नाथूराम गोडसे का गाँधी की हत्या करना किसी भी दृष्टि से सही नहीं ठहराया जा सकता। परंतु यह भी सत्य है कि भले ही कोई कितना भी बड़ा अपराधी हो उसे अपनी बात रखने का अधिकार होता है और समाज का यह दायित्व है कि उसकी बात सुनी जाए।
दुर्भाग्य से गाँधी जी की हत्या से जुड़े हर पहलू पर विमर्श होता है किंतु गोडसे के पक्ष पर बात नहीं होती। जैसा कि शंकर शरण कहते हैं: “नाथूराम गोडसे के नाम और उनके एक काम के अतिरिक्त लोग उनके बारे में कुछ नहीं जानते।”
गाँधी जी की हत्या करने के आरोप में गोडसे पर मुकदमा चला था। उस मुकदमे की कार्यवाही में गोडसे ने अपनी बात पाँच घंटे लंबे वक्तव्य के रूप में रखी थी। यह वक्तव्य 90 पृष्ठों का था जो 1977 के बाद प्रकाशित हुआ। महत्वपूर्ण यह नहीं कि गोडसे के वक्तव्य में गाँधी की आलोचना थी, सोचने वाली बात यह है कि गोडसे की उस आलोचना का आजतक किसी ने उत्तर नहीं दिया।
नाथूराम गोडसे द्वारा गाँधी जी की आलोचना की कभी समीक्षा नहीं की गई, न ही एक व्यक्ति के रूप में उनका मूल्यांकन करने का प्रयास किया गया। एक उदाहरण से समझते हैं। हम गाँधी जी से पहले हुए महापुरुषों के हत्यारों की खोज करें तो पाएँगे कि अब्राहम लिंकन की हत्या करने वाले जॉन विल्क्स बूथ का नाम गूगल पर ढूंढने पर हमें करीब 56 लाख से अधिक परिणाम मिलते हैं। लेकिन जब हम गोडसे का नाम सर्च करते हैं तो मात्र 4 लाख से कुछ अधिक ही परिणाम प्राप्त होते हैं।
विकिपीडिया पर खोजने पर जॉन विल्क्स बूथ पर एक लंबा सा प्रामाणिक कहलाने लायक लेख मिलता है जिसमें उन्हें ‘actor who assassinated Abraham Lincoln’ कहा गया है। लेकिन विकिपीडिया पर ही गोडसे के ऊपर एक छोटा और एकपक्षीय दृष्टिकोण वाला लेख है जिसमें पहली लाइन में ही गोडसे को ‘right wing advocate of Hindu nationalism’ घोषित कर दिया गया है। बूथ वाला लेख देखेंगे तो उसमें एक दो नहीं बल्कि 192 फुटनोट और दर्जनों पुस्तकों का संदर्भ दिया गया है। जबकि नाथूराम गोडसे पर मात्र 29 नोट्स और कुल जमा सात पुस्तकों का संदर्भ दिया गया है।
यह एक छोटा सा उदाहरण है यह बताने के लिए कि किसी हत्यारे का भी पक्ष होता है और उसके जीवन तथा विचारों की भी विवेचना की जानी चाहिए भले ही वह विचार अनुकरणीय न हो। जब तक किसी के विचारों पर शोध नहीं होगा उसे गलत समझने या न समझने की भूल यह समाज करता रहेगा। गोडसे को उसकी करनी की सज़ा मिली किंतु दुर्भाग्य से वामपंथी बुद्धिजीवियों ने गोडसे के पक्ष और उसके चिंतन पर न शोध किया न करने दिया। हम ध्यान से सोचें तो आज भी कोई ठीक-ठीक नहीं बता पाता कि गोडसे ने गाँधी जी को क्यों मारा था हालाँकि अपने उत्तर को उचित ठहराते हुए लोग एकदम से राइट या लेफ्ट ज़रूर मुड़ जाते हैं।
न्यायालय में नाथूराम गोडसे द्वारा दिए गए वक्तव्य की वृहद् समीक्षा भारत के बाहर केवल डॉ कोएनराड एल्स्ट ने अपनी पुस्तक “Why I Killed the Mahatma” में की है। डॉ एल्स्ट लिखते हैं कि गोडसे हृदय से सेक्युलर विचारधारा के व्यक्ति थे। गोडसे ने अपने वक्तव्य में यह स्वीकार किया है कि उन्हें गाँधी जी के सभी मतों का समान रूप से आदर करने और सभी पंथों की पवित्र पुस्तकों का आदर करने से कोई समस्या नहीं थी बल्कि वे (गोडसे) तो इसे अच्छा मानते थे। गाँधी की हत्या के कारण को भी गोडसे शुद्ध रूप से ‘राजनैतिक’ मानते हैं।
गोडसे यह भी मानते हैं कि ब्रिटिश के आने से पहले यह अवधारणा स्थापित थी कि हिन्दू और मुस्लिम तमाम अंतर्विरोधों के होते हुए भी एक साथ रह सकते हैं। अंग्रेज़ों ने भारत आकर हिन्दू और मुस्लिमों के बीच की खाई को बढ़ाया और अपनी शक्ति में वृद्धि करने के लिए इसका इस्तेमाल किया। गोडसे के इस विचार से डॉ एल्स्ट यह निष्कर्ष निकालते हैं कि गोडसे ने भारत के विभाजन का ज़िम्मेदार अंग्रेज़ों को माना था न कि मज़हबी इस्लामी विचारधारा को।
गोडसे पूरी तरह से सेक्युलर और लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे। उनका मानना था कि सभी भारतीयों को समान अधिकार मिलने चाहिए। गोडसे के चिंतन में गलती तब हुई जब उन्होंने बँटवारे का ज़िम्मेदार पूरी तरह से गाँधी जी को मान लिया। गोडसे ने यह मान लिया था कि गाँधी चाहते तो बँटवारा न होता। यह सोचकर उन्होंने गाँधी जी की हत्या कर दी थी। पाकिस्तान के निर्माण से गोडसे के मन में यह बात बैठ गई कि हिन्दुओं के साथ पक्षपात हुआ है।
इसके अतिरिक्त यह भी सत्य है कि गोडसे हृदय से गाँधीवादी थे। डॉ एल्स्ट के अनुसार कुछ मुद्दों पर संघ, सावरकर और हिन्दू महासभा की विचारधारा गाँधी से मिलती जुलती थी। नाथूराम गोडसे ने कॉन्ग्रेस सदस्य न होते हुए भी अपने जीवन में छुआछूत को कोई स्थान नहीं दिया था। जवानी के दिनों में उन्होंने महार जाति के एक बच्चे की जान बचाई थी जिसके कारण उन्हें घरवालों के गुस्से का शिकार होना पड़ा था।
गोडसे ने छुआछूत की मान्यताओं को दरकिनार करते हुए दलितों के साथ बैठकर खाना भी खाया था। यही नहीं वे गाँधी के अहिंसा के विचार में भी विश्वास रखते थे। सन 1938 में हिन्दुओं के प्रति भेदभाव के विरुद्ध हैदराबाद के मुस्लिम बहुल क्षेत्र में नाथूराम गोडसे ने हिन्दू महासभा के एक दल का नेतृत्व किया था। यह प्रदर्शन पूरी तरह अहिंसात्मक था। इस प्रदर्शन के कारण गोडसे को साल भर के लिए जेल भेज दिया गया था।
लिबरल बुद्धिजीवी आशीष नंदी ने अपने अध्ययन में गोडसे और गाँधी के विचारों में कई समानताएँ पाईं। नंदी के अनुसार दोनों पक्के राष्ट्रवादी थे। दोनों यही मानते थे कि मूल समस्या भारत के हिन्दुओं के साथ है। इसीलिए गोडसे ने बँटवारे का ज़िम्मेदार एक ‘हिन्दू’ अर्थात गाँधी जी को माना था। यद्यपि गोडसे ने जिन्नाह को मारने का विचार किया था लेकिन उन्होंने गाँधी की हत्या की क्योंकि वे मानते थे कि पाकिस्तान के निर्माण को गाँधी रोक सकते थे।
गाँधी जी की हत्या गोडसे ने किसी संगठन या व्यक्ति से प्रेरित होकर नहीं की थी। गोडसे ने अपने वक्तव्य में सावरकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भी आलोचना की थी। इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि गाँधी जी की हत्या में किसी संगठन का प्रत्यक्ष हाथ था। संघ, नाथूराम गोडसे और सावरकर की आलोचना कई प्रकार से की जा सकती थी किंतु स्वतंत्र भारत में वामपंथी इतिहासकारों ने स्वस्थ आलोचना को स्थान ही नहीं दिया।
नाथूराम गोडसे को लेकर विभिन्न प्रकार की अफ़वाहें और ओछी बातें की गईं। यहाँ तक कहा गया कि सावरकर और गोडसे के बीच होमोसेक्सुअल संबंध थे। इसमें कोई सच्चाई नहीं लेकिन यह अफवाह इतनी अधिक फैलाई गई कि इसे अकादमिक विमर्श का भाग मान लिया गया। किसी राजनैतिक हत्यारे के बारे में ऐसी बेहूदा बातें शायद ही कभी की गईं। इसीलिए आज आवश्यकता है एक ऐसे नैरेटिव की जिसमें किसी के मत के प्रत्येक पक्ष का तात्विक विश्लेषण किया जा सके।
भारतीय वायुसेना ने एक नया कारनामा कर के इतिहास रच दिया है। हाल ही में वायुसेना ने देश के सबसे ऊँचे हवाईअड्डों में से एक- पाक्योंग एयरपोर्ट पर अपना परिवहन विमान AN-32 को उतार कर नया कीर्तिमान स्थापित किया। यह एयरपोर्ट सामरिक रूप से भी भारत के लिए काफ़ी महत्वपूर्ण है। भारतीय वायुसेना (IAF) के ‘Antonov-32 (AN- 32)’ ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट को पाक्योंग एयरपोर्ट पर सफलतापूर्वक लैंड कराया गया। यह एयरपोर्ट भारत-चीन सीमा से सिर्फ 60 किमी की दूरी पर स्थित है। राजधानी गंगटोक से इसकी दूरी क़रीब 16 किमी है।
IAF के एक उच्चाधिकारी ने इस बारे में विशेष जानकारी देते हुए बताया:
“यह इस एयरफील्ड पर एएन -32 श्रेणी के विमानों द्वारा पहली लैंडिंग है, जो भारत के उच्चतम हवाई अड्डों में से एक है।”
विमान के क्रू का नेतृत्व कमांडर एसके सिंह ने किया। एयरक्राफ्ट में सैन्य स्क्वाड्रोन्स में कुल 43 जवान शामिल थे। बता दें कि सितम्बर 2018 में प्रधानमंत्री मोदी ने सिक्किम के इस पहले एयरपोर्ट का उद्घाटन किया था। समुद्र तल से 4,500 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित पाक्योंग देश का 100वाँ एयरपोर्ट है। पिछले वर्ष वायुसेना ने अपने ‘Dornier-128’ विमान को इस एयरपोर्ट पर उतारा था। इस से पहले कई बार उसे यहाँ उतारने की कोशिश की गई थी लेकिन मौसम के कारण स्थगित करना पड़ा था।
In the Pakyong Airport, Sikkim gets its first airport and India its one hundredth. Today is a momentous day for the aviation sector.
