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पाकिस्तान में जहाँ मरियम से मिली ज्योति, वहीं पाकिस्तानी युवती ने हुस्न के जाल में देवेंद्र को फँसाया: क्या जासूसों की बहाली के लिए करतारपुर कॉरिडोर का इस्तेमाल कर रहा ISI?

भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहाँ कई धर्म, संस्कृति और सभ्यताओं का मेल एक ही जगह पर आसानी से दिख जाता है। सनातन हो या सिख, सभी एक दूजे के धर्मों के दिल से सम्मान करते हैं और उनके पूजनीयों में अपनी अटूट आस्था भी रखते हैं। यही वजह है कि इन दोनों धर्मों के तीर्थ स्थलों पर श्रद्धालुओं में इस बात का फर्क कर पाना मुश्किल है कि कौन सा इंसान किस धर्म से है?

इस कड़ी में श्रद्धालुओं की आस्था बरकरार रखने के लिए भारत ने पाकिस्तान के साथ बातचीत की और कोविड महामारी के बाद 09 नवंबर 2019 को पाकिस्तान स्थित करतारपुर साहिब के लिए एक कॉरिडोर खुलवाया गया। लोगों की सहूलियत के लिए इस कॉरिडोर को वीजा मुक्त कर दिया गया।

हालाँकि, बीते कुछ समय से आतंकी मुल्क पाकिस्तान इस कॉरिडोर का उपयोग हमारे देश में अशांति फैलाने और अपना हित साधने के लिए उपयोग करने की कोशिश कर रहा है। श्रद्धालु के तौर पर जाने वाले कई लोगों को पाकिस्तान हमारे देश की खुफिया जानकारी निकालने के लिए एजेंट बनाता है। इन ‘ब्रेनवाश्ड’ लोगों में कई इन्फ्लूएंसर्स, ट्रैवल ब्लॉगर्स और पढ़ें लिखे लोग शामिल हैं।

उदाहरण के तौर पर ये जानकारी काफी है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद पिछले दो हफ्तों में 8 इंफ्लुएंसर्स को जासूसी करने के इल्जाम में गिरफ्तार किया जा चुका है। इस कड़ी में हरियाणा के कैथल से 25 साल के राजनीति विज्ञान के छात्र देवेंद्र सिंह ढिल्लों को ISI एजेंट के साथ पटियाला की सैन्य छावनी की कुछ संवेदनशील जानकारी साझा करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। वह सबसे पहले करतारपुर साहिब कॉरिडोर गया था। उसके बाद से ही उसने गुप्त जानकारियाँ साझा करनी शुरू की थी।

इसी तरह हरियाणा के हिसार में रहने वाली 33 साल की ट्रैवल ब्लॉगर ज्योति मल्होत्रा को 17 मार्च 2025 को पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। ज्योति भी करतारपुर साहिब गईं थी। वहाँ से वीडियो भी साझा की, जिसमें वह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे नवाज शरीफ की बेटी और पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज का इंटरव्यू करती दिख रही हैं।

इसके बाद ज्योति पर आरोप लगे शुरू हुए कि वह पाकिस्तान उच्च आयोग में रहकर ISI के लिए काम करने वाले एहसान उर रहीम उर्फ दानिश के साथ मिलकर भारत की जासूसी कर रही थी। उसके सोशल मीडिया हैंडल पर डाले गए वीडियो से यह भी सामने आया कि वह कई बार पाकिस्तान जा चुकी है और इंक्रिप्टेड एप्लीकेशंस के जरिए ISI हैंडलर्स के संपर्क में थी।

पंजाब के गुरदासपुर की सुखप्रीत सिंह को ISI एजेंट्स को ऑपरेशन सिंदूर के बारे में कई संवेदनशील जानकारियाँ साझा करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। उस पर ये भी आरोप था कि जानकारियाँ साझा करने के एवज में 1 लाख रुपए भी लिए थे।

करतारपुर साहिब कॉरिडोर के जरिए पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी भारतीय लोगों से संपर्क बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं। दिलचस्प बात यह है कि लोग भी अपने पूरे होश-ओ-हवास में पाकिस्तान को जानकारियाँ दे रहे हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने पहले ही दी थी चेतावनी

हालाँकि, करतारपुर कॉरिडोर को खोलने से पहले पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पाकिस्तान की मंशा पर पहले से ही शक जताया था।

करतारपुर साहिब गुरुद्वारा में कॉरिडोर खुलने से तो खुशी जताई थी, लेकिन उन्होंने यह भी कहा था कि इस कॉरिडोर को बिना किसी परेशानी के पाकिस्तान के खोलने के पीछे उसका ISI एजेंडा भी हो सकता है।

अमरिंदर सिंह ने यह भी कहा था कि पाकिस्तान द्वारा कॉरिडोर और गुरु नानक के नाम पर विश्वविद्यालय शुरू करने जैसे निर्णय भी संदेह करने वाले हैं। इन पर भारत को सतर्क और सक्रिय रहने की आवश्यकता है।

उन्होंने सरकार को चेताया था कि पाकिस्तान की छिपे हुए एजेंडे को ध्यान से परखने की जरूरत है। भारत को सिर्फ पाकिस्तान के सामने दिख रहे चेहरे पर ही विश्वास नहीं करना चाहिए बल्कि अन्य चीजों को भी समग्र तौर पर रखना चाहिए।

DGP के बयान पर तब मचा था बवाल, अब वही हो रहा सच

इसका एक और उदाहरण पंजाब के तत्कालीन DGP दिनकर गुप्ता ने भी दिया था। उन्होंने बिना वीजा के करतारपुर में एंट्री लेने पर भी सुरक्षा पर सवाल उठाया था। DGP के मुताबिक पाकिस्तान में कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो श्रद्धालुओं को रिझाने में लगे हुए हैं।

फरवरी 2020 में दिए गए डीजीपी दिनकर गुप्ता के उस बयान ने भी काफी हंगामा मचाया था, जिसमें उन्होंने कहा था, “करतारपुर में ऐसी क्षमता है कि अगर आप किसी साधारण श्रद्धालु को भी सुबह भेजते हैं तो शाम तक वह ट्रेंड आतंकी के तौर पर लौटता है। आपको वहाँ फायरिंग रेंज तक लेकर जाया जा सकता है। IED भी बनाना सिखाया जा सकता है।”

उस वक्त DGP के बयान से सिख समुदाय में काफी आक्रोश फैला था और लोगों ने निंदा की थी। हालाँकि, DGP का यह बयान एक तरह से अब सच्चाई बयान कर रहा है।

आस्था की जमीन पर पाकिस्तान के आतंकी ठिकाने

करतारपुर साहिब कॉरिडोर खुलने से पहले एक खुफिया रिपोर्ट सामने आई थी। इसमें कहा गया था कि पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के नारोवाल जिले में स्थित इस गुरुद्वारे के आसपास कई आतंकी कैंप चल रहे हैं। ये कैंप पाकिस्तानी पंजाब के मुरीदके, शाकरगढ़ और नारोवाल में हैं। कैंपों में काफी तादाद में पुरुष और महिला रहते हैं और ट्रेनिंग ले रहे हैं।

रिपोर्ट में आशंका जताई गई थी कि करतारपुर कॉरिडोर को ड्रग स्मगलर्स और देश विरोधी गतिविधियों में शामिल लोग पाकिस्तानी सिम कार्ड्स के जरिए इस्तमाल कर सकते हैं।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद पाकिस्तानी जासूसों की धर पकड़ तेज हो गई है। पकड़े गए जासूसों का कहीं न कहीं करतारपुर साहिब से कनेक्शन सामने आया है। इससे वे आशंंकाएँ सही साबित हो रही हैं, जिनमें करतारपुर साहिब कॉरिडोर का पाकिस्तान द्वारा दुरुपयोग की बात कही गई थी। भारत को इससे सबक लेने की जरूरत है।

क्या गाँधी परिवार का ‘गुरूर’ बचाने को शशि थरूर की कुर्बानी देगी कॉन्ग्रेस?

ऐसा सिर्फ कॉन्ग्रेस पार्टी में ही हो सकता है, जहाँ राष्ट्रवाद के लिए दंडित किया जाता है। यहाँ नेताओं को उनकी साख, रिकॉर्ड, ‘नेशन फर्स्ट’ रखने पर दरकिनार कर दिया जाता है। कॉन्ग्रेस हाईकमान यानी गाँधी परिवार को खुश करने के लिए अपमानित भी किया जाता है।

पूर्व राजनयिक और कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर अब कॉन्ग्रेस में बेवजह गुस्से का शिकार हैं। उनका अपराध यह है कि थरूर ने वैश्विक स्तर पर भारत के आतंकवाद विरोधी रुख को स्पष्ट करने और ऑपरेशन सिंदूर के बारे में बताने के लिए सांसदों के एक बहुदलीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करने के लिए मोदी सरकार के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया।

गाँधी परिवार के वफादार कॉन्ग्रेसी अब पार्टी के अंदर इस बात पर गुस्से का इजहार कर रहे हैं कि आखिर क्यों शशि थरूर को केन्द्र ने बहुदलीय प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बनाया? शशि थरूर को केन्द्र सरकार ने विदेश भेजे जा रहे डेलिगेशन का नेतृत्व करने के लिए चुना है। उनका ग्रुप अमेरिका, पनामा, गुयाना, ब्राजील और कोलंबिया जाएगा। दरअसल, कॉन्ग्रेस के खफा होने की वजह ये है कि बहुदलीय प्रतिनिधिमंडल के लिए कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा सुझाए गए नामों में थरूर शामिल नहीं थे। कॉन्ग्रेस ने आनंद शर्मा, गौरव गोगोई, नासिर हुसैन और राजा बरार के नाम भेजे थे।

