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‘न्यूड फोटो शूट से महिलाओं की भावनाओं को किया आहत’: रणवीर सिंह के खिलाफ पुलिस कंप्लेन, आलिया भट्ट बोलीं- बुरा नहीं सुन सकती

बॉलीवुड एक्टर रणवीर सिंह के न्यूड फोटोशूट के खिलाफ मुंबई पुलिस को एक शिकायत दी गई। रणवीर उस फोटोशूट में बिना कपड़ों के नज़र आ रहे हैं जिस वजह से तरफ उन्हें काफी ट्रोल किया जा रहा है वहीं अब वह एक नई मुसीबत में भी पड़ गए हैं।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, रणवीर के खिलाफ न्यूड फोटोशूट कराने के मामले में भारतीय संस्कृति का हवाला देते हुए एक गैर-सरकारी संस्था ने मुंबई के चेम्बूर पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करवाई है। श्याम मंगाराम फाउंडेशन नाम के एक NGO ने अपनी शिकायत में लिखा, ”हम पिछले 6 साल से बच्चों और विधवाओं के अच्छे भविष्य के लिए काम कर रहे हैं। पिछले हफ्ते हमने रणवीर सिंह की कई न्यूड फोटोज़ वायरल होते हुए देखीं। वो तस्वीरें जिस हिसाब से क्लिक की गईं उससे कोई भी महिला और पुरुष शर्मसार महसूस करेंगे।”

रणवीर सिंह के खिलाफ शिकायत दर्ज (साभार-ABP न्यूज़)

बता दें कि जहाँ रणवीर सिंह को उनकी अलग-अलग पोज़ में नग्न तस्वीरों के लिए ट्रोल किया जा रहा है वहीं अर्जुन कपूर के बाद उनकी दोस्त आलिया भट्ट ने भी उनका समर्थन किया है। हाल ही में जब डार्लिंग्स के ट्रेलर लॉन्च पर आलिया भट्ट से जब रणवीर सिंह के न्यूड फोटोशूट पर रिऐक्शन पूछा गया तो उन्होंने रणवीर को अपना फेवरिट बताया। आलिया ने अपने दोस्त और अभिनेता रणवीर का बचाव करते हुए कहा, “मुझे अपने पसंदीदा रणवीर सिंह के बारे में कुछ भी नकारात्मक कहना और सुनना पसंद नहीं है। मैं उनसे हमेशा प्यार करती हूँ और वह केवल मेरे ही नहीं हर किसी के पसंदीदा कलाकार हैं। रणवीर ने हमें बहुत ही बेहतरीन फिल्में दी हैं, इसलिए हमें उन्हें सिर्फ प्यार देना चाहिए।”

गौरतलब है कि रणवीर सिंह ने पेपर मैगज़ीन के लिए एक फोटोशूट करवाया जिसने सोशल मीडिया पर तहलका मचा दी। बॉलीवुड एक्टर रणवीर की कई फोटोज़ सोशल मीडिया पर वायरल हुईं जिनमें वह न्यूड होकर अलग-अलग पोज़ देते नजर आए। जहाँ इस फोटोशूट की वजह से रणवीर को सोशल मीडिया पर खूब ट्रोल किया गया तो वहीं उनके सपोर्ट में भी बॉलीवुड के दूसरे एक्टर के अलावा तमाम लिबरल और वामपंथी समूहों ने किया। हालाँकि, इतने के बाद भी रणवीर सिंह का कहना है कि ये तो सिर्फ फोटोशूट है, वो 1000 लोगों के सामने भी न्यूड हो सकते हैं उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता।

जनजातीय समाज बोझ नहीं, एक संपदा: अंग्रेजी ‘ट्राइबल’ मानसिकता से नहीं, नायकों की कहानियों से समझना होगा देश को

प्राचीन काल से ही भारत में जनजातीय समाज की महत्वपूर्ण स्थिति रही है। परंतु अंग्रेजों ने परिभाषा बदल दी। उन्होंने औपनिवेशिक कारणों से नई परिभाषाएँ गढ़ीं, नए नाम दिए। ट्राइबल शब्द का प्रयोग प्रारंभ किया और उसकी परिभाषा उन्होंने यूरोपीय तरीके से की, जो भारत पर लागू नहीं होती थी।

इस प्रकार लगभग 150 वर्षों से उन्होंने ऐसा एक कथानक गढ़ा जो आज भी जारी है। इस कथानक की रचना उन्होंने नृतत्व विज्ञान के रूप में की। इस कथानक का ही परिणाम है कि जनजातीय समाज को बोझ समझा जाता है। सचाई यह है कि जनजातीय समाज बोझ नहीं, एक संपदा है। ये बातें राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष हर्ष चौहान ने दिल्ली आईआईटी से सीनेट हॉल में आयोजित एक कार्यक्रम में कही।

आयोग की तरफ से दिल्ली आईआईटी में जनजाति समुदाय एवं विश्वविद्यालयों में अनुसंधान विषय पर एक कार्यक्रम आयोजित किया था। कार्यक्रम में पटना, रांची, पटना, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय व आईआईटी रायपुर के अलावा देशभर के 30 से ज्यादा विश्वविद्यालयों के कुलपति शामिल हुए थे।

दरअसल आजादी के अमृत महोत्सव के तहत राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों से जनजाति समाज से आने वाले नायकों को लेकर शोध करने के लिए कहा है। ताकि उन नायकों की कहानियाँ भी लोगों तक पहुँच सके। इसके अलावा जनजातीय समाज से जुड़े विभिन्न विषयों पर विश्वविद्यालयों द्वारा उनके यहाँ शोधकार्य को बढ़ावा देने के लिए कहा है।

जनजाति समुदाय एवं विश्वविद्यालयों में अनुसंधान विषय पर आयोजित कार्यक्रम में आए गणमान्य लोग

आयोग के अध्यक्ष हर्ष चौहान ने इस विषय और अधिक प्रकाश डालते हुए कहा कि हमारे संविधान निर्माताओं के पास यह दृष्टि थी और इसलिए उन्होंने जनजातीय समाज के लिए अद्भुत प्रावधान किए, जो विश्व में इकलौते हैं। उनकी दूरदृष्टि पर हमें गर्व होना चाहिए। पूरे विश्व में जनजातीय समाज की संपदा को सुरक्षित रखने के लिए कहीं भी ऐसे प्रावधान नहीं हैं।

जनजातीय समाज एक मौन समाज है। वह शोर नहीं मचाता। प्रारंभ में अनुसूचित जाति तथा जनजाति का एक ही मंत्रालय था, जबकि दोनों में काफी भिन्नता है। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में पृथक मंत्रालय बना और आयोग की रचना हुई। परंतु अपने देश की यह समस्या है कि नीति-निर्माताओं से लेकर उसके क्रियान्वयन करने वालों तथा अकादमिया तक को जनजातीय समाज की बहुत कम जानकारी है। वर्तमान सरकार ने इस पर ध्यान दिया है और कई योजनाएँ बनाई गई हैं।

इन सभी योजनाओं तथा उनके क्रियान्वयन में मुख्य समस्या यह है कि जनजातीय समाज की छवि और उनके यथार्थ में एक बड़ा अंतर है। जनजातीय समाज की एक छवि औपनिवेशिक कथानक के आधार पर देश में गढ़ी गई है, जो उनके यथार्थ से पूरी तरह भिन्न है। सामान्यतः नीतियाँ उस छवि के आधार पर बनती हैं और इसलिए अच्छी नीयत से बनी होने के बाद भी उनका क्रियान्वयन नहीं हो पाता है।

इसका समाधान विश्वविद्यालयों के पास है। विश्वविद्यालयों में जनजातीय समाज को पढ़ाया जाता है कि तुमको जो मालूम है, वह तुम नहीं हो, हम जो तुम्हारे बारे में पढ़ा रहे हैं, वह तुम हो। वह भी भ्रमित हो जाता है। इससे ही संभ्रम पैदा हो रहा है। इस पर विचार करना होगा। जनजातीय समाज और उनके मुद्दों पर शोध कैसे हो, इस पर विचार किया जाना जरूरी है। शोध का प्रारंभ विश्वविद्यालयों से होगा, तभी इसका समाधान हो पाएगा।

1000 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव परिणाम तय करने वाला अल्पसंख्यक कैसे? संविधान में सभी समान, फिर विदेशी संप्रदाय के लिए अल्पसंख्यक मंत्रालय क्यों?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 30(1) भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यकों को शिक्षण संस्थान का निर्माण करने और इसे संचालित करने का अधिकार देता है और संविधान का अनुच्छेद 30(2) कहता है कि केंद्र और राज्य सरकार शिक्षण संस्थानों को मदद देते समय भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यकों द्वारा बनाए गए शिक्षण संस्थान के साथ कोई भेदभाव नहीं करेगी, लेकिन प्रश्न यह है कि भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यक कौन है? विश्व में 6000 से ज्यादा भाषाएँ बोली जाती हैं तो क्या भारत सरकार 6000 भाषाई अल्पसंख्यक घोषित कर सकती है?

