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‘समाजवादी पार्टी को उखाड़ फेकेंगे’: 7 बार के सपा MLA ने अपनी ही पार्टी को जड़ से उखाड़ फेंकने का लिया संकल्प, वीडियो वायरल

उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव (Uttar Pradesh Assembly Election 2022) होने वाले हैं। चुनाव से पहले जनता को रिझाने के लिए सभी पार्टियाँ बड़े-बड़े वादे कर रही हैं। साथ ही राजनीतिक दलों के नेताओं के बीच जुबानी जंग भी तेज देखने को मिल रही है। लगातार आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी जारी है। इसी बीच समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) का गढ़ कहे जाने वाले आजमगढ़ (Azamgarh) जिले के सदर विधायक और पूर्व मंत्री दुर्गा प्रसाद यादव (Durga Prasad Yadav) का एक वीडियो वायरल हो रहा है। 

इस वीडियो में सपा विधायक दुर्गा प्रसाद की जुबान लड़खड़ाते हुए दिख रही है। हैरान की करने वाली बात ये है कि विधायक दुर्गा यादव अपनी ही पार्टी को जड़ से उखाड़ फेंकने की बात कर रहे हैं।

वायरल वीडियो में दुर्गा प्रसाद यादव कह रहे हैं, “चौपाल और रैलियाँ निकालेगें, हमारे यहाँ जनता का देख ही रहे है। यहाँ पर जनसैलाब उमड़ा हुआ है। आने वाले दिन में और करेंगे। इसलिए मजबूती से हम लोग संकल्प लेकर के समाजवादी पार्टी को उखाड़ फेंकने का काम करेंगे।”

उनका ये बयान सुनकर वहाँ मौजूद कार्यकर्ता भौंचक्का रह जाते हैं और उन्हें गलती सुधारने के लिए कहते हैं। जिसके बाद वह भाजपा को उखाड़ फेंकने की बात कहते हैं। इधर वीडियो वायरल होते ही दुर्गा प्रसाद अपनी गलती को लेकर सोशल मीडिया पर लोगों के हाथों ट्रोल हो गए हैं।

सोशल मीडिया पर लोगों ने लिए मजे

एक सोशल मीडिया यूजर ने लिखा कि नेता जी भावनाओं में बह चुके हैं क्या? सपा नेता दुर्गा प्रसाद यादव ने जज्बात में ‘समाजवादी पार्टी’ को ही उखाड़ फेंकने की बात कर डाली।

राजन यादव लिखते हैं, “आजमगढ़ सदर से सपा विधायक, पूर्व मंत्री दुर्गा प्रसाद यादव के दिल की बात आखिरकार जुबाँ पर आ ही गई। बोलते-बोलते गला बैठा जा रहा है, लेकिन नेता जी अपने संकल्प को बताने से पहले चुप नहीं हुए। कुछ भी हो, नेताजी ने सच ही कहा है।”

वहीं अजय कुमार मौर्य ने लिखा, “सपा के पूर्व मंत्री दुर्गा यादव ने समाजवादी पार्टी को अब पूरी तरह उखाड़ फेंकने का संकल्प ले लिया है। हम सब का नैतिक कर्तव्य बनता है उनके इस संकल्प को पूरा करें।”

प्रभात मिश्रा ने लिखा, “ये है समाजवादी पार्टी के सात बार के विधायक और पूर्व कैबिनेट मंत्री दुर्गा प्रसाद यादव। अब ये भी अपनी पार्टी से ऊब चुके हैं।”

उल्लेखनीय है कि 2022 के विधानसभा चुनाव को लेकर दुर्गा प्रसाद यादव समाजवादी पार्टी की जीत सुनिश्चित करने के लिए लगातार सड़क पर संघर्ष कर रहे हैं। मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए जनसंपर्क करते हुए मौजूदा सरकार की नीतियों महँगाई, बेरोजगारी, डीजल, पेट्रोल, गैस की बढ़ती कीमतों सहित कई मुद्दों पर सपा कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग किया। इसी दौरान मीडिया से बातचीत करते हुए सपा सरकार में पूर्व कैबिनेट मंत्री रहे दुर्गा प्रसाद यादव की जुबान फिसल गई और उन्होंने समाजवादी पार्टी को ही उखाड़ फेंकने की बात कह डाली। बता दें कि दुर्गा यादव का सियासी सफर साल 1985 से शुरू हुआ। इसी साल वो जिले की सदर विधानसभा से पहली बार निर्दलीय विधानसभा पहुँचे थे। दुर्गा प्रसाद यादव आजमगढ़ जिले में 8 बार से सपा विधायक हैं।

जब अंबेडकर ने गाँधी के लिए कहा था- बगल में छुरी मुँह में राम, ‘हत्या’ को देश के लिए बताया था ‘अच्छा’: आज सवाल पर कालीचरण महाराज गिरफ्तार

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी पर अपमानजनक टिप्पणी करने के बाद महाराज कालीचरण को आज (दिसंबर 30, 2021) खजुराहो से गिरफ्तार कर लिया गया है। इस गिरफ्तारी के बाद कुछ लोग जगह-जगह पर इसका विरोध कर रहे हैं। इस लिस्ट में डॉ आनंद रंगनाथन का भी नाम शामिल है। 

डॉ आनंद रंगनाथन ने इस गिरफ्तारी पर अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला देकर डॉ अंबेडकर के विचार पेश किए हैं जहाँ डॉ अंबेडकर गाँधी के व्यवहार में ‘चालाकी’ की बात करते हैं। साथ ही ‘बगल में छूरी मुँह में राम’ वाली कहावत का उदाहरण देकर गाँधी को महात्मा मानने से इनकार कर कहते हैं कि उनके लिए गाँधी सिर्फ मोहन दास करमचंद गाँधी हैं। वह गाँधी की राजनीति को भारतीय इतिहास की राजनीति की सबसे बेईमान राजनीति बताते हैं और राजनीति में से नैतिकता खत्म करवाने का जिम्मेदार भी गाँधी को बताते हैं।

बता दें कि उक्त बातें डॉ अंबेडकर ने गाँधी को ‘महात्मा’ बुलाए जाने के संबंध में कही थीं। इसके अलावा उन्होंने 8 फरवरी 1948 को अंबेडकर ने अपनी पत्नी सविता अंबेडकर को एक पत्र लिखा था। इस पत्र में वो अपनी पत्नी सविता को समझा रहे थे कि वो उनसे सहमत हैं कि गाँधी की मौत इस तरह नहीं होनी चाहिए थी। लेकिन उन्होंने अपने इस पत्र में ये भी साफ कहा था कि उनका अस्तित्व गौतम बुद्ध के अलावा किसी से प्रेरित नहीं है।

इस पत्र में उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि महापुरुष अपने देश की महान सेवा करते हैं। लेकिन एक समय आता है जब वे अपने देश की प्रगति में एक बाधा भी बन जाते हैं।” इस पत्र में उन्होंने लिखा था कि गाँधी इस देश के लिए एक पॉजिटिव खतरा थे। उन्होंने सभी स्वतंत्र विचारों का गला घोंट दिया। वह कॉन्ग्रेस को साथ पकड़े हुए थे, जो समाज में सभी बुरे और स्वार्थी तत्वों का मिश्रण है और जो किसी सामाजिक और नैतिक सिद्धांत को लेकर सहमति नहीं देते केवल गाँधी की चापलूसी के अलावा। ये निकाय देश को चलाने में बिलकुल सही नहीं है।

इसी पत्र के अंत में डॉ अंबेडकर ने कहा, “जैसा कि बाइबल में लिखा है कि कई बार कुछ अच्छी चीज किसी बुरी चीज से ही बाहर आती हैं। मुझे लगता है कि गाँधी की मौत से भी कुछ अच्छा ही होगा। ये लोगों को महान व्यक्ति के बंधन से मुक्त करेगा। यह उन्हें अपने लिए सोचने पर मजबूर करेगा कि उनके फायदे में क्या है।”

