पाकिस्तान के खिलाफ भारत के ऑपरेशन सिंदूर एयर स्ट्राइक के बाद से हरियाणा और पंजाब से अब तक 8 पाकिस्तानी जासूस पकड़े जा चुके हैं। इस कड़ी में उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद से पकड़े गए जासूस शहजाद को लेकर एंटी टेरेरिस्ट स्क्वाड (ATS) ने बड़ा खुलासा किया है।
ATS के अनुसार, शहजाद भारत में एक बड़े आतंकी हमले की तैयारी में था। कई दिनों तक निगरानी रखने के बाद उसे पकड़ा गया।
शहजाद को पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के लिए जासूसी करने के आरोप में 18 मई 2025 को गिरफ्तार किया गया है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, शहजाद भारत-पाकिस्तान की सीमा पर अवैध रूप से कॉस्मेटिक, मसाले, कपड़े समेत अन्य चीजों के तस्करी करता था।
इसी दौरान वह ISI एजेंट के संपर्क में आया और पाकिस्तान के लिए काम करने लगा। शहजाद के साथ-साथ 17 मई 2025 को हरियाणा के नूँह से पकड़े गए मोहम्मद तारीफ का भी बयान सामने आया है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, एक वायरल वीडियो में तारीफ ने इस बात को माना है कि पाकिस्तानी दूतावास में काम करने वाले आसिफ बालौच और जाफर से उसने भारतीय सिम कार्ड के जरिए बातचीत की और व्हाट्सएप कॉल के जरिए संपर्क में था ताकि सुरक्षा एजेंसी के सर्विलांस पर न आ सके।
तारीफ ने यह बात भी मानी है कि आसिफ बालौच और जाफर के कहने पर ही उसने पाकिस्तान को सिरसा एयरपोर्ट स्टेशन की जानकारी भेजी।
नूँह से ही राजाका गाँव से सुरक्षा जाँच एजेंसी टीम ने पाकिस्तान के लिए जासूसी करने वाले अरमान को गिरफ्तार किया था। इसके बाद बावला गाँव से मोहम्मद तारीफ को गिरफ्तार किया गया। दोनों को पुलिस टीम ने सप्ताह भर की रिमांड पर लिया है। उनसे और जानकारियाँ जुटाई जा रही हैं।
लोगों का नेटवर्क तैयार कर रहे थे शहजाद और तारीफ
रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस का मानना है कि तारीफ और अरमान स्लीपर सेल की तरह काम करते थे और ISI का नेटवर्क बढ़ाने के लिए लोगों को तैयार करते थे। सुरक्षा एजेंसियाँ उस दुकान की भी खोज में हैं जहाँ से अरमान और तारीफ ने सिमकार्ड खरीदे थे।
एटीएस की मानें तो शहजाद रामपुर के कई युवाओं को पाकिस्तान भेज चुका था। वहाँ उन्हें जासूसी और हिंसक गतिविधियों की ट्रेनिंग दी गई। इन सभी का वीजा खुद शहजाद ने लगवाया जिसमें ISI एजेंट्स की उसे मदद मिली।
पुलिस को यह भी पता चला है कि शहजाद पाकिस्तान उच्चायोग में काम करने वाले अधिकारी एहसान उर रहीम उर्फ दानिश के संपर्क में था। दानिश का नाम पहले ही ISI एजेंट के तौर पर काम करने में सामने आ चुका है। उसके संपर्क में हरियाणा की ज्योति मल्होत्रा भी रही है जिसे गिरफ्तार किया गया है।
तस्करी के बहाने जासूसी की तैयारी
शहजाद कॉस्मेटिकेस, नकली आभूषण, महिलाओं के कपड़े जैसे तस्करी का काम करता था। इसमें उसने रामपुर के कुछ युवकों को भी शामिल किया और धीरे-धीरे सभी को ट्रेनिंग के लिए पाकिस्तान भेजने की पूरी तैयारी की।
पाकिस्तान जासूसी एजेंसियों ने सोशल मीडिया और इंक्रिप्टेड एप्लीकेशंस का भरपूर उपयोग किया। व्हाट्सएप के कॉल और इंक्रिप्टेड मैसेज के जरिए जासूसी करने से लेकर सोशल मीडिया को लोगों से जुड़ने का जरिया बनाया जिससे सुरक्षा एजेंसी के रडार पर न आ सकें। सुरक्षा एजेंसियाँ इस पर भी अपनी जाँच कर रही हैं।
भारत का मोस्ट वॉन्टेड आतंकी और हाफिज सईद का करीबी अमीर हमजा अस्पताल में अंतिम साँसें गिन रहा है। हमजा लश्कर ए तैय्यबा का को-फाउंडर है और उसे अमेरिका ने 2012 में ग्लोबल टेरेरिस्ट घोषित किया था।
आमिर हमजा बुरी तरह घायल अवस्था में लाहौर के मिलिट्री अस्पताल में भर्ती कराया गया है। वो घायल कैसे हुआ है? इसके बारे में कोई पक्की खबर नहीं है। हालाँकि दावा किया जा रहा है कि अज्ञात लोगों ने उसे गोलियों से भून दिया है जबकि कई लोग उसके दुर्घटना में बुरी तरह घायल होने की बात कह रहे हैं। घायल अवस्था में उसे घर से अस्पताल लाया गया था।
भारत में हुए कई आतंकी गतिविधियों में शामिल रहा हमजा
पाकिस्तान के गुजरांवाला का रहने वाला आमिर हमजा लश्कर ए तैय्यबा का को फाउंडर है और उसे हाफिज सईद के साथ साथ अब्दुल रहमान मक्की का करीबी बताया जाता है। अपने भड़काऊ भाषण में वो भारत के खिलाफ जहर उगलता है। हमजा और सैफुल्लाह ने मिलकर साल 2005 में बेंगुलुरु में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस पर हमले की साजिश रची थी। अबू सैफुल्लाह की अज्ञात बंदूकधारियों ने हाल ही में हत्या कर दी।
कश्मीर में आतंकियों की घुसपैठ और टेरर फंडिंग में आमिर हफजा का बड़ा हाथ है। हामिद सईद के साथ मिलकर 1990 में उसने लश्कर ए तैय्यबा का नींव रखी। सईद के साथ मतभेद के बाद उसने 2018 में जैश ए मनकफा नाम से संगठन बनाया था और आतंकवाद को फैलाने के लिए फंड इक्ठ्ठा करता था। इसके बाद वो फिर हाफिज सईद से दोस्ती कर ली और लगातार भारत में आतंकियों की घुसपैठ की कोशिश कर रहा था। आतंकी नेटवर्क फैलाने में हमजा की बड़ी भूमिका रही है।
पाकिस्तान में लगातार आतंकियों के खातमे की खबरें आ रही हैं। पिछले दो साल में अब तक 17 आतंकियों की पाकिस्तान के अलग अलग जगहों पर मौत हो चुकी है। हाल ही में अबू सैफुल्लाह को मौत के घाट उतार दिया गया था। वह नागपुर स्थित आरएसएस मुख्यालय पर हमले की योजना में शामिल था।
इस घटना के अगले दिन यानी 19 मई 2025 को लश्कर ए तैय्यबा का एक और अहम आतंकी अब्दुल वाहिद मारा गया। दोनों को ही सिंध में अज्ञात बंदूकधारियों ने गोलियों से भून दिया। गौरतलब है कि पाकिस्तान में मारे गए पिछले दो साल में 17 आतंकियों की गोली लगने से ही मौत हुई है।
मार्च 2025 में फैजल नदीम उर्फ अबु किताल मारा गया जो लश्कर का अहम कमांडर था। मार्च में ही मुफ्ती शाह मारा गया जो आईएसआई का एजेंट था। फरवरी 2025 में मौलाना काशिफ मारा गया जो लश्कर के ही कमांडर था। नवंबर 2023 में तीन आतंकी रहीम उल्लाह तारिक मारा गया जो मसूद अजहर का करीबी था। इसके अलावा लश्कर का आतंकी अकरम गाजी और ख्वाजा शाहिद मारा गया।
सितंबर 2023 में मौलाना जियाउर रहमान मारा गया जो लश्कर का अहम कमांडर था। इससे पहले 2023 को मसूद अजहर का एक और करीबी काजी एजाज आबिद मारा गया। 2023 मसूद अजहर के करीबियों के लिए अच्छा नहीं रहा। इस साल दाउद मलिक भी मारा गया। लश्कर का आतंकी अदनान अहमद दिसंबर 2023 में मारा गया।
हिजबुल मुजाहिद्दीन का आतंकी बशीर अहमद पीर फरवरी 2023 में गोलियों से भून दिया गया। सितंबर 2023 में लश्कर ए तैय्यबा का आतंकी रियाज अहमद जबकि मई 2023 में खालिस्तानी आतंकी परमजीत सिंह पंजवार मारा गया
2022 में जिन आतंकियों को मारा गया उनमें जैश ए मोहम्मद का आतंकी जहूर इब्राहिम अहम है।
दैनिक भास्कर की एक सनसनीखेज रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश के सागर शहर के शनिचरी और शुक्रवारी इलाकों से हिंदू परिवार बड़ी संख्या में पलायन कर रहे हैं। पिछले 10 सालों में यहाँ की हिंदू आबादी में 4.88 प्रतिशत की कमी आई है, जो गहरी चिंता का विषय है।
रिपोर्ट बताती है कि पिछले 5 सालों में 41 हिंदू परिवारों ने अपने मकान बेचकर ये इलाके छोड़ दिए हैं, और चौंकाने वाली बात ये है कि ये सभी मकान मुस्लिम समुदाय के लोगों ने खरीदे हैं। कुल मिलाकर, पिछले एक दशक में 63 हिंदू परिवारों के 228 लोग यहाँ से जा चुके हैं, और अभी भी कई घरों पर ‘बिकाऊ’ के बैनर लगे हुए दिख रहे हैं।