कॉन्ग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने 17 मई 2025 को कहा कि कॉन्ग्रेस पाकिस्तान से आतंकवाद पर भारत के रुख को स्पष्ट करने के लिए विदेश जा रहे सांसदों के रूप में अपने दिए गए चार सांसदों के नाम “नहीं बदलने जा रही है”।

जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि औपचारिक रूप से चार नाम दिए जाने के बावजूद सरकार ने उनमें से अधिकांश को नजरअंदाज कर दिया, जिससे संसदीय परंपराओं, विपक्ष- सत्तारूढ़ दल के बीच विश्वास को ठेस पहुँचा।

16 मई 2025 को केंद्रीय मंत्री किरन रिजिजू ने केंद्र सरकार की ओर से कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी से संपर्क किया और बहुदलीय संसदीय दल में शामिल होने के लिए पार्टी से चार नामों का अनुरोध किया। राहुल गाँधी ने उसी दिन दोपहर से पहले वरिष्ठ नेताओं आनंद शर्मा, गौरव गोगोई, नासिर हुसैन और राजा बरार का नाम भेजा। इस पर जयराम रमेश ने कहा, “सरकार ने कॉन्ग्रेस द्वारा सुझाए गए नामों में से केवल आनंद शर्मा को चुना और मामले का राजनीतिकरण किया।”

हालाँकि, कॉन्ग्रेस पार्टी को पहले यह जवाब देना चाहिए कि विदेशी मामलों की विशेषज्ञता रखने और पूर्व राजनयिक शशि थरूर को क्यों नजरअंदाज किया गया?

पार्टी से पहले राष्ट्र को प्राथमिकता देना और स्वतंत्र राय रखना कॉन्ग्रेस पार्टी को नागवार गुजर रहा है। कॉन्ग्रेस पार्टी ने भले ही शशि थरूर पर सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की ओर झुकाव रखने का आरोप नहीं लगाया है, लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने उन्हें ‘बीजेपी स्लीपिंग सेल’ कहा है। रिपोर्ट्स बताती है कि कॉन्ग्रेस हाईकमान थरूर को पार्टी से निकालने पर विचार कर रहा है। हालाँकि कॉन्ग्रेस ने इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है।

अब सवाल यह उठता है कि कॉन्ग्रेस पार्टी अपने उन नेताओं को क्यों नजरअंदाज करती है? जो मूल रूप से ‘दरबारियों’ की तरह काम नहीं करते हैं और बौद्धिक स्वतंत्रता बनाए रखना पसंद करते हैं। क्या यह इस डर की वजह से है कि ऐसे मजबूत नेता गाँधी परिवार को पीछे छोड़ सकते हैं या पार्टी में समानांतर सत्ता बना सकते हैं?

शशि थरूर की जगह राहुल गाँधी के वफादार गौरव गोगोई को चुनना, क्या उचित है? गाँधी परिवार के करीबी न होने के बावजूद शशि थरूर न केवल विदेशी मामलों में विशेषज्ञता रखने वाले अहम सासंद हैं, बल्कि संसद की विदेश मामलों की स्थायी समिति के अध्यक्ष भी हैं। कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा दरकिनार और अपमानित किए जाने के बावजूद शशि थरूर ने हार नहीं मानी।

उन्होंने कहा कि वे अपनी सौंपी गई जिम्मेदारियों को पूरी लगन से निभाएँगे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पार्टी नेतृत्व को अपनी राय रखने का अधिकार है, लेकिन उनकी प्रतिबद्धता अटल है। कॉन्ग्रेस की अधीनता के बजाए थरूर ने राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देने का फैसला किया और संदेश दिया कि वह ‘आसानी से अपमानित’ नहीं होंगे।

इस बीच, केरल कॉन्ग्रेस ने भी तिरुवनंतपुरम के सांसद के फैसले से खुद को अलग कर लिया है। केरल में विपक्ष के नेता वीडी सतीशन ने कहा कि थरूर कॉन्ग्रेस कार्यसमिति (CWC) के सदस्य हैं और उनके जैसे नेता पार्टी में मध्यम पायदान पर आते हैं। सतीशन ने कहा, “CWC का सदस्य होना महत्वपूर्ण है। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को इस मामले पर अपनी राय व्यक्त करनी चाहिए। उनका जो भी विचार होगा, हम उसे मानेंगे।”

केरल कॉन्ग्रेस के नेता सतीशन और मुरलीधरन ने थरूर द्वारा बहुदलीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करने के लिए केंद्र के आह्वान को तुरंत स्वीकार करने को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा बताया और थरूर के कद को कम करके यह सुझाव दिया कि उन्हें एक सांसद के रूप में अपने कर्तव्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

गौरतलब है कि थरूर पिछले कुछ वर्षों में कॉन्ग्रेस पार्टी की केरल इकाई द्वारा लगातार निशाने पर हैं। अप्रैल 2024 में कुछ कॉन्ग्रेसी कार्यकर्ताओं ने तिरुवनंतपुरम शहर के बलरामपुरम में एक चुनाव अभियान के दौरान अपने सांसद शशि थरूर को रोक दिया था। उन्होंने थरूर के खिलाफ ‘वापस जाओ’ और ‘तुम्हें वोट नहीं’ के नारे लगाए।

इससे पहले 2019 में वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता के मुरलीधरन ने शशि थरूर का मजाक उड़ाया और कहा कि “यह ‘ऑक्सफ़ोर्ड इंग्लिश’ नहीं बल्कि ‘मोदी विरोधी’ रुख है, जिसने पार्टी के नेतृत्व वाले मोर्चे को तिरुवनंतपुरम सीट जीतने में मदद की।” मुरलीधरन का यह बयान थरूर के उस बयान के कुछ दिनों बाद आया, जिसमें उन्होंने कहा था कि वह हमेशा से ही सही नीतिगत निर्णयों के लिए पीएम मोदी की प्रशंसा करने के पक्षधर रहे हैं। थरूर ने कहा था कि सही निर्णयों के लिए पीएम मोदी की प्रशंसा करने से विपक्ष की विश्वसनीयता भी बढ़ेगी।

हालाँकि कॉन्ग्रेस ने थरूर का नाम नहीं भेजा, जबकि वे संयुक्त राष्ट्र के पूर्व राजनयिक हैं और इस कार्य में उनकी विशेषज्ञता है। यह स्पष्ट हो गया कि थरूर की बौद्धिकता, वाकपटुता और स्वतंत्रता सोच पार्टी आलाकमान, खासकर गाँधी परिवार को पसंद नहीं है। पार्टी आलाकमान के करीबियों को ही यहाँ प्राथमिकता दी जाती है। कॉन्ग्रेस का ये दृष्टिकोण कोई नया नहीं है। कॉन्ग्रेस पार्टी में गाँधी परिवार के प्रति वफादारी हमेशा योग्यता पर भारी रही है। कॉन्ग्रेस पार्टी के कई वरिष्ठ और मजबूत नेताओं को सिर्फ इसलिए हार का सामना करना पड़ा क्योंकि उन्होंने गाँधी परिवार की अवहेलना करने की जुर्रत की और विभिन्न मुद्दों पर स्वतंत्र राय व्यक्त करने का साहस किया। हाल के वर्षों में शशि थरूर को लगातार अपनी ही पार्टी द्वारा निशाना बनाया गया, दरकिनार किया गया और अपमानित किया गया।

शशि थरूर ने गाँधी परिवार के वफादार खड़गे के खिलाफ लड़ा चुनाव

नवंबर 2022 में, थरूर को गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनावों के लिए स्टार प्रचारकों की सूची में जगह नहीं दी गई थी। लगभग उसी समय केरल कॉन्ग्रेस ने थरूर से खुद को दूर कर लिया था और कोझीकोड में एक RSS विरोधी सेमिनार की मेजबानी करने से पीछे हट गई थी, जहाँ कॉन्ग्रेस सांसद को अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। उस समय ऐसी खबरें आई थीं कि कॉन्ग्रेस नेतृत्व ने पार्टी की स्थानीय इकाइयों को शशि थरूर का कोई भी कार्यक्रम आयोजित न करने का अनाधिकारिक आदेश दिया था।

फरवरी 2025 में शशि थरूर ने पार्टी में अपनी भूमिका को लेकर असंतोष जताया था। उन्होंने पार्टी में दरकिनार किए जाने और संसद के अंदर प्रमुख बहसों में भाग लेने का अवसर न दिए जाने पर रोष व्यक्त करने के लिए राहुल गाँधी से मुलाकात की थी। हालाँकि, थरूर संतुष्ट नहीं हुए। थरूर का असंतोष ऑल इंडिया प्रोफेशनल कॉन्ग्रेस (AIPC) के प्रभार से हटाए जाने से भी पैदा हुआ। कॉन्ग्रेस पार्टी भी थरूर से तब से नाराज है, जब उन्होंने पार्टी के आधिकारिक रुख से हटकर प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा की प्रशंसा की थी।

पीएम मोदी की ट्रंप से मुलाकात के बारे में थरूर ने कहा, “मुझे लगता है कि यह बहुत अच्छा नतीजा है, क्योंकि अन्यथा, डर था कि वाशिंगटन में जल्दबाजी में कुछ फैसले लिए जा सकते हैं, जिससे हमारे निर्यात पर असर पड़ता। इस तरह, चर्चा और बातचीत के लिए समय है।”

