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टेरर फंडिंग पर पाकिस्तान से FATF ने पूछे 150 सवाल, आतंकवाद में संलिप्त मदरसों पर भी मॉंगा जवाब

फ़ाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (FATF) ने पाकिस्तान से 150 सवाल पूछे हैं। FATF दुनियाभर में टेरर फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों पर जर रखती है। सवाल आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई को लेकर इमरान खान की सरकार के दावों से जुड़े हैं। उन मदरसों पर कार्रवाई की बाबत भी जवाब मॉंगा गया है जो आतंकी गतिविधियों में संलिप्त हैं। पाकिस्तान को इन सारे सवालों के जवाब 8 जनवरी तक देने होंगे।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पाकिस्तान ने 7 दिसंबर को ही एफएटीएफ के 22 सवालों का जवाब दिया था। अब एफएटीएफ ने पाकिस्तान से आतंकी संगठनों से जुड़े लोगों पर अदालती कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा है। साथ ही मदरसों को आतंकी गतिविधियों से दूर रखने के लिए उठाए गए कदमों का ब्यौरा भी मॉंगा है।

ख़बर के अनुसार, FATF ने पाकिस्तानी अधिकारियों से यह सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि आतंकवादी संगठनों से जुड़े व्यक्तियों को दोषी ठहराया जाए। FATF द्वारा 150 सवालों के जवाब माँगे जाने की पुष्टि पाकिस्तानी अधिकारियों ने की है।

पाकिस्तान को ब्लैक लिस्ट में डाला जाए या नहीं यह फरवरी में होनी वाली FATF की बैठक में तय होगा। पिछले साल फरवरी में ही पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में डाला गया था। पाकिस्तान इस उम्मीद में है कि अगली बैठक में भी उसे ब्लैक लिस्ट में डालने का फ़ैसला टल जाएगा और उसे जून 2020 तक की नई मियाद मिल जाएगी। हालाँकि, FATF ने पिछली मीटिंग में पाकिस्तान को कड़े लहज़े में कहा था कि अगर उसने तय समय-सीमा में ऐंटी-मनी लॉन्ड्रिंग और काउंटर-टेरर फाइनैंसिंग के 27 में से बाकी बचे 22 बिंदुओं (सवालों) पर उचित कार्रवाई नहीं की तो उसे ब्लैकलिस्ट में डाल दिया जाएगा।

पाकिस्तानी अखबार एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने वहाँ के वित्त मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से लिखा कि पाकिस्तान ने 7 दिसंबर को ही एफएटीएफ के 22 सवालों का जवाब दिया था। उन्हीं जवाबों पर एफएटीएफ ने दोबारा 150 सवाल पूछ डाले। अब पाकिस्तान को मनी लॉन्ड्रिंग और टेरर फाइनैंसिंग पर नए सवालों के जवाब देने होंगे।

पाकिस्तान FATF को यह भी बताएगा कि उसने पैसे की सीमा पार अवैध आवाजाही पर रोक के लिए कौन-कौन से क़दम उठाए। 7 दिसंबर को पाकिस्तान ने जो कंप्लायंस रिपोर्ट सौंपी थी, उसमें संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित आतंकवादी समूहों पर इमरान सरकार के ऐक्शन और उन्हें कोर्ट से मिली सज़ा के बारे में भी विस्तृत जानकारी दी थी। पाकिस्तान अब तक चीन, तुर्की, मलेशिया, सऊदी अरब और मध्य पूर्व देशों के राजनयिक समर्थन के कारण ब्लैकलिस्ट से बचने में सफल रहा है।

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बुलेट प्रूफ जैकेट को चीरती हुई निकली दंगाई की गोली, जेब में विराजमान शिवजी ने बचाई कॉन्स्टेबल की जान

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले में शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद शुरू हुआ हिंसक-प्रदर्शन शनिवार को भी जारी रहा। इस दौरान कॉन्स्टेबल विजेंद्र कुमार को नया जीवन मिला। प्रदर्शन के दौरान दंगाइयों ने फायरिंग की। इस दौरान एक बुलेट विजेंद्र कुमार के बुलेटप्रूफ जैकेट के आर-पार चली गई। लेकिन सिक्कों से भरे पर्स में जाकर गोली फँस गई। विजेंद्र ने पर्स जैकेट की ऊपर वाली जेब में रखा हुआ था।

विजेंद्र ने कहा, “यह मेरा दूसरा जीवन है। मैं भगवान का शुक्रगुजार हूँ। कल विरोध-प्रदर्शन के दौरान यह गोली लगी थी। मुझे वास्तव में ऐसा लग रहा है कि यह मेरा दूसरा जीवन है।” उन्होंने बताया, “भारी पथराव और फायरिंग के बीच मुझे हिंसक भीड़ को रोकना था। इसी दौरान एक गोली मेरे सीने की तरफ आई। मेरी बुलेटप्रूफ जैकेट तो इससे नहीं बचा पाई, लेकिन मेरा पर्स जिसमें मैंने भगवान शिव की तस्वीर रखी थी ने बचा लिया।”

जब विरोध-प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया और फायरिंग शुरू हुई उस वक़्त विजेंद्र कुमार फिरोजाबाद एसपी के एस्कॉर्ट में शामिल थे। फिरोजाबाद एसपी सचिंद्र पटेल ने घटना की पुष्टि करते हुए कहा कि विजेंद्र कुमार भाग्यशाली थे, वो बाल-बाल बच गए। पटेल ने बताया कि हिंसक भीड़ पुलिसवालों पर फायरिंग कर रही थी। थानाध्यक्ष, सब इंस्पेक्टर और कॉन्स्टेबल सहित 40 पुलिसकर्मी घायल हो गए हैं।

