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मेवात के बाद अब हैदराबाद में निकाह धड़ाधड़, मस्जिदों में लंबी लाइन: ’21 साल में शादी’ वाला कानून आने से पहले ही मुस्लिमों में खलबली

केंद्र की मोदी सरकार ने हाल ही में लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 21 साल करने का प्रस्ताव पास किया था। हालॉंकि अभी इस संबंध में कानून नहीं बना है। लेकिन इसकी आहट से ही मुस्लिम समुदाय में अफरातफरी दिख रही है। वे जल्दी से जल्दी लड़कियों का निकाह करना चाहते हैं। रिपोर्ट के अनुसार इसके कारण हैदराबाद के पुराने शहर की मस्जिदें व्यस्त और गुलजार हैं।

जल्दबाजी में किए जा रहे इन निकाहों में शामिल दुल्हनों की उम्र 18 से 20 साल के बीच बताई जा रही है। पहले इनमें से अधिकांश का निकाह 2022-2023 में होना तय था। लेकिन शादी की न्यूनतम उम्र से जुड़ा नया कानून आने के डर से अब उनके परिजन इंतजार नहीं करना चाहते हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस बाबत ओल्ड सिटी में रहने वाले कम से कम आधा दर्जन परिवारों से बात की, जिन्होंने इसी कारण से अपनी बेटियों की निकाह की तारीख बदली है। रिपोर्ट में कहा गया है कमजोर आर्थिक स्थिति की वजह से निकाह के बावजूद परिवारों ने ‘विदाई’ की रस्म को फिलहाल टाल दिया है।

19 साल के एक लड़की की अम्मी समरुन्निसा ने TOI से बात करते हुए कहा कि उनकी तीन बेटियाँ हैं, जिनमें से एक विकलांग है। ऐसे में वह अपनी एक बेटी की शादी के लिए दो साल और इंतजार कैसे कर सकती है? वहीं बाबानगर की एक महिला ने बताया कि उसके पति कमाने के लिए श्रीलंका गए हैं और वह उनके वापस आने के बाद 2022 के मध्य में अपनी बेटी का निकाह करना चाह रही थी, लेकिन बिल के बारे में सुनने के बाद उसे जल्दबाजी में यह कदम उठाना पड़ा है। 

इसी तरह रहमत अली ने 26 दिसंबर को अपनी बेटी का निकाह किया और उसकी विदाई 4-5 महीने में करेंगे, क्योंकि अभी उनके पास बेटी को फर्नीचर, गहने या कपड़े आदि देने के लिए पैसे नहीं हैं। वहीं चंद्रयानगुट्टा निवासी एक जोड़ा अपनी बेटी की शादी के लिए केसीआर सरकार की ‘शादी मुबारक’ योजना पर निर्भर है। 2014 में टीआरएस सरकार ने यह योजना शुरू की थी। यह योजना एससी, एसटी, ईबीसी या अल्पसंख्यकों को 1 लाख रुपए की वित्तीय सहायता देती है। योजना के लाभ के लिए लड़कियों की उम्र कम से कम 18 वर्ष होनी चाहिए।

इलाके के एक स्थानीय नेता फ़िरोज़ खान ने बताया कि इसी योजना का लाभ उठाने के लिए परिवार निकाह करवा रहे हैं, ताकि वो जल्द से जल्द इसके लिए आवेदन कर सकें। वहीं बिल को लेकर मुस्लिम धर्मगुरु और अमरत-ए-मिल्लत-ए-इस्लामिया तेलंगाना और आंध्र के अमीर (प्रमुख) मौलाना जफर पाशा का कहना है कि यह मुस्लिम पर्सनल लॉ में ‘घुसपैठ’ के अलावा और कुछ नहीं है। उन्होंने कहा कि इस्लाम में एक मुस्लिम लड़की यौवन प्राप्त करने के बाद शादी कर सकती है।

गौरतलब है कि हाल ही में हरियाणा के मेवात से भी ऐसी ही खबर सामने आई थी। यहाँ के मुस्लिम बहुल वाले नूँह क्षेत्र में लोग ऐसे लड़कों की तलाश में हैं, जो 2 दिन में निकाह करने के लिए तैयार हो जाए। इमामों के पास दूल्हा बताने की इतनी माँग बढ़ गई है कि अब इस संबंध में अजान के समय घोषणा भी होती सुनी गई है। नूँह जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष साजिद इस कानून को लेकर कहा था, “हम इस पर आपत्ति जताते हैं। ये उनके लिए ठीक है जो पढ़ी लिखी हैं और जीवन में कोई उद्देश्य रखती हैं, लेकिन जिनका कोई उद्देश्य नहीं है, वह अनपढ़ हैं, उन्हें उनके माता-पिता शादी न होने पर भार समझते हैं।“

कालीचरण महाराज गिरफ्तार, ‘धर्म संसद’ में गाँधी पर आपत्तिजनक टिप्पणी का आरोप: FIR के बाद कहा था– फाँसी दे दो, माफ़ी नहीं माँगूँगा

कालीचरण महाराज (Kalicharan Maharaj) गिरफ्तार कर लिए गए हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार उन्हें मध्य प्रदेश के खजुराहो से गिरफ्तार किया गया है। उन पर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आयोजित ‘धर्म संसद’ में महात्मा गाँधी पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप है। इसको लेकर उन पर रायपुर और महाराष्ट्र के पुणे में मामला दर्ज किया गया था। अब खबर आ रही है कि रायपुर पुलिस ने खजुराहो के एक होटल से उन्हें गिरफ्तार कर लिया है।

उनके खिलाफ रायपुर के टिकरापारा थाने में मामला दर्ज किया गया था। जिस ‘धर्म संसद’ में गाँधी को लेकर अपमानजनक बात की गई थी वह 26 दिसंबर 2021 को रायपुर के रावण भाटा मैदान में आयोजित की गई थी। आरोप है कि कालीचरण महाराज ने गाँधी की हत्या को जायज ठहराते हुए गोडसे को नमन किया था। कथित तौर पर उन्होंने मंच से कॉन्ग्रेस नेताओं की आलोचना करते हुए हिंदू नेता चुनने की बात भी श्रोताओं से कही। इसके अलावा उन्होंने इस्लाम को लेकर कहा था कि मुस्लिम देश पर कब्जा करना चाहते हैं।

अपने खिलाफ केस दर्ज होने के बाद कालीचरण महाराज ने YouTube चैनल के जरिए स्पष्टीकरण दिया था। इसमें कहा था कि उन्हें महात्मगा गाँधी के लिए कहे गए अपशब्दों का कोई पश्चाताप नहीं है। उन्होंने पूछा था कि महात्मा गाँधी ने हिन्दुओं के लिए किया ही क्या है? उन्होंने बताया कि किस तरह 14 वोट प्रधानमंत्री पद के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल को मिले, लेकिन शून्य वोट वाले जवाहरलाल नेहरू को पीएम बना कर उन्होंने वंशवाद फैलाया।

उन्होंने कहा था कि अगर सरदार पटेल के हाथों में भारत की सत्ता गई होती तो हमारा देश आज जगद्गुरु होता और अमेरिका से भी आगे होता, लेकिन जनता के साथ विश्वासघात हुआ। उन्होंने कहा कि गाँधी चाहते तो भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फाँसी रुकवा सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। कालीपुत्र कालीचरण महाराज ने गाँधी का तिरस्कार करने की बात करते हुए बताया कि कैसे उन्होंने अपनी लाश पर भारत का बँटवारा होने की बात कही थी, लेकिन पाकिस्तान और बांग्लादेश बन गया।

उन्होंने कहा था, “जब बँटवारा हुआ, तब गाँधी ज़िंदा थे। बँटवारे के दंगे में लाखों हिन्दुओं-सिखों को काट डाला गया। 27 लाख हिन्दुओं का नरसंहार हुआ ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के दिन जिन्ना द्वारा। पाकिस्तान की ट्रेनों से बोर के बोर भर कर हिन्दुओं की लाशें और महिलाओं के सामूहिक बलात्कार के बाद स्तन काट कर भेजे जा रहे थे। गाँधी अनशन कर रहे थे कि पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए दो। जब दंगा पीड़ित सिखों ने ठंड में मस्जिदों का श्री लिया, तब उन्हें बाहर निकाल कर मुस्लिमों को मस्जिदें सौंपने के लिए गाँधी ने अनशन किया। इसीलिए, मैं नफरत करता हूँ गाँधी से।” बता दें कि महाराज कालीचरण पिछले साल तब चर्चा में आए थे, जब मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध भोजपुर शिव मंदिर में शिव तांडव स्त्रोत का गायन करते हुए उनका वीडियो वायरल हुआ था।

