कोरोना वायरस महामारी के ईलाज में इस्तेमाल की जा रही मलेरिया की दवाई हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन की माँग इन दिनों चारों ओर से है। ऐसे में इसके निर्यात को भारत सरकार से मंजूरी मिलने के बाद कई देश फूले नहीं समा रहे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना संकटमोचक हनुमान की तरह कर रहे हैं। अभी कल की यदि बात करें तो अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत से मदद मिलने के बाद देश के लोगों व पीएम मोदी को आभार प्रकट किया था और कहा था कि वे इस मदद को कभी नहीं भूलेंगे। अब इसी सूची में इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का नाम भी जुड़ गया है।
इजराइल के प्रधानमंत्री ने गुरुवार को ट्वीट कर हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्लीन उपलब्ध कराने पर पीएम मोदी को अपना प्रिय दोस्त बताते हुए धन्यवाद कहा। नेतन्याहू ने अपने ट्वीट में लिखा, “क्लोरोक्वीन भेजने के लिए शुक्रिया, मेरे प्रिय दोस्त नरेंद्र मोदी। इजराइल के सभी नागरिकों की ओर से आपको धन्यवाद।”
Thank you, my dear friend @narendramodi, Prime Minister of India, for sending Chloroquine to Israel.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 3 अप्रैल को बेंजामिन नेतन्याहू के साथ टेलीफोन पर बातचीत की थी। जहाँ दोनों नेताओं ने कोरोना वायरस महामारी और स्वास्थ्य संकट के लिए अपनाई गई रणनीतियों पर चर्चा की थी। इसके अलावा खबर ये भी है कि इजराइल इस कोविड-19 वायरस को लेकर मार्च से ही भारत के संपर्क में रहा। जिसके चलते बेंजामिन नेतन्याहू ने इस संबंध में 13 मार्च को भारतीय प्रधानमंत्री से आग्रह कियाथा कि वे मास्क और अन्य जरूरी चीजें निर्यात करने की छूट दें।
उनके अलावा कई अन्य देशों ने भी भारत से ये गुहार लगाई थी। फिर भारत ने मंगलवार को इसके निर्यात पर लगी रोक को आंशिक रूप से हटा लिया और गुरुवार को भारत द्वारा भेजी गई 5 टन दवाइयाँ इजरायल पहुँच गईं, जिनमें हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन भी शामिल थी। जिसके बाद नेतन्याहू का ट्वीट आया।
बता दें कि भारत दुनिया में हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का सबसे बड़ा निर्माता है। लेकिन विदेश व्यापार महानिदेशालय ने देश में संक्रमण से संबंधित मामलों में तेजी से वृद्धि को देखते हुए दवा और इसके अवयवों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। भारत की ओर से हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के निर्यात पर खुशी जताते हुए ट्रंप ने कहा था कि संकट की इस घड़ी में भारत की मदद को भुलाया नहीं जाएगा। उन्होंने मोदी की सराहना करते हुए उन्हें महान नेता बताया।
वहीं ब्राजील के राष्ट्रपति ने कहा कि वह ब्राजील के लोगों की समय पर की गई इस मदद के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत के लोगों को धन्यवाद देते हैं। प्रधानमंत्री मोदी को भेजे अपने पत्र में राष्ट्रपति जायर एम बोल्सोनारो ने लिखा कि भगवान राम के भाई लक्ष्मण की जिंदगी बचाने के लिए हिमालय से दवा (संजीवनी बूटी) लेकर आने वाले भगवान हनुमान और बीमारों को स्वस्थ करने वाले यीशु मसीह की तरह भारत और ब्राजील मिलकर इस वैश्विक संकट का सामना करेंगे।
बिहार के मधुबनी में 5 अप्रैल की रात एक 70 वर्षीय दलित महिला काला देवी (उर्फ कैली देवी) की हत्या कर दी जाती है। हत्या को अंजाम देने के बाद सुलेमान नदाफ, मलील नदाफ और शरीफ नदाफ फरार हैं। फरार होने से पहले और उसके बाद भी आरोपित लगातार गाँव के सरपंच फकरे आलम के संपर्क में है। वो उनसे मुलाकात भी करते हैं और अब पता चला है कि फकरे आलम हत्यारों को बचाने की पूरी कोशिश में जुट भी गए हैं। उन्होंने हत्यारों को बचाने के लिए पूर्व मुखिया को फोन करके पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट को बदलवाने की कोशिश की।
इन सारी बातों का खुलासा किया है खुद मृतक महिला के बेटे सुरेंद्र मंडल ने। उन्होंने बताया कि फकरे आलम ने जिस व्यक्ति को फोन करके रिपोर्ट बदलवाने की कोशिश की, उन्होंने खुद आकर उनको बताया। सुरेंद्र ने बताया कि फकरे आलम रिपोर्ट बदलवाने के लिए उस व्यक्ति से मिलने भी गया था। हालाँकि, फिलहाल सुरेंद्र उस शख्स का नाम उजागर नहीं करना चाहते हैं। उन्होंने हमसे फिलहाल उनके नाम को गुप्त रखने के लिए कहा है। मगर उन्होंने इतना जरूर कहा है कि समय आने पर वो उनके नाम का भी खुलासा करेंगे।
इतना ही नहीं, सुरेंद्र ने तो हमें यह भी बताया कि न सिर्फ हत्यारों को बचाने की कोशिश की जा रही है, बल्कि उनके परिवार को बदनाम भी किया जा रहा है। सुरेंद्र ने कहा, “गाँव में लोगों ने अफवाह उड़ा दी है कि हमने दूसरे मजहब के परिवार से 2 लाख रुपए लेकर मामले को रफा-दफा कर दिया है। ये बिल्कुल गलत बात है। हमने ऐसा कुछ भी नहीं किया है और न ही करेंगे। हम तो कहते हैं कि 1 लाख रुपया मेरे से और ले लो और दोषियों को सजा दो। हमें पैसे नहीं, इंसाफ चाहिए। हमारी माँ चली गई, उनकी मौत नहीं हुई, उनकी हत्या की गई। हमारा एक जान चला गया। हम पैसा लेकर क्या करेंगे? हमें तो बस इंसाफ चाहिए।”
ऑपइंडिया से बात करने के दौरान उन्होंने प्रशासन से भी नाराजगी जताई। उनका कहना है कि उन्हें लोगों से पता चल रहा है कि तीनों आरोपित लगातार सरपंच फकरे आलम से मिलने आते हैं, तो फिर पुलिस उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं कर पा रही है। इस पर उन्होंने आगे कहा, “प्रशासन ने हमसे कहा था कि आरोपितों को गुरुवार (अप्रैल 9, 2020) तक पकड़ लिया जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। अब हम और यहाँ के स्थानीय नागरिक चाहते हैं कि आरोपितों को जिस किसी ने भी अपने यहाँ शरण दिया है, अपने यहाँ छुपाया है, उसे भी दोषी माना जाए और कठोर से कठोर सजा दी जाए।” वैसे ये तो कानून भी है कि गुनाह में साथ देने वालों को भी गुनहगार माना जाएगा।
जैसा कि हमने अपनी पिछली रिपोर्ट में बताया था कि दोषियों को बचाने में राष्ट्रीय जनता दल के विधायक फैयाज अहमद का भी हाथ माना जा रहा है। हालाँकि, इसकी अभी पुष्टि नहीं हो पाई है, लेकिन सुरेंद्र ने बताया कि सरपंच फकरे आलम, फैयाज का रिश्तेदार है और दोनों एक ही समुदाय और एक ही जगह के रहने वाले हैं। ऐसे में उन्होंने आशंका जताई है कि हो न हो इसमें फैयाज अहमद की भी मिलीभगत है। वरना कथित अल्पसंख्यकों के दो घरों में छोटी से छोटी समस्या में दौड़कर आने वाले विधायक जी इतनी बड़ी घटना होने के बाद भी गाँव में क्यों नहीं आए? क्या वो हिंदुओं के विधायक नहीं हैं?
अब सोचने वाली बात यह है कि एक बुजुर्ग दलित महिला की गला दबाकर हत्या कर दी जाती है, लेकिन असहिष्णुता का राग अलापने वाले ये झंडाबरदारों ने एक शब्द तक नहीं कहा। आखिर क्यों? इस हत्या पर न तो तथाकथित सेक्युलर बोल रहे और न ही असहिष्णुता के पैरोकार। इस हत्या पर असहिष्णुता के पैरोकारों ने क्यों चुप्पी साध रखी है? हम आपको बताते हैं कि इस घटना पर कोई सेक्युलर पैरोकार आगे क्यों नहीं आया, क्योंकि यहाँ पर एक हिंदू मारा गया था। आखिर क्यों इन बुद्धिजीवी लोगों को सिर्फ मजहब विशेष के लोगों मरने पर देश में असहिष्णुता नजर आती है? अवार्ड वापसी इन्हें तब ही क्यों याद आती है?
