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‘हरा$ज*, हरा%$, चू$%’: ‘कुत्ते’ के प्रेम में मेनका गाँधी ने पशु चिकित्सक को दी गालियाँ, ऑडियो वायरल

भारतीय जनता पार्टी की नेता मेनका गाँधी अक्सर किसी न किसी विवाद के कारण खबरों में आती हैं। कुछ दिन पहले ही एक बिजनेसमैन को आपत्तिजनक शब्दों में झाड़ते हुए उनकी ऑडियो सामने आई थी। अब एक और रिकॉर्डिंग सोशल मीडिया पर वायरल है। इसमें कथिततौर पर मेनका गाँधी एक पशुचिकित्सक को भला-बुरा बोल रही हैं।

ऑडियो में सुनाई दे रही महिला की आवाज को लेकर हर जगह दावा है कि ये मेनका गाँधी की आवाज है। इसके अलावा ऑडियो में शुरू में महिला बताती भी है कि वह मेनका गाँधी की तरफ से है और मेनका गाँधी खुद डॉक्टर से बात करना चाहती हैं। इस ऑडियो में बेहद घटिया ढंग से पशुओं के डॉक्टर से बात की जा रही है। पूरी बातचीत एक कुत्ते के इलाज को लेकर है जो डॉक्टर द्वारा इलाज मिलने के बाद भी सही नहीं हो पाया।

कथिततौर पर मेनका गाँधी ने डॉक्टर को फोन करवाया और उनके लिए, ‘हरा$ज*’, हरा%$, चू$% जैसे शब्दों का प्रयोग किया। ऑडियो सुनकर लगता है कि वह कुत्ते के इलाज से परेशान थी। इसलिए उन्होंने डॉक्टर को बोलने का मौका नहीं दिया और उन्हें झोलाछाप कह दिया। डॉक्टर ने बताने की कोशिश की कि कुत्ते के इलाज के बाद उसे सेंटर पर रखने की जरूरत थी लेकिन मैडम (कुत्ते की मालकिन) उसे अपने घर ले गई। डॉक्टर ने उन्हें समझाया भी ये बात ध्यान रहे कि कुत्ता अपने टाँके खोल न ले।

इसके बाद ओनर ने कहा भी वह ध्यान रखेंगी लेकिन जब अगले दिन वे आए तो टाँके फटे हुए थे। डॉक्टर की बात सुनने के बाद भी भाजपा नेता चुप होने को तैयार नहीं हुई और गाली गलौच करते हुए उनसे उनका लाइसेंस छीन लेने की बात कही।

गाँधी ने डॉक्टर से पूछा कि उनका पूरा नाम क्या है। इस पर डॉक्टर ने बताया कि उनका नाम विकास शर्मा है। इस पर गाँधी ने कहा कि डॉक्टर को अपना पूरा नाम नहीं लेना चाहिए क्योंकि वह अपने परिवार पर धब्बा हैं। डॉक्टर को झोलाछाप कहते हुए गाँधी ने डॉक्टर के परिवार को बीच में घसीटा। गाँधी ने कहा, “तुम्हारा बाप क्या करता है? कोई माली है चौकीदार है क्या हैं?” डॉक्टर बताते भी हैं कि उनके पिता एक टीचर हैं। इस पर वो पूछती हैं, “तुम इस धंधे में क्यों आए पैसे कमाने के लिए।” 

डॉक्टर बार-बार कहते हैं कि उनसे इस तरह की बात न की जाए लेकिन गाँधी बिना कोई बात सुने अपना हुक्म चलाती रहीं। उन्होंने उस कॉलेज को भी बेकार कहा जहाँ से डॉक्टर पास हुए थे। मेनका गाँधी ने कहा कि वह कोई बात नहीं सुनना चाहती हैं। कुत्ते को वापस लेकर आया जाए और उसका इलाज किया जाए। अगर कुत्ता मरा तो उनकी नौकरी जाएगी।

बता दें कि ऑडियो सामने आने के बाद इस संबंध में जून 23 को इंडियन वेटेरनरी एसोसिएशन के डॉक्टरों ने मेनका गाँधी के ऐसे बर्ताव की आलोचना की। साथ ही मुआवजे की माँग भी की। भाजपा नेता के रवैये की निंदा करते हुए कहा गया कि पीएम और लोकसभा अध्यक्ष को मामले से अवगत करवा दिया गया है।

बीएचयू में भी छात्रों ने मेनका गाँधी का विरोध किया। साथ ही मंत्री से माफीनामा माँगा।

अन्य कॉल रिकॉर्डिंग वायरल

उल्लेखनीय है कि ये कोई पहला मामला सामने नहीं आया है जहाँ इस तरह भाजपा नेता अभद्र शब्द बोलती सुनी गई हों। अपने जानवरों से प्रेम के चलते उन्होंने एक अनुभवी डॉक्टर से भी बदसलूकी की थी।

सोशल मीडिया पर सामने आई एक अन्य कॉल रिकॉर्डिंग में सुना जा सकता है कि गाँधी एक सीनियर डॉक्टर पर कुत्ते को मारने का आरोप मढ़ रही हैं। डॉक्टर समझाता है कि कुत्ता बहुत बीमार था और ओनर के अनुरोध पर उसका इलाज हुआ। हालाँकि मेनका गाँधी फिर भी डॉक्टर को जिम्मेदार मानती रहीं। जब डॉक्टर ने उनके आपत्तिजनक सवालों का जवाब देने से मना किया तो गाँधी ने दोबारा डॉक्टर का लाइसेंस कैंसिल करने की धमकी दी।

दिलचस्प बात ये है कि विकास शर्मा जो 6 माह से पेशे में लगे थे उन्हें मेनका गाँधी झोला छाप कह रही थीं और अगले मामले में डॉक्टर 25 साल का अनुभवी था फिर भी मेनका गाँधी उनका लाइसेंस कैंसिल करवाने की बात कह रही थीं। डॉक्टर ने ऐसा रवैया देख कर कहा भी कि वह उन्हें कोई जवाब नहीं देंगे, उन्हें जो करना हैं करें, वह मंत्री पद पर हैं।

बिजनेसमैन के साथ बातचीत की ऑडियो वायरल

कुछ समय पहले सोशल मीडिया पर बीजेपी नेता मेनका गाँधी और रामलिंगम नामक एक कारोबारी के बीच हुई एक कथित बातचीत का ऑडियो वायरल हुआ था। इस ऑडियो में कथित तौर पर मेनका गाँधी को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि वह उस शख्स पर यौन शोषण का केस दर्ज करा देंगी। यह ऑडियो रामलिंगम द्वारा कथित रूप से एक कुत्ते को बैट से मारने के बाद हुई बातचीत का था।बातचीत के दौरान, मेनका गाँधी को कथित तौर पर युवक को ‘गुंडा’, ‘बदमाश’ कहते हुए सुना गया था।

सलमान खान को मानहानि के केस में राहत, मुंबई की अदालत ने कहा- KRK ने लाँघी आजादी की सीमा

मुंबई की एक सिविल कोर्ट ने बॉलीवुड सुपरस्टार सलमान खान को फिल्म क्रिटिक कमाल आर खान (KRK) के खिलाफ मानहानि के केस में राहत दी है। कोर्ट ने बुधवार (23 जून 2021) को कहा कि केआरके ने आजादी की सीमा लाँघी है। कोर्ट ने कमाल आर खान को अभिनेता और उनके परिवार के खिलाफ अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करने और विवादित बयान से अस्थायी रूप से रोक दिया है।

दरअसल, यह मामला सलमान खान की फिल्म ‘राधे’ के रिव्यू से जुड़ा हुआ है। केआरके बॉलीवुड फिल्मों का अपने स्टाइल में रिव्यू करते हैं। उन्होंने दुबई में ‘राधे’ का फर्स्ट हाफ देखने के बाद इसका भी रिव्यू किया था। केआरके ने रिव्यू करते हुए कहा था, ”फर्स्ट हाफ देखने के बाद कुछ भी समझ नहीं आ रहा है। कहानी क्या है, कैरेक्टर क्या है, क्या हो रहा है। मेरा दिमाग पूरी तरह से घूम गया है। मुझे समझ ही नहीं आया। गाने वगैरह-एक्शन ठीक है, पर ये सब क्यों हुआ इसका कुछ अता-पता नहीं। इंटरवल के बाद मुझसे थिएटर में अंदर नहीं जाया गया।”