ऑपइंडिया टॉप 12: साल की वो खबरें जो वामपंथी मीडिया के नैरेटिव में नहीं आई फिट, हमने देश को पढ़ाया

अपने बच्चे को वापस लाने की गुहार लगाता पिता हो या फिर ईसाई मिशनरियों द्वारा गुमराह किए आदिवासियों को पैर पखारकर घर लौटाने वाला युवा नेता, 2021 में भी ऐसे तमाम मौके आए जब वामपंथी मीडिया ने या तो पाठकों से खबर छिपाने की कोशिश की या फिर उन्हें तोड़-मरोड़कर अपने नैरेटिव के हिसाब से पेश किया। जिस लखीमपुर खीरी पर इतना शोर मचा, वहीं मार डाले गए श्याम सुंदर निषाद और रमन कश्यप के परिवार की सुध लेने तक की जहमत नहीं उठाई गई। लेकिन हमने हर वह दरवाजा खटखटाया जिनकी आवाज मेनस्ट्रीम मीडिया ने दबाई। आपके सामने खबर का हर वह कोण रखा जो लिबरल मीडिया की लिस्ट में दूर-दूर तक नहीं था।

जब हम नए साल में प्रवेश करने को हैं पाठकों को फिर से उन खबरों की याद दिला रहे हैं जिनकी आवाज हम बने ताकि सनद रहे ‘खबरों का राइट एंगल’ इधर ही है।

मुस्लिम बीवी से बेटे को वापस पाने के लिए सिख युवक की गुहार

इस वर्ष के बीच में जिस समय जम्मू-कश्मीर में सिख लड़कियों के धर्मांतरण का मामला गरमाया हुआ था, उसी बीच ऑपइंडिया से बात करते हुए एक सिख युवक ने आपबीती सुनाई थी। व्यक्ति का नाम तरलोचन सिंह संधू था, जिन्होंने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया था कि 2008 में मुस्लिम युवती नगीना से शादी करने के बाद उनके जीवन में समस्याओं का पहाड़ टूट गया। धीरे-धीरे हाल (खबर के समय) ऐसे हुआ कि नगीना के परिजन उनपर धर्म बदलने का दबाव बनाने लगे, उनके सिख होने पर आपत्ति जताई और उन्हें ताहिर खान बनाकर कलमा पढ़ाना चाहा। तरलोचन का आरोप था कि उनके ससुरालवाले बेटे का भी खतना कराना चाहते हैं। इसलिए वो चाहते हैं कि बस उनका बेटा किसी तरह उन्हें वापस मिल जाए।

मुस्लिम पत्नी सिख पति
पीड़ित सिख युवक तरलोचन सिंह अपने बेटे के साथ (पहले की फोटो)

जब मुस्लिम भीड़ के शिकार बने दुबे भाई

किसी आपराधिक घटना में यदि मुस्लिम भीड़ आरोपित हो तो वामपंथी इसे अक्सर अपनी रिपोर्ट्स में बड़ी चालाकी से छिपा ले जाते हैं। कुछ ऐसा ही सितंबर माह में मध्य प्रदेश में घटित एक घटना के समय भी हुआ जब रीवा जिले की जवा तहसील में एक मामूली विवाद के बाद आधा दर्जन से ज्यादा मुस्लिम समुदाय के लोगों ने दो भाइयों को घेर कर बुरी तरह मारा। ब्रजेंद्र दुबे और विवेक दुबे पर हुए इस हमले में दोनों को गहरी चोट आई थी। ऐसे में ऑपइंडिया ने उनसे बात की और घटना के विषय में विस्तार से जाना। इसके बाद अपने पाठकों को घटना की विस्त़ृत रिपोर्ट दी जिसमें बताया गया था कि कैसे इस हमले में एक भाई का दिमागी संतुलन बिगड़ गया है। वहीं दूसरा भाई भी बुरी तरह तरह घायल हो गया था।

रीवा ब्रजेंद्र विवेक मार
हमले में घायल ब्रजेंद्र दुबे और विवेक दुबे (बाएँ से)

लखीमपुर में मार डाले गए श्याम सुंदर निषाद

लखीमपुर खीरी हिंसा में किसानों पर हुई बर्बरता की आज जगह-जगह चर्चा है, पर हिंसा में मारे गए भाजपा कार्यकर्ताओं पर कोई कुछ नहीं कहता। घटना के वक्त भी यही हाल था। तब ऑपइंडिया ने हिंसा में मारे गए बीजेपी सदस्य श्याम सुंदर निषाद के भाई से बात की थी। बातचीत में संजय ने घटना की और अपने भाई की आखिरी वीडियोज के आधार पर उग्र किसानों की भीड़ को जल्लाद बताया था। साथ ही अपने भाई की मृत्यु पर कहा था कि अगर उनके भाई पर हमला करने वाले किसान होते तो उनके भाई श्याम निषाद के साथ ऐसा नहीं होता।

लखीमपुर खीरी हिंसा, भाजपा नेता श्याम सुंदर निषाद
लखीमपुर खीरी हिंसा में मारे गए भाजपा सदस्य श्याम सुंदर निषाद

रमन कश्यप के परिवार का दर्द

किसान प्रदर्शनकारी और भारतीय जनता पार्टी के नेता व कार्यकर्ताओं के बीच लखीमपुर खीरी में हुई हिंसक झड़प में मारे जाने वाले पत्रकार रमन कश्यप भी थे। उनकी मौत की खबर भी लगातार मीडिया में आ रही थी। ऐसे में ऑपइंडिया ने मृतक के पिता से संपर्क किया तो पता चला कि कैसे घटनास्थल की कवरेज करने पहुँचे रमन को गाड़ी ने टक्कर मारी और फिर तमाम भीड़ ने उन्हें वहीं पर पड़े रहने दिया। मृतक के पिता राम दुलारे कश्यप ने बताया था कि घटना दोपहर में हुई थी और उन्हें देर रात जाकर इस बात के बारे में पता चला कि उनका बेटा अब इस दुनिया में नहीं है। जब उन्होंने मार्चरी में जाकर चेक किया तो उनके बेटे की लाश तिरछी पड़ी थी। ऑपइंडिया से बात करते हुए राम दुलारे ने बिलखते हुए कहा था कि अगर उसको कहीं दिखाया गया होता तो हो सकता है वो हमारे बीच होता।

लखीमपुर खीरी हिंसा, पत्रकार रमन कश्यप, पिता और बच्चे
लखीमपुर खीरी हिंसा का शिकार हुए पत्रकार रमन कश्यप (बाएँ) और उनके पिता व बच्चे (दाएँ)

10000 से ज्यादा लोगों की घर वापसी कराने वाला युवा नेता

हमारे समाज में धर्मांतरण की घटनाएँ समय के साथ बढ़ी हैं उससे साफ पता चलता है कि किस तरह लोगों की मजबूरियों का फायदा उठाया गया और उन्हें लालच देकर धर्म परिवर्तन करवा दिया गया। हालाँकि, अब समय बदला है। लोग जागरूक हुए हैं और अपने मूल धर्म में वापसी कर रहे हैं। पिछले दिनों ऐसे कई वाकये सामने आए जब सैंकड़ों लोगों ने मिलकर हिंदू धर्म अपनाया। इसी क्रम में ऑपइंडिया ने उस शख्स से बात की जो इस अभियान को सक्रियता से आगे बढ़ा रहा है। ये व्यक्ति कोई नहीं बल्कि भाजपा प्रदेश मंत्री प्रबल प्रताप सिंह हैं जो जशपुर राजपरिवार से संबंध रखने के बाद भी अपने पिता व बीजेपी के दिग्गज नेता दिलीप सिंह जूदेव की तरह उन आदिवासियों को मूल धर्म में घरवापसी करवा रहे हैं जिन्हें ईसाई मिशनरियों ने जाल में फांस लिया था। घरवापसी के समय वह लोगों के चरण पखारते हैं और विधिवत ढंग से लोगों की हिंदू धर्म में वापसी कराते हैं। इस बातचीत में प्रबल प्रताप ने ऑपइंडिया को बताया था कि वो अब तक 10 हजार से ज्यादा लोगों की घरवापसी करवा चुके हैं। हाल में उन्होंने 250 परिवार के 600 लोगों को हिंदू धर्म में पैर धोकर स्वागत किया था।