कैप्टन अमरिंदर सिंह का कॉन्ग्रेस से बाहर निकलना

2021 में तत्कालीन पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने यह कहते हुए कॉन्ग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया था कि वह अपने साथ हुए अपमान को बर्दाश्त नहीं कर सकते। सिंह ने कॉन्ग्रेस छोड़ने का फैसला तब किया जब पार्टी ने उन्हें सूचित किए बिना पंजाब में कॉन्ग्रेस विधायक दल की बैठक बुलाई। इससे पहले पार्टी ने अमरिंदर सिंह की कड़ी आपत्तियों के बावजूद जुलाई 2021 में नवजोत सिंह सिद्धू को पंजाब कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष चुनकर उन्हें नकार दिया था।

कॉन्ग्रेस आलाकमान ने हिमंत बिस्वा सरमा को पार्टी छोड़ने पर किया मजबूर

सितंबर 2015 में कॉन्ग्रेस पार्टी ने असम से एक बेहतरीन नेता खो दिया, जब हिमंत बिस्वा सरमा ने कॉन्ग्रेस पार्टी से इस्तीफा देते हुए कहा कि पार्टी में ‘निरंकुश परिवार-केंद्रित’ राजनीति और ‘लोकतंत्र की कमी’ है।

सरमा ने कॉन्ग्रेस से इस्तीफा देते हुए कहा, “2012 से मैं देख रहा हूँ कि स्थिति बिगड़ती जा रही थी और राज्य नेतृत्व के उदासीन रवैये के कारण पार्टी सम्मान खो रही थी। तीसरी बार जीत सिर पर चढ़ गई थी और लोगों के लिए काम करने के प्रति करुणा और समर्पण की जगह अहंकार ने लेना शुरू कर दिया था। पार्टी नेतृत्व में आत्मसंतुष्टि और यथास्थितिवाद की भावना समा गई थी। चाटुकारों के एक समूह द्वारा लगातार प्रोत्साहित की जाने वाली निरंकुश परिवार-केंद्रित राजनीति ने कभी भी राज्य में कॉन्ग्रेस नेतृत्व तक तर्कसंगत और तटस्थ आवाज नहीं पहुँचने दी।”

हिमंत बिस्वा सरमा अब बीजेपी नेता और असम के लोकप्रिय सीएम हैं। पार्टी को लगातार दो चुनावी जीत दिलाने के बाद हिमंत ने एक अपमानजनक घटना को याद किया। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस के राजकुमार राहुल गाँधी ने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को अपने पालतू कुत्ते के साथ एक ही प्लेट में बिस्किट खाने को कहा था। राहुल के कुत्ते द्वारा अस्वीकार किए गए बिस्किट देने की घटना से वह काफी परेशान हो गए थे। एक एक्स पोस्ट का जवाब देते हुए हिमंता ने कहा कि वह एक स्वाभिमानी असमिया और भारतीय हैं। उन्होंने कहा कि वह एकमात्र कॉन्ग्रेस नेता थे, जिन्होंने कुत्ते के बिस्किट खाने से इनकार कर दिया और कॉन्ग्रेस से इस्तीफा दे दिया। यह घटना तब हुई जब सरमा ने असम की समस्याओं पर चर्चा करने के लिए 2016 के चुनावों के दौरान राहुल गाँधी से मुलाकात की।

2022 में सरमा ने एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्होंने “कॉन्ग्रेस में अपने जीवन के 22 साल बर्बाद कर दिए हैं”। कॉन्ग्रेस और भाजपा के बीच अंतर के बारे में बोलते हुए सरमा ने कहा, “कॉन्ग्रेस में हम एक परिवार की पूजा करते थे। भाजपा में हम देश की पूजा करते हैं।”

पार्टी आलाकमान से अलग राय रखने पर दरकिनार किए जाते हैं कॉन्ग्रेसी या उन्हें ‘संघी’ करार दिया जाता है

दिलचस्प बात यह है कि कॉन्ग्रेस पार्टी में बने हुए तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने कई मौकों पर ऐसे फैसले लिए हैं, जिससे पार्टी नेतृत्व को निराशा हुई है। चाहे वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को “बड़े भाई” कहना हो या “गुजरात मॉडल” की प्रशंसा करना हो। जब राहुल गाँधी बार-बार पीएम मोदी पर व्यवसायी गौतम अडानी के कथित क्रोनी कैपिटलिज्म में मिलीभगत का आरोप लगाते हुए हमला कर रहे थे, उस वक्त रेवंत रेड्डी विकास परियोजनाओं के लिए अडानी समूह के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर कर रहे थे।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान केंद्र और सशस्त्र बलों का समर्थन करने वाले रेड्डी ने कई बार स्वतंत्र रूप से काम किया है। हालाँकि, पार्टी नेता और समर्थकों ने उन्हें “संघी एजेंट” भी कहा। इसी तरह कॉन्ग्रेस नेता सचिन पायलट को भी गाँधी परिवार के वफादार और राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ मतभेदों के कारण कॉन्ग्रेस पार्टी ने दरकिनार कर दिया है।निकम्मा, गद्दार और न जाने क्या-क्या कहे जाने के बावजूद पायलट कॉन्ग्रेस में बने हुए हैं, हालाँकि उन्हें नजरअंदाज किया जाता है।

ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देवड़ा से लेकर कपिल सिब्बल तक कई कॉन्ग्रेस नेता, जो पार्टी में बड़े नेता बनने की क्षमता रखते थे। उन्हें दरकिनार कर दिया गया और आखिरकार उन्हें कॉन्ग्रेस छोड़नी पड़ी। पार्टी में साफतौर पर समझा जा सकता है कि जिस नेता के विचार पार्टी हाईकमान की लाइन से मेल नहीं खाता, वह दरकिनार रहेंगे। गुलाम नबी आज़ाद ने पार्टी में 50 से अधिक साल बिताने के बाद कॉन्ग्रेस छोड़ दी क्योंकि हाईकमान फीडबैक और आलोचना के प्रति उदासीन हो गया था।

अगस्त 2022 में कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आज़ाद ने 50 साल से ज़्यादा समय तक कॉन्ग्रेस पार्टी से जुड़े रहने के बाद इस्तीफ़ा दे दिया। अपने विदाई नोट में गुलाम नबी आज़ाद ने पार्टी के पतन के लिए कॉन्ग्रेस आलाकमान को जिम्मेदार ठहराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने कॉन्ग्रेस के वारिस राहुल गाँधी पर पार्टी के भीतर परामर्श तंत्र को अकेले ही नष्ट करने का आरोप लगाया। आजाद का कॉन्ग्रेस के प्रति असंतोष तब स्पष्ट हो गया, जब वे पिछले साल जम्मू में जी-23 असंतुष्ट समूह में शामिल हो गए। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी प्रशंसा की थी। उन्होंने अलग पार्टी बना ली।

कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए राष्ट्र नहीं, गाँधी परिवार सबसे पहले आता है। इस अघोषित नियम का उल्लंघन करने वाले को या तो तिरस्कार, अपमान और ‘भाजपा एजेंट’ अथवा संघी करार दिया जाता है या पार्टी से सीधे निष्कासित कर दिया जाता है। जाहिर है गाँधी परिवार अपने वरिष्ठ पार्टी नेताओं को अपनी बौद्धिक स्वतंत्रता की आजादी देकर नियंत्रण खोने का जोखिम नहीं उठाना चाहता।

225 मदरसा, 30 मस्जिद, 25 मजार, 06 ईदगाह… नेपाल से सटे 7 जिलों में योगी सरकार का चला बुलडोजर, 286 अवैध ढाँचे समतल: डेमोग्राफी-लैंड जिहाद को ऑपइंडिया ने किया था उजागर

नेपाल बॉर्डर से सटे उत्तर प्रदेश के जिलों में योगी सरकार ने एक बड़ा अभियान छेड़ा हुआ है। इसके तहत अवैध मस्जिदों और मदरसों पर कार्रवाई की जा रही है। हाल ही में 7 जिलों में 225 गैरकानूनी मदरसों को हटाया गया है। साथ ही अवैध रूप से चल रही 30 मस्जिदें, 25 मजारें और छह ईदगाह भी ध्वस्त की गई हैं।

ये सभी कार्रवाई नेपाल की सीमा से सटे महाराजगंज, सिद्धार्थनगर, बलरामपुर, श्रावस्ती, बहराइच, लखीमपुर खीरी और पीलीभीत में हुई है। सभी अवैध जमीनों पर बने मदरस, मस्जिद, मजार और ईदगाह को बुलडोजर से ढहा दिया गया। इनमें सबसे अधिक मदरसे श्रावस्ती जिले में पाए गए हैं। पीलीभीत में अवैध मस्जिद मिली।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 14 मई 2025 को महाराजगंज में 29 मदरसे, 9 मस्जिद, 7 मजार और एक ईदगाह पर कार्रवाई हुई। सिद्धार्थनगर में 35 मदरसों और 9 मस्जिदों को जमींदोज कर दिया गया। बलरामपुर जिले में 30 मदरसा, 10 मजार और 1 ईदगाह को चिन्हित किया।

इसी के साथ श्रावस्ती में सबसे ज्यादा 110 अवैध मदरसों पर सरकार का चाबुक चला। जिले में 1 मस्जिद, 5 मजार और 2 ईदगाह पर भी कार्रवाई हुई। बहारइच में 13 मदरसे, 8 मस्जिद, 2 मजार और 1 ईदगाह को ध्वस्त किया गया। लखीमपुर खीरी में 8 मदरसे, 2 मस्जिद, 1 मजार और 1 ईदगाह पर बुलडोजर कार्ऱवाई की गई। वहीं, पीलीभीत में केवल 1 अवैध मस्जिद को नष्ट कर दिया गया।