कालीचरण महाराज पर कार्रवाई

उल्लेखनीय है कि कालीचरण महाराज पर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आयोजित ‘धर्म संसद’ में महात्मा गाँधी पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप लगा था। इसको लेकर उन पर रायपुर और महाराष्ट्र के पुणे में मामला दर्ज किया गया था। अपने खिलाफ केस दर्ज होने के बाद कालीचरण महाराज ने YouTube चैनल के जरिए स्पष्टीकरण दिया था। इसमें कहा था कि उन्हें महात्मा गाँधी के लिए कहे गए अपशब्दों का कोई पश्चाताप नहीं है। उन्होंने पूछा था कि महात्मा गाँधी ने हिन्दुओं के लिए किया ही क्या है? उन्होंने बताया कि किस तरह 14 वोट प्रधानमंत्री पद के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल को मिले, लेकिन शून्य वोट वाले जवाहरलाल नेहरू को पीएम बना कर उन्होंने वंशवाद फैलाया।

‘महात्मा गोडसे ने बलिदान देकर हिंदुस्तान को मुस्लिम बनने से बचा लिया, गजवा-ए-हिन्द फेल कर दिया’: कालीचरण महाराज के वो बयान, जिसके बाद हुए गिरफ्तार

महात्मा गाँधी (Mahatma Gandhi) की आलोचना करने के मामले में छत्तीसगढ़ पुलिस ने कालीचरण महाराज (Kalicharan maharaj) को 30 दिसंबर 2021 को गिरफ्तार कर लिया है। उनपर गाँधी की आलोचना करने और नाथूराम गोडसे की प्रशंसा करने का आऱोप है। मीडिया रिपोर्टों को मुताबिक, उन्हें मध्य प्रदेश के खजुराहो (Khajuraho) से गिरफ्तार किया गया है। उनपर आरोप है कि रायपुर में धर्म संसद के दौरान उन्होंने महात्मा गाँधी को लेकर विवादित बयान दिए। उनके भाषण का वो वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

नाथूराम गोडसे को दिया धन्यवाद

रायपुर की धर्म संसद में कालीचरण महाराज ने देश के हालात पर टिप्पणी करते हुए कहा, “हमारी आँखों के सामने दो-दो कब्जे देश पर हुए। ईरान, इराक और अफगानिस्तान तो पहले ही कब्जा चुके थे। बांग्लादेश और पाकिस्तान को उन्होंने हमारी आँखों के सामने कब्जाया। इन दोनों हिस्सों को देश से अलग करने के लिए राजनीति का इस्तेमाल हुआ। उस ह#$मी मोहनदास करमचंद गाँधी ने भारत को तबाह कर दिया। नाथूराम गोडसे जी को नमस्कार है। मार डाला उस ह#$मी को।”

वीडियो में कालीचरण महाराज आगे कहते हैं, “देखो ऑपरेशन करना बहुत जरूरी होता है, इन फोड़े-फुन्सियों का नहीं तो ये कैंसर बन जाते हैं। आपको मैं दंगे-धोपे करने को नहीं बोल रहा हूँ। इसकी जरूरत नहीं है और आप इसके लिए तैयार भी नहीं हो। मुस्लिम जरूर तैयार हैं, लेकिन आप नहीं। ये पुलिसवाले नहीं होते तो अपना सत्यानाश हो चुका था। इसमें धर्मात्मा लोग भी हैं, लेकिन ये हमारी साइड कभी नहीं लेते।”

उन्होंने आगे कहा, “ये पुलिसवाले हमारी साइड नहीं लेते हैं। ये हमें ही समझाते हैं कि तुम ज्यादा जुलूस मत निकालो। चिल्ला-पुकारा मत करो। मुस्लिमों के इलाके से भगवा रैली मत निकालो। इसमें पुलिसवालों का कसूर लगता है क्या आपको? नहीं! पुलिस भी गुलाम है। पुलिस को कौन नियंत्रित कर सकते। मैं पूरी-पूरी राजनीतिक बात कर रहा हूँ। अगर आप राजनीति से घृणा करोगे तो आप धर्म का नाश करोगे।”

‘गाँधी राष्ट्रपिता कहलाने लायक नहीं’: कालीचरण महाराज

कालीचरण महाराज के इस भाषण के बाद इस हंगामा मचा। इसके बाद उन्होंने एक और वीडियो जारी किया। इसमें उन्होंने कहा था उन्हें महात्मा गाँधी के खिलाफ इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करने पर कोई पछतावा नहीं है। उन्होंने बताया कि किस तरह 14 वोट प्रधानमंत्री पद के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल को मिले, लेकिन शून्य वोट वाले जवाहरलाल नेहरू को पीएम बना कर उन्होंने वंशवाद फैलाया।

उन्होंने कहा कि अगर सरदार पटेल के हाथों में भारत की सत्ता गई होती तो हमारा देश आज जगद्गुरु होता और अमेरिका से भी आगे होता, लेकिन जनता के साथ विश्वासघात हुआ। उन्होंने कहा कि ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे प्रतिभावान लोगों को कॉन्ग्रेस में इसी कारण काम करने का अवसर नहीं मिला। उन्होंने कहा कि ‘साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल, दे दी आज़ादी हमें बिना खडग बिना ढाल’ गाना लिखने वाले को जूते मारने चाहिए। उन्होंने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को याद करते हुए पूछा कि क्या इन्होंने देश के लिए कुछ नहीं किया?

उन्होंने बताया कि किस तरह जिन क्रांतिकारियों को फाँसी पड़ी, जिनमें 80% सिख थे, 20 प्रतिशत अन्य क्रान्तिकारी थे। ये गाना लिखने वालों ने उन्हें श्रेय नहीं दिया। उन्होंने पूछा कि क्या कभी महात्मा गाँधी ने एक लाठी भी खाई? उन्होंने कहा कि गाँधी चाहते तो भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फाँसी रुकवा सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। कालीपुत्र कालीचरण महाराज ने गाँधी का तिरस्कार करने की बात करते हुए बताया कि कैसे उन्होंने अपनी लाश पर भारत का बँटवारा होने की बात कही थी, लेकिन पाकिस्तान और बांग्लादेश बन गया।

बँटवारे के बारे में बात करते हुए कालीचरण महाराज ने कहा, “गाँधी कहते थे कि बँटवारा मेरी लाश पर होगा। लेकिन जब बँटवारा हुआ तो वह जिंदा थे। बँटवारे के बाद हुए दंगों में लाखों हिंदू और सिख मारे गए थे। जिन्ना के ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ पर 27 लाख हिंदुओं का नरसंहार किया गया। पाकिस्तान से ट्रेनों के जरिए हिंदुओं के शव भेजे जा रहे थे। महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया। उनके स्तन कटे हुए थे। स्तन को बोरों में भरकर भेजा गया था। दूसरी ओर गाँधी भारत को पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए देने के लिए मजबूर करने के लिए आमरण अनशन पर बैठे थे।”

“जब दंगा पीड़ित सिखों ने ठंड में मस्जिदों में शरण लिया, तब उन्हें बाहर निकाल कर मुस्लिमों को मस्जिदें सौंपने के लिए गाँधी ने अनशन किया। इसीलिए, मैं नफरत करता हूँ गाँधी से। इसलिए मैं गाँधी से नफरत करता हूँ।” उन्होंने कहा कि ‘गजवा-ए-हिन्द’ के तहत भारत के इस्लामीकरण के लिए पाकिस्तान और बांग्लादेश को जोड़ने वाले हजारों वर्ग किलोमीटर का कॉरिडोर मुस्लिमों ने माँगा और उसे देने के लिए भी गाँधी अनशन करने वाले थे। उन्होंने बताया कि जब स्वातंत्र्य वीर सावरकर ने हिन्दू वर्ण व्यवस्था को तोड़ कर एक होने की बात कही तो गाँधी ने नकार दिया। उन्होंने कहा कि बाबा साहब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने संस्कृत को राष्ट्रभाषा घोषित करने की बात कही, तब गाँधी ने इसके लिए अनशन नहीं किया।