जूदेव पिता-पुत्र
चरण पखार घर वापसी करवाते प्रबल प्रताप सिंह जूदेव, बाएँ उनके दिवंगत पिता दिलीप सिंह जूदेव

YouTube ने जब कुचली एक राष्ट्रवादी की आवाज़

इसी साल नवंबर के महीने में यूट्यूब की मनमानियों का एक नमूना सामने आया था जब सब-लोकतंत्र की स्थापना करने वाले रचित कौशिक के चैनल को यूट्यूब ने प्रतिबंधित कर दिया था। अजीब बात ये थी कि यूट्यूब ने कभी हेट स्पीच तो कभी चाइल्ड सेफ्टी पॉलिसी का हवाला दे देकर उनकी वीडियोज को हटाना शुरू किया था। जब रचित कौशिक ने यूट्यूब की इस तानाशाही भरे रवैये के ख़िलाफ़ अपील की तो उन्हें बताया गया कि ऐसा कोई वीडियो नहीं है जिसमें नियमों का उल्लंघन होता हो। बावजूद इसके उनके चैनल को सस्पेंड किए रखा गया। बाद में एक नए चैनल से रचित कौशिक ने अपनी बात रखनी शुरू की। मगर यूट्यूब इसके पीछे भी पड़ा। इस पूरे घटनाक्रम में ऑपइंडिया लगातार सब-लोकतंत्र के साथ किए जा रहे बर्ताव पर रिपोर्ट कर रहा था।

YouTube, सब लोकतंत्र, रचित कौशिक
YouTube की करतूतों की वजह से ‘सब लोकतंत्र’ के संस्थापक रचित कौशिक को छोड़ना पड़ा ये प्लेटफॉर्म

जब एक सोसायटी हुआ मुस्लिम बहुल तो हिंदुओं का क्या हुआ

गुजरात के भरूच में हुए डेमोग्राफिक बदलाव के बाद वहाँ हिंदुओं की जो हालात हुई उस पर अक्टूबर में ऑपइंडिया ने अपने पाठकों के लिए एक रिपोर्ट की थी। इस रिपोर्ट में बताया गया था कैसे जलाराम बापा मंदिर में होने वाली शाम की आरती पर शौकत अली के विरोध के बाद रोक लग गई। इसके अलावा इस खबर में ये भी बताया गया था कि कैसे हिन्दू अपने घरों और मंदिरों को बेचने के लिए मजबूर हो चुके हैं क्योंकि क्षेत्र में मुस्लिमों की संख्या बढ़ती जा रही है। सूत्रों ने ऑपइंडिया को ये भी बताया था भरूच के कुछ हिस्सों में 2019 में अशांत क्षेत्र अधिनियम लागू किया गया था, लेकिन प्रशासन सहित कुछ लोगों ने इसमें छिपी खामियों का फायदा उठाते हुए कुछ क्षेत्रों में पूरी जनसांख्यिकी (डेमोग्राफी) ही बदल डाला। अब स्थिति यह हो गई है कि हिंदू केवल भरूच के सोनी फलियो (Soni Faliyo) और हाथीखाना (Hathikhana) क्षेत्रों में रह गए हैं। अब वहाँ भी मुश्किल से कोई 20-25 हिंदू परिवार बचे हैं। और वो भी अब यहाँ से अपने घरों को बेचकर और वह इलाका छोड़ देने का फैसला कर चुके हैं।

भरूच का एक सोसायटी हुआ मुस्लिम बहुल तो शिव मंदिर बन गया ‘मूत्रालय’, जलराम बापा मंदिर पर लगा ‘बिक्री का बोर्ड’

भारत से हार के बदले पाकिस्तानी उठा लेते थे हिंदू लड़कियाँ

भारत-पाकिस्तान के वर्ल्ड कप मैच के बाद भारत की हार पर जगह-जगह जश्न मनाने की खबरें आईं थी। शायद इतनी खुशी इसलिए थी क्योंकि पाकिस्तान ने पहली बार भारत को वर्ल्ड कप मैच में हराया था। पाकिस्तानियों ने भी अपनी टीम की जीत का खूब जश्न मनाया था। मगर इस दौरान एक पाकिस्तानी हिंदू शर्णार्थी ने ऑपइंडिया से बात करते हुए वो सच्चाई बताई जिसके बारे में शायद ही कोई जानता हो। दिल्ली के आदर्श नगर इलाके के शर्णार्थी कैंप में मूलभूत जरूरतों के लिए भी तरसने वाली एक हिंदू शर्णार्थी ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा था कि उन्हें दुख है कि पाकिस्तान जीता मगर इससे पहले तक जब भी इंडिया जीतता था वहाँ (पाकिस्तान) के लोग इसका बदला हिंदू लड़कियों को उठाकर लेते थे और पुलिस भी कुछ नहीं करती। कई बार लड़कियाँ लौटती थीं और कई बार नहीं भी आती थीं।

आदर्श नगर हिन्दू कैंप बिजली
बिजली की समस्या से सिर्फ बीमारी ही नहीं मौत भी झेल रहे पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थी: आदर्श नगर कैंप का आँखों देखा हाल

वह साधु जिसने 6 दिसंबर 1992 की देखी अयोध्या

6 दिसंबर की तारीख आते ही यूँ तो आप अयोध्या पर बहुत से लेख पढ़ते होंगे। लेकिन इस बार इस विशेष दिन पर ऑपइंडिया आपके लिए कुछ अलग लेकर आया था। ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट में आपको एक साधू से हुई बातचीत पेश की थी जो उस 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में थे। आज उन्हें संत ब्रजमोहन दास के नाम से जाना जाता है। हमसे बातचीत में उन्होंने बताया था कि 6 दिसंबर के करीब 15 दिन पहले ही वहाँ कारसेवकों का आना शुरू हो गया था। हर दिन उनकी संख्या बढ़ रही थी। चप्पे-चप्पे पर सुरक्षाकर्मी थे। अयोध्या वाले इसी सोच में थे कि 6 दिसंबर को क्या होगा। महंत से हुई बातचीत की इस रिपोर्ट में न केवल 6 दिसंबर से पहले का विस्तारपूर्वक जिक्र किया गया है बल्कि अयोध्या की व्यवस्था, सुरक्षाबलों का बर्ताव, जयघोष की ऊर्जा, अयोध्या का माहौल सबका वर्णन है। महंत आज भी उस दिन और दृश्य पर अचंभित होते हैं जहाँ 6 दिसंबर 1992 को कुछ समय तक ढांचा खड़ा था और कुछ देर बार रोड़ी भी देखने को नहीं थी।

अयोध्या, 6 दिसंबर 1992
महंत ब्रजमोहन दास: अयोध्या का एक चश्मदीद

दिल्ली में बिजली को तरसते हिंदू शरणार्थियों की व्यथा रहे हिंदू शर्णार्थी

दिल्ली के हिंदू शरणार्थियों पर ऑपइंडिया आपके लिए ग्राउंड रिपोर्ट अक्सर लाता रहता है। इन रिपोर्ट्स में शरणार्थियों की समस्या या उनके साथ घटित घटनाओं की चर्चा होती है। इस साल जब ऑपइंडिया ने आदर्श नगर के हिंदू शर्णार्थियों से बात की तो पता चला बिजली की समस्या से सिर्फ शरणार्थियों को बीमारी ही नहीं होती बल्कि मूलभूत जरूरत न पूरी होने के कारण पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थी मौत भी झेल रहे हैं। 

रोशनी अली की हिंदू घृणाकी हिंदू घृणा

कलकत्ता हाईकोर्ट ने दिवाली / काली पूजा के दौरान पूरे बंगाल में सभी प्रकार के पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का जो आदेश दिया था, उसकी चर्चा हर जगह हुई। ऐसे में एक नाम रोशनी अली का था जो सुर्खियों में रहा और जिसकी याचिका पर ये फैसला लिया गया। ऑपइंडिया ने आपको इसी रोशनी अली पर एक विस्तृत रिपोर्ट दी थी जिसमें बताया था कि पर्यावरण की चिंता करने वाली रोशनी अली को बीफ से कितना प्रेम है और कैसे वो भगवान गणेश के उत्सव को व्यर्थ बताकर, जन्माष्टमी में प्रोपगेंडा फैलाकर हिंदू त्योहारों व हिंदू देवताओं से घृणा दिखाती रहती हैं।

रोशनी अली पटाखा दिवाली
याचिकाकर्ता रोशनी अली (साभार: Facebook)