बता दें कि नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के नाम पर प्रदेश में हुई हिंसा को लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस ने ताबड़तोड़ कार्रवाई करनी शुरू कर दी है। उपद्रवियों की पहचान कर एफआईआर दर्ज करने और उन्हें गिरफ्तार का सिलसिला जारी है। साथ ही सीएम योगी आदित्यनाथ की सरकार ने हिंसा के बाद हुए नुकसान की भरपाई के लिए एक 4 सदस्यीय कमेटी बना दी है, जो गिरफ्तार लोगों को पैसा वसूल करेगी। सीएम के इस ऐलान के दो दिन बाद शनिवार से ही उपद्रवियों की पहचान कर नोटिस भेजना शुरू हो गया है। मुजफ्फरनगर में प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए 50 दुकानों को सील कर दिया है।

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भीम आर्मी के चंद्रशेखर से मायावती ने दलितों को किया सचेत, कहा- यूपी का होकर दिल्ली के जामा मस्जिद जाता है

नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में हो रहे ​हिंसक प्रदर्शनों को लेकर दलित नेतृत्व के बीच मतभेद स्पष्ट दिख रहा है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने कार्यकर्ताओं को पहले ही इससे दूर रहने को कहा था। अब उन्होंने भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर उर्फ रावण पर इसको लेकर निशाना साधा है। उन्होंने चंद्रशेखर पर विरोधियों के हाथ खेलने का आरोप लगाते हुए कहा है कि उत्तर प्रदेश का होकर भी वह दिल्ली के जामा मस्जिद जाता है और जबरन अपनी गिरफ्तारी करवाता है।

मायावती ने सिलसिलेवार ट्वीट के जरिये भीम आर्मी चीफ़ को लताड़ लगाई है। उन्होंने ट्वीट कर कर कहा है कि दलितों का मानना है कि षड्यंत्र के तहत चंद्रशेखर ऐसे राज्यों में जाता है जहॉं चुनाव करीब हो और बीएसपी की पकड़ हो। वोटों को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर प्रदर्शन वगैरह कर वह फिर जबरन जेल चला जाता है।

मायावती ने कहा कि वह (चंद्रशेखर) उत्तर प्रदेश का रहने वाला है। लेकिन, CAA/ NRC पर वो यूपी के बजाए वह दिल्ली के जामा मस्जिद में हो रहे विरोध-प्रदर्शन में शामिल होता है। जबरन अपनी गिरफ़्तारी करवाता है, क्योंकि दिल्ली में जल्द ही विधानसभा चुनााव होने हैं। उन्होंने कहा, “मैं पार्टी कार्यकर्ताओं से अपील करती हूँ कि वे ऐसे सभी स्वार्थी तत्वों, संगठनों व पार्टियों से हमेशा सचेत रहें। वैसे ऐसे तत्वों को पार्टी कभी लेती नहीं है, चाहे वे कितना ही प्रयास क्यों न कर लें।”

दरअसल, रविदास मंदिर की घटना के दौरान हुए आंदोलन पर अपनी गिरफ़्तारी से मुक्त होने के बाद, भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद ने बसपा सुप्रीमो मायावती की तरफ़ दोस्ती का हाथ बढ़ाया था और भाजपा के ख़िलाफ़ एकजुट होने के लिए कहा था। चंद्रशेखर, जो मायावती को ‘बुआ’ या चाची के रूप में संदर्भित करता है, उसने मायावती को एक खुला पत्र लिखा था, जिसमें चंद्रशेखर ने बहुजन आंदोलन को मज़बूत करने के लिए चर्चा में शामिल होने के लिए कहा था ताकि वह दलित विरोधी नीतियों के लिए भाजपा सरकार के ख़िलाफ़ लड़ सके। हालाँकि, बसपा प्रमुख ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था, क्योंकि बसपा इसे दलितों के बीच भ्रम पैदा करने की चाल मानती है।

ग़ौरतलब है कि शुक्रवार (20 दिसंबर) को चंद्रशेखर आज़ाद दिल्ली के जामा मस्जिद पर हुए प्रदर्शन में दिखा था। बाद में उसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। दिल्ली की एक अदालत ने शनिवार को उसे 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया था।

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नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध के नाम पर प्रदेश में हुई हिंसा को लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस ताबड़तोड़ कार्रवाई कर रही है। उपद्रवियों की पहचान कर एफआईआर दर्ज करने और उन्हें गिरफ्तार का सिलसिला जारी है। नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ उत्तर प्रदेश के कई जिलों में शनिवार (दिसंबर 21, 2019) को भी हिंसक प्रदर्शन जारी रहा। उपद्रवी तत्वों ने पुलिस पर हमले किए, कई वाहनों में आग लगा दी और तोड़फोड़ की।

यूपी पुलिस ने बताया कि CAA के दौरान हुई हिंसा में शामिल 705 लोगों को गिरफ्तार व 4500 लोगों को हिरासत में लेने के बाद छोड़ दिया गया है। पुलिस द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार अब तक 124 एफआईआर दर्ज की गई है, वहीं इस हिंसा में अभी तक कुल 263 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं, जिनमें से 57 पुलिसकर्मी को बुलेट इंजरी आई हैl हिंसाग्रस्त क्षेत्रों से 405 खोखा कारतूस बरामद हुए हैं।

इस बीच गोरखपुर में पुलिस ने उपद्रवियों की फोटो सोशल मीडिया पर जारी करते हुए पहचान बताने वालों को ईनाम देने की घोषणा की है। पुलिस ने कहा है कि उपद्रवियों की सूचना देने वाले व्यक्ति का नाम गोपनीय रखा जाएगा और सहयोग करने वालों को उचित ईनाम दिया जाएगा।

विज्ञप्ति में बताया गया है कि सोशल मीडिया पर भी पुलिस की नजर लगातार बनी हुई है और वह बड़ी कार्रवाई कर रही है। पुलिस ने बताया कि सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्मों पर किए गए आपत्तिजनक/ भ्रामक पोस्टों/ मैसेज आदि के संबंध में प्रदेश में अब तक कुल 63 एफआईआर दर्ज की गई हैं, वहीं 102 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। कुल 14101 सोशल मीडिया पोस्टों के विरुद्ध कार्रवाई की गई। इनमें टि्वटर की 5965, फेसबुक की 7995 और यूट्यूब की 141 आपत्तिजनक पोस्ट शामिल हैं।

