नोएडा में वेतन वृद्धि समेत कई माँगों को लेकर अस्थायी मजदूरों का प्रदर्शन जारी है। नोएडा के फेज-2 में स्थित मदरसन कंपनी के अस्थायी मजदूरों ने मनमानी का आरोप लगाते हुए दो-तीन दिन पहले प्रदर्शन शुरू किया था। इसके बाद योगी सरकार ने उनकी कई माँगें मान ली। जिला प्रशासन ने कई आश्वासन दिए।
औद्योगिक शांति बनाए रखने के हेतु नोएडा प्राधिकरण में महत्वपूर्ण बैठक संपन्न हुई,जिसमें प्रमुख सचिव(श्रम)एवं श्रम आयुक्त,उ0प्र0 ने वर्चुअल रूप से प्रतिभाग करते हुए श्रमिकों के हितों की सुरक्षा, ओवरटाइम का दोगुनाभुगतान,बोनस,साप्ताहिकअवकाश एवंकार्यस्थल सुरक्षा सहित विषयों पर चर्चाकी pic.twitter.com/Ui7XaDGHai
— DM NOIDA Gautam Buddha Nagar (@dmgbnagar) April 12, 2026
इसके बावजूद सोमवार (13 अप्रैल 2026) को प्रदर्शन हिंसक हो गया। प्रदर्शनकारियों ने गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया और जमकर तोड़फोड़ की। स्थिति को काबू में करने के लिए पुलिस को आँसू गैस के गोले दागने पड़े। बवाल की वजह से एनएच-9, दिल्ली- मेरठ एक्सप्रेस वे और चिल्ला बॉर्डर पर 5 किलोमीटर तक लंबा जाम लग गया। रूट डायवर्ट कर सेक्टर 62 और डीएनडी की ओर भेजा गया। इलाके को छाबनी में तब्दील कर दिया गया है।
मजदूरों का कहना है कि उनकी कंपनी में नए श्रम कानून के प्रावधान लागू नहीं हैं, इसलिए मजदूरों को कम वेतन मिलता है और सुविधाएँ भी न्यूनतम हैं। दिल्ली-हरियाणा समेत कई राज्यों में 1 अप्रैल 2026 से न्यूनतम मजदूरी बढ़ाई गई है। दिल्ली में मजदूरों को अकुशल, कुशल, अर्ध कुशल वर्गों में विभाजित कर 18000 रुपए से 24000 रुपए हर महीना देने का प्रावधान है, जबकि हरियाणा में 15220 रुपए हर महीना मिलता है।
लेकिन, यूपी में मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी 13000 रुपए महीना है, इसलिए मजदूर वेतन वृद्धि की माँग कर रहे हैं। 12 अप्रैल को कथित तौर पर एक महिला मजदूर के फायरिंग में घायल होने की खबर फैली। इसके बाद सोमवार को मजदूर उग्र हो गए और उन्होंने बवाल काटा। बताया जा रहा है कि आंदोलन में कई असामाजिक तत्व शामिल हो गए हैं, जो साजिश रच रहे हैं।
मजदूरों की माँगों को सरकार ने माना
योगी सरकार मजदूरों की ज्यादातर माँगों को पहले ही मान चुकी है। इसके बावजूद मजदूरों का बवाल सवाल खड़े करता है। योगी सरकार ने जिन माँगों को माना है, उनमें
दोगुना ओवरटाइम भुगतान
समय पर सैलरी सीधे बैंक में
10 तारीख से पहले हर महीना वेतन मिलना चाहिए
सैलरी स्लिप हर मजदूर को हर महीने मिलना चाहिए
30 नवंबर से पहले बोनस का भुगतान सीधा बैंक खाते में होना चाहिए
साप्ताहिक अवकाश सुनिश्चित हो
अवकाश के दिन काम करने पर दोगुनी मजदूरी मिले
महिला सुरक्षा के लिए आंतरिक शिकायत समितियाँ और कंट्रोल रूम बनाना अनिवार्य
समिति में एक महिला सदस्य जरूर हो
कंट्रोल रूम में शिकायत पेटी लगाई जाए
हेल्पलाइन नंबर जारी की जाए, ताकि उससे भी शिकायत दर्ज कराई जा सके
शिकायतों का तुरंत निपटारा किया जाए
सरकार के निर्देशों का पालन सुनिश्चित कराने के लिए नियमित निगरानी की जाए।
नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनी के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।
शनिवार 11 अप्रैल 2026 को सीएम योगी ने मजदूरों के विरोध प्रदर्शन को संज्ञान में लेते हुए उच्च स्तरीय बैठक की और निर्देश जारी करते हुए कहा कि मजदूरों के हितों की किसी भी हाल में अनदेखी नहीं की जाएगी। नोएडा प्रशासन ने इसकी जानकारी भी दी।
मजदूरों का डिरेल होता आंदोलन
नोएडा में हो रहा मजदूर आंदोलन डिरेल होता नजर आ रहा है। सरकार ने भी हर हाल में मजदूरों के हितों की रक्षा करने की बात कही और सीएम योगी ने खुद संज्ञान लिया। इसके लिए निर्देश जारी किए। लेकिन अब एक प्राइवेट कंपनी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में कई कंपनियों के अस्थायी मजदूर शामिल हो गए हैं। इसमें ऐसे असामाजिक तत्व भी हैं, जो इसे हिंसक बना रहे हैं।
मजदूरों को उनका हक हर हाल में मिलना चाहिए, लेकिन इनके शांतिपूर्ण विरोध को हिंसक बनाने वाले तत्वों को जरूर सामने लाया जाना चाहिए। ऐसा करने वाले मजदूरों का भला नहीं कर रहे होते हैं, क्योंकि आंदोलन के हिंसक होते ही मजदूरों की माँगें कहीं खो जाती है और बातें उस हिंसा की होती है, जो असामाजिक तत्व फैलाते हैं। ऐसी ही हालत अब नोएडा में मजदूर आंदोलन की हो रही है।
इससे पहले पानीपत, मानेसर समेत कई जगहों पर मजदूरों को भड़काने की कोशिश की गई। पानीपत-मानेसर में रिफाइनरी में अस्थायी मजदूरों की कई माँगे हैं। उन्हें 12 घंटे काम कराकर 8 घंटे की ड्यूटी बताया जाता है। मजदूरों ने वेतन वृद्धि और फैक्ट्री में मजदूरों के लिए बेहतर सुविधाएँ देने की माँग की है।
यह आंदोलन भी हिंसक हो गया और मजदूरों की माँग पीछे रह गई और 2500 अज्ञात लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया। असामाजिक तत्वों ने हिंसा फैला कर मजदूर आंदोलन को डिरेल कर दिया। इस बीच फरीदाबाद में भी मजदूरों का मुद्दा गरमाने लगा है और विरोध प्रदर्शन की तैयारी चल रही है। मजदूर संगठनों ने पानीपत-मानेसर के मजदूरों को समर्थन देने के लिए आंदोलन करने की चेतावनी दी है।
इसी तरह मध्यप्रदेश के सिंगरौली में अडानी ग्रुप की परियोजना का विरोध किया गया। यहाँ की सुलियारी और थिरौली कोयला खदानों को बंद करने की माँग करते हुए विरोध प्रदर्शन हुए। इस दौरान संदिग्ध परिस्थिति में एक मजदूर की मौत के बाद बवाल मच गया।
यूपी समेत कई बीजेपी राज्यों में साजिश रची गई
यूपी को अशांत करने की कोशिशें काफी दिनों से हो रही है। किसान आंदोलन के दौरान पंजाब से यूपी खासकर पश्चिम यूपी में बवाल मचा। जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हरियाणा, राजस्थान, यूपी समेत कई राज्य इसकी जद में आए।
इन आंदोलनों के दौरान सड़कों को जाम कर सरकारी बसों और दूसरे वाहनों को आग के हवाले करना, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाना आम बात हो गई थी। सोशल मीडिया ने इस दौरान आग में घी का काम किया और आंदोलन को लेकर तरह-तरह की अफवाहें फैलाई गई। दरअसल इन आंदोलनों के पीछे सियासी साजिश थी, जिसका खुलासा बाद में सरकारी एजेंसियों ने किया।
2025 में ‘आई लव मोहम्मद’ बीजेपी शासित राज्यों उत्तराखंड, यूपी, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात समेत कई राज्यों में विवाद का विषय रहा। यूपी में कानपुर में 4 सितंबर 2025 को शुरू हुआ यह विवाद बरेली, अलीगढ़, मेरठ तक फैला। इस दौरान ‘आई लव मोहम्मद’ के बैनर-पोस्टर के साथ सड़कों को इस्लामी भीड़ ने जाम किया और भड़काऊ नारेबाजी की। कई जगहों पर पथराव हुए और पुलिस पर हमले किए गए।
इस्लामी कट्टरपंथियों पर काबू पाने के लिए कई जगहों पर पुलिस ने आँसू गैस के गोले छोड़े और लाठीचार्ज किया। उत्तराखंड के काशीपुर में ‘आई लव मुहम्मद’ को लेकर हुए बवाल और पुलिस पर पत्थरबाजी में समाजवादी पार्टी नेता नदीम अख्तर का नाम सामने आया। इस विवाद को भी सोशल मीडिया के माध्यम से हवा दी गई।
दरअसल किसानों, मजदूरों और इस्लामी कट्टरपंथियों के बवाल के पीछे साजिश का खुलासा बाद में होता है। भोले-भाले किसानों और मजदूरों की माँगों को आगे कर सियासी रोटी सेंकने की आदत पार्टियों की रही है। मजदूरों की माँग न्यूनतम मजदूरी की रही है, जिसे नाजायज नहीं कहा जा सकता। लेकिन, क्या इसके पीछे यूपी के विकास और औद्योगिक धंधों को डिरेल करने की कोशिश तो नहीं है?
IPL 2026 में राजस्थान रॉयल्स के टीम मैनेजर रोमी भिंडर विवादों में आ गए हैं। मामला रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के खिलाफ खेले गए मैच का है, जहाँ कैमरों में उन्हें डगआउट में मोबाइल फोन इस्तेमाल करते हुए देखा गया।
ये मैच शुक्रवार (10 अप्रैल 2026) को गुवाहाटी में खेला गया था। यह वही मैच था जिसमें राजस्थान रॉयल्स ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 6 विकेट से जीत दर्ज की। उस दौरान उनके पास युवा खिलाड़ी वैभव सूर्यवंशी भी बैठे हुए थे।
BCCI के एक अधिकारी ने साफ तौर पर माना है कि डगआउट में फोन का इस्तेमाल करना नियमों के खिलाफ है। IPL जैसे बड़े टूर्नामेंट में इस तरह की गलती को हल्के में नहीं लिया जाता, क्योंकि यहाँ एंटी-करप्शन से जुड़े नियम बहुत सख्त होते हैं। अब यह माना जा रहा है कि भिंडर पर किसी न किसी तरह की कार्रवाई जरूर हो सकती है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल मैच के दौरान टीवी कैमरों ने रोमी भिंडर को फोन इस्तेमाल करते हुए कैद कर लिया। बाद में यह तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। शुरुआत में इसे सामान्य बात समझा गया, लेकिन जब इसकी जाँच हुई तो यह पुष्टि हो गई कि वह वास्तव में फोन इस्तेमाल कर रहे थे।
रोमी भिंडर लंबे समय से टीम के साथ जुड़े हुए हैं और IPL की शुरुआत से ही टीम मैनेजमेंट का हिस्सा रहे हैं। ऐसे में उनसे उम्मीद की जाती है कि वे सभी नियमों और प्रोटोकॉल को अच्छी तरह जानते होंगे। इसलिए यह मामला थोड़ा गंभीर माना जा रहा है। हालाँकि कुछ लोग इसे गलती से हुआ काम बता रहे हैं, लेकिन नियमों का उल्लंघन तो साफ तौर पर हुआ है।
अब इस पूरे मामले की रिपोर्ट मैच रेफरी और एंटी-करप्शन यूनिट (ACU) को सौंपी जाएगी, जिसके आधार पर आगे का फैसला लिया जाएगा। यह फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि इसे कितनी बड़ी गलती माना जाता है।
क्या कहते हैं IPL के नियम?
IPL में PMOA यानी प्लायर्स एण्ड मैच अफिशल एरिया को बहुत ही संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। इसमें ड्रेसिंग रूम, डगआउट, खिलाड़ियों की बैठने की जगह और मैच अधिकारियों के कमरे शामिल होते हैं। इस पूरे इलाके में सुरक्षा और नियमों का खास ध्यान रखा जाता है।
स्क्रीन शॉर्ट – IPL PMOA PROTOCOL
नियम साफ कहते हैं कि डगआउट में मोबाइल फोन का इस्तेमाल पूरी तरह से बैन है। टीम मैनेजर को सिर्फ ड्रेसिंग रूम में ही फोन इस्तेमाल करने की अनुमति होती है। इसके अलावा खिलाड़ियों और सपोर्ट स्टाफ को अपने फोन और स्मार्ट डिवाइस बंद करके जमा कराने होते हैं, ताकि मैच के दौरान किसी भी तरह का बाहरी संपर्क न हो सके।
डगआउट और ड्रेसिंग रूम के बीच बातचीत के लिए सिर्फ वॉकी-टॉकी का इस्तेमाल किया जा सकता है। इन सभी नियमों का मकसद मैच को पूरी तरह निष्पक्ष और सुरक्षित बनाए रखना होता है, ताकि किसी भी तरह की गड़बड़ी या भ्रष्टाचार की संभावना न रहे।
अब अगर रोमी भिंडर के मामले की बात करें, तो यह तय है कि नियमों का उल्लंघन हुआ है। ऐसे में उन पर चेतावनी, जुर्माना या फिर मैच बैन जैसी कार्रवाई हो सकती है। अंतिम फैसला ACU की रिपोर्ट और मैच रेफरी की सिफारिश के बाद ही लिया जाएगा।
क्या अमेरिका में कुछ ऐसा हो रहा है जो आम लोगों से छिपाया जा रहा है? एक के बाद एक NASA के कर्मियों, न्यूक्लियर साइंटिस्ट और सैन्य अधिकारियों की मौत और गुमशुदगी ने अब एक खौफनाक पैटर्न का रूप ले लिया है। जिन लोगों पर देश की सुरक्षा और विज्ञान की खोज की जिम्मेदारी थी, वही अब रहस्यमयी हालात में या तो मर रहे हैं या अचानक लापता हो रहे हैं और सबसे बड़ी बात कई मामलों में किसी भी एजेंसी के पास इसका कोई साफ जवाब नहीं है।
मीडिया में इन मामलों की हालिया चर्चा डेली मेल की एक रिपोर्ट के बाद शुरू हुई। 22 मार्च 2026 की इस रिपोर्ट में रिटायर्ड जनरल विलियम नील मैककासलैंड और नासा की एयरोस्पेस इंजीनियर मोनिका जैसिंटो रेजा के सिर्फ आठ महीनों के भीतर 2 अलग-अलग घटनाओं में ट्रैकिंग के दौरान रहस्यमयी तरीके से गायब होने की बात कही गई। 22 मार्च 2026 की डेली मेल की इस रिपोर्ट में ऐसे रहस्यमयी मामलों की संख्या 5 बताई गई थी जो 11 अप्रैल 2026 की एक ताजा रिपोर्ट में बढ़कर 10 बताई गई है।
कौन थे मैककासलैंड व रेजा और कैसे हुए गायब?