Delighted to have inaugurated the airport in Sikkim. Come, visit Sikkim and experience the beauty and hospitality of the state! pic.twitter.com/fZ6ZxIitRj
वायुसेना द्वारा 1.7 किमी रनवे वाले इस हवाई अड्डे पर विमान उतारने के पीछे वहाँ स्थित सैनिकों और उसकी सामग्री की गतिशीलता को बढ़ावा देना है। इस से पहले 14 जनवरी को अरुणाचल प्रदेश के तेजू हवाई अड्डे पर भी C-130J विमान को उतरा गया था।
भारत-चीन सीमा पर तनाव को देखते हुए यह एक सुखद समाचार है क्योंकि क्षेत्र भारतीय सेना की गतिशीलता जितनी सुगम होगी, सीमा की सुरक्षा भी उतनी ही मज़बूत होगी। हाल ही में अमेरिका ने भी इस बात का अंदेशा जताया है कि भारत और चीन में सीमा विवाद को लेकर तनाव बना रहेगा। चीन भी सीमा से सटे अपने इलाकों में इंफ़्रास्ट्रक्चर बढ़ाने का कार्य तेज़ी से कर रहा है। इसे मद्देनज़र रखते हुए भारत ने भी क्षेत्र में विकास कार्यों को नई गति दी है। दोकलाम गतिरोध के बाद भारत लगातार उत्तर-पूर्व के राज्यों में पर्यटन और ट्रांसपोर्टेशन को बढ़ावा दे रहा है।
ताज़ा भ्रष्टाचार सूचकांक को देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि प्रधानमंत्री मोदी का ‘न खाऊँगा, न खाने दूँगा’ वाला वाक्य चरितार्थ हो रहा है। अगर हम मंगलवार (जनवरी 29, 2019) को आई रिपोर्ट से 2013 के डाटा की तुलना करें, तो पता चलता है कि भारत ने इस मामले में काफ़ी तरक्की की है। इस तुलनात्मक अध्ययन से पहले हाल के आँकड़ों पर नजर डाल कर देखते हैं कि विश्व के अन्य देशों में भारत का स्थान क्या है, और ऐसे कौन से देश हैं जो भ्रष्टाचार के मामले में भारत से आगे या पीछे हैं।
अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी ‘ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल (Transparency International)’ प्रत्येक वर्ष सभी देशों की एक सूची जारी करता है, जिस से यह पता चलता है कि किस देश में कितना भ्रष्टाचार है। इसके लिए सभी देशों को एक रेटिंग दी जाती है, जिसके घटने बढ़ने से पता चलता है कि भ्रष्टाचार कम हुआ है या बढ़ा है। जिस देश का स्कोर जितना ज्यादा होगा, वह उतना कम भ्रष्ट होगा। जिस देश का रैंक जितना नीचे होगा, वहाँ भ्रष्टाचार भी ज्यादा होगा।
पिछले 6 वर्षों में भारत 16 स्थान ऊपर चढ़कर साल 2018 में 78वें पोजिशन पर है
अपने विश्लेषण में ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल (TI) ने 88 स्कोर के साथ डेनमार्क और 87 स्कोर के साथ न्यूज़ीलैंड को विश्व का सबसे कम भ्रष्ट देश पाया है। एशिया-पैसिफ़िक क्षेत्र में न्यूज़ीलैंड के बाद ऑस्ट्रेलिया आता है, जिसका स्कोर 85 है। TI ने कहा है कि ये दोनों लोकतान्त्रिक देश हैं और इन्होने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में सफलता पाई है लेकिन सिंगापुर और हॉन्गकॉन्ग जैसे अलोकतांत्रिक जैसे देश भी हैं, जिन्होंने भ्रष्टाचार को नियंत्रण में रखा है।
स्कोर की बात करें तो भारत ने पिछले 6 वर्षों में 5 अंकों की छलांग लगाई है
इस क्षेत्र में 41 ‘Corruption Perceptions Index (CPI)’ स्कोर के साथ भारत ने अपनी रेटिंग में पिछले वर्ष (2017) के मुक़ाबले सुधार किया है। उस वर्ष भारत का CPI स्कोर 40 था जिसमे 1 अंक का सुधार आया है। पहली नज़र में देखने पर भले ही यह मामूली लगे, लेकिन इस सिक्के के और भी पहलू हैं। 2013 में भारत का CPI स्कोर 36 था। यानी कि देश में जड़ तक फ़ैल चुके भ्रष्टाचार को कम करने के लिए देश एक बार एक एक सीढ़ी चढ़ रहा है। भारत में भ्रष्टाचार की स्थिति कैसी थी, इसका अंदाज़ा 2011 में अन्ना हजारे के आंदोलन की व्यापकता के पैमाने से मापा जा सकता है। 2013 में 94वें रैंक से भारत अब 78वें रैंक पर पहुँच गया है- यानी 16 स्थानों की छलांग।
ताज़ा रिपोर्ट में TI ने भारत के बारे में चर्चा करते हुए में कहा है:
“जैसे कि भारत अब आगामी लोकसभा चुनाव के लिए तैयार हो रहा है, इसके CPI स्कोर में महत्वपूर्ण सुधार आया है, जो 40 से बढ़ कर 41 हो गया। 2011 में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ सार्वजनिक आंदोलन (अन्ना हजारे अनशन) के बावज़ूद, जहाँ जनता ने सरकार से माँग की कि भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जाए और विस्तृत जान-लोकपाल एक्ट को लागू करे, ये आंदोलन ख़त्म हो गए और इनका कोई ख़ास असर नहीं हुआ। ज़मीनी स्तर पर भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए कुछ भी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार नहीं किया गया।”
TI ने भारत को ‘Countries to Watch’ की सूची में रखा है। इसका अर्थ है कि संस्था को उम्मीद है कि जिस तरह से साल दर साल भारत की रैंकिंग और सूचकांक में सुधार आते जा रहे हैं, उस से आगे बेहतर परिणाम आने की उम्मीद है। वहीं अगर 2013 की बात करें तो, उस दौरान अपने रिपोर्ट ने केंद्र स्तर पर नित नए भ्रष्टाचार के ख़ुलासों को भारत के ख़राब प्रदर्शन का कारण बताया था। TI ने 2013 में कहा था:
“भारत का ख़राब CPI स्कोर एक विडम्बनापूर्ण स्थिति का परिचायक है- यहाँ भ्रष्टाचार ने विकास को बाधित कर रखा है। पिछले दो वर्ष में देश को हिला कर रख देने वाले बड़े पैमाने पर लगातार हो रहे भ्रष्टाचार से प्रभावी रूप में निपटने में असमर्थता- यह सब अभी भी कायम है।”
अगर हम TI के दोनों बयानों की तुलना करें तो पता चलता है कि हमारे देश ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर काफ़ी तरक़्क़ी की है। जहाँ उस समय अंतरराष्ट्रीय एजेंसियाँ बड़े पैमाने पर हो रहे भ्रष्टाचार की बात करती थी, अब भारत को पॉजिटिव नजरों से देखते हुए ऐसे देशों की सूची में रखती है, जिनका प्रदर्शन बेहतर होने की उम्मीद है। जहाँ उस समय बात होती थी कि भ्रष्टाचार ने विकास को बाधित कर रखा है, अब एजेंसी भारत के प्रदर्शन को ‘महत्वपूर्ण सुधार’ बताती है। उस समय एजेंसी भारत को भ्रष्टाचार से निपटने में असमर्थ बताती थी।
अगर भारत के पड़ोसी देशों की बात करें तो एशिया-पैसिफ़िक क्षेत्र में अफ़ग़ानिस्तान उत्तर कोरिया के बाद सबसे भ्रष्ट देश है। CPI स्कोर 33 के साथ पकिस्तान भारत से ख़ासा पीछे है और बांग्लादेश 26 CPI स्कोर के साथ सबसे भ्रष्ट देशों की सूची में शामिल है। चीन का रैंक 87 है तो पकिस्तान 117वें स्थान पर है। दोनों ही देश भारत से पीछे हैं। यह दिखाता है कि एशिया-पैसिफ़िक क्षेत्र में भारत अपने पड़ोसी देशों के मुक़ाबले बेहतर प्रदर्शन कर रहा है।
वैसे तो पूरी मानवजाति ही व्यक्तिगत और सामूहिक तौर पर स्वयं के परिपेक्ष्य में विरोधाभासी है, पर इसमें भी भारतीय सबसे आगे हैं।
कुछ दिन पहले भूतपूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को भारत रत्न से सम्मानित किया गया। हमने देखा कि उन्हें एक उच्चकोटि के देशभक्त राजनेता की तरह प्रस्तुत किया गया और उन्हें इस सम्मान के लिए उचित व्यक्ति सिद्ध करने में हम जैसे राष्ट्रवादियों ने ही सबसे अधिक तर्क दिए, बावजूद इसके कि वे राष्ट्रपति कार्यकाल के अतिरिक्त जीवनपर्यंत एक कॉन्ग्रेसी रहे।
हम नेताजी सुभाषचंद्र बोस को एक मिथकीय चरित्र के रूप में देखते हैं। वे थे भी। उनकी मृत्यु आज तक एक रहस्य ही है। सुभाष बाबू की कथित अस्थियाँ जापान में हैं। जब प्रणव मुखर्जी विदेश मंत्री थे, तब वे उनकी अस्थियाँ लेने जापान गए और वहाँ के विदेश मंत्री से मिलने के बाद जर्मनी गए। अस्थियों को लाने का मतलब यही होता कि सरकार यह मानकर चल रही थी कि उनकी मृत्यु विमान दुर्घटना में हो चुकी थी।
जर्मनी में सुभाष बाबू का भुला चुका परिवार रहता है। यह भी बड़े ताज्जुब की बात है कि इस देश की जनता स्वतंत्रता-पश्चात के एक शहीद प्रधानमंत्री की विदेशी मूल की पत्नी को सिर आँखों पर बिठाता है, उन्हें राष्ट्रीय पार्टी का अध्यक्ष बनाता है और वे भारतीय राजनीति में बहुत गहरा दखल रखती हैं। पर नेताजी जैसे कद के राष्ट्रनायक की विदेशी मूल की पत्नी श्रीमती एमिली शेंकल (मृत्यु 1996) का नाम तक नहीं जानता।
प्रणव मुखर्जी 1995 में सुभाष की बेटी श्रीमती अनीता फाफ और उनके पति श्री मार्टिन फाफ से मिले। अनीता ने अस्थियों की सुपुर्दगी पर मौखिक सहमति दी थी पर वे अपनी माँ के जीवित रहते कुछ नहीं कर सकती थी। प्रणव श्रीमती एमिली से मिले। उनका जवाब बस इतना था कि ‘किसकी अस्थियाँ? जापान में रखी अस्थियाँ नेताजी की नहीं है। उसे कहीं भी रखा जाए, उन्हें उससे कोई मतलब नहीं।’ अफ़वाह तो यह भी थी कि प्रणव ने उन्हें ब्लैंक चेक भी दिया था जिसके उन्होंने टुकड़े कर दिए थे।
प्रणव मुखर्जी, सुभाष चंद्र बोस को नमन करते हुए
आखिर प्रणव मुखर्जी यह साबित क्यों करना चाहते थे कि नेताजी विमान दुर्घटना में ही मरे?
