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BHU में विरोध जारी: मीडिया ने फैलाई झूठी खबर, प्रशासन ने नेतृत्व कर रहे छात्रों को हटने को कहा

बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) के संस्कृत विद्या धर्म-विज्ञान संकाय में फिरोज खान की नियुक्ति को लेकर आज 16वें दिन भी छात्रों का विरोध प्रदर्शन जारी है। हालाँकि, लगातार प्रशासन छात्रों पर दबाव बना रहा है कि छात्र धरना ख़त्म कर दें लेकिन छात्र अपनी माँगों पर बने हुए हैं।

छात्रों ने कल प्रशासन को अपना माँग पत्र सौंपते हुए कई सवालों का विश्वविद्यालय प्रशासन से जवाब माँगा है। जिसे लेकर देर रात SVDV के संकाय प्रमुख, अन्य विभागाध्यक्षों और VC के बीच मीटिंग चली लेकिन किसी भी नतीजे पर नहीं पहुँचा गया। इस बीच खबर ये भी है SVDV के छात्रों पर दबाव बनाने के लिए विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे शशिकांत मिश्रा, शुभम और कृष्णा को प्रशासन ने धरनास्थल से हटाने का प्रयास किया। इसके बावजूद छात्रों का प्रदर्शन जारी है।

आंदोलनरत SVDV के छात्रों का वाइसचांसलर से सवाल

  • इस नियुक्ति प्रक्रिया में विश्वविद्यालय ने यूजीसी के किस शार्ट लिस्टिंग प्रक्रिया को अपनाया है?
  • विश्वविद्यालय संविधान के अनुसार नियुक्ति प्रक्रिया सम्पन्न हुई है?
  • क्या बीएचयू एक्ट के 1904, 1096, 1915, 1955, 1966 व 1969 एक्ट को केंद्र में रखकर यह नियुक्ति की गई है?
  • संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के साहित्य विभाग में क्या संकाय के अन्य सभी विभागों के अनुरूप ही शार्ट लिस्टिंग हुई है?
  • क्या संकाय के सनातन धर्म के नियमों को ध्यान में रखकर शार्ट लिस्टिंग की गई है?

SVDV के छात्रों का माँग पत्र
SVDV के छात्रों का माँग पत्र

बीएचयू प्रशासन ने आंदोलनरत छात्रों की ओर से पूछे गए इन सवालों का दस दिन के अंदर लिखित जवाब देने का आश्‍वासन दिया है। लेकिन आज सुबह से ही मीडिया में धरना समाप्ति सहित कई फर्जी खबरें चलाई गई जिस पर छात्रों का आरोप है कि प्रशासन और मीडिया की मिलीभगत से ऐसी खबरें जानबूझकर उनका मनोबल गिराने के लिए चलाई जा रही हैं।

SVDV के छात्र विरोध करते हुए, जिसमे से टॉप लीडर गायब कर दिए गए हैं

बता दें कि पहली बार बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय (SVDV) के साहित्य विभाग में एक मुस्लिम सहायक प्रोफेसर डॉ फिरोज खान की नियुक्ति 5 नवम्बर को हुई। संकाय के विद्यार्थियों को जैसे ही इसकी जानकारी हुई, इस नियुक्ति के खिलाफ विश्वविद्यालय में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया था और तब से लगातार प्रदर्शन जारी है।

उल्लेखनीय है कि जब प्रोफेसर फिरोज खान की नियुक्ति को लेकर छात्र प्रदर्शन कर रहे थे तो देश भर में तमाम मीडिया समूहों ने इस न्यूज़ को ऐसे चलाया जैसे कि पूरे BHU में मुस्लिम टीचर की नियुक्ति का विरोध हो रहा है। जबकि ऐसा बिलकुल नहीं है। अलीगढ़ के तर्ज पर बेशक BHU के नाम में कुछ समानताएँ हो लेकिन वहाँ किसी का सिर्फ मुस्लिम होने की वजह से विरोध कभी नहीं हुआ। 

दरअसल यह विरोध एक गैर-हिन्दू का ‘धर्म-विज्ञान संकाय’ में नियुक्ति का विरोध था। बता दे कि संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के अंतर्गत दो विभाग आते हैं। पहला संस्कृत विद्या और दूसरा धर्म विज्ञान। इन दोनों में अलग-अलग तरीके की पढ़ाई होती है। संस्कृत विभाग में संस्कृत को भाषा की तरह पढ़ाया जाता है। वहीं, संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान विभाग में सनातन धर्म के रीति-रिवाजों, मंत्रों, श्लोकों, पूजा पाठ के तौर-तरीकों और पूजा पाठ के बारे में बताया जाता है।

छात्रों का कहना है कि कोई मुस्लिम व्यक्ति कैसे हिंदू धर्म के पूजा पाठ के बारे में बता सकता है, पढ़ा सकता है। छात्रों का विरोध इसी बात पर था। उनका कहना था कि संस्कृत को भाषा के तौर पर किसी भी जाति- धर्म के टीचर द्वारा पढ़ाए जाने पर उन्हें कोई ऐतराज नहीं है। छात्रों का कहना था कि अगर यह नियुक्ति विश्वविद्यालय के ही किसी अन्य संकाय में संस्कृत अध्यापक के रूप में होती तो यह विरोध नहीं होता। मगर अब छात्रों के विरोध के बाद विश्विद्यालय की तरफ से यह साफ कर दिया गया है कि फिरोज खान कर्मकांड नहीं, बल्कि संस्कृत पढ़ाएँगे। 

आपको बता दें कि अन्य मीडिया संस्थानों से परे ऑपइंडिया ने इस मामले पर शुरू से ही छात्रों के मूल पक्ष को रखा। इस पर ग्राउंड रिपोर्टिंग की गई। विरोध किस बात को लेकर है, इसको लेकर पाठकों को भ्रम में रखने के बजाय पूरे मामले की असलियत को समझाया गया।

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कॉन्ग्रेस ने टाँग अड़ाई हमने कर दिखाया, अयोध्या में बनेगा भव्य राम मंदिर: गृहमंत्री अमित शाह

झारखण्ड राज्य में अब विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। आगामी विधानसभा चुनाव से पहले अमित शाह ने आज लातेहर में की और अपनी इसी जनसभा के साथ राज्य में चुनाव प्रचार की शुरुआत कर दी है। झारखण्ड के लातेहर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए केन्द्रीय गृह-मंत्री अमित शाह ने कॉन्ग्रेस पर जमकर निशाना साधा। उन्होने कहा कि अयोध्या में आसमान छूने वाला भव्य मंदिर बनेगा। उन्होंने कहा कि प्रभु श्री राम की कृपा से फैसला आ गया है, अब उसी स्थान पर भव्य राम मंदिर निर्माण का ताला खुल गया है।

शाह यहीं नहीं रुके, उन्होंने अपने भाषण में कॉन्ग्रेस पर वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि इस पार्टी ने अपने स्वार्थ के लिए 70 साल तक अनुच्छेद 370 और 35A को लटकाए रखा। उन्होंने मोदी सरकार की सराहना करते हुए कहा कि उनकी सरकार ने कश्मीर समस्या का हल निकाला। अमित शाह ने अपनी जनसभा में झारखण्ड के आदिवासियों के लिए सरकार द्वारा चलाई गई योजनाओं का भी ज़िक्र किया। शाह बोले कि उनकी सरकार ने इन 5 सालों में आदिवासियों का गौरव बढ़ाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि केंद्र की मोदी सरकार आदिवासियों के विकास हेतु डिस्ट्रिक्ट मिनरल फंड में करीब 32 हज़ार करोड़ रूपए खर्च किए।

एक रिपोर्ट के मुताबिक अपने भाषण में उन्होंने नक्सलवाद पर भी निशाना साधा। शाह ने झारखण्ड की अपनी जनसभा में बोलते हुए कहा कि भाजपा सरकार ने आदिवासियों के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। उन्होंने कहा कि इसी कारण से कोने-कोने बिजली, सड़क, पीने का पानी और सिलेंडर पहुँच सका है।