68 साल के रिटायर्ड जनरल मैककासलैंड और 60 वर्षीय रेजा दोनों एयर फोर्स रिसर्च लेबोरेटरी से जुड़े बड़े नाम थे। मैककासलैंड का नाम ओहायो के राइट-पैटरसन एयर फोर्स बेस में कथित गुप्त UFO प्रोग्राम से जोड़ा जाता रहा है। वहीं, रेजा एडवांस स्पेस टेक्नोलॉजी पर काम कर रही थीं। इसी वजह से कुछ लोग यह दावा कर रहे हैं कि दोनों को उनके काम की वजह से निशाना बनाया गया हो सकता है या वे खुद छिप गए हों।
मैककासलैंड 27 फरवरी 2026 को अचानक अपने घर से बिना फोन के निकल गए थे और आखिरी बार न्यू मैक्सिको के अल्बुकर्क में एक जगह के पास देखे गए। उनके पास न फोन था, न कोई ट्रैकिंग डिवाइस और न ही चश्मा। उनकी पत्नी सुसान ने कहा कि उन्हें किसी साजिश का शक नहीं है लेकिन यह जरूर बताया कि मैककासलैंड सिर्फ जूते और अपनी .38 कैलिबर रिवॉल्वर लेकर घर से निकले थे। टेनेसी के सांसद टिम बर्चेट का कहना है कि मैककासलैंड के पास अमेरिका के परमाणु रहस्य थे।
जनरल मैककासलैंड
वहीं, मोनिका रेजा 22 जून 2025 से लापता हैं। वह जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी में काम कर रही थीं और ‘मोंडालॉय’ नाम की एक खास धातु की सह-खोजकर्ता थीं। उनके गायब होने के चार दिन बाद इंटरनेट पर उनका एक मेमोरियल पेज भी बना जिसमें उन्हें मृत बताया गया था लेकिन बाद में वह पेज हटा दिया गया। अधिकारियों ने अभी तक उनके शव मिलने की पुष्टि नहीं की है और मामला अब भी अनसुलझा है।
मोनिका रेजा
3 अन्य वैज्ञानिकों की रहस्यमयी मौत की कहानी
इस रिपोर्ट में 3 अन्य वैज्ञानिकों की हत्या का भी जिक्र किया गया है जिसमें 47 साल के नूनो लुरेरो भी शामिल हैं। लुरेरो की 15 दिसंबर 2025 को बोस्टन के पास उनके घर में हत्या कर दी गई। पुलिस के अनुसार, हमलावर उनका पुराना सहपाठी था। लुरेरो एक जाने-माने वैज्ञानिक थे और हाल ही में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के फ्यूजन सेंटर के प्रमुख बने थे। उनका काम ऐसी ऊर्जा पर था जो भविष्य में क्लीन और लगभग असीमित ऊर्जा दे सकती है।
नूनो लुरेरो
उनका शोध बहुत गर्म गैसों (प्लाज्मा) और फ्यूजन ऊर्जा पर आधारित था। हालाँकि, जाँचकर्ता डैनियल लिस्जट का कहना है कि इस तरह का काम गुप्त UFO तकनीक से भी जोड़ा जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि लुरेरो का काम न्यूट्रॉन स्टार जैसी अंतरिक्ष घटनाओं से जुड़ा था जिसे असीमित ऊर्जा का स्रोत माना जाता है।
67 साल के खगोल वैज्ञानिक कार्ल ग्रिलमायरकी 16 फरवरी 2026 को उनके घर पर हत्या कर दी गई। सुबह करीब 6 बजे उन्हें उनके घर के बाहर गोली मार दी गई। ग्रिलमायर ने एक दूर के ग्रह पर पानी की खोज में अहम योगदान दिया था। उनके साथियों ने कहा था कि इससे धरती से करीब 160 प्रकाश वर्ष दूर जीवन के संकेत मिल सकते हैं। इस मामले में पुलिस ने 29 साल के फ्रेडी स्नाइडर को संदिग्ध मानकर बाद में उस पर हत्या, कार चोरी और चोरी के आरोप लगाए। हालाँकि पुलिस ने अभी तक हत्या का कारण नहीं बताया है।
वहीं, 45 साल के जेसन थॉमस का शव 17 मार्च 2026 को मैसाचुसेट्स के वेकफील्ड में लेक क्वानापोविट से मिला। वह 12 दिसंबर 2025 से लापता थे। थॉमस नोवार्टिस कंपनी में केमिकल बायोलॉजी के असिस्टेंट डायरेक्टर थे और उनका काम नई दवाएँ बनाने, खासकर कैंसर के इलाज से जुड़ा था। नोवार्टिस के अमेरिकी रक्षा विभाग और स्वास्थ्य विभाग के साथ भी काम करने की जानकारी है। इस मामले में पुलिस का कहना है कि मौत का कारण अभी नहीं पता है लेकिन फिलहाल किसी साजिश के सबूत नहीं मिले हैं।
परमाणु हथियार कार्यक्रम से जुड़ी कैसियस लापता
अपनी इस रिपोर्ट के 4 दिन बाद 26 मार्च 2026 को डेली मेल ने एक और रिपोर्ट छापी जिसमें वैज्ञानिक मेलिसा कैसियस (Melissa Casias) के गायब होने का दावा किया गया। बताया गया कि 54 साल की कैसियस 26 जून 2025 से लापता हैं। कैसियस लॉस अलामोस नेशनल लैब (LANL) में एडमिनिस्ट्रेटिव असिस्टेंट थीं। यह वही लैब है जिसकी स्थापना द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मैनहट्टन परियोजना के तहत हुई थी और तब से यह अमेरिका के परमाणु हथियार कार्यक्रम से जुड़ी रही है।
रिपोर्ट में कैसियस के परिवार के हवाले से बताया गया है कि उस दिन कैसियस ने घर से काम करने का फैसला किया था जो उनके स्वभाव के बिल्कुल विपरीत था। बाद में उन्हें उनके घर से कई किलोमीटर दूर अकेले चलते हुए देखा गया और हैरानी की बात यह थी कि उनके पास न फोन था, न पर्स और न ही चाबियाँ।
हालाँकि, कैसियस के परिवार का मानना था कि वह निजी और आर्थिक परेशानियों के चलते खुद कहीं चली गई होंगी। मामला इतना भी सीधा नहीं है। 24 साल तक एफबीआई में रह चुके क्रिस स्वेकर इस मामले को कहीं ज्यादा गंभीर मानते हैं। उनका कहना है कि यह सिर्फ एक गुमशुदगी नहीं बल्कि एक बड़े पैटर्न का हिस्सा हो सकता है।
कैसियस के गायब होने वाले दिन की घटनाएँ भी बेहद अजीब थीं। उसी लैब में काम करने वाले उनके पति मार्क कैसियस ने बताया कि वह उन्हें सुबह ऑफिस छोड़ने गई थीं और उनके पास लैब में एंट्री के लिए सिक्योरिटी बैज भी था। वहीं, उनकी बेटी सिएरा के अनुसार, कैसियस बाद में उसके पास आईं, एक सैंडविच दिया और कहा कि वह घर लौट रही हैं क्योंकि वह बैज भूल गई हैं। शाम होते-होते मामला और रहस्यमयी हो गया।
लैब से सूचना मिली कि कैसियस ने न तो ऑफिस जॉइन किया और न ही घर से काम किया। घर लौटने पर परिवार को पता चला कि उनके दोनों फोन घर पर ही थे और उन्हें पूरी तरह से फैक्ट्री रीसेट किया गया था यानी सारा डेटा मिटा दिया गया था। CCTV फुटेज में उन्हें आखिरी बार न्यू मैक्सिको के स्टेट रोड 518 पर अकेले चलते हुए देखा गया। इसके बाद उनका कोई पता नहीं चला न कोई शव मिला, न ही कोई ठोस सबूत।
आखिरी बार न्यू मैक्सिको में दिखीं कैसियस (फोटो साभार:डेली मेल)
NASA के वैज्ञानिक की मौत और LANL का पूर्व कर्मी लापता
वैज्ञानिकों और महत्वपूर्ण पदों पर रहे लोगों के गायब होने या रहस्यमयी मौतों की रिपोर्ट्स की कड़ी में डेली मेल ने 1 अप्रैल 2026 को एक और रिपोर्ट जारी की जिसमें दो अन्य लोगों का जिक्र था। रिपोर्ट में बताया गया कि NASA के वैज्ञानिक फ्रैंक माइवॉल्ड की 4 जुलाई 2024 को लॉस एंजेलिस में 61 साल की उम्र में मौत हो गई थी लेकिन उनकी मौत का कारण आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया। उनका पोस्टमार्टम नहीं किया गया था।
माइवॉल्ड 1999 से जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी में काम कर रहे थे और एडवांस सैटेलाइट तकनीक पर कई अहम प्रोजेक्ट्स से जुड़े थे जिनकी मदद से धरती और दूसरे ग्रहों की स्कैनिंग की जा सकती है। अपनी मौत से करीब 13 महीने पहले माइवॉल्ड एक ऐसे बड़े रिसर्च प्रोजेक्ट के प्रमुख थे जिससे भविष्य में अंतरिक्ष मिशनों को दूसरे ग्रहों पर जीवन के साफ संकेत खोजने में मदद मिल सकती है। उन्हें ‘प्रिंसिपल’ सम्मान मिला था लेकिन इसके बावजूद नासा ने उनकी मौत पर कभी खुलकर कोई जानकारी नहीं दी।
वैज्ञानिक फ्रैंक माइवॉल्ड
वहीं, दूसरा मामला लॉस एलामोस नेशनल लैब (NANL) से जुड़ा है। यह अमेरिका की प्रमुख परमाणु शोध संस्थाओं में से एक है। यहाँ के पूर्व कर्मचारी एंथनी चावेज (79 साल) 4 मई 2025 को अचानक लापता हो गए लगभग एक साल बाद भी उनका कोई सुराग नहीं मिल पाया है। पुलिस के अनुसार, उनकी तलाश अभी भी जारी है। चावेज को आखिरी बार अपने घर से पैदल निकलते हुए देखा गया था। उनका वाहन घर के बाहर ही खड़ा मिला और उनका पर्स, चाबियाँ और अन्य जरूरी सामान घर के अंदर ही मिले।
NASA के वैज्ञानिक माइकल डेविड हिक्स की रहस्यमयी मौत
डेली मेल ने 7 अप्रैल 2026 को एक अन्य रिपोर्ट में अमेरिका के स्पेस प्रोग्राम से जुड़े वैज्ञानिक माइकल डेविड हिक्स का नाम भी उस सूची में शामिल किया जिसके बाद ऐसे मामलों की संख्या बढ़कर 9 हो गई। माइकल डेविड हिक्स नासा की जेट प्रोपल्शन लैब (JPL) में काम करते थे। उनकी 30 जुलाई 2023 को 59 साल की उम्र में मौत हो गई लेकिन उनकी मौत की वजह आज तक नहीं बताई गई। यहाँ तक कि यह भी साफ नहीं है कि उनका पोस्टमॉर्टम हुआ था या नहीं।
हिक्स ने 1998 से 2022 तक JPL में काम किया और 80 से ज्यादा रिसर्च पेपर लिखे। उन्होंने धूमकेतु (comets) और एस्टेरॉयड (asteroids) को समझने में नासा की मदद की। खास तौर पर हिक्स DART प्रोजेक्ट से जुड़े थे जो नासा का एक टेस्ट था यह देखने के लिए कि क्या इंसान खतरनाक एस्टेरॉयड को पृथ्वी से दूर मोड़ सकते हैं। उन्होंने डीप स्पेस 1 मिशन पर भी काम किया जिसमें नई स्पेस टेक्नोलॉजी का परीक्षण किया गया था और जिसने 2001 में एक धूमकेतु के पास से उड़ान भरी थी।
अजीब बात यह है कि हिक्स के लिए लिखे गए कई ऑनलाइन श्रद्धांजलि संदेशों में उनकी मौत से पहले किसी बीमारी का जिक्र नहीं था। उनकी मौत अचानक हुई और यह लगभग एक साल बाद हुई जब उन्होंने नासा JPL छोड़ दिया था।
माइकल डेविड हिक्स
न्यूक्लियर रहस्यों से जुड़े स्टीवन भी लापता
डेली मेल ने रविवार (11 अप्रैल 2026) को अपनी रिपोर्ट में न्यूक्लियर रहस्यों से जुड़े एक और शख्स के गायब होने का दावा किया। रिपोर्ट में बताया गया कि 48 साल के स्टीवन गार्सिया 28 अगस्त 2025 को बिना किसी सुराग के गायब हो गए। उन्हें आखिरी बार न्यू मैक्सिको के अल्बुकर्क स्थित अपने घर से पैदल निकलते हुए देखा गया था और उनके पास सिर्फ एक हैंडगन थी। गार्सिया एक सरकारी ठेकेदार थे जो कंसास सिटी नेशनल सिक्योरिटी कैंपस (KCNSC) के लिए काम करते थे।
KCNSC ऐसी जगह है जहाँ सेना के परमाणु हथियारों में लगने वाले ज्यादातर (80% से ज्यादा) गैर-परमाणु हिस्से बनाए जाते हैं। बताया गया है कि गार्सिया वहाँ सामान और उपकरणों की देखभाल करने का काम करते थे। इस वजह से उनके पास ऊँची सुरक्षा अनुमति थी और उन्हें वहाँ की कई अहम और गोपनीय जानकारियों तक पहुँच थी। रिपोर्ट के मुताबिक, उनका काम बहुत जिम्मेदारी वाला था और वे वहाँ मौजूद सभी मशीनों और सामान की निगरानी करते थे जिनकी कीमत करोड़ों डॉलर तक हो सकती है। इस तरह स्टीवन ऐसे मामलों से जुड़े 10वें शख्स बन गए हैं।
स्टीवन गार्सिया हुए गायब
अल्बुकर्क पुलिस के अनुसार, गार्सिया को आखिरी बार सुबह करीब 9 बजे अपने घर (कैटटेल कोर्ट SW) से बाहर निकलते हुए देखा गया था। उन्होंने हरे रंग की कैमोफ्लाज टी-शर्ट और शॉर्ट्स पहने हुए थे। उन्हें एक हैंडगन लिए हुए भी देखा गया था। हालाँकि, रिपोर्ट में इस बात से इनकार किया गया कि गार्सिया आत्महत्या करने वाले थे या किसी मानसिक परेशानी से जूझ रहे थे। संदेह जताया गया है कि उन्हें विदेशी जासूसों द्वारा निशाना बनाया गया हो।
क्या है अमेरिका के खुफिया अधिकारियों को संदेह?