नेताजी की बात चली तो भगतसिंह को भी याद कर लेते हैं। भगतसिंह ने युवाओं के नाम एक चिट्ठी लिखी थी जिसका मतलब यह था कि देशवासियों को सुभाष के बजाय नेहरू का अनुसरण करना चाहिए, क्योंकि सुभाष के पास देश को आगे ले जाने का कोई विजन नहीं है, और नेहरू एक विचारवान व्यक्ति हैं जो जानते हैं कि देश को किस दिशा में चलाना चाहिए।
भगत सिंह नेहरू में एक भविष्यदृष्टा देखते थे, सुभाष में नहीं। उधर सुभाष ने गाँधी और नेहरू के विरोधी होने के बावजूद भी अपनी सशस्त्र सेना के दो अंगों का नाम नेहरू और गाँधी के नाम पर रखा था।
सावरकर से बड़ा गाँधी का विरोधी कौन था? पर इन्हीं सावरकर ने इंग्लैंड के इंडिया हाउस में गाँधी की प्रशंसा में पत्र पढ़ा था।
हम आज भी, तमाम दस्तावेजों के प्रत्यक्ष सुबूतों के बाद भी एक बेतुका इल्जाम लगाते हैं कि गाँधी को देश का बँटवारा नहीं करना चाहिए था। क्या इसमें कोई सच्चाई है? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अतिरिक्त यदि कोई इस बँटवारे का प्रखर विरोधी था तो वो गाँधी थे। मुस्लिम लीग की ज़िद के आगे कॉन्ग्रेस ने घुटने टेक दिए थे, न कि गाँधी ने। उनका तो यह तक कहना था कि इतना खून बह गया है, और खून बह जाने दो पर राष्ट्र के टुकड़े मत करो।
हम लौह पुरुष सरदार पटेल के आभारी हैं कि उन्होंने इस देश के सैकड़ों टुकड़ों को एक करने में अथक परिश्रम किया। पर हम विभाजन के दोषियों को याद करते समय यह याद नहीं रखते कि कॉन्ग्रेस के प्रथम पंक्ति के कद्दावर नेताओं में पटेल पहले थे जिन्होंने मुस्लिम लीग की ज़िद के आगे घुटने टेक दिए थे। गाँधी और गाँधी-भक्त पटेल में बस इतना ही अंतर है कि प्रयोगात्मक सोच रखने वाले पटेल ने पाकिस्तान के बाद बचे भारत को संगठित करने का संकल्प लिया और भावुक गाँधी यह सोचते रहे कि यह बँटवारा कुछ समय का है, ‘पाकिस्तान’ भारत का अभिन्न हिस्सा है जो वक़्ती तौर पर अलग हो गया है। और यह सोच केवल गाँधी की नहीं थी, बहुतेरे लोग ऐसा सोचते थे कि पाकिस्तान जल्द ही वापस भारत से जुड़ जाएगा, हालाँकि, उनकी सोच इस विचार पर आधारित थी कि दरिद्र पाकिस्तान अपनी बदहाली पर आठ आँसू रोता हुआ ख़ुद ही वापस आने की गुज़ारिश करेगा।
संयुक्त भारत की भावुक सोच केवल गाँधी की ही नहीं थी, गाँधी को गोली मारने वाले नाथूराम भी यही चाहते थे। उनकी अस्थियाँ आज भी संयुक्त भारत की नदियों में प्रवाहित किए जाने की प्रतीक्षा कर रही हैं।
गाँधी में तमाम ऐसी बातें थी जिन्हें पसन्द नहीं किया जा सकता। ख़ुद मैंने उन पर विस्तार से लिखा है। पर हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि उनमें तमाम ऐसी बातें भी थी जिन्होंने इस देश को, देशवासियों को एक दिशा दी। यह स्वीकार करने में कदाचित हमें परेशानी हो पर यह इतिहास-सिद्ध है कि हम बहुत ही लापरवाह (या कायर) नागरिक हैं। अभी का ही उदाहरण देखें, कि लापरवाही के अतिरिक्त क्या वजह है कि राममंदिर का मुद्दा आजादी के इतने वर्षों बाद भी एक मुद्दा बना हुआ है?
उस दौर में जब गुलामी हमारी नसों में बहती थी, रक्त में घुली-मिली हुई थी, कुछ वीरों के अतिरिक्त किसी को कोई छटपटाहट नहीं महसूस होती थी। वीर तब भी थे, बहुतेरे नेता थे पर वे नागरिकों को अपने साथ, आज़ादी के उद्देश्य के साथ बाँधे रखने में सर्वथा असफल थे। गाँधी से पहले कॉन्ग्रेस बस अभिजात्य वकीलों का गुट भर था जो साल में एक बार मीटिंग करता और पारित प्रस्तावों को ब्रिटिश सरकार के पास सविनय प्रेषित कर देता। वे गाँधी थे जिन्होंने ग़रीब जनता तक को आंदोलन में जोड़ा।
कमज़ोर भारतीयों से यह अपेक्षा करना निरी मूर्खता थी कि वे सभी रक्तरंजित क्रांति करते। एक नेता उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग करता है। गाँधी के सामने संसाधन थे वे नागरिक जो घर से निकलने में डरते थे, गोरी चमड़ी के सामने जिनकी रूह काँपती थी। भगत, सुभाष जैसे नेता और उनका अनुसरण करने वाली जनता का प्रतिशत इस मुल्क की विशाल जनसंख्या के सामने नगण्य था, नगण्य है। गाँधी ने उस कमज़ोर जनता को अपनी शक्ति बनाया और उसका प्रभावी उपयोग किया।
बात विरोधाभास से चली थी। देखिए कि हम आज के एक संगठन को बहुत प्यार देते हैं, एक नेता में अपना भविष्य देखते हैं। और यही संगठन, यही नेता जिस महात्मा के आगे बारम्बार सिर नवाता है उसे गाली देते हैं! व्यक्ति का मूल्यांकन उसके समस्त कार्यों से होना चाहिए, न कि उसकी एक कमज़ोरी से जो कि आपमें, हम में या किसी भी व्यक्ति में हो सकती है।
कार्ति चिदंबरम को ‘एयरसेल-मेक्सिस डील’ और ‘आईएनएक्स मीडिया’ केस में जाँच एजेंसियों के साथ सहयोग न करने पर सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई। चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली तीन जजों के बेंच ने कार्ति से कहा, “यदि आप कानून के साथ खेलते हैं, तो केवल भगवान ही आपकी मदद कर पाएँगे। हम आपके पीछे पड़ जाएँगे। आप जाँच में सहयोग नहीं कर रहे थे। हमारे पास कहने को बहुत कुछ है, लेकिन अभी वो समय नहीं है। आगे से यदि आपने जाँच में जरा-सा भी असहयोग दिखाया, तो हम आप पर बहुत भारी पड़ेंगे।”
सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदम्बरम के बेटे कार्ति चिदम्बरम की विदेश जाने की इजाज़त संबंधी याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा, “10 से 26 फरवरी के बीच आप जहाँ जाना चाहते हैं, जा सकते हैं। लेकिन आपको जाँच एजेंसियों के साथ सहयोग करना ही होगा।”
कार्ति चिदम्बरम को विदेश जाने की अनुमति देने के एवज़ में कोर्ट ने ₹10 करोड़ सिक्यॉरिटी के तौर पर जमा कराने को कहा है। साथ ही कार्ति को देश लौटने और जाँच में सहयोग देने संबंधी अंडरटेकिंग भी भरने का आदेश कोर्ट ने दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कार्ति को ‘एयरसेल-मेक्सिस डील’ और ‘आईएनएक्स मीडिया’ केस में 5, 6, 7 और 12 मार्च को ED (प्रवर्तन निदेशालय) के सामने पेश होने का आदेश दिया।
कार्ति चिदम्बरम ने अगले कुछ महीनों के लिए फ़्रांस, स्पेन, जर्मनी और यूके जाने की अनुमति माँगी थी। इन देशों में होने वाली इंटरनेशनल टेनिस टूर्नामेंट का आयोजन टोटस टेनिस लिमिटेड (Totus Tennis Ltd) के द्वारा किया जा रहा है। टोटस टेनिस लिमिटेड की मालिकाना कंपनी चेस ग्लोबल एडवाइज़री सर्विसेज़ है। कार्ति इसी चेस ग्लोबल एडवाइज़री सर्विसेज़ के मालिक हैं।
‘एयरसेल-मेक्सिस डील’ और ‘आईएनएक्स मीडिया’ मामले में आरोपित कार्ति को हर बार विदेश जाने से पहले सुप्रीम कोर्ट सेआज्ञा लेनी पड़ती है।
आज की तारीख़ पर देशभर में अगर लोगों के आँख-कान किसी मुद्दे पर लगे हुए हैं, तो वह राम मंदिर निर्माण है। वर्षों से अधर में लटके इस एक निर्णय को लेकर हर व्यक्ति में उत्साह है। जनता की सबसे बड़ी दिलचस्पी है कि जल्द से जल्द इस मुद्दे को सुलझाया जा सके।
अयोध्या राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण मामले पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई निरंतर टलने के बाद भी बयानबाज़ी का सिलसिला जारी है। कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद सरकार से अध्यादेश लाने की माँग करते आ रहे हैं, तो कुछ का मानना है कि इसका निपटारा सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से ही किया जाना चाहिए। RSS, विश्व हिंदू परिषद, शिवसेना, बीजेपी और संत समाज ने भी लगातार मंदिर निर्माण के लिए अपने-अपने सुझाव दिए हैं।