इसके अलावा उत्तर प्रदेश में सीएम योगी आदित्यनाथ की सरकार ने हिंसा के बाद हुए नुकसान की भरपाई के लिए एक 4 सदस्यीय कमेटी बना दी है, जो गिरफ्तार लोगों को पैसा वसूल करेगी। सीएम के इस ऐलान के दो दिन बाद शनिवार से ही उपद्रवियों की पहचान कर नोटिस भेजना शुरू हो गया है। मुजफ्फरनगर में प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए 50 दुकानों को सील कर दिया है।

वहीं अलीगढ़ में इंटरनेट सेवाएँ बहाल कर दी गई हैं। नागरिकता संशोधन कानून को लेकर विरोध-प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़कने के बाद 15 दिसंबर से सेवाओं को निलंबित कर दिया गया था।

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दंगाई भीड़ में शामिल 7-14 साल के बच्चों ने की पत्थरबाज़ी, जबलपुर के SP का चौंकाने वाला ख़ुलासा

मध्य प्रदेश के जबलपुर के पुलिस अधीक्षक (एसपी) अमित सिंह ने चौंकाने वाला ख़ुलासा किया है। उन्होंने बताया कि नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध कर रहे दंगाइयों की भीड़ में शामिल 7 से 14 साल के बच्चों ने पुलिस पर पत्थरबाज़ी की। उन्होंने कहा उपद्रवियों में शामिल 7-14 साल के बच्चों को नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण (NRC) के बारे कुछ नहीं पता, बावजूद इसके उन्होंने न सिर्फ़ पुलिस पर पथराव किया बल्कि वाहनों को भी क्षतिग्रस्त किया।

पुलिस अधिकारी ने कहा कि आमतौर पर यह आरोप पुलिस पर लगाया जाता है कि उन्होंने बच्चों पर लाठीचार्ज किया और नाबालिगों पर आँसू गैस का इस्तेमाल किया। लेकिन, अब भी शहर के कुछ हिस्से ऐसे हैं जहाँ छोटे बच्चे उत्पात मचा रहे हैं। उन्होंने कहा, “न केवल बच्चे बल्कि उनके अभिभावकों के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई की जाएगी।” हिंसा के बाद स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए इलाक़े में कर्फ़्यू लगा दिया गया है।

जबलपुर में नागरिकता क़ानून और राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण (NRC) के ख़िलाफ़ उग्र हुई भीड़ ने एक विरोध मार्च के दौरान काफ़ी हिंसक रूप ले लिया था।

ख़बर के अनुसार, हिंसक भीड़ ने न केवल पुलिसकर्मियों, बल्कि मीडिया कर्मियों पर भी जमकर पथराव किया और सार्वजनिक सम्पत्तियों को नुक़सान पहुँचाया। कुछ पुलिस अधिकारी गंभीर रूप से घायल हो गए, जिन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती किया गया।

एसपी अमित सिंह ने आगे कहा कि उग्र हुई भीड़ में नक़ाबपोश बच्चों की बड़ी संख्या में मौजूदगी इस बात का स्पष्ट संकेत था कि उन्हें कुछ तत्वों द्वारा भड़काया गया था। उपद्रवियों की भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को आँसू गैस के गोले दागने पड़े। उन्होंने कहा कि हमारी प्राथमिकता स्थिति को नियंत्रण में लाने की रहती है। उन्होंने जानकारी दी कि इलाक़े के चार पुलिस स्टेशनों में कर्फ़्यू लगा दिया गया है।

पुलिस अधिकारी ने कहा कि शुक्रवार (20 दिसंबर) को जुमे की नमाज के बाद स्थानीय लोगों ने छोटे समूहों में विभाजित होकर, छोटी गलियों में घुसकर जुलूस का नेतृत्व करने की कोशिश की। बच्चों और किशोरों की भीड़ ने पत्रकारों और कैमरापर्सन पर भी हमला किया। कई मीडियाकर्मियों को पत्थरों से मारा गया।

नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में शुक्रवार की दोपहर हज़ारों लोगों के सड़कों पर उतरने के बाद मुस्लिम भीड़ द्वारा हिंसक विरोध-प्रदर्शन किया गया। दंगों के बाद चार थाना क्षेत्रों- अधारताल, हनुमंतल, गोहलपुर और कोतवाली में कर्फ़्यू लगा दिया गया।

फ़िलहाल, जबलपुर में कर्फ़्यू में ढील दी गई है। मध्य प्रदेश के 50 ज़िलों में धारा-144 लगी हुई है। भोपाल क़ाज़ी ने शांति की अपील की है।

दंगों से कुछ तस्वीरें, जो बताती हैं पुलिस वाले भी चोट खाते हैं, उनका भी ख़ून बहता है…

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मजहबी भीड़ ने मंदिर में की तोड़-फोड़ और आगजनी: पटना में स्थानीय लोग और पुलिस इनके सामने असहाय

नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) एवं राष्‍ट्रीय नागरिक रजिस्‍टर (NRC) के विरोध में आयोजित राष्‍ट्रीय जनता दल (RJD) के बिहार बंद के दौरान शनिवार (दिसंबर 21, 2019) को राज्‍य में कई जगह भारी हिंसा हुई। सबसे बड़ी घटना पटना के फुलवारीशरीफ में हुई, जहाँ दो गुटों के बीच भिड़ंत के दौरान जमकर पथराव हुआ। इस दौरान हुई फायरिंग में 11 लोगों को गोली लगी, जबकि एक को छुरा भी मारा गया। घटना के दौरान पथराव में आधा दर्जन पुलिसकर्मियों सहित दो दर्जन लोग घायल हो गए।