मगर जैसे ही किसी दूसरे मजहब के व्यक्ति की मौत होती है, मामले को तूल देकर ऐसा रंग दिया जाता है, जिससे लगे कि देश में ‘मजहब विशेष पर अत्याचार’ हो रहे हैं। दरअसल सच्चाई तो यह है कि इनकी इस समुदाय के लोगों के साथ भी कोई सहानुभूति नहीं है। ये तो अपने पेशे को चमकाने और राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए ये लोग ऐसा करते हैं। ये लोग किसी एक घटना को इस तरीके से दुनिया को बताने और जताने का प्रयास करते हैं मानो पूरे भारतवर्ष का यही माहौल हो। जबकि इसके उलट जो मामले इनको ‘फायदे वाले’ नहीं लगते उन पर चुप्पी साध लेते हैं।
यदि कोई हिंदू की हत्या की जाती है, तो चुप्पी साध ली जाती है। स्क्रीन काली कर डालने वाले, हर चीज में ‘मजहब पर अत्याचार’ ढूँढ़ने वाले मीडिया के एक खास वर्ग के लिए यह खबर नहीं होती। सेकुलरिज्म का चश्मा लगाए चैनलों पर बहस करने वाले पत्रकार ऐसी घटनाओं पर खामोश हो जाते हैं। कथित बुद्धिजीवी दलीलें देते हैं कि मामले को मजहब के नजरिए से न देखा जाए।
‘सेलेक्टिव जर्नलिज्म’ (मजहब, जात, सुविधा देखकर होने वाली पत्रकारिता) और ‘सेलेक्टिव क्रिटिसिज्म’ (सुविधा के हिसाब से मुद्दों को आलोचना के लिए चुनना) वाला एक तबका लंबे समय से देश के मीडिया पर काबिज है। ये वही लोग हैं, जिनके लिए अपराध में जहाँ मजहब विशेष के लोग शामिल हों, इनकी परिभाषा बहुत सरल है- अपराध का और अपराधियों का कोई मजहब नहीं होता। पूरी दुनिया में फैले मजहबी आतंकवाद का इनकी निगाह में ‘कोई मजहब नहीं’ है।
एक तरफ पूरा विश्व कोरोना की महामारी से जूझ रहा है। लेकिन पूरे विश्व को कोरोना की सौगात देने वाला चीन अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। चीन ने एक बार फिर अपना असली चेहरा दिखाते हुए पाकिस्तान की भाषा में कश्मीर राग अलापा है, लेकिन इस बार भारत ने साफ शब्दों में जवाब देते हुए कहा है कि चीन को अच्छी तरह पता है कश्मीर पर भारत का रुख क्या है, लिहाजा चीन हमारे आंतरिक मामले में दखल न दे।
#China and Pakistan both are virus of humanity on earth nd having same thinking.##№KASHMIR ISSUE IN UN: कोरोना से जंग के बीच चीन की कश्मीर पर चाल, भारत ने दिया जवाब- हमारे घर में न दें दखल – india…https://t.co/VVK3CsOcF7
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने चीन के प्रवक्ता द्वारा कश्मीर पर दिए गए बयान को खारिज करते हुए कहा कि कहा, “चीन को इस मुद्दे पर हमारा रुख पता है। जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और रहेगा। जम्मू-कश्मीर से जुड़ा मुद्दा भारत का आंतरिक मसला है। कश्मीर मुद्दे पर भारत किसी भी देश की टिप्पणी को स्वीकार नहीं कर सकता।”
श्रीवास्तव ने आगे कहा कि इसलिए हमारी अपेक्षा है कि चीन सहित सभी देशों को हमारे आतंरिक मामले से दूर रहना चाहिए और भारत की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करना चाहिए। हम चीन से यह भी उम्मीद करते हैं कि वह सीमा पार से हो रहे आतंकवाद और इससे भारत में जीवन पर पड़ रहे असर को समझेगा।
आपको बता दें कि इससे पहले चीनी प्रवक्ता ने कहा था कि पेइचिंग कश्मीर के हालात पर नजर रखे हुए हैं और हमारा रुख इस पर नहीं बदला है। कश्मीर मुद्दे का इतिहास शुरू से ही विवादित रहा है और इसका समाधान संयुक्त राष्ट्र के चार्टर, सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों और द्विपक्षीय तरीके से होना चाहिए।” याद रहे कि कश्मीर पर चीन की यह कोई पहली टिप्पणी नहीं बल्कि पाकिस्तान को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए चीन समय-समय पर पाक के साथ कश्मीर राग अलापता रहता है।
गौरतलब है कि पिछले वर्ष गृहमंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में विशेष बिल पेश कर जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने की सिफारिस की थी। इसके बाद राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा अनुमोदित होते ही जम्मू-कश्मीर के सभी विशेष अधिकार समाप्त हो गए थे। तभी से जम्मू-कश्मीर में पूरे देश के समान कानून लागू होते हैं। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटने के बाद से ही चीन और पाकिस्तान कश्मीर पर अपना-अपना राग अलापते रहते हैं।
इस बात में कोई संदेह नहीं है कि कोरोना वायरस के बढ़ते प्रभाव के लिए तबलीगी जमात के लोग जिम्मेदार हैं। पूरा देश इस समय उन्हें, उनकी हरकतों के लिए कोस रहा है। इस बीच शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी ने भी इस जमात पर एक गंभीर आरोप लगायाहै।
उनका कहना है कि इन जमातियों का उद्देश्य पूरे देश में 1 लाख से ज्यादा लोगों को मारने का था। उनका आरोप है कि ये जमात इस समय मलेशिया में छिपे भगौड़े जाकिर नाइक की बी टीम की तरह काम कर रही है और इन्हीं जमातियों की मदद से उसने भारत में आत्मघाती हमले की साजिश रची है। गुरुवार को दिए इस बयान को शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन ने किस आधार पर बोला, ये निश्चित ही पड़ताल के बाद मालूम होगा। लेकिन अभी उनके इस खुलासे ने हलचल मचा दी है।
उन्होंने कहा कि मुमकिन है कि इस साजिश में मलेशिया में रह रहे जाकिर नाइक भी शामिल हों। उन्होंने कहा कि जिस तरह से मलेशिया के जमाती मिल रहे हैं, उससे जाकिर नाइक की साजिश से इनकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि तबलीगी जमात जाकिर नाइक की बी टीम की तरह काम कर रहा है।
इसके बाद, देश में लगातार डॉक्टरों के साथ मारपीट करने की जमातियों की खबर पर वसीम रिजवी ने कहा कि डॉक्टरों को परेशान करके उनका मनोबल कम करने की कोशिश की जा रही है। यह भी इन सभी तबलीगी जमातियों की साजिश का एक हिस्सा है।
एक लाख हिंदुओं को मारने की थी साज़िश ये साज़िश जाकिर नाइक के द्वारा रची गयी -:वसीम रिजवी
हिंदुओं सावधान , अब आतँकवादी दूसरे मुल्कों में नही बल्कि हम और तुम्हारे बीच मे पल बढ़ रहे हैं ! pic.twitter.com/HHFMq5OES3
— Pushpendra Kulshrestha (@PureDehati) April 9, 2020
बता दें, वसीम रिजवी के इस बयान के बाद इसपर सियासत तेज हो गई है। शिया धर्म गुरु सैय्यद मोहम्मद मेंहदी ने वसीम रिजवी के बयान पर सवाल उठाते हुए कहा कि ‘वसीम क्राइम ब्रांच अथवा सीबीआई के डायरेक्टर हैं क्या जो इन्हें इस तरह की जानकारी मिल रही है? साथ ही उन्होंने तंज कसते हुए यह भी कहा कि उनके (रिजवी) बयान से साफ है कि वे साजिशकर्ताओं के संपर्क में है जिसके कारण उन्हें इस तरह की जानकारी मिली है, इसलिए सबसे पहले इन्हें जेल में डालकर इनसे पूछताछ होनी चाहिए। उन्होंने कहा रिजवी जैसे लोग सांप्रदायिकता की राजनीति कर रहे है और समाज में विद्वेष फैला रहे है।
धर्मगुरु का कहना है कि राम मंदिर के फैसले के समय भी वसीम रिजवी ने उल्टे सीधे बयान देकर समाज को बाँटने का प्रयास किया था और अब जमातियों के बारे में बयान दिया जा रहा है। उन्होंने वसीम रिजवी को सलाह देते हुए कहा कि वो शिया वक्फ़ बोर्ड के चेयरमैन हैं इसलिए वो वक्फ़ की बात करें और उसकी भलाई के बारे में सोचें यही उनके लिए बेहतर है। उन्होंने कहा कि रिजवी जितना षडयंत्र यह बता रहे हैं और कह रहे हैं कि जमाती एक लाख लोगों को मारना चाहते हैं तो इस संबंध में उन्हें सुबूत देना चाहिए।
गौरतलब है कि वसीम रिजवी इससे पहले ईरान से एक फतवा मँगाकर इन तबलीगी जमातियों के खिलाफ कार्रवाई की माँग कर चुके हैं। वसीम ने कहा था कि ईरान के फतवे में यह कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति महामारी को फैलाता है तो इसका जिम्मेदार वही होता है। अगर इसकी वजह किसी की मौत हो जाती है तो उसका जि़म्मेदार भी वही होगा। इतना ही नहीं इलाज का पूरा खर्चा भी उसी को देना होगा। लिहाजा मरकज के मुखिया होने के नाते मौलाना साद से जुर्माना वसूला जाए।