कालीपुत्र कालीचरण महाराज ने पूछा कि जो राष्ट्र करोड़ों वर्षों से है, उसका राष्ट्रपिता कोई 200 वर्ष पहले आया व्यक्ति कैसे हो सकता है? उन्होंने कहा कि अगर राष्ट्र का पिता बनाना अनिवार्य ही है तो छत्रपति शिवाजी, गुरु गोविंद सिंह, आचार्य चाणक्य या महाराणा प्रताप को बनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अभी के महापुरुषों को बनाना है तो राष्ट्र को एक करने वाले सरदार पटेल को बनाया जाना चाहिए, जिन्होंने छोटे-छोटे रियासतों को एक कर के टुकड़ों में बँटे देश को एक किया।

कालीपुत्र कालीचरण महाराज ने कहा, “अगर पाकिस्तान-बांग्लादेश को भारत में कॉरिडोर मिल जाता तो हिंदुस्तान कब का मुस्लिम बन गया होता। महात्मा नाथूराम गोडसे को कोटि-कोटि धन्यवाद है। उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम है। उन्होंने अपना बलिदान देकर हिंदुस्तान को मुस्लिम बनने से बचा लिया। ‘गजवा-ए-हिन्द’ फेल कर दिया। सच बोलने की सज़ा मृत्यु है तो स्वीकार है। वीरों ने कुल के लिए बलिदान दे दिया तो मेरे जैसे करोड़ों कालीचरण धर्म के लिए मर सकते हैं। हम हिंदुत्व के लिए मृत्युदंड पाने के लिए भी तैयार हैं।”

खुले में नमाज हो या पीरियड आते ही निकाह की रवायत या फिर मोपला नरसंहार के दबे पन्ने… 2021 में जिनसे सब भागे, उन पर हमने की बात

वे गुरुग्राम की सड़कों, पार्कों और हर उस जगह पर नमाज पढ़ने को अमादा थे जिससे आपकी रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो। जिससे आपको उनकी हनक का पता चले। पर सेक्स और हिंदूफोबिया में सनी मुख्यधारा की मीडिया को इस साल भी इससे फर्क नहीं पड़ा। उन्होंने जब भी इस पर बात की तो उन्हें हिंदू ही असहिष्णु दिखे। पर हमने तमाम दबावों को दरकिनार कर साल भर इस पर बात की। मोपला नरसंहार के इस शताब्दी वर्ष में हम वे पन्ने खोलकर लाए जिन्होंने बताया कि हमें जो किसान विद्रोह बताकर पढ़ाया गया था, असल में वह हिंदुओं का सुनियोजित कत्लेआम था। चाहे एनसीईआरटी की किताबों में छपा प्रोपेगेंडा हो या वह कठमुल्ला कानून जो पीरियड आते ही मुस्लिम लड़कियों के निकाह को जायज ठहराता है, पर खुलकर बात की। काशी के विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त करने के औरंगजेब के शाही फरमान से लेकर बॉलीवुड की हिंदूफोबिया तक के हर पहलू पर चर्चा की। असल जिंदगी के उन नायकों की बात की जिन्होंने आरक्षण की बैसाखी के बिना सिक्योरिटी गार्ड से IIM प्रोफेसर तक का सफर तय किया।

जब 2021 जाने को है, हम समेट लाए हैं कि 15 ऐसी खबरें जो मीडिया के लिए मिसफिट था, लेकिन 2022 में भी जो हमें याद दिलाते रहेंगे अपने पाठकों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को।

कृषि कानूनों की वापसी, पंजाब चुनाव और हिंदू-सिख संबंध

2021 का ये पूरा साल किसान प्रदर्शनकारियों से जुड़ी खबरों के कारण चर्चा में रहा। कभी प्रदर्शन से हिंसा की खबरें आई, कभी रेप की, कभी हत्या की और कभी धमकियों की। ऐसे में केंद्र में बैठी मोदी सरकार ने एक साल से चल रहे प्रदर्शन को रोकने के लिए 19 नवंबर 2021 को ये तीन कृषि कानूनों को वापस ले लिया और कहा कि शायद वो कुछ किसानों को समझाने में असफल हो गए इसलिए वो इन कानूनों को वापस लेते हैं। मोदी सरकार के इस फैसले के साथ ही वो धड़ा एकदम से नाराज हो गया जिन्होंने शुरू से नए कृषि कानूनों को सराहा था। पीएम के प्रति नाराजगी, बीजेपी से गुस्सा उस समय बेहद सामान्य भाव थे। ऐसे में ऑपइंडिया में प्रकाशित एक लेख के भीतर उन संभावनाओं से लेकर उन घटनाओं का जिक्र किया गया जिसकी वजह से केंद्र ने अपना फैसला बदला। इस लेख में न केवल आपको राष्ट्र सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं पर जानकारी दी गई बल्कि निष्पक्ष ढंग से पंजाब चुनाव वाले तर्क को वर्णित किया गया और हिंदू-सिख संबंधों पर भी उन किताबों के आधार पर बात हुई जो बीजेपी की साइट पर मौजूद हैं।

निकाह की उम्र

हाल में केंद्र की मोदी सरकार ने लड़कियों की शादी की उम्र 18 से 21 करने का जो निर्णय लिया उससे समाज के कई लोग चिढ़े दिखाई दिए। इनमें सबसे ज्यादा मुस्लिम समुदाय के कट्टरपंथी थे। उन्होंने तो इस फैसले को लड़कियों को आवारा बनाने वाला, उन्हें छूट देने वाला, लोकतंत्र के ख़िलाफ़ और न जाने क्या-क्या कह दिया। मगर, बावजूद इसके एक सवाल सबके जहन में था कि क्या जो सरकार नए बदलाव लाने के लिए फैसला ले रही है वो इस्लामिक लॉ को प्रभावित करेगा या नहीं, क्योंकि इस्लामिक लॉ में तो पीरियड आने के बाद लड़की को बालिग मान लिया जाता है, वहाँ उम्र तय नहीं है। ऐसे में ऑपइंडिया ने आपके सामने उन खबरों के हवाले से इस सवाल को उठाया, जब भारतीय संविधान की जगह फैसला इस्लामिक लॉ को देखते हुए लिए गए। हालाँकि बाद में पता चला कि सरकार द्वारा जो संशोधन किया जाएगा वो अन्य सभी धर्मों के साथ-साथ मुस्लिमों पर भी लागू होगा।

मंदिरों की संपत्ति

प्राचीन मंदिरों और स्मारकों के रखरखाव के लिए इस वर्ष मद्रास हाईकोर्ट का एक फैसला आया था जिसका लब्बोलुआब था कि मंदिरों की जो जमीन है, उनका जो पैसा है, वह सब उनपर ही खर्च किया जाना चाहिए। ऐसे में सद्गुरु वासुदेव जैसे लोग जो तमिलनाडु में हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से छुड़ाने की कोशिशों में थे उनके अभियान को बल मिला था। इसी बीच ऑपइंडिया ने आपको इस खबर पर रिपोर्टिंग के साथ ये भी बताया था कि भारत का संविधान किस तरीके से हिंदुओं को अपने मंदिरों और उनकी संपत्तियों के संचालन करने का अधिकार देता है। ‘अनुच्छेद 14’ , ‘अनुच्छेद 25’ और  ‘अनुच्छेद 26’ के साथ हमने आपको राज्य के मंदिरों और वहाँ की वर्तमान  दशा का भी चेहरा दिखाया था।