इसके साथ ही उपद्रवियों ने फुलवारीशरीफ के एक मंदिर में भी तोड़-फोड़ और आगजनी की। जानकारी के मुताबिक, बंद के समर्थन में निकला जुलूस टमटम पड़ाव के पास धार्मिक स्थल से गुजर रहा था। इस जुलूस में उपद्रवी और असामाजिक तत्व भी मौजूद थे। सभी टमटम पड़ाव पर पहुँचने के बाद संगतपर मोहल्ले से आगे बढ़ने पर अड़ गए। लेकिन संगतपर निवासियों ने जुलूस का रास्ता रोक लिया था। पुलिस ने भी उन्हें आगे बढ़ने की अनुमति नहीं दी, जिसके बाद विवाद बढ़ गया और जुलूस में शामिल उपद्रवियों ने धार्मिक स्थल में तोड-फ़ोड़ करनी शुरू कर दी और फिर आगजनी भी की। इससे विवाद ने और विकराल रूप ले लिया। दोनों गुटों के बीच जमकर पत्थरबाजी और फायरिंग हुई।

बता दें कि बंद की पूर्व संध्या पर शुक्रवार (दिसंबर 20, 2019) को आरजेडी की ओर से राजधानी पटना समेत सभी जिलों, प्रखंडों एवं कस्बों में मशाल जुलूस निकाले गए। बंद को लेकर आरजेडी नेता व बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्‍वी यादव ने प्रशासन को चेतावनी दी थी कि अगर उसने आरजेडी समर्थकों को नुकसान पहुँचाया तो अंजाम बुरा होगा, लेकिन बंद के दौरान आरजेडी कार्यकर्ता ही जगह-जगह हिंसा पर उतर गए। महागठबंधन के सहयोगी दलों एवं वाम दलों ने भी आरजेडी के बंद का समर्थन किया। उपद्रवी तत्‍वों ने मीडियाकर्मियों को भी नहीं छोड़ा। इस दौरान ‘लालू यादव जिंदाबाद’, ‘नरेंद्र मोदी मुर्दाबाद’ और ‘दिल्ली पुलिस हाय-हाय’ के नारे भी लगे।

काफिरों से आजादी, हत्यारों से आजादी… हम लेकर रहेंगे आजादी: भुवनेश्वर में लगे हिंदू और देश विरोधी नारे

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नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ बवाल शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। विरोध प्रदर्शन के नाम पर नागरिकता के इस नए कानून को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में हिंसा की जा रही है। असम से शुरू हुए इस विरोध प्रदर्शन की लपटों ने पहले कोलकाता को अपने आगोश में लिया, इसके बाद दिल्ली की जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों के हिंसक प्रदर्शन ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा। अब भुवनेश्वर के समुदाय विशेष ने भी विरोध के नाम पर देश-विरोधी और हिंदुओं के खिलाफ नारे लगाए। नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ समुदाय ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन तेज कर दिया है।

इस बीच उड़ीसा के भुवनेश्वर में हुए विरोध प्रदर्शन का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें विरोध के नाम पर हिन्दू विरोधी और देश विरोधी नारे लगाए जा रहे हैं। प्रदर्शनकारी उर्दू में लिखी तख्ती को लेकर विरोध कर रहे हैं और नारे लगा रहे हैं, “हम लेकर रहेंगे आजादी, इन काफिरों से आजादी, इन हत्यारों से आजादी, इस जहन्नुम से चाहिए आजादी, पुलिस बर्बरता से चाहिए आजादी, इस नाइंसाफी से चाहिए आजादी, इस्लामोफोबिया से चाहिए आजादी, दंगाइयों से आजादी।”

इसके अलावा सोशल मीडिया पर ऐसे तमाम वीडियो सामने आए हैं, जिनमें नागरिकता संशोधन कानून का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों ने हिंसक रुख अख्तियार करते हुए पुलिसकर्मियों पर खूनी हमले किए, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाया है। लेकिन किसी वामपंथी और जनवादी लेखक ने इस तरह के हिंसक कृत्यों की कोई निंदा नहीं की है। बता दें कि नागरिकता संशोधन कानून से भारत के 20 करोड़ से अधिक अल्पसंख्यकों में से किसी एक को भी किसी प्रकार का कानूनी संकट नहीं आने वाला है। यह वैधानिक रूप से एक तथ्य है और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह संसद से लेकर हर लोकमंच पर स्पष्ट कर चुके हैं। इसके बावजूद दूसरे मजहब के लोग लगातार बिना तथ्य को जाने, बिना विरोध की वजह जाने देश विरोध और हिंसक कृत्य करने पर उतारू हैं।

इतना ही नहीं, जो राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) अभी प्रस्तावित ही नहीं है उसका पूरा खाका (फर्जी और भ्रम फैलाने वाला) बनाकर पेश कर दिया गया है। इतिहास की भारत विरोधी भावनाएँ गढ़ने वाले ये बुद्धिजीवी असल में अपने असली चरित्र पर आ गए हैं। उनकी अपनी नाजी मानसकिता आज सबके सामने आ गई है, जो किसी भी सूरत में दक्षिणपंथी या अन्य विचार को स्वीकार नहीं करती है। इसके लिए वह झूठ या फिर हिंसा सबको जायज मानती है। हालाँकि, वह आज भी मानने को तैयार नहीं हैं कि उनकी भारत विरोधी और अल्पसंख्यकवादी राजनीतिक दलीलों को नया भारत खारिज कर चुका है।

2019 की इस मजहबी उन्मादी आग से 2024 में कितनी रोशन होगी भाजपा?

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2019 की इस मजहबी उन्मादी आग से 2024 में कितनी रोशन होगी भाजपा?