अमेरिका में वैज्ञानिकों के अचानक गायब होने और रहस्यमयी मौतों की घटनाओं के लगातार बढ़ने पर एक पूर्व खुफिया अधिकारी क्रिस स्वेकर ने बड़ा शक जताया है। 24 साल तक FBI में काम कर चुके स्वेकर का कहना है कि अन्य देश अमेरिका के उन लोगों को निशाना बना सकते हैं जिन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी अहम जानकारी होती है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी वैज्ञानिकों खासकर रॉकेट और मिसाइल तकनीक से जुड़े विशेषज्ञों को लंबे समय से निशाना बनाया जाता रहा है।
स्वेकर ने चेतावनी दी कि अगर ये घटनाएँ आपस में जुड़ी हैं तो कई विदेशी ताकतें इसमें शामिल हो सकती हैं। ये लोग वैज्ञानिकों का अपहरण कर सकते हैं, उन्हें ब्लैकमेल कर सकते हैं, उनसे जानकारी निकलवा सकते हैं या यहाँ तक कि उन्हें मार भी सकते हैं। उन्होंने कहा कि चीन, रूस, पाकिस्तान, भारत, ईरान और उत्तर कोरिया जैसे देश इस तरह की तकनीक हासिल करने की कोशिश करते रहते हैं। उन्होंने कहा कि शीत युद्ध के समय से ही ऐसे प्रयास होते रहे हैं।
पद्मविभूषण से सम्मानित, सुरों की मल्लिका और सबसे ज्यादा गाना रिकॉर्ड करने के लिए ग्रिनीज बुक ऑफ द वर्ल्ड में अपना नाम दर्ज कराने वाली मशहूर गायिका आशा भोसले अब इस दुनिया में नहीं हैं। 10 साल की उम्र से पार्श्व गायन के क्षेत्र में आ चुकी आशा भोसले ने 92 साल की उम्र तक अपनी गायकी को खुद से अलग नहीं होने दिया। 80 साल की सिंगिग करियर में उन्होंने 12000 से ज्यादा गाने रिकॉर्ड किए। ये 20 से ज्यादा भाषाओं में थे।
उनकी मौत संगीत के कद्रदानों के लिए बड़े सदमे से कम नहीं है। 12 अप्रैल 2026 को मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में उन्होंने अंतिम साँस ली। एक दिन पहले उन्हें हार्ट अटैक आया था, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
कुछ समय पहले यूके बेस्ड ‘गोरिलाज’ के साथ जुड़ीं, जो वर्चुअल बैंड हैं। इस बैंड की थीम है कि कला को किसी रंग या रूप में नहीं पहचाना जा सकता, इसलिए इनका कोई चेहरा नहीं है यानी इसमें एनिमेटेड कैरेक्टर है। इसके एलबम द माउंटेन के लिए आशा भोसले ने गाना गाया। इसे सुनकर कोई भी रो देगा।
91 साल में लाइव परफॉर्म किया
2025 में 91 साल की उम्र में आशा भोसले ने लाइव परफोर्म करके दर्शकों का मंत्रमुग्ध कर दिया। उनके गाने के अंदाज की कॉपी करने की कई कलाकारों ने कोशिश की, लेकिन असली तो फिर असली होता है। वह सबसे अलग और अनोखा होता है।
हर दौर में नए तेवर और नए अंदाज में वह आईं और अपनी आवाज का जादू बिखेरा। कव्वाली से लेकर शास्त्रीय संगीत तक हर गाना खुद में आइकॉनिक है। उनके करियर की शुरुआत 1943 में हुई थी। पिता दीनानाथ मंगेशकर के निधन के बाद जब परिवार संभालने की जिम्मेदारी दीदी लता मंगेशकर पर आई तो उन्होंने बड़ी बहन का पूरा साथ दिया। उन्होंने पहला गाना मराठी फिल्म के लिए गाया।
उस रिकॉर्डिंग को याद करते हुए उन्होंने अपने इंटरव्यू में बताया था कि उनके पैर हाथ काँप रहे थे। उन्हें पता नहीं था कि माइक क्या होता है और इस पर कैसे गाया जाता है। लेकिन जब गाना गा लिया, तो उन्हें एहसास हुआ कि वह भी गा सकती हैं, सिर्फ दीदी ही नहीं। वहाँ से नई जिंदगी शुरू हुई।
बॉलीवुड में उन्होंने फिल्म ‘चुनरिया’ के लिए 1948 में गीता दत्त और शमशाद बेगम के साथ पहला गाना रिकॉर्ड किया था। उस गाने के बोल थे- सावन आया रे। 1949 में उन्होंने फिल्म रात की रानी में अपना पहला सोलो गाना रिकॉर्ड किया। बहन लता मंगेशकर के लिए यह साल वरदान साबित हुआ। फिल्म महल में गाने से वह रातोरात कामयाबी के शिखर पर चढ़ गईं। 1950 आते आते लता मंगेशकर दिग्गज संगीतकारों की पहली पसंद बन चुकी थीं। बहन के साए में आशा भोसले को मात्र बी ग्रेड की फिल्में ही ऑफर की जाती। बड़े संगीतकार उनसे दूर थे।
16 साल की उम्र में घर से भाग कर शादी की
ऐसे समय में 16 साल की उम्र में आशा भोसले ने 31 साल के लता मंगेशकर के सेक्रेटरी गणपतराव भोसले संग घर से भाग कर शादी रचा ली। परिवार ने बहुत विरोध किया और इसके बाद दोनों बहनों के रिश्तों में दरार आ गई, जो लंबे वक्त तक चली।
एक इंटरव्यू में आशा भोसले ने खुद माना था कि लता दीदी उनकी शादी के खिलाफ थीं। उनके रिश्ते इसके बाद कड़वे हो गए और सालों तक दोनों बहनों में बातचीत भी नहीं हुई। दूसरी तरफ ये शादी सचमुच आशा भोसले के लिए किसी त्रासदी से कम नहीं थी। रूढिवादी परिवार को ‘सिंगर बहू’ से काफी एतराज था। पति से भी वह काफी परेशान रहीं। उनकी निजी जिंदगी में उथल-पुथल मचा था और करियर का भी बुरा हाल था।
आशा भोसले की करियर में बदलाव फिल्म परिणीता (1953) से आई। 1954 में राजकपूर ने उन्हें फिल्म बूट पॉलिश में गाने का मौका दिया। संगीतकार ओपी नय्यर का मानना था कि वह लता मंगेशकर के बगैर भी सुपरहिट गाने दे सकते हैं। उन्होंने आशा भोसले को अपनी फिल्मों में गाने का मौका दिया। फिल्म सीआईडी के गानों के हिट होते ही आशा भोसले उनकी पसंदीदा गायिका बन गईं।
नय्यर का साथ आशा भोसले के लिए बेहतरीन दौर साबित हुआ। इस जोड़ी ने एक के बाद एक कई हिट गाने दिए। इन गानों ने आशा को वह मुकाम दिया, जिससे वह अपनी बहन लता मंगेशकर की परछाई से बाहर निकल गईं। ओपी नय्यर के साथ उन्होने 60 फिल्मों के करीब 324 गीत गाए।
फिल्म नया दौर (1957) के हिट गानों के बाद हर एक की जुबान पर उनका नाम था। इसी वक्त एसडी बर्मन और लता मंगेशकर में मनमुटाव हुआ और आशा के जीवन में नया मोड़ आया।
लता से राइवलरी और सालों तक बातचीत बंद
आशा भोसले, किशोर कुमार,एसडी बर्मन और मजरूह सुल्तानपुरी की चौकड़ी ने चुलबुले गीतों का नया ट्रेंड विकसित किया, जो आसानी से हर दिलों तक पहुँच जाता था।
आज भी ‘चलती का नाम गाड़ी’, ‘पेइंग गेस्ट’, ‘बंबई का बाबू’ जैसी फिल्मों के गीत लोग गुनगुनाते हैं। फिल्म ‘काला पानी’ में ‘अच्छा जी मैं हारी’ रोमांटिक गीत का शोखभरा अंदाज से लेकर ‘सुजाता’ और ‘लाजवंती’ के बेहद गंभीर गानों में आशा की आवाज हर रंग में माहिर दिखी।
इसके बावजूद लता मंगेशकर की तुलना में आशा भोसले को काफी कम मेहनताना मिलता था। 1960 में जब लता एक गाने के लिए 500 रुपए लेती थीं, तो आशा को मात्र 100-150 रुपए मिलते थे। मशहूर डायरेक्टर सई परांजपे ने फिल्म साज में ऐसी ही दो बहनों की कहानी दिखाई है जो संगीत की दुनिया की बादशाह थीं।
आशा भोसले को स्टूडियों से निकाला गया
आशा भोसले को एक बार रिकॉर्डिंग रुकवा कर स्टूडियो से बाहर निकाला गया था। ये घटना 1947 की है। आशा भोसले और किशोर कुमार फेमस स्टूडियों में फिल्म ‘जान पहचान’ के लिए एक गाना रिकॉर्ड कर रहे थे। इस फिल्म के म्यूजिक डायरेक्टर खेमचंद प्रकाश थे। उन्होंने खराब आवाज बोल कर रात 2 बजे दोनों की रिकॉर्डिंग बंद करवा दी और बाहर जाने को कह दिया।
करीब 10 साल बाद किशोर कुमार ने इस अपमान का बदला लिया। उन्हें फेमस स्टूडियो में रिकॉर्ड के लिए बुलाया गया। उस दिन आशा भोसले भी गाने के लिए पहुँची थीं। जब डायरेक्टर ने उन्हें गाने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि आप ने तो हमारी आवाज को खराब बता कर रिकॉडिंग रुकवा दी थी। आज देखिए हम कहाँ हैं।
पंचम दा का साथ और आशा की दूसरी शादी
1960 में आशा भोसले अपने तीन बच्चों के साथ पति से अलग हो गईं। 1966 में तीसरी कसम में उन्होंने पहली बार एचडी बर्मन के साथ काम किया। हालाँकि उनके पिता एसडी बर्मन के साथ काम करते वक्त उनकी मुलाकात एचडी बर्मन से होती रहती थी। इस जोड़ी ने सुरों को नया आयाम दिया।
एचडी बर्मन यानी पंचम दा ने पश्चिमी मिजाज को भारतीय संगीत के रंग में रंगा और आशा की आवाज उसमें कशिश डाल देती। इससे दुनिया ने आशा की आवाज की उस ऊँचाई से वाकिफ हुई, जो अब तक अनसुना था। कैबरे हो या गजल, शास्त्रीय हो या पाश्चात्य, हर जटिलता को आसान बना कर गीतों में पिरोया। 1980 की शुरुआत में दोनों ने शादी की लेकिन दशक के अंत तक अलग भी हो गए। इसकी वजह संगीतकार के नशे की आदत बताई गई। हालाँकि अलग होने के बाद भी दोनों की दोस्ती कायम रही।
परमाणु हथियारों का फैलाव न हो, इसके लिए ईरान पर संयुक्त राष्ट्र के साथ-साथ अमेरिका ने भी कई तरह के प्रतिबंध लगा रखे हैं। मध्यपूर्व में परमाणु होड़ को रोकने से लेकर आतंकी संगठनों हूती, हिजबुल्ला और हमास तक पर लगाम कसने के लिए ईरान पर ‘रोक’ जरूरी है। इजरायल के अस्तित्व को नकारने वाले ईरान के हाथ परमाणु बम लगने का वैश्विक असर पड़ सकता है। इसलिए परमाणु कार्यक्रम पर पूर्ण विराम अमेरिका की अहम शर्त है।
परमाणु करार पर बढ़ी ‘रार’
ईरान पर अमेरिका-इजरायल युद्ध को स्थाई तौर पर रोकने के लिए इस्लामाबाद में 21 घंटे की वार्ता विफल रही। मध्यपूर्व में स्थाई शांति, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह रोकना और होर्मुज स्ट्रेट को खोलने के लिए चल रही वार्ता पर दुनियाभर की नजर थी। इसके विफल रहने के पीछे अहम वजह होर्मुज पर ईरान का नियंत्रण और उसका परमाणु कार्यक्रम ही है।
अमेरिका नहीं चाहता है कि किसी भी हालत में ईरान के पास परमाणु बम हो। वह हर हाल में ईरान का परमाणु कार्यक्रम खत्म या सीमित करना चाहता है, लेकिन ईरान इसे एक देश का अधिकार मानता है।
ईरान-अमेरिका वार्ता भी इसकी वजह से सफल नहीं हो सकी। दरअसल परमाणु कार्यक्रम पर अमेरिकी दबाव ईरान को अस्वीकार है। उसका कहना है कि यूरेनियम संवर्धन वह पूरी तरह खत्म नहीं कर सकता, लेकिन परमाणु हथियार नहीं बनाएगा।
ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद से ही अमेरिका और ईरान के बीच भरोसे में कमी आनी शुरू हो गई थी। अमेरिका को ईरान पर जरा भी एतबार नहीं है।
2015 में अमेरिका डील से बाहर निकल गया
2003 में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि ईरान चोरी छिपे परमाणु हथियार बनाने की कोशिशों में लगा हुआ है। इसके आधार पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने ईरान पर प्रतिबंध लगाए। 2006 में ईरानी कंपनियों की संपत्ति, जो विदेशों में थी, उसे फ्रीज कर दिया गया और ईरान में यूरेनियम संवर्धन पर प्रतिबंध लगाया गया।
इसके अगले साल यानी 2007 में ईरान के हथियार खरीदने पर प्रतिबंध लगाया गया। ईरान की अर्थव्यवस्था पर सबसे गहरी चोट तब पहुँची, जब ईरानी सेंट्रल बैंक और तेल निर्यात पर रोक लगा दी गई।
2015 में ईरान के परमाणु बम नहीं बनाने को लेकर एक बड़ा समझौता हुआ था। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा की अगुवाई में ईरान और दुनिया के बड़े देशों जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस, चीन के बीच JCPOA (Joint Comprehensive Plan of Action) समझौता हुआ था।
उस वक्त ईरान ने माना था कि वो यूरेनियम संवर्धन का स्तर निम्न रखेगा, स्टॉकपाइल सीमित करेगा और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी को अपने प्लांट के निरीक्षण की इजाजत देगा। समझौते के बाद उस पर लगी आर्थिक पाबंदियाँ हटा दी गईं।
अमेरिका और इजराइल का मानना था कि इससे ईरान परमाणु बम नहीं बना पाएगा और अगर चोरी-छिपे बनाता भी है, तो इसमें काफी समय लगेगा। लेकिन, 2018 में अमेरिका इस डील से बाहर निकल गया। राष्ट्पति ट्रंप का मानना था कि डील एक तरफा और कमजोर है। इसमें ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों पर रोक नहीं लगी है। प्रॉक्सी ग्रुप्स (जैसे हिजबुल्लाह, हूती हमास) पर कोई रोक नहीं है और 10-15 साल बाद ईरान फिर से खुलकर परमाणु कार्यक्रम चला सकता है। इसके बाद ईरान ने भी धीरे-धीरे डील तोड़ी। उसने यूरेनियम 60% तक संवर्धित करना शुरू कर दिया। हालाँकि परमाणु बम के लिए ये संवर्धन 90% जरूरी होता है। स्टॉकपाइल बढ़ा दिया और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी से सहयोग करना कम कर दिया।
10 साल बाद यानी 2025-26 में जब ईरान पर संयुक्त राष्ट्र का प्रतिबंध हटने वाला था, लेकिन JCPOA का उल्लंघन करने, 60 फीसदी से ज्यादा यूरेनियम संवर्धन करने और परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के जुर्म में उस पर ज्यादा कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए। हालाँकि ईरान कहता रहा कि उसका परमाणु कार्यक्रम ऊर्जा और चिकित्सीय उद्देश्यों के लिए है, लेकिन अमेरिका नहीं माना।
ईरान के साथ बातचीत के बीच अमेरिका ने चेतावनी दी और अंत में इजरायल के साथ मिलकर 28 फरवरी 2026 को हमला कर दिया।
क्या सुरक्षा की गारंटी है परमाणु हथियार
अमेरिका के धूर विरोधी उत्तर कोरिया और ईरान दोनों ही देश हैं। दोनों देशों के संबंध रूस और चीन के साथ अच्छे हैं। लेकिन, अमेरिका उत्तर कोरिया पर हमला करने की हिम्मत नहीं करता, लेकिन ईरान पर हमला करता है। इसकी एक अहम वजह ईरान का परमाणु शक्ति संपन्न नहीं होना भी है।
अगर उत्तर कोरिया की तरह ईरान के पास परमाणु बम होता, तो इजरायल और अमेरिका दोनों ही देश उस पर हमला करने से पहले सौ बार सोचते। दरअसल अमेरिका को डर रहता है कि अगर उसने उत्तर कोरिया को छेड़ा, तो उस तक युद्ध की आँच पहुँच जाएगी। उत्तर कोरिया के पास ऐसे मिसाइल मौजूद हैं, जिससे अमेरिका को टारगेट किया जा सकता है।
अगर ईरान को ‘परमाणु बम’ मिल जाए तो क्या होगा?