अधिकारियों के अनुसार, यह अभियान अवैध अतिक्रमण को हटाने और सीमा क्षेत्र में सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से चलाया जा रहा है। सरकार का कहना है कि यह कार्रवाई अवैध अतिक्रमण को हटाने, सरकारी और वन भूमि को मुक्त कराने के लिए की जा रही है। यह कदम भूमि उपयोग नियमों और स्थानीय प्रशासन के नियमों को लागू करने का हिस्सा है।

बता दें कि अप्रैल 2025 में भी योगी सरकार ने इन इलाकों में बुलजोडर चलाया था, जिसमें 17 मदरसों को सील करते हुए 89 अवैध निर्माणों को समतल कर दिया था।

गौरतलब है कि ऑपइंडिया ने नेपाल-उत्तर प्रदेश की सीमा पर डेमोग्राफी में बदलाव और लैंड-जिहाद पर सिलसिलेवार रिपोर्ट प्रकाश की थी।

60 JCB, 40 क्रेन, 3000 पुलिस… ‘मिनी बांग्लादेश’ में चला गुजरात सरकार का बुलडोजर, 2.5 लाख वर्ग मीटर जमीन होगा मुक्त: चंडोला तालाब को घुसपैठियों ने बना लिया था अड्डा

अहमदाबाद के चंडोला तालाब क्षेत्र में बसे अवैध बांग्लादेशियों को हटाने के लिए बुलडोजर एक्शन शुरू हो चुका है। मंगलवार (20 मई 2025) की तड़के 6 बजे से ही अतक्रमण हटाने का काम तेजी से शुरू हो चुका है।

ईसानपुर क्षेत्र में स्थित सूर्यनगर पुलिस चौकी से मीरा सिनेमा की ओर जाने वाले सड़क पर सभी अवैध मकानों को ध्वस्त किया जा रहा है। इस जगह पर इससे पहले भी अतिक्रमण हटाने का एक्शन किया जा चुका है।

चंडोला तालाब के पास अवैध रूप से रहने वाले बांग्लादेशियों की इतनी तादाद है कि इस जगह को ‘मिनी बांग्लादेश’ के नाम से भी बुलाया जाने लगा है। यहाँ पर अवैध बस्तियों के ध्वस्तीकरण का मंगलवार (20 मई 2025) को दूसरा चरण शुरू हो गया है। धवस्तीकरण की प्रक्रिया में सुरक्षा के लिहाज से 3000 पुलिस वालों की तैनाती की गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अहमदाबाद नगर निगम (AMC) ने ध्वस्तीकरण के लिए अपनी पूरी तैयारी की है। 60 जेसीबी, 40 क्रेन मशीनें लगाई गई हैं। इससे पहले, प्रथम चरण में 1.5 लाख वर्ग मीटर जमीन पर बने अतिक्रमण को ध्वस्त किया हगया था। दूसरे चरण में 2.5 लाख वर्ग मीटर जमीन को साफ करने का लक्ष्य AMC ने तय किया है। इसके तहत 8000 अवैध घर ध्वस्त हो सकते हैं।

250 बांग्लादेशी पकड़े गए, इनमें 207 चंडोला से

अहमदाबाद के पुलिस आयुक्त जीएस मलिक ने इस कार्रवाई को लेकर जानकारी दी। उन्होंने बताया कि चंडोला तालाब काफी समय से बांग्लादेशियों के अवैध रूप से बसने का अड्डा बन चुका है।

2025 में अहमदाबाद से 250 बांग्लादेशी नागरिक पकड़े गए थे, जिनमें से 207 केवल चंडोला क्षेत्र से थे। चंडोला से हर वर्ष लगभग 10 से 40 बांग्लादेशी घुसपैठिए पकड़े जाते हैं।

मलिक ने आगे बताया कि दूसरे चरण की कार्रवाई के लिए एक संयुक्त आयुक्त, एक अतिरिक्त आयुक्त, 6 डीसीपी और पीआई समेत कुल लगभग 3000 पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं।

पुलिस के साथ साथ 25 SRPF कंपनियाँ भी लगाई गई हैं। साथ ही पूरे एक्शन पर नजर बनाए रखने के लिए ड्रोन का उपयोग भी किया जा रहा है।

अनुमान लगाया जा रहा है कि ये बुलडोजर एक्शन लगभग तीन-चार दिन तक चलेगा। ऐसे में पुलिस और प्रशासन पूरी तैयारी करके वहाँ पर तैनात है। हालाँकि अगर समय बढ़ता है तो भी पुलिस पूरी तरह तैयार है।

कानूनी प्रक्रिया में पहुँचे घुसपैठिए

गौरतलब है कि चंडोला ध्वस्तीकरण की कार्रवाई सरकार ने योजनाबद्ध तरीके से शुरू की है। हालाँकि इसे रोकने के लिए कई घुसपैठियों के समर्थक हाईकोर्ट तक पहुंच गए थे, लेकिन हाईकोर्ट ने इस कार्रवाई को रोकने से मना कर दिया। इससे पहले हजारों की संख्या में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों को भी गिरफ्तार किया गया था।

कौन हैं मोहिनी मोहन दत्ता जिनके लिए ₹588 करोड़ की प्रॉपर्टी छोड़कर गए हैं रतन टाटा: पहले वसीयत पर उठाया सवाल, अब किया स्वीकार

भारत के सबसे सफल कारोबारियों में से एक रतन टाटा अपनी मृत्यु से पहले अपने शुभचिंतकों और परिवार को अपनी कमाई हुई दौलत को बाँट गए। इसमें एक नाम मोहिनी मोहन दत्ता का भी है।

दत्ता को रतन की वसीयत में 588 करोड़ रुपए मिले। ये रतन की कमाई का लगभग एक तिहाई हिस्सा है। लोगों के मन में सवाल हैं कि अचानक इतनी बड़ी रकम का उत्तराधिकार पाने वाले व्यक्ति मोहिनी मोहन दत्ता आखिर कौन हैं।

रतन टाटा की वसीयत में हर उस शख्स का नाम शामिल है जिसने उनके जीवन के किसी भी समय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन्हीं में से एक नाम है मोहिनी मोहन दत्ता। सुनने में ये नाम भले ही एक महिला का लगता हो लेकिन असल में ये रतन टाटा के 60 साल पुराने और अजीज पुरुष मित्र हैं।

मोहिनी मोहन दत्ता हैं कौन

मोहिनी मोहन दत्ता जमशेदपुर में एक उद्यमी हैं। वर्तमान में उनकी आयु 77 वर्ष है। रतन टाटा से उनकी दोस्ती तब हुई जब दत्ता की उम्र 13 वर्ष थी और रतन 25 वर्ष के थे। उसके बाद से उन दोनों ने एक दूसरे का साथ नहीं छोड़ा।

रिपोर्ट्स की मानें तो दत्ता कहते हैं कि टाटा ने ही उनके करियर को ऊँचाई तक पहुँचाने में मदद की। ताज होटल से ही करियर शुरू कर 1986 में उन्होंने ताज इंडस्ट्रीज से फंडिंग ली और अपनी कंपनी स्टैलियन ट्रैवल एजेंसी शुरू की।

2006 से इस कंपनी की टाटा समूह के साथ साझेदारी थी। कंपनी में दत्ता की साझेदारी 80% और टाटा इंडस्ट्रीज के पास 20% हिस्सा था। दत्ता की बेटी ने भी टाटा समूह के साथ कई वर्षों तक काम किया।

रिपोर्ट्स के अनुसार, दत्ता को ताज होटल्स ग्रुप को निदेशक की जिम्मेदारी भी दी गई। 2013 में स्टैलियन का ताज ग्रुप ऑफ होटल्स की सहायक कंपनी ताज सर्विसेज में विलय हो गया।

मोहन को क्यों थी वसीयत से परेशानी

मोहिनी मोहन दत्ता ने रतन की वसीयत में अपना हिस्सा अस्वीकार कर दिया था। उनका कहना था कि उनके लिए रतन ने जितनी रकम लिखी है वह काफी अधिक है। इसके बाद परिवार और वकीलों की बात मानने के बाद उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया। उनके इसे स्वीकार करने के बाद ही वसीयत को कानूनी मान्यता दिलाने के लिए प्रोबेट की प्रक्रिया में तेजी आएगी। प्रोबेट प्रक्रिया के लिए 27 मार्च को ही कोर्ट में याचिका डाल दी गई थी।

प्रोबेट प्रक्रिया से पहले सवाल उठाने के बाद वसीयत के नियम ‘नौ कॉन्टेस्ट क्लॉज’ के तहत मोहिनी मोहन दत्ता को टाटा की संपत्ति में अब लगभग 200 करोड़ रुपये मिलेंगे। इस नियम के अनुसार, कोई भी व्यक्ति वसीयत को कोर्ट में चुनौती नहीं दे सकता। अगर वह ऐसा करता है तो वह वसीयत से जुड़े सभी अधिकार खो देगा।

वसीयत में कितना हिस्सा किसको

रतन टाटा की मृत्यु 9 अक्तूबर 2024 को हुई थी। इसके बाद उनकी वसीयत को उनके परिवार और दोस्तों समेत सभी के सामने पढ़ा गया।