अमित शाह ने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री रहते हुए झारखण्ड को राज्य का रूप दिया था। पीएम मोदी इसे सँवारेंगे। उन्होंने कहा कि बिरसा मुंडा की इस कर्मभूमि पर भाजपा ने 70 साल में पहली बार, 2018 में डिग्री कॉलेज की स्वीकृति दी।

पाक हिन्दू शरणार्थियों को भारत छोड़ने का जारी हुआ आदेश, गृह मंत्रालय से हुई गुज़ारिश

राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने हिन्दुओं के लिए भारत छोड़कर पाकिस्तान चले जाने का आदेश निकाला है। राज्य सरकार का यह आदेश उनके लिए है जोकि पाकिस्तान के सिंध प्रांत से धार्मिक वीसा पर भारत आए थे। दरअसल यह सभी परिवार के सदस्य हिन्दू हैं जो पाकिस्तान से विस्थापित होकर भारत में रह रहे हैं। इन सभी के परिवार जैसलमेर और उसके आसपास के सीमावर्ती इलाकों में रह रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा वक़्त में इन परिवारों के 19 सदस्य यहाँ रह रहे हैं। इनमें से तीन सदस्यों को सीबीआई और जिला प्रशासन की टीम पाकिस्तान चले जाने का नोटिस थमा चुकी है।

जयपुर के रहने वाले डॉ ओमेन्द्र रत्नु पाकिस्तानी हिन्दुओं और दलित सहोदरों (भाइयों) के हक में आवाज़ बुलंद करने के लिए जाने जाते हैं। डॉ ओमेन्द्र ने पाकिस्तान के इन विस्थापित हिन्दू परिवारों के लिए न्यायालय में गुहार भी लगाई थी मगर वहाँ कोई सफलता हाथ नहीं लगी।

उन्होंने बताया, “राजस्थान पुलिस इन लोगों को वाघा-अटारी बॉर्डर के रास्ते पाकिस्तान डिपोर्ट करना चाहती है मगर हम पूरा प्रयास कर रहे हैं कि इसे रुकवाया जाए। इसके लिए सुबह से ही लगतार हम ट्वीट भी कर रहे हैं। इस सम्बन्ध में हमारी बात अरुण कुमार और संघ के अन्य बड़े नेताओं से हुई है। होम मिनिस्टर तक बात चली गई है। हम इन्हें डिपोर्ट तो नहीं होने देंगे, हमें सतत प्रेशर बना कर रखना है।”

डॉ रत्नु ने आगे कहा कि इन्होने जिस नियम का उल्लंघन किया हो उसकी सज़ा दी जाय मगर इन्हें डिपोर्ट कर देना कोई समाधान नहीं है। लोगों के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि यह मेघवाल हैं जो अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखते हैं।

दरअसल एक कट्टर इस्लामिक देश होने के चलते पाकिस्तान में हिन्दुओं पर अत्याचार चरम पर हैं। यह सभी परिवार धार्मिक वीसा के बहाने यहाँ इसी लिए रुके थे क्योंकि पाकिस्तान में हिन्दुओं को सिर्फ यातनाएँ ही मिलती हैं। पाकिस्तान एक असहिष्णु इस्लामिक देश होने के कारण अधिकतर कानून इस्लामिक मान्यताओं की ओर झुकाव रखते हैं और कई बार हिन्दुओं के लिए घातक सिद्ध होते हैं। इन हिन्दू परिवार के सदस्यों ने भी पाकिस्तान में खुदपर होने वाले अत्याचारों से बचने के लिए भारत में शरण ली हुई थी जिस पर अब खतरा मंडरा रहा है।

विशाल डडलानी ने की पूर्व CJI रंजन गोगोई पर आपत्तिजनक टिप्पणी: ट्विटर यूजर्स ने लताड़ा

भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की सेवानिवृत्ति पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने को लेकर सोशल मीडिया यूजर्स ने म्यूजिक कंपोजर विशाल डडलानी को आड़े हाथों लिया है। विशाल डडलानी ने ट्वीट किया था, “अलविदा, पूर्व सीजेआई गोगोई और मुझे आशा है कि आप अपने पीछे जो शर्मनाक और कायराना विरासत छोड़कर जा रहे हैं, उसका अहसास आपको होगा।” फिर क्या था वही हुआ जो होना था।

विशाल का यह ट्वीट यूजरों के आक्रोश का निशाना बना। देशवासियों ने इस म्यूजिक कंपोजर डडलानी को रियलिटी शो ‘इंडियन आइडल’ से हटाने के लिए अभियान छेड़ दिया, एक यूजर ने लिखा, “प्रिय विशाल मोदी के प्रति घृणा ने आपको अंधा कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप आप हिदू विरोधी, हिंदुओं से घृणा करने वाले बन गए हैं, जिस वजह से आपको सुप्रीम कोर्ट का राम मंदिर पर फैसला असंतोषजनक लग रहा है। शर्म आनी चाहिए आपको।” इसके आलावा बहुत से ट्विटर यूजरों ने डडलानी की ऐसी-तैसी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

वहीं, एक अन्य ट्विटर यूजर ने विशाल को नीच मानसिकता वाला इंसान करार दिया।

वैसे यह पहली बार नहीं है जब विशाल डडलानी ने मोदी विरोध में अपनी घृणा को कहीं और निकाला हो। उनका ऐसे घृणास्पद बात करने का घृणित इतिहास रहा है।

सुप्रीम कोर्ट पहुँची ऑपइंडिया की रिपोर्ट: लिबरल्स को आया रोना, सोशल मीडिया पर मचाया हाय-तौबा

5 अगस्त को कश्मीर पर भारत सरकार द्वारा लिए गए महत्वपूर्ण निर्णय के बाद वामपंथी मीडिया गिरोह ने इसे लेकर भ्रान्तियाँ फैलाना शुरू कर दिया था। इन गिरोहों द्वारा फैलाए जा रहे झूठ और फेक न्यूज़ को लेकर सुप्रीम कोर्ट की एक सुनवाई में भारत सरकार ने इनका खंडन करते हुए ऑपइंडिया की एक रिपोर्ट पेश की ।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई के दौरान भारत के सॉलिसिटर जनरल ने ऑपइंडिया की मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए अपनी बात रखी। इस दौरान वे द-वायर और इंडिया स्पेंड जैसी वेबसाइट द्वारा कश्मीर पर फैलाए जा रहे झूठ पर अपनी बात रख रहे थे। इस दौरा सॉलिसिटर जनरल द्वारा ऑपइंडिया का हवाला देने की बात सुनते ही वामपंथी मीडिया वर्ग को बड़ा झटका महसूस हुआ।

मीडिया के इस वर्ग की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि इसके लोग अपने से भिन्न विचार वाले इंसान को देखना तक नहीं चाहते। इनके मुताबिक मुख्यधारा की चर्चाओं में एक आम नागरिक के लिए कोई जगह नहीं है, चर्चा का यह मंच सिर्फ और सिर्फ इलीट क्लब के लोगों का एकाधिकार है। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट में ऑपइंडिया की खबर का ज़िक्र हुआ- यह सुनकर उनके कान खड़े हो गए।