2014 के आम चुनावों में नरेंद्र मोदी ने एक तरह से अविश्वसनीय जीत हासिल की थी। उनसे नफरत करने वाले भी यह मानने को मजबूर हो गए थे कि उनका करिश्मा देशव्यापी है। आजाद भारत में शायद इसकी तुलना इंदिरा गॉंधी की अपील से की जा सकती थी। नफरत करने वालों ने इंदिरा से तुलना जान-बूझकर की, क्योंकि नेहरू के मुकाबिल मोदी को खड़ा करना उनके लिए ईश निंदा जैसा होता। एक तथ्य यह भी है कि चुनावी जीत के संदर्भ में नेहरू के बराबर पायदान पर खड़े होने के लिए मोदी को भी 2024 के आम चुनावों में लगातार तीसरी बार फतह हासिल करनी होगी।

हालॉंकि राजनीतिक नब्ज भॉंपने की क्षमता और करिश्मे को लेकर इंदिरा के साथ मोदी की तुलना के पीछे भी एक मकसद था। एक दबी हुई इच्छा थी। मकसद था इंदिरा की तरह मोदी की निरंकुश छवि गढ़ना। दबी आकांक्षा यह थी कि मोदी लड़खड़ाएँगे और आपातकाल लगा देंगे। इससे सत्ता से उनकी विदाई का रास्ता तैयार होगा। यही कारण है कि हर मौके पर बार-बार यह भ्रम पैदा करने की कोशिश की गई कि देश में ‘अघोषित आपातकाल’ है।

मोदी से घृणा करने वाले आपातकाल का जिस बेचैनी और तड़प के साथ इंतजार कर रहे हैं, शायद ही कोई ‘संघी’ हिंदू राष्ट्र को लेकर उतना बेसब्र होगा।

बड़े पैमाने पर छात्रों के प्रदर्शन जो तेजी से जनांदोलन में बदल हो गया के कारण 1975 में आपातकाल लागू किया गया था। मोदी से घृणा करने वाले चाहते हैं कि ऐसा दोबारा हो। नतीजतन, छात्र की तरह दिखने और नारे लगाने वाला नजर आते ही आपातकाल लगने की उनकी आस जग जाती है और उन्हें बहुप्रतीक्षित सपना साकार होता दिखता है।

2016 की शुरुआत में जेएनयू के कुछ छात्र जब देश विरोधी कार्यक्रम आयोजित करने और वहाँ आतंकी अफजल गुरु के समर्थन में नारे लगने के बाद गिरफ्तार किए गए तो उन्होंने सोचा कि उनके सपने के पूरा होने का वक्त आ गया। इसके एक या दो हफ्ते पहले ही कट्टर वामपंथी राजनीति से प्रताड़ित होकर रोहित वेमुला नाम के एक छात्र ने आत्महत्या कर ली थी।

‘गया! अब दलित वोट भी गया!’ रोहित वेमुला की मौत के बाद मोदी से घृणा करने वाली एक ‘पत्रकार’ की यही प्रतिक्रिया थी। बता दें कि यह घटना जनवरी 2016 की है। उससे पहले भाजपा दो चुनाव हार गई थी। पहले दिल्ली और फिर बिहार में। अरविंद केजरीवाल के ‘मैं बनिया हूँ’ भाषण का हवाला देते हुए कहा गया कि आप ने दिल्ली में बीजेपी के बनिया वोटर छीन लिए और बिहार में ओबीसी का वोट नहीं मिला। ‘लिबरल’ पत्रकार वेमुला के मरने से काफी उत्साहित थी, क्योंकि यह भाजपा के दलित वोटों को भी छीन सकता था।

चाहे वह आत्महत्या हो, हत्या हो, विरोध हो, दुर्घटना हो, बिजनेस हो या फिर क्रिएटिव प्रोडक्ट- मोदी की चुनावी संभावनाओं पर इसका क्या असर पड़ेगा, इसकी परवाह लिबरलों की जमात को है। लिबरलों का जश्न या विरोध इस बात पर निर्भर करता है कि यह मोदी की मदद करेगा या नुकसान पहुँचाएगा। छात्रों का विरोध उनके अंदर आपातकाल की उम्मीद जगाता है। साथ ही इसमें यह भी अंतर्निहित होता है कि जिस तरह से 1977 में आपातकाल के बाद इंदिरा को हार मिली थी, उसी तरह से मोदी भी परास्त हो जाएँगे।

इसी उम्मीद के साथ उन्होंने जेएनयू के पार्ट-टाइम-छात्रों सह फुल-टाइम प्रदर्शनकारियों को हीरो बनाया गया था। रोहित वेमुला की मौत को विभिन्न शैक्षणिक परिसरों में भुनाने की कोशिश हुई। एफटीआईआई में गजेन्द्र चौहान को चेयरमैन नियुक्त किए जाने के विरोध में छात्रों का प्रदर्शन हुआ और फिर वह भी इस गतिविधि में शामिल हो गए। यहाँ तक कि हार्दिक पटेल जैसे को छात्र नेता के तौर पर पेश किया गया। छात्रों ने कैंपस को अशांत किया और फिर निराश हो बैठ गए। इसके बाद उन्होंने मॉब लिंचिंग, गौरी लंकेश की हत्या, घर वापसी इत्यादि को लेकर ‘माहौल’ बनाया और इसे अघोषित आपातकाल की निशानी के रूप में पेश किया गया।

ऐसा लगा आपातकाल उनके सपनों में आया। वे शोर मचाने लगे ये देखो आपातकाल। जिसका हम इंतजार कर रहे थे।

हालाँकि, उनके सपने 2019 में चकनाचूर हो गए, जब मोदी एक बार फिर से बड़े जनादेश के साथ सत्ता में लौटे। लेकिन जैसा कि एक लिबरल कभी गलत नहीं होता, लोग गलत होते हैं। मोदी से घृणा करने वाले पूरी तरह मुतमइन थे कि मोदी 2019 में हारने वाले थे, लेकिन बालाकोट एयरस्ट्राइक से बदले माहौल और उग्र राष्ट्रवाद के झॉंसे में मूर्ख जनता के आने की वजह से वे जीत गए।

यही कारण है कि ये लिबरल जमात दूसरे कार्यकाल में भी वही तीन-तिकड़म और भी आक्रामकता से दुहरा रहे हैं। वे एक बार फिर छात्र विरोध और क्रांति का सपना देख रहे हैं। इस बार नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर माहौल बनाया जा रहा है।

सबसे पहले, एएमयू और जामिया के मजहबी प्रदर्शन को छात्रों के विरोध के रूप में पेश किया गया। फिर जामिया में दंगाइयों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई को छात्रों पर कार्रवाई के तौर पर प्रस्तुत किया गया। अन्य परिसरों के छिटपुट प्रदर्शनों को ‘छात्रों पर कार्रवाई’ के समर्थन में ‘विद्रोह’ के रूप में प्रस्तुत किया गया। यह सब बेहद सोचे-समझे तरीके से बॉलीवुड अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की मिलीभगत से किया गया ताकि ऐसा भ्रम पैदा हो कि छात्रों का विरोध जनांदोलन में बदल रहा है।

इस तरह का सन्देश देने की कोशिश हुई कि अब आपातकाल को कोई नहीं रोक सकता। अनुराग कश्यप ने इमरजेंसी हैशटैग के साथ ट्वीट भी किया।

तो क्या इतिहास खुद को दोहराएगा? या फिर पिछली बार की तरह विफल रहेगा और 2024 में मोदी को और भी व्यापक जनादेश मिलेगा?