खुले में नमाज

गुरुग्राम में खुले में नमाज पढ़ने का विरोध जिस प्रकार हिंदुओं द्वारा किया गया उसने देश के अन्य कोनों में रह रहे हिंदुओं को एक बड़ी सीख दी। ये सीख थी कि अपने आस-पास किस तरह सार्वजनिक स्थलों को कब्जे से बचाएँ और कैसे ये गुरुग्राम की घटना को याद रखकर प्रेरित हों। ऑपइंडिया ने भी इसी तर्ज पर आपको अपने लेख के जरिए बताया था कि आखिर क्यों गुरुग्राम में हुई घटनाएँ अन्य शहरों में न केवल लोगों के लिए बल्कि स्थानीय प्रशासन के लिए एक केस स्टडी की तरह होनी चाहिए क्योंकि सार्वजनिक स्थलों पर नमाज पढ़ने जैसे मजहबी कार्यकलाप, दीर्घकाल में सामाजिक समरसता के लिए सही नहीं हैं।

IIM प्रोफेसर बने रंजीत रामचंद्रन

कुछ खबरें कभी-कभी ऐसी होती हैं जो भले ही हमेशा सुर्खियों में नहीं रहती लेकिन कुछ लोगों के जीवन पर खासी छाप छोड़ती हैं। ऐसी ही एक खबर साल 2021 में आई जो रंजीत रामंचद्रन से जुड़ी थी। रंजीत का खबरों में आना इसलिए चर्चा का विषय नहीं कि उन्हें IIM राँची में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर चुना गया। बल्कि ये खबर इसलिए दोबारा पढ़ने वाली है क्योंकि रंजीत प्रोफेसर बनने से पहले एक नाइट गार्ड हुआ करते थे और आगे बढ़ने के लिए उन्होंने आरक्षण को अपना सहारा नहीं बनाया। बिन रिजर्वेशन उन्होंने प्रोफेसर बनने तक का मुकाम पाया और बाद में उनका एक पोस्ट वायरल हुआ जिसमें उन्होंने लिखा था IIM के प्रोफेसर का घर इसी घर में हुआ।

मोपला नरसंहार

इतिहास के नाम पर हमें जो किसानों का विद्रोह बचपन से लेकर बड़े होने तक पढ़ाया गया वो वास्तविकता में मोपला नरसंहार था। एक ऐसा नरंसहार जिसने न केवल मजहबी कट्टरपंथियों की बर्बरता को दोबारा प्रासंगिक बनाया बल्कि साथ में सैंकड़ों हिंदुओं को तड़पा तड़पा कर मारने में कोई कसर नहीं छोड़ी। स्थिति 1921 में कितनी भयावह थी इसका अंदाजा एक वाकये से लगाइए कि दंगाई न हिंदुओं के घरों को छोड़ रहे थे और न मंदिरों को, न औरतें बख्शी जा रही थीं और न बुजुर्ग। एक दृश्य तो इतना दर्दनाक भी था जहाँ भूख से तड़पती एक डेढ़ साल की बच्ची अपनी मरी माँ के स्तनों को चूस रही थी कि उसे किसी तरह एक दूध की बूंद मिल जाए। इस झकझोर देने वाले दृश्य को जब नीलमपुर मानववेदन तिरुमुलपद के दूसरे राजा ने देखा। तो उन्होंने उस अनाथ बच्ची को गोद लिया, उसका नाम कमला रखा और उसे अपनी बेटी के रूप में पाला। बाद में 1938 में कमला का विवाह इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के जूनियर इंजीनियर पद्मनाभ मेनन से हुआ। ऑपइंडिया पर मोपला नरसंहार पर जो लेख आपको पढ़ने को मिले उनमें से एक को कमला और पद्मानाभ मेनन के पोते श्याम श्रीकुमार ने ही लिखा था।

कोविड वैक्सीनेशन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने कोविड वैक्सीन देने में जो नए रिकॉर्ड बनाए उनसे आज कोई भी देश अंजान नहीं है। लेकिन कुछ समय पहले का वक्त यदि याद करें तो पता चलेगा कि कैसे वैक्सीन के विरुद्ध अभियान चलाने में अपने ही देश की ईसाई मिशनरियों से लेकर नामी उलेमाओं तक ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। हालाँकि बावजूद इसके भारत ने 100 करोड़ के पार वैक्सीनेशन का रिकॉर्ड कायम किया। ये आँकड़ा कितना ज्यादा है इसका अंदाजा इस बात से लगाइए कि अमेरिका, इंग्लैंड, रूस, फ्रांस, और जर्मनी की पूरी जनसंख्या को मिला दिया जाए तो वह तकरीबन 68 करोड़ के आसपास बैठती है और भारत ने जिस 100 करोड़ का आँकड़ा पार किया है वो इन पाँच उन्नत देशों की समूची आबादी के डेढ़ गुने के बराबर है।

जब एक बुजुर्ग स्वयंसेवक ने दिखाई राह

कोरोना महामारी का प्रकोप जब पूरे देश में फैल गया था और अस्पताल के लिए मारामारी चल रही थी। उस समय एक 85 साल के बुजुर्ग व आरएसएस कार्यकर्ता नारायण दाभदकर ने कोविड से पीड़ित होने के बाद भी अपना बेड छोड़ दिया था क्योंकि उन्होंने वहीं अस्पताल में खड़ी एक 40 साल की महिला को अपने पति के लिए रोते देख लिया था। वह अपने पति को एडमिट कराने की भीख माँग रही थी। इसी दृश्य को देख दाभदकर काका ने आराम से मेडिकल टीम को सूचित किया कि उनका बिस्तर महिला के पति को दे दिया जाए। उन्होंने कहा, “मैं अब 85 वर्ष का हो चुका हूँ, मैंने अपना जीवन जी लिया है। आपको मेरे बदले इस आदमी को बेड ऑफर करना चाहिए, क्योंकि उसके बच्चों को उसकी जरूरत है।” इस फैसले के बाद वो घर आए बीमारी से तीन दिन लड़े और फिर उनका स्वर्गवास हो गया। उनके जाने के बाद ये कहानी फेसबुक पोस्ट के जरिए वायरल हुई थी।

बॉलीवुड की हिंदूफोबिया

बॉलीवुड की मनोरंजन वाली दुनिया थोड़ी अलग है। आप सोचते हैं कि वहाँ बनने वाली फिल्में आपके एंटरटेनमेंट के लिए हैं या फिर आपके ज्ञानवर्धन के लिए। लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं होता। वहाँ प्रोपगेंडा एक कारक की तरह काम करता है जिसे फॉलो करने के चक्कर में निर्माता कितनी चालाकी से असली कहानियों से छेड़छाड़ करते है इसका पता दर्शक को भी नहीं चलता। पिछले कुछ सालों में हमने ऐसी तमाम फिल्म देखी हैं जिसमें प्रोपगेंडा के तड़के ने पूरी कहानी को ही बदल दिया हो। बात चाहे चक दे इंडिया की हो जिसमें मीर रंजन नेगी को कबीर खान बना दिया गया, शेरनी की हो जिसमें असगर अली खान को बना दिया ‘पिंटू भैया’ बना दिया या फिर आर्टिकल 15 की जिसमें बदायूँ रेप काण्ड के दोषियों को ब्राह्मण बनाकर पेश किया गया। ऑपइंडिया ने ऐसी ही फिल्मों की लंबी सूची बनाते हुए प्रोपगेंडा का पर्दाफाश किया था।