अगर ईरान परमाणु हथियार बना लेता है, तो मध्यपूर्व में क्षेत्रीय असंतुलन पैदा होने का तर्क अमेरिका देता रहा है। ईरान के पड़ोसी देशों सऊदी अरब, कतर, यूएई, बहरीन, तुर्की, इजरायल समेत सभी देश परमाणु हथियार बनाने की होड़ में शामिल हो सकते हैं। इससे पूरे मध्यपूर्व और पूरी दुनिया को खतरा पैदा होगा। फिलहाल इस्लामिक देशों में सिर्फ पाकिस्तान के पास परमाणु बम है, इसकी धौंस वह भारत पर भी जमाता रहता है।
अमेरिका का करीबी देश इजरायल परमाणु संपन्न है, इसके बावजूद ईरान का परमाणु शक्ति संपन्न होना उसकी सुरक्षा के लिए खतरनाक है। 1979 में इस्लामिक क्रांति से पहले ईरान के इजरायल से काफी अच्छे संबंध थे। 1950 में ईरान ने इजरायल को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता दी थी। ऐसा करने वाली ईरान उन शुरुआती देशों में शामिल था, जिन्होंने इजरायल को राष्ट्र के रूप में स्वीकारा, लेकिन इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान ने उसे ‘दुश्मन देश’ करार दिया और विश्व मानचित्र से हटाने की बात कही। जाहिर तौर पर इजरायल के लिए ईरान का परमाणु शक्ति संपन्न होना खतरे की घंटी होगी। इसके अलावा हमास से तो इजरायल का युद्ध लंबे वक्त तक चला। हमास को कमजोर करने में वह सफल रहा है, लेकिन ईरान के परमाणु संपन्न होने से हमास एक बार फिर सामरिक और राजनीतिक रूप से ‘जीवित’ हो सकता है।
हिज्बुल्लाह, हूती, हमास जैसे आतंकियों तक परमाणु बम पहुँच सकते हैं
ईरान के परमाणु बम बना लेने से लेबनान का हिज्बुल्लाह, यमन के हूती, फिलिस्तीन के हमास जैसे संगठन काफी ताकतवर हो सकते हैं। इन संगठनों को ईरान मदद करता है और ये संगठन लगातार इजरायल और मध्यपूर्व के देशों के खिलाफ आतंकी कार्रवाई को अंजाम देते हैं। ऐसे में इन आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई को ईरान परमाणु बम का धौंस दिखा कर रोकने की कोशिश कर सकता है। इसके बाद ये आतंकी संगठन बेखौफ होकर आक्रामक गतिविधियों को अंजाम दे सकते हैं। ईरान को इनकी मदद करने में कोई दिक्कत भी नहीं होगी, क्योंकि उसे किसी का डर नहीं होगा।
जो ईरान अभी होर्मुज स्ट्रेट पर कंट्रोल कर अमेरिका को वार्ता की मेज तक आने के लिए मजबूर कर दिया। दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर डालने में कामयाब रहा, वह हूतियों के माध्यम से लाल सागर पर भी नियंत्रण कर लेगा। होर्मुज की तरह लाल सागर भी दुनिया के व्यस्ततम मार्गों में एक है। ऐसे में ईरान का प्रभुत्व काफी बढ़ जाएगा। इससे क्षेत्रीय असंतुलन पैदा होगा।
ईरान के परमाणु संपन्न होने से न सिर्फ मध्यपूर्व के देश परमाणु बनाने की होड़ में शामिल हो जाएँगे, बल्कि दुनियाभर में परमाणु बम बनाने की एक सनक सवार हो सकती है। परमाणु अप्रसार को रोकने के लिए वैश्विक परमाणु अप्रसार संधि यानी एनपीटी कमजोर पड़ सकता है। परमाणु संपन्न देश अपने एटमी बमों और हथियारों को दुनिया में न फैलाएँ और धीरे-धीरे दुनिया परमाणु निरस्त्रीकरण की ओर बढ़े, ये इसका उद्देश्य है, लेकिन ईरान जैसे ‘गैर जिम्मेदार’ देशों के पास परमाणु हथियारों का पहुँचना, पूरी दुनिया के लिए खतरनाक है।
सुप्रीम कोर्ट ने 24 मार्च 2026 को आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। उसमें साफ कहा गया कि सिर्फ हिंदू, बौद्ध और सिख लोग ही अनुसूचित जाति समुदाय के सदस्य बन सकते हैं और अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) कानून के तहत सुरक्षा माँग सकते हैं। इसमें बताया गया कि अगर कोई दूसरा धर्म अपना ले, चाहे ईसाई हो या इस्लाम तो कन्वर्जन होते ही अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत और पूरी तरह खत्म हो जाता है, भले ही जन्म से वो कुछ भी हो।
जैसा कि सबको पहले से पता था, यह बात वामपंथियों और उदारवादी ढोंगियों को बहुत बुरा लगी। ये लोग दूसरे मौकों पर कहते हैं कि न्यायपालिका देश का सबसे बड़ा संवैधानिक संस्थान है और हमें उसके फैसलों का सम्मान करना चाहिए, लेकिन सिर्फ तब जब वो फैसला उनके फायदे का हो। यह उनकी लोकतंत्र, मीडिया, चुनाव आयोग और यहाँ तक कि संविधान के बारे में सबसे बड़ी शर्त है। वरना यह गिरोह हमेशा विरोध में खड़ा रहता है, वो भी सही-गलत के आधार पर नहीं बल्कि अपनी विचारधारा और स्वार्थ के आधार पर।
वायर ने सुप्रीम कोर्ट पर लगाया संविधान का पालन न करने का आरोप
‘द वायर’ ने गुरुवार (9 अप्रैल 2026) को एक लेख छापा जिसमें इसी तरह की नाराजगी दिखाई गई और इस नई घटना को पंजाब के ‘दलित ईसाइयों’ से जोड़ दिया गया। कुसुम अरोड़ा ने लिखा, “पंजाब में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने कि ईसाई दलित नहीं माने जा सकते, इससे पूरे राज्य में बेचैनी फैल गई है।” लेख में कहा गया कि यह फैसला पूरे देश में, खासकर उत्तर राज्य के उस समुदाय में, बहुत संवेदनशील मुद्दा बन गया है।
वायर ने लिखा, “2011 की जनगणना के मुताबिक लगभग एक तिहाई (31.9%) आबादी वाला यह राज्य अनुसूचित जातियों का सबसे बड़ा हिस्सा वाला है। यहाँ जाति आधारित भेदभाव की लंबी परंपरा रही है।” अरोड़ा ने चिंथड़ा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के हालिया मामले का हवाला दिया जिसमें एक पादरी ने सुप्रीम कोर्ट से एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) कानून 1989 के तहत सुरक्षा माँगी थी लेकिन उसे मना कर दिया गया।
लेख में शिकायती लहजे में लिखा गया, “इस फैसले ने सुरक्षा देने से इनकार कर दिया जिससे पंजाब के दलित ईसाइयों में काफी चिंता फैल गई है, जो मुख्य रूप से वाल्मीकि, मझबी सिख और आद-धर्मी समुदायों से हैं, जो राज्य की प्रमुख अनुसूचित जाति समूह हैं।”
उसने यह भी जोड़ा कि पंजाब की आबादी में लगभग 1.5 प्रतिशत ईसाई हैं, 2011 की जनगणना के अनुसार और यह संख्या बढ़ रही है क्योंकि गाँवों, कस्बों और शहरों में, खासकर जालंधर, होशियारपुर, कपूरथला, अमृतसर, तरन तारन, गुरदासपुर, फिरोजपुर और पठानकोट जिलों में मझा और दोआबा इलाकों में मंत्रालय और चर्च बन रहे हैं।
लेख में लिखा है, “दलित ईसाई ज्यादातर दोआबा इलाके में रहते हैं, जहाँ 32 प्रतिशत से ज्यादा पंजाबी दलित आबादी है, चाहे वो किसी भी धर्म के हों। वहीं मझा इलाके में वाल्मीकि समुदाय और मझबी सिखों की अच्छी खासी आबादी है, जिनमें ईसाई धर्म अपनाने वालों की भी अच्छी संख्या है।”
लेखिका का मूल तर्क लगता था कि वो देश के कानूनी नियमों को नजरअंदाज कर रही थी। असल में वो चाहती थी कि सबसे ऊपरी अदालत इन नियमों को तोड़कर कन्वर्शन को बढ़ावा दे। ऐसा लगता था जैसे वो चाहती हो कि न्यायपालिका इस काम में मददगार बने।
भाजपा चाहती है एंटी-कन्वर्जन कानून, कोर्ट ने डाला आग में घी: वायर ने किया गैरकानूनी कन्वर्जन का समर्थन
ऐसा कोई हमला भाजपा पर आरोप लगाए बिना कैसे पूरा हो सकता था और अरोड़ा ने निराश नहीं किया। अपने लेख में उन्होंने लिखा, “हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्य के मोगा में ‘बदलाव’ रैली में कहा कि भाजपा पंजाब में एक नया कानून लाकर धार्मिक कन्वर्जन पर रोक लगाएगी। इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का फैसला दलित ईसाइयों के डर को और बढ़ा रहा है, भले ही भाजपा (शाह की पार्टी) पंजाब की राजनीति में बहुत छोटी भूमिका निभाती है।”
यह समझना जरूरी है कि पंजाब में गैरकानूनी कन्वर्जन की समस्या बहुत गंभीर हो गई है, जिससे कई लोग चिंतित हैं। पिछले साल रिपोर्ट्स में सामने आया कि पिछले 24 महीनों में 3.5 लाख लोग ईसाई मजहब में कन्वर्ट हो चुके हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि ये आँकड़े असली विश्वास से ज्यादा धोखे वाली बातों से जुड़े हैं- जैसे बीमारी ठीक करने का झूठा वादा, पैसे और सामान देने का लालच, नौकरी का ऑफर और ऐसी ही दूसरी चीजें।
पंजाब बचाओ मोर्चा ने राज्य में ‘चमत्कारिक इलाज’ से जुड़ी इस महामारी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने का फैसला किया। इसके अध्यक्ष तेजस्वी मिन्हास ने पंजाब में एंटी-कन्वर्जन बिल लाने की माँग की ताकि ‘स्वयंभू बाबाओं और पादरियों’ द्वारा कराए जा रहे कन्वर्जन पर रोक लगे।
संगठन ने बताया, “राज्य में करीब 65,000 पादरी काम कर रहे हैं जो लालच, दबाव और झूठे चमत्कारिक इलाज के जरिए कन्वर्जन करा रहे हैं, जो ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) कानून 1954 और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की कई धाराओं का उल्लंघन है।” उसने यह भी वादा किया कि जो कोई भी ‘गैरकानूनी कन्वर्जन का सबूत’ देगा उसे गोपनीयता और 2 लाख रुपए का इनाम दिया जाएगा।
यह समस्या की गंभीरता दिखाता है। लेकिन मीडिया हाउस इन गतिविधियों को और बढ़ावा देने के लिए तरस रहा है, जो न सिर्फ निर्दोष लोगों को झूठे वादों के सहारे उनके धर्म छोड़ने पर मजबूर करता है बल्कि गरीब और कमजोर लोगों की जान और सेहत को भी खतरे में डालता है, जिन्हें इलाज के लिए डॉक्टर के पास जाना चाहिए न कि ईसाई पादरियों के पास। अरोड़ा वैज्ञानिक सोच या अंधविश्वास की भी परवाह नहीं करती, जो तब बड़ा मुद्दा बन जाता है जब कोई हिंदू किसी संत या साधु के पास जाता है।
‘भेदभाव’ वाली भारत सरकार
इस लेख में वायर ने इंटरव्यूज का इस्तेमाल करके दावा किया कि कोर्ट का फैसला देश में रहने वाले दलित ईसाई और मुस्लिम समुदायों की भावनाओं के खिलाफ है, साथ ही विवादास्पद सच्चर कमेटी की रिपोर्ट का जिक्र करके इन लोगों के बीच पीड़ित होने का भाव जगाने की कोशिश की।
उसने पंजाब के पूर्व अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन प्रोफेसर इमैनुएल नाहर का हवाला दिया जिन्होंने कहा, “मजहबी सिख और रविदासिया को 1956 में अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल किया गया था, जब संसद ने संविधान में पहला संशोधन पास किया, और 1990 में दूसरे संशोधन के बाद बौद्धों को जोड़ा गया। ईसाई और मुस्लिमों को खुद अपनी लड़ाई लड़नी पड़ी।”
इमैनुएल नाहर ने आगे कहा कि पंजाब में आद-धर्मी, रविदासिया और रामदासिया सिख समुदाय आरक्षण के जरिए तरक्की कर रहे हैं, लेकिन वाल्मीकि, ईसाई और मुस्लिम जो कन्वर्ट हुए हैं उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है और सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से वे पिछड़े रह गए हैं।
नाहर ने गृह मंत्री को चुनौती दी कि ‘कार्रवाई तो करें लेकिन यह भी बताएँ कि कितने लोगों ने दबाव में धर्म बदला। और कहा कि पंजाब एक अनोखा राज्य है, जिसने कभी ऐसे भावनाओं के आगे झुककर नहीं। उन्होंने कहा कि वे सांसदों से संपर्क करेंगे और उनसे मुद्दा उठाने और राष्ट्रपति के हस्तक्षेप की माँग करने को कहेंगे।
हालाँकि ये मनमाने सवाल तुरंत जवाब न दें, लेकिन गैरकानूनी कन्वर्जन का लगातार समर्थन करने से एक गहरी साजिश का पता चलता है। इसके अलावा, यह ‘अनोखा’ संवेदनशील बॉर्डर वाला राज्य अपनी जनसांख्यिकी बदलने वाली बुरी साजिशों से जूझ रहा है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है, खासकर बाहरी मिशनरियों की वजह से जैसा हाल ही में राजस्थान में देखा गया।
पंजाब क्रिश्चियन मूवमेंट के अध्यक्ष हमीद मसीह ने भी यही कहा और 1950 के राष्ट्रपति आदेश का जिक्र किया जिसमें अनुसूचित जाति का दर्जा सिर्फ हिंदुओं तक सीमित रखा गया था। उन्होंने कहा, “कोर्ट मुस्लिमों और ईसाइयों को भारत का मूल निवासी नहीं मानता जबकि हकीकत यह है कि वे यहाँ सदियों से रह रहे हैं।”
मसीह ने शाह पर विभाजनकारी राजनीति करने और विधानसभा चुनावों से पहले सांप्रदायिक भावनाएं भड़काने का आरोप लगाया। उसने कहा, “कोर्ट ने जाति व्यवस्था को नजरअंदाज किया और सिर्फ धार्मिक कन्वर्जन पर फोकस किया।” उसने सवाल दागा कि अगर कोई ईसाई हिंदू धर्म अपना ले तो क्या कोर्ट उसे (मूल) भारतीय नागरिक मानेगा?