इसी प्रकार विश्व में 1000 से ज्यादा मत-पंथ-संप्रदाय हैं तो क्या भारत सरकार विश्व के सभी संप्रदायों को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा दे सकती है? और सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि अल्पसंख्यकों को प्राइमरी स्कूल खोलने का अधिकार मिलना चाहिए या इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज, लॉ कॉलेज और विश्वविद्यालय खोलने का अधिकार भी मिलना चाहिए? भारतीय संविधान भारतीयों के लिए बना है न कि विदेशियों के लिए और भारतीय संविधान भारतीय भाषा, भारतीय रीति-रिवाज, भारतीय प्रथा, भारतीय वेशभूषा, भारतीय संस्कार, भारतीय संस्कृति, भारतीय शैली, भारतीय परंपरा और भारतीय संप्रदाय को संरक्षित करने का अधिकार देता है न कि विदेशी भाषा, विदेशी रीति-रिवाज, विदेशी प्रथा, विदेशी वेशभूषा, विदेशी संस्कार, विदेशी संस्कृति, विदेशी शैली, विदेशी परंपरा और विदेशी मजहब को।

आर्टिकल 30 में भाषा और संप्रदाय आधारित अल्पसंख्यक का जिक्र है लेकिन वह विदेशी भाषा और विदेशी संप्रदाय के लिए नहीं बल्कि भारतीय भाषा और भारतीय संप्रदाय को संरक्षित करने के लिए है, अर्थात उत्तर प्रदेश में तमिल-मलयालम-बंगाली-गुजराती-असमी-मराठी बोलने वालों को भाषाई अल्पसंख्यक का दर्जा मिल सकता है लेकिन फ्रेंच, जर्मन, जापानी या चाइनीज बोलने वालों को नहीं। यही पैमाना संप्रदाय आधारित अल्पसंख्यक पर भी लागू होता है, अर्थात जैन बौद्ध सिख आर्य समाज जैसे भारत में शुरू हुए पंथ मानने वालों को आर्टिकल 30 के अंतर्गत धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा मिल सकता है लेकिन यहूदी पारसी ईसाई बहाई और इस्लाम जैसे विदेशी मत पंथ संप्रदाय मानने वालों को अल्पसंख्यक दर्जा नहीं मिल सकता है।

संविधान दो शब्दों ‘सम और विधान’ से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है समान विधान, जबकि ‘कॉन्स्टिट्यूशन’ का अर्थ है ‘विधान’। जिस प्रकार अंग्रेजी भाषा में ‘धर्म’ का कोई समानार्थी शब्द नहीं है इसलिए ‘रिलिजन’ का उपयोग किया जाता है उसी प्रकार ‘संविधान’ का कोई समानार्थी शब्द नहीं है इसलिए कॉन्स्टिट्यूशन का उपयोग होता है। जिस प्रकार धर्म और रिलिजन का अर्थ अलग है उसी प्रकार संविधान और कॉन्स्टिट्यूशन का अर्थ भी सर्वथा भिन्न है।

भारतीय संविधान का भावार्थ को आर्टिकल 14, 15, 16, 19, 21, 25, 26, 27 में स्पष्ट है। आर्टिकल 14 कहता है कि सभी भारतीय एक समान हैं और सबको कानून का समान संरक्षण प्राप्त है। आर्टिकल 15 कहता है कि जाति पंथ भाषा क्षेत्र जन्मस्थान के आधार पर किसी से भेदभाव नहीं किया जाएगा और आर्टिकल 16 कहता है कि हिंदू हो या मुस्लिम, नौकरियों में सबको समान अवसर मिलेगा। आर्टिकल 19 सभी नागरिकों को देश में कहीं पर भी जाने, रहने, बसने, रोजगार शुरू करने का अधिकार देता है।

संविधान को यथारूप पढ़ने से स्पष्ट है कि समता, समानता, समरसता, समान अवसर तथा समान अधिकार भारतीय संविधान की आत्मा है। कुछ लोग आर्टिकल 25-30 में प्रदत्त अधिकार की दुहाई देकर समाज को गुमराह कर रहे हैं जबकि आर्टिकल 25 की शुरुआत ही होती है- ‘सब्जेक्ट टू पब्लिक ऑर्डर, हेल्थ एंड मोरैलिटी’ अर्थात अच्छी रीति-प्रथा-परंपरा को पालन करने का अधिकार है लेकिन कुप्रथा, कुरीति, कालाजादू, अंधविश्वास, पाखंड और भेदभाव को आर्टिकल 25 का संरक्षण प्राप्त नहीं है।

इसी प्रकार अन्य जितने भी मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्व हैं, वे सब समता और समरसता मूलक समाज की स्थापना करने का निर्देश देते हैं। मजहब के आधार पर आयोग और मंत्रालय का तो संविधान में कहीं जिक्र भी नहीं है। अनुच्छेद 29-30 में ‘अल्पसंख्यक’ शब्द का जिक्र तो है लेकिन अल्पसंख्यक को परिभाषित नहीं किया गया है। संविधान सभा की बहस पढ़ने से स्पष्ट है कि अनुच्छेद 29 सभी भारतीयों को भारतीय भाषा, भारतीय रीति-रिवाज, भारतीय प्रथा, भारतीय वेश-भूषा, भारतीय संस्कार, भारतीय संस्कृति, भारतीय संप्रदाय, भारतीय शैली और भारतीय परंपरा को संरक्षित करने का अधिकार देता है न कि विदेशी भाषा, विदेशी रीति-रिवाज, विदेशी प्रथा, विदेशी वेश-भूषा, विदेशी संस्कार, विदेशी संस्कृति, विदेशी शैली, विदेशी परंपरा और विदेशी मजहब को।

केंद्र सरकार ने अब तक 125 बार संविधान में संशोधन किया और 5 बार तो सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी पलट दिया गया लेकिन भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यक को परिभाषित करने और उसे जिलेवार निर्धारित करने के लिए गाइडलाइन आजतक नहीं बनाया। अल्पसंख्यक आयोग और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय की आवश्यकता तो पाकिस्तान-बांग्लादेश जैसे देशों में है जहाँ शरिया लागू है और गैर मुस्लिमों को मुस्लिमों के बराबर अधिकार नहीं है और उन पर अत्यधिक अत्याचार हो रहा है और उनकी संख्या लगातार घट रही है लेकिन भारत जैसे सेक्युलर देश में जहाँ प्रत्येक मौलिक अधिकार सबके लिए एक समान है और जहाँ किसी भी प्रकार का भेदभाव संभव नहीं है वहाँ अल्पसंख्यक आयोग और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय बनाना और विदेशी संप्रदायों को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देना असंवैधानिक है।

अंग्रेजों ने डिवाइड एंड रूल नीति के अंतर्गत अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक विभाजन शुरू किया। सन 1899 में तत्कालीन जनगणना आयुक्त ने तो यह भी कह दिया था कि भारत में हिंदू बहुसंख्यक हैं और सिख जैन बौद्ध मुस्लिम अल्पसंख्यक इसीलिए संविधान सभा में ‘अल्पसंख्यक’ मुद्दे पर जोरदार बहस हुई थी। 26 मई, 1949 को संविधान सभा में आरक्षण पर बहस के दौरान अनुसूचित जातियों को आरक्षण देने के प्रश्न पर आम राय थी लेकिन धार्मिक आधार पर आरक्षण देने पर अत्यधिक विरोध था।