आज पूरी दुनिया कोरोना जैसी भीषण महामारी से जूझ रही है, लड़ रही है। दुनिया का शायद ही ऐसा कोई कोना बचा होगा, जहाँ ये महामारी ना पहुँची हो। सभी पीड़ित राष्ट्र अपने-अपने तरीकों से अपने लोगों को बचाने में लगे हुए हैं। भारत समेत कई सारे राष्ट्र इस महामारी से बचने के लिए वैक्सीन की खोज में भी लगे हुए है परंतु अभी तक कुछ ठोस नहीं हो पाया है।
सारे पीड़ित राष्ट्रों में पीपीई किट एवं मास्क की बढ़ती माँग को लेकर उहापोह की स्थिति बनी हुई है। इस संदर्भ में भारत अग्रणिम राष्ट्रों में से एक है, जिसने चीन से लेकर कई सारे राष्ट्रों की मदद की है। भारत विश्वगुरु की तरह ये मदद अभी भी कर रहा है। अभी हाल ही में भारत ने अमेरिका, ब्राजील एवं कई पड़ोसी मुल्कों की हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वाइन दवा की माँग को पूरा किया है। किसी राष्ट्र ने भारत को जबरदस्त दोस्त, तो किसी ने PM मोदी को प्रभु हनुमान का नाम दे दिया। यहाँ हमारे प्रधानमंत्री का अलग रूप देखने को मिलता है, जिसे अगर मानवता का दैवीय रूप कहें तो अतिरेक ना होगा।
ये तो रही बात दवा एवं बीमारी की, जो फिलहाल बेहद महत्वपूर्ण बात है। लेकिन एक और सबसे महत्वपूर्ण बात है जिसकी तरफ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा वो है कि जब भारत समेत पूरी दुनिया लॉकडाउन मोड में है तो क्या ये न सोचा जाए कि कोई भूख से ना मरे? जरूरतमंद लोगों की कतार बड़ी लंबी है, जो भूख से परेशान हैं।
लॉकडाउन की वजह से गरीब एवं जरूरतमंद लोगों के पास रोजी-रोटी के साधन छिन गए हैं। ये वो लोग हैं, जो रोज कमाते और उसी कमाई से रोज खाते हैं। इन्हें आप चाहे तो दिहाड़ी का मजदूर भी कह सकते हैं। जिनके पास कोई बैंक बैलेंस नहीं होता है। ये तबका हमेशा चोट खाता है। आज फिर से इन्हें चोट खानी पड़ रही है परंतु इस बार दोष सरकार का नहीं बल्कि इस गंभीर बीमारी का है, जिसने लोगों में त्राहिमाम जैसी स्थिति पैदा कर दी है।
हमारी संस्कृति एवं सभ्यता के अनुरूप हमेशा की भाँति इस विपरीत परिस्थिति में बहुत लोग सड़कों पर आकर गरीब एवं जरूरतमंद लोगों में खाना एवं जरूरत की चीजों को बाँट रहे हैं। हर कोई अपने-अपने तरीकों से गरीब एवं असहाय की मदद कर रहा है। इस पंक्ति में कई सारे व्यक्ति, नेता, समाज सेवक, समाजसेवी संस्था, व्यापारी शामिल हैं।
परंतु कुछ लोगों का तो प्रयास ही अनूठा है, जिसमें बीजेपी के नेशनल गुड गवर्नेंस सेल के प्रमुख, राज्यसभा सांसद एवं पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ विनय सहस्रबुद्धे का नाम अग्रणी है। आप यूँ भी कह सकते हैं कि इनका प्रयास सबसे अलग है। इनका प्रयास दो स्तरों पर जारी है:
फूड पैकेट्स तैयार करते डॉ विनय सहस्रबुद्धे
पहला प्रयास वो जो काफी लोगों से मेल खाता है और वह है लोगों हेतु भोजन एवं जरूरत की चीजों की व्यवस्था करना। डॉ विनय सहस्रबुद्धे के निर्देशन में दिल्ली के करीब 1700-2000 गरीब एवं जरूरतमंद लोगों को प्रतिदिन मुफ्त भोजन वितरित किया जा रहा है। इस संदर्भ में गुड गवर्नेंस सेल के सदस्य वीरेंद्र सचदेवा की अहम भूमिका है, जिन्होंने दिल्ली के मयूर विहार फेज-1 में एक स्पेशल किचन तैयार करवाया है। यहाँ दिन-रात काम जारी है।
फूड पैकेट्स का वितरण करते डॉ विनय सहस्रबुद्धे
मयूर विहार के किचन में प्रतिदिन जरूरत के हिसाब से खाने के पैकेट्स तैयार किए जाते हैं और इसे दिल्ली के विभिन्न इलाकों की झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले गरीब और जरूरतमंद लोगों में वितरित किया जाता है। समय-समय पर डॉ विनय सहस्रबुद्धे इस किचन का दौरा भी करते रहते हैं और उसी के अनुरूप जरूरी दिशा-निर्देश भी देते रहते हैं।
यह पुनीत कार्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 24 मार्च को लॉकडाउन की घोषणा किए जाने के बाद से ही प्रारंभ कर दिया गया था। तब से ही भोजन वितरण काम शुरू कर दिया गया था। भोजन के अलावा जो जरूरत की चीजें जरूरतमंद लोगों के बीच बाँटी जाती है, उनमें दाल, चावल, तेल, मसाले व अन्य चीजें भी शामिल हैं।
बात इतने से ही नहीं रुकती। डॉ विनय के निर्देशन में इंडियन सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी नेटवर्क (आईएसआरएन) नाम की संस्था भी काम कर रही है। ये संस्था आनंद विहार और अन्य जगहों पर लोगों में जरूरत की चीजों का वितरण करवा रही है। साथ ही साथ, इस संस्था ने एक ‘वॉलिंटियर रिज़र्व फोर्स’ का गठन भी किया है। जो लोग इस संकट की घड़ी में समाज और देश के लोगों की मदद करना चाहते हैं, वे इस प्लेटफॉर्म से जुड़ कर मदद कर सकते हैं।
और सबसे अंत में डॉ विनय सहस्रबुद्धे के दूसरे अनूठे प्रयास की कहानी। इसका भी उद्देश्य वही है, यानी समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की मदद, जिसे महान विचारक स्वर्गीय दीनदयाल उपाध्याय ने अंत्योदय की संज्ञा दी है। इस नए तरह के प्रयास/व्यवस्था के माध्यम से लोग मदद प्राप्त भी कर भी सकते हैं और मदद कर भी सकते हैं।
इसमें एक अलग तरीके के प्लेटफॉर्म की स्थापना की गई है, जहाँ दो तरह के लोगों को आपस में कनेक्ट किया जा रहा है। एक वो जो सहायता पाना चाहते हैं और दूसरे वो जो सहायता करना चाहते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो इसे “सीकर्स एंड गिवर्स” प्लेटफॉर्म के नाम से भी समझा जा सकता है। इस अनूठे प्लेटफॉर्म का नाम “आई-कैन: इंडिया को-विन ऐक्शन नेटवर्क (I-CAN: India Co-Win Action Network)” है, जिसे डॉ विनय सहस्रबुद्धे ने दो संस्थाओं (अटल इन्क्यूबेशन सेंटर-रामभाऊ म्हाळगी प्रबोधिनी एवं कनेक्टिंग ड्रीम्स फाउंडेशन) के संयुक्त माध्यम से लॉन्च किया है।
अब तक 25 राज्यों से करीब 2,000 से ज्यादा कोविन वॉरियर्स (सहायता देने वाले) इस प्लेटफॉर्म से जुड़ चुके हैं। साथ ही साथ करीब 25,000 जरूरतमंद लोगों को मदद भी मिल चुकी हैं। डॉ विनय का उद्देश्य बड़ा ही पुनीत है और वो यह है कि “कोई भी भूखा ना रहे। वो प्रधानमंत्री मोदी के उद्देश्य “सबका साथ, सबका विकास” को लेकर सदैव आगे बढ़े हैं। और आज एक बार फिर इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए वो बहुतेरे कदम उठा रहे हैं, जो कि सराहनीय है।
कोरोना वायरस महामारी ने फुल टाइम प्रोटेस्ट में पारंगत एक्टिविस्ट जमात को ज्ञान बाँटने का बहुत सही मौका उपलब्ध कराया है। यह ब्रिगेड आजकल सिर्फ इतना ही बताने में व्यस्त है कि महामारी को रोकने के लिए सरकार को किस प्रकार के प्रयास करने थे और कौन सा कदम उठाने से बचना चाहिए था। इन एक्टिविस्ट्स का फोकस सिर्फ इस बात पर रहता है कि सरकार ने क्या-क्या गलतियाँ कीं, जो प्रधानमंत्री मोदी के प्रति इनकी निरंकुश घृणा से पैदा हुए ‘वर्ल्डव्यू’ पर आधारित होती है।
ठीक उसी समय ये तबलीगी जमात के ‘सुपर स्प्रेडर्स’ को बेशर्मी पूर्वक बचाते भी दिखते हैं। सिर्फ इसलिए कि उनका मजहब उन्हें ‘लॉकडाउन’ का उल्लंघन करने, थूकने और कॉरिडोर्स में मल-मूत्र त्यागने की इजाजत देता है। जब विश्व कोरोना महामारी से निपटने के लिए उठाए गए मोदी के कदमों की प्रशंसा करता है, ये स्टूडियोज में मौन व्रत धारण कर बैठ जाते हैं। ये एक्टिविस्ट्स जिनकी चिंता में दुबला होने का स्वांग रचते घूमते हैं इस आपदा के समय उनके लिए ऊँगली तक हिलाते नहीं दिखते। ऐसी ही एक फुल टाइम प्रोटेस्टर और पार्ट टाइम एक्ट्रेस हैं, नंदिता दास।
कोरोना लॉकडाउन किस तरह प्रवासी मजदूरों पर प्रभाव डाल रहा है, इस पर एनडीटीवी से चर्चा करते हुए हाल ही में नंदिता दास ने टिप्पणी की थी कि यहाँ दो तरह के भारत मौजूद हैं। पहला, वह जो घर जाने और खाने के लिए मीलों पैदल चलता है। दूसरा, वह जो अपने वाइन के इंतजाम के लिए परेशान है।
