Friday, April 3, 2026
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व्यापार पर बात, ममता बनर्जी करने लगी ‘मुस्लिम वोट बैंक’ का बचाव: क्या हैं बंगाल CM के बयान के मायने, क्यों BJP नेता ने इसे बेलडांगा हिंसा से जोड़ा?

नबन्ना के बिजनेस लीडर्स के मंच से बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बेलडांगा हिंसा की पृष्ठभूमि में मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करने से खुद को नहीं रोक पाई। जहाँ 'मुस्लिम वोटबैंक' को खुश करने के लिए कट्टरपंथी भीड़ द्वारा सड़कों पर अवरोध करने का बचाव किया।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में नबन्ना में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उद्योगपतियों और बिजनेस लीडर्स को संबोधित किया। यह मंच बंगाल में निवेश, व्यापार और औद्योगिक विकास के माहौल पर बातचीत के लिए था। लेकिन इसी मंच से ममता बनर्जी ने अपनी मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति के सबूत दिए।

कार्यक्रम को संबोधित कर अपने भाषण में ममता बनर्जी कहती हैं, “अगर हम 30 प्रतिशत समुदाय के आदमी से झगड़ा करें, तो वो रोज रोड अवरोध करेगा। आपकी कंपनी बंद कर देगा। हमारा जीना हराम कर देगा। हम चाहते हैं सब बराबर रहें। कोई किसी के मसलों में हस्तक्षेप न करे।”

ममता बनर्जी के बयान का यह वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल है। यह बयान ऐसे समय में आया है, जब कुछ ही दिन पहले बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के बेलडांगा इलाके में मुस्लिम भीड़ ने बवाल मचाया था। भीड़ ने सड़क और रेलवे जाम किया, वाहनों में तोड़फोड़ और पत्थरबाजी की।

बीजेपी ने ममता बनर्जी के इस बयान को आड़े हाथों लेते हुए इसे बेलडांगा में हुई हिंसा से जोड़ा है। बीजेपी नेता अमित मालवीय ने कहा, “इस तरह मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बेलडांगा में हुई हिंसा को उचित ठहराया और मूलरूप से यह कहा कि उनके वोट बैंक को पूरे प्रदेश में उत्पात मचाने का अधिकार है और वह कोई कार्रवाई नहीं करेंगी।”

मुस्लिमों को खुश करने के लिए ममता बनर्जी ने व्यापारिक मंच का किया उपयोग

बीजेपी ने इसे बेलडांगा से सिर्फ इसीलिए जोड़ा क्योंकि ममता बनर्जी का बयान और मकसद उसी कम्युनिटी के लोगों का बचाव करता हुआ दिखाई देता है, जिसने बेलडांगा की सड़कों पर उपद्रव मचाया था। मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में भले ही किसी जगह या घटना का नाम न लिया हो, लेकिन शब्दों का चुनाव और समय अपने आप में बहुत कुछ कहता है।

यहाँ सवाल यह है ही नहीं कि ममता बनर्जी ने किसी घटना का नाम लिया या नहीं। सवाल यह है कि उन्होंने क्या कहा, किस मंच से कहा और किस संदर्भ में कहा? नबन्ना का मंच व्यापारियों के लिए था। वहाँ से संदेश यह जाना चाहिए था कि राज्य में विकास और व्यापार को कैसे आगे बढ़ाया जाए। लेकिन इसके बजाए बयान का फोकस इस बात पर रहा कि एक खास कम्युनिटी (मुस्लिमों) को नाराज करने का नतीजा क्या हो सकता है।

ममता बनर्जी ने यह नहीं कहा कि सड़क जाम करने गलत है। उन्होंने यह भी नहीं कहा कि जो कोई भी ऐसा करेगा, उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। इसटे उलट वह ऐसा करने वाली मुस्लिम भीड़ का बचाव करते हुए इतने बड़े मंच से लोगों को उन उपद्रवियों से डरने का संदेश दे रही हैं।

ममता बनर्जी मुस्लिम वोटबैंक पर मंडराए खतरे को निपटाने की रणनीति

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आगे कहती हैं कि सरकार चाहती है कि सब लोग अपनी-अपनी जिंदगी जिएँ, कोई किसी के मामलों में दखल न दे। यह वचन सुनने में काफी उदार लगते हैं। लेकिन जब इसे जमीनी हकीकत के साथ जोड़ा जाता है, तो कई असहज सवाल खड़े होते हैं। अगर सच में सबको बराबरी का अधिकार है तो बार-बार सड़क जाम और विरोध के जरिए हिंदुओं को दबाने की राजनीति बंगाल की पहचान क्यों बन गई है?