इसी बीच, अयोध्या में चल रही धर्म संसद में धर्मगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने राम मंदिर बनाने के लिए तारीख़ का ऐलान करने का दावा किया है। उन्होंने कहा है कि आज यानि बुधवार (जनवरी 30, 2018), शाम 5 बजे वो धर्म संसद में पहुँचकर मंदिर निर्माण की तारीख़ की घोषणा करेंगे।
सुप्रीम कोर्ट में अटकी सुनवाई को लेकर साधू समाज और मंदिर निर्माण की माँग कर रहे लोगों में इस मामले को लेकर काफ़ी नाराज़गी देखी जा रही है। धर्म संसद में राम मंदिर निर्माण सहित कुल 18 मुद्दों पर चर्चा होगी। उन्होंने बताया कि राम मंदिर निर्माण को लेकर साधु समाज एकजुट है और इसमें कोई मतभेद नहीं।
एक समाचार चैनल से बातचीत के दौरान शंकराचार्य ने कहा कि राम मंदिर बनने का रोड मैप तैयार है। जया, भद्रा, नंदा और पूर्णा, 4 शिलाओं के साथ शिलान्यास की तैयारी की गई है। इस पर उन्होंने केंद्र सरकार पर आरोप भी लगाया कि उन्होंने राम मंदिर को लेकर उदासीनता बरती है।
दो अनजान लोग फेसबुक पर मिले, दोनों में प्यार हुआ और फिर उन्होंने शादी कर ली। लेकिन ये सुन कर आप चौंक जाएंगे कि इस पूरी कहानी के पीछे नरेंद्र मोदी हैं। यह बात ख़ुद उस व्यक्ति ने ट्वीट कर बताई। जय दवे नमक व्यक्ति ने अपनी पत्नी के साथ फ़ोटो ट्वीट कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि वो और उनकी पत्नी पीएम मोदी के कारण शादी के बंधन में बंधे हैं।
जय दवे ने ट्वीट कर पीएम को धन्यवाद दिया।
जय के अनुसार, एक लड़की ने नरेंद्र मोदी के समर्थन में किए उनके कमेंट को लिखे किया, जिसके बाद उनका प्रेम परवान चढ़ा। जय ने पीएम को टैग करते हुए लिखा:
“नरेंद्र मोदी जी हम आपके कारण शादी के बंधन में बंधे हैं। मैंने राहुल गाँधी के फेसबुक पेज पर आपके समर्थन में कॉमेंट किया और इस सुंदर लड़की ने मेरे कॉमेंट को लाइक किया। हमने बात की, एक-दूसरे से मिले और पाया कि हम दोनों आपका समर्थन करते हैं क्योंकि हम भारत के लिए जीना चाहते हैं। इसलिए हमने शादी करने का फैसला कर लिया।”
दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता तेजिंदर बग्गा सहित कई लोगों ने इस जोड़े को बधाई दी। इसके बाद यह ट्वीट डिलीट हो गया, जिसके बाद लोगों ने जय को ट्रोल करना शुरू कर दिया। इस पर जवाब देते हुए उन्होंने दो और ट्वीट किया। उन ट्वीट्स में जय ने बताया:
There are misconcpetions in media and social media that accidental deletion of the viral tweet was due to the amount of trolling received.
Fact is just like Modiji, I m used to criticism and trolling, my commitment towards the nation is unaffected by what trolls. Jay Hind! https://t.co/7PcngTQF1v
“मैं कुछ और डिलीट करना चाहता था लेकिन गलती से वह ट्वीट डिलीट हो गया। मीडिया और सोशल मीडिया में एक गलतफहमी है कि मैंने ट्रोल होने के डर से वह ट्वीट डिलीट किया है। सच यह है कि मोदी जी की तरह ही मैं भी ट्रोलिंग और आलोचना का आदी हो चुका हूँ। देश की ओर मेरा कमिटमेंट ट्रोल्स से प्रभावित नहीं होगा। जय हिंद।“
जय की लव स्टोरी काफ़ी वायरल हो रही है और लोग उनकी प्रेम कहानी को पसंद भी कर रहे हैं। यह सोशल मीडिया पर भी काफ़ी शेयर किया जा रहा है।
30 जनवरी 1948- यह वो तारीख़ है, जब राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हत्या कर दी गई थी। यह विडम्बना ही है कि अहिंसा के सबसे बड़े पुजारी के जीवन का अंत हिंसा से हुआ। इसीलिए इस दिन को हम ‘शहीद दिवस’ के रूप में मनाते हैं। लेकिन एक और व्यक्ति था, जिसकी मृत्यु इसी दिन हुई थी, गाँधीजी के निधन से 420 वर्ष पहले। एक ऐसा शख़्स, जिसने इस्लामिक आक्रांताओं को भारत की धरती पर प्रवेश करने से रोकने के लिए सारे प्रयास किए, लेकिन तकनीक के सामने असफल रहा। मेवाड़ की जब भी बात आती है तो हमें महाराणा प्रताप याद आते हैं लेकिन आज हम उस शूरवीर की बात करने जा रहे हैं जो जज़्बा, वीरता, हठधर्मिता और देशभक्ति के मामले में प्रताप से भी दो क़दम आगे था।
अब तक आप समझ गए होंगे- हम यहाँ राणा सांगा की बात करने जा रहे हैं। उनका भी स्वर्गवास 30 जनवरी यानी आज के ही दिन हुआ था। महाराणा सांगा की मृत्यु के साथ ही दिल्ली में मुग़ल सत्ता स्थापित होने का मार्ग प्रशस्त हो गया और देश तब तक इस्लामिक आक्रांताओं का ग़ुलाम रहा, जब तक उन्हें 18वीं शताब्दी के बाद सिखों, मराठों और अंग्रेजों के वर्चस्व का सामना न करना पड़ा। लेकिन यह सब कुछ सिर्फ़ एक युद्ध के परिणाम से तय हो गया था। वह था- खानवा का युद्ध।
16वीं शताब्दी की शुरुआत में जब बाबर ने काबुल पर कब्ज़ा किया, तभी से उसके मन में एक ही शब्द घूम रहा था और वह था- हिंदुस्तान। अपने पूर्वज तैमूर की कहानियाँ सुन कर बड़ा हुआ बाबर को ज्ञात था कि कैसे तैमूर ने झटके में शहर के शहर तबाह किए थे और हजारों को मौत के घाट उतारा था। वह तैमूर द्वारा पंजाब में जीते गए कुछ क्षेत्रों को वापस हथियाना चाहता था। जब बाबर ने दिल्ली में लोदी को हरा कर उसके सारे धन-वैभव पर कब्ज़ा जमाया, तब आम धारणा यह थी कि वह भी तैमूर की तरह लूटपाट कर वापस चला जाएगा लेकिन अति-महत्वकांक्षी बाबर के इरादे नेक नहीं थे।
बाबर के दिल्ली में साम्राज्य स्थापित करने की ख़बर सुनते ही राणा सांगा के कान खड़े हो गए। राणा का मानना था कि बाबर का दिल्ली में बैठना लोदी से भी बड़े ख़तरे का संकेत था। बाबर के अनुसार, राणा के पास 2 लाख सैनिकों की एक मज़बूत सेना थी। राणा ने बाबर के ख़िलाफ़ कई राजाओं का गठबंधन बनाने की हरसंभव कोशिश की और उसमें वह बहुत हद तक सफल भी हुए। राजस्थान के राजपूत राज्य, जैसे- हरौती, जालौर, सिरोह, डूंगरपुर, धुंधर और अम्बर। तुर्क़-अफ़ग़ान के अवशेषों पर एक हिन्दू राज्य की स्थापना का स्वप्न लिए राणा ने बाबर के इरादों की भनक लगते ही उसे सबक सिखाने का मन बना लिया था।
दिल्ली में हिन्दू राज्य की स्थापना के लिए महाराणा सांगा ने अफ़ग़ान तक की भी मदद ली। उन्होंने विशाल सेना-सेनापतियों की एक ऐसी फ़ौज खड़ी की, जिसके ‘जय एकलिंग’ का नाद करते ही आसमान भी थर्रा कर काँप उठता था।
बाबर ने इस युद्ध को हिन्दू बनाम मुस्लिम बना दिया। जैसा कि आज के ज़िहादी आतंकी कहते आए हैं, उसने राणा के साथ युद्ध को इस्लाम की रक्षा से जोड़ कर अपनी सेना में जोश भर दिया। बाबर ने अपने सिपहसालारों से क़ुरानशरीफ़ पर हाथ रख कर राणा जैसे जिहादी ताक़त को ख़त्म करने की शपथ दिलाई। खानवा में हुए युद्ध से एक शाम पहले बाबर ने एक ऐसा उत्तेजित भाषण दिया- जिसने भावी युद्ध को कथित काफ़िर बनाम इस्लाम के रक्षक से जोड़ दिया। बाबर ने इस्लाम की आन, बान और शान की हिफ़ाज़त के लिए अपनी सेना से एक सच्चे मुस्लिम की तरह लड़ने का वादा लिया। सच्चे मुस्लिम की परिभाषा में फ़िट बैठने के लिए उसने शराब के मर्तबान पटक डाले और शराब छोड़ने की क़सम खाई।
खानवा का युद्ध भारतीय इतिहास का एक ऐसा युद्ध है, जिसके दूरगामी परिणाम हुए। सांगा के बलिदान के बाद दिल्ली में मुग़ल सत्ता की स्थापना हुई लेकिन इस युद्ध में देश की माटी की रक्षा के लिए अपनी जान न्यौछावर करने वाले राणा सांगा ने जिस वीरता और देशभक्ति का परिचय दिया- उसकी मिसाल इतिहास में शायद ही कहीं और मिले। युद्ध की शुरुआत में ही राणा सांगा ने बाबर की सेना पर ऐसा हमला किया, जिस से पूरी इस्लामिक फ़ौज में हड़कंप मच गया। राणा के ताबरतोड़ आक्रामक से बाबर की सैन्य संरचना बिखर सी गई।
लेकिन, राणा सांगा एक जगह चूक गए थे। बाबर ने जिस तरह पानीपत में इब्राहिम लोदी को हराया था, उस से उन्होंने कोई सीख नहीं ली थी। भारतीय वीरों की उस सूची में राणा का भी नाम है, जिन्होंने अपनी वीरता के बावज़ूद दुश्मन के छल, कपट और पैंतरेबाज़ी का अंदाज़ा लगाना उचित नहीं समझा। युद्ध के पहले बाबर ने युद्धस्थल का पूरी तरह मुआयना किया था। किस तरफ से, कहाँ और किस ओर वार करना है- ये सब उसने पहले ही सुनिश्चित कर लिया था। खानवा और आगरा की दूरी 35 मील के क़रीब है।