इकोनॉमिक टाइम्स‘ की रिपोर्ट के अनुसार, रतन टाटा ने अपनी ₹10 हजार करोड़ की संपत्ति करीब दो दर्जन लोगों में बाँटी है। रतन टाटा ने अपनी संपत्ति का लगभग एक तिहाई हिस्सा, यानी लगभग 3800 करोड़ रुपए दान कर दिए हैं। इसके अलावा ‘रतन टाटा एडोमेंट फाउंडेशन’ (RTEF) जैसी चैरिटी संगठनों के लिए भी अपनी व्यक्तिगत संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा रतन टाटा ने दिया है। इसमें ‘टाटा संस’ की 0.82% हिस्सेदारी शामिल है।

रतन टाटा की संपत्ति के बँटवारे के लिए प्रोबेट की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। प्रोबेट का अर्थ है कि मृत व्यक्ति की वसीयत की वैधता को न्यायालय में प्रमाणित करना और उसके बाद वसीयत के अनुसार संपत्ति के लिए नामित व्यक्ति को उसका अधिकार देना। 

रतन के अविवाहित भी जिम को जुहू बँगले का एक हिस्सा दिया गया है। इसके अलावा सौतेली बहन शिरीन और डिनना जेजीभॉय को एक अन्य वित्तीय संपत्ति के तहत लगभग 800 करोड़ रुपए की वैल्यू के बैंक की FD व पेंटिंग्स समेत अन्य चीजें मिली हैं।

सौतेले भाई नोएल टाटा को ‘टाटा ट्रस्ट’ का चेयरमैन बनाया गया है। इसके अलावा रतन टाटा के सबसे करीबी सहयोगी और दोस्त शांतनु नायडू को स्टार्टअप ‘गुडफेलोज’ में टाटा की हिस्सेदारी मिली है। रतन टाटा की सेक्रेटरी दिलनाज गिल्डर को ₹10 लाख रुपए मिलेंगे।

पालतू जानवर को भी मिली संपत्ति

रतन टाटा की संपत्ति में से उनके रसोइए सुब्बैया को ₹30 लाख मिलेंगे, वहीं रसोई के ही राजन शॉ और उनके परिवार के लिए ₹50 लाख की राशि नामित की गई है। राजन को ही पालतू कुत्ते टीटो की देखभाल का जिम्मा भी दिया है। इसके अलावा ₹12 लाख रुपए की राशि उनके सभी पालतू जानवरों की देखभाल के लिए दिए हैं। इसमें से हर तीन महीने ₹30 हजार रुपए का खर्च निर्धारित किया गया है।

इस्लामी हिंसा ने शरणार्थी बनाया, मिशनरी ताक़तों ने मार डाला… जब त्रिपुरा के बागबेर में हुआ हिन्दुओं का नरसंहार, चर्चों के पैसे से पलता था NLFT

सभ्यताओं की कहानियाँ केवल उनके भव्य स्थापत्य, वैज्ञानिक आविष्कारों या सांस्कृतिक उपलब्धियों से नहीं बनतीं, बल्कि वे उन जख्मों से भी आकार लेती हैं, जो समय ने उनके शरीर और आत्मा पर छोड़े। वे उन पीड़ाओं से भी लिखी जाती हैं, जो पीढ़ियों ने सहन कीं। उन अत्याचारों से भी गढ़ी जाती हैं, जिन पर उन्होंने मौन रखा, और उस सहिष्णुता की अग्नि से भी तपती हैं, जो बार-बार परीक्षा की वेदी पर चढ़ाई जाती है।

हिन्दू संस्कृति की गाथा भी उन्हीं पीड़ाओं और अत्याचारों से भरी हुई है। ऐसी ही अनेकों अनकही पीड़ाओं की श्रृंखला में एक त्रासदी आती है—बागबेर नरसंहार। 

समृद्ध त्रिपुरा के दामन पर लगा वो घाव

त्रिपुरा एक समय एक समृद्ध राजशाही था। भारतीय उपमहाद्वीप में सांस्कृतिक समरसता का प्रतीक माना जाता था। लेकिन, 1949 में भारत में विलय के बाद वहाँ की जनसांख्यिकी में बड़ा परिवर्तन हुआ। स्वतंत्रता के पश्चात पूर्वी पाकिस्तान से आए लाखों बंगाली हिंदुओं ने त्रिपुरा में शरण ली। इन प्रवासियों के बसने से जनसंख्या अनुपात में भारी बदलाव आया और स्थानीय ईसाई समुदायों के भीतर असुरक्षा की भावना पनपी। धीरे-धीरे इस असुरक्षा को संगठित रूप से भुनाया गया और राजनीतिक-सांस्कृतिक आंदोलन शुरू हुए।

इन्हीं आंदोलनों के चरम रूप के रूप में NLFT (नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा) जैसे उग्रवादी संगठनों का जन्म हुआ, जो इस सांस्कृतिक बदलाव को हिंसा के जरिए पलटना चाहते थे। यह केवल उग्रवाद नहीं था, यह एक छटपटाती अस्मिता की मजहबी उन्माद में बदल चुकी प्रतिक्रिया थी, जिसका सबसे बड़ा शिकार वे लोग बने, जो सबसे कम दोषी थे।

20 मई, 2000 को त्रिपुरा के पश्चिमी हिस्से में स्थित बागबेर गाँव में एक भयावह त्रासदी घटित हुई। नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (NLFT) के लगभग 60 सशस्त्र उग्रवादियों ने बागबेर गाँव पर हमला किया, जिसमें 25 निर्दोष बंगाली हिंदू मारे गए। 

बागबेर नरसंहार में मारे गए 25 लोगों में महिलाएँ, बच्चे और बुजुर्ग शामिल थे। वे सभी बंगाली हिंदू थे, जो पहले से ही हिंसा से पीड़ित थे और शरणार्थी शिविर में शरण लिए हुए थे। उनकी कहानियाँ त्रासदी, पीड़ा और अन्याय की गवाह हैं। उनकी मौतें न केवल उनकी व्यक्तिगत हानि थीं, बल्कि एक समुदाय की सामूहिक पीड़ा का प्रतीक थीं। इस नरसंहार ने त्रिपुरा में लंबे समय से चल रहे जातीय संघर्ष और उग्रवाद की भयावहता को उजागर किया। संख्याएँ कभी भी पूरी सच्चाई नहीं कहतीं। ‘25 लोग मारे गए’— यह वाक्य एक कागज पर लिखी गई एक पंक्ति हो सकती है, लेकिन उसके पीछे की पीड़ा समुद्र से भी गहरी है। जो 25 लोग मरे, वो कोई गुंडे या फिर आतंकवादी नहीं थे, वो सिर्फ हिन्दू थे, जिनका ‘धर्म’ गलत समय, गलत जगह पर था।

चर्च और विदेशी मिशनरियों की छतरी तले पला-बढ़ा NLFT

बागबेर नरसंहार केवल एक हिंसक घटना नहीं थी; यह एक संस्कृति पर हमला था। यह एक प्रकार का लक्षित नरसंहार था, जिसे हिन्दुओं को लक्षित करके अंजाम दिया गया। जिन हिन्दुओं को मारा गया, वे कोई हथियारबंद सैनिक नहीं थे, न ही किसी ‘विचारधारा’ के प्रचारक थे। वे आम लोग थे, बच्चे थे, महिलाएँ थीं, मजदूर थे। उन्हें सिर्फ और सिर्फ इसलिए मारा गया क्योंकि वे हिंदू थे। हिन्दुओं को लक्षित करके सिर्फ सरकार को ही नहीं बल्कि हिन्दू पहचान को भी NLFT द्वारा संदेश भेजा गया।

NLFT एक ईसाई उग्रवादी संगठन था। इसका समर्थन कई चर्चों और विदेशी मिशनरी नेटवर्क से होता था। वे त्रिपुरा को एक स्वतंत्र ईसाई मुल्क बनाना चाहते थे। NLFT की विचारधारा ईसाई कट्टरवाद और हिंदू विरोध पर आधारित थी। उनका उद्देश्य त्रिपुरा को एक ऐसा स्वतंत्र ईसाई राष्ट्र बनाना था, जिसमें बंगाली हिंदुओं के लिए कोई स्थान नहीं था। उन्होंने जबरन धर्मांतरण, हिंसा और आतंक के माध्यम से अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयास किया। बागबेर नरसंहार उसी विचारधारा का एक क्रूर उदाहरण था। बागबेर में उनकी ‘मजहबी आकांक्षा’ निर्दोष हिंदुओं की हत्या के रूप में प्रकट हुई।

कई पोर्टल्स पर इस बात को उल्लेखित किया गया है कि बागबेर नरसंहार के दौरान, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के जवान गाँव के पास ही तैनात थे, लेकिन उन्होंने हमले के दौरान कोई हस्तक्षेप नहीं किया। यह निष्क्रियता राज्य की विफलता को दर्शाती है, जो अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में असमर्थ था। यह घटना हिन्दू समाज के लंबे समय से चले आ रहे उस प्रश्न को भी मुखर करती है, कि क्या हिन्दुओं को आत्मरक्षा की ओर मुड़ जाना चाहिए?