गीता कचरे में फेंकने वाली, देवी-देवताओं को गाली देने वाली टीचर

बिहार के गया जिले में पिछले दिनों चौथी कक्षा में पढ़ने वाले एक बच्चे ने अपनी मुस्लिम टीचर पर श्रीमगभगवद्गीता को डस्टबिन में फेंकने और हिंदू देवी-देवताओं को गाली देने का आरोप लगाया था। इसके बाद बच्चे की वीडियो वायरल हुई और ऑपइंडिया ने सच जानने के लिए बच्चे से बात की। बातचीत में पता चला कि बच्चा पीड़ित छात्र गया स्थित इस्कॉन मंदिर के पुजारी का बेटा है जिसका कहना था कि उसके स्कूल में उसकी हिंदी-उर्दू की टीचर सदफ ने बैग चेकिंग के दौरान उसके बस्ते से श्रीमद्भगवतगीता और माला को कूड़ेदान में फेक दिया था। वहीं बच्चे का कहना था कि टीचर की चप्पल पर गणेश भगवान बने हुए थे। इस खबर की पुष्टि करते हुए पीड़िता के पिता से बात की थी। साथ ही पुलिस से भी संपर्क कर आपके सामने एक विस्तृत रिपोर्ट दी थी। डेलहा थाना प्रभारी ने कहा था कि वो इस मामले में नियमानुसार चल रहे हैं और मामला शिक्षा विभाग से जुड़ा है इसलिए विभाग के वरिष्ठ अधिकारी जाँच कर रहे हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता, गया, बिहार, शिक्षिका
बिहार के गया में शिक्षिका पर श्रीमद्भगवद्गीता की पुस्तक फेंकने का आरोप (प्रतीकात्मक चित्र)

तालिबान ने ‘अल्लाह-हू-अकबर’ कह हारमोनियम को कूचा, टीवी को सुनाई मौत की ‘सजा’: वीडियो वायरल

तालिबान (Taliban) गीत, संगीत, वाद्ययंत्र के साथ-साथ म्यूजिक सुनने वालों से भी नफरत करता है। सोशल मीडिया पर अफगानिस्तान का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें तालिबानी अल्लाह-हू-अकबर बोलते हुए एक बड़े से पत्थर से हारमोनियम और अन्य वाद्ययंत्रों को नष्ट करते हुए दिखाई दे रहे हैं। वीडियो को पाकिस्तान के पत्रकार हमजा अजहर सलाम ने शेयर किया है। ट्वीट में उन्होंने लिखा, “तालिबान लड़ाके म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट को नष्ट कर रहा है। लेकिन भविष्य में यह बदल सकता है।”

हमजा ने पाकिस्तान का उदाहरण देते हुए कहा, “पाकिस्तान (Pakistan) में भी मौलवी टीवी, रेडियो और मनोरंजन के अन्य साधनों के तब तक खिलाफ थे, जब तक वे इससे होने वाले फायदे नहीं जान गए। आने वाले वक्त में तालिबान भी इस बात को समझेंगे।”

अफगानिस्तान के नातिक मलिकजादा द्वारा साझा किए गए एक अन्य वीडियो में तालिबानियों को एक आदमी को फिर कभी टीवी न देखने की कसम दिलाते हुए देखा जा सकता है। बाद में तालिबान लड़ाकों ने टीवी को मौत की सजा सुनाई और उसके बाद टीवी को सजा देते हुए तोड़ दिया गया। टीवी के टूटते ही लोग तालियाँ बजाने लगे।

हालाँकि, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि तालिबान मोबाइल फोन, वीडियो कैमरा, ट्विटर और इंटरनेट जैसी चीजों को ‘हराम’ या ‘इस्लाम के खिलाफ’ मानता है। दरअसल, वह अपना प्रचार-प्रसार करने के लिए इनका भरपूर उपयोग करता है। ऐसा लगता है कि उसे केवल आम जनता द्वारा मनोरंजन के साधनों का इस्तेमाल करने से परेशानी होती है। इसी साल अक्टूबर में अफगानिस्तान में म्यूजिक सुन रहे 13 लोगों की तालिबानियों ने हत्या कर दी थी।

बता दें कि यह पहली बार नहीं है जब तालिबान को मनोरंजन के साधनों तोड़ते हुए देखा गया है। जब से उसने अफगानिस्तान पर कब्जा किया है, वह इस तरह की कई घटनाओं को अंजाम दे चुका है। इसी साल सितंबर में तालिबानियों ने तबला, पियानो और कई अन्य वाद्ययंत्रों को नष्ट कर दिया था। 25 साल पहले जब तालिबान सत्ता में आया तो उसने संगीत और खेल पर प्रतिबंध लगा दिया था।

नौकरानी के कपड़े पर 16 साल की ख्याति ने देखे खून के धब्बे, पिता ने शुरू की Pinkishe Foundation: 20 लाख महिलाओं को फ्री सेनेटरी पैड

हम भले ही आधुनिक समाज की बात करते हों, नई-नई तकनीकों के आविष्कार का दंभ भरते हों, चाँद से आगे बढ़ कर मंगल पर बस्तियाँ बसाने का खाका तैयार करते हों, लेकिन एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि पीरियड्स (माहवारी) को लेकर अभी भी खुलकर बात नहीं होती हैं। ऐसे समय में उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के इंदिरापुरम निवासी इंजीनियर अरुण गुप्ता ने महिलाओं के हाइजीन को लेकर पिंकिंश फाउंडेशन (Pinkishe Foundation) नामक मुहिम शुरू किया और देखते ही देखते 20 लाख महिलाएँ इससे लाभान्वित हुईं और आज भी हो रही हैं।

दरअसल हमारे देश के अधिकांश हिस्सों में पीरियड्स को अक्सर शर्मनाक या फिर छिपाने वाली चीज की तरह माना जाता हैं और जिन महिलाओं को माहवारी हो रही होती है, उनसे इसे छिपाने की उम्मीद की जाती है। जिसकी वजह से उन्हें बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। 

लड़कियाँ इस बारे में बात करते समय काफी असहज महसूस करती हैं, खासकर अपने पिता या भाई से बात करने में, मगर 16 साल की ख्याति गुप्ता ने ऐसा नहीं किया। एक दिन ख्याति ने घर की नौकरानी के कपड़ों पर खून का धब्बा देखा और जब उन्होंने उससे सेनेटरी पैड के बारे में बात की, तो उसे इसकी कोई जानकारी ही नहीं थी। ख्याति यह जानकर काफी हैरान रह गई कि वह पीरियड्स के दौरान वह सेनेटरी पैड नहीं, बल्कि पुराने कपड़ों का इस्तेमाल करती है।

नैपकिन की सुविधा मिलने के बावजूद यह अपने आप में बेहद परेशान करने वाली घटना है और जिनको नैपकिन भी नसीब नहीं उनके पीरियड्स के दिनों की कल्पना तो खुद उन लड़कियों के लिए भी असंभव है जिन्हें पैड्स नसीब हैं। वैसे आपको बता दें कि ख्याति के घर में काम करने वाली नौकरानी ही नहीं, बल्कि आज भारत में पीरियड्स से गुजरने वाली लगभग 35 करोड़ से भी ज्यादा लड़कियाँ/स्त्रियाँ गाँवों में रहती हैं। इनमें से सिर्फ 12 प्रतिशत पैड्स का इस्तेमाल करती हैं। देश की लड़कियों/स्त्रियों का एक बड़ा प्रतिशत (तकरीबन 88%) ऐसा है जो पीरियड्स के दौरान कई-कई महीने एक ही कपड़े को धोकर इस्तेमाल करती हैं और जिन्होंने पैड्स देखे तक नहीं हैं। एक स्टडी के अनुसार 70 फीसदी महिलाएँ सेनेटरी पैड खरीदने में सक्षम नहीं हैं।

अब आते हैं पिंकिंश फाउंडेशन (Pinkishe Foundation) की शुरुआती सफर पर। अरुण गुप्ता बताते हैं कि पैड बैंक बनाने का आइडिया उनकी बेटी ख्याति गुप्ता ने दिया था। ख्याति को जब अपनी नौकरानी के बारे में पता चला तो उन्होंने इस बारे में अपने पिता से बात की। इसके बाद ख्याति ने अपनी पॉकेट मनी से उसके लिए सेनेटरी पैड खरीदने का फैसला किया। ख्याति ने अपने पापा को आइडिया दिया कि हाइजीन को लेकर ऐसी महिलाओं की मदद के लिए कुछ काम करना चाहिए और यहीं से शुरू होता है पिंकिंश फाउंडेशन का सफर।