पंडित नेहरू ने भी कहा था कि पंथ आस्था मजहब आधारित आरक्षण गलत है लेकिन तब तक अल्पसंख्यक का मतलब मुस्लिम हो चुका था। संविधान सभा के सदस्य तजम्मुल हुसैन ने जोर देकर कहा था कि “हम अल्पसंख्यक नहीं हैं, अल्पसंख्यक शब्द अंग्रेजों की खोज है। अंग्रेज यहाँ से चले गए, इसलिए इस शब्द को डिक्शनरी से हटा दीजिए। अब हिंदुस्तान में कोई अल्पसंख्यक नहीं है, हम सब भारतीय हैं”। तजम्मुल हुसैन के भाषण पर संविधान सभा में खूब तालियाँ बजी थी

अनुच्छेद 29-30 में भाषाई-धार्मिक अल्पसंख्यक के लिए विशेष प्रावधान है लेकिन अल्पसंख्यक परिभाषित नहीं है संविधान निर्माताओं को अल्पसंख्यक आयोग और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय के गठन की जरूरत नहीं महसूस हुई थी लेकिन राजनीति को इसकी जरूरत थी, सन 1992 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम बनाकर राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग बनाया गया। इस एक्ट में भी अल्पसंख्यक की परिभाषा नहीं तय की गई।

धारा 2(सी) केंद्र सरकार को किसी भी समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित करने का असीमित अधिकार देती है। किसी जाति समूह को अनुसूचित जाति या जनजाति घोषित करने की विधि बहुत जटिल है और यह काम केवल संसद ही कर सकती है (अनुच्छेद 341-342) लेकिन किसी समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित करने का काम सरकारी बाबू भी कर सकता है। इसी अधिकार द्वारा केंद्र सरकार ने 23 अक्टूबर 1993 को एक अधिसूचना के जरिये 5 समुदायों (मुसलमान, ईसाई, बौद्ध, सिख और पारसी) को अल्पसंख्यक घोषित किया।

2006 में अलग से अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय शुरू किया गया और 2014 में तत्कालीन संप्रग सरकार ने लोकसभा चुनाव से ठीक पहले जैन समुदाय को भी अल्पसंख्यक घोषित कर दिया। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या उस समुदाय को अल्पसंख्यक कह सकते हैं जो भारत के लगभग 200 जिलों में पार्षद-प्रधान का भविष्य तय करता हो, लगभग 200 लोकसभा क्षेत्रों में साँसद का भविष्य तय करता हो और लगभग 1000 विधान सभा क्षेत्रों में हार जीत का निर्धारण करता हो और वह भारतीय संप्रदाय नहीं बल्कि विदेशी संप्रदाय हो?

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2006 में राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में कहा था, “यह सुनिश्चित करने के लिए कि अल्पसंख्यक, खासकर मुस्लिम विकास में बराबरी से फायदा ले सकें, हमें मौलिक योजना बनानी पड़ेगी। संसाधनों पर उनका पहला हक होना चाहिए।” मनमोहन सिंह ने तो ‘अल्पसंख्यक’ का मतलब ही मुस्लिम मान लिया था लेकिन आजादी के सात दशक बाद भी देश में अल्पसंख्यक कौन है यह तय नहीं हो पाया है।

‘अल्पसंख्यक’ की परिभाषा नहीं होने के कारण बड़े स्तर पर इसका दुरुपयोग हो रहा है। कश्मीर में मुस्लिम किसी भी दृष्टिकोण से अल्पसंख्यक नहीं कहे जा सकते हैं लेकिन अल्पसंख्यकों को मिलने वाली सारी सहूलियतें इन्हें मिलती हैं और हिंदू समुदाय जो कि वास्तविक अल्पसंख्यक है, उन सुविधाओं से महरूम हैं। यही स्थिति लद्दाख, लक्षद्वीप, मिजोरम, नागालैंड, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और पंजाब में है। 2002 में टीएमए पई केस में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा था कि भाषाई-धार्मिक अल्पसंख्यक की पहचान राज्य स्तर पर की जाए न कि राष्ट्रीय स्तर पर लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले को आज तक लागू नहीं किया गया।

इसका दुष्प्रभाव यह है कि कई राज्यों में जो बहुसंख्यक हैं उन्हें अल्पसंख्यक का लाभ मिल रहा है। सन 2005 में सुप्रीम कोर्ट की 3 जजों की बेंच ने कहा कि धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक की अवधारणा देश की एकता-अखंडता के लिए बहुत खतरनाक है इसलिए जितना जल्दी हो सके अल्पसंख्यक बहुसंख्यक का विभाजन बंद होना चाहिए। संविधान में सभी नागरिकों को बराबर अधिकार मिला हुआ है इसलिए अब समय आ गया है कि अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक के आधार पर समाज का विभाजन बंद किया जाए अन्यथा दूसरा उपाय यह है कि अल्पसंख्यक की परिभाषा और जिलेवार अल्पसंख्यकों की पहचान के लिए दिशा निर्देश तय हों और यह सुनिश्चित किया जाए कि केवल उसी समुदाय को संविधान के अनुच्छेद 29-30 का संरक्षण मिले जो वास्तव में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से प्रभावहीन हो और संख्या में नगण्य हों।

(लेखक अश्विनी उपाध्याय सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता हैं)

स्मृति ईरानी से खुन्नस ऐसी, उनकी बेटी को ‘बार वाली’ बताने के लिए फैक्ट को दिखाया ठेंगा: द वायर और यौन शोषण आरोपित में कॉन्ग्रेस ने खोजा सहारा

बीते दिनों केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की बेटी का नाम ‘गोवा बार विवाद’ में खींचकर कॉन्ग्रेस ने एक बार फिर अपने स्तर को गिराया। 18 साल की जोइश ईरानी पर कॉन्ग्रेस ने सार्वजनिक तौर पर हमला किया। बिन किसी सबूत के उनका चरित्र हनन हुआ। उन्हें ‘बार वाली’ कहा गया जबकि उनकी माँ के लिए बोला गया कि वह हमेशा गाँधी परिवार पर बोलती हैं लेकिन उनकी खुद की बेटी बार चलाती है।

ये दावे किन आधार पर कॉन्ग्रेस ने किए ये शायद कॉन्ग्रेस को भी नहीं पता। उन्होंने जोइश को बदनाम करने के लिए इतनी उत्सुकता दिखाई कि वो भूल गए आरोप लगाने से पहले भी तथ्यों की पुष्टि की जानी चाहिए।

कॉन्ग्रेस मीडिया में दो-चार कागजों और वीडियो के साथ आई। फिर अपने ओछे और घटिया शब्दों के साथ जोइश पर निशाना साधना शुरू किया। जोइश पर लगाए जाने वाले इल्जाम एक RTI पर आधारित थे। ये आरटीआई गोवा के ‘आयर्स रॉड्रिक्स’ नाम के कार्यकर्ता ने डाली थी। रॉड्रिक्स वही हैं जिनपर 2017 में एक महिला ने यौन शोषण तक के आरोप लगाए थे।

आयर्स ने ही अपनी आरटीआई के नाम पर गोवा के सिली सोल्स कैफे एंड बार पर झूठ फैलाना शुरू किया। उसने दावा किया कि रेस्टोरेंट को फर्जी ढंग से लाइसेंस मिला जो कि ईरानी परिवार द्वारा किए गए भ्रष्टाचार का सबूत है। उसने ये भी बताया कि एक्साइज विभाग रेस्टोरेंट को नोटिस भेज चुका है। उसके दावे के मुताबिक रेस्टोरेंट में फर्जी कागज देकर शराब का लाइसेंस लिया गया।

आरटीआई जिनमें कहीं जोइश का नाम भी नहीं है

24 जुलाई को लिखे नोट में उसने कहा कि रेस्टोरेंट को शराब का लाइसेंस एक ऐसे व्यक्ति के नाम पर मिला जो अब इस दुनिया में भी नहीं है। इसके बाद उसने कहा कि गोवा में स्मृति ईरानी और अन्य केंद्र के नेताओं द्वारा खरीदी गई ‘बेनामी’ संपत्ति की जाँच होनी चाहिए ताकि सच सामने आए।

आयर्स रॉड्रिक्स का पोस्ट

अब यहाँ गौर रहे कि आयर्स के सारे दावों में कहीं भी जोइश का नाम नहीं था। मगर फिर भी उसने जोइश की तस्वीर आगे बढ़ाई।