खैर, 2024 बहुत दूर है और कोई भी निश्चित तौर पर नहीं कह सकता कि उस समय क्या होगा। लेकिन मुझे लगता है कि मोदी 2024 में भी इसका फायदा उठाने की स्थिति में होंगे क्योंकि उनसे नफरत करने वाले 2019 की हार से कुछ भी सीखने को तैयार नहीं हैं। 2016 में जेएनयू के गढ़े हुए छात्र विरोध की वजह से आम लोगों के मन में राष्ट्रवाद की भावना बालाकोट एयरस्ट्राइक से पहले ही मजबूत हो चुकी थी। जेएनयू में लगे ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ के नारे सभी ने सुने थे। इसके बाद ही राष्ट्रवाद की भावना पैदा हुई। बावजूद इसके प्रोपेगेंडा फैलाने वाले धूर्त लिबरलों ने कहा कि इस वीडियो के साथ छेड़छाड़ की गई है।

इसी तरह, CAA को लेकर किए जा रहे छात्रों का मनगढ़ंत प्रदर्शन आम मतदाताओं के भीतर हिंदुत्व की भावना को मजबूत कर सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि CAA के खिलाफ हो रहे विरोध-प्रदर्शन मजहबी नंगई और तुष्टिकरण से हटकर कुछ भी नहीं है। फिर भी हिंसा में हिंदुओं के शामिल होने जैसे धूर्त दुष्प्रचार किया जा रहा है। ध्यान देने वाली बात है कि ऐसा कर वे ‘JNU वाली वीडियो के साथ छेड़छाड़ हुई है’ वाले उसे हास्यापद षड्यंत्र को आगे बढ़ा रहे हैं जैसा मोदी के पहले कार्यकाल में किया गया था।

यदि मोदी से नफरत रखने वाले इतनी बेताबी से इतिहास को दोहराने में लगे हैं, तो इतिहास निश्चित रूप से उन्हें निराश नहीं करेगा और 2019 के नतीजें फिर से 2024 में दोहराए जाएँगे। कम से कम आज तो मुझे ऐसा ही लगता है।

तो क्या यह तय मान लिया जाए कि विरोध-प्रदर्शनों से मोदी सरकार बेअसर है? किसी भी स्तर पर छात्रों या आम लोगों का प्रदर्शन उसकी चुनावी संभावनाओं को नुकसान नहीं पहुॅंचा सकता? तब भी जब कोई कहे कि मौजूदा CAA विरोधी प्रदर्शनों की तुलना 2016 के जेएनयू के प्रदर्शनों की बजाए 2011 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से की जानी चाहिए? कुछ लोग बेहद चालाकी से “IAC” का इस्तेमाल करने भी लगे हैं। तब इसका मतलब था इंडिया अंगेंस्ट करप्शन और अब यह इंडिया अंगेस्ट CAA के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है।

यह एक अच्छा तर्क है कि इसका विश्लेषण इसकी खूबियों के आधार पर किया जाना चाहिए। क्या यह मोदी 2.0 के लिए अन्ना आंदोलन साबित हो सकता है? क्या 2024 में इतिहास खुद को 2019 की बजाए 2014 के रूप में दोहरा सकता है?

इसके लिए, हमें यह देखना होगा कि अन्ना आंदोलन क्यों सफल हुआ? इसने कॉन्ग्रेस पार्टी को कैसे नुकसान पहुँचाया? क्या वही बात CAA के विरोध और भाजपा पर लागू होती है?

बता दें कि दोनों विरोधों के बीच प्रमुख अंतर मुद्दे का है। भ्रष्टाचार एक ऐसा मसला है जिससे हर भारतीय प्रभावित होता है। इससे हर कोई जुड़ा होता है। नागरिकता खोने का खतरे ऐसा नहीं है। मोदी विरोधी रणनीतिकारों ने यहाँ गलती की। वे चिल्लाते रहे कि CAA+NRC मुस्लिम विरोधी है और इस तरह उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से कहा कि गैर-मुस्लिमों को परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। यह भ्रष्टाचार जैसी समस्या नहीं थी जो हर नागरिक को प्रभावित कर सके।

हालाँकि वामपंथी अब महसूस करते हैं कि यह एक बड़ी रणनीतिक गलती थी। अब गलती को सुधारने के लिए फरहान अख्तर जैसे लोगों ने अत्यधिक भ्रामक पर्चे फैलाए, जिसमें दावा किया गया कि गरीब, दलित, आदिवासी, ट्रांसजेंडर और अन्य समूह भी अपनी नागरिकता खो सकते हैं। वास्तव में ये बेतुकी बात है। उनके कहने का मतलब है कि करीब 90 फीसदी भारतीयों की नागरिकता चली जाएगी और उन्हें निर्वासित कर दिया जाएगा। कहॉं निर्वासन किया जाएगा? इस तरह के बेवकूफाना दुष्प्रचार पर भला कौन यकीन करे?