17 साल तक निजी कंपनी में बतौर इंजीनियर की नौकरी करने के बाद अरुण गुप्ता ने अब खुद को इसी मुहिम के प्रति समर्पित कर दिया है। सोशल मीडिया पर ग्रुप बनाकर महिलाओं को उससे जोड़ा। ऐसे सभी शहरों में ग्रुप बनते चले गए। इसके बाद पैडबैंक (PadBank) नामक परियोजना शुरू की गई। इसके अंतर्गत इसने दो लाख से अधिक लड़कियों को मासिक धर्म साक्षरता प्रदान की गई और 17 से ज्यादा राज्यों में 20 लाख से अधिक मुफ्त सैनिटरी पैड उपलब्ध कराए हैं। 

फाउंडेशन अभी भी अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स से पीरियड्स से जुड़ी परेशानियों को दूर कर रही है और जरूरतमंद महिलाओं को नि:शुल्क सेनेटरी पैड बाँट रही है। इसके जरिए फाउंडेशन महिलाओं एवं लड़कियों को मासिक धर्म के समय अपने स्वास्थ्य का पूरा ध्यान रखने के तरीके बताए हैं। इस अभियान का उद्देश्य है जरूरतमंद महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान सैनेटरी पैड की जरूरत पड़ने पर कमी न हो। जिन्हें जरूरतमंद महिलाओं में संस्था द्वारा नि:शुल्क पैड बाँटी जाती है।

2017 में सिर्फ दो लोगों से शुरू हुए इस अभियान के सदस्यों की संख्या अब दो लाख तक पहुँच चुुका है और देश में इसके तकरीबन 50 ब्रांच हैं। इस फाउंडेशन में काम करने वाली महिलाएँ आम महिलाएँ हैं जिन्होंने अपनी जैसी महिलाओं और लड़कियों के जीवन में बदलाव लाने का संकल्प लिया है। वे अपने घरों से काम करते हैं और स्वेच्छा से अपनी सेवाओं का योगदान करते हैं। खास बात यह है कि पिंकिश में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है, जो सैलरी या किसी अन्य रूप में मुआवजा लेता हो। यह लोगों की नि:शुल्क सेवा करती हैं। हाल ही में फेसबुक ने कम्यूनिटी एक्सलरेटर प्रोग्राम के विजेता के रूप में 130 ग्रुप चुना था, जिसमें ‘पिंकिश’ भी एक था। इस प्रोग्राम के लिए 13000 फेसबुक ग्रुप ने अपना नामांकन किया था।

पिंकिश फाउंडेशन देशभर में मासिक धर्म के समय स्वच्छता के संदेश को हर महिला तक पहुँचाने की कोशिश कर रहा है। पैड बैंक बनाकर शहर की आर्थिक रूप से सक्षम महिलाओं से पैड कलेक्ट करने का काम करता है। जिन्हें जरूरतमंद महिलाओं में बाँटा जाता है। हर शहर में मेन ऑफिस में पैड जमा होता है और फिर जरूरत के मुताबिक इलाकों में भेजे जाते हैं। इसके अलावा सहायक कार्यालय भी बने हैं, इससे पैड जमा करने में मदद मिलती है।

अरुण गुप्ता ने बताया कि दानदाता के विश्वास को बनाए रखने के लिए मोबाइल एप की भी मदद ली जाती है। इसमें बैंक में कितने पैड कलेक्ट व दान हुए और कितनी लड़कियों को फायदा मिला, इसकी जानकारी दानदाता के पास पहुँच जाती है। इसके साथ ही प्राप्तकर्ता हर महीने उनसे मदद लें, इसके लिए उसे आईडी कार्ड भी दिया जाता है। पिंकिश फाउंडेशन सवा लाख से भी अधिक महिलाओं का समूह है। संस्था देश के अन्य 50 से भी अधिक शहरों में महिलाओं और बच्चियों को सशक्त करने के लिए सामाजिक और आर्थिक रूप से विकास कार्यों में आगे आकर मदद करती है। इस फाउंडेशन ने कोरोना काल में भी लोगों की काफी मदद की। इसने कम आय वर्ग के परिवारों को वित्तीय सहायता प्रदान की, जिन्होंने कोरोना के कारण परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य खो दिया था।

मुगलों को बताया शरणार्थी, औरंगजेब की आलोचना से दिक्कत: फ़िल्में न मिलने की खुन्नस मोदी सरकार पर निकाल रहे नसीरुद्दीन शाह?

आज के भारत में, या ये कह लें कि मोदी सरकार के कार्यकाल में, बॉलीवुड के वरिष्ठ अभिनेता नसीरुद्दीन शाह को अपने बच्चों के लिए डर लग रहा है। उन्हें नरसंहार और गृहयुद्ध का डर सता रहा है, क्योंकि उनके शब्दों में कहें तो देश में मुस्लिमों को भयभीत करने के प्रयास हो रहे हैं। उनकी नजर में चर्च-मस्जिद तोड़े जा रहे हैं, गाय की मौत मुद्दा बन रही है और ‘हिन्दू खतरे में है’ का झूठा नैरेटिव फैलाया जा रहा है। वो एहसान भी जता रहे हैं कि उनके पिता ने पाकिस्तान की जगह भारत को चुना और 20 करोड़ मुस्लिम आज भारत की, अपने परिवार की रक्षा कर रहे हैं।

इन सबके अलावा नसीरुद्दीन शाह मुगलों का महिमांडन रुक जाने से भी दुःखी हूँ। औरंगजेब की आलोचना क्यों हो रही है, इसका उन्हें गहरा दुःख है। उनकी नजर में कला, संगीत और साहित्य से लेकर कलाकृतियों वाले स्मारक तक मुग़ल ही भारत में लेकर आएँ। इतना ही नहीं, उनकी नजर में मुग़ल तो भारत निर्माता हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उन्हें खासी चिढ़ है, क्योंकि अयोध्या और काशी का विकास उनकी नजर में ‘अपने व्यक्तिगत धर्म का खुला प्रदर्शन’ है।

नसीरुद्दीन शाह ने यहाँ तक आरोप लगा दिया कि गुजरात में हुए दंगों के लिए नरेंद्र मोदी (जो 2002 में वहाँ के मुख्यमंत्री थे) ने कभी माफ़ी नहीं माँगी, इसके उलट इस घटना से वो ख़ुशी महसूस करते हैं। मुग़ल उनकी नजर में आक्रांता नहीं, बल्कि ‘शरणार्थी’ हैं। प्रोपेगंडा पोर्टल ‘The Wire’ पर करण थापर के साथ इंटरव्यू में उन्होंने कह डाला कि मुस्लिमों का नरसंहार हो रहा है। उन्हें इससे भी दिक्कत है कि पीएम मोदी क्यों मीडिया में आते हैं। साथ ही सवाल पूछते हैं कि अगर मंदिर तोड़े जाएँगे तो क्या होगा?

नसीरुद्दीन शाह को क्या 1984 में सिखों का नरसंहार याद है, जो कॉन्ग्रेस नेताओं के इशारे पर हुआ था और जिसके लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने कह दिया था कि कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है। उनका इशारा उनकी माँ और प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गाँधी की हत्या की ओर था। अब नसीरुद्दीन शाह को ये सब कहाँ से याद होगा? उस साल तो वो ‘पार’ (शबाना आजमी के साथ), ‘मोहन जोशी हाजिर हों’ (दीप्ति नवल के साथ), ‘होली’ (आमिर खान अभिनीत फिल्म) और ‘कंधार’ (शबाना आजमी के साथ) जैसी फिल्मों में व्यस्त थे, जो उसी साल रिलीज हुईं।’

इतना ही नहीं, भारत में 80 के दशक में ‘समानांतर सिनेमा’ के स्तंभों में से एक माने जाने वाले नसीरुद्दीन शाह की उससे एक साल पहले भी 7 फ़िल्में आई थीं और इसके एक साल बाद भी उनकी 5 फ़िल्में रिलीज हुईं। इस तरह इन तीन वर्षों में उन्होंने 16 फ़िल्में की। उन्हें मस्त काम मिल रहा था, वो डिमांड में थे और पैसे भी आ रहे थे – इसीलिए सिखों का नरसंहार भी उनकी नजर में ठीक ही रहा होगा। अब स्थिति उलट है। 4 वर्षों (2018,19, 20 और 21) में उनकी 6 फ़िल्में ही आई हैं, वो भी सहायक किरदारों में, इसीलिए उन्हें कुछ भी ठीक नहीं लग रहा।