25 जुलाई तक वह अगला पोस्ट करके इस बात पर रोने लगा कि पहले कॉन्ग्रेस उसे निशाना बनाती थी और अब भाजपा वालों का खुलासा करने पर भी यही हो रहा है।

द वायर का आर्टिकल

जोइश ईरानी पर कॉन्ग्रेस के हमलों का कनेक्शन द वायर से भी है। 21 जुलाई को द वायर ने ही कुणाल विजयकर नाम के यूट्यूबर की वीडियो को आधार बनाकर दिखाया था कि कैसे जोइश का कनेक्शन बार से है और वो कह रही हैं कि काश ‘सिली सोल्स’ गोवा का फूड डेस्टिनेशन बन जाए।

कॉन्ग्रेस ने इसी वीडियो को अपना झूठ सच बनाने के लिए प्रयोग किया, जबकि जोइश के वकील ने कहा कि उनकी मुअक्किल बार चलाती नहीं बल्कि केवल उसमें इंटर्न हैं। सिली सोल्स की तरह उन्होंने 4 अन्य कैफों में भी इंटर्न की है।

द वायर में जोइश का जिक्र

रही बात कैफे की, तो मौजूद जानकारी यही कहती है कि ये कैफे वैध है। जुबिन ईरानी ने इसे अपने साथी एंथनी डगामा के साथ मिल शुरू किया था। लेकिन डगामा का देहांत 2021 में हो गया। अब उसका स्वामित्व उनके बेटे के पास है और शराब का लाइसेंस पाने के लिए जिन ‘फर्जी दस्तावेजों’ को पेश करनी की बात हुई, वो भी उन्हीं से जुड़े हैं।

इस पूरे मामले में देख सकते हैं कि कॉन्ग्रेस ने जोइश पर आरोप मढ़ते समय ये बात नकारी कि जुबिन ईरानी खुद एक बिजनेसमैन हैं और उन्होंने बिन किसी राजनैतिक हस्तक्षेप या पब्लिक फंड के इसे शुरू किया। कॉन्ग्रेस ने बस ईरानी नाम देखा, कैफे के बार जोइश की तस्वीर देखी, कुछ एडिटिड तस्वीरें उठाई और मीडिया में आकर स्मृति ईरानी की बेटी को बदनाम कर दिया।

कॉन्ग्रेस स्मृति ईरानी और जोइश ईरानी की जिन तस्वीरों के आधार पर झूठ फैला रही है वो तस्वीरें एडिट की गई हैं। एक तस्वीर में देख सकते हैं कि कॉन्ग्रेस ने माँ-बेटी को बार के बाहर दिखाया है जबकि 2019 में किया गया पोस्ट बताता है कि ये तस्वीर कहीं घर की है। कॉन्ग्रेस ने सिर्फ झूठ गढ़ने के लिए इसका प्रयोग किया।

नोट: मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई इस रिपोर्ट को विस्तार से पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।

‘लवलीना बोरगेहेन की कोच अब टीम के साथ, हमने सुलझा ली सारी समस्याएँ’: बॉक्सिंग कोच ने कहा – सारे खिलाड़ी कॉमनवेल्थ के लिए तैयार

टोक्यो ओलंपिक की कांस्य पदक विजेता लवलीना बोरगोहेन ने बॉक्सिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (बीएफआई) पर मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का आरोप लगाया है। उन्होंने ट्वीट कर कहा है कि उनके साथ गलत हो रहा है।

ओलिंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली पहली असमिया महिला बनी लवलीना फिलहाल बर्मिंघम में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 की तैयारी कर रही हैं, लेकिन बॉक्सर के दावों के मुताबिक बीएफआई उनके साथ गंदी राजनीति कर रही है।

लवलीना ने बीएफआई पर कुछ गंभीर आरोप लगाते हुए हुए ट्वीट किया। बोरगोहेन ने आरोप लगाया है कि उन्हें उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है और उनके कोचों को परेशान किया जा रहा है जिससे उनके प्रशिक्षण में बाधा आ रही है। लवलीना ने सोमवार को शाम 04:21 बजे किए गए एक ट्वीट के जरिए अपनी आपबीती साझा की।

ट्वीट में लवलीना ने लिखा कि उन्हें और उनके प्रशिक्षण कोचों ने ओलंपिक में पदक दिलाने में मदद की, उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है और उनके प्रशिक्षण को बाधित करने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी कोच संध्या गुरुंगजी, जो द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित हैं, कई अनुरोधों के बाद उनके प्रशिक्षण शिविर से जुड़ी हैं और वह भी बहुत देर से।

उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह की गड़बड़ी प्रशिक्षण को बाधित करती है और उन्हें मानसिक रूप से परेशान करती है। उन्होंने पोस्ट में आगे कहा कि उनके कोच को कॉमनवेल्थ विलेज में प्रवेश से वंचित किया जा रहा है और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता से ठीक 8 दिन पहले उनका प्रशिक्षण रोक दिया गया है। उन्होंने कहा कि उनके दूसरे कोच को जबरन भारत भेज दिया गया है।

लवलीना ने लोगों से मदद माँगी ताकि इन व्यवधानों और उत्पीड़न की वजह से उनका खेल बर्बाद न हो जाए जो अगले सप्ताह होने वाला है। उन्होंने कहा कि अगर उन्हें गंदी राजनीति से बचाया जाता है तो वह देश के लिए पदक जीतने की उम्मीद करती हैं। हालाँकि, लवलीना ने किसी ऐसे व्यक्ति के नाम का उल्लेख नहीं किया है जो उसके प्रशिक्षण में व्यवधान के लिए जिम्मेदार हो सकता है।

बता दें कि असम के गोलाघाट जिले की एक भारतीय महिला मुक्केबाज लवलीना बोरगोहेन ने महिलाओं के 69 किग्रा वर्ग में तुर्की की शीर्ष वरीयता प्राप्त बुसेनाज सुरमेनेली के खिलाफ क्वार्टर फाइनल में हारने के बाद टोक्यो ओलंपिक में कांस्य पदक हासिल किया था।

अपडेट: महिला बॉक्सिंग कोच भाष्कर भट्ट ने बताया कि लवलीना बोरगेहेन की कोच अब टीम के साथ हैं और सारी समस्याएँ सुलझा ली गई हैं। उन्होंने बताया कि ‘बॉक्सिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (BFI)’ और ‘इंडिया ोाल्पिक एसोसिएशन (IOA)’ ने मिल कर इन समस्याओं को सुलझा लिया है।

उन्होंने ये भी कहा कि आगामी कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए सारे बॉक्सर तैयार हैं और हमें उम्मीद है कि हमारे सभी खिलाड़ी देश के लिए मेडल लेकर आएँगे।

‘रजनीकांत सर एक जिम्मेदार नागरिक हैं’: आयकर विभाग ने किया सम्मानित, सबसे ज्यादा टैक्स भरने वाले एक्टर में अक्षय कुमार भी

आयकर दिवस (24 जुलाई 2022) के मौके पर चेन्नई में इनकम टैक्स विभाग ने सुपरस्टार रजनीकांत (Rajinikanth) को सबसे ज्यादा इनकम टैक्स देने के लिए सम्मानित किया। रजनीकांत की बेटी ऐश्वर्या ने इंस्टाग्राम पर इसकी तस्वीरें शेयर की हैं। ऐश्वर्या रजनीकांत (Aishwaryaa Rajinikanth) ने इनकम टैक्स विभाग से मिले इस सम्मान को अपने पिता की अनुपस्थिति में स्वीकार किया।

ऐश्वर्या ने इंस्टाग्राम पर तस्वीरों के साथ कैप्शन लिखा, “जिम्मेदार और सबसे ज्यादा इनकम टैक्स देने वाले टैक्सपेयर की बेटी होने पर गौरवान्वित महसूस कर रही हूँ। आयकर दिवस 2022 के मौके पर अप्पा को सम्मानित करने के लिए तमिलनाडु और पुडुचेरी के आयकर विभाग को बहुत धन्यवाद।” तेलंगाना की राज्यपाल तमिलिसाई सुंदरराजन ने ऐश्वर्या को उनके पिता की अनुपस्थिति में सम्मान-पत्र सौंपा।