उन्होंने दोहराते हुए कहा, “देखिए, सिर्फ दलितों को अनुसूचित जाति श्रेणी के तहत आरक्षण मिलता है। बाकी, मुस्लिमों और ईसाइयों सहित, भेदभाव का शिकार हैं।” उसने आगे कहा, “पंजाब के दलित ईसाई या तो प्राइवेट सेक्टर में काम करते हैं या मजदूरी करते हैं, जिससे उनकी आर्थिक तरक्की का कोई स्कोप नहीं है। चर्च में कम से कम उन्हें बराबरी और सम्मान मिलता है, जो उन्हें दूसरे धर्मों में नहीं मिलता। यही नहीं, उसने कहा कि पंजाब सरकार में ईसाइयों के लिए कोई नौकरी का प्रावधान नहीं है।
मसीह ने जोर दिया कि चर्च में कोई भेदभाव नहीं है और यही अब्राहमिक मजहबों द्वारा दूसरों को कन्वर्ट करने का मुख्य हथियार है, बराबरी के नाम पर। जाति की अवधारणा वे हिंदू धर्म से जोड़ते हैं। तो क्या यह उनकी आरक्षण की माँग को कमजोर नहीं करता?
जब उनके अपनाए गए धर्म में जाति को मान्यता ही नहीं है तो उन पर भेदभाव कैसे हो सकता है? कन्वर्जन का मूल मकसद तो अपने मूल जड़ों से जुड़ाव तोड़कर इस प्रथा से आजादी पाना है ना? फिर उन्हें जाति आधारित आरक्षण के फायदे क्यों मिलने चाहिए? क्या वे मूल धर्म से अलग हो गए लेकिन फिर भी जाति से बंधे रहना चाहते हैं? यहाँ तो विडंबना भी मर जाती है।
आरक्षण के लिए ‘पीड़ित’ होने का रोना
पूरी लेख पूरी तरह से विरोधाभासों से भरा है, जहाँ कन्वर्जन के बाद बराबरी का दावा किया जा रहा है और साथ ही भेदभाव का रोना रोया जा रहा है तथा आरक्षण की माँग की जा रही है। पेंदू मजदूर यूनियन के अध्यक्ष तारसेम पीटर ने कहा, “यह सरासर भेदभाव है कि पंजाब में दलित सिख, हिंदू और बौद्ध आरक्षण का फायदा उठाते हैं, लेकिन जो दलित ईसाई बन जाते हैं वे गरीबी में पड़ जाते हैं क्योंकि वे अल्पसंख्यक श्रेणी में आ जाते हैं।”
उनके मुताबिक मोदी सरकार ने विदेशी फंडिंग बंद कर देने के बाद कई पादरियों ने अपने खुद के मंत्रालय शुरू कर दिए। उसने आगे कहा, “इस बदलाव के बाद मंत्रालयों की संख्या बहुत बढ़ गई है, जो लोगों से आर्थिक और शारीरिक हालत में चमत्कारिक बदलाव का वादा और प्रचार करते हैं।”
पीटर ने कहा कि सरकारें और राजनेता सिस्टम का फायदा उठाते हैं और फिर तुरंत भगवा पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और ‘गोदी’ मीडिया पर गैरकानूनी कन्वर्जन रोकने की कोशिश का आरोप लगाया।
उन्होंने स्वीकार किया कि विदेश से निवेश लोगों को कन्वर्ट करने के लिए आ रहा था, जिसकी वजह से फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल लाया गया। इसके अलावा, मुस्लिम और ईसाई समुदाय दलितों के लिए बने खास कानूनों के हकदार कैसे हो सकते हैं? क्या हिंदू उन नियमों का हक जता सकते हैं जो पहले वाले को खुश करने के लिए बनाए गए, जैसे मुस्लिम पर्सनल लॉ, जो दूसरे सबसे बड़े मजहबी समूह को कानून तोड़ने की छूट देता है।
क्रिश्चियन जसबीर संधू ने कहा, “सरकार अमृत काल और डिजिटल इंडिया की बात करती है, तो हमारे साथ यह भेदभाव क्यों? हमें हमारी तकलीफ समझनी चाहिए।” उन्होंने दलित ईसाइयों की गंभीर आर्थिक मुश्किलों का जिक्र किया और भाजपा पर मुद्दे का राजनीतिक फायदा उठाने का आरोप लगाया, फैसले पर चिंता जताई।
संधू ने गुस्से में कहा, “भाजपा जानती है कि ज्यादातर अल्पसंख्यक उन्हें सपोर्ट नहीं करते। पंजाब विधानसभा चुनाव अगले साल जल्दी होने वाले हैं, इसलिए वे इस मुद्दे को उठाकर वोट माँग रहे हैं। शायद भाजपा को पता नहीं कि पंजाब में नफरत का बीज कभी नहीं जमता। पंजाबी हमेशा साथ रहते हैं, चाहे जाति या धर्म कुछ भी हो।”
सबसे पहले, केंद्र द्वारा शुरू की गई योजनाएँ और कार्यक्रम देश को आगे बढ़ाने के लिए हैं, न कि गैरकानूनी धार्मिक कन्वर्जन को बढ़ावा देने के लिए। लेकिन सरकार को किसी भी ऐसी कार्रवाई का सामना करना पड़ता है जो भारत की सुरक्षा, सामाजिक ढाँचे और राष्ट्रीय हित को नुकसान पहुँचा सकती है।
देश में कई समूह हैं जो आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं लेकिन वे किसी खास मदद की माँग नहीं करते या अपनी स्थिति सुधारने के लिए कुछ नहीं करते। सच्चाई यह है कि वे अक्सर बुरे तत्वों द्वारा कन्वर्जन के मुख्य निशाने बनाए जाते हैं।
संधू ने आगे कहा, “ज्यादातर दलित चर्च जाते हैं लेकिन उन्होंने औपचारिक रूप से ईसाई महजब नहीं अपनाया। साथ ही पंजाब में कुछ कन्वर्टेड ईसाई अभी भी अनुसूचित जाति श्रेणी के तहत फायदे ले रहे हैं।” ये बात साबित करती है कि कुछ लोग आरक्षण का दुरुपयोग और कानून तोड़ रहे हैं।
संधू ने जोर दिया कि चर्च जाना दलित के लिए सामाजिक बराबरी के बारे में है, क्योंकि इससे उनकी जिंदगी और समस्याओं पर कोई असर नहीं पड़ता, और कहा कि न हमारी हालत सुधरी है न हमारी तकलीफें खत्म हुई हैं।
ये विरोधाभास बहुत हैरान करने वाले हैं। अगर चर्च ने उन्हें बराबरी दे दी है तो फिर वे उस भेदभाव का सामना क्यों कर रहे हैं जो उनके धर्म में नहीं है? तुम केक खा भी सकते हो और रख भी सकते हो, ऐसा नहीं होता। कोई उनकी मुश्किलों से इनकार नहीं कर रहा, लेकिन उनकी दलील की कमजोर नींव और माँगों की बेतुकी बात साफ दिख रही है।
हालाँकि यह बहुत जरूरी है कि दलित हिंदुओं के साथ कोई बड़ा अन्याय न हो, उनके हिस्से को चुराकर दूसरों को दे दिया जाए, जो इस गिरोह का मकसद है जो खुद को एससी-एसटी का समर्थक बताता है।
कानूनी लड़ाइयों का जिक्र
लेख में आगे बताया गया कि दलित ईसाई संगठन आरक्षण कोटा के लिए याचिकाएँ दायर करके अभियान चला रहे हैं। इसमें क्रिश्चियन पादरी चिंथड़ा आनंद के मामले का भी जिक्र किया गया जिसमें आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने उन्हें कथित हमले के मामले में एससी/एसटी कानून का दुरुपयोग करने के लिए फटकार लगाई थी। कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता के ईसाई बन जाने की वजह से इस कानून के तहत एफआईआर दर्ज करना गैरकानूनी था।
अरोड़ा ने आगे लिखा, “इस बीच, केंद्र सरकार ने अक्टूबर 2022 में जस्टिस के.जी. बालकृष्णन की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जांच आयोग गठित किया था ताकि यह देखा जा सके कि क्या हिंदू, सिख या बौद्ध के अलावा दूसरे धर्म अपनाने वाले दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जा सकता है, खासकर ईसाई और मुस्लिमों पर फोकस करते हुए।”
उसने आगे लिखा, “आयोग को डॉ. अंबेडकर अनुसूचित जाति अधिकारी कर्मचारी मंच जैसे समूहों से आपत्तियाँ मिली हैं, जो तर्क दे रहे हैं कि कन्वर्ट्स को अनुसूचित जाति का दर्जा देने से मौजूदा लाभार्थियों के अधिकार और फायदे कम हो जाएँगे। जिससे दलित हिंदू समुदाय का इस मुद्दे पर स्टैंड साफ होता है।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है आखिरी फैसला
जस्टिस पीके मिश्रा और एनवी अंजारिया की बेंच ने संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश 1950 के क्लॉज 3 का हवाला दिया जिसमें साफ लिखा है कि ‘हिंदू धर्म के अलावा किसी दूसरे धर्म को मानने वाला कोई भी व्यक्ति’ अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं माँग सकता। सबसे ऊपरी अदालत ने कहा कि यह रोक स्थायी और अपरिवर्तनीय है।
आदेश में कहा गया, “संविधान या संसद या राज्य विधानसभा द्वारा बनाए गए किसी भी कानून के तहत कोई भी वैधानिक फायदा, सुरक्षा या आरक्षण या हक उस व्यक्ति को नहीं मिल सकता या बढ़ाया नहीं जा सकता जो क्लॉज 3 के तहत अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाता। यह रोक पूर्ण है और इसमें कोई अपवाद नहीं। कोई व्यक्ति क्लॉज 3 में बताए गए धर्म के अलावा किसी दूसरे धर्म को मानते और व्यवहार करते हुए अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं बन सकता।”
गैर-भारतीय समुदायों को आरक्षण क्यों नहीं?