नंदिता दस का स्टेटमेंट ( source : NDTV )
नंदिता दास का यह बयान अपने आप में गलत नहीं है, क्योंकि सच में भारत में एक महान विभाजन मौजूद है। लेकिन जब आप सोचते हैं कि यह बयान किसी तरफ से आया है तो मुँह दबा कर हँसते हुए यह सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि आखिर कोई खुलेआम इतना दोमुँहा बर्ताव कैसे कर लेता है।
वैसे तो नंदिता दास खुद को एक मितव्ययी एक्टिविस्ट के रूप में पेश करने की शौक़ीन हैं। आम लोगों के साथ खुद को जोड़ कर देखना पसंद करतीं हैं। जबकि वास्तविकता में वह उन लोगों में से हैं जो अपने घर में आराम से वाइन पीते हुए गरीबों की चिंता जताने के आदी होते हैं, लेकिन उनके लिए करते कुछ भी नहीं।
नंदिता दास के पिता प्रसिद्ध पेंटर जतिन दास हैं। वे आर्थिक रूप से काफी संपन्न हैं। लेकिन एक सरकारी फ्लैट में तब तक कब्जा जमाए हुए बैठे रहे जब तक उनको वह जगह खाली करने का नोटिस नहीं भेजा गया। गरीबों, वंचितों की बात करने वाली नंदिता दास के पिता सालों से एक सरकारी रिहाइश में गैर क़ानूनी ढंग से कब्जा जमाए हुए बैठे थे।
जतिन दास एशियन गेम्स विलेज के एक फ्लैट में 26 सालों से रह रहे थे, जबकि वह उन्हें सिर्फ 3 साल के लिए दिया गया था। सच में देश में दो भारत हैं, लेकिन वाइन के लिए परेशान रहने वाली जमात कौन है यह न तो मीडिया पहचान पाती है और न ही नंदिता स्वीकार कर पाती हैं।
जहाँ एक तरफ वाइन पीते घर बैठकर गरीबों की रोटी की चिंता करती नंदिता दास हैं। वहीं दूसरी ओर आरएसएस जैसी वे संस्थाएँ हैं जो भूखों को भोजन उपलब्ध कराने में दिन-रात एक किए हुए हैं, जिन्हें ये लोग सुबह-शाम गाली देते घूमते हैं। आरएसएस की तरह ही उसका संबद्ध संगठन ‘सेवा भारती’ भी इस आपदा के दौरान वंचितों की मदद में अनथक परिश्रम में जुटा है।
‘सेवा भारती’ का मुख्यालय दिल्ली में है, जहाँ से सारे देश में सहायता कार्यक्रम चलाया जा रहा है। कोरोना महामारी के इस काल में भोजन के पैकेट से लेकर, मास्क बना कर उन्हें जरूरतमंदों तक पहुँचाने तक में ‘सेवा भारती’ का काडर युद्ध स्तर पर लगा हुआ है। ‘सेवा भारती’ का दो लाख से ज्यादा का काडर देश के दूरदराज के इलाकों में बेहद जरूरी सहायता सामग्री लेकर आज मौजूद दिखता है।
‘सेवा भारती’ के अखिल भारतीय महासचिव श्रवण कुमार ने बताया कि संगठन यह नहीं देखता कि वह किस राज्य में काम कर रहा है, या सहायता की जरूरत जिस व्यक्ति को है वह किस जाति-धर्म या पहचान से संबद्ध है। उन्होंने बताया कि मुख्यतः संगठन उन क्षेत्रों में काम कर रहा है जहाँ सरकार भी नहीं पहुँच पा रही। श्रवण कुमार ने बताया कि 26 लाख लोगों तक तो उनकी सीधी पहुँच है जिनको भोजन आदि सहायता पहुँचाई जा रही। आरएसएस भी कोरोना से लड़ाई में अपनी प्रत्यक्ष भूमिका निभा रहा है जो भोजन पैकेट्स और मस्के बाँटने से लेकर गंदे अस्पतालों की साफ़-सफ़ाई में अपना योगदान देता हुआ देश के साथ खड़ा नजर आता है।
नंदिता दास सच कह रहीं हैं, सच में यहाँ दो भारत हैं। और दो ही नहीं, तीन भारत कहे जाने चाहिए। पहला, जहाँ श्रमिक खुद के जीवन की मूलभूत समस्याओं को पूरा करने में संघर्ष करते दिखते हैं। दूसरा, वह जहाँ आरएसएस और सेवा भारती जैसे संगठनों के वालंटियर्स और वे देशवासी हैं जो इस संकट के समय वंचित वर्ग का मददगार बनने का भरसक प्रयत्न कर रहे हैं। और, तीसरा वह है जहाँ नंदिता और उनके पिता जैसे लोग हैं जो सरकारी पैसों पर बेजा आश्रित होते हुए भी गरबों और जरूरतमंदों की बात करते हैं।
एक था सुबराती। सुबराती गाँव का रहने वाला था, कुछ पढ़ा-लिखा नहीं था और उस समय मौसमी बेरोजगारी का शिकार था। वो गाँव के ही एक सज्जन व्यक्ति, जिन्हें अक्सर लोग संजू भाई के नाम से बुलाते थे, उनके पास काम माँगने आया। संजू भाई कुछ विनोदी प्रवृत्ति के थे, बोले- “सुबराती इस समय तुझे गाँव में कहाँ काम मिलेगा, तू एक काम कर तू बंबई चला जा, वहाँ शायद बात बने।”
सुबराती सहमत होते हुए बोला- “भाई! तुम्हारी बात में दम है, क्योंकि जिसे देखो वही काम की तलाश में बंबई चला जाता है। ऐसा क्या काम चल रहा है बंबई में?” संजू भाई ने चुटकी ली- “वहाँ धरती घुमाई जाती है। बताओ ये धरती घूमती है या नहीं?” सुबराती बोला- “साहब, धरती तो घूमती है।” भाई ने कहा- “तो कोई घुमा भी रहा होगा, तभी तो घूमेगी ना?” बात सुबराती को जँच गई।
सुबराती थोड़ा हिचकिचाया, बोला- “भाई! धरती तो बहोत कैड़ी घूमती होगी? शायद मुझसे ना हो।”
संजू भाई बोले- “सुबराती बात ऐसी है कि कुछ आदमी तो धरती घुमाने का काम करते हैं और कुछ उसकी कील में तेल डालने का काम करते हैं, ताकि धरती थोड़ी फोकी घूमे। चल तू तेल डालने का काम कर लेना, अब तो सही है?”
इस तरह सभी तारांकित और अतारांकित प्रश्नों का उत्तर मिल जाने के बाद सुबराती बंबई जाने को उद्यत था और बोला- “भाई! तुम जल्दी से किसी तरह मेरे बंबई जाने का इंतजाम कर दो।”
खैर, सुबराती तो कभी धरती घुमाने नहीं जा पाया, लेकिन धरती तो घूम ही रही है। यानी कोई न कोई तो घुमा ही रहा होगा इसे? वो कौन लोग हैं, जो इसे घुमा रहे हैं? और वो इस कठिन काम को इतनी सहजता से कर रहे हैं कि उनके मुँह से उफ़ तक नहीं निकलती, किसी को उनके इस महान उद्यम की भनक तक नहीं लगती और सर्वनाश का भय भी उन्हें कर्तव्य पथ से नहीं डिगा सकता। ऐसे ही लोगों के लिए भारतवर्ष के सुविख्यात नीतिवेत्ता भर्तृहरि ने कहा-
‘कमठकुलाचलदिग्गजफणिपतिविधृताऽपि चलति वसुधेयम्। प्रतिपन्नममलमनसां न चलति पुंसां युगान्तेऽपि।।’
यानी शेषनाग आदि के द्वारा धारित यह पृथ्वी भी कदाचित हिल जाए या काँप उठे किन्तु विशुद्ध अंत:करण वाले व्यक्तियों द्वारा धारित विषय युगांत यानी प्रलय के उपस्थित हो जाने पर भी दृढ़ बने रहते हैं। शायद इसीलिए अपनी जान जोखिम में डालकर भी हमारे स्वास्थ्यकर्मी दूसरों के प्राणों को बचाने के अपने धर्म यानी कर्त्तव्य से ज़रा भी विचलित नहीं हुए।
ये धरती ऐसे ही शीलवान लोगों की वजह से चल रही है, वास्तव में ये धरती ऐसे ही मजबूत कन्धों पर टिकी है। अगर धरती से शील नष्ट हो जाए तो ये ठीक से चल नहीं पाएगी। जो अच्छाई प्रदर्शन या पॉलिटिक्स के काम आती है, उसका फल लोकसंग्रह है और वो वहीं चरितार्थ हो जाती है लेकिन इस दुनिया की हर वो अच्छाई जो बड़ी नजाकत, विनम्रता और सहजता के साथ कहीं न कहीं घटती रहती है, वो शील है। यानी वो अच्छाई जो धौंस नहीं दिखाती, अपना मोल नहीं माँगती, अहसान नहीं जताती, बदले में कोई अपेक्षा नहीं रखती वो शील है। जब तक ये है तब तक धरती ठीक से घूमती रहेगी।
आज न जाने ऐसे कितने ही शीलवान लोगों ने कोई वैक्सीन न होते हुए भी कोरोना को अपने इसी नैतिक कर्त्तव्य और अपने शील से टक्कर दी है, वो वास्तव में इस धरा के शेषनाग हैं, बड़ी शिद्दत से इसे सही पथ पर घुमा रहे हैं, हमें तो सिर्फ तेल डालने का आसान काम मिला है, सिर्फ घर पर रहकर उनका सहयोग करना है।
आमतौर पर नैतिकता की प्रेरणा का विचार धर्म और ईश्वरीय आस्था के सुरक्षा-चक्र में ही फलता-फूलता आया है। पाप और पुण्य हमारी वर्जनाओं और प्रोत्साहनों का दायरा तय करते आए हैं। आस्तिकता हमें नैतिकता की ओर प्रेरित करे, ये सचमुच अच्छी बात है। बहुत से लोगों की आस्था सामाजिक सद्भाव और मानवीय मूल्यों के प्रति होती है, तो कुछ डंडे के प्रति आस्थावान हैं। इस तरह हम देखते हैं कि वो शील या नैतिकता जिस पर ये दुनिया टिकी है, वो अनेक प्रकार की प्रेरणाओं से अनुप्राणित है।