ऐश्वर्या रजनीकांत ने जैसे ही ये तस्वीरें शेयर की रजनीकांत के फैंस की तरफ से बधाई देने की होड़ लग गई। सोशल मीडिया पर एक यूजर ने कमेंट किया, “थलाइवा का फैंस होने पर गर्व है।” एक अन्य ने लिखा, “थलाइवा को बधाई। रजनीकांत सर एक जिम्मेदार नागरिक हैं।”

फोटो साभार: ऐश्वर्या रजनीकांत का इंस्टाग्राम अकाउंट

गौरतलब है कि इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने 24 जुलाई 2022 को बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार को सम्मान-पत्र देकर सम्मानित किया। विभाग ने बताया था कि वह बॉलीवुड में सबसे ज्यादा टैक्स देने वाले कलाकार हैं। सोशल मीडिया पर अभिनेता के फैन्स ने उनको दिए गए सर्टिफिकेट को शेयर किया था। अक्षय कुमार ने 2017 में 29.5 करोड़ रुपए इनकम टैक्स दिया था, जिसके बाद फोर्ब्स की सबसे ज्यादा टैक्स देने वाले सेलिब्रिटी की सूची में वे 10वें स्थान पर थे। इसके बाद जब उनकी आय बढ़ी है, तो उन्होंने सबसे ज्यादा टैक्स का भुगतान किया। फिलहाल ये नहीं पता चल सका है कि कितना टैक्स भरने पर अक्षय को इस पत्र से सम्मानित किया गया है। वहीं वर्क फ्रंट की बात करें तो, 11 अगस्त को अक्षय कुमार की फिल्म रक्षाबंधन सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है।

CDS बिपिन रावत और कन्हैया लाल को श्रद्धांजलि, नूपुर शर्मा का समर्थन: अनोखी है काँवड़ यात्रा की झाँकियाँ, एम्बुलेंस और सैन्य वाहनों को हट कर देते हैं रास्ता

सावन माह में चल रही काँवड़ यात्रा में सबसे अधिक चहल पहल हरिद्वार जाने वाले मार्गों पर दिखाई देती है। इन सभी में गाजियाबाद से मेरठ और मुजफ्फरनगर जाने वाला राजमार्ग मुख्य है। इस बार काँवड़ यात्रा में कुछ ऐसी झाँकियाँ देखने को मिलीं जो अपने आप में अलग और अनोखी हैं। इसमें भारतीय सेना के सम्मान, दिवंगत CDS जनरल बिपिन रावत की स्मृति, राम मंदिर प्रतीक और नूपुर शर्मा के समर्थन की भी झाँकियाँ शामिल हैं। काँवड़ियों को पुलिसकर्मियों के साथ भी दोस्ताना माहौल में घुला-मिला देखा गया।

काँवड़ यात्रा के खिलाफ बोलने वाले कुछ वामपंथी तत्वों की खबरों की सही जानकारी लेने के लिए हम 23 जुलाई, 2022 (शनिवार) को कावड़ियों के बीच मुजफ्फरनगर से हरिद्वार तक बाइक से गए। मुजफ्फरनगर के थाना मंडी क्षेत्र में सेना के वाहनों का काफिला निकला तो काँवड़ियों ने खुद ही अपने जत्थे को रोक दिया। फ़ौज का अंतिम वाहन निकल जाने तक वो ‘भारत माता की जय’ और ‘वन्दे मातरम’ के नारे लगाते रहे।

दिवंगत CDS बिपिन रावत की झाँकी

थोड़ा आगे चल कर मुजफ्फरनगर के ही छपार थाना क्षेत्र में एक ऐसी झाँकी मिली जिसमें CDS विपिन रावत को श्रद्धांजलि दी गई थी। झाँकी में जनरल रावत की फोटो के साथ एक बलिदानी फौजी का प्रतीकत्मक होर्डिंग बनाया गया था। इसी झाँकी में कोरोना काल में बलिदान हुए डॉक्टरों और पुलिस के जवानों को भी श्रद्धांजलि दी गई थी।

CDS रावत की झाँकी

नूपुर शर्मा का समर्थन और कन्हैयालाल को श्रद्धांजलि

थोड़ा आगे बढ़ने पर मुजफ्फरनगर के पुरकाजी थानाक्षेत्र में एक वाहन पर नूपुर शर्मा का बैनर लगा दिखा। वाहन पर कई युवक खड़े हो कर ‘भारत माता की जय’ का नारा भी लगा रहे थे। इस वाहन में उदयपुर में बलिदान हुए कन्हैया लाल का फोटो लगा कर उन्हें हिन्दू वीर बता कर श्रद्धांजलि दी गई थी।

नूपुर शर्मा सपोर्ट

मुजफ्फरनगर के छपार थानाक्षेत्र में गाजियाबाद शिव मंदिर बालाजी धाम के महंत मछेन्द्र पुरी अपने हाथ में नूपुर शर्मा का पोस्टर ले कर चलते दिखाई दिए।

मछेन्द्र पुरी

काँवड़ियों ने महिलाओं को दिया पूरा सम्मान

हरिद्वार से लगभग 30 किलोमीटर पहले रुड़की बाईपास पर शाम लगभग 5 बजे हमने लगभग आधे दर्जन महिलाओं को काँवड़ यात्रियों को निःशुल्क खाना खिलाते देखा। उन्होंने हमें बताया, “हम यहीं बगल के गाँव के हैं। सुबह से यहाँ काँवड़ियों को खाना खिला रहे। हमारे आगे से अब तक हजारों भोले (काँवड यात्री) जा चुके। कइयों ने यहाँ खाना भी खाया। उन सभी का व्यवहार हमारे लिए हमारे घर के सदस्यों जैसा रहा। सभी काँवड़िए हमसे शालीनता और सभ्यता से पेश आए।”

काँवड़ियों को खाना खिलाती महिलाएँ

काँवड़ियों की भीड़ में हर एम्बुलेंस को मिला रास्ता

हरिद्वार पहुँच कर हमें लाखों काँवड़ियों की भीड़ दिखी। कई सड़कें जाम दिखीं। लेकिन उन्हीं रास्तों से जब भी कोई एम्बुलेंस गुजरी तब हर काँवड़ यात्री ने उसे खुद हट कर राह दी।

हरिद्वार में लोहा पुल के पास गुजरती एम्बुलेंस

‘राष्ट्र धर्म के लिए किसी भी हद तक जाऊँगा’: ऑपइंडिया से बोले कश्मीर फाइल्स के प्रोड्यूसर, आमिर खान के ‘लाल सिंह चड्ढा’ से टकराएगी अगली फिल्म

आपने ‘द कश्मीर फाइल्स’ फिल्म देखी है और इसे पसंद किया है तो इसमें पैसा लगाने वाले व्यक्ति का नाम भी जान लीजिए उनका नाम है अभिषेक अग्रवाल, जिन्होंने विवेक अग्निहोत्री की इस फिल्म को प्रोड्यूस किया। 41 वर्षीय अभिषेक अग्रवाल निखिल सिद्धार्थ की फिल्म ‘कार्तिकेय 2‘ और रवि तेजा की पैन-इंडिया फिल्म ‘टाइगर नागेश्वर राव’ लेकर भी आ रहे हैं। स्वभाव से विनम्र और जमीन से जुड़े अभिषेक अग्रवाल ने विभिन्न विषयों पर ऑपइंडिया से बातचीत की, जिसे हम आपके समक्ष पेश कर रहे हैं।

‘द कश्मीर फाइल्स’ और ‘कार्तिकेय 2’ के निर्माता अभिषेक अग्रवाल का इंटरव्यू

सवाल: एक फिल्म निर्माता के रूप में ‘द कश्मीर फाइल्स’ की सफलता के बाद आपके जीवन में क्या बदलाव आए? क्या आप अपने अनुभव साझा करेंगे?

जवाब: एक निर्माता से भी अधिक, एक व्यक्ति के रूप में ‘द कश्मीर फाइल्स’ ने मुझे अत्यधिक संतुष्टि दी। हर रात में इसी ख़ुशी में बिस्तर पर जाता हूँ कि मैंने अपने कश्मीरी भाइयों की सच्चाई और व्यथा को दिखा कर इस देश और समाज के लिए कुछ किया है। अब पूरा भारत ही मेरा परिवार है। मैं हर उस चीज का समर्थन करूँगा, जो हमारे राष्ट्र के लिए अच्छा होगा। मैं अपने देश, धर्म और संस्कृति के लिए किसी भी हद तक जा सकता हूँ।

सवाल: आप विवेक अग्निहोत्री के साथ मिल कर ‘द दिल्ली फाइल्स’ का निर्माण भी कर रहे हैं। ये फिल्म किस बारे में है और ये ‘द कश्मीर फाइल्स’ से किस तरह अलग है?