झूठ की फैक्ट्री ‘एनडीटीवी’ की एंकर निधि राजदान ने इस पर आरोप लगाते हुए कहा कि सॉलिसिटर जनरल ने फेक न्यूज़ वेबसाइट का हवाला दिया है। हालाँकि, सच्चाई यह है कि एनडीटीवी खुद कई बार झूठ फैलाते पकड़ा गया है। इस सम्बन्ध में एनडीटीवी की कथित निष्पक्षता की कई रिपोर्ट ऑपइंडिया वेबसाइट पर उपलब्ध हैं। पूरे एनडीटीवी कुनबे की नींव ही फेक न्यूज़ फ़ैलाने पर टिकी है। दरअसल, इस कुनबे के अनुसार फेक न्यूज़ की परिभाषा ही बदल जाती है। निधि राजदान के ही मुताबिक “वह जिस न्यूज़ को दबाना चाहते हैं वही फेक न्यूज़ है।” उसके लिए खबर का पूरी तरह से झूठा होना मायने नहीं रखता। फेक न्यूज़ फैलाने के बावजूद हद तो तब हो जाती है जब एनडीटीवी खुद फेक न्यूज़ पर ही एक डिबेट रखता हैं।

अकेले निधि ही नहीं, अशोक स्वेन भी उनमें से हैं जिन्हें ऑपइंडिया की खबर से मिर्ची लगी है। यह स्वेन वही हैं जो लिबरल्स की भीड़ इकठ्ठा करने के लिए जाने जाते हैं। अशोक जो खुद नफरत फैलाने के लिए जाने जाते हैं मगर उन्होंने ऑपइंडिया वेबसाइट को फेक न्यूज़ वेबसाइट बताया है।

इनके अलावा गालीबाज ट्रोल स्वाति चतुर्वेदी ने भी इस मसले पर ऑपइंडिया को घेरने की कोशिश की। उन्होंने सॉलिसिटर जनरल के कदम को ही Utter Lunacy यानी गन्दी हरकत बता दिया। स्वाति चतुर्वेदी का इतिहास खंगालें तो असल में फेक न्यूज़ फैलने की महारथी रही हैं, इन्हें गाली बकने के लिए जाना जाता रहा है। एक बार तो स्वाति ने पीएम मोदी की फोटोशॉप की हुई फोटो तक ट्वीट कर दी थी। इस फोटो में पीएम मोदी को अरबी पोषक पहने दिखाया गया था। इन्होने दावा किया था कि संसद में कार्रवाई के दौरान अमित शाह सो रहे थे, बाद में उनका यह दावा झूठा साबित हुआ। इतना ही नहीं, स्वाति चतुर्वेदी पर प्लेजियरिज्म यानी साहित्य चोरी के भी आरोप हैं। वहीं फैक्ट्स प्रकाशित करने पर स्वाति ने ऑपइंडिया को ही मानहानि का नोटिस भेज दिया था।

सुप्रीम कोर्ट में ऑपइंडिया का हवाला दिए जाने से जिन लोगों को धक्का लगा उनमें द वायर की पत्रकार रोहिणी सिंह भी हैं। रोहिणी ने भी एक रीट्वीट के ज़रिए अपनी कुंठा व्यक्त की। यह द वायर की वही रोहिणी सिंह हैं जिन्हें अमित शाह के बेटे जय शाह ने कोर्ट में चुनौती दे डाली थी। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने ऑपइंडिया की इस रिपोर्ट को उस पीत-पत्रकारिता का अंग तक नहीं माना जो सिर्फ दर्शकों को लुभाने के उद्देश्य से बनाई जाती है। बता दें कि वायर फेक न्यूज़ फ़ैलाने के मामले में कभी पीछे नहीं रहा।

ऑपइंडिया की रिपोर्ट का हवाला दिए जाने से परेशान लोगों की लिस्ट में एक नाम तहसीन पूनावाला का भी है। दरअसल पूनावाला के लिखे का खंडन ऑपइंडिया की ही रिपोर्ट में मौजूद था, पूनावाला की उदासी की एक वजह यह भी हो सकती है।

इसके बाद नाम आता है विजेता सिंह का, विजेता सिंह जिन्हे रेवेन्यु और प्रॉफिट यानी राजस्व और मुनाफे के बीच का फर्क भी मालूम नहीं है। हैरानी की बात यह है कि विजेता सिंह द हिन्दू के लिए काम करती हैं जो खुद तथ्यों को तोड़ मरोड़ और उलझा कर पेश करने के लिए जानी जाती हैं। विजेता पर खुद भी यह आरोप हैं कि उन्होंने भी कई बार भ्रामक जानकारी फैलाई है।

सुप्रीम कोर्ट में ऑपइंडिया की रिपोर्ट के आधार पर सॉलिसिटर जनरल का अपनी दलील पेश करना लिबरल्स को पसंद नहीं आया क्योंकि इस रिपोर्ट में उन्हीं की फैलाई फेक न्यूज़ का खंडन किया गया था। जबकि लिबरल्स के मुताबिक फेक न्यूज़ वह होती है जिसे वह नापसंद करते हैं और देखना नहीं चाहते। जो उनके फैलाए झूठ का भंडाफोड़ करे, यह लोग उसपर फेक न्यूज़ फ़ैलाने का आरोप लगाए बगैर रह नहीं पाते।

नल में आता है नाले का पानी, दिल्ली निवासी ने सबूतों के साथ खोली केजरीवाल के दावों की पोल

दिल्ली शहर आजकल प्रदूषण का ऐसा पर्याय बन चुका है जिसमें कि साफ़ हवा और साफ़ पानी दोनों ही मिलना आज के समय में नसीब होना हद से ज्यादा कठिन हो गया है। हाल ही में एक जाँच रिपोर्ट में सामने आया था कि राजधानी का पानी देश में सबसे गन्दा पानी है।

इस जाँच में 21 शहरों के पानी के सैम्पल लिए गए थे। इसमें राजधानी दिल्ली का भी सैंपल शामिल था जहाँ से करीब 11 सैम्पल उठाए गए थे। एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली के जिन इलाकों से सैम्पल लिए गए, उनमें लुटियंस ज़ोन से लेकर पीतमपुरा, बुराड़ी, अशोक नगर, सोनिया विहार और नन्दनगरी जैसे इलाके शामिल हैं।

साल 2015 में केजरीवाल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री की शपथ लेने के साथ ही दिल्ली में पानी को लेकर बड़े बदलाव करने की बात कही थी मगर इसका कोई असर धरातल पर दिखाई नहीं पड़ता। यह हाल तब है जब केजरीवाल खुद जल बोर्ड के अध्यक्ष हैं। दिल्ली में साफ़ पानी को लेकर हालात इस कदर बुरे हैं कि घर के नलों में भी नालों और सीवर का पानी आ जाता है। एक ट्विटर यूजर ने इस मसले पर अपनी लिखकर बताया कि कैसे दिल्ली के घरों में नल से साफ़ पानी की बजाय नालों और सीवर का गन्दा पानी आता है। @proudkannadiga नामक ट्विटर हैंडल के इस शख्स ने इस मामले में काफी तथ्य भी सामने रखे।

यह एक ऐसी समस्या है जिसे सुनकर कोई भी इंसान अचरज में पड़ जाए। इसे झेलने वाले यूज़र ने अपने खुद के अनुभव से बताया कि कैसे नाले और सीवर का यह पानी घरों में पानी पहुँचाने वाले पाइप के ज़रिए टंकी तक में भर जाता है। यह पानी एकदम गन्दा, दुर्गन्ध वाला और काला होता है। इसके लिए टंकी साफ़ करने से लेकर सारे उपाय करने पड़ते।

यह एक ऐसी समस्या है जिसे सुनकर कोई भी इंसान अचरज में पड़ जाए। इसे झेलने वाले यूज़र ने अपने खुदके अनुभव से बताया कि कैसे नाले और सीवर का यह पानी घरों में पानी पहुँचाने वाले पाइप के ज़रिए टंकी तक में भर जाता है। यह पानी एकदम गन्दा, दुर्गन्ध वाला और काला होता है। इसके लिए टंकी साफ़ करने से लेकर सारे उपाय करने पड़ते। अपने एक ट्वीट में उन्होंने लिखा कि यह ज़रूरी नहीं कि दुर्गन्ध न आए तो पानी साफ़ ही आ रहा हो। क्योंकि जिस पाइप के ज़रिये पानी घरों में आता है वह खुद सीवर के जर्जर हो चुके पाइप के साथ समनान्तर हैं। कई-कई जगहों पर तो पानी के यह पाइप खुद सीवर के जल-जमाव से होकर आते हैं।