इसको लेकर दबंग सलमान काफी भड़क गए थे। उन्होंने पिछले म​हीने केआरके के खिलाफ मुंबई कोर्ट में मानहानि की शिकायत दर्ज कराई थी। सलमान खान की लीगल टीम की तरफ से कमाल आर खान को शिकायत के संबंध में नोटिस भेजा गया था।

क्या है पूरा मामला

गौरतलब है कि केआरके का दावा है कि सलमान खान ने फिल्म ‘राधे’ के निगेटिव रिव्यू के लिए उन पर मानहानि का केस किया था। लेकिन सलमान खान की लीगल टीम का कहना है कि केआरके मानहानि के केस की जो वजह बता रहे हैं, वह गलत है। केआरके के खिलाफ मानहानि का केस इसलिए किया गया, क्योंकि उन्होंने सलमान को बदनाम करने के लिए कई तरह के आरोप लगाए हैं। उन्हें भ्रष्ट बताया है और उनकी संस्था बीइंग ह्यूमन पर धोखाधड़ी और पैसों की हेरफेर का आरोप लगाया है।

केस दर्ज होने के बाद KRK ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि सलमान खान के हिसाब से उनकी फिल्म ‘राधे’ जबरदस्त हिट थी, लेकिन उनकी समीक्षा के बाद जनता फिल्म देखने गई ही नहीं और ये बुरी तरह फ्लॉप हो गई। KRK ने कहा कि जिस तरह उनका सलमान खान को ‘सल्लू दादाजी’ कहना बुरा लगा, ठीक उसी तरह उन्हें सलमान का फिल्म में खुद को ’22 साल का मोरल लौंडा’ कहलवाना भी बुरा लगा।

उन्होंने कहा कि फिल्म में जब दिशा पटानी से सलमान खान ने खुद को ‘भोलू, क्यूट बॉय’ कहलवाया, तो भी उन्हें बुरा लगा। KRK ने आगे कहा कि दिशा पटानी को तो पैसे देकर फिल्म में रोल दिया गया था, इसीलिए वो मजबूर थीं लेकिन हम तो मजबूर नहीं हैं।

राजा-रानी की शादी हुई, दहेज में दे दिया बॉम्बे: मात्र 10 पाउंड प्रति वर्ष था किराया, पुर्तगाल-इंग्लैंड ने कुछ यूँ किया था खेल

क्या आपने ‘ब्रागांज़ा की कैथरीन’ का नाम सुना है। उनका जन्म नवंबर 1638 में हुआ था। वो पुर्तगाल की राजकुमारी थीं। उनकी शादी इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय के साथ हुई थी। इस तरह वो अप्रैल 1662 से लेकर फरवरी 1685 में अपने पति की मृत्यु तक इंग्लैंड (स्कॉटलैंड और आयरलैंड भी) की महारानी के पद पर थीं। लेकिन, क्या आपको पता है कि उनकी शादी में ही जून 1661 में पुर्तगाल द्वारा बॉम्बे को दहेज के रूप में इंग्लैंड को दे दिया गया था?

16वीं और 17वीं शताब्दी के स्पेन को ‘हैब्सबर्ग स्पेन’ भी कहते हैं। ‘ब्रागांज़ा की कैथरीन’ के पिता और पुर्तगाल के राजा जॉन IV (ब्रगांजा के 8वें ड्यूक) के काल में ही पुर्तगाल ने ‘हैब्सबर्ग स्पेन’ से आज़ादी मिली। उन्होंने ‘हाउस ऑफ ब्रगांजा’ की स्थापना की 60 साल पुराने उस ‘लिबरल यूनियन’ को ख़त्म किया जिससे स्पेन वहाँ राज कर रहा था, जिससे उन्हें ‘जॉन द रीस्टोरर’ भी कहा गया। कैथरीन इंग्लैंड में लोकप्रिय नहीं थीं, लेकिन उन्होंने ही वहाँ चाय पीने की परंपरा शुरू की थी।

कैथरीन एक रोमन कैथोलिक ईसाई थीं, इसीलिए इग्लैंड में वो लोकप्रिय नहीं थीं। उनके काल में एडमंड बेरी गॉडफ्रे नामक एक जज की हत्या हुई थी, जिसका आरोप रानी पर लगा। इसके बाद पूरे इंग्लैंड में कैथोलिक विरोधी आंदोलन शुरू हो गया। उन पर राजा को ज़हर देने की साजिश के आरोप लगे। अंततः हाउस ऑफ कॉमन्स ने प्रस्ताव पारित कर सभी रोमन कैथोलिकों को ‘पैलेस ऑफ व्हाइटहॉल’ (मिडलसेक्स के वेस्टमिंस्टरमें स्थित महल, जो 1530-1698 में इंग्लैंड के राजपरिवार का निवास स्थान से) से निकाल बाहर करने का आदेश दे दिया।

वहीं दूसरी तरफ कैथरीन से 8 साल पहले मई 1930 में जन्मे चार्ल्स II की बात करें तो इंग्लैंड के चार्ल्स I के ज़िंदा बचे संतानों में सबसे बड़े थे। उस समय इंग्लैंड में सिविल वॉर का दौर था और उनके पिता की हत्या कर दी गई थी। उन्हें राजा तो बनाया गया, लेकिन सेनापति ओलिवर क्रॉमवेल तानाशाह बन बैठा और उन्हें फ़्रांस भागना पड़ा। 9 सालों तक वहाँ रहने के बाद क्रॉमवेल की मृत्यु के बाद वो लौटे और इंग्लैंड में फिर से राजशाही आई।

तो ये था इन दोनों का परिचय, जिनकी शादी में पुर्तगाल ने दहेज के रूप में बॉम्बे (आज की मुंबई) को ही दे दिया। भले ही ‘ब्रागांज़ा की कैथरीन’ का इससे कोई खास लेनादेना नहीं था, लेकिन उनकी शादी का असर भारत में अंग्रेजों और पुर्तगालियों के राज़ पर पड़ा। जब ये सब बदलाव हो रहा था, तब औरंगज़ेब दिल्ली की गद्दी पर बैठा, जिसका एक ही लक्ष्य था – साम्राज्य विस्तार। रानी की शादी से 4 साल पहले ही उसने सत्ता संभाली थी और अगले 45 वर्षों तक उसे गद्दी पर रहना था।

भारत में अंग्रेज तब कंपनी के रूप में थे और प्लासी के युद्ध में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हराने में अभी भी 100 साल थे, लेकिन उन्होंने जहाँगीर से आंध्र प्रदेश के मछलीपत्तनम और गुजरात के सूरत में फैक्ट्री स्थापना करने का आदेश 17वीं सदी का दूसरा दशक शुरू होते ही ले लिया था। वहीं पुर्तगाल तो भारत में पहले से ही सक्रिय था और 16वीं शताब्दी की शुरुआत में ही उसने गोवा, दमन-दीव और बॉम्बे को अपने कब्जे में रखा हुआ था।

तो, ‘ब्रागांज़ा की कैथरीन’ और चार्ल्स II की शादी में पुर्तगाल ने ‘बॉम्बे के सात द्वीपों’ को दहेज में इंग्लैंड को दे दिया। इस शादी के प्रस्ताव को तैयार करने में कई महीने लगे थे। चार्ल्स ने बॉम्बे को ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ को रेंट पर दे दिया, जिन्होंने वहाँ अपनी प्रेसिडेंसी स्थापित की। आज मुंबई 2 करोड़ से भी अधिक जनसंख्या के साथ दुनिया का 7वाँ सबसे बड़ा महानगर है और भारत की आर्थिक राजधानी भी कही जाती है।