राणा सांगा ने इन सब की जरूरत नहीं समझी। अपनी हाथी सेना और तलवारबाज़ों की क्षमता पर भरोसा करने वाले राणा को इस बात का अंदाज़ा न था कि बाबर की तोपों के सामने वीरता का प्रदर्शन कर बलिदान तो दिया जा सकता है, लेकिन तीर और भाले से मशीनों को शायद ही जीता जा सकता है। मालवा और गुजरात की संयुक्त सुल्तानी सेना को धुल चटाने वाले राणा सांगा बाबर की पैंतरेबाज़ी ने वाक़िफ़ न थे। उन्होंने संगठन, सेना और रणनीति- इन सब पर ध्यान दिया था, लेकिन दुश्मन की चाल को समझने की कोशिश न करना उन्हें भारी पड़ा।
बाबर ने खानवा में भी पानीपत वाला तरीका ही आज़माया। उसने ख़ुद को मध्य में रख बाकी दोनों तरफ से सेना का ऐसा चक्रव्यूह बनाया, जिस से एक बार में कई तरफ से आक्रमण किया जा सके। अगर राणा पानीपत के युद्ध से थोड़ी भी सीख ले लेते, तो शायद इस तकनीक की काट की योजना तैयार कर सकते थे। तन-बदन पर लगे अनगिनत घावों से जूझते राणा सांगा ने सीधा बाबर की तरफ प्रस्थान किया और दुश्मन के मुखिया का ही काम तमाम करने के लिए पूरी ताक़त से धावा बोला।
लेकिन बीच में ही राणा की सेना बिखर गई। बाबर द्वारा कई तरफ से हो रहे आक्रमण और तोपों द्वारा काफ़ी कम दूरी से किए जा रहे फायर ने राणा के योद्धाओं को तितर-बितर कर डाला। हालाँकि, राजपूत सेना की हार देख योद्धाओं ने राणा को युद्धस्थल छोड़ने की सलाह दी। हठी राणा ने साफ़ मना कर दिया। हालाँकि, किसी तरह राणा को वहाँ से निकाल लिया गया लेकिन उनके ज़ख्म ऐसे थे, कि वह फिर युद्ध में लौट नहीं सके। राणा के जाते ही उनकी सेना की हार हुई और बाबर ने इस्लामिक साम्राज्य को एक नया विस्तार दिया। साम्राज्यवाद का यह रथ बाद में क़रीब दो दशकों के लिए रुका, जिसका श्रेय शेरशाह सूरी और हेमचन्द्र विक्रमादित्य को जाता है।
लेकिन राणा हार मानने वालों में से नहीं थे। अपनी पराजय उन्हें स्वीकार न थी। इतिहासकार प्रदीप बरुआ लिखते हैं कि अगर बाबर ने तोपों की मदद नहीं ली होती और पानीपत वाली रणनीति न दोहराई होती, तो शायद दिल्ली में मेवाड़ का केसरिया ध्वज फहरा रहा होता। इस युद्ध के बाद राणा का गठबंधन बिखर गया।
लेकिन इस युद्ध में राणा सांगा ने जिस तरह का प्रदर्शन किया, उसकी तुलना महाभारत काल के योद्धाओं से की जा सकती है। राणा के शरीर पर 80 ज़ख्म थे। पहले की कई युद्धों में लड़ते-लड़ते उनका एक हाथ जा चुका था। एक ही आँख से देख पाते थे, दूसरी युद्ध की बलि चढ़ गई थी। एक ही पाँव से ठीक से चल पाते थे, दूसरा अपाहिज हो चुका था। फिर भी उन्होंने बाबर से टक्कर लेने का निर्णय लिया और उसे नाकों चने चबाने को मज़बूर किया। यह जज़्बा प्रशंसनीय है।
आज (30 जनवरी) के दिन ही 1528 में उनका स्वर्गवास हो गया। ज़ख्मों से जूझ रहे राणा दिल्ली में बैठे बाबर को फिर से ललकारने की योजना तैयार कर रहे थे। लेकिन, उनके दरबारियों और अन्य राजाओं को ये पसंद नहीं था। उन्हें दिल्ली और आगरा कब्ज़ा कर बैठा बाबर अपराजेय नज़र आ रहा था। उनके निधन के बाद भी बाबर उन्हें अपना सबसे बड़ा ख़तरा मानता रहा, जब तक वह निश्चित नहीं हो गया कि राणा सचमुच नहीं रहे। कुछ इतिहासकारों का दावा है कि बीमार राणा के दोबारा युद्ध की योजना से तंग आकर उनके ही लोगों ने उन्हें ज़हर दे दिया था।
जो भी ही, अगर हम अहिंसा के पुजारी गाँधीजी को याद करते हैं, तो 30 जनवरी को वीरों के वीर महाराणा सांगा को भी याद करना चाहिए। राणा ने जिस जज़्बे की नींव रखी, उस पर चल कर प्रताप, हेमू और बाजीराव जैसे कितने योद्धा अमर हो गए। राणा का अखंड हिन्दू साम्राज्य का स्वप्न भले ही उनके जीवन रहते सफल न हो पाया हो, लेकिन उनके व्यक्तित्व से पूरा राजस्थान प्रेरणा लेता है, उनकी वीरता भारत के कण-कण में समाहित है।
अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसियों द्वारा तैयार की गई ‘US Worldwide Threat Assessment Report‘ में भारत को लेकर कई बातें कही गई हैं, जिन पर ग़ौर करना जरूरी है। इस रिपोर्ट में दुनिया भर में आतंकवाद के प्रभाव से लेकर परमाणु बम तक की बात की गई है। आइए एक-एक कर जानते हैं कि इस विस्तृत रिपोर्ट में कौन-कौन सी ऐसी बातें हैं, जो आपको जाननी चाहिए। इस रिपोर्ट को मंगलवार (जनवरी 29, 2019) को USA कॉन्ग्रेस में डायरेक्टर ऑफ़ नेशनल इंटेलिजेंस डेनियल कोट द्वारा टेबल किया गया।
क्षेत्रीय ख़तरे
अमेरिका की रिपोर्ट में ‘Regional Threats’ के लिए एक पृथक वर्ग बनाया गया है, जिसमें दक्षिण एशिया से लेकर इराक़ तक- पूरी दुनिया में जो भी क्षेत्रीय ख़तरे पनप रहे हैं, उनकी तरफ ध्यान आकर्षित कराया गया है। इस वर्ग में दक्षिण एशिया वाले खंड में भारत की भी चर्चा की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान समर्थित आतंकी गुट पाक स्थित सुरक्षित आतंकी ठिकानों (Safe Heaven) का इस्तेमाल करना जारी रखेंगे ताकि भारत में हमलों को अंजाम दिया जा सके और इसके लिए योजना बनाई जा सके। रिपोर्ट में कहा गया है कि ये आतंकी अमेरिकी हितों को भी निशाना बनाएंगे।
साथ ही, अमेरिका ने पकिस्तान पर भी कड़ी टिप्पणी की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में सहयोग के मामले में इस्लामाबाद का दृष्टिकोण काफ़ी संकीर्ण है। इस रिपोर्ट में आतंकी गुटों को लेकर पाकिस्तान के दोहरे रवैये पर भी सवाल खड़े किए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान आतंकी संगठनों का प्रयोग ‘नीतिगत हथियार (Policy Tools)’ की तरह कर रहा है। पाकिस्तान सिर्फ़ उन्हीं आतंकवादी संगठनों के विरुद्ध कार्रवाई करता है, जिस से उसे सीधा ख़तरा (Direct Threat) है।
रिपोर्ट में पाकिस्तान के दोहरे रवैये के प्रति चिंता जताते हुए कहा गया है कि पाकिस्तान का यह व्यवहार तालिबान के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे अमेरिकी अभियान को विफल कर देगा।
लोकसभा चुनाव और सांप्रदायिक हिंसा
बता दें कि इस साल भारत में लोकसभा चुनाव होने हैं और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में होने वाले इस चुनाव पर सभी अंतरराष्ट्रीय ताक़तों की नज़र है। अमेरिकी रिपोर्ट में आगामी चुनाव को लेकर सांप्रदायिक हिंसा की संभावना बढ़ने का अंदेशा जताया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है:
“अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी आगामी लोकसभा चुनावों में हिन्दू राष्ट्रवादी विषयों पर ज़ोर देती है तो सांप्रदायिक हिंसा की संभावना बढ़ जाएगी। मोदी के पहले कार्यकाल के दौरान भाजपा सरकार की नीतियों ने कई भाजपा शासित राज्यों में सांप्रदायिक तनाव को और गहरा करने का कार्य किया है।”
वैसे रिपोर्ट में इस निष्कर्ष के पीछे का कारण नहीं बताया गया है। नरेंद्र मोदी के पिछले साढ़े चार साल पहले सत्ता संभालने के बाद से अब तक देश में कोई बड़ा दंगा नहीं हुआ है। ऐसे में अमेरिकी रिपोर्ट में ऐसी बातें चौंकाने वाली है। यही नहीं, इस रिपोर्ट में कई अन्य हिंदूवादी नेताओं के बयानों से भी ख़तरों के उपजने की बात कही गई है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कुछ राज्य-स्तरीय हिन्दू राष्ट्रवादी नेता अपने समर्थकों को उत्तेजित करने के लिए हिन्दू राष्ट्रवादी अभियान को लोकल स्तर पर हिंसा भड़काने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।