गैरकानूनी कन्वर्जन पूरे भारत में एक खतरे में बदल गए हैं और कन्वर्ट्स को अनुसूचित जाति का दर्जा देने से सिर्फ शिकारी मिशनरियों जैसे तत्वों को और ताकत मिलेगी जो इस देश को अपने धर्म में लाने का सुनहरा मौका मानते हैं। साथ ही, कन्वर्जन का घड़ा तो भेदभाव न करने पर आधारित है, फिर वे जाति पर आधारित आरक्षण कैसे माँग सकते हैं? ये दोनों चीजें साथ-साथ नहीं चल सकतीं।
यह दलित हिंदुओं के साथ बहुत बड़ा अन्याय होगा जिन्होंने लालच के बावजूद अपने विश्वास पर टिके रहने का फैसला किया और उन्हें शिक्षा और रोजगार जैसे सही अवसरों से वंचित कर दिया जाएगा। सरकार सिर्फ हिंदू मंदिरों की संपत्ति पर टैक्स लगाती है, जिसका इस्तेमाल जरूरतमंद समुदाय के सदस्यों की मदद के लिए किया जा सकता था। नतीजा यह है कि उन्हें आरक्षण पर निर्भर रहना पड़ता है जबकि मुस्लिम और ईसाई अपने सारे संसाधन अपने समुदाय की तरक्की पर लगा सकते हैं।
दलित हिंदू किसी भी ऐसे कदम के खिलाफ हैं और समुदाय का डर, जो सीधे प्रभावित होगा, को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आखिरकार, भारत पहले ही लव जिहाद, चंगाई सभाओं और अपराधी पादरियों से जुड़ी कन्वर्जन की बड़ी समस्याओं से जूझ रहा है। देश कभी ऐसा कानून नहीं बना सकता जो उनकी बुरी महत्वाकांक्षाओं को और मजबूत करे।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा देकर न्यायिक गलियारों में खलबली मचा दी है। उन्होंने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा भेजकर तत्काल प्रभाव से पद छोड़ने की घोषणा की है। यह इस्तीफा उस समय आया है जब उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया चल रही थी।
पूरा विवाद 14 मार्च 2025 को उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास के एक स्टोररूम में लगी आग से शुरू हुआ था। आग बुझाने के दौरान वहाँ से भारी मात्रा में कैश बरामद हुआ था, जिसके बाद से उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे थे। जस्टिस यशवंत वर्मा ने अब ‘जजों की जाँच समिति’ को एक 13 पन्नों का विस्तृत पत्र लिखा है।
जस्टिस यशवंत वर्मा ने इस पत्र में पूरी घटना को अपने खिलाफ एक सुनियोजित साजिश बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि पूरी जाँच प्रक्रिया में उनके अधिकारों का हनन किया गया और उन्हें अपनी बेगुनाही साबित करने का कोई उचित मौका भी नहीं दिया गया।
छुट्टियों के बीच लगी आग और साजिश का दावा
जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पत्र में स्पष्ट किया कि जिस दिन यह घटना हुई, वे वहाँ मौजूद नहीं थे। वे 12 मार्च 2025 को होली की छुट्टियों के लिए दिल्ली से बाहर गए हुए थे। वे एक ऐसे दुर्गम इलाके में थे जहाँ मोबाइल नेटवर्क बहुत कम काम कर रहा था। उन्हें 15 मार्च की रात करीब सवा एक बजे आग लगने की सूचना मिली। तब तक फायर सर्विस और पुलिस ने न केवल आग बुझा दी थी, बल्कि वहाँ मौजूद कैश के Video भी रिकॉर्ड कर लिए थे।
जस्टिस वर्मा का कहना है कि उन्हें इन Video या कैश के बारे में कोई जानकारी पहले से नहीं थी। उनके वापस आने से पहले ही ये वीडियो Supreme Court की बेवसाइट पर डाल दिए गए। मीडिया में इस खबर को इस तरह पेश किया गया जैसे वह सारा पैसा उनका ही हो। जस्टिस यशवंत वर्मा ने सवाल उठाया कि जब वे वहाँ थे ही नहीं, तो उन्हें इस कैश के लिए जिम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है? उनके अनुसार, यह उन्हें सार्वजनिक रूप से बदनाम करने की एक कोशिश थी।
स्टोररूम का रहस्य और सुरक्षा में सेंध
जस्टिस यशवंत वर्मा ने उस स्टोररूम की बनावट और इस्तेमाल पर भी कई चौंकाने वाले फैक्ट्स रखे हैं। उन्होंने बताया कि वह स्टोररूम मुख्य घर और उनके ऑफिस से बिल्कुल अलग बना हुआ था। वहाँ जाने के लिए पीछे के गेट का इस्तेमाल होता था, जहाँ कोई सुरक्षा तैनात नहीं थी। इस कमरे का इस्तेमाल घरेलु कर्मचारी, मेंटेनेंस स्टाफ और बाहरी लोग पुराना सामान रखने के लिए करते थे। वहाँ अक्सर कबाड़, पुराने बर्तन और बागबानी के औजार रखे जाते थे।
जस्टिस यशवंत वर्मा के मुताबिक, वह कमरा अक्सर बिना ताले के रहता था और चाबी उनके पास नहीं होती थी। वे खुद दो साल में सिर्फ चार या पाँच बार ही उस कमरे में गए थे। सबसे अहम बात यह है कि स्टोररूम के बाहर एक CCTV कैमरा लगा था, लेकिन उसका कंट्रोल जज साहब के पास नहीं था। उन्होंने कई बार इस कैमरे की फुटेज माँगी ताकि सच सामने आ सके, लेकिन जाँच एजेंसियों ने उन्हें फुटेज देने से बार-बार मना कर दिया। जस्टिस वर्मा के अनुसार, उनके पास सुरक्षा का कोई नियंत्रण नहीं था, फिर भी उन्हें जवाबदेह ठहराया गया।
जाँच प्रक्रिया में गंभीर खामियाँ और पक्षपात
जस्टिस वर्मा ने जाँच करने वाली समितियों (IHC और इन्क्वायरी कमेटी) की कार्यप्रणाली पर कड़े प्रहार किए हैं। उन्होंने बताया कि अगस्त 2025 में बनी कमेटी से पहले एक इन-हाउस कमेटी (IHC) ने जाँच की थी। उस समय गवाहों के बयान जस्टिस यशवंत वर्मा की अनुपस्थिति में दर्ज किए गए। उन्हें गवाहों से सवाल पूछने या जिरह करने का कोई मौका नहीं दिया गया। जस्टिस यशवंत वर्मा ने लिखा कि IHC की रिपोर्ट गोपनीय होनी चाहिए थी, लेकिन इसे सार्वजनिक कर दिया गया।
जस्टिस यशवंत वर्मा ने आरोप लगाया कि जाँच समिति ने सिर्फ उन्हीं सबूतों को चुना जो उनके खिलाफ जा सकते थे। जो सबूत जस्टिस यशवंत वर्मा के पक्ष में थे, उन्हें जानबूझकर हटा दिया गया। उदाहरण के तौर पर उन्होंने ‘आधिकारिक फायर रिपोर्ट’ का जिक्र किया। इस सरकारी रिपोर्ट में कहीं भी कैश मिलने का कोई जिक्र नहीं था। साथ ही रिपोर्ट दिखाती थी कि अधिकारी आग बुझने के काफी बाद तक वहाँ मौजूद थे। जस्टिस वर्मा ने जब इस रिपोर्ट को गवाहों के सामने पेश करना चाहा, तो समिति ने उन्हें ऐसा करने की अनुमति नहीं दी।
गवाहों को हटाने का संदिग्ध पैटर्न
पत्र का एक बड़ा हिस्सा गवाहों के साथ हुए व्यवहार पर केंद्रित है। जस्टिस वर्मा ने बताया कि जाँच के दौरान कुल 54 गवाहों में से 27 को बिना कोई कारण बताए हटा दिया गया। इसमें दिल्ली फायर सर्विस और दिल्ली पुलिस के वे वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे, जिनकी गवाही से यह सच सामने आ सकता था कि कैश को लेकर क्या खेल हुआ। जिरह में यह बात सामने आई थी कि बड़े अफसरों ने रात 12:15 बजे ही तय कर लिया था कि वे कैश मिलने की बात सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं करेंगे।
जस्टिस यशवंत वर्मा का तर्क है कि उस समय तक तो उन्हें आग की खबर भी नहीं थी, तो इसमें उनकी मिलीभगत कैसे हो सकती है? जैसे ही यह तथ्य सामने आया, उन अधिकारियों को गवाहों की सूची से निकाल दिया गया। इसी तरह उनके 3 निजी सुरक्षा अधिकारियों (PSO) के मामले में भी खेल हुआ। जब जस्टिस वर्मा ने उनके मोबाइल लोकेशन और गूगल रिकॉर्ड्स की जाँच की माँग की ताकि उनके झूठ को पकड़ा जा सके, तो कमेटी ने तुरंत तीनों PSO को गवाह के रूप में हटा दिया।
साबित करने का उल्टा भार और इस्तीफा
जस्टिस यशवंत वर्मा ने बड़े दुख के साथ लिखा कि उनके 13 साल के न्यायिक करियर में उन पर कभी भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा। इस मामले में भी उन पर सीधे कोई आरोप या सबूत नहीं है। पूरी जाँच सिर्फ ‘अनुमानों’ और ‘इशारों’ पर आधारित है। उनसे यह उम्मीद की गई कि वह उन बातों को गलत साबित करें जो उन्होंने की ही नहीं। आमतौर पर अभियोजन को दोष साबित करना होता है, लेकिन यहाँ जज साहब से अपनी बेगुनाही का सबूत माँगा जा रहा था।
जस्टिस यशवंत वर्मा ने लिखा कि उनसे ‘मल्टीपल नेगेटिंव’ साबित करने को कहा गया, जो कानून के सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्हें लगा कि यह जाँच केवल उन्हें हटाने के मकसद से की जा रही है, न कि सच जानने के लिए। अंत में उन्होंने फैसला किया कि वह इस अपमानजनक और अन्यायपूर्ण प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बने रहेंगे। जस्टिस यशवंत वर्मा ने इस्तीफा देते हुए लिखा कि वह संस्था के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते हैं और आत्मसम्मान के लिए पद छोड़ रहे हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि इतिहास एक दिन उनके साथ हुए इस व्यवहार का हिसाब जरूर करेगा।
दुनिया इस समय एक ऐसे आर्थिक और भू-राजनीतिक संकट से गुजर रही है, जहाँ एक क्षेत्र में हुआ तनाव पूरे वैश्विक बाजार को प्रभावित कर रहा है। मीडिल ईस्ट में ईरान से जुड़े हालात, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बाधित आवाजाही और कच्चे माल की सप्लाई में आई रुकावटों के बीच अब चीन ने एक बड़ा कदम उठाया है।
चीन ने संकेत दिया है कि वह मई 2026 से सल्फ्यूरिक एसिड के निर्यात पर लगभग पूरी तरह रोक लगा देगा। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पहले से ही सल्फर की कमी और कीमतों में उछाल से वैश्विक बाजार दबाव में है। इस कदम का असर सिर्फ केमिकल सेक्टर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खाद, धातु, कृषि और महँगाई तक इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिलेगा।
Chinese authorities have announced that China will not be allowed to export sulphuric acid from next month, with the only exception being electronic‑grade sulphuric acid. This means that neither smelter acid nor sulphur‑based acid can be exported will be able to be exported.…
चीन ने अपने घरेलू बाजार को प्राथमिकता देते हुए सल्फ्यूरिक एसिड के निर्यात को रोकने की तैयारी कर ली है। इस प्रतिबंध में केवल इलेक्ट्रॉनिक-ग्रेड सल्फ्यूरिक एसिड को छूट दी जाएगी, जबकि स्मेल्टर से बनने वाला एसिड और सल्फर आधारित एसिड निर्यात के दायरे से बाहर हो जाएँगे।
यह फैसला इसलिए बेहद अहम है क्योंकि चीन इस क्षेत्र का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक है। 2025 में उसने लगभग 4.6 मिलियन टन सल्फ्यूरिक एसिड निर्यात किया था। चिली, इंडोनेशिया, मोरक्को, सऊदी अरब और भारत जैसे देश इस पर काफी हद तक निर्भर हैं।
2026 की शुरुआत में ही चीन ने जनवरी से अप्रैल तक निर्यात कोटा लागू कर दिया था, जिससे सप्लाई पहले ही घट चुकी थी। अब पूरी तरह प्रतिबंध लगने से बाजार में अचानक बड़ा गैप पैदा हो सकता है। चीन का यह कदम यह भी दिखाता है कि जब वैश्विक संकट गहराता है, तो देश अपनी घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता देते हुए वैश्विक सप्लाई चेन की परवाह कम करने लगते हैं।
मिडिल ईस्ट में संकट और सप्लाई चेन पर उसका असर
इस फैसले के पीछे सबसे बड़ा कारण मिडिल ईस्ट में चल रहा संघर्ष है। ईरान से जुड़े घटनाक्रम के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई है। यह जलमार्ग दुनिया के सबसे अहम व्यापारिक रास्तों में से एक है, जहाँ से तेल, गैस और उनसे जुड़े उत्पादों की सप्लाई होती है।
सल्फर सल्फ्यूरिक एसिड का मुख्य कच्चा माल है और मुख्य रूप से तेल और गैस रिफाइनिंग से निकलता है। दुनिया के कुल सल्फर उत्पादन का बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट से आता है और समुद्री व्यापार का लगभग आधा हिस्सा इसी क्षेत्र पर निर्भर करता है।
चीन खुद अपनी जरूरत का 50% से ज्यादा सल्फर आयात करता है और उसमें भी मिडिल ईस्ट की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बाधित हुआ, तो यह सप्लाई लगभग कट गई। इसका सीधा असर चीन के घरेलू बाजार पर पड़ा, जहाँ कच्चे माल की कमी और कीमतों में तेजी देखने को मिली।
यही वजह है कि चीन ने निर्यात रोककर अपनी आंतरिक जरूरतों को सुरक्षित करने का रास्ता चुना।
कीमतों में उछाल और वैश्विक बाजार पर दबाव
जैसे ही कच्चे माल की सप्लाई प्रभावित हुई, सल्फर की कीमतों में तेज उछाल आया। इसका सीधा असर सल्फ्यूरिक एसिड पर पड़ा, जिसकी कीमतें भी तेजी से बढ़ने लगीं। अब चीन के निर्यात रोकने से यह दबाव और ज्यादा बढ़ने की संभावना है। सल्फ्यूरिक एसिड फॉस्फेट आधारित खाद बनाने में बेहद जरूरी होता है।