अब चार्ल्स II जैसे बड़े राजा बॉम्बे से शासन तो करते नहीं, जो उनके लिए उतनी महत्वपूर्ण जगह नहीं थी। क्या आपको पता है कि बॉम्बे को कितनी रकम में रेंट पर किया गया था? ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ बॉम्बे के रेंट के रूप में मात्र 10 पाउंड (अभी 10 पाउंड 1037 भारतीय रुपया के बराबर है) प्रतिवर्ष देती थी। इसे आज की पूरी दक्षिणी मुंबई का रेंट समझ लीजिए। गेराल्ड एंजीयर ने गर्वनर के रूप में मुंबई में वेयरहाउसेज बनवाए और यहाँ पहला ब्रिटिश मिंट स्थापित किया।

इसके अलावा इंग्लैंड को दहेज में उत्तरी अफ्रीका में स्थित टैनजियर, ब्राजील और हिंद महासागर में व्यापार की छूट, पुर्तगाल में धार्मिक/व्यापारिक स्वतंत्रता और 20 लाख पुर्तगाली क्राउन्स (2.66 करोड़ भारतीय रुपए में) मिले। बदले में इंग्लैंड ने भी अपनी सेना और नौसेना के माध्यम से पुर्तगाल की मदद का आश्वासन दिया। पुर्तगाल को स्पेन के खिलाफ लड़ाई में इसका फायदा भी मिला। इसीलिए, उस समय स्पेन इस समझौते का विरोध कर रहा था।

इधर मुंबई का कद बढ़ता जा रहा था और सायन में 1669 में किला बनवाया। 1666 की आग में लंदन तक राख हो चुका था, ऐसे में उसे पुनर्निर्मित करने के लिए जो योजना तैयार की गई, उसका खाका गेराल्ड को भी मिला। इंग्लैंड में सही मायने में अपने ‘दहेज’ का विकास करने में लगभग एक दशक लगे, लेकिन मात्र 8 वर्षों में भी बॉम्बे की जनसंख्या में 65,000 का इजाफा आ चुका था। हालाँकि, आज जिसे सबअर्बन मुंबई कहते हैं, वो 1740 में मराठों के हाथ जाने तक पुर्तगाल के कब्जे में ही रहा।

एक और अजीब बात आपको ये लग सकती है कि लिस्बन और लंदन में बैठे लोगों ने समझौते पर हस्ताक्षर तो कर किए, लेकिन उनमें से शायद ही किसी ने मुंबई को देखा तक हो। स्थानीय पुर्तगाली अधिकारियों ने पूरी कोशिश की कि बॉम्बे इंग्लैंड के हाथ में न जाए। चार्ल्स ने मामले को सुलझाने के लिए ‘Earl Of Marlborough (मालबर)’ को 400 सैनिकों के साथ भेजा, लेकिन वो सभी गोवा में अन्गेदिवा के द्वीपों पर घिर गए।

इस दौरान दोनों तरफ से मोल-जोख का दौर चालू रहा। कई अंग्रेजी सैनिक तो मलेरिया और अन्य बीमारियों के कारण मर गए। उनमें से शायद 100 ही बचे रहे होंगे, जो किसी तरह बॉम्बे तक पहुँचने में कामयाब रहे। लेकिन, पुर्तगाल ने कोरोबा, धारावी, माहिम और सायन जैसे द्वीपों को देने से मना कर दिया। फिर अंग्रेजी राजपरिवार ने बॉम्बे प्रेसिडेंसी के पहले गवर्नर हम्फ्रे कूक को मामले को सुलझाने के लिए कहा।

उन्होंने इंग्लैंड को ‘बॉम्बे के 7 द्वीपों’ के अधिकार का ट्रांसफर कराया। पूरी प्रक्रिया समाप्त होते-गोते सन् 1665 तक का समय लग गया। हालाँकि, इस दौरान पुर्तगाल की एक सेना बॉम्बे में ही रही, सन् 1827 तक। उनमें अधिकतर बॉम्बे के स्थानीय निवासी ही थे और उन्हें वेतन भी नहीं मिलता था। इस ‘बॉम्बे-पुर्तगाल सेना’ का गठन 1672 में हुआ था। इस तरह आज जिस मुंबई को हम देखते हैं, वो इस तरह के कई दौर से गुजरी है।

कॉन्ग्रेस के इस मर्ज की दवा नहीं: ‘श्वेत पत्र’ में तलाश रही ऑक्सीजन, टूलकिट वाली वैक्सीन से खोज रही उपचार

वृहद टीकाकरण अभियान के पहले दिन (21 जून 2021) 86 लाख से अधिक लोगों को टीके दिए गए। इसमें एनडीए शासित राज्यों का योगदान अधिक रहा। यदि आँकड़ों को देखें तो पाएँगे कि एनडीए शासित सात बड़े राज्यों का हिस्सा 60 प्रतिशत से भी अधिक था। संख्या को देखते हुए यह निश्चित रूप से एक उपलब्धि थी और इसकी सराहना उपलब्धि के तौर पर ही हुई।

दूसरे दिन यह संख्या लगभग 54 लाख की रही जो निश्चित तौर पर पहले दिन की अपेक्षा कम थी पर इतनी भी कम नहीं थी कि वरिष्ठ कॉन्ग्रेसी नेताओं द्वारा इसका मजाक उड़ाया जाए। पर यहाँ कॉन्ग्रेस नेताओं की बात हो रही है। ऐसे में यह अपेक्षा शायद उचित नहीं थी। चिदंबरम ने ट्वीट कर अभियान के पहले दो दिनों में टीकाकरण के आंकड़ों पर फब्ती कसते हुए लिखा, “रविवार को जमा करो, सोमवार को टीकाकरण करो और फिर मंगलवार को उसी स्थिति में लौट आओ। यही एक दिन में टीकाकरण का विश्व कीर्तिमान स्थापित करने के पीछे का राज है।”

चिदंबरम के ये ट्वीट पढ़कर आश्चर्य नहीं होता। जबसे कोरोना आया है, उसका सबसे अधिक प्रभाव कॉन्ग्रेसी नेताओं पर ही दिखाई दिया है। ये कभी कहते हैं कि इन्हें देशी टीकों पर विश्वास नहीं है तो कभी पूछते हैं कि देशी टीकों को बाहर क्यों भेजा गया? कभी कहते हैं कि राज्य सरकारों को टीके खरीदने और टीकाकरण की नीति बनाने की स्वायत्तता दी जाए तो स्वायत्तता मिलने के बाद कहते हैं कि केंद्र सरकार ने अपनी जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ लिया।

केंद्र द्वारा राज्यों के साथ लगातार रखे गए संवाद के बावजूद कॉन्ग्रेसी नेता यह कहने में जरा भी समय नहीं लगाते कि मोदी सेकंड वेव का पूर्वानुमान लगाने में विफल रहे। जैसे किसी वायरस द्वारा संक्रमण की नहीं बल्कि किसी समुद्री तूफ़ान के पूर्वानुमान की बात कर रहे हैं। इन्हें कोरोना की रोकथाम के लिए बने टीके और पोलियो की दवा में फर्क नज़र नहीं आता। इनके लिए सब धान बाइस पसेरी है। ये आँकड़ों को अपने मनमुताबिक पेश करते हुए नहीं हिचकिचाते। संक्रमण सम्बंधित आँकड़े ये संख्या में व्यक्त करेंगे पर टीके से सम्बंधित आँकड़े प्रतिशत में। ये सरकार के आँकड़े नहीं मानते पर यह भी चाहते हैं इन्हें जिम्मेदार विपक्ष माना जाए। 

पिछले एक वर्ष में जब भी लगा कि इनकी माँगों पर विमर्श के पश्चात सरकार ने उन्हें मान लिया, ये नई माँगों के साथ सामने आते रहे। सरकार द्वारा उठाए गए हर कदम से असंतुष्ट दिखे। इनके नेता राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री पर ‘अपने दोस्त पूनावाला’ को लाभ पहुँचाने तक का आरोप लगाया। दूसरी लहर के समय टूलकिट आधारित दुष्प्रचार चलाने के इनके कर्म किसी से छिपे नहीं हैं। नए टीकाकरण अभियान के तहत पहले दिन के टीकाकरण के बाद जब सब सरकार की सराहना कर रहे थे तभी ये एक तथाकथित श्वेत पत्र लेकर खड़े हो गए।