नसीरुद्दीन शाह की पिछली हिट फिल्म ‘द डर्टी पिक्चर (2011)’ थी, जिसमें विद्या बालन और इमरान हाशमी जैसी फ़िल्मी हस्तियाँ थीं और ये सुपरहिट रही थी। इस तरह से पिछले एक दशक से नसीरुद्दीन शाह किसी हिट फिल्म का हिस्सा नहीं रहे हैं। हो सकता है कि इसकी खुन्नस भी वो मोदी सरकार और हिन्दुओं पर निकाल रहे हों। आजकल उन्हें अवॉर्ड्स भी नहीं मिल रहे, उनके मन में ये गम भी रहा होगा। ये सब कुछ उनके बयानों में स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है।

नसीरुद्दीन शाह कहते हैं कि मुगलों ने भारत को बनाया। अगर ऐसा है तो मौर्य वंश (जिसमें चन्द्रगुप्त और अशोक जैसे पराक्रमी शासक हुआ), गुप्त वंश (जिसमें चन्द्रगुप्त और समुद्रगुप्त नाम के कुशल प्रशासक हुए), राजा हर्षवर्धन, चोल साम्राज्य (जिसमें राजेंद्र चोल और राजराज चोल जैसे योद्धा हुए), पंड्या वंश (महावर्मन राजसिम्हा और श्रीमारा श्रीवल्लभा) जैसे शासक हुए, विजयनगर साम्राज्य (कृष्णदेवराया और रामराया), मराठा साम्राज्य (छत्रपति शिवाजी और बाजीराव), मेवाड़ (महाराजा प्रताप और राणा सांगा) जैसे अनगिनत हिन्दू राजाओं और राजवंशों ने क्या किया?

भारतीय राजाओं, भारतीय सनातन धर्म और भारतीय इतिहास को लेकर नसीरुद्दीन शाह हिन्दुओं में ऐसी हीन भावना भरना चाहते हैं कि यहाँ के सभी लोग निकम्मे-नकारा थे और अरब से आए इस्लामी आक्रांताओं ने ही यहाँ के लोगों को रहना, खाना-पीना और जीना सिखाया। जिस औरंगजेब ने अनगिनत मंदिरें तोड़ीं और हिन्दुओं का कत्लेआम किया, उसकी आलोचना से उन्हें दुःख क्यों? आज चर्च-मस्जिद टूटने की झूठी बातें कर रहे नसीरुद्दीन शाह बताएँ कि जिन हिन्दुओं के 30,000 मस्जिदें ध्वस्त कर दी गईं उन्हें कैसा लगा होगा? ये तो सच्ची बात है और इतिहास में दर्ज है। खुद इस्लामी आक्रांताओं को इस पर गर्व था।

2002 के दंगे बड़े याद आ रहे हैं नसीरुद्दीन शाह को। वो तो हिन्दू-मुस्लिमों का संघर्ष था, जिसमें मस्जिदों से हिन्दुओं के कत्लेआम का ऐलान हुआ। न्यायपालिका, जनता की ‘अदालत’, सरकारी जाँच एजेंसियाँ और पुलिस – हर जगह से पीएम मोदी को क्लीन चिट मिला। लेकिन, गोधरा में 59 हिन्दुओं (जिनमें महिलाएँ, बच्चे और बुजुर्ग शामिल थे) को ज़िंदा जला देने वाली घटना क्यों याद नहीं है उन्हें? इसके बाद जो हुआ, उसमें नमक-मिर्च-मसाला लगा कर तो उन्हें याद ही है।

नसीरुद्दीन शाह किस आधार पर कह रहे हैं कि मुस्लिमों का नरसंहार हो रहा है? कहाँ हो रहा है? अफगानिस्तान में तालिबान महिलाओं की आवाज़ कुचल रहा और विरोधियों की हत्याएँ कर रहा। जम्मू कश्मीर में इस्लामी आतंकी संगठन धर्म पूछ कर मार रहे। पाकिस्तान आतंकियों को पाल-पोष कर भारत भेज रहा। PFI भारत में दंगे की साजिश रच रहा। वामपंथी उग्रवाद सुरक्षा बलों और पुलिसकर्मियों की जानें ले रहा। फिर मुस्लिमों का नरसंहार कहाँ हो रहा? हर जगह तो हिन्दू ही पीड़ित हैं? कश्मीरी पंडित 30 वर्षों से अपने ही देश में शरणार्थी बने हुए हैं।

नसीरुद्दीन शाह को गोहत्या से कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि हिन्दुओं की भावनाओं और संवेदनाओं का इस देश में कोई सम्मान नहीं होना चाहिए उनकी नजर में। जबकि 20 करोड़ मुस्लिम (जितनी पाकिस्तान, बांग्लादेश और नाइजीरिया की जनसंख्या है और ये आँकड़े जापान और रूस की जनसंख्या से डेढ़ गुना ज्यादा हैं) भारत में अल्पसंख्यक हैं और उन्हें दिन में 5 वक़्त भोंपू बजा कर हिन्दुओं के कान पकाने का अधिकार है। नसीरुद्दीन शाह CAA-NRC के खिलाफ आंदोलन स्थलों पर जम कर घूमे और आए दिन पीएम मोदी की आलोचना करते हैं, लेकिन साथ ही ये भी कह रहे कि इस देश में बोलने का अधिकार अब नहीं बचा। कैसे?

तभी तो कॉन्ग्रेस शासन में हुए नरसंहार उन्हें याद ही नहीं हैं और मोदी सरकार के कार्यकाल में जब सब ठीक है तो उन्हें मुस्लिमों के लिए समस्या नजर आ रही और अपने बच्चों के लिए डर लग रहा। अगर ऐसा ही है तो वो भारत में हैं ही क्यों? उनके पास पर्याप्त धन है, जिससे वो दुनिया के किसी भी देश में बस सकते हैं। पीएम मोदी की लोकप्रियता से उन्हें घबराहट है तो इमरान खान की ही जय-जयकार कर लें। हिन्दू अगर बयान भी दे दें तो उन्हें दिक्कत है और इस्लामी आतंकवादी कत्लेआम भी मचाएँ तो उनकी आलोचना से एक कौम भयभीत हो रही है। ऐसा ही है न?

बॉलीवुड में पचासों पोर्न स्टार… इंडस्ट्री ने तो सनी लियोनी को ‘देवी घोषित’ कर दिया: कमाल राशिद खान (KRK) ने खोला कच्चा चिट्ठा

फिल्म क्रिटिक कमाल राशिद खान (KRK) ने बॉलीवुड की कड़वी सच्चाई को अपने यूट्यूब चैनल के जरिए दुनिया के सामने रखा है। KRK के मुताबिक, मौजूदा वक्त में बॉलीवुड में पचासों की संख्या में पोर्न स्टार अपनी जगह बना चुकी हैं। भारत में पोर्न के धंधे को बॉलीवुड ने धड़ल्ले से आगे बढ़ाने का काम किया है।

KRK ने अपने यूट्यूब वीडियो के जरिए सनी लियोनी पर अपने विचार साझा किए हैं। उन्होंने ‘सनी लियोनी ने हिंदू धर्म का अपमान किया?’ शीर्षक वाले एक वीडियो में कहा, “पुलिस की जाँच और कुछ लड़कियों के बयान के मुताबिक बॉलीवुड में पचासों पोर्न स्टार्स हैं, जो केवल पोर्न फिल्मों में ही काम करती हैं और करोड़ों रुपए सालाना कमाती हैं। लेकिन ऐसा कैसे हुआ? उस समाज की लड़कियों में इतनी हिम्मत कैसे आ गई कि वो पोर्न फिल्म में काम करने लगीं।”

KRK ने आगे कहा, जिस समाज ने ममता कुलकर्णी का जीना हराम कर दिया था। ममता कुलकर्णी के घर पर औरतों ने जुलूस निकाला था। उनके खिलाफ केस हुए थे और ममता को अदालतों के चक्कर काटने पड़े थे। सिर्फ इसलिए कि ममता कुलकर्णी ने बोल्ड फोटोशूट कराया था, जिसके कुछ फोटो फिल्मी मैगजीन में छपे थे।”