अधिकतर पाइप जिनसे सीवर और पानी अपने-अपने गंतव्य के लिए भेजे जाते हैं, वह पुराने हैं और सही रखरखाव न होने के चलते लीक कर जाते हैं। इसके बाद ही सप्लाई वाले पाइप में भी सीवर और नाले के जल-जमाव का पानी खिंच कर घरों में चला जाता है।

दरअसल मोटर चलने के बाद सक्शन के चलते पानी पाइप में खिंचकर घरों में आता है। मगर इस दौरान अगर सप्लाई वाला पाइप सीवर के दलदल या नाले या किसी अन्य तरह के जल जमाव के करीब से होकर गुज़रता है तो वह गन्दा पानी उस जर्जर पाइपलाइन के ज़रिये खुद-ब-खुद घर के नलों तक खिंचा चला आता है।

सोशल मीडिया पर अपना अनुभव शेयर करते हुए इस यूजर ने बताया कि कई बार बुलाने के बाद जाकर किसी तरह दिल्ली जल बोर्ड से एक कर्मचारी उसके घर पहुँचा। नलों में सीवर के पानी की बात पर खोजबीन शुरू हुई तो पता चला कि पास मे ही सीवर की एक पाइपलाइन फट गई, जिसके चलते लीकेज हुआ और इस जल-जमाव से आती घरों में पानी पहुँचाने वाली पाइपलाइन में सीवर का पानी भी आ गया।

उसने बताया कि कैसे अस्थायी जुगाड़ के तौर पर उस कर्मचारी ने सीवर पाइप का एक 2 से 3 फीट का हिस्सा काटकर बदल दिया। जब कर्मचारी से पूछा गया कि इस समस्या का उपाय क्या है तो उसने बताया कि सीवर के 400 मीटर लम्बे पाइप को बदले बगैर यह समस्या नहीं सुधरेगी, मगर इलाके के सीवर को ढोने वाली 40 इंच डायमीटर वाली मुख्य पाइपलाइन को तबतक नहीं बदला जा सकता जब तक कि ऊपर से (यानी जल बोर्ड से) इस सम्बन्ध में फण्ड नहीं दिया जाता।

अपनी समस्या को लेकर विस्तार से लिखने के बाद गंदे पानी की इस समस्या से पीड़ित यूजर ने अपनी शिकायत में कॉन्ग्रेस को जमकर कोसा और कहा कि इस पार्टी ने कभी जनता की लड़ाई में साथ ही नहीं दिया। उन्होंने यह भी कहा कि टैक्स देने वाले इंसान के साथ यह एक बहुत बड़ा छलावा है।

अपने एक अन्य ट्वीट में उस यूजर ने यह भी लिखा कि वह खुद 15 साल से दिल्ली में रह रहते आ रहे हैं। 2018 में पश्चिमी दिल्ली में शिफ्ट हुए हैं मगर गंदे पानी की ऐसी समस्या उन्होंने 2015 से पहले कभी नहीं देखी थी।

…जब OpIndia की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में रखी गई और झूठ का किया गया पर्दाफाश

सुप्रीम कोर्ट, अनुच्छेद 370 के निरस्त होने और जम्मू-कश्मीर के दो संघ शासित प्रदेशों- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में विभाजन के बाद कश्मीर में तथाकथित संचार शट डाउन से संबंधित मामलों की सुनवाई कर रहा है। इसी दौरान एक दिलचस्प वाकया हुआ। सुनवाई के दौरान, IndiaSpend के झूठ का पर्दाफ़ाश करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में ऑपइंडिया की एक रिपोर्ट का हवाला दिया गया।

सुनवाई के दौरान, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने उन आरोपों के मुद्दे को उठाया कि कश्मीर के लोग राज्य में स्वास्थ्य सेवा तक नहीं पहुँच पा रहे हैं।

तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि सरकार की एक योजना (आयुष्मान भारत) है, इसमें स्वास्थ्य सुविधा का लाभ कैशलेस भी उठाया जा सकता है। इस योजना के तहत इस साल 5 अगस्त से कुल 11468 मामले दर्ज किए गए हैं।

इसके अलावा, तुषार मेहता ने एक IndiaSpend की एक रिपोर्ट की बात की, जिसमें आरोप लगाया गया था कि कश्मीर में कई लोग स्वास्थ्य सेवा तक नहीं पहुँच पा रहे। इसके बाद तुषार मेहता ने ऑपइंडिया रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें IndiaSpend द्वारा फैलाए जा रहे झूठ का पर्दाफ़ाश किया गया।

दरअसल, सॉलिसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में जिस रिपोर्ट का ज़िक्र किया, वो एक लेख था। उस लेख में अनुच्छेद-370 के निरस्त होने के बाद IndiaSpend और द वायर द्वारा फैलाए गए झूठे दावों का कच्चा-चिट्ठा था। लेख में, IndiaSpend ने आँकड़ों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया और यह दावा किया कि अनुच्छेद-370 के निरस्त होने के बाद कश्मीर में स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएँ लगातार बढ़ रही हैं।

“रोगी अनिच्छुक, स्वास्थ्य सेवा तक पहुँचने में असमर्थ” इस सब-हेडिंग के साथ, द वायर ने फ़ेक न्यूज़ IndiaSpend का यह कहते हुए उल्लेख किया कि जम्मू-कश्मीर में मरीज 5 अगस्त 2019 से स्वास्थ्य सेवा तक नहीं पहुँच पाए हैं, जिससे यह धारणा बनाई जा सके कि कश्मीर के लोग मानसिक समस्याओं का सामना कर रहे हों। ताज्जुब इस बात पर होता है कि वे इसी सब-हेडिंग में यह भी बताते हैं, “यहाँ तक कि एक सामान्य स्थिति में, कुछ लोग विशेष रूप से मानसिक स्वास्थ्य सेवा तक पहुँचते हैं।” लिहाज़ा यह बड़ा अटपटा सा लगता है कि इस मामले में, द वायर और IndiaSpend ने इसे अनुच्छेद-370 के उन्मूलन से कैसे जोड़ दिया, यह अभी तक समझ से परे है।

लेख में कहा गया है कि अगस्त में अनुच्छेद-370 के निरस्त होने के बाद, जुलाई की तुलना में 44.5% कम रोगियों ने IMHANS का दौरा किया। हालाँकि, वे यह भी कहते हैं कि यह डेटा अनिर्णायक है क्योंकि रोगियों की संख्या मई में भी कम थी। वहीं, दिलचस्प बात यह है कि कश्मीर में रिपोर्ट किए गए सबसे अधिक मानसिक स्वास्थ्य मुद्दों को अनुच्छेद-370 को निरस्त करने के एक महीने पहले जुलाई में था। सबसे कम मई में था।

पूरे लेख ने अनिवार्य रूप से पाठकों को यह बताने के लिए भ्रमित करने की कोशिश की गई थी कि सबसे पहले, मरीज स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुँचने में असमर्थ हैं और दूसरी बात यह है कि इसके कारण, मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे अनुच्छेद-370 के निरस्त होने के बाद बढ़ रहे हैं। ऑपइंडिया ने अपने लेख के माध्यम से इन दोनों ही दावों की पोल खोल कर रख दी थी।