श्वेत पत्र के बारे में बात करते हुए इनके नेता राहुल गाँधी ने सरकार पर जो आरोप लगाए वे वही सारे आरोप थे जो वे लगाते आए हैं। जिनका कोई आधार नहीं है। एक तरफ तो कहते रहे कि सरकार का विरोध नहीं कर रहे और दूसरी तरफ विरोध छोड़कर और कुछ नहीं किया। ऊपर से यह दावा करते रहे कि ये विशेषज्ञों से बात करते हैं, क्योंकि सरकार विशेषज्ञों से बात नहीं करती और जो कुछ भी करती है वह अपने मन से करती है। जाहिर है कि ऐसी बचकानी बात राहुल गाँधी से ही आ सकती है। 

कॉन्ग्रेस नेताओं को यह समझने की आवश्यकता है कि वैकल्पिक नीति और दुष्प्रचार दो अलग-अलग बातें हैं। कोरोना पर नियंत्रण पाने के लिए चलाया जा रहा टीकाकरण अभियान लगभग हर मायनों में पहले चलाए गए ऐसे किसी भी अभियान से पूरी तरह से भिन्न है। इन कॉन्ग्रेसी नेताओं को यह समझने की भी आवश्यकता है कि सरकार यदि सक्रिय न रहती तो समय पर भारत में टीकों से संबंधित अनुसंधान, ट्रायल और उसके पश्चात उनका उत्पादन न हो रहा होता। ऐसे में जब ये नेता कहते हैं कि सरकार विशेषज्ञों से बात नहीं करती तब ये हास्यास्पद दिखाई देते हैं।

इस अभियान का दूसरा पहलू यह है कि इसकी तुलना पल्स पोलियो के लिए चलाए गए अभियान से नहीं की जा सकती। पोलियो संक्रमण से फैलने वाली बीमारी नहीं है। ऐसे में केंद्रों पर बच्चों को दवा पिलाने के बाद इतनी देर तक नहीं रखा जाता जितनी देर तक कोरोना के टीके देने के बाद रखा जाता है। आज चल रहे टीकाकरण अभियान में एक केंद्र पर कितने लोग आ सकते हैं, उस संख्या का निर्धारण भी एक चुनौती है। कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए विश्व भर के देश आज सबसे अधिक टीके पर निर्भर दिखाई दे रहे हैं। संक्रमण की गति रोकने का यही सबसे ठोस तरीका भी लगता है।

समस्या यह है कि टीके की उपलब्धता सीमित है। उसके उत्पादन की गति को बढ़ाए जाने की अपनी सीमा है। ऐसे में समय पर टीका मिलना सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसे में बार-बार यह आरोप लगाना कि सरकार टीका खरीदना नहीं चाहती या यह कहना कि समय पर टीके का ऑर्डर देने से ही समस्या हल हो जाती, एक तथ्यहीन बात लगती है। अमेरिका ने टीके का ऑर्डर सबसे पहले दिया था पर प्रश्न यह है कि उसे क्या सारे टीके समय पर या फिर एक बार में ही मिल गए थे? यूरोपियन यूनियन ने जितने टीकों का ऑर्डर दिया था, उसे यदि वे सारे डोज मिल गए होते तो आज उन देशों में टीकाकरण की हालत इतनी खराब न होती। ऐसे में यह कहना कि टीके का ऑर्डर देने से ही समय पर उसकी उपलब्धता पक्की हो जाती, एक आधारहीन बात है।

विपक्ष में बैठी कॉन्ग्रेस और उसके नेताओं को अब स्वीकार कर लेना चाहिए कि वे विपक्ष में हैं। उन्हें यह भी समझना चाहिए कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष द्वारा दी जाने वाली वैकल्पिक नीति पर विमर्श का रास्ता तभी खुलेगा जब उस नीति का ठोस आधार होगा। यह समझना मुश्किल नहीं रहना चाहिए कि विपक्ष की वैकल्पिक नीति पर लोग तभी बात करेंगे जब नीति तर्कसंगत होगी। ऊपर से यह बात शांतिकाल के दौरान अर्थव्यवस्था या प्रशासन पर एक वैकल्पिक मॉडल पर शायद आसानी से लागू हो सकती है पर महामारी काल में तर्कहीन वैकल्पिक मॉडल पर विश्वास करना नागरिकों के लिए आसान नहीं होगा। खासकर, तब और नहीं जब इस वैकल्पिक मॉडल को प्रस्तुत करने का काम राहुल गाँधी कर रहे हों। 

यहाँ एक और बात आवश्यक है। बात यह है कि तथ्य के विकल्प के रूप में प्रोपेगेंडा कभी साधन नहीं बन सकता। ऐसे में जब चिदंबरम केवल एनडीए शासित राज्यों के आँकड़े संलग्न कर ट्वीट करते हैं, तब उसे पढ़ने वाला व्यक्ति खुद से अवश्य पूछेगा कि इन्होने कॉन्ग्रेस शासित राज्यों के आँकड़े क्यों नहीं दिए? तब उनका यह प्रयास अपना उद्देश्य खो देगा। ऐसे में कॉन्ग्रेस हर विषय पर राजनीति न करके अपना ही भला करेगी। उसे और उसके द्वारा गढ़े गए इकोसिस्टम को स्वीकार करना चाहिए कि महामारी काल में प्रोपेगेंडा और टूलकिट दुष्प्रचार के काम आ सकते हैं, लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में सहायक नहीं हो सकते। 

एलोपैथी पर टिप्पणी मामले में दर्ज केसों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुँचे बाबा रामदेव, FIR पर रोक लगाने की माँग

योग गुरु बाबा रामदेव एलोपैथी पर टिप्पणी के बाद उनके खिलाफ देशभर में दर्ज कराए गए एफआईआर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुँच गए हैं। उन्होंने शीर्ष अदालत में याचिका दायर कर इन सभी मामलों पर रोक लगाने और उन्हें एक साथ जोड़कर दिल्ली ट्रांसफर करने की माँग की है। इसमें उन्होंने उनके खिलाफ पटना और रायपुर में दर्ज एफआईआर पर रोक लगाने की माँग की है।

कोरोना की दूसरी लहर के दौरान पिछले महीने (मई 2021) में उन्होंने कोरोना के इलाज में एलोपैथी दवाओं के असर पर सवाल कर दिया था। इसके बाद इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने उनके बयान का कड़ा विरोध करते हुए उनसे माफी माँगने की माँग की थी।

दरअसल, एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें बाबा रामदेव को यह कहते हुए सुना गया था, “एलोपैथिक दवाओं के कारण लाखों लोग मारे गए हैं, जो इलाज या ऑक्सीजन नहीं मिलने के कारण मारे गए हैं।” इतना ही नहीं उन्होंने एलोपैथी को बकवास करार दिया था।

केंद्रीय मंत्री ने लिखा था पत्र

उनके इस वीडियो के विरोध में आईएमए की विभिन्न इकाइयों ने कई शिकायतें दर्ज कराई थी। विरोध बढ़ने के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने बाबा रामदेव को पत्र लिखकर कहा था कि उनके शब्दों से न केवल कोरोना वॉरियर्स का अपमान हुआ है, लोगों के दिल को भी इससे ठेस पहुँची है।

उन्होंने लिखा, “आपके शब्दों ने कोरोना योद्धाओं को आहत और अपमान किया है, जो इस महामारी के खिलाफ लड़ाई में सबसे आगे रहे हैं और दूसरों की जिंदगियों को बचाने के लिए खुद को खतरे में डाल रहे हैं। ऐसे समय आपने जो कहा वो बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि आधुनिक दवाओं ने कईयों की जानें बचाई है।”