रिपोर्ट में फिर से इस निष्कर्ष के आधार का जिक्र नहीं किया गया है। वो कौन से हिन्दू राष्ट्रवादी नेता हैं, जो हिंसा भड़का कर समर्थकों को उत्तेजित करते हैं- इस बारे में कुछ और नहीं बताया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंसा की ऐसी वारदातें मुसलामानों को अलग-थलग कर देगी और भारत में इस्लामिक आतंकवादी समूहों को अपने प्रभाव का विस्तार करने में सहयोग करेंगी।
US के WTA रिपोर्ट का एक अंश (साभार: डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस)
भारत-पकिस्तान तनाव और आतंकवाद
रिपोर्ट में भारत-पकिस्तान के बीच तनाव और पाकिस्तान समर्थित आतंकियों द्वारा भारत में हमले करने की भी बात की गई है। रिपोर्ट के अनुसार निम्नलिखित बातों का भारत-पाक तनाव पर ख़ासा असर पड़ेगा:
सीमा पार से आतंकवाद
LOC (नियंत्रण रेखा) पर गोलीबारी
भारत में विभाजनकारी राष्ट्रीय चुनाव
भारत-अमेरिकी रिश्ते को देखने का इस्लामाबाद का नज़रिया
रिपोर्ट के अनुसार, कम से कम मई 2019 (भारतीय चुनावों की समयसीमा या फिर उसके बाद) तक तो भारत और पाकिस्तान के बीच ऐसी तनावपूर्ण स्थिति बनी रहेगी। अमेरिका ने कहा है कि दोनों देशों के बीच विश्वास को मज़बूत करने के सीमित उपायों के बावज़ूद उन्होंने कश्मीर सीमा पर संघर्ष विराम जारी रखा है। लगातार हो रहे आतंकी हमलों और सीमा पार से गोलीबारी ने दोनों देशों की सोच को और सख्त कर दिया है तथा मैत्री के लिए जरूरी इच्छाशक्ति को भी कम कर दिया है।
अमेरिकी विशेषज्ञों और ख़ुफ़िया एजेंसियों द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट में भारत-पाक संबंध के निकट भविष्य में अच्छे होने की संभावना से इनकार किया गया है। इसके लिए भारत में आगामी लोकसभा चुनाव में होने वाली पैंतरेबाज़ी को जिम्मेदार ठहराया गया है।
भारत-चीन संबंधों में तनाव
अमेरिका ने अंदेशा जताया है कि इस वर्ष भी भारत और चीन के रिश्ते तनावपूर्ण बने रहेंगे। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सेनाओं की गतिविधियों के बारे में गलत धारणाएँ बनेंगी और सीमा पार चल रहे निर्माण कार्यों को लेकर भी स्थिति तनावपूर्ण बनी रहेगी। रिपोर्ट में इस बात को लेकर चिंता जताई गई है कि भारत और चीन के बीच का तनाव सशस्त्र संघर्ष का रूप भी ले सकता है।
2017 के डोकलाम विवाद की तरफ इशारा करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि उस घटना के बाद से दोनों तरफ से शांति के लिए प्रयास किए गए हैं लेकिन अनजाने में तनाव के गहरा हो जाने का जोखिम बना हुआ है। बकौल अमेरिकी रिपोर्ट, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने तनाव को कम करने और संबंधों को सामान्य करने के लिए अप्रैल 2018 में एक अनौपचारिक शिखर सम्मेलन आयोजित तो किया, लेकिन उन्होंने सीमा-संबंधी मुद्दों को संबोधित नहीं किया।
भारत और परमाणु हथियार
अमेरिका ने भारत और पकिस्तान- दोनों ही देशों के परमाणु हथियार कार्यक्रमों में हो रही निरंतर वृद्धि और विकास पर चिंता जताई है। कहा गया है कि इस से दक्षिण एशिया में परमाणु सुरक्षा से जुड़े ख़तरे बढ़ जाएंगे। नए प्रकार के हथियार क्षेत्र में सुरक्षा से जुड़े नए प्रकार के जोखिम पैदा करेंगे। अमेरिका ने पकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के बारे में बात करते हुए रिपोर्ट में कहा:
पाकिस्तान ने नए प्रकार के परमाणु हथियारों का विकास जारी रखा है, जिसमें छोटी दूरी के सामरिक हथियार, समुद्र आधारित क्रूज मिसाइल, हवा से लॉन्च क्रूज मिसाइल और लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल शामिल हैं।
इसके अलावा अमेरिका ने INS अरिहंत के बारे में बात करते हुए कहा कि भारत ने भी 2018 में मिसाइलों से लैस पहली परमाणु संचलित पनडुब्बी की तैनाती की है। पाकिस्तान ने नए प्रकार के परमाणु हथियारों का विकास जारी रखा है, जिसमें छोटी दूरी के सामरिक हथियार, समुद्र आधारित क्रूज मिसाइल, हवा से लॉन्च क्रूज मिसाइल और लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल शामिल हैं। बता दें कि अरिहंत भारत का पहला परमाणु बैलेस्टिक मिसाइल पनडुब्बी है और 2018 में उसने अपना पहला निवारक गश्त (Deterrent Patrol) पूरा कर इतिहास रच दिया था।
अर्थव्यवस्था
अमेरिकी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि वर्ष 2018 में निवेशकों ने ब्राजील, भारत, इंडोनेशिया और तुर्की से पूंजी खींच ली है, जिसके कारण उन देशों में पहले से ही ख़राब हो रहा मुद्रा विमूल्यन (Currency Depreciation) और गहरा हो गया है। इस कारण ये देश 2019 में यूएस डॉलर वाले ऋण पर काम करने में कठिनाई महसूस करेंगे।
इसके अलावा रिपोर्ट में बताया गया है कि 2018 में भारत और चीन में तरल प्राकृतिक गैस (LNG) की काफ़ी माँग रही। बता दें कि भारतीय रेलवे भी अब एलएनजी के इस्तेमाल करने की योजना तैयार कर रहा है।
आज जब हम गाँधी जी की 150वीं जयंती मना रहे हैं तो याद आता है बापू आज़ाद हिंदुस्तान में केवल साढ़े पाँच महीने जीवित रह सके। हमने ऐसा क्या किया कि 125 साल तक ज़िंदा रहने कि इच्छा रखने वाले गाँधी अपने आखिरी दिनों में मौत की कामना करने लगे थे।
आज़ाद हिंदुस्तान में उन्होंने अपनी एक ही वर्षगाँठ देखी उस दिन प्रार्थना सभा में बोलते हुए उन्होंने कहा, “मेरे लिए तो आज मातम मनाने का दिन है। मैं आज तक ज़िंदा पड़ा हूँ। इस पर मुझको खुद आश्चर्य होता है। शर्म लगती है, मैं वही शख्स हूँ जिसकी जुबान से एक चीज निकलती तो करोड़ो मानते थे लेकिन आज तो मेरी कोई सुनता ही नहीं है। मैं कहूँ कि तुम ऐसा करो, ‘नहीं, ऐसा नहीं करेंगे’ ऐसा कहते हैं। ऐसी हालत में हिन्दुस्तान में मेरे लिए जगह कहाँ है और मैं उसमें ज़िंदा रह कर क्या करूँगा?…..”
आखिर क्यों? कहना पड़ा गाँधी को यह सब अपनी हत्या से ठीक पहले की वर्षगाँठ पर? क्या गाँधी की हत्या को रोका जा सकता था? कौन से थे वे लूप होल्स जहाँ लगा कि कुछ लोग हैं जिनके लिए अब गाँधी का नाम ही काफी है, गाँधी नहीं? चलिए थोड़ा पीछे ले चलता हूँ।
शुक्रवार 30 जनवरी 1948 की शुरुआत गाँधी जी के जीवन में एक आम दिन की तरह ही हुई। हालाँकि माहौल इतना शान्तिपूर्ण नहीं था, गाँधी जी को भी पता था उनकी वज़ह से उनके अपने ही देश में कुछ लोग नाराज़ हैं। वज़ह गाँधी जी की यह ज़िद कि पाकिस्तान को उसके हिस्से का 55 करोड़ रुपए मिलना चाहिए। बेशक़, वह उससे भारत के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए हथियारों की ख़रीद में ही क्यों न इस्तेमाल करे। पाकिस्तान को उसका हक़ दिलाने के लिए कई दिनों तक गाँधी जी ने अनशन भी किया था। गाँधी जी, शरीर जर्ज़र होने के बावज़ूद भी उस दिन हमेशा की तरह तड़के साढ़े तीन बजे सोकर उठ गए थे। प्रार्थना की, उसके बाद दो घंटे अपनी डेस्क पर कॉन्ग्रेस की नई जिम्मेदारियों के मसौदे पर काम किया और इससे पहले कि दूसरे लोग उठ पाते, छह बजे फिर सोने चले गए।
कौन जानता था कि आज शाम गाँधी जी हमेशा के लिए आँखें मूँद लेंगे। एक ऐसी चिरकालीन निद्रा में चले जाएँगे, जहाँ से शायद फिर कभी वापसी न हो।
नोआखाली के दंगों के बाद से ही गाँधी जी की जान को ख़तरा बढ़ गया था। जग़ह-जग़ह उनके ख़िलाफ़ नारेबाज़ी हो रही थी। फिर भी, गाँधी जी उसे नज़रअंदाज़ करते हुए अपनी धुन में जिए जा रहे थे। लेकिन उनके आस-पास के लोग जो सत्ता में थे, वो उनपर बढ़ते खतरे को देखते हुए भी क्यों इतने लापरवाह हो गए थे, ये सवाल आज भी है? क्यों गाँधी जी कॉन्ग्रेस को भंग कर देना चाहते थे? क्यों ख़ुद को खोटा सिक्का कहने लगे थे? क्यों अपने ही देश में उपेक्षित महसूस कर रहे थे?