जवाब: ‘द दिल्ली फाइल्स’ के बारे में अभी कुछ भी बात करना काफी जल्दबाजी होगी।

सवाल: ‘द कश्मीर फाइल्स’ को बनाने से लेकर अब तक विवेक अग्निहोत्री और पल्लवी जोशी के साथ आपके कैसे सम्बन्ध हैं? उनके बारे में आपको क्या पसंद है?

जवाब: मैंने विवेक अग्निहोत्री से संपर्क किया और उन्होंने जीवन को बदल कर रख देने वाली इस यात्रा में सहभागी बनाते हुए मुझमें अत्यधिक विश्वास दिखाया। ये यात्रा कठिन थी, लेकिन विवेक अग्निहोत्री और पल्लवी जोशी का इस दौरान लगातार सपोर्ट मिला। कश्मीर के दिल दहला देने वाले इतिहास को दिखाने में इन्होंने जो ईमानदारी दिखाई, वो प्रेरक और सराहनीय है। दोनों राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता हैं और उन्हें जानना, उनके साथ मिल कर काम करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। अब वो मेरे परिवार की तरह हैं।

सवाल: अब आपकी अगली फिल्म ‘कार्तिकेय 2’ पर आते हैं। इस फिल्म का निर्माण करने के पीछे क्या कारण थे? आपको इस फिल्म के बारे में क्या अच्छा लगा, जिससे आपने इसमें रुपए लगाने का निर्णय लिया?

जवाब: अक्टूबर 2014 में आई ‘कार्तिकेय’ एक सफल फिल्म थी। जब फिल्म के निर्देशक चंदू मोंडेति मेरे पास ‘कार्तिकेय 2’ की स्क्रिप्ट लेकर आए, तो मैं इस फिल्म के स्वरूप के कारण इससे जुड़ना चाहता था। फिल्म ये मेरे ड्रीम प्रोजेक्ट्स में से एक बन गया। इस फिल्म में काफी रोमांचक दृश्य हैं, जिसे सभी लोग पसंद करेंगे। ये फिल्म भगवान श्रीकृष्ण और उनकी महानता पर आधारित है। मैं ‘कार्तिकेय 2’ को लेकर हिंदी दर्शकों के पास भी जा रहा हूँ और मुझे विश्वास है कि इसके रोचक विषय के कारण वो इसे पसंद करेंगे।

सवाल: ‘कार्तिकेय 2’ द्वारका और भगवान श्रीकृष्ण के रहस्यों पर आधारित फिल्म है। क्या आपको नहीं लगता कि हमरी संस्कृति और धरोहरों पर कई फ़िल्में बनाई जा सकती थीं। बॉलीवुड ने हमारे वास्तविक इतिहास को नज़रअंदाज़ किया।आप इसके लिए किसे जिम्मेदार मानते हैं?

जवाब: जैसा कि मैंने कहा, ‘कार्तिकेय 2’ मेरे ड्रीम प्रोजेक्ट्स में से एक है। हमने इसका निर्माण एक बड़े स्तर पर किया है। हमारा देश और हमारा सनातन धर्म समृद्ध संस्कृति, धरोहरों, इतिहास और कथाओं का संगम है। ‘कार्तिकेय 2’ भगवान श्रीकृष्ण के रहस्यों और उस द्वारका नगर पर आधारित है, जो आज अरब सागर में डूबा हुआ है। हमारी संस्कृति से कहानियों को कहने के लिए काफी रिसर्च की आवश्यकता होती है और तथ्यों और आस्था के साथ छेड़छाड़ किए बिना इसे कहने की ज़रूरत होती है। ये कठिन है और इसीलिए इस रास्ते पर कोई नहीं चलता। बॉलीवुड ने ऐसी कहानियों को दिखाने से परहेज किया और अब जब परिदृश्य धीरे-धीरे बदल रहा है, हमारी संस्कृति और विरासतों पर आधारित अन्य कहानियाँ भी देखने को मिल सकती हैं।

सवाल: हाल ही में ‘कार्तिकेय 2’ के मुख्य अभिनेता निखिल सिद्धार्थ ने कहा कि हाल की कुछ बॉलीवुड फिल्मों ने हमारी संस्कृति को नीचा दिखाया। क्या आप उनसे सहमत हैं? लोग बॉलीवुड के हिन्दू विरोधी प्रोपेगंडा से गुस्से में हैं। आपका इस विषय में क्या सोचना है?

जवाब: ऐसी कुछ घटनाएँ हुई हैं, जहाँ बॉलीवुड फिल्मों ने हमारी संस्कृति को नीचा दिखाया और जनता की संवेदनाओं को आहत किया। ये सही समय है जब फिल्म निर्माताओं को एहसास होना चाहिए कि लोग अब जागरूक हो गए हैं और उन्हें हमारी संस्कृति और आस्था के प्रति संवेदनशील होना पड़ेगा। हर चीज को बेचने वाला मनोभाव अब नहीं चलेगा।

सवाल: आप ‘मास महाराजा’ के नाम से जाने जाने वाले रवि तेजा की ‘टाइगर नागेश्वर राव’ नाम की एक बहुत बड़ी फिल्म का निर्माण भी कर रहे हैं। क्या आपको लगता है कि उनके पास क्षमता है कि वो प्रभाष और यश जैसे अभिनेताओं की तरह पैन-इंडिया स्टार बनें?

जवाब: रवि तेजा एक ऐसे अभिनेता हैं, जिन्हें तेलुगू का हर दर्शक प्यार करता है। उन्होंने ‘मास महाराजा’ बनने के लिए जो कड़ी मेहनत और जो प्रयास किए हैं, वो प्रशंसनीय है। हालाँकि, किसी अन्य अभिनेताओं के साथ कोई तुलना नहीं है, लेकिन ‘टाइगर नागेश्वर राव’ रवि तेजा को देश के सभी लोगों के करीब लेकर जाएगी।

सवाल: क्या आप इसे लेकर निश्चित हैं कि हिंदी दर्शक TNR को पसंद करेंगे? इस फिल्म के बारे में आप उन्हें क्या कहना चाहेंगे?

जवाब: ‘टाइगर नागेश्वर राव’ एक बायोग्राफिकल फिल्म है, जो 1970 के दशक में स्टुअर्टपुरम के अति-कुख्यात चोरों पर आधारित है। इस कहानी में निश्चित रूप से एक वैश्विक आकर्षण है। निर्देशक वामसी ने जिस तरह से स्क्रिप्ट को तैयार किया है, उसमें हमें इस फिल्म को कई भाषाओं में बनाने का आत्मविश्वास दिया। इस फिल्म का बड़ा स्तर और इसमें जो इमोशंस हैं, वो निश्चित रूप से हिंदी बाजार में भी काम करेंगे।

सवाल: रवि तेजा की हाल की फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर उतनी सफल नहीं रही हैं। वो फ़िलहाल करियर के एक बुरे दौर से गुजर रहे हैं। आपको उनमें और TNR में भरोसा होने के क्या कारण हैं?

जवाब: रवि तेजा एक परिपक्व स्टार हैं और उन्हें कुछ भी साबित करने की ज़रूरत नहीं है। TNR एक ऐसे विषय पर आधारित है, जो रवि तेजा के लिए एकदम नया है और टाइटल रोल को निभाने के लिए वो अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास दे रहे हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि रवि तेजा ‘टाइगर नागेश्वर राव’ और अपनी अगली फिल्मों के साथ अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में वापसी करेंगे।

सवाल: आपने ‘द कश्मीर फाइल्स’ की बड़ी सफलता के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। ये कैसा अनुभव रहा? उनके बारे में आपको क्या पसंद है?