इस विरोध को धर्मनिरपेक्ष-मानवतावादी विरोध के तौर पर पेश करने में उनसे काफी देरी हो चुकी है। लेकिन अभी भी मीडिया की मदद से बड़े पैमाने पर प्रयास किए जा रहे हैं। हालाँकि वे CAA+NRC के मजहब विरोधी होने के बारे में पहले से ही बहुत अधिक भयभीत हैं, क्योंकि मजहबी भीड़ ने अब सूत्र अपने हाथ में ले लिए हैं। इससे यह सुनिश्चित होगा कि इस मुद्दे को केवल मजहबी मुद्दे के रूप में देखा जाए।

दूसरा अंतर यह है कि दोनों विरोध सत्ता के संबंधित पक्षों को कैसे प्रभावित करते हैं। 2011 के भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शन ने कॉन्ग्रेस पार्टी को भ्रष्टाचार का पर्याय बना दिया। ऐसा नहीं है कि पहले उसे कुछ साफ-सुथरी पार्टी के रूप में देखा जाता था, लेकिन कॉन्ग्रेस की छवि, विशेषकर शहरी युवाओं के बीच काफी बुरी तरह से बिगड़ गई। अगर भ्रष्टाचार आपके लिए चिंता की बात थी तो कॉन्ग्रेस एक विकल्प के रूप में भी नहीं रही।

यदि यह​ मान लिया जाए कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की तरह ही सीएए का विरोध है, तो भाजपा को सबसे बड़ा नुकसान यह होगा कि वह मुस्लिम विरोधी पार्टी का पर्याय बन जाएगी। क्या वास्तव में इससे भाजपा को कोई नुकसान होगा? क्या भाजपा को मौजूदा वक़्त में मुस्लिम समर्थक पार्टी के तौर पर देखा जाता है या यह भी माना जाता है कि उसे कथित अल्पसंख्यकों का समर्थन हासिल है? गौर करने वाली बात यह भी है कि बॉलीवुड अभिनेताओं और ‘बुद्धिजीवियों’ के समर्थन वाले ऐसे विरोध-प्रदर्शन शहर के अंग्रेजीदा युवाओं को सबसे ज्यादा पसंद आते हैं। यह वर्ग पहले से ही स्टैंड अप कॉमेडी के रूप में भाजपा विरोधी प्रोपेगेंडा और अन्य ‘रोमांचों’ से घिरा हुआ है।

इसका मतलब यह कतई नहीं है कि यदि आपकी छवि मुस्लिम विरोधी है तो आम भारतीय या हिंदू को इससे फर्क नहीं पड़ता और बीजेपी को कोई चिंता नहीं करनी चाहिए। असल में एक आम हिंदू में अपराध बोध का भाव इतना गहरा होता है कि ऐसे हालात में वह मान लेगा कि भाजपा समुदाय विशेष के साथ अन्याय कर रही है और उसे इसका दंड मिलना चाहिए।

लेकिन, हिंसक प्रदर्शन इस कदर उन्मादी हो चुका है कि उसके दृश्य हिंदुओं में उस अपराध बोध को गहराने नहीं देंगे जिसमें उसे मुस्लिम खासकर बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठिए बेबस और लाचार दिखें। अपनी हिन्दुफोबिया से वामपंथी इस भाव को और गहरा ही करेंगे। बस वक्त की बात है जब विरोध की लपटें गाय, बीफ, मंदिर वगैरह तक पहुॅंचेगी। वे खुलकर आगे आएँगे। कुछ स्वयंभू सर्वज्ञ ‘कॉमेडियन’ तो वास्तव में इस मोर्चे पर जुट भी गए हैं। इस सूरतेहाल में एक आम हिंदू के मन में अपराध बोध कोई भाव बचा भी होगा तो उसकी तिलांजलि तय है।

यकीनन, इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि मजहबी भीड़ का उन्माद और लिबरलों का हिन्दुफोबिया कितने वक्त तक चलता रहता है। जेएनयू से निकले “टुकड़े टुकड़े” नारे करोड़ों लोगों तक पहुॅंचे थे। मुझे एक दोस्त का कहा याद आ रहा है। जेएनयू के पास जाने के लिए उसने ऑटो लिया। ऑटो ड्राइवर जेएनयू को पाकिस्तान जैसा बता रहा था। इसी ने पुलवामा और बालाकोट से काफी पहले राष्ट्रवाद और पाकिस्तानी विरोधी भावनाओं को गहरा दिया था। फिर से वही सब दोहराया जा रहा है और यह इस्लाम विरोधी भावनाओं को गहरा सकता है। चिंता का सबब वे हिंसक घुसपैठिए हो सकते हैं जिन्हें ‘धर्मनिरपेक्ष’ भारत ने अरसे से पनाह दे रखी है।

2024 के शुरुआती दिनों में नरेंद्र मोदी यदि अयोध्या में बने भव्य मंदिर में पूजा करते नजर आए तो लिबरल शोर करेंगे कि लोकसभा चुनावों में जीत सुनिश्चित करने के लिए वे हिंदुत्व की भावनाओं को उभार दे रहे हैं। पर हकीकत यही है कि लिबरल खुद सांप्रदायिकता की आग लगा चुके हैं।

मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे गए इस लेख का अनुवाद रचना झा ने किया है।

15 मौतें, 705 गिरफ्तारियाँ, 57 पुलिसकर्मियों को लगी गोली: यूपी में CAA पर हिंसा का हर डिटेल

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध के नाम पर प्रदेश में हुई हिंसा को लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस ताबड़तोड़ कार्रवाई कर रही है। उपद्रवियों की पहचान कर एफआईआर दर्ज करने और उन्हें गिरफ्तार का सिलसिला जारी है।

यूपी पुलिस के अनुसार राज्य में विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा में अब तक 15 लोगों की मौत हुई है। हिंसा को लेकर अलग-अलग जिलों के थानों में 124 मुकदमे दर्ज किए गए हैं। 705 लोग गिरफ्तार किए गए हैं। करीब 4500 लोगों को हिरासत में लेने के बाद छोड़ दिया गया है।

राज्य के पुलिस महानिदेशक (कानून-व्यवस्था) प्रवीण कुमार ने शनिवार (दिसंबर 21, 2019) को मीडिया से बात करते हुए ये आँकड़ें सार्वजनिक किए। उन्होंने बताया कि सीएए को लेकर लगातार हो रहे विरोध-प्रदर्शनों में अब तक 124 एफआईआर दर्ज की गई है। 705 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। 4500 लोगों को निरोधात्मक कार्रवाई के तहत हिरासत में लिया गया।