तनाव के उस दौर में, उनका ज़्यादातर समय नेहरू और पटेल के मतभेद सुलझाने में जा रहा था। पटेल ने सत्ता से दूर हटने के संकेत दे दिए थे? शायद नेहरू मंजूरी भी दे देते लेकिन गाँधी जानते थे कि पटेल देश की ज़रूरत हैं। सच्चाई ये भी है कि नेहरू, गाँधी के उनके प्रति मोह की वज़ह से ही सत्ता के केंद्र बने हुए थे। तनातनी के माहौल में गाँधी का ख़ुद को उपेक्षित महसूस करना अनायास नहीं था, बल्कि माहौल ही ऐसा था।
शायद आज की नई पीढ़ी उस समय के घटनाक्रमों से वाकिफ़ न हो! पिछले कई दिनों से जब मैं उस समय की परिस्थितियों पर गौर कर रहा था, तो बार-बार कुछ बातें दिमाग में हलचल पैदा करती रहीं कि कैसे थोड़ी सी लापरवाही, थोड़ी सजगता की कमी और थोड़ी सी ज़िद ने इतिहास के घटनाक्रमों का रुख मोड़कर, उस दौर में देश, तमाम विरोधाभाषी विचारों और व्यक्तित्वों के टकराव का केंद्र बन चुका था।
कहते हैं “इतिहास गौरव से ज़्यादा विश्लेषण का विषय वस्तु है” जिससे सबक लेकर आने वाली पीढ़ियाँ उन गलतियों के दोहराव से बच सकती हैं। चलिए आपको जनवरी 1948 के कुछ तारीख़ों से परिचय कराते हैं कि कैसे षड्यंत्रों के बीज बोए गए, कहाँ सुरक्षा में चूक हुई, कि तमाम आहटों और स्पष्ट जानकारियों के बावजूद भी हमने गाँधी को खो दिया।
20 जनवरी 1948, की सुबह साफ़ और चमकदार थी। फ़िज़ा में अनशन के बाद गाँधी जी के स्वास्थ्य में सुधार की ख़बर थी। सुबह के 8.30 बजे गाँधी जी हत्या कर देने के इरादे से चार षडयंत्रकारी आप्टे, करकरे, बागड़े और किस्तैया बिड़ला निवास के लिए निकले। गोपाल गोडसे इस योजना का हिस्सा था, लेकिन किसी कारण से नाथूराम गोडसे ने षड्यंत्र की प्रारंभिक योजना में भाग नहीं लिया था। 20 जनवरी को गाँधी को पीछे से हथगोला फेंक कर मार देने की योजना थी। उनके हथियारों में पाँच हथगोले और दो पिस्तौल थी लेकिन पिस्तौल सही हालत में न थी।
उस दिन प्रार्थना सभा में ऐन वक़्त पर प्लानिंग के हिसाब से कुछ भी नहीं हुआ। उस शाम एक षड्यंत्रकारी पाहवा के भगदड़ मचाने के लिए पलीते में आग लगाने के बाद भी प्रार्थना सभा में कोई भगदड़ नहीं मची। हालाँकि, उस समय बागड़े और किस्तैया गाँधी के पास ही ही खड़े थे, पर फिर भी किसी तरह के ख़ास हलचल न मचने की वज़ह से गाँधी को मार देने की योजना बुरी तरह विफ़ल हो गई थी। और षड्यंत्रकारी पाहवा पुलिस की हिरासत में था। विडम्बना कहें या लापरवाही? पूछताछ में पाहवा ने उस रात बाकी सभी षड्यंत्रकारियों के नाम बता दिए थे। फिर भी न गाँधी की सुरक्षा बढ़ाई गई, न बाकी के षड्यंत्रकारियों को पकड़ने की कोई योजना ही बनी। अगले दिन मदनलाल पाहवा के हिरासत में होने की ख़बर प्रमुखता से अख़बारों में छपी।
जब ये ख़बर बम्बई में डॉ. जैन ने पढ़ी तो वे तुरंत अधिकारियों से मिलने की सोचने लगे क्योंकि उनके पास बाकी षड्यंत्रकारियों के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी थी। हुआ यूँ था कि 13 जनवरी को जब पाहवा मुंबई में ही था और कोई भी षड्यंत्रकारी दिल्ली के लिए नहीं निकला था, तब पाहवा ने डॉ. जैन के माध्यम से समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण से मिलने का समय माँगा था। लेकिन आखिरी वक़्त में एक दुर्घटना के कारण पाहवा की मुलाक़ात डॉ. जैन, जयप्रकाश नारायण से नहीं करा पाए।
प्रार्थना सभा में धमाके के अगले दिन, डॉ.जैन हड़बड़ी में एक से दूसरे सरकारी विभाग फोन कर रहे थे। सरदार पटेल भी उस दिन बम्बई में ही थे लेकिन वो भी व्यस्त थे। बम्बई कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष एस के पाटिल के बम्बई में मौजूद नहीं होने से उनसे मिलना सम्भव नहीं था। अंततः बी जी खेर से जैन की मुलाक़ात हुई और डॉ. जैन ने उन्हें पाहवा और विष्णु करकरे के नाम के बारे में बताया। पाहवा ने इस षड्यंत्र के बारे में खुद ही जैन को बताया था। उसने सावरकर का आशीर्वाद होने की बात भी कही थी। जब डॉ. जैन ये कहानी सुना रहे थे, तब उनको भी अंदेशा था कि उनकी बात पर कोई भरोसा नहीं करेगा क्योंकि ये आम धारणा है कि कोई साज़िश कर्ता अपने षड्यंत्रों के बारे में किसी को क्यों बताएगा और यही हुआ भी। हालाँकि, डॉ. जैन के अति प्रतिष्ठित होने की वजह से उन पर भी किसी ने शक नहीं किया।
महात्मा गाँधी , नेहरू और पटेल
बी जी खेर ने डॉ. जैन पर भरोसा जताते हुए उन्हें मोरारजी देसाई से मिलाया। उस समय मोरारजी बम्बई सरकार के गृहमंत्री थे इसलिए पुलिस और अपराधों की छानबीन की जिम्मेदारी उनकी थी। पर जो कहानी डॉ. जैन ने मोरारजी को सुनाई थी, वह इतनी अनपेक्षित थी कि मोरारजी उस पर यकीन ही नहीं कर पाए। उन्होंने सोचा कि भला मदनलाल पाहवा भाषा के एक प्राध्यापक को अपने षड्यंत्र के बारे में क्यों बताएगा, जो कि उसे संयोग से बम्बई की व्यस्त गलियों में मिल गए थे? दूसरी बात, डॉ. जैन ये बात उन्हें बताने के लिए इतने उतावले क्यों थे? हालाँकि डॉ. जैन ने उनके सभी प्रश्नों का उत्तर देने की कोशिश की थी, जो उनसे पूछे गए थे। लेकिन इसके बावजूद मोरारजी उनसे सन्तुष्ट नहीं हुए। और उन्होंने ख़ुश्क और अशिष्ट स्वर में डॉ. जैन से पूछा कि फिर तो आपको भी उन षड्यंत्रकारियों में से एक होना चाहिए। एक क्षण को वो हिल गए पर संभलते हुए उन्होंने एक और कोशिश की कि उन्हें दिल्ली भेजा जाए, हो सकता है कि पाहवा उन्हें अपनी योजना के बारे में बता दे। मोरारजी ने ये सुझाव भी एक तरफ सरका दिया और कोई ध्यान नहीं दिया।
यहाँ लगता है कि किस तरह किसी घटना को ठीक से समझ न पाने के कारण हम भारी अनिष्ट को निमंत्रण दे देते हैं। उस समय भी अँग्रेज सरकार में 11 साल मजिस्ट्रेट रह चुके मोरारजी देसाई से एक भारी भूल हुई थी।
फिर भी मोरारजी उसी दिन अहमदाबाद जाते हुए बम्बई के उपायुक्त जे डी नागरवाला को इस षड्यंत्र के बारे में ब्रीफ करते हुए, सावरकर के घर पर नज़र रखने को बोल गए। अगले कुछ दिनों तक डॉ. जैन परेशान रहे कि इतनी महत्वपूर्ण सूचना को नज़र अंदाज़ किया जा रहा है। षड्यंत्रकारियों को पकड़ने के लिए कुछ नहीं किया जा रहा है। हालाँकि, 20 जनवरी को गाँधी से महज़ 70 फ़ीट की दूरी पर भगदड़ के लिए पाहवा द्वारा आग लगाए गए बम फटने से सरदार पटेल ने बिड़ला हाउस में पुलिस बल बढ़ा ज़रूर दिया था पर डॉ. जैन को पुलिस पर भरोसा नहीं था।
पता नहीं क्यों षड्यंत्रकारियों को पकड़ने की चिंता न पटेल को थी, न मोरारजी को और न पुलिस को। क्या ऐसा नासमझी की वज़ह से हो रहा था। या लोग मन ही मन गाँधी से छुटकारा चाहने लगे थे? जीवित गाँधी अब उनके काम के नहीं थे। पता नहीं क्या रहा होगा उस समय के सत्ताधीशों के मन में, जिसका अब सिर्फ़ अनुमान ही किया जा सकता है।