बागबेर नरसंहार के बाद, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इस घटना को अपेक्षित कवरेज नहीं मिला। यह चुप्पी पीड़ितों के प्रति एक पूरे इकोसिस्टम की उदासीनता को दर्शाती है। जब किसी समुदाय की पीड़ा को नजरअंदाज किया जाता है, तो यह अन्याय को और बढ़ावा देता है। इस घटना ने मीडिया की भूमिका और उसकी जिम्मेदारियों पर भी सवाल उठाए। 

त्रिपुरा का बागबेर नरसंहार: अन्यायों को भुलाइए मत

बागबेर का सबसे बड़ा अपमान यह नहीं था कि वहाँ निर्दोष मारे गए, बल्कि यह था कि उस त्रासदी को राष्ट्रीय स्मृति से ही विस्थापित कर दिया गया। वह घटना जिसे इतिहास में दर्ज होना चाहिए था, एक पूरे समुदाय की चेतना का हिस्सा बनना चाहिए था, उसे या तो जानबूझकर दबा दिया गया या चुप्पी की चादर ओढ़ा दी गई। बागबेर केवल एक गाँव नहीं था, वह एक घाव था, जो धार्मिक हिंसा के प्रति ‘सलेक्टिव सेंसिटिविटी’ का शिकार होता रहा है।

बागबेर नरसंहार हमें केवल अतीत की एक घटना नहीं बताता, वह हमें वर्तमान की आत्मा पर लगे उस धब्बे की ओर भी इंगित करता है जिसे हम अनदेखा करते आए हैं। इतिहास गवाह है कि जिन अन्यायों को भुला दिया गया, वे लौटे—और हर बार अधिक क्रूर रूप में लौटे।

इसलिए, बागबेर को केवल याद करना ही पर्याप्त नहीं है, उसे जिम्मेदारी के साथ स्मरण करना होगा। पीड़ितों की स्मृति को जीवित रखना केवल एक मानवीय कर्तव्य नहीं है, यह सभ्यता की आत्मरक्षा भी है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसी घटनाएँ भविष्य में न दोहराई जाएँ—ना विचारधारा के नाम पर, ना पहचान के नाम पर, और ना ही मजहब के नाम पर।

अगर ज्योति मल्होत्रा मुसलमान होती… आज शोर मचाने वाले ‘इकोसिस्टम’ ही डाल रहा होता पर्दा, खेल रहा होता विक्टिम कार्ड

भारत में बीते कुछ दिनों में कम से कम 19 जासूस पकड़े गए हैं। इनमें से एक नाम ज्योति मल्होत्रा का है। इस नाम को लेकर वामपंथी और सेकुलर जमात सोशल मीडिया पर ये प्रोपेगेंडा चला रहा है कि अगर ज्योति मल्होत्रा की जगह किसी मुस्लिम की गिरफ्तारी होती, तो नरेटिव अलग होता। हालाँकि ये वो एक नाम है, जिसकी आड़ में कथित सेकुलर और इस्लामी कट्टरपंथियों ने सोशल मीडिया पर ये ट्रेंड चलाने की कोशिश की कि गद्दारों का कोई मजहब नहीं होता।

इस प्रोपेगेंडा में बताया जा रहा है कि ज्योति मल्होत्रा की गिरफ्तारी पर हिंदू कुछ नहीं बोल रहे हैं। जबकि ये पूरी तरह से गलत है। बहुसंख्यक जमात न सिर्फ ज्योति मल्होत्रा के कारनामों को सामने ला रहा है, बल्कि उसकी प्रोफाइल से लेकर उसके सारे टूर तक पर शक की नजर डाल रहा है। यही बहुसंख्यक समुदाय ही ज्योति मल्होत्रा की पूरी कुंडली खंगाल रहा है।

सबसे पहले तो मैं आपको बता दूँ कि बीते कुछ दिनों में करीब 19 जासूसों के पकड़े जाने की जानकारियाँ मेरे पास आई। कितनों के साथ पूछताछ जारी है और जाने कितने अभी सुरक्षा एजेंसियों के रडार में हैं, वो बात छोड़ ही दीजिए। इन 19 नामों में सिर्फ 1 नाम ज्योति मल्होत्रा का ऐसा मिला है, जिसका कोई हिंदू बचाव तो करता नहीं मिला, बल्कि इस्लामी कट्टरपंथी उसकी आड़ में अपने ‘उम्माह भाईयों और बहनों’ को बचाने की कोशिश करते दिख रहे हैं।

सबसे पहले तो आप उन 19 जासूसों के नाम और धर्म जान लीजिए… जिसमें से 15 मुस्लिम – जाफर हुसैन, मोहम्मद अरमान, नोमान ईलाही, मोहम्मद जुबैर, मोहम्मद यासमीन, गजाला खातून, नसरीना बानो, मोहम्मद रकीब, आरिफ खान, रकीब खान, अरशद खान, मोफिजुल इस्लाम, सादिक खान और 2 अन्य हैं। कुछ और मामले छूट भी गए होंगे। वहीं, इन 19 में 2 ईसाई भी हैं, जिनके नाम पलक शेर मसीह और सूरज मसीह हैं। दोनों पंजाब के रहने वाले वाले हैं।

एक हरियाणा का सिख-देवेंद्र सिंह ढिल्लों है, जो पंजाब के पटियाला में रहता था और आखिरी नाम ज्योति मल्होत्रा नाम की हिंदू का है। कथित तौर पर ये भी बताया जा रहा है कि ज्योति अपने पाकिस्तानी हैंडसर के ‘प्यार’ में पड़कर खुद मुस्लिम बन चुकी है और निकाह भी कर चुकी है। ऐसे तमाम मीडिया रिपोर्ट्स इन दावों को लेकर हैं।

बहरहाल, ज्योति मल्होत्रा की आड़ में जो प्रोपेगेंडा सेकुलरों और इस्लामी कट्टरपंथियों ने शुरू किया, उसके कुछ नमूने देख लीजिए। कविश अजीज नाम की कथित पत्रकार ने एक्स पर लिखा, “एक मामूली सी यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा मरियम नवाज शरीफ से मिलती है और उनका इंटरव्यू भी ले लेती है। सोचिए ज्योति की जगह अगर जीनत या जुबेदा होती तो गोदी मीडिया कलेजा पीट पीट कर भारत के मुसलमान के खिलाफ अपने स्टूडियो में बैठकर नफरत परोस रहे होते.. देश के कई हिस्सों में मुसलमानों को तंग भी किया जाने लगता।”

खुद को पत्रकार बताने वाला मोहम्मद असगर भी हिंदू और सिख जासूसों की तस्वीर पोस्ट करके ऐसे ही सवाल पूछ रहा है। उसने लिखा, “आज दो पाकिस्तानी जासूस पकड़े गए! एक का नाम- ज्योति मल्होत्रा दूसरे का नाम- देवेंद्र सिंह अब कोई नहीं पूछेगा धर्म? न देशभक्ति पर सवाल, न बुलडोजर, न टीवी डिबेट! क्या गद्दारी का धर्म होता है सिर्फ़ मुसलमान?”

कॉन्ग्रेसी और कथित सेकुलर नेता सुरेंद्र राजपूत भी यही सवाल पूछता दिखा। उसने एक्स पर लिखा, “हरियाणा की यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा पाकिस्तान की जासूस निकली! ये नाम अगर किसी मुसलमान का होता तो सारी भाजपा और सारा नोएडा मीडिया चीख रहा होता!” सुरेंद्र राजपूत की लाइन पर कई सेकुलर लोग ऐसे सवाल पूछते दिखे।

बहरहाल, हिंदू बहुसंख्यक होते हुए भी कोई ज्योति मल्होत्रा के समर्थन में नहीं आया। न ही ज्योति मल्होत्रा नाम की पाकिस्तानी जासूस के लिए बहुसंख्यक हिंदुओं ने ‘बेचारगी’ जताई, न ही उसके साथ कोई सहानुभूति दिखाई। न ही बहुसंख्यक समाज ने सामाजिक पहल करते हुए किसी तरह का वकील मुहैया कराया और ही उसके लिए कानूनी लड़ाई लड़ने का ऐलान किया।

लेकिन दूसरी तरफ मुस्लिम चाहे वो आतंकवादी ही क्यों न हो, भले ही वो कमलेश तिवारी का गला रेतने वाला सैयद आसिम अली ही क्यों न हो, उसके लिए यही मुस्लिम उम्माह खड़ा हो जाता है। वो सुप्रीम कोर्ट तक चुनाव लड़ता है। इसी तरह, आतंकवाद के आरोप में पकड़े गए युवकों के लिए जमीयत उलेमा-ए-हिंद जैसी संस्थाएँ कानूनी लड़ाई लड़ती नजर आईं।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने कई बार आतंकवाद के आरोपियों के लिए मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान की है। उदाहरण के लिए, 2006 के मुंबई ट्रेन बम विस्फोटों के आरोपियों और 2010 के वाराणसी बम धमाकों के संदिग्धों के लिए जमीयत ने वकील उपलब्ध कराए। संगठन का दावा है कि वह ‘न्याय’ के लिए लड़ रहा है।

यही मुस्लिम उम्माह बड़े बड़े वकीलों को हायर करता है और सुप्रीम कोर्ट को आधी रात को काम पर लगा देता है। आपको याद होगा इस्लामिक आतंकी और गैंगस्तर याकूब मेनन का मामला, जिसे मुंबई धमाकों के लिए फाँसी की सजा सुनाई गई थी, लेकिन उसके मामले की सुनवाई के लिए आधी रात को न सिर्फ सुप्रीम कोर्ट खुली, बल्कि पूरी बहस भी हुई।

बात नरेटिव बनाने की हो, तो संसद हमले के मामले में फाँसी की सजा पाए अफजल गुरु के मामले को कौन भूल सकता है, जिसके लिए ‘मास्टर का बेटा’ जैसे भावुक नरेटिव चलाए गए। आज भी कट्टरपंथियों में अफजल गुरु को लेकर भावुकता दिखती है।