तैत्तिरीय उपनिषद् में किसी भी कीमत पर, किसी भी मनोभाव के साथ भलाई करते रहने का उपदेश दिया गया है- ‘श्रद्धया देयम्। अश्रद्धया देयम्। श्रिया देयम्। ह्रिया देयम्। भिया देयम्। संविदा देयम्।।।।‘ देना यानी सहयोग प्रदान करना इतना अभीष्ट कार्य है कि श्रद्धा न भी हो तो अश्रद्धा से ही दे दो, शोभायुक्त होकर दो या लज्जा से दो, भय से दो या दृढ संकल्प से, किसी भी तरह दो पर देना सीखो। यहाँ देना तो एक उपलक्षण मात्र है भलाई का। यानी हमेशा ऐसा कुछ करना जो सबके किए अच्छा ही अच्छा हो।
लेकिन कुछ लोगों के लिए अच्छा करने के इतने कारणों में से एक भी कारगर नहीं है। बल्कि इसके विपरीत ईश्वर के प्रति दृढ़ आस्था जहाँ अन्यों के लिए प्रेरणा का काम करती है, वहीं कुछ लोग अपनी धार्मिक आस्थाओं की बिनाह पर ही धरती के शेषनागों के कंधे पकड़कर हिला रहे हैं। उनकी पूरी कोशिश है कि तबाही जितनी जल्दी सम्भव हो आ जाए।
और ये सब तबलीग यानी अपने धर्म के प्रचार के नाम पर किया जा रहा है। जमात जिसका मतलब ही है संगठन, वो विघटन का पर्याय बन गया है। क्या पानी के फौव्वारों से भी आग बरसती है? या आग का दरिया शांत-शीतल समुद्र होने का बहाना कर रहा है? अल्लाह ने ये ज़िंदगी बक्शी है, जिसका मतलब है जीना और ये पहली जमात का सबक है। लेकिन अपने दीन की पीएचडी का तमगा लेकर घूमने वाले लोगों को अब तक पहली जमात का ये सबक भी समझ में नहीं आया कि जीने का अर्थ मरना नहीं होता। शास्त्र कहते हैं-
जिसका अर्थ है- एक ओर विधिपूर्वक किए गए सभी धार्मिक अनुष्ठान यानी मजहबी इमाल और दूसरी तरफ रोग पीड़ित प्राणियों के प्राणों की रक्षा का कार्य, ये दोनों कर्म समान रूप से पुण्य देने वाले हैं। यानी इस समय डॉक्टर, सुरक्षाकर्मी, सफाईकर्मी जो कार्य कर रहे हैं वो किसी धार्मिक अनुष्ठान से कम नहीं है। इसलिए धर्म के नाम पर धर्म के कार्य में बाधा डालने का अधार्मिक काम करना बंद करें।
आइए हम सब भी नैतिक बनें, शील को अपना कन्धा बनाएँ और इस धरती को अपनी धुरी पर ठीक से घुमाने में अपना योगदान दें या कम से कम सुबराती की तरह तेल डालने का आसान काम ही चुन लें।
आम आदमी कोरोना वायरस की महामारी से इतने घबराए और सहमे हुए हैं कि इससे बचाव के लिए वह समाचार के विभिन्न स्रोतों से लेकर सोशल मीडिया पर अपने स्तर पर जानकारी जुटाने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन इस चक्कर में कई लोग यह भूल जाते हैं कि यह घटना वाकई में कोरोना वायरस से जुड़ी हुई है भी या नहीं।
इंडिया टुडे की ऐसी ही एक खबर सोशल मीडिया पर शेयर होती देखी गई, जिसमें बताया गया है कि सऊदी अरब के मुफ्ती अब्दुल अजीज बिन अब्दुल्ला ने फतवा जारी कर कहा है कि भयंकर भूखा होने की हालत में अपनी बीवी को भी मारकर खा सकते हैं। वायरल हो रही रिपोर्ट के मुताबिक, इस फतवे में न केवल बीवी को मारने की बात कही गई है, बल्कि शौहर को यह भी छूट दी गई है कि वह बीवी के शरीर के कुछ हिस्से भी खा सकता है।
क्या है सच्चाई –
इंडिया टुडे द्वारा प्रकाशित इस खबर में सऊदी अरब के शीर्ष मुफ्ती के फतवे का जिक्र किया गया है। लेकिन CNN Arabic की अप्रैल 2015 की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि, मुफ्ती ने इस फतवे का खंडन किया था। यह कोई वास्तविक घटना भी नहीं है। असल में मोरक्को के एक ब्लॉगर Israfel al-Maghribi द्वारा अपने ब्लॉग पर प्रकाशित किया गया यह एक व्यंग्य था। हालाँकि, अधिकतर पोर्टल्स ने ब्रिटिश न्यूज पोर्टल mirror.co.uk का हवाला देकर यह खबर चलाई थी। कुछ जगहों पर अचानक से यह खबर शेयर होने लगी है जो कि एक समुदाय के प्रति घृणा बढ़ाने का कुत्सित प्रयास लगती है।
लॉकडाउन के बीच क्यों शेयर की जा रही है फतवे वाली खबर?
दरअसल, तबलीगी जमात के द्वारा संक्रमण के मामलों में आई वृद्धि के बाद उनके सार्वजानिक स्थानों पर थूकने, डॉक्टर्स से अभद्रता करने आदि हरकतों को देखते हुए आम आदमी इतना ज्यादा भयभीत हो चुका है कि वह मुस्लिम समुदाय की कुछ पुरानी वीडियो से लेकर खबरों को भी शेयर कर उसकी सच्चाई जानना चाहता है और दूसरों को भी जागरूक करने का प्रयास करते देखा जा रहा है।
यही कारण है कि हाल ही में स्वघोषित फैक्ट चेकर वेबसाइट ऑल्टन्यूज़ ने भी कुछ पुराने वीडियो को फैक्ट चेक किया! इनमें से एक में उन्होंने बताया कि फलों पर थूक लगाने वाले शेरू मियाँ का वीडियो मार्च नहीं, बल्कि फरवरी का है और उसका कोरोना के संक्रमण से कोई लेना-देना नहीं है।
हालाँकि, ऑल्टन्यूज़ के फैक्ट चेक का फैक्ट चेक करने पर ऑपइंडिया ने पाया कि थूक के जारिए कोरोना के संक्रमण का खतरा फरवरी में भी उतना ही था जितना कि अप्रैल में है, क्योंकि भारत में संक्रमण के मामले जनवरी में ही सामने आने लगे थे।
अपनी ही बीवी को खाने का फतवा जारी करने वाले धर्मगुरु वाला यह व्यंग्य लेख 2015 से भी पहले का हो सकता है। लेकिन कोरोना महामारी के कारण भूखमरी की आशंका को देखते हुए इस खबर को गलत मानसकिता के लोग फैला रहे हैं।
अफवाहों के भय के बीच क्या न करें –
जागरूक नागरिक के तौर पर हमारी जिम्मेदारी बनती है कि संवेदनशील समय में ऐसी गलत खबरों से बचना चाहिए और कम से कम इसे सार्वजनिक करने से पहले इसके स्रोत की जाँच कर लेनी चाहिए।
हमें सिर्फ वास्तविक खबरों को ही, बिना उनका मजहब देखे शेयर करना चाहिए। लेकिन अगर कोई व्यक्ति पाँच साल पुरानी खबर शेयर कर रहा है तो उसके पीछे की सोच गलत होगी, या फिर वो अनभिज्ञता में ऐसा कर रहा होगा। अतः, यह बताना आवश्यक है कि ऐसी खबरें शेयर न करें। यह सिर्फ भय बढ़ाती हैं।
एक सोची-समझी साजिश के तहत, अपने ही भीतर के कुदरती थूक, कुदरती पेशाब और कुदरती टट्टी को अपने मन के हिसाब से यहाँ-वहाँ फेंकने वाले मासूम तबलीगियों को मुसलमान होने के कारण बदनाम किया जा रहा है।
राजधानी दिल्ली स्थित निजामुद्दीन में हुए तबलीगी जमात के मरकज का खुलासा होते ही कोरोना वायरस के संक्रमण का सबसे बड़ा स्रोत बनकर उभरा यह समूह देखते ही देखते इस वैश्विक महामारी के समानांतर चर्चा का एक प्रमुख विषय बन गया। अब सबकी जुबान पर सबसे पहला सवाल 1920 के दशक में इस्लामिक पुनर्जागरण के नाम पर भारत से शुरू हुए इस समूह की संदिग्ध गतिविधियों को लेकर है।
विश्वभर में हुई विभिन्न आतंकवादी घटनाओं में तबलीगी जमात के लोगों का सम्बन्ध नजर आने के बाद इसके मूल और इसके उद्येश्यों पर अतीत में भी खूब बहस हो चुकी है। दरअसल, तबलीगी जमात विश्व में सुन्नी इस्लाम के प्रचार के लिए किया गया आंदोलन था। जिसका प्रमुख उद्देश्य समुदाय के लोगों को प्राचीन इस्लामी पद्धतियों की ओर ले जाने की प्रेरणा देना था। मूल रूप से, ये प्रशिक्षित इस्लामिक मिशनरी हैं, जिन्होंने दुनिया भर में इस्लाम फैलाने में अपना अधिकांश जीवन समर्पित कर दिया।
तबलीगी जमात
सबसे पहले यहाँ पर जान लेना आवश्यक है कि ‘मरकज, तबलीगी, जमात’ ये तीनों शब्द अलग-अलग हैं। तबलीगी का शाब्दिक अर्थ होता है, अल्लाह के संदेशों का प्रचार करने वाला। जमात मतलब, समूह और मरकज का अर्थ होता है बैठक के लिए इस्तेमाल की जाने वाली जगह। यानी, अल्लाह की कही बातों का प्रचार करने वाला समूह।
तबलीगी जमात से जुड़े लोग पारंपरिक इस्लाम को मानते हैं और इसी के मूल 6 उद्देश्यों (इसी लेख में आगे वर्णित है) का प्रचार-प्रसार दुनियाभर में करते हैं। वे आम लोगों तक इन्हें पहुँचाते हैं और उनके विश्वास को इस्लाम में पुनर्जीवित करने का काम करते हैं। आज यह कम से कम 213 देशों तक फैल चुका है। इसका मुख्यालय दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में स्थित है। बताया जाता है कि इस जमात के दुनिया भर में आज के समय में 15 करोड़ सदस्य हैं।
हालाँकि भारत में रहने वाले इसके सदस्य निजामुद्दीन को ही इसका प्रमुख आधार मानते हैं क्योंकि यह आंदोलन इस्लाम के देवबंद स्कूल से ही तैयार हुआ था और जो कि अधिक तार्किक भी है फिर भी पाकिस्तान के रायविंड और बांग्लादेश स्थित तंगी में इसके बुजुर्गों ने अपने देशों की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी का हवाला देते हुए निजामुद्दीन को ही इसका प्रमुख केंद्र मानने पर अक्सर आपत्ति दर्ज करते हुए कहा है कि यह महज निजामुद्दीन तक सीमित न होकर अधिक व्यापक तौर पर काम करता है।