उन्होंने आगे लिखा, “कोरोना को मात देकर हजारों लोग अपने घरों को जा रहे है। अगर देश की मृत्यु दर 1.13 प्रतिशत है और रिकवरी रेट 88 फीसदी से भी ज्यादा है तो इसका श्रेय एलोपैथी और उसके डॉक्टरों को जाता है। मुझे उम्मीद है कि आप अपने आपत्तिजनक और दुर्भाग्यपूर्ण बयान को वापस लेंगे।”

केंद्रीय मंत्री डॉ हर्षवर्धन सिंह के पत्र के बाद बाबा रामदेव ने शर्तों के साथ माफी माँगते हुए कहा था कि उनके बयान को गलत तरीके से लिया गया है। उन्होंने कहा कि वो उन्हें कोट किए गए व्हाट्सएप मैसेज को पढ़ रहे थे। फिर भी अगर किसी को इससे दुख हुआ तो माफी चाहते हैं।

इसके साथ ही बाबा रामदेव ने ये भी कहा कि अगर कोई इलाज के किसी तरीके की गलती को उजागर करता है तो उसे हमला समझने के बजाय एक रचनात्मक आलोचना समझना चाहिए।

आईएमए ने बाबा रामदेव को भेजा था 1000 करोड़ का नोटिस

एलोपैथी को लेकर जारी विवाद के बीच इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने 26 मई 2021 को बाबा रामदेव को 1000 करोड़ रुपए की मानहानि का नोटिस भेजा था। नोटिस में उनसे अपने बयान का खंडन कर लिखित और वीडियो के जरिए माफी की माँग की गई थी।

मुंबई के 26/11 से जुड़े हैं पेरिस हमले के तार: जर्मन डॉक्यूमेंट्री ने खोले PAK खुफिया एजेंसी ISI के कई राज

इस्लामी आतंकियों की जड़ तलाशने के क्रम में जर्मनी की एक डॉक्यूमेंट्री खुलासा करती है कि कैसे साल 2015 में हुए पेरिस हमले का मास्टरमाइंड मोहम्मद घनी उस्मान मुंबई अटैक 26/11 से जुड़ा हुआ था। ये उस्मान पाकिस्तानी आतंकी है और लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा हुआ है।

डॉक्यूमेंट्री का शीर्षक- ‘द बिजनेस विद टेरर‘ है। इसमें बताया गया है कि आखिर यूरोप में हुए आतंकी हमलों में फाइनेंसिंग, प्लॉनिंग और कमीशनिंग कहाँ से हुई। डॉक्यूमेंट्री बनाने के साथ निर्माताओं ने जिन बिंदुओं पर काम किया उससे ये निष्कर्ष सामने आया कि जितने भी आतंकी हमले यूरोप, यूनाइटेड स्टेट अमेरिका और पश्चिमी देशों में हुए हैं उन सबका संबंध पाकिस्तान और उसकी इंटेलिजेंस सर्विस ISI से है।

2015 में हुए पेरिस हमले के बाद जब यूरोप में कई आतंकी हमले दर्ज किए गए तो मामले में मास्टरमाइंड मोहम्मद घनी उस्मानी को गिरफ्तार किया गया। पूछताछ में उसने बताया कि उसने सिर्फ पेरिस हमलों की साजिश नहीं रची बल्कि मुंबई के 26/11 हमले में भी उसका हाथ था।

डीडब्ल्यू द्वारा प्रसारित डॉक्यूमेंट्री में लंदन के सुरक्षा विश्लेषक सज्जन गोहेल के हवाले से कहा गया,  “यह आदमी लश्कर-ए-तैयबा का एक प्रमुख सदस्य था। ऐसा माना जाता है कि वह 2008 में मुंबई में हुए हमलों की योजना में शामिल था। फिर भी, इसका कुछ भी नहीं किया गया था।”

साभार: यूट्यूब

फ्रांसीसी जाँचकर्ता मानते हैं कि इस्लामी स्टेट जिसने पेरिस हमलों का और ब्रुसेल्स में फिदायीन हमले का जिम्मा लेने का दावा किया था, उन्होंने उस्मान और हदादी को यूरोप में भेजा था। इसके बाद 34 साल के बम बनाने वाले उस्मान को अक्टूबर 2015 में गिरफ्तार किया गया। इसके साथ अल्जीरियाई सहयोगी और संदिग्ध इस्लामिक स्टेट आतंकी एडेल हदादी भी पकड़ा गया। इनकी गिरफ्तारी तब हुई जब वे 200 अन्य शरणार्थियों के साथ लेरोस के ग्रीक द्वीप पर जाली पासपोर्ट लेने के लिए पहुँचे थे।

जाँचकर्ताओं के अनुसार, नाव में दो अन्य व्यक्ति थे जिन्होंने बाद में स्टेड डी फ्रांस स्टेडियम के बाहर खुद को उड़ा लिया। ये विस्फोट यूरोपीय धरती पर सबसे दुस्साहसी हमलों में से एक था। हदादी और उस्मान चूँकि ग्रीक अधिकारियों द्वारा नकली पासपोर्ट मामले में 25 दिनों के लिए गिरफ्तार किए जा चुके थे तो वे हमलों के लिए पेरिस नहीं जा सके। लेकिन बाद में जब उन्हें जाने की अनुमति दी गई, तो उन्होंने मुख्य प्रवासी मार्ग अपनाया और नवंबर के अंत में- पेरिस हमलों के बाद पश्चिमी ऑस्ट्रिया के साल्ज़बर्ग पहुँचे। वहाँ उन्होंने साल्ज़बर्ग में एक शरणार्थी आश्रय में शरण के लिए आवेदन किया।

हालाँकि, दोनों को दिसंबर 2015 में फिर से गिरफ्तार कर लिया गया जब फिंगरप्रिंट सर्च ने इनके तार उन पासपोर्ट्स से जुड़े दिखाए जिसे इस्लामिक स्टेट ने चोरी किया था। बाद में एक ऑस्ट्रियन कोर्ट के आदेश पर उन्हें फ्रांस स्थानांतरित कर दिया गया।

साजिद मीर: टेरर अटैक में संयोजक के तौर पर काम करने वाला आतंकी

साल 2019 में, राष्ट्रीय जांँच एजेंसी ने मुंबई आतंकी हमलों के सिलसिले में उस्मान से पूछताछ की और बाद में कहा कि उस्मान पाकिस्तान मूल के अमेरिकी आतंकवादी डेविड कोलमैन हेडली के संपर्क में था, जिसने 2008 के मुंबई हमले की साजिश रची और संभावित लक्ष्यों की रेकी की।

इसके बाद डॉक्यूमेंट्री में पिछले कुछ आतंकी हमलों की उत्पत्ति के बारे में बताया गया जिन्होंने यूरोप को दहलाया था। फिल्म में खुफिया अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि सज्जाद मीर उन नोडल संपर्कों में से एक था जो पश्चिमी देशों में आतंकवादी हमलों में कॉरडिनेट करते थे।

डॉक्यूमेंट्री में आतंकवादी विरोधी एक पूर्वी फ्रांसीसी जाँचकर्ता न्यायाधीश जीन-लुई ब्रुगुएरे के हवाले से कहा गया “अमेरिका में कुछ संदिग्ध साजिद मीर के होने की पुष्टि करते हैं। साथ ही पश्चिमी लोगों से उसके संबंध और उन्हें इस उद्देश्य से रिक्रूट करना कि वह उन्हें यूरोप और यूएस भेजकर वहाँ लश्कर ए तैयबा के नाम पर हमले करवा सकें, इसकी पुष्टि भी करते हैं।”

मुंबई के पुलिस अधिकारी देवेन भारती, जो नवंबर 2008 में पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा हमला किए गए स्थलों में एक पर सबसे पहले पहुँचने वाले लोगों में से एक थे। उन्होंने बताया कि आतंकियों के मारे जाने के बाद उन्होंने उनके मोबाइल फोन पकड़े थे। वह वेटर बनकर होटल में घुसे थे ताकि आतंकियों को निर्देश देने वाले की पहचान की जा सकें। इस क्रम में उन्हें पता चला कि वह साजिद मीर था जो आतंकियों को ज्यादा से ज्यादा लोगों को मारने के निर्देश दे रहा था।