ये सारे मामले तो पुराने हुए, अभी बोकारो में एक मुस्लिम युवक की रेप की कोशिश के दौरान हत्या हुई, तो पूरा इस्लामी जमात न सिर्फ उसके समर्थन में खड़ा हो गया, बल्कि कॉन्ग्रेस-जेएमएम जैसी कथित सेकुलर ताकतें भी उसके लिए खड़ी हो गई। सिद्दीकी समाज ने पैसे भी इकट्ठे करके दिए।

खुद कॉन्ग्रेस का मुस्लिम विधायक और मंत्री रेप की कोशिश करने वाले अब्दुल के दरवाजे तक गए और सोशल मीडिया पर उसके लिए न्याय भी माँगा गया। जबकि इस मामले के असली पीड़ित एसटी परिवार के दरवाजे तक भी कोई नहीं गया, बल्कि उस परिवार के लोग सलाखों के पीछे हैं।

हालाँकि ज्योति मल्होत्रा का मामला न केवल भारत की सुरक्षा के लिए एक चेतावनी है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे सोशल मीडिया का इस्तेमाल धार्मिक और सामाजिक ध्रुवीकरण के लिए किया जा सकता है। ऑपरेशन सिंदूर ने देश के अंदर और बाहर दुश्मनों को बेनकाब किया, लेकिन ज्योति के मामले ने एक नया प्रोपेगेंडा शुरू कर दिया।

इस्लामी कट्टरपंथी और सेकुलर ताकतों ने इस मामले को हिंदुओं के खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश की। 19 जासूसों की सूची में केवल एक हिंदू नाम होने के बावजूद, इस्लामी कट्टरपंथी ताकतों ने इसे मुस्लिम समुदाय के बचाव के लिए इस्तेमाल किया। ऐसे में भारत को न केवल बाहरी खतरों से, बल्कि आंतरिक प्रोपेगेंडा और ध्रुवीकरण से भी सतर्क रहने की जरूरत है।

चीन से सटकर उछल रहा था बांग्लादेश, भारत ने दे दिया ₹6415 करोड़ का झटका: जानिए यूनुस सरकार की नीतियों से कारोबारी संबंधों को कैसे पहुँचा नुकसान

बांग्लादेश से आने वाले कई उत्पादों पर भारत ने पाबंदियाँ लगाई है। एक रिपोर्ट के अनुसार इससे बांग्लादेश को करीब 770 मिलियन डॉलर (करीब 6415 करोड़ रुपए) का आर्थिक नुकसान हो सकता है।

इसका सबसे अधिक प्रभाव बांग्लादेश के गारमेंट और प्रोसेस्ड फूड आइटम्स के उद्योग पर पड़ेगा। इस्लामी सरकार के नेतृत्व में गंभीर आर्थिक चुनौतियों और आंतरिक अस्थिरता से जूझ रहे बांग्लादेश के लिए यह किसी झटके से कम नहीं है।

भारत की पाबंदियों से बांग्लादेश को हजारों करोड़ का झटका

बिजनेस थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की 18 मई 2025 को प्रकाशित रिपोर्ट में भारत की ओर से लगाई गई पाबंदियों से बांग्लादेश को यह नुकसान होने का अनुमान लगाया गया है। यह​ उसके कुल आयात का करीब 42% है। इन पाबंदियों के तहत कई उत्पादों का कारोबार अब सड़क मार्ग की जगह केवल ​निश्चित किए बंदरगाहों तक सीमित कर दिया गया है।

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) के निर्देश पर 18 मई 2025 से बांग्लादेश से आयातित कई श्रेणियों के सामानों पर तत्काल बंदरगाह प्रतिबंध लागू कर दिए हैं। इस निर्णय के तहत प्रमुख वस्तुएँ जैसे वस्त्र, तैयार खाद्य पदार्थ, प्लास्टिक और पीवीसी उत्पाद, और लकड़ी का फर्नीचर अब केवल चुनिंदा समुद्री बंदरगाहों से ही भारत में आ सकेंगे, जबकि भूमि मार्गों से इनका आयात पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है।

नई नीति के अनुसार, बांग्लादेश से आने वाले कपड़े जो करीब 618 मिलियन डॉलर (करीब 5130 करोड़ रुपए) के होते हैं, अब केवल दो बंदरगाहों के जरिए ही भारत में लाए जा सकेंगे। इनके सड़क मार्ग से आयात पर पाबंदी लगा दी गई है। इसी तरह की पाबंदी फूड प्रोसेस्ड आयटम, फ्रूट ड्रिंक्स, कार्बोनेटेड ड्रिंक्स, कपास और अन्य प्रसंस्कृत उत्पादों पर भी लगाई गई है।

विस्तृत अधिसूचना के अनुसार, बांग्लादेश से रेडीमेड गारमेंट्स का आयात अब किसी भी सड़क मार्ग से नहीं होगा। इनका आयात अब केवल मुंबई के न्हावा शेवा और कोलकाता के समुद्री बंदरगाहों से ही होगा।

इसके अतिरिक्त असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के किसी भी भूमि सीमा शुल्क स्टेशन (एलसीएस)/एकीकृत चेक पोस्ट (आईसीपी), तथा पश्चिम बंगाल में चंगराबांधा और फुलबारी के एलसीएस के माध्यम से फ्रूट्स ड्रिंक, कार्बोनेटेड पेय, बेक्ड सामान, स्नैक्स, चिप्स, कन्फेक्शनरी, कपास और सूती धागे, प्लास्टिक, पीवीसी और लकड़ी का फर्नीचर आयात करने पर पाबंदी लगाई गई है।

भारत के साथ कारोबारी संबंधों से ही बांग्लादेश के बदले थे हालात

उल्लेखनीय है कि भारतीय कपड़ा निर्माता लंबे समय से इस बात को लेकर चिंतित रहे हैं कि बांग्लादेशी प्रतिस्पर्धियों को अनुचित लाभ मिल रहा है। उन्हें चीन से बिना शुल्क के कपड़ा आयात और सरकारी निर्यात सब्सिडी का फायदा मिलता है, जिससे वे भारतीय बाजार में 10-15% तक सस्ती दरों पर सामान बेच पाते हैं।

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने नई पाबंदी इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखकर लगाए हैं। ये प्रतिबंध चीन की ओर बांग्लादेश के बढ़ते कूटनीतिक झुकाव के प्रति भारत की प्रतिक्रिया भी है।

इस साल फरवरी में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केंद्रीय बजट में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए कपड़ा मंत्रालय के बजट में 19% की वृद्धि की थी, जिससे उद्योग को महत्वपूर्ण प्रोत्साहन मिला है। वित्त वर्ष 2024-25 के 4417.03 करोड़ रुपए की तुलना में अब मंत्रालय को 5272 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। इसके साथ ही सरकार ने कपास उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए 5 वर्षीय कपास मिशन शुरू करने की घोषणा भी की है।

पूर्व में बांग्लादेश कपड़ों का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक था, लेकिन वहाँ का कपड़ा क्षेत्र इस समय वित्तीय संकट, बिजली की कमी और बढ़ती हिंसा जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। शेख हसीना सरकार के पतन के बाद स्थिति और अधिक खराब हो गई है। इस पृष्ठभूमि में भारत के पास अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन, इटली और नीदरलैंड जैसे प्रमुख बाजारों में कपास और वस्त्र निर्यात बढ़ाने का मौका है। ऐसे में भारत उन सभी रणनीतिक कदमों को अपना रहा है, जिनसे बांग्लादेश से हट रहे वैश्विक व्यापार को अपनी तरफ किया जा सके।

बांग्लादेश का झुकाव चीन की तरफ, भारत ने आयात पर लगाई पाबंदी

भारत द्वारा बांग्लादेशी सामानों पर पाबंदी लगाने के फैसले को बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस की विवादास्पद टिप्पणी की प्रतिक्रिया के रूप में भी देखा जा रहा है। चीन में दिए गए एक भाषण के दौरान यूनुस ने भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को लैंड लॉक्ड बताते हुए बांग्लादेश को समंदर का इकलौता गार्जियन बताया था। इस बयान को भारत में कूटनीतिक रूप से आपत्तिजनक माना गया, क्योंकि भारतीय अधिकारियों ने इसे पूर्वोत्तर क्षेत्र की कनेक्टिविटी और रणनीतिक स्थिति को कमतर दर्शाने वाला बताया। इससे दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव और गहरा गया है।

जीटीआरआई की रिपोर्ट में बताया गया है कि बांग्लादेश में चीन के साथ बढ़ती निकटता भारत के लिए रणनीतिक चिंता का विषय बन गई है। रिपोर्ट के अनुसार, 2024 के मध्य में भारत समर्थक शेख हसीना सरकार के पतन और मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम प्रशासन के गठन के बाद ढाका ने बीजिंग के साथ गठबंधन की दिशा में रुख किया है। मार्च 2025 में यूनुस की चीन यात्रा के दौरान 2.1 बिलियन अमेरिकी डॉलर (करीब 17430 करोड़) के नए निवेश और सहयोग समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसके साथ ही तीस्ता नदी विकास जैसी बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं में चीनी भागीदारी से क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति पर गंभीर असर पड़ने की आशंका है।

2024 के अंत से बांग्लादेश ने भारतीय निर्यात पर कई प्रकार के प्रतिबंध लागू किए हैं। इनमें अप्रैल 2025 तक 5 प्रमुख बंदरगाहों के माध्यम से भारतीय धागे के आयात पर प्रतिबंध, चावल के शिपमेंट पर कड़े नियंत्रण, कागज, तंबाकू, मछली तथा पाउडर दूध सहित कई भारतीय उत्पादों के आयात पर रोक शामिल है।