औपनिवेशिक काल में भारत से शुरुआत
तबलीगी जमात आंदोलन, 1927 में मुहम्मद इलियास अल-कांधलवी ने भारत में हरियाणा के नूंह जिले के एक गाँव से शुरू किया था। वह प्रमुख देवबंदी मौलवी, विद्वान और तबलीगी जमात के प्रस्तावक थे। हरियाणा के नूंह से वर्ष 1927 में शुरू हुई तबलीगी जमात की पहली मरकज 14 साल बाद वर्ष 1941 में 25 हजार लोगों के साथ हुई थी। विश्व के अलग-अलग देशों में हर साल इसका वार्षिक कार्यक्रम आयोजित होता है, जिसे ‘इज्तेमा’ कहते हैं।
छह प्रमुख उद्देश्यों के साथ तबलीगी जमात की एक सबसे बड़ी शर्त और विशेषता इसकी गोपनीयता ही है। इसी गोपनीयता ने इसकी हरकतों पर हमेशा आवरण का काम किया है। समूह की आंतरिक कार्यप्रणाली के बारे में बहुत कम लोगों को पता होता है क्योंकि यह अपनी सदस्यता और नेतृत्व के कोई भी आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं रखता है।
भारत में मशहूर देवबंदी आन्दोलन की उपज इस तबलीगी जमात को एक राजनीतिक, जनवादी संगठन के रूप में तैयार किया गया था, जो दुनिया भर के मिशनरियों को इस्लाम की कट्टर रूढ़िवादी प्रथाओं के लिए स्वच्छंद रूप से उन्हें वापस लाने (या विश्वास को कायम रखने) के उद्देश्य से जगह-जगह भेजता है।
तबलीगी जमात के मूलतः 6 प्रमुख उद्देश्य
कलिमा (एकेश्वरवाद के अंतर्गत यह घोषणा कि दुनिया में सिर्फ और सिर्फ एक अल्लाह ही भगवान है और प्रोफेट मोहम्मद उनके दूत हैं) सलात (पाँच वक्त की नमाज) इल्म-ओ-ज़िक्र (मजहबी ज्ञान) इक्राम-ए-मुस्लिम (मजहब के लोगों का आपस में एक-दूसरे का सम्मान करना और मदद करना- भाईचारा) इख्लास-ए-निय्यत (इरादे की ईमानदारी) तफ्रीह-ए-वक़्त (रोजाना के कामों से दूर रहकर समय का इस्तेमाल अल्लाह के संदेश को घर-घर तक पहुँचाना) इनके अलावा एक सातवाँ और शायद सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है- दावत-ओ-तबलीग (मस्जिद में आने की दावत: धर्मांतरण का हिस्सा)
20वीं सदी में तबलीगी जमात को इस्लाम का एक बड़ा और अहम आंदोलन माना गया था। औपनिवेशिक ब्रिटिश काल के दौरान भारत में आर्य समाज ने दयानंद सरस्वती के पुनर्जागरण के अभियान के अंतर्गत उन लोगों को दोबारा से हिंदू बनाने का ‘घरवापसी’ अभियान शुरू किया था, जिन्हें मुगल आक्रान्ताओं ने इस्लाम में परिवर्तित किया था। जिसके चलते मौलाना इलियास कांधलवी ने इस्लाम की शिक्षा देने का काम प्रारंभ किया। लेकिन यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि तबलीगी लोग सूफ़ियों के आदेश में विश्वास नहीं करते हैं, लेकिन इस्लाम के भीतर कुछ समुदाय इसे मानते हैं और खुद को सुन्नियों के रूप में बुलाते हैं।
जिहाद से तबलीगियों का सम्बन्ध
समय के साथ विश्वभर में ऐसी तमाम घटनाएँ और खुलासे होते गए, जिनमें तबलीगी जमात को आतंकवाद में भर्ती की पहली सीढ़ी बताया गया। बाहरी तौर पर तबलीगी जमात एक शांतिपूर्ण, समतावादी और भक्ति आंदोलन के रूप में ही काम करता रहा है। यहाँ तक कि आज भी भारत में लेफ्ट-लिबरल मीडिया के उपदेशक शेखर गुप्ता और दी वायर की पत्रकार आरफा खानम इनकी तमाम बदसलूकियों के सामने आने के बावजूद यही दावा करते हुए नजर आते हैं कि ये महज अल्लाह के संदेशवाहक हैं और इनको सिर्फ बदनाम किया जा रहा है।
सबसे पहले इस समूह के बीच अप्रत्यक्ष संबंध और शिया-विरोधी सांप्रदायिक समूहों, कश्मीरी आतंकवादियों और तालिबान से बने कट्टरपंथी/चरमपंथी देवबंदियों से साँठ-गाँठ के सबूत मिले। यह सम्बन्ध एक ऐसा माध्यम प्रदान करता है, जिसके जरिए वो लोग जो तबलीगी समूह के राजनीतिक कार्यक्रम (6 उद्देश्यों) से असंतुष्ट हैं, को छोड़कर आतंकवादी संगठनों में शामिल हो सकते हैं।
इस समूह के सदस्यों पर 1995 में पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के खिलाफ तख्तापलट की साजिश रचने का भी आरोप लगाया गया था। हालाँकि, इस संगठन की अत्यधिक गोपनीयता के कारण, इसके बारे में बहुत जानकारी नहीं जुटाई जा सकी थी, लेकिन कम से कम यह स्पष्ट हो गया था कि तबलीगी महज धार्मिक परिधि तक ही सीमित न होकर अपने दावे के उलट राजनीतिक महत्वाकांक्षा में भी सक्रिय रहे। तबलीगी धीरे-धीरे हरकत-उल-मुजाहिद्दीन (HuM) और अल-कायदा जैसे आतंकवादी संगठनों में जिहादी लड़ाकों की भर्ती का प्रमुख जरिया बनता गया।
ऐसे भी प्रमाण मिले, जिनमें यह खुलासा हुआ कि तबलीगियों ने धर्म प्रचारक के रूप में जाकर वहाँ कट्टरपंथ का रास्ता चुना और लोगों को वही रास्ता दिखाया भी। इन तबलीगियों की एक बार पाकिस्तान में भर्ती होने के बाद, विभिन्न कट्टरपंथी इस्लामी समूहों के प्रतिनिधियों, जैसे कि हरकत-उल-मुजाहिदीन, तालिबान और अल-कायदा, को उन्हें अपनी जिहादी सेना में सैन्य प्रशिक्षण देकर भर्ती करने के लिए कहा जाता है। इसके लिए उन्हें लुभावने प्रलोभन दिए जाते हैं। इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण था जॉन वॉकर लिंड – एक अमेरिकी, जिसे अफगानिस्तान के खिलाफ जिहाद में तालिबान के समर्थन के लिए जेल की सजा काटनी पड़ी। उसने वर्ष 1998 में पाकिस्तान में तबलीगी प्रचारकों के साथ यात्रा की, ताकि तालिबान में शामिल होने से पहले इस्लामिक मजहबी शिक्षा ले सके।
तबलीगी समय के साथ कट्टर जिहादी समूहों में बढ़ते गए और यह विश्वास करने लगे कि ‘अच्छे मुस्लिमों’ को इसी जीवन में यातनाएँ भोगनी चाहिए। जुलाई 07, 2005 में लंदन बम विस्फोटों के लिए जिम्मेदार सेल के दो प्रमुख सदस्य – मोहम्मद सिद्दीक खान और शहजाद तनवीर ने 2001 में ही तबलीगी मस्जिद छोड़कर कुछ ‘जमीनी काम’ करने की ठानी थी। ये तबलीगी जमात के मंच से निकलकर कट्टर इस्लामिक गतिविधियों में उतरने वाले ही कुछ उदाहरणों में से एक थे।
इसके बाद कई अन्य लोग तबलीगी जमात छोड़कर इराक़, पाकिस्तान, चेचन्या, दागेस्तान आदि इलाकों में ‘पर्यटक’ और ‘उपदेशक’ का आवरण ओढ़कर कट्टर जिहादी संगठन तैयार करने में लगे रहे। इनकी संदिग्ध गतिविधियों पर संज्ञान लेते हुए कुछ देशों ने इन्हें उसी समय ब्लैक-लिस्ट कर प्रतिबंधित करने का साहसिक फैसला लिया था।
हाल ही में सबसे बड़ा आश्चर्य यह देखना था कि उत्तराखंड के सुदूर इलाकों में बसे (कॉन्ग्रेस सरकार का शुक्रिया, जिसने बांग्लादेशियों और मजहब विशेष के अवैध प्रवास के काम में खूब मदद भी की), लोग भी दिल्ली में आयोजित निजामुद्दीन मरकज से घर वापस लौटे थे। एक वीडियो में देखा जा सकता है कि स्थानीय ग्रामवासियों के सवालों का किस बेपरवाही से वह जवाब दे रहे हैं। वह कह रहा है, “हमारा मालिक’ सबसे बड़ा है, इसलिए मेरी जिन्दगी पूरी मजे से कटेगी।”
In Tehri Garhwal, Uttarakhand, Tablighi Jammat member is telling his story calmly as if there had been not a big issue. Atlast he tells his Malik(Allah) is biggest referring as if nothing going to happen.#COVIDIOTS#TablighiJamatViruspic.twitter.com/LZwItYma50
उत्तराखंड में एक वर्षों पुरानी स्थानीय कहावत भी सुनी जाती थी- “मच्छर, मक्खी, मु###न- ये तीन पहाड़ों पर नहीं होते।” बेशक यह कहावत आपसी हँसी-मजाक के तौर पर इस्तेमाल की जाती थी। लेकिन विगत कुछ समय में पहाड़ों पर इनकी संख्या बढ़ती देखी गई। जहाँ पलायन के कारण उत्तराखंड के गाँव के गाँव खाली होते जा रहे हैं, वहीं समुदाय विशेष ने अपने गाँव में मस्जिदें बनाकर उन पर माइक लगाने शुरू कर दिए हैं। उल्लेखनीय है कि यह गाँव कुछ साल पहले तक बिना माइक के ही सुबह की अजान पढ़ते थे।