IndiaSpend फ़र्ज़ी ख़बरे प्रचारित-प्रसारित करने का आदी है। फ़िलहाल, अब यह अपनी फर्ज़ी ख़बरों की दुकान बंद कर चुका है। अपने बड़े एजेंडे और संदिग्ध ट्रैक रिकॉर्ड के साथ, IndiaSpend, Factchecker.in ने चुनिंदा रिपोर्टिंग द्वारा हिंदूफोबिक प्रचार को आगे बढ़ाने का प्रयास किया था। इसके लिए वे ऐसे अपराध चुनते थे, जिसमें अभियुक्त कथित रूप से हिन्दू थे और इसे ‘घृणित अपराध’ के रूप में संदर्भित किया जाता था। जबकि उन अपराधों को जानबूझकर अनदेखा किया गया था, जिसमें अपराधी समुदाय विशेष के होते थे और पीड़ित पक्ष के तौर पर हिन्दू होते थे।

Factchecker.in की ‘हेट क्राइम वॉच’ पहल, देश भर में घृणित अपराधों के एक कथित ट्रैकिंग टूल के रूप में शुरू हुई थी। इसके बाद जल्द ही इसने न केवल हिन्दूफोबिक सामग्री को अपनी रिपोर्टिंग को सीमित करके, बल्कि मजहब विशेष द्वारा किए गए अपराधों को भी पाक-साफ़ करने और हिन्दुओं के ख़िलाफ़ अपने असली रंग को उजागर करना शुरू कर दिया। एक बार तो IndiaSpend के ‘फैक्टचैकर’ पत्रकार को बेगूसराय की एक नाबालिग दलित पीड़िता से छेड़छाड़ करने की कोशिश करते हुए पकड़ा गया था।

फैक्टचैकर ने भारत के कुछ हिस्सों में कश्मीरियों पर कथित हमलों के साथ आतंकवादी हमले की तुलना पुलवामा आतंकी हमले से की। उसने दावा किया कि उन्होंने ऐसे हमलों को ‘घृणित अपराध’ के रूप में शामिल नहीं किया है क्योंकि यह धार्मिक पहचान के मानदंडों से प्रेरित नहीं है, क्योंकि इस तरह के हमले धार्मिक पहचान से नहीं बल्कि पीड़ितों की क्षेत्रीय पहचान से प्रेरित दिखाई देते हैं।

नोट: कार्यवाही की पूरी जानकारी का इंतज़ार है और नई जानकारी सामने आने पर यह ख़बर अपडेट की जाएगी।

हरेन पांड्या मर्डर: SC ने ख़ारिज की 10 कट्टरपंथी इस्लामी की पुनर्विचार याचिका, सभी ने ली थी ISI से ट्रेनिंग

गुजरात के पूर्व गृह मंत्री हरेन पंड्या की मार्च 2003 में उनकी हत्या के लिए 10 लोगों को दोषी ठहराए जाने के ख़िलाफ़ पुनर्विचार याचिकाओं को ख़ारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आज (21 नवंबर) अपना फ़ैसला सुनाया।

जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस विनीत सरन की पीठ ने पाँच जुलाई के अपने फ़ैसले के ख़िलाफ़ 12 में से 10 दोषियों की पुनर्विचार याचिकाएँ निरस्त कर दी। पीठ ने अपने फ़ैसले में कहा, “हमने पुनर्विचार याचिकाओं को देखा और हम मानते हैं कि जिस आदेश की समीक्षा की अपील की गई थी, उसमें किसी तरह की ग़लती नहीं है जिसके लिए पुनर्विचार किया जाए। इसलिए पुनर्विचार याचिका ख़ारिज की जाती है।”

दरअसल, वर्ष 2003 के हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को पलटते हुए आरोपितों को उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई गई थी। गुजरात हाईकोर्ट ने साल 2003 के हरेन पांड्या हत्याकांड के सभी 12 आरोपितों को हत्या के आरोप से बरी कर दिया था। गुजरात में नरेंद्र मोदी की सरकार के समय तत्कालीन गृह मंत्री हरेन पांड्या की 26 मार्च 2003 को अहमदाबाद के लॉ गार्डन इलाके में उस समय गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, जब वे सुबह की सैर कर रहे थे। इस हत्या का आरोप 12 लोगों पर था।

हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई में कहा था कि सीबीआई की जाँच की दिशा स्पष्ट नहीं है। इसके अलावा यह भी कहा था कि जाँच के दौरान कुछ तथ्यों की अनदेखी की गई और बहुत कुछ छूट गया। हाईकोर्ट में मामला जाने से पहले सेशन कोर्ट ने आरोपितों को हत्या करने और आपराधिक साज़िश रचने का दोषी माना था।

ग़ौरतलब है कि हरेन पांड्या की हत्या उस वक्त हुई थी गुजरात में नरेंद्र मोदी की सरकार थी। उस समय आतंकवाद निरोधक क़ानून के तहत विशेष पोटा कोर्ट ने सभी आरोपितों को दोषी ठहराते हुए उम्र क़ैद की सजा सुनाई थी। आरोपितों ने इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। 

वर्ष 2011 में 29 अगस्त को गुजरात हाईकोर्ट ने सत्र अदालत के फ़ैसले को पलट दिया और सभी आरोपितों को बरी कर दिया। हाईकोर्ट के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सीबीआई ने 2012 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था।

जानकारी के अनुसार, इस मर्डर केस में दोषी करार दिए गए 12 आरोपितों में से 10 ने पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी। इन 12 दोषियों में मोहम्मद रउफ़, कयूम शेख, परवेज़ ख़ान पठान उर्फ़ अतहर परवेज़, मोहम्मद परवेज़ अब्दुल, मोहम्मद फ़ारूक, शाहनवाज़ गाँधी, मोहम्मद सैफ़ुद्दीन, मोहम्मद यूनुस सरेसवाला, कलीम अहमदा, रेहान पुथवाला, अनीज़ माचिस वाला, मोहम्मद रियाज़ सरेसवाला शामिल हैं। CBI ने आरोप लगाया था कि ये सारे दोषी पाकिस्तान के ISI द्वारा ट्रेनिंग लेकर आए थे।

Pak में दूध, अंडे, मुर्गी, भैंस-बकरी से आएगा इंकलाब: आर्थिक परेशानियों का इमरान खान ने दिए 5 समाधान

पाकिस्तान को ‘नया पाकिस्तान’ बनाने का सपना दिखाकर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज होने वाले इमरान खान इन दिनों अपने ही बयानों के कारण पूरे विश्व में हँसी का पात्र बने हुए हैं। उनके अपने मुल्क में ही लोग उनकी आभासी नीतियों का खुलकर विरोध कर रहे हैं।

इसी कड़ी में आज वहाँ की जानी-मानी पत्रकार नायला इनायत ने भी इमरान खान के लिए कुछ ट्वीट किया है। अपने ट्वीट में उन्होंने लिखा है कि भैंस से लेकर बकरी तक इमरान खान के पास पाकिस्तान की हर आर्थिक परेशानी का बहुत साधारण सा हल है। नायला का ये ट्वीट इमरान खान के उस बयान को इंगित करते हुए आया है, जिसमें उन्होंने कहा था- “अगर हम एक गाय से 12 लीटर दूध निकाल पाए तो हम पाकिस्तान में इंकलाब ला सकते हैं।”

इस ट्वीट के साथ उन्होंने ‘द प्रिंट’ पर प्रकाशित अपनी रिपोर्ट भी ट्वीट की हैं। जिसमें उन्होंने इमरान खान द्वारा दिए 5 समाधानों यानी दूध, अंडा, मुर्गा, भैंस-बकरी, नीलामी और गैस-तेल की खोज को नए पाकिस्तान के लिए 5 स्तंभ बताया है। और इनसे जुड़े इमरान खान के बयानों का जिक्र करते हुए उनकी ख़िल्ली उड़ाई हैं। इनमें से गाय के दूध, और अंडे पर दिए बयान सबसे हास्यास्पद हैं। जिनपर नायला ने तंज कसा है।

नायला के मुताबिक इमरान खान ने उनके मुल्क की आवाम से कहा था, “एक गाय औसतन 6 लीटर दूध देती हैं और हम अगर इसे दुगना कर दें। यानी हम अगर एक गाय से 12 लीटर निकालना शुरू कर दें तो पाकिस्तान की आर्थिक क्रांति आ जाएगी।”