— प्रियंक कानूनगो Priyank Kanoongo (@KanoongoPriyank) May 20, 2025
पलायन के पीछे की दर्दनाक कहानियाँ
दैनिक भास्कर की टीम ने कुछ ऐसे परिवारों से बात की जिन्होंने अपने पुश्तैनी मकान छोड़कर जाने को मजबूर हुए हैं:
उमाशंकर शर्मा ने बताया कि उनके 150 साल पुराने पुश्तैनी मकान को मुस्लिम समुदाय के लोगों ने घेर लिया और परेशान करने लगे। घर पर केवल महिलाएँ थीं। मजबूरी में उन्हें अपना 18 लाख रुपये का मकान मात्र 5.30 लाख रुपये में बेचना पड़ा।
राजपाल सिंह ने बताया कि उनके घर के बाहर मीट के टुकड़े और अंडे के छिलके फेंके जाते थे, जिससे वहाँ रहना मुश्किल हो गया था। उनका 625 वर्गफीट का मकान दो साल तक नहीं बिका, आखिर में उन्हें कम कीमत में बेचना पड़ा।
एक अन्य व्यक्ति ने बताया कि उसकी बेटी को मुस्लिम युवक ने प्रेम-प्रसंग में फँसाया, जिससे मजबूरन उसे अपनी बेटी की शादी उस युवक से करानी पड़ी। बाद में बेटी को प्रताड़ित किया गया और मकान बेचने पर मजबूर किया गया।
संतोष कुमार साहू ने बताया कि उनके आसपास सिर्फ 1-2 हिंदू परिवार बचे थे। मुस्लिम लोगों के मकान अधिक होने से उनके बच्चों की शादियाँ नहीं हो रही थीं। वहाँ के माहौल के चलते रिश्ते नहीं आ रहे थे। उन्हें अपने 30 लाख रुपये के मकान को 22 लाख रुपये में बेचना पड़ा।
शनिचरी चौगना इलाके की एक हिंदू महिला ने बताया कि पति के न होने पर उन्हें अपनी दो बेटियों की सुरक्षा का डर रहता था। मुस्लिम समुदाय के लोगों से विवाद के बाद उन्होंने अपने 22 लाख रुपये के मकान को 14 लाख रुपये में बेचा।
विश्व हिंदू परिषद की अपील और प्रशासन की भूमिका
विश्व हिंदू परिषद के जिलाध्यक्ष अजय दुबे का कहना है कि क्षेत्र में माहौल खराब होने के कारण हिंदू परिवार अपने मकान बेचकर जा रहे हैं। उन्होंने प्रशासन से इस पलायन को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की अपील की है और कहा है कि उनका संगठन भी परेशान परिवारों की मदद के लिए तैयार है।
यह रिपोर्ट सागर के शनिचरी-शुक्रवारी क्षेत्र में एक गंभीर सामाजिक समस्या की ओर इशारा करती है, जहाँ जनसांख्यिकीय बदलाव और सामाजिक ताना-बाना खतरे में दिख रहा है। यह मुद्दा प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती है, जिस पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है।
हरियाणा के हिसार से पाकिस्तान की जासूसी के आरोप में पकड़ी गई यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा को पाकिस्तान से खूब प्रेम है। ऐसा ज्योति ने अपनी पर्सनल डायरी में लिखा है। पुलिस ने उसकी डायरी को बरामद कर लिया है।
पुलिस के अनुसार, ज्योति अक्सर अपनी अतंराराष्ट्रीय यात्राओं के अनुभवों को निजी डायरी में लिखा करती थी। अधिकारियों का मानना है कि डायरी से जाँच में काफी हद तक मदद मिल सकती है। डायरी में पाकिस्तान को लेकर काफी बातें लिखी हुई हैं।
ज्योति ने दो बार पाकिस्तान का दौरा किया। साल 2024 में जब वह 10 दिन के लिए पाकिस्तान गई थी, तब ज्योति ने भारत लौटने के बाद निजी डायरी में पाकिस्तान के बारे में दो पेज लिखे थे। इसमें पाकिस्तान की काफी तारीफें लिखी हुई हैं। साथ ही भारत-पाकिस्तान के बीच रिश्तों को लेकर भी विचार लिखे गए हैं।
ज्योति ने लिखा है, “10 दिन की पाकिस्तान यात्रा पूरी करने के बाद, आज मैं वापस भारत आ गई हूँ। हमें नहीं जानते कि सरहदों की दूरियाँ कब तक रहेंगी, लेकिन दिलों की शिकायतें मिट जाएँ। हम सब एक ही जमीन, एक ही मिट्टी के हैं।” आगे लिखा कि लाहौर घूमने के लिए दो दिन का वक्त काफी कम था।
ज्योति ने आगे अपनी डायरी में पाकिस्तान में मिले आतिथ्य की प्रशंसा की और उम्मीद जताई कि अधिक भारतीय हिंदू वहाँ अपने पूर्वजों से मिल सकें। इसी के साथ यूट्यूबर ने 1947 के विभाजन के दौरान पाकिस्तान में बसे परिवारों के लिए मंदिर और गुरुद्वारों के रास्ते खोलने की इच्छा भी लिखी। इसके अलावा लिखा, “पाकिस्तान की बस और ट्रक के बारे में जितना कहूँ, उतना कम। क्रेजी और कलरफुल।”
मोबाइल फोन से हो सकता है खुलासा, फोरेंसिक जाँच को भेजा
बता दें कि यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा 5 दिन की पुलिस रिमांड पर हैं। उनसे लगातार NIA, IB जाँच एजेंसिया और हरियाणा पुलिस पूछताछ कर रही है। इस दौरान रोजाना नए खुलासे हो रहे हैं। पुलिस का कहा है कि ज्योति जाँच में अड़चन पैदा करने के लिए कुछ गुमराह बयान भी दे रही है।
ज्योति ने पाकिस्तान उच्चायोग में काम करने वाले ISI एजेंट दानिश के साथ अपने रिश्तों को नकार दिया है। यूट्यूबर ने अपने और दानिश के व्हाट्सएप चैट्स भी डिलीट किए हुए हैं। अधिकारियों का मानना है कि यह चैट्स पाकिस्तान को शेयर की गई खुफिया जानकारी का हिस्सा हो सकती हैं। इसीलिए उसके मोबाइल फोन को फोरेंसिक जाँच के लिए भेजा गया है।
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में पिछले महीने हुई हिंसा की जाँच के लिए हाई कोर्ट ने कमेटी बनाई थी, जिसने अपनी रिपोर्ट दे दी है। कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा बनाई गई जाँच समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि इस हिंसा में ममता बनर्जी की सत्ताधारी पार्टी टीएमसी के स्थानीय नेताओं की अहम भूमिका रही।
यह हिंसा वक्फ संशोधन बिल के पास होने के दौरान शुरू हुई थी, जिसें हिंदुओं को निशाना बनाया गया। जब पीड़ित लोगों ने मदद के लिए पुलिस को फोन किया, तो पुलिस ने कोई जवाब नहीं दिया और पूरी तरह निष्क्रिय रही।
रिपोर्ट में बताया गया कि हिंसा में बड़े पैमाने पर आगजनी और लूटपाट हुई। दुकानों और मॉल्स को बेरहमी से नष्ट किया गया। जाँच समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा, “हमले स्थानीय पार्षद मेहबूब आलम के इशारे पर हुए। स्थानीय पुलिस गायब रही और उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।” यह रिपोर्ट एनडीटीवी ने हासिल की है।
रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य हमला शुक्रवार (11 अप्रैल 2025) को दोपहर 2:30 बजे के बाद हुआ। जिसमें बताया गया है कि “यहाँ स्थानीय पार्षद मेहबूब आलम हमलावरों के साथ आया। उसके साथ समसेरगंज, हिजलतला, शिउलीतला और डिगरी के नकाबबंद मुस्लिम थे। उन्होंने हमला कर सबकुछ जला दिया। इसके बाद विधायक अमीरुल इस्लाम आया और उसने देखा कि कौन से घर अभी तक नहीं जले। इसके बाद हमलावरों ने उन घरों में आग लगा दी।”
हिंसा पीड़ित बेटबोना गाँव के लोगों ने पुलिस को फोन किया, लेकिन पश्चिम बंगाल पुलिस ने कोई जवाब नहीं दिया। रिपोर्ट में बताया गया है कि स्थानीय विधायक अमीरुल इस्लाम वहीं मौजूद था, लेकिन उसने हिंसा रोकने की कोशिश तक नहीं की, बल्कि वो चुपचाप वहाँ से खिसक गया।
हिंसा पीड़ित ग्रामीणों के जख्मों पर नमक डालते हुए हमलावरों ने पानी की पाइपलाइन भी काट दी, ताकि वो अपने घरों में लगी आग को बुझा तक न सकें। इसी बेटबोना गाँव में 113 घर सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। इन घरों को इतना नुकसान हुआ कि अब वे रहने लायक नहीं हैं। इन्हें पूरी तरह दोबारा बनाना होगा। गाँव की महिलाएँ डर के मारे अपने रिश्तेदारों के पास रहने को मजबूर हैं।