हम पहले भी बता चुके हैं कि किस प्रकार तबलीगी जमात के सदस्य अमेरिका के 9/11 हमले से लेकर कश्मीर, अफगानिस्तान आदि जगहों पर जिहादी षड्यंत्र के जिम्मेदार रहे। यद्यपि तबलीगी संगठन अल कायदा जैसे आतंकवादी संगठनों के लिए एक प्रमुख स्रोत की तरह काम करता है, लेकिन इस बात का कोई आधिकारिक सबूत नहीं है कि तबलीगी स्वेच्छा से वैश्विक रूप से जिहादी संगठनों के लिए कार्य करता है। बल्कि बताया जाता रहा है कि ऐसी गतिविधियाँ तबलीगी नेताओं की जानकारी या सहमति के बिना घटित होती हैं। यानी, तबलीगियों की गोपनीयता का सूत्र फिर से इनका बचाव करता नजर आता है।
तबलिगी जमात का नाम आतंकवादी साजिश रचने में के संबंध में पहले भी आया है, जिसमें अक्टूबर 2002 पोर्टलैंड सेवन (The Portland Seven), सितंबर 2002 लाकवाना, अमेरिका में छह मामले, साथ ही अगस्त 2006 में लंदन हवाई मार्ग पर बम विस्फोट करने की साजिश शामिल है। संयुक्त राज्य अमेरिका, 7 जुलाई 2005, लंदन बम विस्फोट और जुलाई 2007 में लंदन और ग्लासगो, स्कॉटलैंड में बम विस्फोट का प्रयास भी इनके द्वारा किया गया था।
कोरोना वायरस के संक्रमण का हॉट-स्पॉट
दिल्ली निजामुद्दीन मरकज में 1 से 15 मार्च के बीच हुए जमात के जलसे में देश-विदेश के 5 हजार से ज्यादा लोग शामिल हुए थे। लेकिन, इसके बाद भी करीब 2000 से ज्यादा लोग लॉकडाउन के बावजूद यहाँ रुके रहे, जबकि ज्यादातर लॉकडाउन से पहले अपने घरों को लौट गए। यहाँ से संक्रमण का कनेक्शन दिल्ली समेत देश के 22 राज्यों से जुड़ गया।
इस मरकज में इंडोनेशिया, मलेशिया, थाइलैंड, नेपाल, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका और किर्गिस्तान सहित 16 देशों के लोग शामिल हुए और इसके बाद विभिन्न हिस्सों में लौट गए। यह मरकज तब सरदर्द बन गई, जब इसमें शामिल कुछ लोग कोरोना के संक्रमण से पॉजिटिव पाए गए। और पता चला कि 31 मार्च तक जहाँ भारत में कोरोना के संक्रमण का ग्राफ बेहद निम्न स्तर पर था, वही अचानक से बढ़ने लगा।
यहाँ मौजूद लोगों को देशभर में मौजूद विभिन्न मस्जिदों में छुपाया गया, पुलिस जब इन्हें ढूँढने गई तो कट्टरपंथियों ने पुलिस पर भी हमला किया। और यहाँ से तबलीगियों के एक नए घिनौने इतिहास का सृजन होने लगा। यह कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलाने के लिए यहाँ-वहाँ थूकते हुए नजर आए। डॉक्टर्स से बदसलूकी से लेकर अस्पताल में महिला कर्मचारियों से अश्लीलता की ख़बरें सामने आने लगीं। ये लोग क्वारंटाइन सेंटर में जगह-जगह थूक रहे हैं। इन लोगों ने डॉक्टरों और देखरेख में जुटे स्टाफ को गालियाँ दीं और उन पर थूका। सोशल डिस्टेंस के निर्देशों का मजाक बनाते नजर आ रहे हैं। यहाँ तक कि तबलीगी जमात के ही एक व्यक्ति ने तो आत्महत्या की भी कोशिश की।
निजामुद्दीन मरकज के कोरोना वायरस के सबसे बड़े हॉट-स्पॉट बनने के पीछे का क्रम देखिए। मलेशिया में पिछले दिनों तबलीगी जमात के सम्मेलन में गए 620 लोग कोरोना पॉजिटिव मिले हैं। इनमें 15 अलग-अलग देशों के लोग हैं। सम्मेलन में शामिल हुए दो लोग फिलस्तीन गए। दो पाकिस्तान के लाहौर पहुँच गए। उसी दौरान दो लोग किर्गिस्तान गए। वहाँ कई लोगों से मिलने के बाद वे दोनों पॉजिटिव मिले। इधर, लाहौर पहुँचे दोनों लोगों से कई लोगों को संक्रमण हुआ। यहीं से संक्रमण पाकिस्तान के सबसे समृद्ध प्रांत पंजाब में पहुँचा। पाकिस्तान के सबसे ज्यादा 748 संक्रमित पंजाब में ही हैं। वहीं, पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ की रिपोर्ट के अनुसार सिंध के हैदराबाद में कुल 43 लोग संक्रमित हैं, जिनमें से 36 तबलीगी जमात के आयोजन में शामिल थे।
मलेशिया के स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर अधम बाबा ने भी इस बात की पुष्टि की है कि कोरोना वायरस से हुई पहली मौत पेटालिंग मस्जिद में 27 फरवरी से 1 मार्च के बीच हुए कार्यक्रम से जुड़ा था। इस कार्यक्रम में 16,000 लोग शरीक हुए थे। इनमें 1,500 विदेशी नागरिक थे। ज्यादातर दक्षिण-पूर्व एशियाई नागरिक थे। सबसे बड़ी बात ये है कि मलेशिया में अभी तक कोरोना वायरस के जो 673 पॉजिटिव केस सामने आए हैं, उनमें से करीब दो-तिहाई मामले इसी दौरान उस मस्जिद में मौजूद रहे लोगों से जुड़े हैं।
कश्मीर से कन्याकुमारी तक संक्रमित तबलीगी
यदि तबलीगी मरकज में शामिल लोग कानून और व्यवस्था में यकीन करते हुए शासन-प्रशासन का सहयोग करते तो शायद इक्कीस दिनों के लॉकडाउन की अवधि को बढ़ाने की नौबत नहीं आती। सहयोग करने के बजाए हालात यह हो गए कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और उड़ीसा से लेकर गुजरात और पंजाब की सीमाओं तक यह मानव बम बनकर संक्रमण फैलाने के प्रमुख स्रोत बन गए। उत्तराखंड पुलिस को तो यह घोषणा करने पर मजबूर होना पड़ा कि दिल्ली मरकज में शामिल लोग स्वयं बाहर आ जाएँ वरना उन पर हत्या का मुकदमा दर्ज किया जाएगा। यूपी में तबलीगी जमात में शामिल हुए करीब 1600 लोगों को चिह्नित कर 1300 को क्वारंटाइन कर लिया गया है।
यूपी में अब तक 410 कोरोना पॉजिटिव केस सामने आए हैं, जिनमें से 221 तबलीगी जमात से जुड़े हुए मिले हैं। यही कहानी तमिलनाडू, तेलंगाना सहित लगभग हर संक्रमित राज्य की है। तमिलनाडू के स्वास्थ्य सचिव डॉ. बीला राजेश ने बताया कि राज्य में दर्ज कुल 738 मामलों में से 679 मामले तबलीगी जमात के एक ही सोर्स से जुड़े हुए हैं। वर्तमान में कुल मामलों में 64% आँकड़ा सिर्फ उन जमातियों का ही है, जिन्होंने निजामुद्दीन मकरज में हुए कार्यक्रम में हिस्सा लिया था।
अप्रैल 04 को इंडिया टुडे के पत्रकार राहुल कँवल ने अपने ट्विटर अकाउंट से एक ऐसा ग्राफ ट्वीट करते हुए बताया कि भारत में दर्ज किए गए कोरोना वायरस के संक्रमण के मामलों में 60% तबलीगी जमात से जुड़े हुए मिले हैं। हालाँकि मात्र एक सूचना को सामने रखने के कारण उन्हें ट्विटर पर राना अयूब और आरफा खानम जैसे ‘कट्टरपंथी उदारवादियों’ का विरोध झेलना पड़ा और राहुल कँवल को ‘इस्लामोफोबिक’ घोषित कर दिया गया।
इस चित्र में टोपी पहने हुए प्रतीकात्मक चित्र का इस्तेमाल यह दिखाने के लिए किया गया था कि तबलीगी जमात के लोग कोरोना के संक्रमण के लिए किस स्तर तक जिम्मेदार हैं। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की वकालत करने वाले यह लोग दुसरे व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता से अक्सर असंतुष्ट नजर आते हैं।
मरकज से लौटे एक तबलीगी का खुलासा
यह खुलासा तेलंगाना के एक ऐसे व्यक्ति ने किया है, जो मरकज में बीते साल नवंबर में 21 दिनों तक ठहरा था। जॉनी (बदला हुआ नाम) शुरू में ईसाई था। उसने धर्मांतरण कर इस्लाम अपना लिया। उसने अपनी प्रेमिका के परिवार को ख़ुश करने के लिए ऐसा किया। एक डॉक्टर ने उसका लिंग-विच्छेद (खतना) किया और उसकी सलाह पर ही जॉनी ने तबलीगी जमात में शामिल होने का फ़ैसला किया।
नवंबर में मरकज़ में जाने से पहले वह कई दिनों तक तेलंगाना की विभिन्न मस्जिदों में प्रवास कर चुका था। उसने बताया कि तबलीगी जमात पूरी दिनचर्या तय करता है। खाने-पीने से लेकर मल-मूत्र त्याग करने तक सब कुछ। यहाँ तक कि सेक्स कैसे करना है, ये भी जमात ही सिखाता था। जॉनी को भी उस ‘ऑर्थोडॉक्स’ संस्था से जुड़ाव हो गया था और वो सब कुछ करता था, जैसे कहा जाता था।
जॉनी ने मरकज के लोगों के बेहद असभ्य संस्कृति के बारे में बताया कि साफ़-सफाई से नफरत करने वाले वो लोग इतने ज्यादा गंदे हैं कि उसे कोई आश्चर्य नहीं कि यह कोरोना का हॉट-स्पॉट बन गया। जॉनी ने कहा–