सावरकर और गाँधी

यूँ तो तमाम चीजें हैं जिन्हें भारतीय इतिहास को पढ़ाने के दौरान सालों तक छिपाया गया। लेकिन वीर सावरकर भारतीय इतिहास का वो नाम हैं जिन्हें लेकिन बातें जो छिपाई गईं वो अलग हैं और उन्हें लेकर जो गलत या आधी अधूरी जानकारी पढ़ाई गई उसकी लिस्ट अलग है। दर्शाया जाता है कि महात्मा गाँधी और वीर सावरकर की विचारधारा अलग थी इसलिए वो एक दूसरे के विरोधी थे। हालाँकि सच क्या है इसका पता महात्मा गाँधी और सावरकर के रिश्तों और एक दूसरे को भेजे गए पत्रों से चलता है। इन्हीं पत्रों से मालूम पड़ता है कि न केवल महात्मा गाँधी ने समय आने पर वीर सावरकर के लिए एक समय में रिहाई के लिए आवाज उठाई थी बल्कि सावरकर ने भी गाँधी की रिहाई के लिए आवाज उठाई थी।

कश्मीरी पंडितों के जख्म

1990 में कश्मीर घाटी में क्या-क्या हुआ…आज इसके बारे में आपको तमाम जगह पढ़ने को मिलता है। लेकिन उस 90 के दर्द को आज भी कैसे कश्मीरी अपने दिल में हरा करके जिंदा हैं ये तब ही पता चलता है जब उनसे बात की जाए। कश्मीरी पंडितों पर जो गुजरी उसकी एक गवाह आरती टिकू सिंह भी हैं। वो एक कश्मीरी पत्रकार हैं जिन्होंने उन सालों की भयावहता को याद करते हुए बताया कि कैसे उनके घर में एक मुस्लिम लड़का काम करता था और वो बताता था कि कब कहाँ विस्फोट होगा। जब टिकू के परिवार को शक हुआ और उससे सवाल किए गए तो पता चला कि ये सारी बातें मस्जिदों में तय होती हैं और वहीं पता चलता है किसे मारना है कितने लोगों को मारना है। आपबीती सुनाते हुए टिकू ने यहाँ तक बताया कि एक दिन ऐसा भी आया जब सभी मर्द घर के बाहर खड़े थे और औरतों ने सभी लड़कियों को इकठ्ठा कर के कहा कि अगर ‘वो लोग’ मोहल्ले में घुसने में कामयाब होते हैं तो लाइटर और दियासलाई से गैस सिलिंडर में आग लगा देनी है। यानी, मौत को गले लगा लेना है – आत्महत्या करनी है।

कोविड और भारतीय शोधकर्ता

कोविड के आने के बाद तरह-तरह की बातें और थ्योरी मीडिया में आ रही थीं। कई जगह चीन पर सवाल उठे, आरोप लगे। ऐसे में  कुछ लोग ये साबित करने में लगे थे कि जिस कोविड ने दुनिया भर में तबाही मचाई है वो स्वभाविक है। हालाँकि भारतीय शोधकर्ता इसे मानने से इनकार करते रहे। इस मुद्दे पर एक रिसर्च करने वाले शोधकर्ता का कहना था कि वे लोग अपने निष्कर्ष पर कायम हैं कि SARS-CoV-2 स्वाभाविक नहीं है। उन्होंने ट्वीट किया था, ”हमने जनवरी 2020 में यह कहा था, हम आज यही फिर से कह रहे हैं (कोरोना स्वभाविक नहीं है)।”

काशी विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त करने का फरमान

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के कारण इस साल ये धाम और इसका नाम सबके जहन में है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि औरंगजेब काल में इस मंदिर के साथ क्या हुआ। अगर नहीं तो आपको एक बार 18 अप्रैल 1669 की उस तारीख को याद करने की जरूरत है जब औरंगजेब ने एक फरमान जारी कर काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त करने का आदेश दिया। यह फरमान एशियाटिक लाइब्रेरी, कोलकाता में आज भी सुरक्षित है। उस समय के लेखक साकी मुस्तइद खाँ द्वारा लिखित ‘मासीदे आलमगिरी’ में इस ध्वंस का वर्णन है। इस पूरे वाकये पर ऑपइंडिया पर एक विस्तृत जानकारी है जो इस साल आपके साथ लेख के तौर पर साझा की गई थी।

सिनौली

इस वर्ष डिस्कवरी प्लस पर आई डॉक्यूमेंट्री ‘Secrets of Sinauli; प्राचीन सभ्यता के उस सच को उजागर किया था जिससे आजतक ज्यादातर लोग अंजान थे। इस डॉक्यूमेंट्री में मनोज वाजपेयी की आवाज के साथ विस्तृत बातचीत और ग्राफिक्स के सहारे उकेरी गई 5000 वर्ष पुरानी सभ्यता का वर्णन हमें देखने को मिला था, जिसने बताया था कि  हमारे यहाँ पनपने वाली एक छोटी सी सभ्यता भी अपने समकालीन विदेशी सभ्यताओं से कम से कम 5 सदी आगे थी।

NCERT का प्रोपेगेंडा

NCERT की किताबों में पढ़ाया जाने वाला इतिहास कितना प्रमाणिक है इसका खुलासा भी इसी साल हुआ। याद करवा दें कि इसी साल एक ऐसी आरटीआई के बारे में  मीडिया में खबरें छपीं थीं जिसमें सवाल किया गया था कि आखिर एनसीआरटी किन स्त्रोतों के आधार पर पढ़ा रहा है कि ‘जब (हिंदू) मंदिरों को युद्ध के दौरान नष्ट कर दिया गया था, तब भी उनकी मरम्मत के लिए शाहजहाँ और औरंगजेब द्वारा अनुदान जारी किए गए।’ लेकिन  NCERT का इस आरटीआई पर जवाब था- “जानकारी विभाग की फाइलों में उपलब्ध नहीं है।”

नहीं टलेंगे UP विधानसभा इलेक्शन: सभी दलों ने की समय पर चुनाव की माँग, एक घंटे बढ़ेगा मतदान का समय, तारीखों का ऐलान 5 जनवरी के बाद

चुनाव आयोग के यूपी दौरे का गुरुवार (30 दिसंबर 2021) को तीसरा और आखिरी दिन है। इस दौरान चुनाव आयोग की प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई। मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा ने कहा कि उत्तर प्रदेश में विधानसभा (Uttar Pradesh Chunav) का कार्यकाल 14 मई को खत्म हो रहा है। यहाँ 403 विधानसभा सीटें हैं, जिसमें 84 एससी के लिए और 2 एसटी के लिए रिजर्व हैं। चुनाव आयोग प्रदेश में निष्पक्ष, शांतिपूर्ण और कोविड मुक्त चुनाव कराने के लिए प्रतिबद्ध है।

मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा ने कहा कि उन्होंने पहले राजनीतिक दलों के साथ बैठक की, उनसे सुझाव लिए फिर हमने इंफोर्मेन्ट एजेंसियों और सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों और एसएसपी  के साथ बैठक की। सभी दलों ने कोविड प्रोटोकॉल का पालन करते हुए चुनाव समय से कराने की माँग की। कुछ लोगों ने रैलियों में भीड़ को लेकर भी अपनी चिंता व्यक्त की। साथ ही कुछ दल के लोगों ने प्रशासनिक लोगों के दबाव में भी होने की बात कही।