मुर्शिदाबाद हिंसा के अगले दिन शनिवार (12 अप्रैल 2025) को हिंदू पिता-पुत्र की उनके मुस्लिम पड़ोसियों ने ही हत्या कर दी।इसके बाद हुई हिंसा में इलाके की दुकानें और बाजार पूरी तरह तबाह हो गए। किराना स्टोर, हार्डवेयर की दुकानें, इलेक्ट्रॉनिक्स और कपड़े की दुकानों को नष्ट कर दिया गया। मंदिरों को भी नहीं बख्शा गया। यह सब स्थानीय पुलिस स्टेशन से सिर्फ 300 मीटर की दूरी पर हुआ।
इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि घोषपारा (मुर्शिदाबाद का इलाका) में 29 दुकानें फूँकी गई या तोड़फोड़ की शिकार हुई। इस दौरान एक शॉपिंग मॉल जैसा बाजार लूट लिया गया और उसे बंद कर दिया गया। जाँच समिति में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण और न्यायिक सेवा के सदस्य शामिल थे। इस समिति ने गाँवों का दौरा किया और हिंसा के शिकार लोगों से बात की। इसके बाद यह रिपोर्ट तैयार की गई, जिसे मंगलवार (20 मई 2025) को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के सामने पेश किया गया।
बता दें कि ऑपइंडिया ने मुर्शिदाबाद हिंसा की विस्तृत कवरेज की थी। हमने बताया था कि किस तरह से पिता-पुत्र को इस्लामी कट्टरपंथियों ने काट डाला, इसके बाद उन दोनों के अंतिम संस्कार तक से लोगों ने दूरी बनाकर रखी। यही नहीं, पीड़ित महिलाओं को भी धमकियाँ दी गई।
हमने अपनी रिपोर्ट में ये भी बताया था कि मुर्शिदाबाद हिंसा में न सिर्फ मंदिरों पर हमले किए गए, बल्कि मंदिरों के सामने पेशाब किए गए और हिंदुओं को कलमा पढ़ने तक के लिए मजबूर किया। हमारी एक रिपोर्ट में ये बात साफ तौर पर लिखी गई है, जिसमें हिंदुओं के घरों पर निशान लगाकर उन्हें हिंसा का शिकार बनाया गया।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को इस्लाम मजहब कबूल करने का न्यौता मिला है। मिस्र के मौलाना अल-अदावी ने वीडियो में ट्रंप के लिए संदेश भेजा। वीडियो में मौलाना कहते हैं, ‘अल्लाह के आगे समर्पण करो और मोक्ष पाओ।’ अब यह वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है। नेटिजन्स डोनाल्ड ट्रंप को नया मुस्लिम नाम दे रहे हैं।
वीडियो में अल-अदावी ने डोनाल्ड ट्रंप के नाम संदेश जारी कर उन्हें ‘महान अमेरिकी’ बताया। उन्होंने कहा, “अल्लाह के प्रति समर्पित हो जाओ और तुम्हें मुक्ति मिलेगी। इस्लाम स्वीकार करो और अल्लाह तुम्हें दोगुना ईनाम देगा। अच्छे कर्म करो, अल्लाह पर भरोसा रखो, क्योंकि अल्लाह एक है और उसका कोई साझीदार नहीं है।”
Prominent Egyptian scholar Al-Adawi urges 'Great American' Trump to convert to Islam
मौलाना ने कहा कि अल्लाह ने ही ट्रंप को साम्राज्य दिया है और वही है जो इसे उनसे छीन सकता है। कहा, राष्ट्र या राष्टपति पद से धोखा मत खाओ, क्योंकि जो लोग तुमसे पहले आए थे वे मर चुके हैं। जॉनसन कहाँ है? निक्सन कहाँ है? कैनेडी कहाँ है?” अल-अदावी ने चेतावनी दी कि एक दिन ट्रंप को उनके कर्मों का फल मिलेगा, इसीलिए उन्हें अल्लाह की राह पर चलना चाहिए।
मौलाना ने ट्रंप से कहा है कि उन्हें अपने देश लौटकर लोगों को बताना कि अल्लाह के अलावा कोई नहीं है। वो कहता है, “इस्लाम को अपनाओ और मुक्ति पाओ। अल्लाह तुम्हें दोगुना इनाम देगा। मुसलमानों द्वारा तुम्हें दिए जाने वाले सबसे महान उपहार के साथ अपने देश लौटो। इस गवाही के साथ कि अल्लाह के अलावा कोई नहीं है, और यह कि मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं।”
यह वीडियो डोनाल्ड ट्रंप के हाल में किए गए खाड़ी दौरे के बाद सामने आया है। पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) पहुँचे थे। राष्ट्रपति बनने का बाद यह उनका पहला विदेशी दौरान था। इसके लिए उन्होंने सबसे पहले कुछ मुस्लिम बहुल देशों को चुना।
ट्रंप के इस विदेशी दौरे के कई वीडियो सामने आए हैं, जिसमें डोनाल्ड ट्रंप का जोरदार स्वागत किया जा रहा है। UAE पहुँचे ट्रंप के स्वागत की एक वीडियो काफी वायरल हुई, जिसमें सफेद कपड़े पहने महिलाएँ अपने बालों को हिला रही हैं। यह सऊदी अरब का सांस्कृतिक नृत्य है, जिसे अनोखा स्वागत बताया गया। वहीं, इस वीडियो को लेकर ट्रंप को ट्रोल भी किया गया।
ट्रम्प का स्वागत यूएई में ऐसे किया गया। अमीराती खवातींनो ने केश नृत्य का मुजहरा किया! pic.twitter.com/jzjCSmKu7t
— ??Jitendra pratap singh?? (@jpsin1) May 15, 2025
सऊदी अरब के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति कतर पहुँचे थे, जहाँ कतर के अमीर ने उन्हें खुद दोहा एयरपोर्ट पर रिसीव किया। ट्रंप का स्वागत पारंपरिक ऊँटों और उनके रेड साइबर ट्रक के साथ किया गया, जो काफी चर्चा में रहा। इस दौरान ट्रंप की दिलचस्पी अरब संस्कृति में काफी अधिक दिखाई दी।
ट्रंप के अरब देशों में दौरे के बाद सोशल मीडिया पर कुछ लोग ट्रंप को मुस्लिम समर्थक होने का दावा कर रहे हैं। इसी दौरे के बाद मिस्र के मौलाना अल-अदावी ने ट्रंप को इस्लाम मजहब कबूल करने का न्यौता देने वाली वीडियो वायरल हुई।
वीडियो को रूस की मीडिया संस्था रशिया टाइम्स के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट किया गया है। इसके बाद से यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है। हालाँकि यह साफ नहीं है कि यह वीडियो कब का है और किस मामले में बनाया गया है। लेकिन वीडियो में मौलाना राष्ट्रपति को इस्लाम अपनाने का आग्रह कर रहे हैं।
रूस की मीडिया रशियन टाइम्स द्वारा जारी की गई पोस्ट का कैप्शन (साभार: @RT_com)
वीडियो में ट्रंप की शपथ ग्रहण समारोह की एक क्लिप भी जोड़ी गई है, जिसमें वे प्रार्थना सभा में मुस्लिम अजान को ध्यान से सुनते दिखाई दे रहे हैं। इसका अर्थ माना जा रहा है कि ट्रंप इस्लाम से काफी प्रभावित हैं। वहीं, वीडियो पर काफी नेटिजंस चुटकी भी लेते नजर आ रहे हैं।
कुछ इस्लामी ने डोनाल्ड ट्रंप को मुस्लिम नाम भी दे दिया है। ट्रंप को दाऊद याह्या अल-ट्रंफी, डोनालडुद्दीन अब्दुल-बिन-ट्रंपुद्दीन-अमेरिकास्तानी, अबु मुहम्मद डोन-अल-उद्दीन ज़कारिया, मुफ्ती अल शेख अल ट्रंप जैसे मुस्लिम नाम रखने का सुझाव दिया जा रहा है। एक यूजर ने ट्रंप की मुस्लिम टोपी पहने फोटो भी शेयर की है।
उत्तर प्रदेश स्थित हापुड़ की मोनाड यूनिवर्सिटी चर्चा में है। करीब 58 एकड़ में फैली मोनाड यूनिवर्सिटी में यूपी एसटीएफ ने छापेमारी की और शनिवार (17 मई 2025) को मोनाड यूनिवर्सिटी के चेयरमैन बिजेंद्र सिंह हुड्डा समेत 12 लोगों को गिरफ्तार कर लिया। एसटीएफ की कार्रवाई में 1372 फर्जी मार्कशीट. 262 फर्जी प्रोविजनल और माइग्रेशन सर्टिफिकेट, मोबाइल फोन, आईपैड, 7 लैपटॉप, 26 सर्वर मशीन, 6 लाख से ज्यादा की नकदी भी बरामद की। आरोप है कि मोनाड यूनिवर्सिटी से फर्जी मार्कशीटों का धंधा चलाया जा रहा था, जिसकी छपाई की कीमत होती थी 5000 रुपए, लेकिन छात्रों-खरीदारों तक पहुँचते पहुँचते इसकी कीमत 50 हजार रुपये से लेकर 5 लाख रुपये तक हो जाती थी।