मुस्लिमों के क्राइम पर बराबरी की बात करने से ममता बनर्जी ने केवल उनके अपराधों को ढकने का काम किया है। मुस्लिम तुष्टीकरण में ममता बनर्जी इतना डूब चुकी हैं कि उन्हें मतलब ही नहीं है कि वो कौन-से मंच पर हैं? वो सिर्फ इस कोशिश में लगी हैं कि कहीं उनका मुस्लिम वोटबैंक हाथ से न निकल जाए। वैसे भी आगामी विधानसभा चुनावों में TMC पर मुस्लिम वोटबैंक खोने का खतरा मंडरा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, विधानसबा चुनाव 2026 में मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की नींव रखवाने वाले TMC के बागी नेता हुमायूं कबीर TMC के खिलाफ मुस्लिम गठबंधन खड़ा करने जा रहे हैं। इस गठबंधन में प्रतिबंधित संगठन PFI का राजनीतिक दल SDPI से लेकर फुरफुरा शरीफ मस्जिद के राजनीतिक दल ISF शामिल होने जा रहा है। खबरें यह भी हैं कि कॉन्ग्रेस को भी गठबंधन में शामिल होने का न्योता मिला है।

तो अगर यह मुस्लिम गठबंधन बन भी जाता है, तो सबसे ज्यादा खतरा ममता बनर्जी की TMC को ही है, क्योंकि उनकी आधी राजनीति मुस्लिम तुष्टीकरण के ही भरोसे है। क्योंकि पिछले कई सालों में ममता बनर्जी की सरकार में हिंदुओं पर लगातार अत्याचार और हमले पर चुप्पी दर्ज कर उन्होंने अपना मुस्लिम वोटबैंक मजबूत किया है। पिछले साल 2025 में फुरफुरा शरीफ में इफ्तार पार्टी अटेंड करना भी इसी मुस्लिम वोटबैंक को खुश करना था। और आने वाले चुनावों में भी उनकी यही रणनीति है।

ममता बनर्जी की ‘बराबरी’ की बात और जमीनी हकीकत

अब बिजनेस लीडर्स के मंच से सामने आया ममता बनर्जी का यह बयान, भले ही मुख्यमंत्री इसे अलग संदर्भ में पेश कर रही हों, लेकिन यह सवाल छोड़ जाता है कि बंगाल में बार-बार सड़क जाम, दंगे और उपद्रव आखिर किसका काम है? बेलडांगा हो या इससे पहले सामने आई बाकी हिंसाओं की घटना हो, अक्सर दिखता रहा है कि विरोध के नाम पर कानून हाथ में लेने वाली भीड़ एक ही पहचान से जुड़ी होती है।

मुख्यमंत्री यह भी कहती हैं कि सबको अपनी इच्छा से जीने का अधिकार है और कोई किसी के मसलों में दखल न दे। लेकिन यह बात तब खोखली लगने लगती है, जब जमीनी हकीकत कुछ और कहती है। अगर सबको अपनी इच्छा से जीने का अधिकार है, तो फिर हिंदुओं को यह सलाह क्यों दी जाती है कि वे मुस्लिम बहुल इलाको में न जाएँ? क्यों हिंदू पलायन कर रहा है? क्यों ममता सरकार की पुलिस हिंदुओं को प्रदर्शन करने पर लाठियों से कूटती है? क्यों हिंदुओं के धार्मिक जुलूस पर पत्थरबाजी होती है?

संदेशखाली की घटनाओं के दौरान भी यही पैटर्न देखने को मिला। हिंदू पीड़ितों की शिकायतों पर गंभीरता से बात करने की बजाए ममता सरकार ने आरोपों का रुख RSS और BJP की ओर मोड़ दिया। इससे पता चलता है कि मुस्लिमों के क्राइम पर ममता बनर्जी की सरकार बराबरी की बात करती है, लेकिन हिंदुओं पर हुए अत्याचार को लेकर आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति करती है।

निष्कर्ष: ममता बनर्जी का दोहरा रवैया

देखा जाए तो ममता बनर्जी की राजनीति मुस्लिम तुष्टीकरण पर केंद्रित होकर रह गई है। जो वो बिजनेस लीडर्स के मंच से भी मुस्लिमों को खुश करने वाले बयान देने से खुद को नहीं रोक पा रही हैं। जब बेलडांगा में मुस्लिमों द्वारा सड़कों पर अवरोध और उपद्रव करने वाली मुस्लिम भीड़ को लेकर ‘बराबरी’ और ‘अधिकार’ की याद आ जाती है, वहीं हिंदुओं पर सालों से हो रहे अत्याचारों के मामलों में या तो आरोप दूसरों के सिर मढ़ दिए जाते हैं या फिर चुप्पी साध ली जाती है।

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