जवाब: ये मेरे लिए जीवन का सबसे महत्वपूर्ण क्षण था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मेरी फिल्म की प्रशंसा करना मेरे सबसे बड़ी उपलब्धि है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई वर्षों से हमारे देश की बेहतरी के लिए कड़ी मेहनत और प्रयास कर रहे हैं। उनके प्रयासों का ही प्रतिफल है कि भारत ने वैश्विक पटल के केंद्रबिंदु में जगह बनाई है।

सवाल: आपकी अगली फिल्म ‘कार्तिकेय 2’ आमिर खान की ‘लाल सिंह चड्ढा’ और अक्षय कुमार की ‘रक्षा बंधन’ के साथ बॉक्स ऑफिस पर क्लैश कर रही है। दोनों काफी बड़ी फ़िल्में हैं। आपका इस सम्बन्ध में क्या कहना है? आपको लगता है कि बॉलीवुड के साथ लोगों का गुस्सा आपकी फिल्म के लिए सहायक सिद्ध होगा?

जवाब: चूँकि ये एक फेस्टिवल वीकेंड है, कई फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर क्लैश होने वाली हैं। दर्शक अच्छी सिनेमा और अच्छे कंटेंट को को गले लगाएँगे। सभी फ़िल्में अलग-अलग जॉनर की हैं, इसीलिए ऐसी कोई प्रतियोगिता नहीं है। मैं उस समय रिलीज हो रही सभी फिल्मों को शुभकामनाएँ देना चाहूँगा।

स्मृति ईरानी पर वार के लिए कॉन्ग्रेस ने अपनाए पुराने पैंतरे, बेटी को बनाया निशाना: चुनावी हताशा की लड़ाई लड़ रहे राहुल गाँधी के चुके हुए ‘सिपहसालार’

किसी महिला को नीचा दिखाने का सबसे आसान तरीका क्या है? खासतौर से तब जब उसने किसी विशेष राजनीतिक रूप से ताकतवर व्यक्ति को उसके ही गढ़ में मात दी हो? ऐसे में उसके परिवार, विशेष रूप से उनकी छोटी बेटी को निशाना बनाया जाए और उनके चरित्र पर आक्षेप लगाए जाएँ और यहाँ तक कि ‘संस्कार’ और उसकी परवरिश पर सवाल उठाए जाएँ तो क्या कहा जा सकता है?

दरअसल, स्मृति ईरानी को 2014 से ही जब से उन्होंने राहुल गाँधी को उनके ही गढ़ में चुनौती देने की ‘हिम्मत’ की तब से अपमान का सामना करना पड़ रहा है। उन पर लगातार स्त्री द्वेषी, सेक्सिस्ट हमले होते रहे हैं, जिनमें से कई यौन उत्पीड़न की श्रेणी में शामिल हैं।

असम राज्य के पूर्व कृषि मंत्री कॉन्ग्रेस नेता नीलामणि सेन डेका आपको याद होंगे। जिन्होंने 2015 में नलबाड़ी में एक जनसभा में कहा था कि कई लोग स्मृति ईरानी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूसरी पत्नी के रूप में संदर्भित करते हैं। एक दूसरे कॉन्ग्रेस नेता ने 2019 में, हुकुमदेव नारायण के साथ ईरानी की एक तस्वीर शेयर करते हुए कहा था कि स्मृति एक “रेप गुरु” के सामने झुक रही है, जबकि राहुल गाँधी को अपनी बलात्कार पर टिप्पणी के लिए माफी माँगने के लिए कहा गया था। तब इंद्राणी मिश्रा ने इशारा किया था कि स्मृति बलात्कार के आरोपित स्वामी चिन्मयानंद को सम्मान दे रही है, जबकि वह वास्तव में अनुभवी सांसद हुकुमदेव नारायण यादव थे।

कॉन्ग्रेस के एक अन्य नेता शशांक भार्गव ने 2020 में एक रैली के दौरान स्मृति ईरानी के खिलाफ यौन शोषण से भरी एक और ऐसी ही टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था, “ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी को वापस लेना चाहिए। बीते दिनों स्मृति ईरानी हाथों में ढेर सारी चूड़ियाँ लेकर घूमती थीं। वह प्रधानमंत्री की करीबी हैं और उन्हें चूड़ियाँ या और भी बहुत कुछ दे सकती हैं। मैं उनसे अनुरोध करूँगा कि प्रधानमंत्री को उनकी चूड़ियाँ और जो कुछ भी वह चाहते हैं उन्हें उपहार में दें और उनसे कीमतों में बढ़ोतरी को वापस लेने के लिए कहें।”

बेशक, अब आम चुनाव में 2 साल से भी कम समय रह गए हैं, ऐसे में कॉन्ग्रेस नेताओं ने भी ‘परिवार’ के प्रति अपने समर्पण को दर्शाने के लिए स्त्री विरोधी हमलों को एक पायदान और ऊपर ले जाने का फैसला किया है। चूँकि वे ईरानी को अपने ठहाकों और तंज से नहीं हिला सकते थे, तो अब उन्होंने एक महिला की कमज़ोरी – उसके बच्चों पर हमला करने की ठानी है।

यह ‘एक महिला को उसकी जगह दिखाने’ का सबसे आसान तरीका, है ना? आखिर उनके प्यारे ‘राजकुमार’ को हराने की एक महिला की हिम्मत कैसे हुई। पवन खेड़ा, जिन्हें राज्यसभा पद के लिए ठुकरा दिया गया था और यहाँ तक कि उनकी अनदेखी की गई थी, वे भी अपनी वफादारी साबित करने के लिए एक बार फिर से मोर्चा सँभालते हुए हमलावर हैं। उन्होंने कहा, “क्या उनकी बेटी, 18 वर्षीय ज़ोइश ईरानी का गोवा में ‘अवैध बार चलाना’ ‘संस्कार’ है?”

इससे पहले कि हम समस्या की तह तक जाएँ। आइए पहले हम कुछ तथ्यों पर सीधे बात करते हैं?

ज़ोइश ईरानी ने 2019 में गोवा में एक सिली सोल रेस्तरां और बार में इंटर्नशिप की, तब वह एक इंटर्न थी। एक इंटर्न बार का मालिक नहीं होती, ठीक उसी तरह जिस तरह पवन खेड़ा के तमाम चाटुकारिता या तपस्याओं के बावजूद कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बनने की संभावना नहीं है। इसके अलावा, बार का लाइसेंस रेस्तरां के मालिक एंथनी डी’गामा के नाम पर था। 2021 में उनके निधन पर, उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए लाइसेंस उनके कानूनी उत्तराधिकारी को दिया गया। लेकिन इस साल जब एंथनी डी’गामा के बेटे ने लाइसेंस के नवीनीकरण के लिए आवेदन किया, तो उन्होंने उल्लेख किया कि टाइटल का हस्तांतरण 6 महीने की अवधि में समाप्त हो जाएगा। हालाँकि, गोवा आबकारी आयुक्त ने उन्हें इसके लिए कारण बताओ नोटिस भेजा।

वहीं आरटीआई के जवाब में जिस दस्तावेज के आधार पर कॉग्रेसियों ने ईरानी पर हमला करने का निर्णय लिया है, उसमें जोइश ईरानी या स्मृति ईरानी का बिल्कुल भी जिक्र नहीं है। इसलिए ज़ोइश को विवादों में घसीटा गया क्योंकि अतीत में, जब वह 16 साल की थी, उसने किसी जगह पर इंटर्नशिप की और उस जगह पर, तीन साल बाद, कुछ अनियमितता हो सकती है। लेकिन ज़ोइश की जब वह 16 साल की थी तब की तस्वीरें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फ्लैश की गईं। हाँ, वह अभी बेशक 18 साल की हो सकती है, लेकिन तब वह एक नाबालिग लड़की थी।

अब, चीजें यहाँ से अलग मोड़ लेती हैं। सवाल उठाया गया कि ईरानी के ‘संस्कार’ कहाँ थे कि उनकी बेटी ‘अवैध बार’ चला रही है। यहाँ, स्पष्ट इरादा यह बताने का था कि उनकी युवा लड़की ‘एक अवैध बार चला रही थी’, एक ऐसी जगह जो शराब परोसती है। मैं चीजों को पहले ही स्पष्ट कर दूँ कि कोई भी काम, जब तक कि वह अवैध न हो, सम्मान का पात्र है। सिर्फ इसलिए कि एक महिला (जरूरी नहीं कि ज़ोइश) बार में काम करती है या काम करती थी, यह किसी भी तरह से उसके चरित्र का प्रमाण पत्र नहीं है।