हापुड़ की मोनाड यूनिवर्सिटी आज घोटालों, जालसाजी और ठगी का अड्डा बन चुकी है। मोनाड यूनिवर्सिटी का चेयरमैन विजेंद्र सिंह हुड्डा, जो कभी उत्तर प्रदेश पुलिस का 5 लाख रुपये का इनामी बदमाश रह चुका है। उसने फर्जी डिग्री घोटाले, बाइक-बोट घोटाले और न्यूज वर्ल्ड इंडिया चैनल के जरिए कर्मचारियों के शोषण जैसे कई कांडों को अंजाम दिया। विजेंद्र सिंह हुड्डा ने हजारों करोड़ रुपये की ठगी कर एक विशाल साम्राज्य खड़ा किया। यह रिपोर्ट विजेंद्र के काले कारनामों की परतें खोलती है, जिसमें हर घोटाला एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। इस रिपोर्ट में मोनाड यूनिवर्सिटी के कामकाज और उसके फर्जीवाड़े को विस्तार से बताया गया है।
झाँसे से लिया न्यूज वर्ल्ड इंडिया और निकल पड़ा घोटालों की राह पर
विजेंद्र सिंह हुड्डा ने 2010 के दशक में न्यूज वर्ल्ड इंडिया चैनल को नवीन जिंदल से खरीदा था। पहले यह चैनल ‘हमार टीवी’ के नाम से चलता था। इस चैनल का मालिक एक कॉन्ग्रेसी नेता हुआ करता था। उससे कॉन्ग्रेस में रहते हुए नवीन जिंदल ने न्यूज वर्ल्ड इंडिया में तब्दील किया। विजेंद्र ने इसे आधे-अधूरे सौदे और उधारी में हासिल किया। सौदा 16 करोड़ रुपये में तय हुआ था, लेकिन विजेंद्र ने जिंदल को पूरा भुगतान नहीं किया। उसने वादा किया था कि पैसे बाद में देगा, लेकिन बाद में वह बाइक-बोट घोटाले में फँस गया और चैनल को छोड़ दिया। इस दौरान चैनल का लाइसेंस भी रद्द हो गया।
न्यूज वर्ल्ड इंडिया में विजेंद्र ने 200 से अधिक पत्रकारों और कर्मचारियों का जमकर शोषण किया। वह कर्मचारियों के वेतन से पीएफ और टीडीएस तो काटता था, लेकिन इसे जमा नहीं करता था। इससे कर्मचारियों का लाखों रुपये डूब गया। कर्मचारियों का कहना है कि विजेंद्र ने चैनल के जरिए न सिर्फ उनका पैसा हड़पा, बल्कि उनके करियर को भी बर्बाद कर दिया। कई पत्रकारों ने बताया कि उनके पास न तो पीएफ का पैसा मिला और न ही उनकी मेहनत की सही कीमत।
न्यूज चैनल बंद होने के कुछ साल बाद इसी चैनल के फर्जी नाम – NewZ World India नाम से यूट्यूब चैनल इसके गुर्गे चला रहे हैं। कथित तौर पर इसका एक स्टूडियो मोनाड यूनिवर्सिटी के परिसर में बनाया गया, जहाँ डिजिटल चैनल चलाने के साथ-साथ बीजेएमसी (बैचलर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन) की पढ़ाई भी कराई जाती थी। लेकिन यह पढ़ाई महज एक दिखावा थी। असल में यूनिवर्सिटी का मुख्य धंधा फर्जी डिग्रियाँ बेचना था।
बाइक-बोट स्कैम से 1500 करोड़ रुपए की ठगी से जुड़ा नाम
विजेंद्र का सबसे चर्चित कांड बाइक-बोट घोटाला था, जिसने लाखों लोगों को ठगा। 2018 में विजेंद्र ने गर्वित इनोवेटिव लिमिटेड कंपनी के साथ मिलकर बाइक-बोट स्कीम शुरू की। इस स्कीम में निवेशकों से 62,000 रुपये लेकर हर महीने 9,500 रुपये देने का वादा किया गया। बाद में एक इलेक्ट्रिक बाइक स्कीम लॉन्च की गई, जिसमें 1.24 लाख रुपये के निवेश पर हर महीने 17,000 रुपये देने का लुभावना ऑफर था। शुरुआत में कुछ निवेशकों को पैसे लौटाए गए, ताकि स्कीम पर भरोसा बढ़े। लेकिन जल्द ही कंपनी बंद हो गई और निवेशकों का पैसा डूब गया।
इस घोटाले में करीब 15000 करोड़ रुपये की ठगी हुई। लखनऊ, नोएडा, गाजियाबाद, कानपुर जैसे शहरों में 118 से अधिक एफआईआर दर्ज हुईं। जाँच के दौरान विजेंद्र और उसकी करीबी दीप्ति बहल लंदन भाग गए। दोनों पर 5-5 लाख रुपये का इनाम घोषित था। 2022 में विजेंद्र ने कोर्ट से जमानत हासिल की और भारत लौट आया। लौटते ही उसने हापुड़ के पिलखुआ में मोनाड यूनिवर्सिटी को खरीद लिया।
वैसे तो ये यूनिवर्सिटी साल 2010 से चल रही थी, लेकिन लॉकडाउन की आड़ में उसने साल 2022 में इस यूनिवर्सिटी को खरीद लिया और चेयरमैन बन बैठा। बाइक बोट घोटाले से जमा रकम उसके पास थी ही और फिर वो राजनीति के मैदान में उतरने की तैयारी करने लगा। वो मोनाड यूनिवर्सिटी से पैसे छापता और बाइक-बोट घोटाले के पैसों को खपाता रहा, साथ ही राजनीतिक मंसूबे भी पालता रहा, जिसके बारे में आगे विस्तार से जानकारी दी गई है।
दरअसल, बाइक-बोट घोटाले में विजेंद्र का साथी संजय भाटी भी शामिल था, जो साल 2019 में गौतम बुद्ध नगर लोकसभा सीट से बीएसपी के टिकट पर चुनाव लड़ने वाला था। उसने नाम की घोषणा भी हो चुकी थी, लेकिन गिरफ्तारी के बाद से वो अब तक जेल में बंद है। इस बाइक बोट घोटाले की जाँच यूपी पुलिस की ईओडब्ल्यू यूनिट को सौंपी गई थी, और अब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) भी इसकी जाँच कर रहा है।
मोनाड यूनिवर्सिटी को बनाया फर्जी डिग्रियों का कारखाना
लौटते हैं विजेंद्र के नए कारनामे यानी मोलाड यूनिवर्सिटी की तरफ। मोनाड यूनिवर्सिटी हापुड़ के पिलखुआ में स्थित है। विजेंद्र ने इसे 2022 में खरीदा और इसे फर्जी डिग्रियाँ बेचने का अड्डा बना दिया। हालाँकि इस यूनिवर्सिटी का नाम साल 2019 में भी फर्जी सर्टिफिकेट के मामले में सामने आ चुका था, लेकिन किसी तरह ये यूनिवर्सिटी बच निकली थी। विजेंद्र सिंह हुड्डा की नजर उस पर थी, क्योंकि वो राजनीतिक कनेक्शनों के दम पर इसे आगे बढ़ाना चाहता था और 58 एकड़ में बसी यूनिवर्सिटी का मालिक बनने के बाद वो पूरी तरह से खुद को सफेदपोश ही समझने लगा था।
इसी क्रम में मोनाड यूनिवर्सिटी में बीए, बीएड, बीटेक, फार्मासिस्ट और बीए-एलएलबी जैसे कोर्स की डिग्रियाँ 50,000 से 4 लाख रुपये में बेची जाने लगी थीं। शनिवार (17 मई 2025) को एसटीएफ की छापेमारी में 1372 फर्जी मार्कशीट, 282 फर्जी प्रोविजनल और माइग्रेशन दस्तावेज जब्त किए गए। यूनिवर्सिटी के चेयरमैन विजेंद्र सहित 10 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें यूनिवर्सिटी के चांसलर नितिन कुमार सिंह, चेयरमैन का पीए मुकेश ठाकुर, हेड ऑफ वैरिफिकेशन डिपार्टमेंट गौरव शर्मा, विपुल ताल्यान, एडमिशन डायरेक्टर इमरान, अकाउंटेंट अनिल वत्रा, कुलदीप, सनी कश्यप और संदीप सेहरावत शामिल थे।
मोनाड यूनिवर्सिटी का कामकाज पूरी तरह से फर्जीवाड़े पर आधारित था। बाहर से देखने में यह एक सामान्य यूनिवर्सिटी लगती थी, जहाँ छात्र पढ़ने आते थे और डिग्रियाँ हासिल करते थे। लेकिन हकीकत में यह एक ऐसा कारखाना था, जहाँ डिग्रियाँ और मार्कशीट छापी जाती थीं। यूनिवर्सिटी में कोई ठोस अकादमिक सिस्टम नहीं था। न तो प्रोफेसरों की नियुक्ति सही तरीके से की गई थी, न ही कोई मान्यता प्राप्त पाठ्यक्रम चलाया जा रहा था। जो कोर्स चलाए जा रहे थे, वे सिर्फ दिखावे के लिए थे। असल में, यूनिवर्सिटी का मुख्य काम फर्जी डिग्रियाँ बेचना था।
इन फर्जी डिग्रियों के लिए अलग से डेटाबेस बना हुआ था। ताकी छापेमारी जैसी कोई कार्रवाई हो भी, तो विजेंद्र सिंह हुड्डा जैसे इसके असली कर्ता-धर्ता बच निकले। यही वजह थी कि उसने यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर चेयरमैन के तौर पर अपना नाम भी नहीं डाला था। बाकी रिपोर्ट्स बता रही हैं कि वो अब मेरठ में भी एक कॉलेज खोलने की तैयारी कर रहा था, ताकी अपने जालसाजी के साम्राज्य को वो और बड़ा कर सके।
यूनिवर्सिटी में एक अलग डिपार्टमेंट बनाया गया था, जिसे वैरिफिकेशन डिपार्टमेंट कहा जाता था। इस डिपार्टमेंट का काम फर्जी डिग्रियों को वैरिफाई करना था, ताकि अगर कोई जाँच करे तो डिग्री असली लगे। गौरव शर्मा इस डिपार्टमेंट का हेड था और उसने सैकड़ों फर्जी डिग्रियों को वैरिफाई करने में अहम भूमिका निभाई। एडमिशन डायरेक्टर इमरान उन लोगों को टारगेट करता था, जो आसानी से डिग्री खरीदना चाहते थे। वह ऐसे छात्रों को लुभाने के लिए झूठे वादे करता था, जैसे कि बिना पढ़ाई के डिग्री मिल जाएगी या कम समय में कोर्स पूरा हो जाएगा।