“मरकज में 4 लोग एक साथ बैठ जाते हैं और एक ही प्लेट में भोजन करते हैं। रोटी, चावल और करी वगैरह भी एक ही प्लेट में खाते थे। यहाँ तक कि हम चम्मच का भी प्रयोग नहीं किया करते थे और साथ ही खाते थे। कभी-कभी 6-7 लोग भी ऐसा ही करते थे। अंदर बाथरूम बहुत कम हैं और सभी को शेयर करना पड़ता है। हालाँकि, एक समय पर मरकज़ में निश्चित लोग ही रहते हैं। लोग वहाँ आते-जाते रहते हैं। कभी-कभी तो वहाँ हज़ार से भी अधिक लोग एक साथ रह रहे होते हैं। इतनी भीड़ होती है कि आप दिन में कभी भी बाथरूम जाएँ, अंदर कोई न कोई होता है और आपको 5-7 मिनट इन्तजार करना ही करना पड़ेगा।”
वहीं, मलेशिया के लेखक फारिश अ नूर ने अपनी किताब, ‘इस्लाम ऑन द मूव’ में इसी से संबधित एक और चौंकाने वाला खुलासा किया है। उन्होंने अपनी किताब में बताया है कि जो जमाती मरकज़ में रहते हैं, वे एक-दूसरे के सामने खुलेआम शौच करने व पेशाब करने में शर्म नहीं करते क्योंकि उनके भीतर अपने शरीर को लेकर शर्म खत्म हो चुकी होती है।
किताब में बताया गया है कि वहाँ टॉयलेट का डिजाइन इस तरह से बनाया जाता है कि तबलगियों को शौच करते हुए सब देख सकें। ताकि अन्य तबलीगी अपने भाइयों को आँकें और उनके पेशाब करने की मुद्रा को सुन्नत के अनुरूप सुधार सकें। किताब में इस बात का उल्लेख है कि समुदाय विशेष को बैठकर पेशाब करना चाहिए, खड़े होकर नहीं। यह खुलासा क्वारंटाइन में रखे हुए उस जमाती की हरकत से भी पर्दा उठाती है, जिसने अस्पताल में खुले में ही शौच कर डाली और वह इस बात को लेकर बिलकुल भी चिंतित नहीं था। यही नहीं, अस्पताल में पेशाब से भरी हुई बोतलें भी बरामद हुई हैं।
कोरोना के संक्रमण को बढ़ाने के लिए हर जगह थूक रहे, जाँच करने वालों पर हमला कर रहे और मस्जिद में इन जमातियों को छुपा रहे लोगों की ख़ास बात यह है कि इनका यह आचरण भारत तक ही सीमित नहीं है बल्कि ऐसे केस पाकिस्तान में भी सामने आ रहे हैं। वहाँ पर भी डॉक्टर्स पर हमले और थूकने की घटनाएँ देखने को मिली हैं।
सवाल यह है कि इन सबके कारनामों में इतनी आश्चर्यजनक एकरूपता आखिर कैसे हो सकती है? वास्तव में इसका जवाब यह है कि उनके धर्मग्रन्थ ने ही उन्हें ऐसा करने की प्रेरणा दी है कि नमाज पढ़ते समय या मजहबी कार्य करते समय शैतान की दखलअंदाजी खत्म करने के लिए वो ये करें।
उल्लेखनीय है कि इन सभी बातों के अलावा हमें मरकज़ के मुखिया मौलाना साद की वो वायरल ऑडियो भी ध्यान में रखने की आवश्यकता है, जिसमें वह सभी जमातियों को यह शिक्षा देने की कोशिश कर रहा था कि कोरोना वायरस एक साजिश है, जिसे मजहब विशेष के समर्थकों को मारने के लिए रचा जा रहा है। साथ ही सरकार को एक शैतान के रूप में प्रदर्शित किया था क्योंकि उन्होंने कोरोना वायरस के मद्देनजर किसी भी धार्मिक स्थल पर भीड़ इकट्ठा करने को मना किया था। तबलीगी जमात का मुखिया मौलाना साद फिलहाल गायब है। पुलिस ने नोटिस भी जारी किया लेकिन मौलाना की ओर से कोई जवाब नहीं मिला है।
सिर्फ मजहब के नाम पर बिहार के मधुबनी से लेकर इंदौर में अपने ही धर्म के लोगों की छुपाने के लिए पुलिस पर हमले किए गए, फायरिंग और पथराव किए गए। यह लोग शाहीनबाग में भी यही कहते देखे गए थे कि मौत तो एक ना एक दिन आनी ही है। इनके मौलवी कहते सुने जा रहे हैं कि उन्हें इस बात की चिंता नहीं कि वो मरेंगे, वह चाहता है कि अपने साथ काफिरों को लेकर मरे।
कोरोना वायरस को नोटों की गड्डियों के द्वारा संक्रमण बढ़ाने की सीख देने के लिए उन पर अपने नाक-मुँह पर पोंछते हुए भी यही सन्देश देते देखे जा रहे हैं कि कोरोना अल्लाह का हिन्दुओं के खिलाफ कहर है। चेतावानी वाले वीडियो सोशल मीडिया पर जारी किए गए कि सुन्नत ना पढ़ने वालों को कोरोना होगा जबकि नमाज में ही कोरोना का इलाज छुपा हुआ है। मौलवी तक अल्लाह से यह दुआ माँग रहे हैं कि कोरोना कम से कम 50 करोड़ भारतीयों को खत्म कर दे। यह धार्मिक कट्टरता की एकरूपता तो पूरे विश्व के लिए सीख है। मौत में भी मजहब ढूँढने वालों के लिए कोरोना सिर्फ एक अवसर माना जा सकता है।
क्या हो सकता है विकल्प?
तबलीगी जमात के लोगों ने थूकने को नई पत्थरबाजी बना दिया है। यदि यह सब इतना सुनियोजित है तो फिर क्या यह एक अन्य किस्म की आतंकवादी गतिविधि नहीं मानी जा सकती है? ऐसे समय में, जब शासन व्यवस्था का सारा ध्यान कोरोना की महामारी से लड़ने में केन्द्रित होना चाहिए था, उसके संशाधनों का इस्तेमाल मजहबी कारणों से उपजी अलग किस्म की महामारी में जाया हो रहा है। साथ ही यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि ऐसा करने में कहीं देश के उदारवादियों की गंगा-जमुनी तहजीब को ठेस ना पहुँचे।
पुलिस और डॉक्टर्स तबलीगी जमातियों की विष्ठा साफ़ कर रहे हैं जबकि कुछ सरकार विरोधी दलों से पोषित गोदी फैक्ट चेकर्स सिर्फ ऐसे अवसर की तलाश में बैठे हुए हैं कि उन्हें विष्ठा को तबलीगियों के बजाए किसी अन्य मजहब की साबित करना है। वह यह साबित करने में लगे हैं कि शेरू मियाँ फलों पर मार्च में नहीं बल्कि फरवरी में थूक लगा रहे थे। पत्थर को वॉलेट साबित करने वाले ये फैक्ट चेकर्स ऐसे साक्ष्य जुटा रहे हैं, जिनसे ये साबित किया जा सके कि चाकू पर थूक लगाकर तरबूज बेचने वाला व्यक्ति स्टील का चाकू इस्तेमाल कर रहा था या फिर प्लास्टिक का? इनका मर्म यह है कि बिहार-लखनऊ की जिस मस्जिद में विदेशी तबलीगियों को छुपाकर रखा गया था, वो चीन के नहीं बल्कि तुर्कमेनिस्तान के मुल्ला थे।
निजामुद्दीन में तबलीगी जमात के मरकज का सम्बन्ध और समाज के प्रति इसका नजरिया कोरोना वायरस के बहाने ही सही लेकिन आख़िरकार सबकी नजरों में यह मुद्दा आखिर आ ही गया। गृह मंत्रालय ने 690 ऐसे तबलीगी जमातियों के वीजा निरस्त कर इनके सदस्यों को ब्लैक-लिस्ट कर दिया है। जाँच में पता चला है कि निजामुदीन स्थित इस मरकज की बिल्डिंग को अवैध तरीके से धीरे-धीरे कर तैयार किया जाता रहा। 1960 के दशक में यह पहले महज स्थानीय लोगों के नमाज पढ़ने की जगह हुआ करती थी, जो बाद में मस्जिद और फिर 7 मंजिला (इसके अलावा दो भूमिगत फ्लोर भी) मरकज में तब्दील कर दिया गया।
ऐसे में एक निराशा हर किसी को सरकार से यह जरूर हो सकती है कि आखिर इतने वर्षों तक इस बात पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया। जबकि कई देशों में पर्यटक वीजा के नाम पर मजहबी गतिविधियों में शामिल यह तबलीगी जमात कई वर्ष पहले प्रतिबंधित कर दी जा चुकी थी। यह यकीन अवश्य किया जा सकता है कि वर्तमान में केंद्र की दक्षिणपंथी सरकार ने जिस दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ तीन तलाक जैसे फैसलों को साकार कर दिया, वह तबलीगी जमात की कारस्तानी पर तो अवश्य ही कोई बड़ा फैसला लेगी।
हमने गत वर्षों में देखा है कॉन्ग्रेसी तुष्टिकरण का अभ्यस्त हमारे समाज और वामपंथी मीडिया गिरोहों के अपार विरोध के बावजूद सरकार ने अनुच्छेद-370 के प्रावधानों को निरस्त करने से लेकर विदेशों में रह रहे हिन्दू शरणार्थियों के लिए नागरिकता कानून जैसे अहम फैसले लिए हैं। यही मीडिया गिरोह और देश का स्वघोषित उदारवादी संगठन तबलीगी जमात के सदस्यों की तमाम अनुचित कारस्तानियों के बावजूद यह रोना रो रहा है कि डॉक्टर्स से लेकर सरकार और मीडिया मजहब को बदनाम करने का प्रयास कर रहा है। जबकि देखा जाए तो डॉक्टर्स, मीडिया और सोशल मीडिया वही चीज सामने ला रही है, जो कि एक ख़ास समुदाय के लोग कर रहे हैं। यह बात सराहनीय है कि उदारवादी वर्ग को यह महसूस हुआ कि यह सब कारनामे बदनाम ही करते हैं, ना कि इनसे कोई भारत रत्न हासिल किया जाता है।
हाँ! देश के वामपंथी उदारवादियों के लिए नया संघर्ष अवश्य खड़ा हो गया है, वह ये; कि ना ही वह तबलीगियों के कारनामों पर यह सवाल उठा पा रहे हैं कि सरकार इनके खिलाफ कार्रवाई में देर ना करे और ना ही खुलकर यह बात स्वीकार कर पा रहे हैं कि देशभर में आज संक्रमण के सबसे बड़े स्रोत तबलीगी जमाती ही हैं। क्योंकि तबलीगी ‘उपदेशकों’ की गोपनीय मंशा पर सवाल उठाना उन्हें एक ही बार में कट्टर और इस्लामोफोबिक साबित कर देगा।