इस पर पड़ी धुंध थोड़ी तब छटती है, जब इस घटना के 20 वर्ष बाद गाँधी से जुड़ी कुछ अनसुलझी बातों का पता लगाने के लिए जस्टिस कपूर की अध्यक्षता में एक समिति का गठन हुआ। समिति की रिपोर्ट से पता चला कि पुलिस महकमे ने आलस्य और ढिलाई का परिचय देते हुए इस मामले की तफ़्तीश का कोई लिखित विवरण भी नहीं रखा था। शायद कोई तफ़्तीश हुई ही न हो। गाँधी की हत्या के षड्यंत्र के मामले में उच्च पदस्थ लोग इतने उदासीन हो चुके थे कि जैसे उन्हें गाँधी से कोई मतलब ही न हो। ऐसा प्रतीत होता है कि सत्ता का सुख भोगने के लिए, सब इस षड्यंत्र को अपने हिसाब से पूरा हो जाने देना ही चाहते थे। शीघ्र ही, एक ऐसी हत्या इतिहास में दर्ज़ हो जाने वाली थी, जिस पर उच्च सरकारी अधिकारियों के साथ पुलिस की भी मौन सहमति थी।
20 जनवरी की असफलता के बाद बागड़े और किस्तैया ने पूना तथा नाथूराम गोडसे और आप्टे ने बम्बई की ट्रेन पकड़ी। गोपाल गोडसे और करकरे ने फ्रंटियर होटल में रात गुज़ारी। इस असफलता से वे सभी निराश नहीं हुए थे बल्कि चारों तरफ़ फैली सुस्ती से अब गाँधी की हत्या के लिए पहले से कहीं अधिक दृढ़ थे।
महात्मा गाँधी और नाथूराम गोडसे
जल्द ही, पुनः योजना बनी पर हमेशा की तरह इस बार भी समस्या पिस्तौल की थी। क्योंकि गोपाल गोडसे द्वारा ठीक की गई बंदूकों का कोई भरोसा नहीं था। एक बार फिर पुरानी फिल्म जैसे चल पड़ी थी।
26 जनवरी 1948 की रात को थाने स्टेशन पर नाथूराम, आप्टे और करकरे मिले, जहाँ गोडसे ने पाहवा द्वारा उनके नाम उजागर कर देने की बात भी कही। उसके विचार में अब 9-10 के ग्रुप में चलने की मूल योजना ग़लत थी। अतः गोडसे अब बार-बार कहने लगा कि गाँधी की हत्या वही करेगा। लेकिन उसे किसी की मदद की भी ज़रूरत है। शायद इतने बड़े महामानव का सामना करने के लिए, नैतिक बल चाहता हो। यहीं पर, नाथूराम गोडसे ने इस योजना से अपने भाई गोपाल गोडसे को भी बाहर रखने का निर्णय लिया। इस प्रकार अब यही तीनों हत्या की योजना में शामिल थे।
योजना के अनुसार, नाथूराम और आप्टे हवाई जहाज़ से और करकरे को रेल से दिल्ली पहुँचकर 29 जनवरी को बिड़ला मंदिर में मिलना था।
नारायण आप्टे, नाथूराम गोडसे, मदन लाल पाहवा, विष्णु करकरे
षड्यंत्रकारियों ने अपने आप को छिपाने का कोई प्रयत्न नहीं किया था। हमेशा की तरह नाथूराम गोडसे अनगिनत लोगों से अपनी योजना की चर्चा कर रहा था। यहाँ तक कि बम्बई से दिल्ली की हवाई यात्रा के लिए उसने अपना नाम एन विनायकराव लिखवाया, उसका पूरा नाम था नाथूराम विनायक गोडसे। इसी प्रकार आप्टे ने डी नारायण के नाम से यात्रा की, उसका पूरा नाम था नारायण दत्तात्रेय आप्टे। कोई भी बुद्धिमान जासूस या अधिकारी उन्हें हवाई जहाज़ में ही आराम से पकड़ सकता था। पर पता नहीं क्यों, उस समय के महकमे को इसकी भनक नहीं लगी या पूरा महक़मा जान बूझकर मौन साधे रहा। ये भी इतिहास के गर्भ में छिपी सच्चाई ही है।
27 जनवरी को दिल्ली पहुँचकर, गोडसे और आप्टे दिल्ली-मद्रास एक्सप्रेस से रात 10.38 पर ग्वालियर पहुँचे। यहाँ से जगदीश प्रसाद गोयल से 500 रुपए में नई रिवॉल्वर और सात गोली ली। उसी रात रेल से ही वे दिल्ली वापस आ गए। रिवॉल्वर के लिए 400 किलोमीटर की यात्रा में भी किसी को भनक नहीं लगी। ये भी कमाल है। शायद ही कहीं कोई तफ़्तीश हुई या कार्यवाही की रूप रेखा बनी, जबकि घटना के विस्तार के साथ सूत्रों के स्रोत फैलते जा रहे थे।
यहाँ तक कि, दिल्ली आने पर विनायकराव के नाम से इस बार होटल न लेकर, रेलवे स्टेशन के सस्ते विश्राम गृह में रुकने का निर्णय लिया गया। हालाँकि उस दिन भी प्रार्थना सभा थी पर थके होने की वजह से हत्या की योजना अगले दिन के लिए टाल दी गई। शाम को, दिमाग की शांति के लिए करकरे और आप्टे सिनेमा देखने गए, गोडसे वहीं विश्राम गृह में ही एक क़िताब पढ़ता रहा।
30 जनवरी को गोडसे जल्दी तैयार हो गया था। जंगल में जाकर गोडसे ने रिवॉल्वर का परीक्षण भी किया। सुबह से ही वह किसी से ज़्यादा बात नहीं कर रहा था। दोपहर तक गोडसे ख़ुद में सिमट गया था।
शाम को 4.30 बजे गोडसे ने ताँगा लिया और अकेले ही बिड़ला हॉउस पहुँच कर प्रार्थना सभा की भीड़ में शामिल हो गया। कुछ देर बाद करकरे और आप्टे भी वहाँ पहुँचकर भीड़ में शामिल हो गए।
शाम 5.15 पर गाँधी जी आभा और मनुबेन के कन्धों पर हाथ रखे बिड़ला हाउस से प्रार्थना सभा के लिए आए। रोज़ उनका रास्ता साफ़ करने वाला गुरुवचन आज पीछे आ रहा रहा था क्योंकि पटेल से मुलाकात के कारण थोड़ी देर होने की वजह से गाँधी जी मैदान के बीच से तेजी से आ गए थे।
गाँधी जब प्रार्थना स्थल की सीढियाँ चढ़ रहे थे, तब गुरुवचन को देखकर मुस्करा रहे थे। सीढ़ियाँ चढ़कर कुछ ही कदम चले होंगे कि नाथूराम गोडसे भीड़ से निकलकर उनके सामने आ गया। उसने मनुबेन को इतनी जोर से धक्का दिया कि वह ज़मीन पर गिर पड़ी और गोडसे ने बिलकुल निकट से तीन गोलियाँ गाँधी पर दाग दीं। तभी दौड़ कर रॉयल इंडियन एयरफ़ोर्स का सार्जेंट देवराज सिंह ने एक हाथ से गोडसे की कलाई पीछे मोड़ते हुए दूसरे हाथ से उसके मुँह पर घूँसों की बरसात कर दी।
थोड़ी देर में वहां इकट्ठे कई लोग गोडसे को पीटने लगे। प्रार्थना स्थल पर अफरा-तफ़री मच गई। जब तक लोग कुछ समझ पाते, तब तक गाँधी जी दम तोड़ चुके थे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार गाँधी जी अंतिम शब्द ‘हे राम’ नहीं थे। आघात इतना तेज़ और अचानक था कि उन्हें कुछ सोचने-समझने का अवसर ही नहीं मिला।
महात्मा गाँधी का अंतिम दर्शन
वहाँ डर, सिसकियों और उसे मार डालो की चीख़ के बीच लहूलुहान गोडसे को ले जाते हुए भी किसी ने नहीं देखा। दस मिनट तक भीड़ दुःख के आवेग में डूबी रही, लोग समझ ही नहीं पा रहे थे कि करना क्या है? जहाँ गाँधी गिरे थे, अब भी वहीं थे। उनका सर आभा और मनुबेन की गोद में था और उनकी चादर पर निरंतर खून फैलता जा रहा था। अंततः उन्हें बिड़ला हॉउस के भीतर ले जाया गया।
जहाँ गाँधी का शरीर धराशाई हुआ था, वहाँ लोगों के बार-बार आने-जाने से एक फ़ीट गड्ढा हो गया था। थोड़ी ही देर में पुलिस वाले छानबीन के लिए पहुँच चुके थे। घास से दो गोलियाँ तत्काल बरामद हुई थी, तीसरी उनके सीने में फँसी रह गई थी।
कुछ ही दिनों के भीतर सारे षड्यंत्रकारियों को गिरफ़्तार कर लिया गया था। बागड़े को अगले दिन, गोपाल गोडसे और परचुरे को चार दिन बाद व किस्तैया को 14 फ़रवरी को गिरफ़्तार कर लिया गया। 11 अप्रैल को जगदीश प्रसाद गोयल को भी गिरफ़्तार कर लिया गया पर कुछ कारणों से उस पर अन्य क़ैदियों के साथ मुक़दमा नहीं चलाया गया।
कभी-कभी सोचता हूँ, काश पुलिस थोड़ी पहले हरक़त में आई होती तो क्या आज हम जिस भारत में साँस ले रहे हैं, उसकी तस्वीर ऐसी ही होती! मालूम नहीं, गाँधी नहीं रहे पर आज भी उनका जीवन निष्कलंक तो नहीं कहा जा सकता फिर भी अनुभूत सच का पक्षधर ज़रूर है। आज भी गाँधी जैसा व्यक्तित्व इस मुखौटा प्रधान छद्म समाज में शायद ही मिले। गाँधी सत्य की अनुभूति के लिए उसे प्रयोगों की कसौटी पर कसने की जो सीख दे गए हैं, वो आने वाली पीढ़ियों का सदैव मार्गदर्शन करती रहेंगी।
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की स्मृति को ऑपइंडिया की तरफ़ से कोटिशः प्रणाम!