यूनिवर्सिटी से बाहर हरियाणा में प्रिंटिंग सिस्टम भी था, जहाँ फर्जी मार्कशीट और डिग्रियां छापी जाती थीं। हरियाणा का रहने वाला संदीप सेहरावत वहाँ से गिरफ्तार हुआ। संदीप ने बताया कि वह विजेंद्र के कहने पर बीएड, बीए, बीए-एलएलबी, फार्मासिस्ट और बीटेक की फर्जी मार्कशीट और डिग्रियाँ छापता था। विजेंद्र का खास राजेश इस काम में उसकी मदद करता था। हर कोर्स की डिग्री के लिए अलग-अलग रेट तय थे। जैसे, बीए की डिग्री 50,000 रुपये में मिलती थी, जबकि बीटेक की डिग्री 4 लाख रुपये तक में बिकती थी।
यूनिवर्सिटी में डिजिटल सिस्टम भी था, जिसमें सारी जानकारी स्टोर की जाती थी। एसटीएफ की छापेमारी में 14 मोबाइल फोन, 6 आईपैड, 7 लैपटॉप, 26 इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, लैपटॉप, हार्ड डिस्क और सर्वर सिस्टम जब्त किए गए। इन डिजिटल उपकरणों में फर्जी डिग्रियों का पूरा डेटाबेस था, जिसमें यह जानकारी थी कि किन-किन छात्रों को डिग्रियाँ बेची गईं और कितने पैसे लिए गए। एसटीएफ अब इस डेटाबेस के जरिए पिछले दो सालों में दी गई हर डिग्री की जाँच कर रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि फर्जी डिग्रियों का इस्तेमाल कहाँ और कैसे हुआ।
यूनिवर्सिटी का एक और गोरखधंधा माइग्रेशन सर्टिफिकेट बेचना था। जो छात्र किसी दूसरी यूनिवर्सिटी से मोनाड यूनिवर्सिटी में ट्रांसफर होना चाहते थे, उन्हें फर्जी माइग्रेशन सर्टिफिकेट दिए जाते थे। इन सर्टिफिकेट्स की कीमत 20,000 से 50,000 रुपये तक होती थी। इस काम में यूनिवर्सिटी का अकाउंटेंट अनिल वत्रा और सनी कश्यप भी शामिल थे। उन्होंने सैकड़ों फर्जी माइग्रेशन सर्टिफिकेट बेचे और मोटा मुनाफा कमाया।
मोनाड यूनिवर्सिटी का फर्जीवाड़ा सिर्फ हापुड़ तक सीमित नहीं था। इसकी पहुँच हरियाणा तक थी। एसटीएफ को शक है कि विजेंद्र का सोनीपत के फर्जी डिग्री रैकेट से भी कनेक्शन था, जिसे दिल्ली पुलिस का एक सिपाही चलाता था। इस रैकेट में 60 से ज्यादा लोग गिरफ्तार हुए थे। मोनाड यूनिवर्सिटी से फर्जी डिग्रियाँ हरियाणा भेजी जाती थीं, जहाँ विजेंद्र का बेटा संदीप इस काम को मैनेज करता था। सोनीपत में फर्जी डिग्रियों से नौकरी पाने वाले कई लोग जैसे लेखपाल और शिक्षक भी पकड़े गए थे। खास बात ये है कि फर्जी मार्कशीटों के साथ पकड़े गए व्यक्ति का नाम भी संदीप है, लेकिन उसका उपनाम सहरावत है। ऐसे में ये दोनों लोग एक ही हैं, या अलग-अलग इसे वेरिफाई किया जाना बाकी है।
यूपी एसटीएफ चीफ अमिताभ यश ने बताया कि विजेंद्र सिंह हुड्डा पहले भी बाइक-बोट घोटाले का मास्टरमाइंड रह चुका है। अब उसका नाम शिक्षा से जुड़े इस बड़े घोटाले से भी जुड़ गया है। जाँच में यह भी पता चला कि विजेंद्र ने पिछले तीन सालों से यह धंधा चला रखा था। उसने यूनिवर्सिटी के जरिए हजारों छात्रों को ठगा और करोड़ों रुपये की कमाई की।
राजनीति के मैदान में तेजी से बढ़ रहा था विजेंद्र, जाटों की राजनीति कर बना रहा था नाम
विजेंद्र ने अपने काले कारोबार को छिपाने के लिए राजनीति का सहारा लिया। 2022 में उसने लोक दल (रालोद नहीं) की सदस्यता ली और सुनील सिंह के साथ मिलकर एक बड़ा पद हासिल किया। उसने कई प्रदर्शन किए और यहाँ तक दावा कर दिया कि उसी की कोशिशों के चलते चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न सम्मान प्राप्त हुआ।
उसने अपने गुर्गों के दम पर अखबारों में बाकायदा आर्टिकल भी छपवाए, ताकी उसके दावे को मजबूती मिल सके। यही नहीं, वो लगातार खुद को रालोद प्रमुख जयंत चौधरी को भी पीछे करने के दावे अखबारों में कराने लगा, ताकी जाटों की राजनीति का वो महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन सके। उसके फेसबुक प्रोफाइल पर इससे जुड़े समाचारों के कटिंग भी शेयर किए गए हैं।
विजेंद्र सिंह हुड्डा ने रालोद प्रमुख को चुनौती देने वाले आर्टिकल भी छपवाए
हालाँकि लोक दल में रहते हुए जब उसे मजबूत मुकाम नहीं मिला, तो उसने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का दामन थाम लिया। 2024 में उसने बसपा के टिकट पर बिजनौर से लोकसभा चुनाव लड़ा। इस चुनाव में उसे 2,18,986 वोट मिले और वह तीसरे स्थान पर रहा। वेस्ट यूपी में बसपा के लिए सबसे ज्यादा वोट लाने वाला उम्मीदवार भी वही था। उसके लिए खुद मायावती ने चुनाव प्रचार किया था।
बीएसपी सुप्रीमो मायवती के साथ विजेंद्र सिंह हुड्डा
बिजनौर लोकसभा सीट पर उसे चुनावी हार मिली, तो उसने बसपा से नाता तोड़ लिया। उसने दूसरी पार्टियों में भी शामिल होने की कोशिश की, लेकिन स्थानीय जाट और ठाकुर नेताओं के विरोध के कारण उसे सफलता नहीं मिली। रालोद के बीजेपी के साथ आने से उसे नई उम्मीद दिखी, लेकिन उससे पहले ही एसटीएफ ने उसे गिरफ्तार कर लिया।
विजेंद्र का आपराधिक इतिहास और संपत्ति
विजेंद्र सिंह हुड्डा सिर्फ 10वीं पास है। उसने चीन में लैपटॉप और टैबलेट बेचकर करोड़ों रुपये कमाए। 2010 में भारत लौटकर उसने यही कारोबार शुरू किया और फिर धीरे-धीरे न्यूज चैनलों और अन्य कामों में हाथ डालने लगा। इस दौरान उसने देश के नामी पत्रकारों और बड़े नौकरशाहों से संपर्क बनाए। जिंदल के न्यूज चैनल को खरीदने की कहानी आगे बताई जा चुकी है। इस बीच, जब उनका बाइक बोट घोटाले में नाम आने लगा, तो वो चैनल और देश छोड़कर भाग निकला।
विजेंद्र पर धोखाधड़ी, जालसाजी, आपराधिक षड़यंत्र और साक्ष्य मिटाने जैसे 100 से अधिक मामले दर्ज हैं। वह इन मामलों का सामना गाजियाबाद, दिल्ली और गौतमबुद्धनगर की अदालतों में कर रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में दिए गए शपथपत्र में उसने बताया कि उसकी संपत्ति 28 करोड़ रुपये है, लेकिन देनदारी 230 करोड़ रुपये की है। उसकी वार्षिक आय मात्र 15 लाख रुपये थी। फिर भी वह अकूत संपत्ति का मालिक कैसे बना, यह जाँच का विषय है।
ईडी की रडार पर आ चुका है विजेंद्र सिंह
अब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) विजेंद्र को अपने रडार पर लेने की तैयारी कर रहा है। ईडी यह जाँच करेगी कि बाइक-बोट घोटाले से जुटाई गई 15000 करोड़ रुपये की रकम कहाँ निवेश की गई और मोनाड यूनिवर्सिटी का साम्राज्य कैसे खड़ा हुआ। विजेंद्र के राजनीतिक आकाओं की भूमिका भी जाँच के दायरे में आएगी। एसटीएफ के डीएसपी संजीव दीक्षित ने बताया कि उनकी टीम ने जो सबूत जुटाए हैं, उन्हें जल्द ही ईओडब्ल्यू और ईडी को सौंपा जाएगा।
विजेंद्र सिंह हुड्डा का यह काला साम्राज्य पत्रकारिता, शिक्षा और स्टार्टअप के नाम पर ठगी का एक बड़ा उदाहरण है। उसने न्यूज वर्ल्ड इंडिया से लेकर मोनाड यूनिवर्सिटी तक हर क्षेत्र में जालसाजी की। अब एसटीएफ और ईडी की कार्रवाई से उसके घोटालों का पूरा मकड़जाल सामने आ रहा है।
भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहाँ कई धर्म, संस्कृति और सभ्यताओं का मेल एक ही जगह पर आसानी से दिख जाता है। सनातन हो या सिख, सभी एक दूजे के धर्मों के दिल से सम्मान करते हैं और उनके पूजनीयों में अपनी अटूट आस्था भी रखते हैं। यही वजह है कि इन दोनों धर्मों के तीर्थ स्थलों पर श्रद्धालुओं में इस बात का फर्क कर पाना मुश्किल है कि कौन सा इंसान किस धर्म से है?