ऐसे में इसकी कमी का मतलब है कि खाद उत्पादन महँगा हो जाएगा। इससे वैश्विक स्तर पर कृषि लागत बढ़ेगी और खाद्य पदार्थों की कीमतों पर भी असर पड़ेगा। इसके अलावा कॉपर माइनिंग में भी इसका महत्वपूर्ण उपयोग होता है। चिली जैसे देश, जो दुनिया के सबसे बड़े कॉपर उत्पादक हैं, वहाँ उत्पादन का बड़ा हिस्सा सल्फ्यूरिक एसिड पर निर्भर करता है।
सप्लाई में कमी आने से कॉपर उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे धातु बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं। पहले से ही कुछ देशों में कीमतों में तेज वृद्धि देखी जा रही है और यदि यह प्रतिबंध पूरे साल जारी रहता है, तो यह स्थिति और गंभीर हो सकती है।
इंडस्ट्री, कृषि और सप्लाई चेन पर गहराता संकट
यह संकट केवल एक उत्पाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक चेन रिएक्शन की तरह पूरी इंडस्ट्री को प्रभावित कर रहा है। सल्फर की कमी से उत्पादन लागत बढ़ती है, जिससे सल्फ्यूरिक एसिड महँगा होता है और फिर इसका असर खाद, केमिकल और मेटल इंडस्ट्री पर पड़ता है।
इस समय स्थिति और जटिल इसलिए है क्योंकि सप्लाई के पारंपरिक रास्ते बाधित हैं। मिडिल ईस्ट के प्रमुख बंदरगाह, जहाँ से सल्फर का निर्यात होता है, सभी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर निर्भर हैं। यदि यह मार्ग लंबे समय तक बंद रहता है, तो सप्लाई में बड़ा अंतर पैदा हो सकता है।
चीन के पास भी सीमित स्टॉक है, जो केवल कुछ हफ्तों या महीनों तक ही चल सकता है। हालाँकि देश वैकल्पिक स्रोतों जैसे उत्तरी अमेरिका या पूर्वी एशिया से आयात बढ़ाने की कोशिश कर सकता है, लेकिन इतनी बड़ी कमी को पूरी तरह भर पाना आसान नहीं होगा।
इसके अलावा यह समय कृषि के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, जब बुवाई के लिए खाद की माँग सबसे ज्यादा होती है। ऐसे में सप्लाई और डिमांड के बीच का अंतर और ज्यादा बढ़ सकता है।
भारत पर असर: महँगाई, खेती और उद्योग पर दबाव
भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकती है। भारत भी चीन से सल्फ्यूरिक एसिड आयात करने वाले प्रमुख देशों में शामिल है, इसलिए इस फैसले का सीधा असर यहाँ देखने को मिलेगा। सबसे पहले फॉस्फेट आधारित खाद की कीमतों में बढ़ोतरी होगी। DAP जैसे खाद के उत्पादन में सल्फ्यूरिक एसिड की बड़ी भूमिका होती है।
इसकी कीमत बढ़ने से किसानों की लागत बढ़ेगी और खेती महँगी हो जाएगी। जब खेती की लागत बढ़ती है, तो इसका असर सीधे खाद्य पदार्थों की कीमतों पर पड़ता है। इससे आम लोगों के लिए महँगाई बढ़ सकती है। इसके अलावा केमिकल और मेटल इंडस्ट्री पर भी दबाव बढ़ेगा।
उत्पादन लागत बढ़ने से कंपनियों को या तो कीमतें बढ़ानी होंगी या उत्पादन कम करना पड़ेगा। इससे आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है। भारत को अब वैकल्पिक स्रोतों से आयात करना पड़ेगा, जो संभवतः महँगे होंगे। इससे व्यापार संतुलन और विदेशी मुद्रा पर भी दबाव बढ़ सकता है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए संकेत
चीन का यह फैसला यह दिखाता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था कितनी ज्यादा आपस में जुड़ी हुई है और किसी एक क्षेत्र में संकट कैसे पूरी दुनिया को प्रभावित कर सकता है। यदि मिडिल ईस्ट में स्थिति जल्दी सामान्य नहीं होती और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज लंबे समय तक बाधित रहता है, तो यह संकट और गहरा सकता है।
ऐसे में सल्फर, सल्फ्यूरिक एसिड, खाद और धातुओं की कीमतों में लगातार अस्थिरता बनी रह सकती है। दुनिया के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह वैकल्पिक सप्लाई स्रोतों को कितनी जल्दी और प्रभावी तरीके से विकसित कर पाती है। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो यह संकट अस्थायी नहीं रहेगा, बल्कि लंबे समय तक वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बनाए रखेगा।
यानी यह स्थिति केवल एक कमोडिटी की समस्या नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक आर्थिक संकट का संकेत है, जिसमें भू-राजनीति, व्यापार और संसाधनों की उपलब्धता सभी एक साथ प्रभावित हो रहे हैं। भारत जैसे देशों के लिए यह समय सतर्क रहने और वैकल्पिक रणनीतियाँ तैयार करने का है, ताकि इस वैश्विक झटके का असर कम किया जा सके।
पश्चिम एशिया की जटिल राजनीति के बीच कुर्दों की कहानी एक ऐसे समुदाय की दास्तान है, जिसे बार-बार इस्तेमाल किया गया, लेकिन कभी स्थायी पहचान या भरोसेमंद समर्थन नहीं मिला। डोनाल्ड ट्रंप के रविरा (05 अप्रैल 2026) के उस बयान ने इस बहस को फिर से जिंदा कर दिया, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि ईरान विरोधी कुर्द समूहों को अमेरिका की तरफ से हथियार दिए गए थे।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार (05 अप्रैल 2026) को एक चौंकाने वाला खुलासा किया। उन्होंने स्वीकार किया कि ईरान के सत्ताविरोधी प्रदर्शनकारियों को हथियार पहुँचाने के लिए अमेरिका ने कुर्दों का सहारा लिया था। लेकिन कुर्दों ने वो हथियार अपने पास रख लिए।
जब डोनाल्ड ट्रंप ने यह स्वीकार किया कि अमेरिका ने ईरान के विद्रोही कुर्दों को हथियार पहुँचाए, तो दुनिया को लगा कि शायद अब ईरान की सत्ता पलट जाएगी। लेकिन कुर्दों के पाँव ठिठक गए। वे ईरान की सीमा तक आए, हथियार उनके पास थे, सेना तैयार थी, लेकिन वे अंदर नहीं घुसे। क्यों? क्योंकि उन्हें मालूम था कि जिस दिन अमेरिका का स्वार्थ सिद्ध हो जाएगा, उन्हें फिर से पहाड़ियों में शरण लेनी पड़ेगी।
इतिहास की किताबों में कई ऐसी कौमों का ज़िक्र है जिन्हें वक्त ने बेरहमी से कुचला, लेकिन ‘कुर्द’ (Kurds) एक ऐसी पहचान हैं जिन्हें वक्त के साथ-साथ दुनिया की हर बड़ी महाशक्ति ने इस्तेमाल किया और फिर बीच मझधार में मरने के लिए छोड़ दिया। ईरान में जो हुआ, वह उसी ‘ऐतिहासिक डर’ और ‘अतीत के ज़ख्मों’ का ताज़ा अध्याय है।
कौन हैं कुर्द?
कुर्द दुनिया के सबसे बड़े जातीय समूह हैं, जिनकी अपनी कोई स्वतंत्र राष्ट्र नहीं है। अनुमानित 30 से 45 मिलियन की आबादी वाले ये लोग मुख्य रूप से तुर्की, ईरान, इराक और सीरिया में बंटे हुए हैं। उनकी भूमि जिसे वे कुर्दिस्तान कहते हैं, पहाड़ी इलाकों में फैली हुई है खासकर टॉरस और ज़ाग्रोस पर्वत श्रृंखलाओं के बीच। कुर्द भाषा इंडो-ईरानी परिवार की है, जिसमें कुर्मांजी (तुर्की, सीरिया में प्रमुख) और सोरानी (इराक, ईरान में) मुख्य बोलियाँ हैं। अधिकांश कुर्द सुन्नी मुस्लिम हैं, लेकिन यजीदी, शिया, ईसाई और अन्य अल्पसंख्यक समूह भी हैं। उनकी संस्कृति में लोकगीत, नृत्य, कविता और स्वतंत्रता की भावना गहराई से जुड़ी हुई है।
कुर्दों का इतिहास सदियों पुराना है। प्राचीन काल में वे मेडेस जैसे समूहों से जुड़े माने जाते हैं, जिन्होंने 612 ईसा पूर्व असिरिया साम्राज्य को हराया था। इस्लाम के आगमन के बाद सातवीं शताब्दी में ‘कुर्द’ शब्द प्रचलित हुआ। सलाहुद्दीन अय्यूबी जैसे कुर्द योद्धा ने क्रूसेडर्स के खिलाफ लड़ाई लड़ी, लेकिन आधुनिक युग में उनकी नियति धोखे और दमन की रही।
आधुनिक काल में मिले सिर्फ धोखे, 100+ साल से भटक रहे
कुर्दों के साथ धोखे की शुरुआत आज की नहीं है, यह एक सदी पुरानी है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद जब ऑटोमन साम्राज्य (Ottoman Empire) ढह रहा था, तब कुर्दों को पहली बार एक स्वतंत्र राष्ट्र का सपना दिखाया गया था।
दरअसल, प्रथम विश्व युद्ध के बाद जब ओटोमन साम्राज्य का पतन हुआ, तब 1920 की सेवरेस की संधि में कुर्दिस्तान नाम के एक स्वतंत्र देश का प्रस्ताव रखा गया था। लेकिन जैसे ही तुर्की में मुस्तफा कमाल अतातुर्क का उदय हुआ, ब्रिटेन और फ्रांस ने अपने रणनीतिक हितों के लिए पाला बदल लिया। 1923 में Treaty of Lausanne हुई, जिसमें ‘कुर्दिस्तान’ के वादे को कूड़ेदान में डाल दिया गया। कुर्दों को चार अलग-अलग देशों तुर्की, इराक, सीरिया और ईरान के बीच बाँट दिया गया। यह वह पहला बड़ा विश्वासघात था जिसने कुर्दों को ‘दुनिया का सबसे बड़ा जमीन विहीन अल्पसंख्यक’ बना दिया।
आज कुर्दों की कुल आबादी लगभग 3.5 से 4 करोड़ के बीच है। वे मध्य पूर्व के एक ऐसे पहाड़ी क्षेत्र में रहते हैं जिसे अनौपचारिक रूप से ‘कुर्दिस्तान’ कहा जाता है, लेकिन नक्शे पर ऐसा कोई देश मौजूद नहीं है।
तुर्की में बुरी तरह से दमन
तुर्की में कुर्दों को लंबे समय तक अपनी पहचान के लिए संघर्ष करना पड़ा। तुर्किए की सरकार ने उन्हें ‘पहाड़ी तुर्क’ कहकर उनकी अलग पहचान से इनकार किया और उनकी भाषा तथा संस्कृति पर पाबंदियाँ लगाईं। इसके जवाब में PKK (Kurdistan Workers’ Party) ने 1980 के दशक में सशस्त्र संघर्ष शुरू किया, जो आज तक जारी है। इस संघर्ष में अब तक हजारों लोग मारे जा चुके हैं और कुर्द इलाकों में भारी सैन्य कार्रवाई होती रही है। हाल के वर्षों में तुर्की ने उत्तरी सीरिया में भी कुर्दों के खिलाफ सैन्य ऑपरेशन चलाए, जिससे वहाँ बने उनके स्वायत्त क्षेत्र कमजोर पड़ गए।
इराक के सद्दाम काल में हुआ कत्लेआम
इराक में कुर्दों का अनुभव भी बेहद दर्दनाक रहा है। सद्दाम हुसैन के शासन में 1988 का हलब्जा केमिकल अटैक कुर्द इतिहास का सबसे काला अध्याय माना जाता है, जिसमें रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल से हजारों लोगों की मौत हुई। हालाँकि 1991 के खाड़ी युद्ध के बाद अमेरिका की दखल से उत्तरी इराक में कुर्दों के लिए ‘नो-फ्लाई ज़ोन’ बनाया गया और बाद में उन्हें सीमित स्वायत्तता मिली। 2005 में कुर्दिस्तान रीजनल गवर्नमेंट की स्थापना हुई, लेकिन 2017 में स्वतंत्रता जनमत संग्रह के बाद इराकी सरकार ने कई विवादित इलाकों पर दोबारा नियंत्रण कर लिया, जिससे कुर्दों की स्थिति फिर कमजोर हो गई।
दरअसल, 2003 में अमेरिकी आक्रमण के बाद सद्दाम का पतन हुआ और उत्तरी इराक में ‘कुर्दिस्तान स्वायत्त क्षेत्र’ बना। आज यही वह एकमात्र इलाका है जिसे कुर्द अपनी ‘सुरक्षित जमीन’ मानते हैं। इसी को खोने के डर से वे हाल ही में ईरान में घुसने से हिचक गए।
सीरिया में भी मिला धोखा
सीरिया में कुर्दों ने आईएसआई के खिलाफ लड़ाई में अहम भूमिका निभाई और अमेरिका के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में गिने गए। सीरियाई गृहयुद्ध के दौरान कुर्दों (YPG/SDF) ने वह कर दिखाया जो दुनिया की बड़ी सेनाएँ नहीं कर पाई थीं। उन्होंने जमीनी लड़ाई में ISIS (इस्लामिक स्टेट) के दाँत खट्टे कर दिए। कोबानी की लड़ाई कुर्दों की वीरता का प्रतीक बन गई।
धोखा 2.0: अमेरिका ने ISIS के खिलाफ कुर्दों का भरपूर इस्तेमाल किया। लेकिन 2019 में तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अचानक सीरिया से अमेरिकी सेना हटाने का फैसला कर लिया। इस फैसले ने कुर्दों को उनके सबसे बड़े दुश्मन तुर्की के सामने निहत्था छोड़ दिया। अमेरिका के हटते ही तुर्की ने सीरिया के कुर्द इलाकों पर हमला कर दिया और उस स्वायत्तता को लगभग खत्म कर दिया जिसे कुर्दों ने खून बहाकर हासिल किया था।
तुर्की कुर्दों को अपनी राष्ट्रीय अखंडता के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है। तुर्की के भीतर ‘कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी’ (PKK) पिछले 40 वर्षों से सशस्त्र संघर्ष कर रही है, जिसमें 40,000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। रायटर्स की रिपोर्ट बताती है कि सीरियाई कुर्द आज भी शिविरों में नरकीय जीवन जीने को मजबूर हैं।
तुर्की के भीतर कुर्दों की राजनीतिक पार्टी HDP के नेताओं को जेल में डाल दिया गया है। फिलहाल एक अनौपचारिक सीजफायर या ‘ठहराव’ की स्थिति है, लेकिन यह किसी शांति समझौते की वजह से नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय दबाव और आर्थिक मंदी की वजह से है। तुर्की इस वक्त अपनी लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था और सीरिया में रूस-ईरान के समीकरणों की वजह से सीधे बड़े युद्ध से बच रहा है, लेकिन कुर्दों पर दमन जारी है।