इसके बाद अंडों से नए पाकिस्तान का निर्मित करने का आइडिया भी इमरान खान पाकिस्तान की आवाम को दे चुके हैं। जिसमें उन्होंने सुझाया था कि ग्रामीण महिलाओं को अंडे और देशी मुर्गियाँ मुहैया कराई जाएँ और फिर उन्हें प्रोटीन का इंजेक्शन लगाकर वे उनसे प्राप्त उत्पाद (अंडे) को बाजार में बेचकर पैसे कमाएँ।

गौरतलब है कि इसके अलावा नायला ने अपने आर्टिकल में इमरान खान द्वारा नवाज शरीफ की 8 गायों की नीलामी का भी जिक्र किया है, जिसे उन्होंने 23 लाख में बेच दिया था और ही 61 कारों का भी। उन्होंने बताया है कि कैसे इमरान खान उन लोगों को बताते हैं कि नए पाकिस्तान की पहचान इनोवेटिव आइडिया से होगा और फिर भैंस-बकरी पर अपने बयान भी देते हैं। वो कहते हैं कि पाकिस्तान की हर परेशानी का हल हो जाएगा अगर पाकिस्तान हर तेल और गैस की खोज करे । जिसके लिए वे उम्मीद भी देते हैं कि पाकिस्तान अरेबियन समुद्र में सभी गैसों को खोजेंगा, जिससे आने वाले 50 सालों के लिए मुल्क की हर परेशानी का समाधान हो जाएगा।

सनातन हिन्दू धर्म को ईसाई या इस्लामी चश्मे से देखना अनुचित: नितिन श्रीधर की ऑपइंडिया से बात

लेखक, indiafacts.org और अद्वैत एकेडमी के सम्पादक व धर्मशास्त्रों के जाने-माने टिप्पणीकार नितिन श्रीधर ने ऑपइंडिया से हाल ही में बात की। इस बातचीत में उन्होंने धर्म से जुड़े कई पक्षों पर बात की, जिसमें राजनीति, लोकतंत्र के बारे में दृष्टिकोण, हाल ही में आए सबरीमाला और राम मंदिर के फैसले, धर्म की व्यवहारिक परिभाषा आदि शामिल थे। पेश है इस साक्षात्कार के मुख्य हिस्सों का सारांश:

धारयति इति धर्मः

धर्म की परिभाषा पर नितिन का कहना है कि इसकी न ही कोई एक लकीर के फकीर वाली परिभाषा है, और न ही संस्कृत के अलावा किसी और भाषा में इसका सटीक अनुवाद हो सकता है या समानार्थी शब्द मिल सकता है। उनके अनुसार ‘धारयति इति धर्मः’ यानि ‘वह, जो पूरी दुनिया को ही धारण करता है’ यही धर्म की परिभाषा है। साथ ही कुछ हिन्दू धर्मशास्त्रों में यह कहा गया है कि धर्म वह है जो सबको ‘अभ्युदय’ (आध्यात्मिक वृद्धि) और ‘निःश्रेयस’ (भौतिक सुख) देता है।

इतने गूढ़ दर्शन से इसे आम जीवन के यथार्थ में लाएँ तो मोटा-मोटी समझ सकते हैं (हालाँकि यह कोई अंतिम, अकाट्य परिभाषा नहीं है) कि धर्म वह है जो अव्यवस्था कम करे, प्राकृतिक/नैसर्गिक व्यवस्था को स्थिरता दे और सबके लिए लाभकारी हो। और जो अव्यवस्था फैलाए, कृत्रिमता बढ़ाए और नुकसानदेह हो, उसे आम तौर पर अधर्म मान सकते हैं।

नितिन ने धर्म को कर्म ले सिद्धांत पर आधारित भी बताया। साथ ही एक महत्वपूर्ण बात पर ज़ोर दिया कि ऐसा नहीं धर्म के सिद्धांत में सभी कुछ जबरिया सबके लिए करना ज़रूरी है (जो कि अब्राहमी पंथों, विशेषतः ईसाईयत और इस्लाम, से काफ़ी अलग है)। ऐसी चीज़ों में वह यज्ञ-हवन आदि का उदाहरण देते हैं- इन्हें करने के अलग-अलग फायदे अलग-अलग शास्त्रों में हैं, लेकिन किसी के गले में हाथ डालकर इन्हें करना ज़रूरी भी नहीं कहा गया है। जिसे इन्हें करने से वर्णित लाभ चाहिए, वह कर सकता है, जिसे नहीं चाहिए, वह न करे।

हिन्दू धर्म संदर्भ के हिसाब से कितना उदार और लचीला है, इसके उदाहरण में नितिन बताते हैं कि एक तरफ़ “सत्यं वद्, प्रियं वद्” हमारे यहाँ सिखाया जाता है, वहीं दूसरी ओर इस एक छड़ी से सबको नहीं हाँका जा सकता। इसके अपवाद का उदाहरण वे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों पर काम कर रहे लोगों का देते हैं, जिनके लिए झूठ के बीच जीना ही उनका ‘विशेष धर्म’ होगा, और वे अगर गला फाड़ कर हर चीज़ का सच हर जगह गाने लगेंगे तो यह अधर्म होगा। (किसी को यह चीज़ नए-नए जनेऊधारी ब्राह्मण बने राहुल गाँधी और कोट के ऊपर जनेऊ पहन रही कॉन्ग्रेस को भी बतानी चाहिए थी।)

व्यक्तिवादी हिंदुत्व/हिन्दू धर्म भी है- लेकिन…

नितिन का कहना है कि आज के समय में हिंदुत्व/हिन्दू धर्म और धार्मिक समाज के बारे में कही जाने वाली यह बात कि हिन्दू व्यक्तिवादी नहीं हैं, परिवार-समाज आदि का महत्वपूर्ण स्थान होता है धर्म के निर्धारण में- यह सब आधा सच हैं। हिन्दू धर्म में व्यक्ति का, इंडिविजुअल का बहुत महत्व है- अंतर यह है कि आधुनिक व्यक्तिवाद जहाँ हर समय केवल हक माँगने व खुद को बेचारा और पीड़ित दिखाने पर आधारित है, वहीं धार्मिक रूपरेखा में व्यक्ति, इंडिविजुअल अपने कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वों के निर्वहन को प्राथमिक मानता है।

सामान्य, सनातन, स्व-धर्म

‘सनातन धर्म’ के बारे में नितिन का कहना है कि यह धर्म का पूरे ब्रह्माण्ड को ही ‘धारण’ करने वाला, व्यवस्थित करने वाला पहलू है। व्यवहारिक रूप से देखा जाए तो आम इंसान के लिए, आम हिन्दू के लिए जिस ‘धर्म’ की बात होती है, वह भी सनातन धर्म का एक पक्ष है, उससे अलग नहीं है- लेकिन पूरी तरह से, केवल उसी को ही सनातन धर्म भी नहीं कह सकते।

व्यवाहरिक धर्म के दो हिस्से नितिन बताते हैं- सामान्य धर्म और विशेष धर्म। वे बताते हैं कि सामान्य धर्म (जोकि नितिन की इसी विषय पर लिखी और हाल ही में प्रकाशित किताब का नाम भी है) में वे चीज़ें आतीं हैं जिनकी अपेक्षा हर इंसान से की जा सकती है। नितिन की किताब के कवर पर धर्म को एक बैल के रूप में दिखाया गया है जिसके चार पैर सामान्य धर्म के चार सबसे महत्वपूर्ण अंग हैं- सत्य, दया, तपस् (सामान्य भाषा में हम इसे अपने कार्य में परिश्रम समझ सकते हैं) और शौच (योग्यता, न कि साफ़-सफ़ाई; स्वच्छता शौच-अशौच का एक अंग है, पूरी परिभाषा नहीं)। सामान्य धर्म के बारे में नितिन एक दिलचस्प बात यह भी बताते हैं कि यदि वे इच्छुक हों तो इसका पालन मुस्लिम और ईसाई भी कर सकते हैं बिना अपनी आस्था के खिलाफ गए।