इस कड़ी में श्रद्धालुओं की आस्था बरकरार रखने के लिए भारत ने पाकिस्तान के साथ बातचीत की और कोविड महामारी के बाद 09 नवंबर 2019 को पाकिस्तान स्थित करतारपुर साहिब के लिए एक कॉरिडोर खुलवाया गया। लोगों की सहूलियत के लिए इस कॉरिडोर को वीजा मुक्त कर दिया गया।
हालाँकि, बीते कुछ समय से आतंकी मुल्क पाकिस्तान इस कॉरिडोर का उपयोग हमारे देश में अशांति फैलाने और अपना हित साधने के लिए उपयोग करने की कोशिश कर रहा है। श्रद्धालु के तौर पर जाने वाले कई लोगों को पाकिस्तान हमारे देश की खुफिया जानकारी निकालने के लिए एजेंट बनाता है। इन ‘ब्रेनवाश्ड’ लोगों में कई इन्फ्लूएंसर्स, ट्रैवल ब्लॉगर्स और पढ़ें लिखे लोग शामिल हैं।
उदाहरण के तौर पर ये जानकारी काफी है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद पिछले दो हफ्तों में 8 इंफ्लुएंसर्स को जासूसी करने के इल्जाम में गिरफ्तार किया जा चुका है। इस कड़ी में हरियाणा के कैथल से 25 साल के राजनीति विज्ञान के छात्र देवेंद्र सिंह ढिल्लों को ISI एजेंट के साथ पटियाला की सैन्य छावनी की कुछ संवेदनशील जानकारी साझा करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। वह सबसे पहले करतारपुर साहिब कॉरिडोर गया था। उसके बाद से ही उसने गुप्त जानकारियाँ साझा करनी शुरू की थी।
इसी तरह हरियाणा के हिसार में रहने वाली 33 साल की ट्रैवल ब्लॉगर ज्योति मल्होत्रा को 17 मार्च 2025 को पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। ज्योति भी करतारपुर साहिब गईं थी। वहाँ से वीडियो भी साझा की, जिसमें वह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे नवाज शरीफ की बेटी और पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज का इंटरव्यू करती दिख रही हैं।
इसके बाद ज्योति पर आरोप लगे शुरू हुए कि वह पाकिस्तान उच्च आयोग में रहकर ISI के लिए काम करने वाले एहसान उर रहीम उर्फ दानिश के साथ मिलकर भारत की जासूसी कर रही थी। उसके सोशल मीडिया हैंडल पर डाले गए वीडियो से यह भी सामने आया कि वह कई बार पाकिस्तान जा चुकी है और इंक्रिप्टेड एप्लीकेशंस के जरिए ISI हैंडलर्स के संपर्क में थी।
पंजाब के गुरदासपुर की सुखप्रीत सिंह को ISI एजेंट्स को ऑपरेशन सिंदूर के बारे में कई संवेदनशील जानकारियाँ साझा करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। उस पर ये भी आरोप था कि जानकारियाँ साझा करने के एवज में 1 लाख रुपए भी लिए थे।
करतारपुर साहिब कॉरिडोर के जरिए पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी भारतीय लोगों से संपर्क बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं। दिलचस्प बात यह है कि लोग भी अपने पूरे होश-ओ-हवास में पाकिस्तान को जानकारियाँ दे रहे हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने पहले ही दी थी चेतावनी
हालाँकि, करतारपुर कॉरिडोर को खोलने से पहले पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पाकिस्तान की मंशा पर पहले से ही शक जताया था।
करतारपुर साहिब गुरुद्वारा में कॉरिडोर खुलने से तो खुशी जताई थी, लेकिन उन्होंने यह भी कहा था कि इस कॉरिडोर को बिना किसी परेशानी के पाकिस्तान के खोलने के पीछे उसका ISI एजेंडा भी हो सकता है।
अमरिंदर सिंह ने यह भी कहा था कि पाकिस्तान द्वारा कॉरिडोर और गुरु नानक के नाम पर विश्वविद्यालय शुरू करने जैसे निर्णय भी संदेह करने वाले हैं। इन पर भारत को सतर्क और सक्रिय रहने की आवश्यकता है।
उन्होंने सरकार को चेताया था कि पाकिस्तान की छिपे हुए एजेंडे को ध्यान से परखने की जरूरत है। भारत को सिर्फ पाकिस्तान के सामने दिख रहे चेहरे पर ही विश्वास नहीं करना चाहिए बल्कि अन्य चीजों को भी समग्र तौर पर रखना चाहिए।
DGP के बयान पर तब मचा था बवाल, अब वही हो रहा सच
इसका एक और उदाहरण पंजाब के तत्कालीन DGP दिनकर गुप्ता ने भी दिया था। उन्होंने बिना वीजा के करतारपुर में एंट्री लेने पर भी सुरक्षा पर सवाल उठाया था। DGP के मुताबिक पाकिस्तान में कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो श्रद्धालुओं को रिझाने में लगे हुए हैं।
फरवरी 2020 में दिए गए डीजीपी दिनकर गुप्ता के उस बयान ने भी काफी हंगामा मचाया था, जिसमें उन्होंने कहा था, “करतारपुर में ऐसी क्षमता है कि अगर आप किसी साधारण श्रद्धालु को भी सुबह भेजते हैं तो शाम तक वह ट्रेंड आतंकी के तौर पर लौटता है। आपको वहाँ फायरिंग रेंज तक लेकर जाया जा सकता है। IED भी बनाना सिखाया जा सकता है।”
उस वक्त DGP के बयान से सिख समुदाय में काफी आक्रोश फैला था और लोगों ने निंदा की थी। हालाँकि, DGP का यह बयान एक तरह से अब सच्चाई बयान कर रहा है।
आस्था की जमीन पर पाकिस्तान के आतंकी ठिकाने
करतारपुर साहिब कॉरिडोर खुलने से पहले एक खुफिया रिपोर्ट सामने आई थी। इसमें कहा गया था कि पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के नारोवाल जिले में स्थित इस गुरुद्वारे के आसपास कई आतंकी कैंप चल रहे हैं। ये कैंप पाकिस्तानी पंजाब के मुरीदके, शाकरगढ़ और नारोवाल में हैं। कैंपों में काफी तादाद में पुरुष और महिला रहते हैं और ट्रेनिंग ले रहे हैं।
रिपोर्ट में आशंका जताई गई थी कि करतारपुर कॉरिडोर को ड्रग स्मगलर्स और देश विरोधी गतिविधियों में शामिल लोग पाकिस्तानी सिम कार्ड्स के जरिए इस्तमाल कर सकते हैं।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद पाकिस्तानी जासूसों की धर पकड़ तेज हो गई है। पकड़े गए जासूसों का कहीं न कहीं करतारपुर साहिब से कनेक्शन सामने आया है। इससे वे आशंंकाएँ सही साबित हो रही हैं, जिनमें करतारपुर साहिब कॉरिडोर का पाकिस्तान द्वारा दुरुपयोग की बात कही गई थी। भारत को इससे सबक लेने की जरूरत है।
ऐसा सिर्फ कॉन्ग्रेस पार्टी में ही हो सकता है, जहाँ राष्ट्रवाद के लिए दंडित किया जाता है। यहाँ नेताओं को उनकी साख, रिकॉर्ड, ‘नेशन फर्स्ट’ रखने पर दरकिनार कर दिया जाता है। कॉन्ग्रेस हाईकमान यानी गाँधी परिवार को खुश करने के लिए अपमानित भी किया जाता है।
पूर्व राजनयिक और कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर अब कॉन्ग्रेस में बेवजह गुस्से का शिकार हैं। उनका अपराध यह है कि थरूर ने वैश्विक स्तर पर भारत के आतंकवाद विरोधी रुख को स्पष्ट करने और ऑपरेशन सिंदूर के बारे में बताने के लिए सांसदों के एक बहुदलीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करने के लिए मोदी सरकार के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया।
गाँधी परिवार के वफादार कॉन्ग्रेसी अब पार्टी के अंदर इस बात पर गुस्से का इजहार कर रहे हैं कि आखिर क्यों शशि थरूर को केन्द्र ने बहुदलीय प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बनाया? शशि थरूर को केन्द्र सरकार ने विदेश भेजे जा रहे डेलिगेशन का नेतृत्व करने के लिए चुना है। उनका ग्रुप अमेरिका, पनामा, गुयाना, ब्राजील और कोलंबिया जाएगा। दरअसल, कॉन्ग्रेस के खफा होने की वजह ये है कि बहुदलीय प्रतिनिधिमंडल के लिए कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा सुझाए गए नामों में थरूर शामिल नहीं थे। कॉन्ग्रेस ने आनंद शर्मा, गौरव गोगोई, नासिर हुसैन और राजा बरार के नाम भेजे थे।
कॉन्ग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने 17 मई 2025 को कहा कि कॉन्ग्रेस पाकिस्तान से आतंकवाद पर भारत के रुख को स्पष्ट करने के लिए विदेश जा रहे सांसदों के रूप में अपने दिए गए चार सांसदों के नाम “नहीं बदलने जा रही है”।
जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि औपचारिक रूप से चार नाम दिए जाने के बावजूद सरकार ने उनमें से अधिकांश को नजरअंदाज कर दिया, जिससे संसदीय परंपराओं, विपक्ष- सत्तारूढ़ दल के बीच विश्वास को ठेस पहुँचा।
16 मई 2025 को केंद्रीय मंत्री किरन रिजिजू ने केंद्र सरकार की ओर से कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी से संपर्क किया और बहुदलीय संसदीय दल में शामिल होने के लिए पार्टी से चार नामों का अनुरोध किया। राहुल गाँधी ने उसी दिन दोपहर से पहले वरिष्ठ नेताओं आनंद शर्मा, गौरव गोगोई, नासिर हुसैन और राजा बरार का नाम भेजा। इस पर जयराम रमेश ने कहा, “सरकार ने कॉन्ग्रेस द्वारा सुझाए गए नामों में से केवल आनंद शर्मा को चुना और मामले का राजनीतिकरण किया।”
हालाँकि, कॉन्ग्रेस पार्टी को पहले यह जवाब देना चाहिए कि विदेशी मामलों की विशेषज्ञता रखने और पूर्व राजनयिक शशि थरूर को क्यों नजरअंदाज किया गया?