डेविड कोलमैन हेडली: 26/11 से पहले मुंबई के इलाकों की रेकी करने वाला लश्कर ए तैयबा का आतंकी

डॉक्यूमेंट्री में फोकस अमेरिकी आतंकवादी डेविड कोलमैन हेडली पर भी किया जाता है, जो मुंबई आतंकी हमलों में अपनी भूमिका के लिए 35 साल जेल की सजा काट रहा है। अपने करियर की शुरुआत में, हेडली ने डीईए एजेंट के रूप में काम किया, लेकिन पाकिस्तान से हेरोइन की तस्करी के आरोप में पकड़ा गया। बाद में डीईए का मुखबिर बनने की कसम खाने और यूएस में तस्करी को रोकने में डीईए की मदद करने की बात कहकर वह बच गया।

लेकिन, बाद में डेविड हेडली को लश्कर-ए-तैयबा के साथ बढ़ती नजदीकियों के लिए फिर से पकड़ा गया। ये लगभग उसी समय की बात है, जब 9/11 के हमले हुए और अमेरिकी एजेंसियों ने ​​अपना ध्यान अल कायदा और अन्य पश्चिमी-केंद्रित आतंकवादी संगठनों से आतंकवादी हमलों को रोकने पर केंद्रित किया। इस बार सीआईए ने हेडली पर कोई केस न करने के बदले उससे सीधा एक सौदा किया कि वह उसके एक अमेरिकी एजेंट के रूप में पाकिस्तान जाए और लश्कर-ए-तैयबा के बीच पहुँचकर, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ने में अमेरिका की मदद करे।

डील के बाद हेडली ने लश्कर-ए-तैयबा के साथ संपर्क स्थापित किया और आगे बढ़ा। इसी बीच, पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) और उसके प्रमुख मेजर इकबाल ने भी उससे संपर्क किया, जो भारत के खिलाफ आतंकी हमले को अंजाम देने के लिए हेडली की अमेरिकी पहचान का उपयोग करना चाहता था। उसने हेडली को एक सलाहकार की आड़ में मुंबई भेजा और हमलों के लिए संभावित लक्ष्यों की रेकी करने को कहा। ध्यान रहे, ये वह समय था जब हेडली डबल एजेंट के रूप में काम कर रहा है, अमेरिका के सीआईए के लिए और साथ ही पाकिस्तान के आईएसआई के लिए भी।

डेविड हेडली: CIA और ISI का डबल एजेंट

हेडली ने मुंबई में उन स्थानों के बारे में अमूल्य जानकारी प्रदान की जिनका उपयोग बाद में पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा 26 नवंबर, 2008 को भीषण हमलों को अंजाम देने के लिए किया गया। मालूम हो कि हेडली मुंबई में हमले के संभावित लक्ष्यों की रेकी कर रहा था, तब भी ब्रिटिश सीक्रेट सर्विस एमआई6 द्वारा उसकी लगातार निगरानी की जा रही थी। लेकिन बावजूद इसके वह भारत की खूफिया एजेंसियों को उसके और उसके पाकिस्तानी आकाओं द्वारा रची गई संभावित आतंकी साजिश के बारे में सूचित करने में विफल रहे थे।

हमलों के बाद, डेविड कोलमैन हेडली वापस संयुक्त राज्य अमेरिका में गया। डॉक्यूमेंट्री में दिखाया जाता है कि कोलमैन बाद में मुंबई में हुए हमलों को दोहराने के लिए डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में रहा। उसने कोपेनहेगन में स्थानों की रेकी की।

डॉक्यूमेंट्री के निर्माताओं द्वारा लिए गए साक्षात्कार में एक सीआईए अधिकारी ने बताया कि कोलमैन उन हमलावरों में से एक बनने की योजना बना रहा था जो कोपेनहेगन में चयनित स्थानों पर हमला करने की योजना बना रहे थे और मौजूद लोगों पर पर अंधाधुंध गोलियाँ चलाने का प्लॉन बना रहे थे। बिलकुल वैसे जैसा कि पाकिस्तानी आतंकवादियों ने मुंबई में कई जगहों पर किया था। हालाँकि, इस बार एमआई6, जो हेडली की गतिविधियों पर करीब से नजर रख रहा था,उनको उसकी योजना की जानकारी मिल गई और उन्होंने अमेरिका में अपने समकक्षों को सूचित किया जिसके कारण डेनमार्क की राजधानी पर होने वाले एक हमले को रोकने में मदद हुई

हेडली को बाद में शिकागो से गिरफ्तार किया गया है। डॉक्यूमेंट्री में कहा गया है कि हेडली द्वारा बार-बार पीठ में छुरा घोंपने के बावजूद, अमेरिकी एजेंसियों ने उसके साथ एक सौदा किए रखा। शायद ऐसा इसलिए क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि किसी को पता चले कि 26/11 हमलों में जो व्यक्ति शामिल था उसके उनके साथ संबंध थे। 

हेडली के साथ हुए सौदे पर बताया गया कि इसके तहत उसे भारत प्रत्यर्पण से बचाया गया ताकि यहाँ उसे मौत की सजा न मिले और अमेरिकी जेल में रखकर 35 साल की सजा दी गई। बदले में उसे उसका मुँह बंद करके रखने को कहा गया। ये गौरतलब हो कि अमेरिकी खूफिया एजेंसियों ने अब तक भारत के साथ की हेडली की फाइनेंशियल ट्रांजेक्शन को शेयर नहीं किया है।

NCB की गिरफ्त में दाऊद इब्राहिम का भाई इकबाल कासकर, ड्रग्स मामले में कार्रवाई

भगोड़े डॉन दाऊद इब्राहिम के भाई इकबाल कासकर को नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने बुधवार (23 जून 2021) को हिरासत में लिया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हाल ही में एनसीबी ने चरस के दो कंसाइनमेंट पकड़े थे। ये ड्रग्स पंजाब के लोग कश्मीर से मुंबई बाइक से लाया करते थे। इस मामले में करीब 25 किलोग्राम चरस पकड़ी गई थी।

इस मामले की जाँच के दौरान एनसीबी (NCB) को तस्करी मामले के तार अंडरवर्ल्ड से जुड़े हुए मिले। इसके बाद ड्रग तस्करी और माफिया कनेक्शन की जाँच शुरू की गई। अब मुंबई नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने इकबाल कासकर को कस्टडी में ले लिया है। उससे पूछताछ चल रही है।

बताया जा रहा है कि मामले की जाँच के दौरान एनसीबी को टेरर फंडिंग और ड्रग्स की सप्लाई के लिए अंडरवर्ल्ड कनेक्शन से जुड़े अहम सुराग हाथ लगे थे। इसके आधार पर एनसीबी ने मुंबई में कई जगहों पर छापेमारी भी की थी। गिरफ्तार आरोपितों से पूछताछ के बाद इकबाल कासकर को हिरासत में लिया गया।

इससे पहले इकबाल को ठाणे में कारोबारियों और बिल्डरों से फिरौती वसूली के मामले में 2017 में गिरफ्तार किया गया था। उस पर मकोका के तहत आरोप लगाए गए थे। उसे 2003 में संयुक्त अरब अमीरात से प्रत्यर्पित कर भारत लाया गया था।

बता दें कि पिछले साल अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जॉंच शुरू होने के बाद बॉलीवुड में ड्रग्स सिंडिकेट की घुसपैठ भी सामने आई थी। इस मामले में एनसीबी कई सितारों से पूछताछ कर चुकी है। कई गिरफ्तारियॉं भी कर चुकी है। कुछ समय पहले दाऊद इब्राहिम के सहयोगी, गैंगस्टर एवं नशीले पदार्थ के विक्रेता परवेज खान उर्फ चिंकू पठान से कथित संपर्क के आरोप में ड्रग विक्रेता हैरिस खान को गिरफ्तार किया था।