विशेष धर्म, नितिन श्रीधर के मुताबिक, व्यक्ति की पहचान, कार्य और स्थिति (देश, समय आदि) पर निर्भर करता है। विशेष धर्म के एक उदाहरण का उल्लेख ऊपर हमने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े लोगों के संदर्भ में किया है। एक दूसरे उदाहरण में मान लीजिए एक कसाई है तो वैसे तो उसका धर्म अपने सामने रखे पशु की हत्या करना ही होगा। लेकिन अगर वह जानवर बीमार है, या आस-पास स्वाइन फ्लू फैला है और पशु की डॉक्टरी जाँच नहीं हुई है, तो उसके लिए धार्मिक कार्य पशु की हत्या न करना होगा।

विशेष धर्म के निर्धारण में व्यक्ति के वर्ण (जिसका संबंध स्वभाव से अधिक होता है, न कि केवल जाति या परिवार से निर्धारित) और आश्रम (जीवन की किस स्थिति या किस पड़ाव पर आप हैं- विद्यार्थी, युवा गृहस्थ, वृद्ध गृहस्थ या फिर जीवन के अंतिम वर्षों में) की अहम भूमिका होती है।

हर व्यक्ति से अपेक्षित सामान्य धर्म और हर व्यक्ति के लिए विशिष्ट और समय के साथ परिवर्तनशील विशेष धर्म को मिलाकर बनता है स्वधर्म, जिसके बारे में श्री कृष्ण गीता में अर्जुन से कहते हैं, “स्वधर्मे निधनम् श्रेयः परधर्मो भयावहः”।

धर्म बनाम पंथ, “धर्म एक जीवनशैली है”

नितिन के अनुसार धर्म का अनुवाद पंथ या रिलीजियन के रूप में करना और फिर इससे निकली ‘धर्मनिर्पेक्षता’ (जिसका सीधा मतलब अ-धर्म होगा) को नीति बना लेना एक ऐतिहासिक भूल थी, जिसके मूल में हिन्दू धर्म को ‘(महज़) एक जीवनशैली’ तक सीमित कर देना और अब्राहमी पंथों के रीति-रिवाजों को ही आस्था, रिलीजियन या पंथ का एकमात्र पैमाना बना देना है। धर्म एक सीमित संदर्भ में भारतोय उद्गम वाली/हिन्दू उपासना पद्धतियों के लिए बेशक प्रयुक्त हो सकता है। वहीं ‘जीवनशैली’ के तर्क को वह इस आधार पर ख़ारिज करते हैं कि हिन्दुओं में ही नहीं, मुस्लिमों और ईसाईयों में भी खुद की एक ‘जीवनशैली’ होती है- इसलिए ‘जीवनशैली’ का तमगा खुद को देकर हिन्दुओं को आत्ममुग्ध नहीं हो जाना चाहिए।

नितिन आगे यह भी जोड़ते हैं कि जब एक ओर अब्राहमी पंथ इस्लाम और ईसाईयत धड़ल्ले से मतांतरण कर रहे हैं तो ऐसी परिस्थति में ‘हम तो कोई आस्था या पंथ नहीं, रिलीजियन नहीं, केवल एक जीवन शैली हैं’ का चोगा ओढ़ कर बैठ जाना एक सभ्यता के तौर पर हमें निराश्रय और कमज़ोर छोड़ देता है। राजनीतिक रूप से, अल्पकालिक और व्यवहारिक तौर पर, हिन्दूइज़्म/हिंदुत्व/हिन्दू धर्म को एक रिलीजियन के तौर पर मान्यता दिए जाने की बेहद ज़रूरत है, भले ही दीर्घकालिक लक्ष्य इसे महज़ एक रिलीजियन से बहुत अधिक वृहद तौर पर स्थापित करने का हो।

धर्म किसी ‘विंग’ के पास गिरवी नहीं है

इस सवाल के जवाब में कि क्या धर्म केवल ‘राइट विंग’ के काम की चीज़ है, या इसमें ‘लेफ्ट विंग’ के पक्ष भी होते हैं, नितिन का कहना था कि धर्म में कोई ‘विंग’ होता ही नहीं है। धर्म अंततः व्यक्तिवादी सिद्धांत है, हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग रूप से व्याख्या होती है, न कि समूह या गुट के लिए। लेकिन समय-समय पर, परिस्थितियों के अनुरूप कभी लेफ़्ट तो कभी राइट विंग के मुद्दे एक धार्मिक शासक का धर्म बन जाते हैं- यानि अगर कोई भूखा है तो उसकी भूख मिटाना (जिसे गरीबों की हिमायत के रूप में लेफ्टविंग नीति के पालन के तौर पर देखा जा सकता है) शासक का धर्म हो सकता है (और अगर किसी समय देश पर हमला हो रहा हो तो उसके ख़िलाफ़ अपनी ताकत का भरपूर इस्तेमाल शासक का धर्म हो सकता है, जिसे ‘राइट विंग’ नीति के रूप में देखा जाएगा)।

नितिन यह भी साफ करते हैं कि हालाँकि धर्म लेफ्ट विंग (या राइट विंग भी) के उठाए मुद्दों से सहमत हो सकता है, उसकी चिंताओं से इत्तेफ़ाक़ रख सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनके सुझाए समाजवादी या कम्युनिस्ट उपायों को भी धर्म की स्वीकृति मिल ही जाए। (मसलन धर्म यह तो स्वीकार कर सकता है कि गरीबों को आर्थिक सहायता दिए जाने की ज़रूरत है, लेकिन इसके लिए वह कम्युनिस्टों के अमीरों से जबरन पैसा छीनने या समाजवादियों के उच्च टैक्स दर के उपाय से भी सहमत हो जाए, यह ज़रूरी नहीं)।

बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक के सवाल पर उन्होंने कहा कि धार्मिक दृष्टि से कोई एक व्यक्ति हर परिस्थिति में बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक होगा ही नहीं, अतः इस सवाल को ही धार्मिक तौर पर परिभषित व्यक्ति और परिस्थिति के संदर्भ में किया जाएगा। साथ ही, जब धर्म के लिए बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की ही कोई जड़ परिभाषा नहीं है, कोई एक फॉर्मूला नहीं है, तो इसमें किसी भी एक वर्ग के प्रति दुर्भावना या पूर्वाग्रह का सवाल ही नहीं है।

इस धार्मिक सिद्धांत की वैधता और स्वीकार्यता का उदाहरण वे भारत में पारसी, यहूदी आदि दुनिया के हर हिस्से में प्रताड़ित समुदायों की आवक का देते हैं। इन सबने शरण भारत में इसी लिए ली क्योंकि इन्हें पता था कि यहाँ के शासकों का धर्म और राजधर्म उन समुदायों के लोगों की प्रताड़ना और हिंसा से रक्षा करेगा।

मंदिर सामुदायिक केंद्र नहीं, देवता का घर है

नितिन का मानना है कि अयोध्या और सबरीमाला, दोनों ही जगह विवाद की जड़ में हिन्दू धर्म को ईसाई-मुस्लिम पंथ के बराबर में खड़ा कर देना, और मंदिर को मस्जिद-चर्च जैसा ही मान लेना है। जबकि ऐसा है नहीं। मंदिर बनाने के पीछे यह आस्था होती है कि मंदिर में देवता (जोकि ‘टेक्निकली’ ईश्वर नहीं होते) को सशरीर रखा जा सकता है- मूर्ति, प्रतिमा या विग्रह को उन्हीं का, उनके ‘शरीर’ का एक अंश माना जाता है, और इसमें देवता की स्थापना की बाकायदा एक विधि होती है, जिसे ‘प्राण प्रतिष्ठा’ कहते हैं। मंदिर का दूसरा नाम ही ‘देवालय’ है- देवता का घर।