उन्होंने आगे कहा, “ममता के मामले के कुछ सालों के बाद बिग बॉस में कनाडाई पोर्न स्टार सनी लियोनी (Sunny Leone) को साइन किया गया, जिसे देख कर बॉलीवुड निर्देशक महेश भट्ट चहक उठे, महक उठे, खुश हो गए। उन्हें लगा कि अब उनके सपनों को पूरा करने वाली आ गई। महेश भट्ट और एकता कपूर को तो ऐसी लड़कियाँ चाहिए ही, जो हमेशा अपने कपड़े उतारकर नंगी होने को तैयार रहें। हुआ भी यही। बाद में महेश भट ने सनी लियोनी को अपनी फिल्म जिस्म-2 में साइन किया और उनकी मूवी हिट हो गई।”

केआरके ने दावा किया कि सनी लियोनी जब पोर्न स्टार थीं तो जिस पोर्न वेबसाइट्स पर अपने वीडियो बेचती थी, उसी पर आज भी अपनी पोर्न वीडियो बेचती है उसे बंद नहीं किया गया। उनसे इंस्पायर होकर गई लड़कियाँ इस धंधे में कूद गई हैं।

सनी लियोनी से प्रभावित हुई सैकड़ों लड़कियाँ

KRK के मुताबिक, सनी लियोनी से पहले बॉलीवुड की अभिनेत्रियाँ ममता कुलकर्णी जैसा हाल होने से डरती थीं। लेकिन, सनी लियोनी ने पचासों-सैकड़ों लड़कियों को प्रभावित किया। इन लड़कियों के मन से डर निकल गया कि उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी। अब वो धड़ल्ले से पोर्न का धंधा कर रही हैं। सनी लियोनी को ही देखकर पूनम पांडे और शर्लिन चोपड़ा जैसी एक्ट्रेस ऐसा करती हैं। इन्होंने बकायदा अपना ऐप बनाकर ऐसे वीडियो डालने शुरू कर दिए।

शाहरुख खान पर पोर्न को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए केआरके ने कहा कि शाहरुख खान जामा मस्जिद से आते हैं। उन्हें अच्छी तरह से पता कि वहाँ जामा मस्जिद में क्या हो सकता है और क्या नहीं हो सकता। बावजूद इसके शाहरुख खान (Shahrukh khan) ने सनी लियोनी को बढ़ाता देते हुए अपनी फिल्मों में उसे काम दिया। उसने तो उसे देवी घोषित कर दिया।

गौरतलब है कि सनी लियोनी अपने हालिया विवादित गाने ‘राधिका मधुबन में नाचे…चली मैं गदर मचा के’ को लेकर चर्चा में हैं और उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की माँग हो रही है। बता दें कि सनी लियोनी ने केआरके खिलाफ मुंबई पुलिस के साइबर सेल में साल 2013 में शिकायत दी थी। केआरके ने दावा किया था कि सनी लियोनी ने अपने विवादित बयान में कहा था कि ‘बलात्कार कोई अपराध नहीं है, यह सिर्फ एक सरप्राइज सेक्स है’।

सरकारी नियंत्रण से मुक्त होंगे कर्नाटक के हिन्दू मंदिर, खुद ही करेंगे अपने बजट का इस्तेमाल: CM बोम्मई का ऐतिहासिक ऐलान

कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने बड़ा ऐलान करते हुए राज्य के हिन्दू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने का निर्णय लिया है। राज्य में धर्मांतरण के खिलाफ आए बिल के लिए वहाँ की भाजपा सरकार पहले से ही चर्चा में है। अब राज्य सरकार ने ऐलान किया है कि हिन्दू मंदिरों को लेकर जो ताज़ा कानून हैं, उनमें अगले बजट के दौरान बदलाव किया जाएगा। मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने बुधवार (29 दिसंबर, 2021) को इस सम्बन्ध में ऐलान किया।

फ़िलहाल जो नियम-कानून हैं, उसके हिसाब से मंदिरों को अपने विकास के लिए अपनी आय का उपयोग करने के लिए सरकारी की अनुमति लेनी होती है। खुद मुख्यमंत्री बोम्मई ने स्वीकार किया कि हिन्दू मंदिर फ़िलहाल अलग-अलग सरकारी नियम-कानून के दायरे में हैं, जिसके द्वारा उन पर सरकार का नियंत्रण है। उन्होंने ऐलान किया बजट सत्र से पहले ही हिन्दू मंदिरों को इन पाबंदियों से मुक्त करने के लिए कदम उठाए जाएँगे। मंदिरों को स्वतंत्रता से संचालन के लिए सुविधा दी जाएगी और केवल अधिनियम ही रहेंगे।

मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारे वरिष्ठों ने जानकारी दी है कि अन्य मजहबों के धर्मस्थल अलग कानून के हिसाब से सुरक्षित हैं और उन्हें स्वतंत्रता से संचालन की अनुमति है। कर्नाटक में भाजपा का 2 दिवसीय भाजपा एग्जीक्यूटिव कमिटी की बैठक का आयोजन किया गया था, जिसके समापन के दौरान सीएम बोम्मई ने ये बातें कही। उन्होंने बताया कि धर्मांतरण के विरुद्ध बिल सिर्फ एक कानून ही नहीं बनेगा, बल्कि इसे ठीक से लागू करने के लिए एक स्पेशल टास्क फोर्स का भी गठन किया जाएगा।

कर्नाटक विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सिद्दारमैया ने घोषणा की है कि अगर राज्य में कॉन्ग्रेस की सरकार बनती है तो उसके एक महीने के भीतर ही इस धर्मांतरण विरोधी कानून को रद्द कर दिया जाएगा। सीएम बोम्मई ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सिद्दारमैया का सपना कभी पूरा नहीं होगा, क्योंकि कॉन्ग्रेस सत्ता में आएगी ही नहीं। उन्होंने कहा कि सभी को अपने धर्म के पालन का अधिकार है और ये कानून यथावत बना रहेगा। कोप्पल जिले में स्थित अंजनाद्रि पहाड़ी और मंदिर का विकास भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होगा। मुख्यमंत्री ने बताया कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसका उद्घाटन करेंगे।

मार्च में पीक पर होगा ओमिक्रोन, पर लॉकडाउन के आसार नहीं: कोरोना पर सटीक अनुमान लगाने वाले IIT प्रोफेसर का आकलन

कोरोना वायरस के नए वैरिएंट ओमिक्रोन ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने बुधवार (29 दिसंबर 2021) को कहा कि इस वैरिएंट का खतरा बहुत ज्यादा है। WHO की यह प्रतिक्रिया पिछले सप्ताह पूरी दुनिया में कोविड-19 के 11 प्रतिशत मामले बढ़ने के बाद आई है। भारत में भी ओमिक्रोन संक्रमण के मामले बढ़कर 781 हो गए हैं।

इधर ओमिक्रोन वैरिएंट का पहला शिकार बने दक्षिण अफ्रीका के डेटा का विश्लेषण कर आईआईटी कानपुर के कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के प्रोफेसर मणींद्र अग्रवाल ने कुछ दिन पहले कहा था कि ओमिक्रोन स्ट्रेन के तेज प्रसार की वजह मुख्य तौर पर इम्यूनिटी (प्रतिरोधक क्षमता) का घटना है। इसके प्रसार को संक्रमण में बढ़ोतरी से न जोड़ा जाए। 

‘सूत्र मॉडल’ के जरिए किए विश्लेषण के आधार पर प्रोफ़ेसर अग्रवाल ने बताया कि साउथ अफ्रीका का पीक आकलन के अनुसार आया। इसके पहले वहाँ कॉन्टैक्ट रेट और रीच में बढ़त दर्ज हुई। रीच 1 के पार जाने का अर्थ होता है, इम्यूनिटी खत्म हो जाना। इसे आधार मानें तो वहाँ 18 प्रतिशत लोगों में इम्यूनिटी खत्म हो गई है। इससे ओमिक्रोन का प्रसार बढ़ा।

भारत में 80 प्रतिशत लोग इम्यून हैं। भारत के मुकाबले दक्षिण अफ्रीका में वैक्सीन से बनी इम्यूनिटी कम रही। वहाँ फाइजर और यहाँ कोविशील्ड इस्तेमाल हुईं। हालाँकि, एक तथ्य साफ है कि ओमिक्रोन वैरिएंट वैक्सीन इम्यूनिटी को बड़े स्तर पर और कुदरती इम्यूनिटी को कुछ हद तक भेद रहा है। भारत में फिलहाल कॉन्टैक्ट रेट 0.54, रीच 0.95 और नैचुरल इम्यूनिटी 83 प्रतिशत है। अगर 20 प्रतिशत लोग प्रतिरोधक क्षमता खो दें तो पैरामीटर में बदलाव हो जाएगा। 