केरल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु: देश में कोरोना संक्रमण के हॉटस्पॉट, नए केस में 56% यहीं से

देशभर में कोरोना संक्रमण के मामले में महाराष्ट्र, केरल और तमिलनाडु कोरोना वायरस के केंद्र बन गए हैं। एक तरफ जहाँ देश के दूसरे राज्यों में वायरस की दूसरी लहर की वजह से होने वाले संक्रमण के मामलों में कमी आई है। इन तीनों राज्यों में संक्रमण बढ़ा है। तमिलनाडु में एक शेर में कोरोना का संक्रमण मिला है। देश में कोरोना महामारी की शुरुआत के साथ ही संक्रमितों की संख्या के मामले में टॉप पर रहे महाराष्ट्र को पीछे ढकेल कर केरल इस मामले में टॉप पर पहुँच गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, केरल में बीते 24 घंटों के दौरान 12,617 नए कोरोना संक्रमित मिले थे। जबकि महाराष्ट्र में 24 घंटे के दौरान 8,470 नए कोरोना संक्रमित मिले। इसी के साथ राज्य में कुल संक्रमितों की संख्या बढ़कर 60 लाख के करीब पहुँच गई है।

देश में कोविड -19 संक्रमण के मामले में टॉप 5 स्टेट (साभार: Covid19.org)

वहीं दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु बीते 14 घंटों के दौरान मिले 6,895 नए कोरोना संक्रमितों के साथ इस मामले में तीसरे स्थान पर आ गया है। केरल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु समेत तीनों राज्यों का देश में मिले कोरोना के कुल मामलों में 56 फीसदी हिस्सेदारी है। मंगलवार (22 जून 2021) को देशभर में कोरोना के 50,848 नए संक्रमित मिले। 1,358 मौतें हुई। इसमें से इन तीन राज्यों में ही 28,000 नए मामले और 817 मौतें हुईं।

हालाँकि, अच्छी बात यह है कि बीते 24 घंटे के दौरान कोरोना के एक्टिव केस 19,327 घटकर 6,43,194 पर पहुँच गए हैं। जबकि इसी दौरान 68,817 लोग स्वस्थ भी हुए, जिससे कुल ठीक होने वालों की संख्या 2.89 करोड़ हो गई है। बीते 40 दिनों से प्रत्येक दिन ठीक होने वालों की संख्या रोजाना नए मामलों से ज्यादा हो रही है।

हालाँकि, चिंता की बात यह है कि इन तीनों राज्यों में लगातार कोविड पेशेंट मिल रहे हैं, जिससे महामारी के खिलाफ इस लड़ाई में कोरोना संक्रमण का बोझ भी बढ़ रहा है। इसके अलावा इन राज्यों में ही कोरोना के डेल्टा प्लस वैरिएँट को लेकर सूचित भी किया गया है।

कोरोना के डेल्टा प्लस वैरिएँट के महाराष्ट्र में 21 मामले, मध्य प्रदेश में छह, केरल में तीन, तमिलनाडु में तीन, कर्नाटक में दो और पंजाब, आंध्र प्रदेश और जम्मू में एक-एक मामले दर्ज किए गए हैं।

महाराष्ट्र:

मंगलवार (22 जून 2021) को महाराष्ट्र में कोविड 19 महामारी के 8,473 नए केस दर्ज किए गए, जो कि सोमवार (21 जून 2021) को मिले संक्रमितों से 2,000 ज्यादा थे। इससे कुल संक्रमितों का आँकड़ा 59,87,521 हो गया। राज्य में कोरोना के चलते अब तक 88,620 लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ी है।

साभार: Covid19.org

राज्य के स्वास्थ्य विशेषज्ञों और अधिकारियों ने संक्रमण बढ़ने के पीछे अधिक जनसंख्या, आवामगन और कोरोना प्रोटोकॉल के उल्लंघन को जिम्मेदार ठहराया है। खास बात यह है कि इस बार गाँवों में कोरोना का संक्रमण ज्यादा तेजी से फैला है।

केरल:

देश में महामारी की शुरुआत से संक्रमण के मुख्य केंद्र रहे केरल में देश में सबसे अधिक कोविड -19 मामले मिल रहे हैं। मंगलवार (22 जून 2021) को राज्य में 12,617 नए कोविड मामले दर्ज किए, जो सोमवार को दर्ज किए गए मामलों की तुलना में लगभग दो हजार अधिक हैं।

वहीं प्रदेश में कोरोना के कारण 141 नई मौतों के साथ मृतकों की संख्या भी बढ़कर 12,295 हो गई। इसके अलावा राज्य का पॉजिविटी रेट (10.72) काफी हाई है, जो कि चिंता का विषय है। राज्य में एक्टिव केस की संख्या 1,00,437 है, और 27,16,284 लोग स्वस्थ हो चुके हैं।

साभार: Covid19.org

कोरोना की पिछली लहर का सामना करने में विफल रहा केरल दूसरी बार भी महामारी से मुकाबला करने में विफल रहा है। प्रदेश में कोरोना संक्रमण बढ़ने के पीछे राज्य सरकार द्वारा मजबूत स्वास्थ्य बुनियादी ढाँचे की कमी और उदासीनता को कारण बताया जा रहा है।

संक्रमण के बढ़ने से इस दक्षिण भारतीय राज्य का स्वास्थ्य ढाँचा भारी दवाब से गुजर रहा है। देशभर में कोरोना वायरस की दूसरी लहर के बीच राज्य सरकार को कोरोना मरीजों का इलाज करने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

तमिलनाडु:

तमिलनाडु में भी बीते 24 घंटे के दौरान 6,895 नए कोरोना संक्रमित मिले, जिससे कुल संक्रमितों की संख्या बढ़कर 24,36,819 हो गई है। इसी अंतराल में कोरोना के कारण 190 से अधिक लोगों की मौत हुई है। इससे कुल मौतों का आँकड़ा भी बढ़कर 31,850 पर पहुँच गया है।

साभार: Covid19.org

इसके अलावा मंगलवार (22 जून 2021) को 13,156 लोग स्वस्थ भी हुए। इससे एक्टिव केस की संख्या घटकर 56,866 तक हो गई है। इसी साल 21 मई 2021 को तमिलनाडु 36,184 संक्रमित मिले थे, जो कि दूसरी लहर के दौरान अपने आप में सर्वाधिक है।

कोरोना संक्रमितों की तेजी से बढ़ती संख्या के बीच बीते 24 घंटे के दौरान केंद्र सरकार ने लगभग 88.09 लाख लोगों का टीकाककरण करके 21 जून 2021 को ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की। हालाँकि, मंगलवार को यह घटकर लगभग 53.4 लाख ही रहा। लेकिन केंद्र सरकार ने इस साल के अंत तक टीकाकरण अभियान पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। मौजूदा वक्त में देश में तीन टीकों का इस्तेमाल हो रहा है। इसमें रूस निर्मित स्पुतनिक वी, और भारत की कोवैक्सिन और कोविशील्ड शामिल है।

‘वर्जिनिटी खोने की सही उम्र क्या है? मैं गलती से प्रेग्नेंट हो गई तो?’: जब अनुराग कश्यप की बेटी ने माँ से पूछे सवाल

अनुराग कश्यप की बेटी आलिया के मन में सवाल आया था कि वर्जिनिटी खोने की सही उम्र क्या है। उन्होंने यही सवाल अपनी माँ और अनुराग कश्यप की पूर्व-पत्नी आरती बजाज से पूछा था। यूट्यूब पर वीलॉग्स बना कर लोकप्रिय हो चुकीं आलिया कश्यप अक्सर चर्चा में रहती हैं। इसी तरह का एक वीडियो उन्होंने जुलाई 2020 में बनाया था। इस वीडियो में उन्होंने फैंस से ऐसे सवाल बताने को कहा था, जिसे उन्हें अपनी माँ से पूछने में डर लगता है।