पार्टी से पहले राष्ट्र को प्राथमिकता देना और स्वतंत्र राय रखना कॉन्ग्रेस पार्टी को नागवार गुजर रहा है। कॉन्ग्रेस पार्टी ने भले ही शशि थरूर पर सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की ओर झुकाव रखने का आरोप नहीं लगाया है, लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने उन्हें ‘बीजेपी स्लीपिंग सेल’ कहा है। रिपोर्ट्स बताती है कि कॉन्ग्रेस हाईकमान थरूर को पार्टी से निकालने पर विचार कर रहा है। हालाँकि कॉन्ग्रेस ने इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है।
अब सवाल यह उठता है कि कॉन्ग्रेस पार्टी अपने उन नेताओं को क्यों नजरअंदाज करती है? जो मूल रूप से ‘दरबारियों’ की तरह काम नहीं करते हैं और बौद्धिक स्वतंत्रता बनाए रखना पसंद करते हैं। क्या यह इस डर की वजह से है कि ऐसे मजबूत नेता गाँधी परिवार को पीछे छोड़ सकते हैं या पार्टी में समानांतर सत्ता बना सकते हैं?
शशि थरूर की जगह राहुल गाँधी के वफादार गौरव गोगोई को चुनना, क्या उचित है? गाँधी परिवार के करीबी न होने के बावजूद शशि थरूर न केवल विदेशी मामलों में विशेषज्ञता रखने वाले अहम सासंद हैं, बल्कि संसद की विदेश मामलों की स्थायी समिति के अध्यक्ष भी हैं। कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा दरकिनार और अपमानित किए जाने के बावजूद शशि थरूर ने हार नहीं मानी।
उन्होंने कहा कि वे अपनी सौंपी गई जिम्मेदारियों को पूरी लगन से निभाएँगे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पार्टी नेतृत्व को अपनी राय रखने का अधिकार है, लेकिन उनकी प्रतिबद्धता अटल है। कॉन्ग्रेस की अधीनता के बजाए थरूर ने राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देने का फैसला किया और संदेश दिया कि वह ‘आसानी से अपमानित’ नहीं होंगे।
इस बीच, केरल कॉन्ग्रेस ने भी तिरुवनंतपुरम के सांसद के फैसले से खुद को अलग कर लिया है। केरल में विपक्ष के नेता वीडी सतीशन ने कहा कि थरूर कॉन्ग्रेस कार्यसमिति (CWC) के सदस्य हैं और उनके जैसे नेता पार्टी में मध्यम पायदान पर आते हैं। सतीशन ने कहा, “CWC का सदस्य होना महत्वपूर्ण है। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को इस मामले पर अपनी राय व्यक्त करनी चाहिए। उनका जो भी विचार होगा, हम उसे मानेंगे।”
केरल कॉन्ग्रेस के नेता सतीशन और मुरलीधरन ने थरूर द्वारा बहुदलीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करने के लिए केंद्र के आह्वान को तुरंत स्वीकार करने को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा बताया और थरूर के कद को कम करके यह सुझाव दिया कि उन्हें एक सांसद के रूप में अपने कर्तव्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
गौरतलब है कि थरूर पिछले कुछ वर्षों में कॉन्ग्रेस पार्टी की केरल इकाई द्वारा लगातार निशाने पर हैं। अप्रैल 2024 में कुछ कॉन्ग्रेसी कार्यकर्ताओं ने तिरुवनंतपुरम शहर के बलरामपुरम में एक चुनाव अभियान के दौरान अपने सांसद शशि थरूर को रोक दिया था। उन्होंने थरूर के खिलाफ ‘वापस जाओ’ और ‘तुम्हें वोट नहीं’ के नारे लगाए।
इससे पहले 2019 में वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता के मुरलीधरन ने शशि थरूर का मजाक उड़ाया और कहा कि “यह ‘ऑक्सफ़ोर्ड इंग्लिश’ नहीं बल्कि ‘मोदी विरोधी’ रुख है, जिसने पार्टी के नेतृत्व वाले मोर्चे को तिरुवनंतपुरम सीट जीतने में मदद की।” मुरलीधरन का यह बयान थरूर के उस बयान के कुछ दिनों बाद आया, जिसमें उन्होंने कहा था कि वह हमेशा से ही सही नीतिगत निर्णयों के लिए पीएम मोदी की प्रशंसा करने के पक्षधर रहे हैं। थरूर ने कहा था कि सही निर्णयों के लिए पीएम मोदी की प्रशंसा करने से विपक्ष की विश्वसनीयता भी बढ़ेगी।
हालाँकि कॉन्ग्रेस ने थरूर का नाम नहीं भेजा, जबकि वे संयुक्त राष्ट्र के पूर्व राजनयिक हैं और इस कार्य में उनकी विशेषज्ञता है। यह स्पष्ट हो गया कि थरूर की बौद्धिकता, वाकपटुता और स्वतंत्रता सोच पार्टी आलाकमान, खासकर गाँधी परिवार को पसंद नहीं है। पार्टी आलाकमान के करीबियों को ही यहाँ प्राथमिकता दी जाती है। कॉन्ग्रेस का ये दृष्टिकोण कोई नया नहीं है। कॉन्ग्रेस पार्टी में गाँधी परिवार के प्रति वफादारी हमेशा योग्यता पर भारी रही है। कॉन्ग्रेस पार्टी के कई वरिष्ठ और मजबूत नेताओं को सिर्फ इसलिए हार का सामना करना पड़ा क्योंकि उन्होंने गाँधी परिवार की अवहेलना करने की जुर्रत की और विभिन्न मुद्दों पर स्वतंत्र राय व्यक्त करने का साहस किया। हाल के वर्षों में शशि थरूर को लगातार अपनी ही पार्टी द्वारा निशाना बनाया गया, दरकिनार किया गया और अपमानित किया गया।
शशि थरूर ने गाँधी परिवार के वफादार खड़गे के खिलाफ लड़ा चुनाव
नवंबर 2022 में, थरूर को गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनावों के लिए स्टार प्रचारकों की सूची में जगह नहीं दी गई थी। लगभग उसी समय केरल कॉन्ग्रेस ने थरूर से खुद को दूर कर लिया था और कोझीकोड में एक RSS विरोधी सेमिनार की मेजबानी करने से पीछे हट गई थी, जहाँ कॉन्ग्रेस सांसद को अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। उस समय ऐसी खबरें आई थीं कि कॉन्ग्रेस नेतृत्व ने पार्टी की स्थानीय इकाइयों को शशि थरूर का कोई भी कार्यक्रम आयोजित न करने का अनाधिकारिक आदेश दिया था।
फरवरी 2025 में शशि थरूर ने पार्टी में अपनी भूमिका को लेकर असंतोष जताया था। उन्होंने पार्टी में दरकिनार किए जाने और संसद के अंदर प्रमुख बहसों में भाग लेने का अवसर न दिए जाने पर रोष व्यक्त करने के लिए राहुल गाँधी से मुलाकात की थी। हालाँकि, थरूर संतुष्ट नहीं हुए। थरूर का असंतोष ऑल इंडिया प्रोफेशनल कॉन्ग्रेस (AIPC) के प्रभार से हटाए जाने से भी पैदा हुआ। कॉन्ग्रेस पार्टी भी थरूर से तब से नाराज है, जब उन्होंने पार्टी के आधिकारिक रुख से हटकर प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा की प्रशंसा की थी।
पीएम मोदी की ट्रंप से मुलाकात के बारे में थरूर ने कहा, “मुझे लगता है कि यह बहुत अच्छा नतीजा है, क्योंकि अन्यथा, डर था कि वाशिंगटन में जल्दबाजी में कुछ फैसले लिए जा सकते हैं, जिससे हमारे निर्यात पर असर पड़ता। इस तरह, चर्चा और बातचीत के लिए समय है।”
कैप्टन अमरिंदर सिंह का कॉन्ग्रेस से बाहर निकलना
2021 में तत्कालीन पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने यह कहते हुए कॉन्ग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया था कि वह अपने साथ हुए अपमान को बर्दाश्त नहीं कर सकते। सिंह ने कॉन्ग्रेस छोड़ने का फैसला तब किया जब पार्टी ने उन्हें सूचित किए बिना पंजाब में कॉन्ग्रेस विधायक दल की बैठक बुलाई। इससे पहले पार्टी ने अमरिंदर सिंह की कड़ी आपत्तियों के बावजूद जुलाई 2021 में नवजोत सिंह सिद्धू को पंजाब कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष चुनकर उन्हें नकार दिया था।
कॉन्ग्रेस आलाकमान ने हिमंत बिस्वा सरमा को पार्टी छोड़ने पर किया मजबूर
सितंबर 2015 में कॉन्ग्रेस पार्टी ने असम से एक बेहतरीन नेता खो दिया, जब हिमंत बिस्वा सरमा ने कॉन्ग्रेस पार्टी से इस्तीफा देते हुए कहा कि पार्टी में ‘निरंकुश परिवार-केंद्रित’ राजनीति और ‘लोकतंत्र की कमी’ है।