देखें कि ‘BAR’ सभी बड़े अक्षरों में कैसा है? इसी कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता को कोरोना महामारी के दौरान ऑक्सीजन संकट के दौर में अपने तथाकथित काम के लिए मानवता के मसीहा के रूप में सम्मानित किया जा रहा था। लेकिन यहाँ वह 18 साल की एक लड़की पर हमला कर रहा है, उसका चरित्र हनन कर रहा है। सोचिए जोइश को किस कदर भावनात्मक आघात का सामना करना पड़ रहा है बस इस बात के लिए कि उसकी माँ ने चुनाव में कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी को हराया था।

कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने एक महिला का अपमान कर राजनीतिक हिसाब चुकता करने से लेकर 18 साल की बेटी के चरित्र हनन तक की डिग्री हासिल कर ली है। यह तब होता है जब पार्टी का नेतृत्व एक महिला (सोनिया गाँधी) सँभाल रही हैं। जिस पार्टी ने भारत को पहला और एकमात्र महिला प्रधानमंत्री दिया है। वह पार्टी अब इतना नीचे गिर गई है कि एक 18 साल की उम्र की लड़की के बारे में ‘बार’ जोक्स बना रही है। इससे घृणित और कुछ नहीं हो सकता।

कहते हैं राजनीति गंदी जगह है, आखिर वहाँ तो मर्दों की दुनिया है। स्वाभाविक रूप से, एक महिला के लिए न केवल अपने लिए जगह बनाना बल्कि चौथी पीढ़ी के राजनेताओं की तरह वास्तव में शक्तिशाली राजनेताओं को हराना कठिन होता है, जिनके पिता, दादी और परदादा भारत के प्रधान मंत्री रहे हैं। जो यह मानते हुए बड़ा हुआ है कि वह भारत के प्रधानमंत्री की सीट का स्वाभाविक उत्तराधिकारी है।

गौरतलब है कि स्मृति ईरानी ने 2014 के आम चुनावों में अमेठी से तत्कालीन 2 बार के सांसद राहुल गाँधी को टक्कर दी, वो भी एक ऐसे निर्वाचन क्षेत्र में जिसने उनके परिवार के कई सदस्यों को लोकसभा भेजा है। राहुल गाँधी चुनाव जीत गए लेकिन ईरानी ने उन्हें कड़ी टक्कर दी। राहुल गाँधी को 46.71% वोट शेयर के साथ 4,08,651 वोट मिले जबकि ईरानी को 34.38% वोट शेयर के साथ 3,00,748 वोट मिले। जबकि पिछले कार्यकाल, 2009 में, राहुल गाँधी को 71.78% वोट शेयर के साथ 4,64,195 वोट मिले थे। इसलिए ईरानी भले ही हार गई हों, लेकिन उन्होंने ‘युवराज’ को कड़ी टक्कर दी थी।

लेकिन स्मृति ईरानी यहीं नहीं रुकी, अगले पाँच वर्षों तक ईरानी ने कड़ी मेहनत की और जब उन्होंने उस वर्ष अमेठी में फिर से राहुल गाँधी को टक्कर दिया, तो उन्होंने न केवल वोटों की संख्या बल्कि वोट शेयर भी बढ़ाया था। ईरानी को 49.71% वोट शेयर के साथ 4,68,514 वोट मिले, जबकि राहुल गाँधी को 4,13,394 वोटों के साथ 43.84% वोट मिले। राहुल गाँधी का वोट शेयर कम हो गया था। राहुल गाँधी ने गहरे में महसूस किया था कि वह अमेठी हार रहे हैं, यही वजह है कि उन्होंने चुनाव लड़ने के लिए केरल में दूसरी ‘सुरक्षित सीट’ वायनाड को चुना। हाँ, राहुल गाँधी ने दो निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ा था और अपना पारिवारिक गढ़ स्मृति ईरानी से हार गए थे, तब भी उनकी बहन सहित उनकी पार्टी के नेताओं ने उनका मजाक उड़ाया, उपहास किया।

अब जब वे उन पर हमला करके उन्हें नहीं तोड़ पाए हैं, तो वे इसे एक पायदान ऊपर ले गए हैं। उन्होंने एक 18 साल की उम्र की बेटी के प्रति अपमानजनक, घटिया टिप्पणियों, स्त्री द्वेषी हमलों, घृणित और अश्लील ‘बार’ जोक्स को हथियार बनाया है। वे चाहते हैं कि ईरानी टूट जाएँ और इसलिए एक महिला की कमजोरी, उनके बच्चों पर हमला कर रहे हैं। लेकिन ईरानी इतनी आसानी से टूट जाने वालों में नहीं हैं। उन्होंने इस मामले में एक लीगल नोटिस भेजा है और अपना मन बना लिया है कि वह छोड़ेंगी नहीं।

स्मृति ईरानी ने वर्षों से जो धैर्य और दृढ़ संकल्प दिखाया है, उम्मीद है उसकी झलक उनके बच्चों में भी पैदा हुई है और वे बड़े होकर अपनी माँ की तरह उतने ही मजबूत होंगे। और ईरानी खुद इस बार 2024 में न सिर्फ अमेठी बल्कि वायनाड से भी चुनाव लड़ेंगी और दोनों सीटों से विजयी होंगी।

लखनऊ के लुलु मॉल के बाद अब मेरठ के मॉल में पढ़ी गई नमाज, वीडियो आया सामने: DGP ने स्थानीय पुलिस से माँगा जवाब

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के लुलु मॉल के बाद मेरठ के एक मॉल में नमाज पढ़ने का मामला सामने आया है। रविवार (24 जुलाई, 2022) से मेरठ के मॉल में नमाज पढ़े जाने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह वीडियो मेरठ के सोहराब गेट स्थित मॉल का बताया जा रहा है। इसमें एक युवक नमाज पढ़ते हुए दिखाई दे रहा है। वीडियो वायरल होने के बाद डीजीपी ने पूरे मामले पर मेरठ पुलिस से जवाब तलब किया है।

भाजपा के आईटी विभाग के जिला संयोजक दिग्विजय सिंह ने मेरठ पुलिस, डीजीपी, डीएम सहित कुछ अन्य लोगों को टैग करते हुए ट्वीट किया है। उन्होंने लिखा कि लखनऊ के लुलु मॉल की तरह गढ़ रोड स्थित सोहराब गेट बस स्टेशन के पास एस-टू-एस स्क्वायर कांप्लेक्स में भी खुले में नमाज पढ़ी जा रही है।

इस मामले को लेकर नौचंदी थाने के इंस्‍पेक्‍टर ने बताया कि मामले की जाँच की जा रही है। पुलिस मॉल में नमाज पढ़ने वाले की तलाश में जुट गई है। यह वीडियो 35 सेकंड का है, जिस समय व्यक्ति नमाज पढ़ रहा था, उसी समय किसी ने उसका वीडियो बना लिया।

गौरतलब है कि 12 जुलाई को, लुलु मॉल में नमाज पढ़ने का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसके बाद से शहर में नया खुला ये शॉपिंग मॉल विवादों आ गया था। हिन्दू संगठनों ने कड़ी कार्रवाई की माँग करते हुए उसी जगह पर हनुमान चालीसा, सुन्दरकाण्ड और गायत्री मंत्र पढ़ने की अनुमति देने की माँग की थी। नमाज के विरोध में हिन्दू महासभा ने मॉल के गेट पर प्रदर्शन भी किया था। वहीं मॉल में नमाज पढ़ने वालों पर मॉल के जन संपर्क अधिकारी सिब्तैन हुसैन की शिकायत पर FIR दर्ज कर की थी।

इसके बाद लुलु मॉल में नमाज पढ़ने और उसका वीडियो बनाने वाले 9 नमाजियों में से 4 को सुशांत गोल्फ सिटी पुलिस ने गिरफ्तार किया था। तब से वामपंथी-लिबरल गिरोह इसे रोज नया मोड़ देते हुए कई मनगढंत दावे कर रहे हैं। यहाँ तक कि नमाजियों को भी हिन्दू साबित करने की न सिर्फ कोशिश हुई बल्कि खूब प्रोपेगेंडा फैलाया गया।