

कुछ समय के लिए यह स्पष्ट है कि चीन, जो एक महत्वपूर्ण अवधि के लिए दुनिया का विनिर्माण केंद्र रहा है, को वुहान कोरोनावायरस महामारी पर अंकुश लगाने में विफल रहने के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। बताया जा रहा है कि वुहान कोरोना वायरस वास्तव में एक बॉयोवेपन हो सकता है जो चीन की एक लैब से गलती से लीक हो गया था। इसके साथ ही इन प्रयोगशालाओं में अपर्याप्त सुरक्षा प्रोटोकॉल भी सवालों के घेरे में आ गए हैं।

चीन के खिलाफ उठती आवाजें

अमेरिका ने कोरोना वायरस का जिम्मेदार सीधे तौर पर चीन को बताया है। दरअसल, हाल में जिस तरह के खुलासे सामने आए हैं कि चीन ने कोरोना वायरस के संक्रमण की भयावहता को छिपाने की कोशिश की और इसकी उत्पत्ति को लोगों के सामने नहीं आने दिया। इससे पहले शनिवार को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि अगर चीन ने यह जानबूझकर किया है तो उसे इसके परिणाम भुगतने पड़ेंगे। इसके बाद से ही डोनाल्ड ट्रम्प संयुक्त राज्य अमेरिका में विनिर्माण के लिए बुला रहे हैं।

इसी तरह कोरोना वायरस के वैश्विक महामारी में चीन की भूमिका और उसके रवैये के बाद जापान सरकार ने चीन में काम कर रही अपनी कंपनियों को वहाँ से शिफ्ट करने के लिए कहा है। 

जर्मनी ने चीन को वैश्‍विक महामारी फैलाने का आरोप लगाते हुए 130 बिलियन पाउंड का बिल भेजा है। जर्मनी के सबसे बड़े टैबलॉयड न्यूजपेपर ‘बिल्ड’ में एक संपादकीय छपा, जिसमें 130 बिलियन पाउंड का अनुमानित नुकसान बताया गया है। इस लिस्ट में 27 मिलियन यूरो का नुकसान पर्यटन को हुआ है, 7.2 मिलियन यूरो का नुकसान फिल्म इंडस्ट्री को हुआ, एक मिलियन यूरो का नुकसान जर्मन एयरलाइंस लुफ्तहांसा, 50 बिलियन यूरो का नुकसान जर्मनी के छोटे उद्यमियों को हुआ। बिल्ड के अनुसार कुल 1784 यूरो का नुकसान प्रति व्यक्ति को हुआ है और देश की जीडीपी 4.2 फीसदी गिर गई, ऐसे में इन तमाम नुकसान के लिए चीन जिम्मेदार है।

कोरोना महामारी से निपटने में चीन के प्रयासों पर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी सवाल उठाए हैं। ब्रिटिश अखबार फाइनेंशियल टाइम्स को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि कुछ ऐसी चीजें घटित हुई हैं जिनके बारे में हमें पता नहीं है। 

मैक्रों से जब पूछा गया कि चीन की अधिनायकवादी प्रतिक्रिया (सब कुछ नियंत्रण में) से पश्चिमी देशों के लोकतंत्र की कमजोरी का पता नहीं चलता है तो उन्होंने कहा, “हमारे यहाँ की सरकारों से उन लोगों की तुलना नहीं की जा सकती है, जहाँ पर सच को दबाया जाता है। हम नहीं जानते, लेकिन स्पष्ट रूप से कुछ ऐसी चीजें घटित हुई हैं, जिनके बारे में हमें नहीं पता है।”