सरमा ने कॉन्ग्रेस से इस्तीफा देते हुए कहा, “2012 से मैं देख रहा हूँ कि स्थिति बिगड़ती जा रही थी और राज्य नेतृत्व के उदासीन रवैये के कारण पार्टी सम्मान खो रही थी। तीसरी बार जीत सिर पर चढ़ गई थी और लोगों के लिए काम करने के प्रति करुणा और समर्पण की जगह अहंकार ने लेना शुरू कर दिया था। पार्टी नेतृत्व में आत्मसंतुष्टि और यथास्थितिवाद की भावना समा गई थी। चाटुकारों के एक समूह द्वारा लगातार प्रोत्साहित की जाने वाली निरंकुश परिवार-केंद्रित राजनीति ने कभी भी राज्य में कॉन्ग्रेस नेतृत्व तक तर्कसंगत और तटस्थ आवाज नहीं पहुँचने दी।”
हिमंत बिस्वा सरमा अब बीजेपी नेता और असम के लोकप्रिय सीएम हैं। पार्टी को लगातार दो चुनावी जीत दिलाने के बाद हिमंत ने एक अपमानजनक घटना को याद किया। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस के राजकुमार राहुल गाँधी ने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को अपने पालतू कुत्ते के साथ एक ही प्लेट में बिस्किट खाने को कहा था। राहुल के कुत्ते द्वारा अस्वीकार किए गए बिस्किट देने की घटना से वह काफी परेशान हो गए थे। एक एक्स पोस्ट का जवाब देते हुए हिमंता ने कहा कि वह एक स्वाभिमानी असमिया और भारतीय हैं। उन्होंने कहा कि वह एकमात्र कॉन्ग्रेस नेता थे, जिन्होंने कुत्ते के बिस्किट खाने से इनकार कर दिया और कॉन्ग्रेस से इस्तीफा दे दिया। यह घटना तब हुई जब सरमा ने असम की समस्याओं पर चर्चा करने के लिए 2016 के चुनावों के दौरान राहुल गाँधी से मुलाकात की।
2022 में सरमा ने एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्होंने “कॉन्ग्रेस में अपने जीवन के 22 साल बर्बाद कर दिए हैं”। कॉन्ग्रेस और भाजपा के बीच अंतर के बारे में बोलते हुए सरमा ने कहा, “कॉन्ग्रेस में हम एक परिवार की पूजा करते थे। भाजपा में हम देश की पूजा करते हैं।”
पार्टी आलाकमान से अलग राय रखने पर दरकिनार किए जाते हैं कॉन्ग्रेसी या उन्हें ‘संघी’ करार दिया जाता है
दिलचस्प बात यह है कि कॉन्ग्रेस पार्टी में बने हुए तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने कई मौकों पर ऐसे फैसले लिए हैं, जिससे पार्टी नेतृत्व को निराशा हुई है। चाहे वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को “बड़े भाई” कहना हो या “गुजरात मॉडल” की प्रशंसा करना हो। जब राहुल गाँधी बार-बार पीएम मोदी पर व्यवसायी गौतम अडानी के कथित क्रोनी कैपिटलिज्म में मिलीभगत का आरोप लगाते हुए हमला कर रहे थे, उस वक्त रेवंत रेड्डी विकास परियोजनाओं के लिए अडानी समूह के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर कर रहे थे।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान केंद्र और सशस्त्र बलों का समर्थन करने वाले रेड्डी ने कई बार स्वतंत्र रूप से काम किया है। हालाँकि, पार्टी नेता और समर्थकों ने उन्हें “संघी एजेंट” भी कहा। इसी तरह कॉन्ग्रेस नेता सचिन पायलट को भी गाँधी परिवार के वफादार और राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ मतभेदों के कारण कॉन्ग्रेस पार्टी ने दरकिनार कर दिया है।निकम्मा, गद्दार और न जाने क्या-क्या कहे जाने के बावजूद पायलट कॉन्ग्रेस में बने हुए हैं, हालाँकि उन्हें नजरअंदाज किया जाता है।
ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देवड़ा से लेकर कपिल सिब्बल तक कई कॉन्ग्रेस नेता, जो पार्टी में बड़े नेता बनने की क्षमता रखते थे। उन्हें दरकिनार कर दिया गया और आखिरकार उन्हें कॉन्ग्रेस छोड़नी पड़ी। पार्टी में साफतौर पर समझा जा सकता है कि जिस नेता के विचार पार्टी हाईकमान की लाइन से मेल नहीं खाता, वह दरकिनार रहेंगे। गुलाम नबी आज़ाद ने पार्टी में 50 से अधिक साल बिताने के बाद कॉन्ग्रेस छोड़ दी क्योंकि हाईकमान फीडबैक और आलोचना के प्रति उदासीन हो गया था।
अगस्त 2022 में कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आज़ाद ने 50 साल से ज़्यादा समय तक कॉन्ग्रेस पार्टी से जुड़े रहने के बाद इस्तीफ़ा दे दिया। अपने विदाई नोट में गुलाम नबी आज़ाद ने पार्टी के पतन के लिए कॉन्ग्रेस आलाकमान को जिम्मेदार ठहराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने कॉन्ग्रेस के वारिस राहुल गाँधी पर पार्टी के भीतर परामर्श तंत्र को अकेले ही नष्ट करने का आरोप लगाया। आजाद का कॉन्ग्रेस के प्रति असंतोष तब स्पष्ट हो गया, जब वे पिछले साल जम्मू में जी-23 असंतुष्ट समूह में शामिल हो गए। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी प्रशंसा की थी। उन्होंने अलग पार्टी बना ली।
कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए राष्ट्र नहीं, गाँधी परिवार सबसे पहले आता है। इस अघोषित नियम का उल्लंघन करने वाले को या तो तिरस्कार, अपमान और ‘भाजपा एजेंट’ अथवा संघी करार दिया जाता है या पार्टी से सीधे निष्कासित कर दिया जाता है। जाहिर है गाँधी परिवार अपने वरिष्ठ पार्टी नेताओं को अपनी बौद्धिक स्वतंत्रता की आजादी देकर नियंत्रण खोने का जोखिम नहीं उठाना चाहता।
नेपाल बॉर्डर से सटे उत्तर प्रदेश के जिलों में योगी सरकार ने एक बड़ा अभियान छेड़ा हुआ है। इसके तहत अवैध मस्जिदों और मदरसों पर कार्रवाई की जा रही है। हाल ही में 7 जिलों में 225 गैरकानूनी मदरसों को हटाया गया है। साथ ही अवैध रूप से चल रही 30 मस्जिदें, 25 मजारें और छह ईदगाह भी ध्वस्त की गई हैं।
ये सभी कार्रवाई नेपाल की सीमा से सटे महाराजगंज, सिद्धार्थनगर, बलरामपुर, श्रावस्ती, बहराइच, लखीमपुर खीरी और पीलीभीत में हुई है। सभी अवैध जमीनों पर बने मदरस, मस्जिद, मजार और ईदगाह को बुलडोजर से ढहा दिया गया। इनमें सबसे अधिक मदरसे श्रावस्ती जिले में पाए गए हैं। पीलीभीत में अवैध मस्जिद मिली।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 14 मई 2025 को महाराजगंज में 29 मदरसे, 9 मस्जिद, 7 मजार और एक ईदगाह पर कार्रवाई हुई। सिद्धार्थनगर में 35 मदरसों और 9 मस्जिदों को जमींदोज कर दिया गया। बलरामपुर जिले में 30 मदरसा, 10 मजार और 1 ईदगाह को चिन्हित किया।
इसी के साथ श्रावस्ती में सबसे ज्यादा 110 अवैध मदरसों पर सरकार का चाबुक चला। जिले में 1 मस्जिद, 5 मजार और 2 ईदगाह पर भी कार्रवाई हुई। बहारइच में 13 मदरसे, 8 मस्जिद, 2 मजार और 1 ईदगाह को ध्वस्त किया गया। लखीमपुर खीरी में 8 मदरसे, 2 मस्जिद, 1 मजार और 1 ईदगाह पर बुलडोजर कार्ऱवाई की गई। वहीं, पीलीभीत में केवल 1 अवैध मस्जिद को नष्ट कर दिया गया।
अधिकारियों के अनुसार, यह अभियान अवैध अतिक्रमण को हटाने और सीमा क्षेत्र में सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से चलाया जा रहा है। सरकार का कहना है कि यह कार्रवाई अवैध अतिक्रमण को हटाने, सरकारी और वन भूमि को मुक्त कराने के लिए की जा रही है। यह कदम भूमि उपयोग नियमों और स्थानीय प्रशासन के नियमों को लागू करने का हिस्सा है।
बता दें कि अप्रैल 2025 में भी योगी सरकार ने इन इलाकों में बुलजोडर चलाया था, जिसमें 17 मदरसों को सील करते हुए 89 अवैध निर्माणों को समतल कर दिया था।
गौरतलब है कि ऑपइंडिया ने नेपाल-उत्तर प्रदेश की सीमा पर डेमोग्राफी में बदलाव और लैंड-जिहाद पर सिलसिलेवार रिपोर्ट प्रकाश की थी।