5 जनवरी के बाद होगा यूपी में चुनाव का ऐलान

चुनाव आयोग ने कहा कि 5 जनवरी को फाइनल वोटर लिस्ट आ जाएगी। इससे यह संकेत मिल रहा है कि 5 जनवरी के बाद ही यूपी में चुनाव का ऐलान होगा। मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि 80 साल से अधिक मतदाताओं को, दिव्यांगजनो को और कोविड पेशेंट का वोट चुनाव आयोग की टीम घर जाकर कास्ट कराएगी। पहली बार ये सुविधा दी जा रही है। 1500 लोगों पर एक बूथ होता था लेकिन इस बार 1250 मतदाता एक बूथ पर जाएँगे। इस तरह 11000 मतदान केंद्र बढ़ गए हैं। अब 1,74,351 मतदान स्थल हैं। इस बार कोरोना को देखते हुए पोलिंग टाइम को एक घंटा बढ़ाया जाएगा। उन्होंने कहा कि सभी मतदान केंद्रों पर वीवीपैट लगाए जाएँगे। चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए लगभग 1 लाख मतदान केंद्रों पर लाइव वेबकास्टिंग की सुविधा उपलब्ध रहेगी। इसके अलावा सभी मतदान अधिकारी फुली वैक्सीनेटेड होंगे।

अब तक मतदाताओं की कुल संख्या 15 करोड़ से अधिक है: EC

लखनऊ में मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा ने कहा कि राज्य में अब तक मतदाताओं की कुल संख्या 15 करोड़ से अधिक है। अंतिम प्रकाशन के बाद मतदाता के वास्तविक आँकड़े आएँगे। अंतिम प्रकाशन के बाद भी अगर किसी का नाम ना आए तो वो क्लेम कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि SSR 2022 के अनुसार अब तक 52.8 लाख नए मतदाताओं को सम्मिलित किया गया है। इसमें 23.92 लाख पुरूष और 28.86 लाख महिला मतदाता हैं। 18-19 आयु वर्ग के 19.89 लाख मतदाता हैं।

जब मोदी थे गुजरात के CM, तब पीछे पड़ी थी UPA की सरकार: शरद पवार ने माना, कहा- मैंने किया था बदले की राजनीति का विरोध

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काम करने के तरीके को विपक्षी नेता भी नहीं नकार पाते। इसी क्रम में हाल में नेशनल कॉन्ग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार भी प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ करते दिखाई दिए। 29 दिसंबर 2021 को शरद पवार ने पीएम मोदी की कार्यशैली की प्रशंसा करते हुए कहा कि वह जब कोई कार्य करते हैं, तो वह सुनिश्चित करते हैं कि काम पूरा हो। साथ ही ये भी बताया कि कैसे यूपीए सरकार में ‘सीएम मोदी’ के ख़िलाफ़ बदले की राजनीति होती थी।

मराठी अखबार ‘लोकसत्ता’ से बात करते हुए शरद पवार ने पीएम के लिए कहा, “उनका स्वभाव ऐसा है कि एक बार जब वह किसी भी कार्य को हाथ में लेते हैं, तो वह यह सुनिश्चित करते हैं कि जब तक वह (कार्य) अपने निष्कर्ष पर नहीं पहुँच जाता, तब तक वह नहीं रुकेगा। प्रशासन पर उनकी अच्छी पकड़ है और ये उनका मजबूत पक्ष है।”

पवार ने ये बातें उस समय कहीं जब उनसे पूछा गया था कि इतने वर्षों में उन्होंने एक नेता के रूप में प्रधानमंत्री मोदी में क्या बदलाव देखे हैं। शरद पवार ने ये भी कहा कि अगर प्रशासन द्वारा लिया गया फैसला आम जन से नहीं जुड़ा होता, उनकी आकांक्षाओं को पूरा नहीं करता तो सिर्फ मेहनती होना काफी नहीं होता। उनके मुताबिक, वह इस जगह पर कमी देखते हैं।

पवार ने इस बातचीत में कहा कि पीएम मोदी के पास लोगों को साथ लेकर चलने की अलग क्षमता है। यह शैली मनमोहन सिंह जैसे पूर्व प्रधानमंत्रियों में गायब थी। पवार से जब पूछा गया कि सीएम होते हुए मोदी के पीछे केंद्रीय एजेंसियाँ पड़ी थीं, क्या ये सही है। इस पर उन्होंने कहा जब मोदी सीएम थे तो वो (पवार) खुद केंद्र में थे। पीएम मीटिंग बुलाते थे और मोदी (भाजपा शासित प्रदेशों के) मुख्यमंत्रियों के समूह का नेतृत्व करते थे। ऐसे में रणनीति बनती थी कि उन्हें कैसे जवाब दिया जाए। पवार के अनुसार, उनके अलावा एक भी मंत्री ऐसा नहीं था जो मोदी से बात कर सके।

उन्होंने बताया कि यूपीए की इंटरनल मीटिंग में वो कहते थे कि अगर मोदी से कोई दिक्कत है भी तो भी ये नहीं भूला जाना चाहिए कि वो एक राज्य के मुख्यमंत्री हैं। लोगों ने उन्हें बहुमत दिया है। अगर वह कुछ मुद्दे लेकर आते हैं तो जरूरी है कि उन्हें सुलझाया जाए। उनके राज्य के लोगों के हित प्रभावित नहीं होने चाहिए।

पवार ने माना कि यूपीए सरकार मोदी से बदले की राजनीति करती थी और वो इसके विरोध में थे। उन्होंने यह भी बताया कि उनके इस मत का तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह समर्थन करते थे। वो दोनों मानते थे कि सीएम मोदी के ख़िलाफ़ बदले की राजनीति नहीं होनी चाहिए। उन्होंने बातचीत में यह भी कहा कि यूपीए सरकार में कुछ लोगों ने गुजरात में कुछ लोगों के ख़िलाफ़ कुछ ज्यादा ही कड़ा (एक्सट्रीम) रुख अपनाया था।

एक मुहम्मदवाद के इतने खतरे, और ‘पैगंबर’ गढ़कर क्या करेंगे: कालीचरण महाराज की ‘गाली’ से गायब नहीं हो जाते गाँधी पर सवाल

ईरान, इराक और अफगानिस्तान तो पहले ही कब्जा चुके ​थे। बांग्लादेश और पाकिस्तान उन्होंने हमारे सामने कब्जाया। राजनीति के द्वारा कब्जाया। और महा ह$मी उस मोहनदास करमचंद गाँधी ने सत्यानाश कर दिया। नाथूराम गोडसे जी को नमस्कार है, मार डाला उस ह$मी को।

यह वह बयान है जिसको लेकर कालीचरण महाराज की गिरफ्तारी हुई। यह बात उन्होंने रायपुर की उस धर्म संसद में कही थी जिसके आयोजकों में कॉन्ग्रेसी शामिल हैं। रायपुर पुलिस ने उन्हें 30 दिसंबर 2021 को मध्य प्रदेश के खजुराहो से गिरफ्तार कर लिया। वो भी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किए बिना। यह हम नहीं कह रहे। यह संवैधानिक तरीके से चुनी गई मध्य प्रदेश सरकार के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा का कहना है। उन्होंने ट्वीट कर कहा है, “कालीचरण महाराज की गिरफ्तारी छत्तीसगढ़ पुलिस ने जिस तरीके से की है‌, वह संघीय मर्यादा के खिलाफ है। कॉन्ग्रेस शासित छत्तीसगढ़ सरकार को इंटरस्टेट प्रोटोकॉल का उल्लंघन नहीं करना चाहिए था। मध्य प्रदेश के डीजीपी को छत्तीसगढ़ के अपने समकक्ष से बात कर गिरफ्तारी के तरीके पर विरोध जताने और स्पष्टीकरण लेने के निर्देश दिए हैं।”

सवाल गिरफ्तारी में कानूनी प्रक्रियाओं के पालन नहीं होने का ही नहीं है। यह भी नहीं है कि कालीचरण महाराज ने जिन शब्दों का इस्तेमाल क्या, वह किया जाना चाहिए था या नहीं। सवाल उन विचित्रताओं का है जो हिंदू ऐसे हर मामले में दिखाते हैं। उन्हें मुहम्मदवाद के खतरे से भी लड़ना और वामपंथियों की वाहवाही भी लेनी है। उन्हें पैगंबर को मानने वाले कट्टरपंथियों की हिंसा को लेकर चिंता भी दिखानी है और लिबरलों की नजर में सहिष्णु दिखने के लिए गाँधी को ‘पैगंबर’ भी बनाना है।