आलिया कश्यप ने इंस्टाग्राम के माध्यम से फैंस से सवाल माँगे थे। इस वीडियो में उनकी माँ आरती बजाज भी मौजूद थीं,। आलिया कश्यप ने वीडियो में कहा कि उनकी माँ इन सवालों के जवाब देंगी। एक फैन ने जब पूछा कि ब्रेअकप से कैसे उबरें, तो उनकी माँ ने बताया था कि ये एक बुरा समय होता है और आप रोते हो, लेकिन अच्छे समय को याद कर मूवऑन कर जाना चाहिए। एक फैन ने डेटिंग को लेकर सही उम्र और इसे लेकर माँओं की सोच पूछी थी।

इसके जवाब में आरती बजाज ने बताया था कि डेटिंग के लिए कम से कम 18 उम्र होनी चाहिए, क्योंकि इस समय लोग थोड़े सेंसिबल होते हैं। जब आलिया ने कहा कि उन्होंने 18 की उम्र में डेटिंग शुरू कर दी थी तो उनकी माँ ने जवाब दिया कि वो उस समय ‘बेबी’ थीं। आलिया की माँ आरती बजाज ने ‘फर्स्ट किस’ के सवाल पर कहा कि वो इस पर बात नहीं करना चाहती हैं, लेकिन उन्होंने बताया कि तब वो 17 की थीं।

शादी से पहले सेक्स के सवाल पर उन्होंने कहा था कि हर एक्शन के परिणाम होते हैं और जब इंसान तैयार हो, तभी ऐसा करना चाहिए। आरती बजाज ने बताया कि 23-24 की उम्र में उन्होंने पहली बार शराब पी थी। वर्जिनिटी खोने की सही उम्र के सवाल पर आलिया कश्यप की माँ आरती बजाज ने बताया था कि इंसान जब तैयार हो, तभी उसे ऐसा करना चाहिए और अगर इंतजार कर सकते हैं तो कीजिए।

आलिया कश्यप ने माँ आरती बजाज के साथ बनाया था वीडियो

उन्होंने ये भी कहा था कि आपको किसी के सामने कुछ साबित करने की ज़रूरत नहीं है। 17 की उम्र में रिलेशनशिप के मामले में उन्होंने कहा कि ये इंसान की पसंद पर निर्भर करता है। एक समय में दो लोगों से प्यार को उन्होंने प्यार नहीं, आकर्षण करार दिया। ‘अगर मैं एक्सीडेंटली प्रेग्नेंट हो जाती हूँ तो आप मेरा समर्थन करेंगी?’ – आलिया के इस सवाल पर आरती बजाज ने कहा था कि ऐसा मत कीजिए, 30 से पहले बच्चा होना उनकी नजर में सही नहीं है।

हाल ही में आलिया कश्यप ने एक वीडियो में दिखाया था कि कैसे उनके पिता ने उनकी और उनके बॉयफ्रेंड की मेजबानी की और देशी भोजन खिलाया। वहीं अपने पिता के साथ बनाए गए वीडियो में आलिया ने पूछा था कि अगर वो शराब पीती हैं तो उनका रिएक्शन क्या होगा? अनुराग ने जवाब दिया था तुम पहले ही ऐसा कर चुकी हो। इस वीडियो में पोर्न से लेकर टीनएज तक की बातें हुई। आलिया बताती हैं कि वह अपने पैरेंट्स से एक-एक बात खुलकर करती हैं। 

केरल सरकार ने दी 2 कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं की हत्या में गिरफ्तार CPM सदस्यों की पत्नियों को सरकारी नौकरी, SC में कर चुकी है डिफेंड

केरल के कासरगोड जिले में 2019 में दो यूथ कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं की हत्या के आरोप में न्यायिक हिरासत में बंद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के सदस्यों के परिजनों को सरकारी नौकरी दी गई है। जिला पंचायत ने माकपा (CPIM) सदस्य एम पीतांबरन, सीजे साजी और सुरेश की पत्नियों को जिला सरकारी अस्पताल में नियुक्त किया है।

माकपा के इन कार्यकर्ताओं ने फरवरी 2019 में युवा कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता कृपेश और सारथ लाल की कथित तौर पर हत्या कर दी थी। तब से ये तीनों न्यायिक हिरासत में हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, अस्पताल में अंतिम श्रेणी के लोगों के लिए चार रिक्तियाँ थीं, जिसके लिए 100 लोगों को शॉर्टलिस्ट किया गया था। इसमें गिरफ्तार आरोपितों के परिवार वालों को तीन पोस्ट दी गई हैं।

दरअसल, केरल सरकार हत्या के आरोपित माकपा पार्टी के कार्यकर्ताओं को बचाने की कोशिश कर रही है। राज्य पुलिस द्वारा दायर चार्ज शीट में अभियुक्तों की बजाए अभियोजन पक्ष के गवाहों को नामित किया गया था। वहीं, जब हाईकोर्ट ने मामले को सीबीआई को ट्रांसफर कर दिया था, तो राज्य सरकार इसे रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में गई थी। हालाँकि, शीर्ष अदालत ने केरल सरकार की याचिका को खारिज कर दिया था।

जिला पंचायत ने आरोपों का खंडन किया

कासरगोड जिला पंचायत के उपाध्यक्ष शनवास पोधुर ने कहा, ”दो युवा कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं की हत्या में शामिल माकपा पार्टी के कार्यकर्ताओं की पत्नियों की नियुक्ति जानबूझकर नहीं की गई थी।” उन्होंने आगे कहा कि जिला पंचायत द्वारा अस्पताल का प्रबंधन किया जाता है, लेकिन इस बार हम आवेदकों के इंटरव्यू में शामिल नहीं हुए थे। हालाँकि, ऐसी राजनीतिक सिफारिशें आम हैं। यह केवल एक अस्थायी नियुक्ति है। वहीं, सारथ लाल के पिता सत्यनारायणन ने इस नियुक्ति को जघन्य कृत्य कहा है। उन्होंने कहा, “इससे पता चलता है कि माकपा हत्यारों के साथ है।”

बताया जा रहा है कि जब दो युवा कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं के परिवार वालों ने सीबीआई जाँच की माँग को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया था, तब पिछली एलडीएफ (LDF) सरकार ने इसका विरोध किया था। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने सीबीआई जाँच के खिलाफ दलील देने वाले सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकीलों पर 90 लाख रुपए खर्च किए थे। हालाँकि, कोर्ट ने पिछले साल मामले को केंद्रीय जाँच एजेंसी (CBI) को सौंप दिया था।

फरवरी 2019 में दो युवा कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं की हत्या

कासरगोड में फरवरी 2019 में 24 वर्षीय कृपेश और 29 वर्षीय सारथ लाल रात में एक स्थानीय कार्यक्रम में शामिल होने के बाद बाइक से अपने घर लौट रहे थे। तभी कार में आए 3 माकपा कार्यकर्ताओं ने युवा कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं पर हमला कर दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, जहाँ कृपेश की मौके पर ही मौत हो गई थी, वहीं सारथ ने मैंगलोर के अस्पताल ले जाते समय रास्ते में दम तोड़ दिया था। केरल पुलिस की क्राइम ब्रांच ने मामले की जाँच की थी और 14 सीपीएम कार्यकर्ताओं और नेताओं पर दोहरे हत्याकांड का आरोप लगाया था। लेकिन पुलिस ने मुख्य संदिग्धों को अभियोजन पक्ष के गवाह के रूप में नामित किया था।

इस विसंगति के चलते केरल हाईकोर्ट की एकल पीठ ने चार्ज शीट को रद्द कर दिया था और 2019 में मामले को सीबीआई को ट्रांसफर कर दिया था। हालाँकि, सरकार ने केस डायरी सीबीआई को सौंपने से इनकार कर दिया था और खंडपीठ के समक्ष आदेश के खिलाफ अपील की थी। खंडपीठ द्वारा एकल पीठ के आदेश पर रोक लगाने से इनकार करने के बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। लेकिन, शीर्ष अदालत ने भी उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। अंतः मामला सीबीआई को सौंप दिया गया था।