आईजी के अनुसार पथराव, आगजनी में 263 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। इनमें 57 पुलिसकर्मियों को गोली लगी है। इस पूरी हिंसा में 15 लोगों की मौत हुई है। जाँच में पुलिस ने नॉन प्रतिबंधित बोर के 405 खोखे बरामद किए हैं।

गौरतलब है कि सड़कों पर उतरे उपद्रवियों के अलावा सोशल मीडिया पर भी इस समय यूपी पुलिस ने कड़ी निगरानी बनाई हुई है। आईजी प्रवीण कुमार ने मीडिया से बातचीत में बताया कि सोशल मीडिया के 14,101 आपत्तिजनक पोस्टों से संबंधित लोगों पर कार्रवाई की गई है। इनमें टि्वटर की 5965, फेसबुक की 7995 और यूट्यूब की 142 आपत्तिजनक पोस्टों पर कार्रवाई की गई है। इनमें 63 एफआईआर दर्ज की गई हैं, वहीं 102 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, इनके अलावा 442 पाबंद किए गए हैं।

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3 करोड़ परिवारों तक पहुँचेगी भाजपा, CAA के समर्थन में 1100 बुद्धिजीवी आगे आए

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) पर फैले भ्रम को दूर करने के लिए भाजपा ने घर-घर पहुॅंचने का फैसला किया है। इस कड़ी में पार्टी 3 करोड़ परिवारों तक पहुॅंचेगी। कानून के विरोध के नाम पर देश के कुछ हिस्सों में हुई हिंसा के बीच पार्टी ने यह फैसला किया है। इस बीच, करीब 1100 बुद्धिजीवियों ने भी इस कानून का समर्थन करते हुए इसके लिए केंद्र सरकार और संसद को बधाई दी है।

CAA पर विपक्षियों पार्टियों और विरोधियों के भ्रम के जवाब में बीजेपी ने यह फैसला किया है। इस दौरान कार्यकर्ता घर-घर जा कर कानून को लेकर जागरूकता बढ़ाएँगे।

इसकी जानकारी शनिवार को बीजेपी महासचिव और राज्यसभा सांसद भूपेंद्र यादव ने दी। उन्होंने कहा, “पार्टी ने तय किया है कि आने वाले 10 दिनों में हम एक विशेष कैंपेन लॉन्च करेंगे। इसके तहत हम 3 करोड़ परिवारों से मिलेंगे। नागरिकता संशोधन विेधेयक पर लोगों तक अपनी बात पहुंचाएँगे। इस बिल के समर्थन में हम जगह-जगह 250 से ज्यादा प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे।”

दूसरी तरफ 1,100 अकादमिक विद्वानों, बुद्धिजीवियों और रिसर्च स्कॉलर्स ने इस कानून के समर्थन में साझा बयान जारी किया है। बयान में कहा गया है कि यह एक्ट धर्म के आधार पर सताए गए लाखों शरणार्थियों की माँग को पूरा करता है, जो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से प्रताड़ित होकर भारत आए हैं। इसके अलावा यह ऐक्ट पड़ोसी देशों में प्रताड़ित होने वाले अहमदिया, हजारा, बलोच या फिर अन्य किसी समुदाय के लोगों को भारतीय नागरिकता हासिल करने से नहीं रोकता।

इतना ही नहीं, अकादमिक जगत के विद्वानों ने इस एक्ट के लिए केंद्र सरकार और संसद को बधाई भी दी। साथ ही पत्र में भारत के सिद्धांतों को बनाए रखने और धर्म के आधार पर पीड़ित समुदायों को शरण देने के लिए सरकार की सराहना की। बुद्धिजीवियों ने सरकार द्वारा लाए गए एक्ट को जरूरी बताते हुए ये भी कहा गया कि 1950 के नेहरू-लियाकत पैक्ट की असफलता के चलते यह लाया गया है। यहाँ तक कि विचारधारा से ऊपर उठकर सीपीएम, कॉन्ग्रेस जैस पार्टियों ने भी पाकिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देने की माँग की थी। इनमें ज्यादातर दलित समुदाय के लोग हैं।

पत्र में नॉर्थ ईस्ट के राज्यों की चिंताओं को भी ध्यान में रखने की बात करते हुए कहा गया, “हम यह भी मानते हैं कि पूर्वोत्तर के राज्यों की चिंताओं को भी सुना जाना चाहिए और उनका समाधान होना चाहिए। यह ऐक्ट भारत की सेक्युलरिज्म की परंपरा और संविधान के मुताबिक है। यह किसी भी धर्म और किसी भी देश के व्यक्ति को भारत की नागरिकता लेने से नहीं रोकता।”

साथ ही पत्र में आरोप लगाया गया है कि देश में जानबूझकर डर का माहौल फैलाया जा रहा है, जिसकी वजह से देश के कई हिस्सों में और खास तौर पर बंगाल में हिंसा हुई। बयान में जरिए बुद्धिजीवियों द्वारा समाज के हर तबके से अपील की गई है कि वे शांति बरतें और सांप्रदायिकता और अराजकतावाद की चपेट में न आएँ।

समर्थन में बयान जारी करने वालों में जेएनयू के आनंद रंगनाथन और प्रोफेसर श्री प्रकाश सिंह, वरिष्ठ पत्रकार कंचन गुप्ता, इंस्टिट्यूट ऑफ पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट स्टडीज के सीनियर फेलो अभिजीत अय्यर मित्रा, सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट जे साई दीपक, पटना यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ लॉ के गुरु प्रकाश, आईसीएसएसआर की सीनियर फेलो मीनाक्षी जैन, शांतिनिकेतन स्थित विश्वभारती के डॉक्टर देबाशीष भट्टाचार्य, एमिटी यूनिवर्सिटी के मानद प्रोफेसर जीतेन जैन, मणिपुर यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफेसर एपी पांडेय, डीयू के भास्कराचार्य कॉलेज की डॉक्टर गीता भट्ट समेत कई नाम शामिल हैं।

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