क्या यह विचित्र नहीं है कि इस देश में हिंदू अराध्यों को गाली दी जा सकती है, उनके मंदिरों पर हमला किया जा सकता है, उनके देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तोड़ी जा सकती है, हिंदुओं के नरसंहार के लिए कहा जा सकता है, देश के टुकड़े-टुकड़े करने की बात हो सकती है… लेकिन गाँधी पर सवाल नहीं उठाया जा सकता, गोडसे को नमस्कार नहीं कहा जा सकता।

गाँधी कोई पवित्र गाय नहीं हैं। हमारी परंपरा भी किसी को पवित्र गाय मानने की नहीं रही है। गर्भावस्था में सीता का परित्याग करने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम राम से भी सवाल करने की इस समाज को स्वतंत्रता रही है। भगवान राम को पूजने वाले मैथिल उस विवाह पंचमी (जिसे विवाह के लिए अत्यंत शुभ दिन माना जाता है) को अपनी बेटियों की शादी नहीं करते और इसे भगवान राम की आलोचना के तौर पर ही देखा जाना चाहिए, उनके जीवन चरित्र पर सवाल ही माना जाना चाहिए कि विवाह पंचमी को ब्याही गई सीता को हुए कष्ट ने इस तिथि को ही त्याज्य बना दिया। फिर गाँधी पर सवाल क्यों नहीं पूछे जा सकते? क्या यह मान लिया जाए कि गाँधी राम से भी बड़े हैं? या फिर केवल इसलिए चुप रहना चाहिए क्योंकि गाँधी के लिए मीठा-मीठा कहने से सियासी फायदे होते हैं, वामपंथी-लिबरल गैंग से सर्टिफिकेट मिलना आसान हो जाता है?

गाँधी पर सवाल करना उनके योगदान को खारिज करना नहीं है। यह हमारा साक्षात्कार उस सत्य से कराता है जिसके कारण हमारे राष्ट्र का विभाजन हुआ। जिसने इस देश में मुस्लिम तुष्टिकरण के बीज बोए। जिसने इस देश के एक प्रधानमंत्री को यह कहने की हिम्मत दी कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुस्लिमों का है। जिसने कट्टरपंथियों को ‘पैगंबर बिल’ के लिए प्रदर्शन की आजादी दी। आजाद मैदान में बलिदानियों का अपमान करने की आजादी दी। यह कहने की आजादी दी कि 15 मिनट दो फिर देखो तुम्हारा क्या होता है। एक हिंदू महिला से शादी करने वाले मुस्लिम अभिनेता को गृहयुद्ध की धमकी देने की आजादी दी।

इसलिए गाँधी पर सवाल जरूरी हैं। बार-बार सवाल किए जाने चाहिए। आंबेडकर जैसे उनके समकालीनों ने भी उन पर सवाल उठाए थे। कालीचरण महाराज जैसों के सवाल केवल कुछ शब्द बीप कर खारिज नहीं किए जा सकते।

हिंदुओं को तय करना ही होगा, जब पैगंबर को मानने वाले कट्टरपंथियों ने पूरी दुनिया को इतना हिंसक बना रखा है तो और ‘पैगंबर’ पैदा कर वे क्या करेंगे? इस ‘पैगंबरवाद’ को आज नहीं रोका गया तो कल को किसी कालीचरण महाराज का गला उसी तरह रेत दिया जाएगा, जैसे कमलेश तिवारी तक का रेता गया। ध्यान रखिएगा जैसे गाँधी को गोली मारने से गोडसे की देशभक्ति खत्म नहीं होती, उसी तरह ‘ह$मी’ की आड़ में सवालों को दबाया नहीं जा सकता।

करोड़ों की मनी लॉन्ड्रिंग और 27 नकली कंपनियाँ: अनिल देशमुख के खिलाफ ED की 7000 पन्नों की चार्जशीट, दोनों बेटों और सीए का भी नाम

राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) के नेता और महाराष्ट्र (Maharashtra) के पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख (Anil deshmukh) भ्रष्टाचार के मामले में लगातार फँसते जा रहे हैं। उनके खिलाफ जाँच कर रहे प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement directorate) ने बुधवार (29 दिसंबर 2021) को मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार (Money laundering & Corruption) के मामले में सप्लीमेंट्री चार्जशीट स्पेशल PMLA कोर्ट में दायर कर दी है। ये चार्जशीट 7000 से अधिक पन्नों की है।

रिपोर्ट के मुताबिक, चार्जशीट में आरोप है कि देशमुख और उनके परिवार ने 50 करोड़ रुपए की मनी लॉन्ड्रिंग की है। प्रवर्तन निदेशालय ने देशमुख के अलावा उनके दो बेटों ऋषिकेश और सलिल देशमुख और देशमुख के सीए भाविक पंजनानी को भी इसमें आरोपित के तौर पर शामिल किया है। हालाँकि, संदिग्ध लेनदेन के मामले में ईडी ने अभी तक सलिल और ऋषिकेश के बयानों को दर्ज नहीं किया है। इसके साथ ही ईडी ने आरोप पत्र में दावा किया है कि देशमुख परिवार 27 नकली कंपनियों को संचालित करता था।

ईडी ने चार्जशीट में मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह (Param bir singh) और महाराष्ट्र के पूर्व चीफ सेक्रेटरी सीताराम कुंटे (Sitaram kunte) के भी बयानों को दर्ज किया है। इस मामले की छानबीन में ED को पता चला है कि देशमुख और उनके परिवार ने कई सारे सदिग्ध वित्तीय लेनदिन किए हैं, जिनके जबाव अभी तक नहीं मिल सके हैं।

शिवसेना (Shivsena) नेता अनिल परब (Anil Parab) भी शक के दायरे में

चार्जशीट में प्रवर्तन निदेशालय ने महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री अनिल परब (Anil Parab) की भूमिका पर भी सवाल खड़ा किया है। हालाँकि, इसमें बहुत कुछ तो ED ने नहीं कहा है, लेकिन शक जाहिर किया है कि 12 IPS अधिकारियों को अनिल देशमुख की सिफारिश के बाद मनचाही पोस्टिंग मिली है। अब इस बात की जाँच की जा रही है कि कहीं अनिल परब ने कुछ अधिकारियों के नाम की सिफारिश तो नहीं की?

नवंबर में गिरफ्तार किए गए थे अनिल देशमुख (Anil Deshmukh)

गौरतलब है कि 100 करोड़ रुपए से अधिक की वसूली के मामले में मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह के लेटर बम के बाद अप्रैल 2021 में CBI ने अनिल देशमुख के खिलाफ केस दर्ज किया था। इसके बाद ED ने भी उनके खिलाफ जाँच शुरू की थी। भ्रष्ट्राचार के मामले में देशमुख को 2 नवंबर 2021 को ईडी ने 12 घंटे तक पूछताछ करने के बाद गिरफ्तार कर लिया था। इस गिरफ्तारी से पहले जाँच एजेंसी ने अनिल देशमुख को पाँच बार पूछताछ के लिए बुलाया था, लेकिन उन्होंने इसे नजरअंदाज कर दिया था।

कानून को ताक पर रख हुई कालीचरण महाराज की गिरफ्तारी: MP के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने जताया ऐतराज, छत्तीसगढ़ के DGP से माँगा जवाब

छत्तीसगढ़ पुलिस ने महात्मा गाँधी पर अमर्यादित टिप्पणी करने वाले कालीचरण महाराज को मध्य प्रदेश के खजुराहो से गिरफ्तार किया। छत्तीसगढ़ पुलिस की इस कार्रवाई पर मध्य प्रदेश के गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने एतराज जताया है।

उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ पुलिस की कार्रवाई प्रोटोकॉल का उल्लंघन है। उन्हें कार्रवाई से पहले या उसके बाद मध्य प्रदेश पुलिस को इसकी सूचना देनी चाहिए थी, जो उन्होंने नहीं किया है। नरोत्तम मिश्रा ने मध्य प्रदेश के डीजीपी को छत्तीसगढ़ से बात कर गिरफ्तारी के तरीके पर विरोध जताकर स्पष्टीकरण लेने के निर्देश दिए हैं।

उन्होंने इस बारे में मीडिया से बात करते हुए कहा, “हमें छत्तीसगढ़ पुलिस के तरीके पर आपत्ति है। यह इंटरस्टेट प्रोटोकॉल का उल्लंघन छत्तीसगढ़ की कॉन्ग्रेस सरकार को नहीं करना चाहिए था। संघीय मर्यादा इसकी बिलकुल इजाजत नहीं देती है। उन्हें सूचना देनी चाहिए थी। छत्तीसगढ़ सरकार चाहती तो उनको नोटिस देकर भी बुला सकती थी। मैंने मध्य प्रदेश के डीजीपी को कहा है कि तत्काल छत्तीसगढ़ के डीजीपी से बात करें कि ये क्या तरीका है उनका। गिरफ्तारी के इस तरीके पर आपत्ति व्यक्त करना है। अपना विरोध दर्ज कराएँ और स्पष्टीकरण भी लें।”

छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ पुलिस की तरफ से कालीचरण महाराज के परिवार और वकील को उनकी गिरफ्तारी की सूचना दे दी गई। 24 घंटे के अंदर उसे कोर्ट में पेश किया जाएगा। इसके साथ ही उन्होंने मध्य प्रदेश के गृह मंत्री पर तंज कसते हुए कहा, “पहली बात तो यह है कि नरोत्तम मिश्रा जी यह बताएँ कि महात्मा गाँधी को गाली देने वाले की गिरफ्तारी से वह खुश हैं या दुखी हैं? दूसरी बात यह है कि किसी नियम का उल्लंघन नहीं हुआ है। जो विधि प्रावधान है, उसके तहत कार्रवाई की गई है।”

इस पर छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने भी नरोत्तम मिश्रा पर निशाना साधते हुए कहा, “एक अपराधी को गिरफ्तार किया गया है, इसलिए उन्हें (मध्य प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा) इस पर आपत्ति नहीं करनी चाहिए। आमतौर पर पुलिस सूचना देती है लेकिन अपराध कई तरह के होते हैं। कभी जानकारी दी जाती है तो कभी नहीं।”

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आयोजित ‘धर्म संसद’ में महात्मा गाँधी पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप है। आरोप है कि कालीचरण महाराज ने गाँधी की हत्या को जायज ठहराते हुए गोडसे को नमन किया था। इसको लेकर उन पर रायपुर और महाराष्ट्र के पुणे में मामला दर्ज किया गया था।

अपने खिलाफ केस दर्ज होने के बाद कालीचरण महाराज ने YouTube चैनल के जरिए स्पष्टीकरण दिया था। इसमें कहा था कि उन्हें महात्मा गाँधी के लिए कहे गए अपशब्दों का कोई पश्चाताप नहीं है। उन्होंने पूछा था कि महात्मा गाँधी ने हिन्दुओं के लिए किया ही क्या है? उन्होंने बताया कि किस तरह 14 वोट प्रधानमंत्री पद के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल को मिले, लेकिन शून्य वोट वाले जवाहरलाल नेहरू को पीएम बना कर उन्होंने वंशवाद फैलाया।

5 राज्यों में चुनाव अभियान के बीच राहुल गाँधी ‘निजी यात्रा’ पर पहुँचे इटली, 1 महीने में दूसरी विदेश यात्रा: पंजाब रैली स्थगित

पाँच राज्यों में चुनावी सरगर्मी के बीच कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी एक बार फिर विदेश यात्रा पर निकल गए हैं। बताया जा रहा है कि वह बुधवार (29 दिसंबर 2021) को इटली पहुँच गए। वायनाड के कॉन्ग्रेस सांसद के भारत में नहीं होने की वजह से उनकी पंजाब रैली स्थगित कर दी गई है। गौरतलब है कि राहुल गाँधी की इटली यात्रा ऐसे समय में हुई है, जब सभी राजनीति दल अगले साल की शुरुआत में पाँच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार और रैलियों की तैयारी कर रहे हैं।

ANI ने कॉन्ग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला के हवाले से कहा, “राहुल गाँधी एक संक्षिप्त व्यक्तिगत यात्रा पर हैं। भारतीय जनता पार्टी (BJP) और उसके मीडिया मित्रों को अनावश्यक रूप से अफवाहें नहीं फैलानी चाहिए।” बता दें कि राहुल गाँधी 3 जनवरी को मोगा जिले में पार्टी की रैली के साथ पंजाब में अभियान की शुरुआत करने वाले थे। रैली के स्थगित होने की संभावना है। रिपोर्टों से पता चलता है कि गाँधी के भारत लौटने से पहले कॉन्ग्रेस पंजाब में अपना प्रचार अभियान शुरू नहीं करेगी।

राहुल गाँधी की पिछली यात्रा लगभग एक महीने की थी

दिवाली से ठीक पहले, राहुल गाँधी ‘लापता’ हो गए थे। कथित तौर पर लंदन गए थे। इसके बाद 5 नवंबर को बताया गया कि राहुल गाँधी ‘लंबी छुट्टी’ पर थे। वह संसद में शीतकालीन सत्र शुरू होने से ठीक पहले लगभग एक महीने बाद लौटे थे। उस वक्त बीजेपी ने राहुल पर कटाक्ष किया और उनके लंदन दौरे पर सवाल उठाया था।

राहुल गाँधी को अक्सर एक राजनेता की तुलना में एक पूर्णकालिक यात्री के रूप में देखा जाता है। दिसंबर 2020 में वह अपनी पार्टी के 136वें स्थापना दिवस पर इटली के लिए रवाना हुए। उनकी पार्टी के नेता एक स्पष्टीकरण पर सहमत नहीं हुए। हर कॉन्ग्रेस नेता की तरफ से अलग-अलग बातें कही जा रही थी, जिसकी वजह से वह विपक्ष और मीडिया के निशाने पर आ गए थे। इसी तरह अक्टूबर 2019 में, हरियाणा और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव से पंद्रह दिन पहले राहुल गाँधी कथित तौर पर बैंकॉक के लिए रवाना हुए थे।

दिलचस्प बात यह है कि राहुल गाँधी का पार्टी के महत्वपूर्ण कार्यक्रमों को छोड़ने का भी इतिहास रहा है। नवंबर 2019 में, कॉन्ग्रेस ने केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ देश भर में 35 प्रेस कॉन्फ्रेंस की योजना बनाई थी, लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस का निर्देश देने वाले राहुल गाँधी खुद ही उसे छोड़ दिया।

मई 2019 में, संसदीय चुनावों की मतगणना से पहले, राहुल गाँधी ने यूपीए अध्यक्ष सोनिया गाँधी द्वारा आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक को छोड़ दिया, जिसमें उन्होंने एक पीएम उम्मीदवार पर फैसला करने की योजना बनाई थी लेकिन वह छुट्टी मनाने के लिए लंदन निकल लिए। 2018 में बजट सत्र में गायब रहने से लेकर 2015 में थाईलैंड, कंबोडिया, म्यांमार और वियतनाम की यात्राओं तक, ऐसा कहा जाता है कि कॉन्ग्रेस नेता अपनी पार्टी के लिए सपोर्ट दिखाने से ज्यादा यात्रा करने में अधिक रुचि रखते हैं।