ईरान में लंबे समय से अधिकारों की माँग
ईरान में भी कुर्द लंबे समय से राजनीतिक अधिकारों और सांस्कृतिक स्वतंत्रता की माँग करते रहे हैं। ईरान में महसा अमीनी (जो खुद एक कुर्द थीं) की मौत के बाद भड़के प्रदर्शनों में कुर्द सबसे आगे थे। ट्रंप के खुलासे के मुताबिक, अमेरिका ने कुर्दों को हथियार दिए ताकि वे ईरान के भीतर सशस्त्र विद्रोह कर सकें। ईरान ने भी इसका बदला लेने के लिए इराक के कुर्द इलाकों पर मिसाइलें दागीं।
बीते महीनों में सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान कुर्द इलाकों में कड़ी कार्रवाई हुई, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार किया गया और कई को कठोर सजा दी गई। इसी पृष्ठभूमि में जब अमेरिका की तरफ से हथियारों की आपूर्ति की खबर सामने आई और कुर्द लड़ाके ईरान सीमा तक पहुँचे, तो एक बार फिर इतिहास उनके सामने खड़ा था। उन्हें याद था कि 1975 में अल्जीयर्स समझौते के बाद अमेरिका और ईरान ने अचानक उनका समर्थन वापस ले लिया था और 1991 में खाड़ी युद्ध के दौरान भी उन्हें अधर में छोड़ दिया गया था।
यही कारण है कि इस बार कुर्दों ने बेहद सतर्क रुख अपनाया। उन्हें अमेरिका और इजरायल से कोई स्पष्ट और दीर्घकालिक सुरक्षा गारंटी नहीं मिली थी। साथ ही, उन्हें इस बात का भी डर था कि अगर वे ईरान के खिलाफ खुलकर लड़ाई में उतरते हैं, तो इसका सीधा असर इराक में उनके स्वायत्त क्षेत्र पर पड़ सकता है, जिसे वे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहते। ईरान की सैन्य तैयारियों और सीमा पार हमलों ने भी कुर्दों को पीछे हटने पर मजबूर किया।
रायटर्स की टीम जब उत्तरी इराक (KRG) पहुँची, तो उन्होंने पाया कि कुर्द लड़ाके डरे हुए थे। उन्हें डर था कि अगर वे ईरान में घुसे, तो ईरान की सेना इराक में मौजूद उनकी इकलौती स्वायत्त सरकार को भी तहस-नहस कर देगी। उन्हें अमेरिका पर भरोसा नहीं था कि मुश्किल वक्त में वह उनके बचाव में आएगा। ऐतिहासिक धोखे ने उन्हें यह सिखा दिया है कि “हथियार तो दिए जा सकते हैं, लेकिन सुरक्षा की गारंटी नहीं।”
कुर्दों का इतिहास बताता है कि उन्होंने लगभग हर दशक में किसी न किसी देश में संघर्ष किया है, लेकिन हर बार उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा। लाखों लोग विस्थापित हुए, हजारों गाँव नष्ट हो गए और अनगिनत लोगों की जान गई। इसके बावजूद उन्हें आज तक न तो एक स्वतंत्र राष्ट्र मिला और न ही स्थायी सुरक्षा की गारंटी। तुर्की, इराक, सीरिया और ईरान, चारों देशों में उनकी स्थिति अलग-अलग जरूर है, लेकिन एक चीज समान है: असुरक्षा और अविश्वास।
आज जब कुर्द लड़ाके ईरान की सीमा से लौटे हैं, तो यह सिर्फ एक सामरिक निर्णय नहीं, बल्कि इतिहास से सीखा गया सबक है। उन्होंने यह समझ लिया है कि बाहरी शक्तियों के भरोसे अपनी लड़ाई लड़ना हमेशा जोखिम भरा रहा है। इसलिए इस बार उन्होंने कदम पीछे खींचकर अपनी सीमित स्वायत्तता और अस्तित्व को बचाने को प्राथमिकता दी है। यही वजह है कि सदियों से लड़ने वाले ये योद्धा इस बार ठिठक गए, क्योंकि उन्हें लड़ाई से ज्यादा, अपने भविष्य की चिंता है।
कुर्दों के बारे में कुछ खास बातें
कुर्दों की कहानी सिर्फ युद्ध की नहीं है, बल्कि एक समृद्ध संस्कृति और अटूट जिजीविषा की भी है।
धर्मनिरपेक्ष ढाँचा: कुर्द मुख्य रूप से सुन्नी मुस्लिम हैं, लेकिन उनका समाज काफी हद तक धर्मनिरपेक्ष (Secular) है। उनके समाज में महिलाओं को जो सम्मान और अधिकार मिले हैं, वे मध्य पूर्व के अन्य देशों में दुर्लभ हैं।
महिला लड़ाके (YPJ): सीरिया में ISIS के खिलाफ लड़ाई में महिलाओं की एक पूरी सेना थी। उनका मानना था कि ISIS के आतंकी महिलाओं के हाथों मरने से डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे वे जन्नत नहीं जा पाएँगे।
नोरूज़ (Nowruz): यह कुर्दों का सबसे बड़ा सांस्कृतिक त्यौहार है (नया साल), जो उनकी पहचान और प्रतिरोध का प्रतीक बन गया है।
पेशाबर्गा (Peshmerga): इसका शाब्दिक अर्थ है ‘वे जो मौत का सामना करते हैं’। यह इराकी कुर्दों की आधिकारिक सेना का नाम है।
भाषा का संघर्ष: तुर्की में दशकों तक ‘कुर्दिश’ भाषा बोलने और उसे लिखने पर प्रतिबंध था। कुर्दों को ‘पहाड़ी तुर्क’ कहकर उनकी पहचान मिटाने की कोशिश की गई।
पहाड़ों के अलावा कोई दोस्त नहीं
कुर्दों के बीच एक बहुत प्रसिद्ध कहावत है- ‘No friends but the mountains’ (पहाड़ों के अलावा हमारा कोई दोस्त नहीं)। इतिहास गवाह है कि जब-जब कुर्दों ने किसी विदेशी ताकत (अमेरिका, ब्रिटेन, रूस या फ्रांस) पर भरोसा किया, उन्हें अंत में पहाड़ों में ही छिपना पड़ा।
ईरान की सीमा पर कुर्दों का रुक जाना कोई कायरता नहीं, बल्कि एक कड़वे अतीत से सीखा गया ‘रणनीतिक सबक’ था। वे जानते हैं कि वे इस्तेमाल होने के लिए बहुत बड़े हैं, लेकिन अपना देश पाने के लिए बहुत अकेले। आज कुर्द दुनिया के सामने एक सवाल की तरह खड़े हैं कि क्या न्याय सिर्फ उन देशों के लिए है जिनके पास नक्शे पर अपनी सरहदें हैं?
कुर्दों के भविष्य को लेकर वैश्विक जिम्मेदारी जरूरी
कुर्दों का मुद्दा सिर्फ मध्य पूर्व का क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है। यह मानवाधिकारों का एक बड़ा संकट है। अगर दुनिया के सबसे बड़े ‘स्टेटलेस’ (राज्यविहीन) समुदाय को इसी तरह फुटबॉल बनाया जाता रहा, तो यह क्षेत्र कभी शांत नहीं होगा।
इराक का मॉडल: क्या इराक की तरह ईरान, सीरिया और तुर्की में भी कुर्दों को स्वायत्तता मिलेगी? वर्तमान परिस्थितियों में इसकी संभावना कम दिखती है क्योंकि तुर्की इसे अपने अस्तित्व का सवाल मानता है।
भारत और कुर्द: भारत ने हमेशा कुर्दों के प्रति एक सहानुभूतिपूर्ण लेकिन सतर्क रवैया रखा है। भारत ‘संप्रभुता’ का सम्मान करता है, इसलिए वह खुलकर कुर्द देश का समर्थन नहीं करता, लेकिन इराकी कुर्दिस्तान के साथ भारत के व्यापारिक संबंध मजबूत हो रहे हैं।
अमेरिका की विश्वसनीयता: कुर्दों के साथ बार-बार हुए धोखे ने मध्य पूर्व में अमेरिका की विश्वसनीयता पर एक बड़ा धब्बा लगा दिया है। अब कोई भी स्थानीय शक्ति अमेरिका पर आँख मूँदकर भरोसा करने से पहले सौ बार सोचेगी।
कुर्दों की दास्ताँ हमें सिखाती है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ‘नैतिकता’ और ‘वादे’ का कोई स्थान नहीं होता, यहाँ सिर्फ ‘हित’ सर्वोपरि होते हैं। जब तक कुर्दों के पास अपनी कोई जमीन नहीं होगी, वे इतिहास के इन खूनी पन्नों में सिर्फ एक ‘मोहरे’ बनकर रह जाएँगे।
भारत ने क्लीन एनर्जी के क्षेत्र में एक बड़ी छलांग लगाते हुए दुनिया में अपनी स्थिति और मजबूत कर ली है। केंद्रीय मंत्री प्रल्हाद जोशी के अनुसार, इंटरनेशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी की रिपोर्ट ‘रिन्यूएबल एनर्जी स्टैटिस्टिक्स 2026’ में भारत अब रिन्यूएबल एनर्जी स्थापित क्षमता के मामले में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश बन गया है।
भारत ने इस सूची में ब्राजील को पीछे छोड़ दिया है और अब केवल चीन और अमेरिका उससे आगे हैं। यह उपलब्धि सिर्फ एक रैंकिंग नहीं, बल्कि भारत की तेजी से बदलती ऊर्जा रणनीति का संकेत है।
India crosses a landmark 150 GW+ of installed solar capacity as on March 31, 2026.
This milestone reflects not just scale, but the consistency and pace at which solar deployment has progressed across the country. Year after year, steady capacity additions have strengthened… pic.twitter.com/6HbDKX24y6
— Ministry of New and Renewable Energy (MNRE) (@mnreindia) April 10, 2026
31 मार्च 2026 तक देश की कुल नॉन फॉसिल फ्यूल आधारित क्षमता 283.46 गीगावाट पहुँच चुकी है, जिसमें 274.68 GW रिन्यूएबल एनर्जी और 8.78 GW परमाणु ऊर्जा शामिल है।
खास बात यह है कि 2025-26 में ही 55.3 GW की रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई, जो अब तक की सबसे ज्यादा सालाना वृद्धि है। भारत ने जून 2025 में अपने कुल बिजली क्षमता का 50% हिस्सा गैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल कर लिया, जो 2030 के लक्ष्य से पाँच साल पहले है। वहीं जुलाई 2025 में 203 GW की माँग में से 51.5% बिजली रिन्यूएबल स्रोतों से आई।
रिकॉर्ड ग्रोथ: बिजली उत्पादन और क्षमता में उछाल
वित्त वर्ष 2025-26 भारत के ऊर्जा सेक्टर के लिए बेहद अहम रहा। इस दौरान देश का कुल बिजली उत्पादन 1845.9 बिलियन यूनिट तक पहुँच गया। इसमें नॉन फॉसिल स्रोतों की हिस्सेदारी 29.2% रही, जबकि रिन्यूएबल ऊर्जा (बड़े जलविद्युत सहित) का योगदान 26.2% रहा।
ध्यान देने वाली बात यह है कि जहाँ एक तरफ कोयला आधारित बिजली उत्पादन में कमी आई, वहीं दूसरी ओर सौर और पवन ऊर्जा में तेज बढ़ोतरी देखने को मिली। सौर ऊर्जा से 173.5 बिलियन यूनिट और पवन ऊर्जा से 106 बिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन हुआ। यानी अब भारत की ऊर्जा व्यवस्था धीरे-धीरे पारंपरिक ईंधनों से हटकर क्लीन एनर्जी की तरफ बढ़ रही है।
सौर और पवन ऊर्जा का दबदबा, गाँव-शहर तक पहुँच
भारत में रिन्यूएबल ऊर्जा की असली ताकत सौर और पवन ऊर्जा बनकर सामने आई है। मार्च 2026 तक सौर ऊर्जा की कुल क्षमता 150.26 GW पहुँच गई, जो 2014 के मुकाबले 53 गुना ज्यादा है।
साल 2025-26 में ही 44.61 GW सौर क्षमता जोड़ी गई, जो अब तक का सबसे बड़ा इजाफा है। इसमें रूफटॉप सोलर और PM KUSUM जैसी योजनाओं का बड़ा योगदान रहा। खासतौर पर रूफटॉप सोलर से लाखों घरों को फायदा मिला और ग्रामीण इलाकों में भी बिजली की पहुँच मजबूत हुई।
पवन ऊर्जा की बात करें तो इसकी क्षमता 56.09 GW तक पहुँच चुकी है। इस सेक्टर में भी 6.05 GW की रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई। रिन्यूएबल ऊर्जा के साथ-साथ भारत ने इसके उपकरणों के निर्माण में भी ग्रोथ हुआ है। सौर मॉड्यूल निर्माण क्षमता 2014 के 2.3 GW से बढ़कर 2026 में करीब 172 GW हो गई है।
विंड टरबाइन निर्माण क्षमता भी बढ़कर लगभग 24 GW तक पहुँच गई है। सरकार ने GST को 12% से घटाकर 5% किया, जिससे लागत कम हुई और घरेलू उद्योग को बढ़ावा मिला। इसके अलावा बैटरी निर्माण और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए भी कई कदम उठाए गए हैं।
नई नीतियाँ, मजबूत सिस्टम और भविष्य की तैयारी
सरकार ने इस क्षेत्र को आगे बढ़ाने के लिए कई अहम नीतियाँ लागू की हैं, जैसे REEIMS पोर्टल, VPPA व्यवस्था और CfD मॉडल। इनसे न सिर्फ पारदर्शिता बढ़ी है, बल्कि निवेशकों का भरोसा भी मजबूत हुआ है।
ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर जैसी परियोजनाओं के जरिए ट्रांसमिशन नेटवर्क को बेहतर बनाया जा रहा है, ताकि रिन्यूएबल ऊर्जा को आसानी से पूरे देश में पहुँचाया जा सके। साथ ही 345 GW क्षमता वाले ऊर्जा जोन भी चिन्हित किए गए हैं, जिससे भविष्य की योजना साफ हो सके।
ग्रीन हाइड्रोजन और स्किल डेवलपमेंट से नई रफ्तार
भारत का नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन भी इस बदलाव का बड़ा हिस्सा है। 19744 करोड़ रुपए के निवेश के साथ इसका लक्ष्य 2030 तक 5 मिलियन मीट्रिक टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन करना है। इस मिशन से 8 लाख करोड़ रुपए तक का निवेश आने और 6 लाख नौकरियों के पैदा होने की उम्मीद है।
इस सेक्टर में काम करने वाले लोगों की जरूरत को देखते हुए 2025-26 में 1.24 लाख से ज्यादा लोगों को ट्रेनिंग दी गई है। इससे आने वाले समय में स्किल्ड वर्कफोर्स तैयार होगा और सेक्टर को और मजबूती मिलेगी।
भारत ने 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल एनर्जी क्षमता का लक्ष्य रखा है। मौजूदा रफ्तार को देखते हुए यह लक्ष्य हासिल करना मुश्किल नहीं लगता।
हालाँकि ग्रिड मैनेजमेंट, ऊर्जा भंडारण और सप्लाई चेन जैसी चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं, लेकिन जिस तरह से नीतियाँ, तकनीक और निवेश आगे बढ़ रहे हैं, उससे साफ है कि भारत आने वाले समय में दुनिया का स्वच्छ ऊर्जा नेता बन सकता है।