मंदिर के उलट चर्च या मस्जिद को स्पष्ट रूप से उस पंथ के लोगों के आस्था से जुड़े कार्यों के लिए इकठ्ठा होने की जगह माना गया है। इस अंतर के मूल में इन दोनों मज़हबों में ईश्वर की जो परिकल्पना है, उसका हमारे यहाँ के देवताओं से अलग होना है। एक ईश्वर की सत्ता को सर्वोपरि हमारे यहाँ भी माना गया है, लेकिन हमारे यहाँ देवता भी हैं, जो ईश्वर का विशिष्ट अंश या रूप हैं- और मंदिर उन्हीं देवताओं की उपासना उस देवता विशेष के या उनसे जुड़े विशेष संदर्भों में करने की परम्परा है।

अय्यप्पा के मामले में वह विशेष संदर्भ उनका सबरीमाला स्थित प्रतिमा विशेष में नैष्ठिक ब्रह्मचारी के रूप में स्थापित होना है, वहीं श्री राम जन्मभूमि के मामले में देवता का जन्म उसी स्थान पर हुआ माना गया था- और बाबर के उस स्थान विशेष पर मस्जिद बनाने का भी कारण उस स्थान के, उससे जुड़े देवता की महत्ता को नकारने का प्रयास ही था।

सबरीमाला के बारे में विवाद के चर्चा में आने के समय से नितिन श्रीधर लम्बे समय से कहते आ रहे हैं कि यह पीरियड्स का नहीं, रजस् नामक आध्यात्मिक गुण का मुद्दा है और इसे उसी परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की ज़रूरत है। इस बातचीत में भी उन्होंने इसे दोहराया। उन्होंने बताया कि पीरियड्स रजस्वला उम्र की स्त्रियों में रजस् गुण की उपस्थिति का नतीजा हैं, अपने आप में उन्हें मंदिर में प्रवेश से प्रतिबंधित किए जाने का कारण नहीं। इसके अतिरिक्त उन्होंने इस संदर्भ में एक और महत्वपूर्ण बात बताई। कोई श्रद्धालु स्त्री जब अय्यप्पा स्वामी के पिछले दर्शन बहुत छोटी उम्र में (10 साल से कम) की होती है, और अपना समूचा यौवन उनसे ‘विरह’ में बिताने के बाद 50 से ऊपर की उम्र में यानि 40 साल बाद करती है तो उसे अलग ही आनंद की अनुभूति होती है। ऐसा न केवल माना जाता है बल्कि कई सारे मामलों में देखा भी गया है। सबरीमाला का मुद्दा असल में था अयप्पा स्वामी के नैष्ठिक ब्रह्मचारी होने और इस कारण रजस् गुण से ही दूर रहने का, और इसे मीडिया ने पीरियड्स का मुद्दा बनाकर हिन्दुओं और हिन्दू धर्म पर जम का कीचड़ उछाला। इसी दुष्प्रचार को तोड़ने के लिए पीरियड्स पर हिन्दू मत को विस्तार से समझते हुए नितिन ने “The Sabarimala Confusion – Menstruation Across Cultures: A Historical Perspective” नामक एक किताब भी लिखी है।

धर्म में लोकतंत्र को मान्यता है, लेकिन ‘होली काऊ’ नहीं

समकालीन राजनीति और लोकतंत्र के ऊपर धार्मिक दृष्टिकोण के बारे में नितिन का कहना है कि धर्मशास्त्रों हालाँकि लोकतंत्र की खूबियों का बखान सम्मान अवश्य किया है, लेकिन उसकी कमज़ोरियाँ पुरातन हिन्दू समाज को अधिक गंभीर लगीं। इसको समझाने के लिए वे दुनिया पहले गणतंत्रों में एक माने जाने वाले महाजनपदों का उदाहरण देते हैं। उनके मुताबिक इनमें एक ओर अगर यह खूबी थी कि लोकतंत्र और स्थानीय जवाबदेही के चलते उनमें स्थानीय समस्याओं का प्रभावी निवारण होता था, तो यह बड़ी खामी भी रही कि महाजनपद कभी व्यक्तिगत तौर पर या महाजनपद-समूह बनकर भी एक सशक्त राजनीतिक शक्ति बनकर नहीं उभर पाए इसी लोकतंत्र के चलते- जिसमें मतभेद सुलझाने और आम सहमति बनाने में ही सारी ऊर्जा खप जाती थी। यही नहीं, उनके अनुसार धर्मशास्त्रों में इस बात की भी आलोचना की गई है कि एक महाजनपद के खुद के अंदर भी इसी लोकतंत्र और ज़बरदस्ती की असहमति के चलते केंद्रीय सत्ता कमज़ोर रही।

उन्होंने कहा कि वे वर्तमान लोकतंत्र का सम्मान अवश्य करते हैं, लेकिन निजी तौर पर उनके लिए यह कोई दिव्य, अंतिम सत्य, आलोचना के परे व्यवस्था नहीं है- कल को बहुत सम्भव है धार्मिक रूपरेखा में लोकतंत्र से अधिक प्रभावी, जनकल्याणकारी, सबको ‘धारण’ कर सकने वाली व्यवस्था विकसित हो जाए।

वे उदाहरण मैसूर राज्य का देते हैं, जहाँ का राजपरिवार अंग्रेजों के समय में भी और बाद में भारतीय राष्ट्र-राज्य में विलय के चलते राजनीतिक ताकत खो देने के बाद भी जनकल्याण और राजधर्म के यथासम्भव पालन के लिए सक्रिय रहा। इसी कारण आज भी मैसूर शहर में राजपरिवार का सम्मान लोग अपने आप, बिना किसी क़ानूनी ज़बरदस्ती के करते हैं।

धार्मिक मूल्यों पर चलने वाली राजनीति को वह ‘क्षात्रत्व’ के रूप में परिभाषित करते हैं, जिसके अंतर्गत न केवल ‘हर स्थिति में अहिंसा’ को नकारा जाता है, बल्कि एक राष्ट्र राज्य अपना प्रभाव-क्षेत्र लगातार बढ़ाते रहने के लिए इच्छुक भी होता है। इस प्रभाव क्षेत्र में वे आर्थिक, सांस्कृतिक, कूटनीतिक जैसे ‘सॉफ़्ट पावर’ क्षेत्र ही नहीं बल्कि सैन्य, रणनीतिक जैसे ‘हार्ड पावर’ क्षेत्रों को भी रखते हैं।

व्यक्तिगत रूप से हिन्दू क्या कर सकते हैं?

इसके जवाब में नितिन ’3-P मॉडल’ समझाते हैं- यानि Preserve(संरक्षण), Protect (सुरक्षा), Promote(प्रचार/प्रोत्साहन)। इसके अंतर्गत उनका मानना है कि हिन्दू सभ्यता की सुरक्षा तभी की जा सकती है जब हिन्दू अपनी कलाओं, आध्यात्म, धर्म, परम्पराओं का एक ही साथ संरक्षण (अभ्यास और अनुपालन द्वारा), सुरक्षा (उनसे जो इन्हें खत्म कर देना चाहते हैं, और उनसे भी जो इनकी जड़ें हिन्दू सभ्यता से काट देना चाहते हैं- जैसे कभी योग तो कभी भरतनाट्यम तो कभी आयुर्वेद के साथ हम देखते रहते हैं, और जो BHU में अभी चल रहा है।), और प्रचार/प्रोत्साहन (जो इनके बारे में नहीं जानते, उन तक इन सभी को ले जाना, बशर्ते वे इसकी हिन्दू जड़ों को इसमें से काटे नहीं।) इस विषय पर उनकी एक पुस्तक, सामान्य धर्म, भी उपलब्ध है।