उन्होंने बताया कि ब्रिटेन में मौजूदा समय में कॉन्टैक्ट या बीटा रेट 0.52 है, जो पिछले महीने की दर 0.72 से कम है। डेनमार्क में भी ऐसा ही हुआ है। ऐसे में माना जाए कि भारत में 20 प्रतिशत लोगों की इम्यूनिटी अगर खत्म हो जाए तो मार्च की शुरुआत में हर दिन 1.8 लाख केसों के साथ तीसरी लहर का चरम (पीक) आ सकता है। फिर इसमें गिरावट देखने को मिल सकती है। हालाँकि यह दूसरी लहर के मुकाबले आधे से भी कम होंगे। बता दें कि दूसरी लहर में मई के पहले हफ्ते में प्रतिदिन नए मामलों की संख्या चार लाख को पार कर गई थी।

प्रोफ़ेसर मणींद्र अग्रवाल ने अनुमान लगाया है कि जब तीसरी लहर पीक पर होगा तो 2 लाख बेड की जरूरत होगी, क्योंकि उनका अब तक का अनुभव बता रहा है कि डेल्टा में जहाँ 5 संक्रमित में से एक को बेड की जरूरत थी वह ओमिक्रॉन में 10 में 1 रहेगी। उनका कहना है कि फिलहाल ऐसा नहीं लगता कि साउथ अफ्रीका की तरह भारत पर इसका ज्यादा असर पड़ेगा। किसी तरह के लॉकडाउन का भी अंदेशा नहीं दिखता। हालॉंकि, मुकम्मल तौर पर अनुमान ओमिक्रोन के भारत में व्यापक रूप से प्रसार के बाद ही लगाया जा सकता है।

ब्रिटेन में ज्यादा मामलों के मिलने पर अग्रवाल ने कहा कि वहाँ टीकाकरण (ज्यादातर एमआरएनए वैक्सीन) अधिक हुआ है, लेकिन सीरो पाजिटिविटी कम है। भारत में टीकाकरण भी ज्यादा हुआ है और सीरो पॉजिटिविटी भी अधिक पाई गई है। उन्होंने बताया कि वैक्सीनेशन के अलावा लोगों में नेचुरल इम्यूनिटी भी डेवलप हो गई है। ऐसे में तीसरी लहर दूसरी लहर की तुलना में कम भयावह होगी।

इससे पहले उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में 18 से 23 दिसंबर तक कोरोना के पीक पर रहने का अनुमान जताया था। हालाँकि उन्होंने कुछ दिन और इंतजार करने की बात कही थी।

बता दें कि देश में कोविड-19 संक्रमण को ट्रैक करने के लिए प्रोफेसर मणींद्र ‘सूत्र’ मॉडल विकसित कर चुके हैं और इनकी बात इसलिए भी मायने रखती है, क्योंकि इनका अनुमान पहले भी बेहद सटीक साबित हुआ है। अगस्त में उन्होंने कहा था कि कोरोना की तीसरी लहर के आने का अंदेशा बहुत ही कम है। अगर वायरस का कोई नया वैरिएंट आता है तभी तीसरी लहर आएगी, लेकिन कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए एहतियात जरूरी है। 

इसके अलावा उन्होंने कोरोना की दूसरी लहर को लेकर अनुमान लगाया था कि मई 2021 में इसका भयानक रूप देखने को मिलेगा। IIT कानपुर के प्रोफेसर ने इस अध्ययन में सभी राज्यों में अलग-अलग कोरोना के पीक टाइम और ग्राफ गिरने की तारीख का अनुमान लगाया था और यह सही साबित हुई थी।

मिस्र के राजा की 3500 साल पुरानी ममी, गले में मिले 30 ताबीज: डिजिटल तकनीक से उठा कई रहस्यों से पर्दा

मिस्र में एक 3500 साल पुरानी ममी के शरीर के कुछ ऐसे अनसुने राज का खुलासा हुआ है, जिसको जानकर शोधकर्ता भी हैरान हैं। मिस्र के शोधकर्ताओं ने 3500 साल पुरानी एक ममी के शरीर को खोला है और डिजिटल स्कैनिंग तकनीक के माध्यम से उसका अध्ययन किया है।

रिसर्च के दौरान शोधकर्ता उस वक्त खुश हो गए, जब उन्हें पता चला कि ये ममी किसी और की नहीं, बल्कि मिस्र के उस राजा की है, जो आज से 3500 साल पहले मिस्र पर राज करता था और सबसे दिलचस्प बात ये है कि मिस्र के राजा का 3500 साल पहले भी खतना हुआ था।

ममी ने उगले रहस्यमयी राज

वैज्ञानिकों ने 1881 इस्वी में खोजे गए इस ममी का पहली बार डिजिटलाइजेशन तकनीक के आधार पर रिसर्च किया है और मिस्र के राजा के जीवन और उनकी मृत्यु को लेकर अनुसुलझी जानकारियों को इकट्ठा किया है। वैज्ञानिकों ने कहा कि ये ममी मिस्र के राजा फिरौ अमेनहोटेप-प्रथम की है और सबसे हैरानी की बात ये है कि उनके शव को इस कदर सुरक्षित अंदाज में ममी बनाया गया था कि उनके दाँत और कान की हड्डियाँ अभी तक पूरी तरह से सुरक्षित हैं।

ममी का डिजिटल तकनीक से परीक्षण

डिजिटल तकनीक से विश्लेषण के दौरान शोधकर्ताओं को कई दिलचस्प जानकारियाँ मिस्र के राजा अमेनहोटेप-प्रथम के बारे में पता चली हैं। वैज्ञानिकों को पता चला है कि राजा के शव को दफनाते वक्त उन्हें फूलों की माला पहनाई गई थी और उनके शव को काफी आकर्षक लकड़ी के मुखौटे से सजाया गया था। ये ममी इतनी ज्यादा नाजुक थी कि इसे कभी पुरातत्वविदों ने खोलने की कोशिश नहीं की थी, जिसकी वजह से 1881 में इस ममी की खोज होने के बाद भी इस पर अभी तक रिसर्चर्स ने शोध नहीं किया था और ये ममी अभी तक सुरक्षित रखी हुई थी।

कैसी थी राजा अमेनहोटेप-प्रथम की ममी

मिस्र के काहिरा विश्वविद्यालय में मेडिकल डिपार्टमेंट में रेडियोलॉजी पढ़ाने वालीं प्रोफेसर सहर सलीम, जो इस रिसर्च टीम की हिस्सा भी हैं, ने बताया कि ममी की पतली ठुड्ढी है और उसके नाक छोटे हैं, वहीं बाल घुँघराले हैं। प्रोफेसर सलीम और उनके सहयोगियों का मानना है कि राजा अमेनहोटेप प्रथम की उम्र लगभग 35 वर्ष रही होगी, जब उनकी मौत हुई होगी। 

प्रोफेसर्स का मानना है कि राजा अमेनहोटेप-प्रथम की कदकाठी औसत थी और उनकी लंबाई करीब 5 फीट 5 इंच थी। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सहर सलीमे ने यह भी बताया कि उनका खतना हुआ था और उनके दाँत पूरी तरह से स्वस्थ थे। वैज्ञानिकों ने पाया कि उनके गले में लपेटन के भीतर 30 ताबीज बँधे हुए थे और सोने की एक अनोखी कमरबंद भी ममी के साथ मिली है। प्रोफेसर सलीम ने कहा कि उनके शरीर में किसी भी तरह का घाव नहीं मिला है और न ही किसी बीमारी के सबूत मिले हैं, लिहाजा उनकी मृत्यु की वजह का पता नहीं चला है।

21 सालों तक किया मिस्र पर शासन

इतिहासकारों के मुताबिक, राजा अमेनहोटेप प्रथम ने 1525 और 1504 ईसा पूर्व के बीच लगभग 21वर्षों तक मिस्र पर शासन किया। वह फिरौन के 18वें राजवंश के दूसरे राजा थे और उनका शासनकाल काफी हद तक शांतिपूर्ण रहा था। अपने शासनकाल के दौरान उन्होंने कई मंदिरों का निर्माण करवाया था। शोधकर्ताओं को यह भी पता चला है कि ममी को कई सौ सालों के बाद लूटने की कोशिश की गई थी और ममी के ऊपर चोट के कई निशान हैं, लेकिन शव के ऊपर निशान नहीं हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि हो सकता है ममी को खजाने के लिए लुटेरों ने लूटने की कोशिश की होगी।