इसके अलावा, ढाका ने भारत से गुजरने वाले सामान पर 1.8 टका प्रति टन प्रति किलोमीटर का पारगमन शुल्क भी लगा दिया है, जिससे तनाव और बढ़ गया है। जीटीआरआई की रिपोर्ट के अनुसार, इन सभी कार्रवाइयों में सख्त बंदरगाह निरीक्षण, परिचालन में देरी और प्रतिबंधों ने भारतीय निर्यातकों के लिए गंभीर बाधाएँ खड़ी कर दी हैं और भारत में एक संतुलित, जवाबी नीति की माँग को जन्म दिया है।

भारत सरकार ने 9 अप्रैल 2025 को बांग्लादेश को दी गई ट्रांसशिपमेंट सुविधा को वापस लेने की घोषणा की, जिसमें रसद संबंधी चुनौतियों और भारतीय बंदरगाहों व हवाई अड्डों पर भीड़भाड़ का हवाला दिया गया। इस सुविधा के तहत बांग्लादेश को अपने कंटेनर ट्रकों और मालगाड़ियों के माध्यम से भारत-बांग्लादेश सीमा पर स्थित पेट्रापोल, गेडे और रानाघाट जैसे लैंड पोर्ट्स से कोलकाता पोर्ट, कोलकाता एयरपोर्ट, न्हावा शेवा पोर्ट (जवाहरलाल नेहरू पोर्ट) और दिल्ली एयरपोर्ट तक अपने सामान भेजने की अनुमति थी। इन भारतीय बंदरगाहों और हवाई अड्डों से माल को अंतिम गंतव्यों तक भेजा जाता था।

भारत द्वारा यह ट्रांसशिपमेंट सुविधा समाप्त करने के कुछ ही दिनों बाद, बांग्लादेश ने जवाबी कदम के रूप में स्थानीय कपड़ा मिलों को होने वाले संभावित नुकसान का हवाला देते हुए भारत से धागे के आयात को लैंड पोर्ट्स के माध्यम से निलंबित कर दिया था। बेनापोल, भोमरा, सोनमस्जिद, बांग्लाबांधा और बुरीमारी जैसे प्रमुख बंदरगाह भारतीय धागे के बांग्लादेश में प्रवेश के मुख्य बिंदु थे।

बांग्लादेश इस समय आर्थिक चुनौतियों, विशेष रूप से कपड़ा उद्योग में गिरावट और बिजली संकट का सामना कर रहा है। बिजली संकट का एक मुख्य कारण भारत की अडानी पावर को लंबे समय से बकाया भुगतान न किया जाना है। कई महीनों तक भुगतान न मिलने के कारण अडानी पावर ने बांग्लादेश को बिजली आपूर्ति रोक दी थी।

हालाँकि, फरवरी 2025 में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस द्वारा झारखंड स्थित गोड्डा संयंत्र से ‘पूर्ण आपूर्ति’ बहाल करने का अनुरोध किए जाने के बाद, अडानी पावर ने बिजली आपूर्ति फिर से शुरू कर दी। इसके बाद, बांग्लादेश ने धीरे-धीरे बकाया भुगतान करना शुरू किया, जिससे इस महीने की शुरुआत में अडानी के दोनों संयंत्रों से बिजली आपूर्ति में इज़ाफा हुआ।

वर्तमान में अडानी पावर को बांग्लादेश से हर महीने 80-90 मिलियन डॉलर की नियमित भुगतान राशि मिल रही है, जिसमें मौजूदा खपत के भुगतान भी शामिल हैं। कुल बकाया राशि लगभग 820-830 मिलियन डॉलर बताई जा रही है, जिसका भुगतान आने वाले महीनों में किए जाने की उम्मीद है।

‘मुगल-सिख’ नाम से प्रोपेगेंडा फैलाने में फँसा यूट्यूबर ध्रुव राठी, AI का इस्तेमाल कर गुरु गोबिंद सिंह को रोता हुआ दिखाया: पहले दी सफाई, फिर Video डिलीट कर भागा

यूट्यूबर ध्रुव राठी फिर से विवादों में है। इस बार मामला गंभीर है। ध्रुव ने अपने यूट्यूब चैनल पर ‘द सिख वॉरियर हू टेरीफाइड द मुगल्स’ नाम से एक वीडियो अपलोड किया, जिसमें सिख गुरुओं की वीरगति और मुगलों के जुल्मों की कहानी थी।

वीडियो में गुरु तेग बहादुर जी, गुरु गोबिंद सिंह जी और बंदा सिंह बहादुर की कहानी को AI-जनरेटेड एनिमेशन के जरिए दिखाया गया। लेकिन इसने सिख समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाई। पंजाब से दिल्ली तक इसका भारी विरोध हुआ। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने इसे सिख गुरुओं का अपमान बताया और वीडियो हटाने की माँग की।

SGPC के गुरचरण सिंह ग्रेवाल ने ध्रुव की जमकर क्लास लगाई। उन्होंने कहा कि गुरु गोबिंद सिंह जी को बच्चे के रूप में रोता दिखाना सिखों की निडरता और चढ़दी कला को ठेस पहुँचाता है।

दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (DSGMC) ने भी वीडियो को सांस्कृतिक रूप से शर्मनाक बताया। DSGMC ने दिल्ली पुलिस में शिकायत ठोक दी और ध्रुव के यूट्यूब अकाउंट की जाँच की बात कही।

दिल्ली सरकार के मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने सोशल मीडिया पर ध्रुव की खिंचाई करते हुए धारा 295ए के तहत FIR की माँग कर डाली।

पंजाब में सिख समुदाय का गुस्सा इस बात पर था कि वीडियो में गुरु गोबिंद सिंह जी को बाल गोविंद राय के रूप में रोते दिखाया गया, जो सिखों के लिए बेहद संवेदनशील मसला है। बंदा सिंह बहादुर को ‘रॉबिन हुड’ कहने पर भी बवाल मचा। सिख परंपरा के मुताबिक, गुरुओं की तस्वीरें सिर्फ स्टिल फोटो में दिखाई जा सकती हैं, AI से नहीं।

विवाद बढ़ने पर ध्रुव राठी ने सफाई दी। उसने कहा कि वीडियो को कई लोगों ने पसंद किया, लेकिन कुछ सिख भाइयों को AI एनिमेशन से आपत्ति है। ध्रुव ने सोशल मीडिया पर फॉलोअर्स से राय माँगी और फिर वीडियो हटा लिया। उसने कहा कि सिख गुरुओं की कहानी बिना विजुअल्स के दिखाना मुश्किल है, लेकिन वह समुदाय की भावनाओं का सम्मान करता है।

1 महिला ने 8 पर किया रेप का केस, सारे निकले फर्जी… गैंगरेप का 1 केस निकला ‘निजी दुश्मनी’ में फँसाने की साजिश: क्या मर्द होना अब अपराध बन चुका है?

दिल्ली की अदालतों में दर्ज बलात्कार मामलों से जुड़ी एक आरटीआई ने हमारी न्याय व्यवस्था की काली सच्चाई को बेपर्दा कर दिया है। 2017 से 2024 के बीच दर्ज 3,097 रेप मामलों में से सिर्फ 133 में दोष सिद्ध हुआ। यानी सिर्फ 4.3% मामलों में सज़ा मिली, जबकि 95% से ज़्यादा मामलों में आरोपित या तो निर्दोष साबित हुए या सबूतों के अभाव में बरी कर दिए गए। यह आँकड़ा दर्शाता है कि गंभीर अपराध के नाम पर न्याय प्रणाली का दुरुपयोग किया जा रहा है।

हमारे देश में, जहाँ सैनिक अपनी जान जोखिम में डालकर भारत माता की रक्षा करते हैं, वहीं कुछ महिलाएँ इन रक्षकों को भी झूठे बलात्कार के झूठे आरोपों में फँसाकर उनकी जिंदगी तबाह कर देती हैं। एक देशभक्त जवान, जिसने देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया, उसे झूठे केस में फँसा कर समाज ने अपराधी की तरह तिरस्कारित किया। मानसिक आघात, परिवार का टूटना और समाज का कलंक, ये सब उसके हिस्से आए। बाद में वह निर्दोष साबित हुआ, लेकिन उसके मन और समाज में लगी चोट को कोई ठीक नहीं कर पाया। यह केवल एक सैनिक की कहानी नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की गहरी विफलता का कड़वा सच है।

दिल्ली-NCR में कई ऐसे उदाहरण हैं जो इस सामाजिक बीमारी को बयां करते हैं:

दिल्ली की एक महिला ने 8 पुरुषों पर झूठे रेप आरोप लगाए, जिन्हें पुलिस ने ‘आदतन झूठी शिकायतकर्ता’ बताया।

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक गैंगरेप FIR को रद्द करते हुए कहा कि इसे ‘निजी दुश्मनी निकालने के लिए कानून का दुरुपयोग’ किया गया।

नोएडा में एक महिला ने शादी से इंकार करने पर रेप का झूठा केस दर्ज कराया, जबकि संबंध पूरी तरह सहमति से थे।

गुरुग्राम में एक व्यक्ति को आठ महीने जेल में रहना पड़ा, लेकिन CCTV और कॉल रिकॉर्ड ने साबित किया कि मामला पूरी तरह फर्जी था।

साथ ही, सरकार ने बलात्कार पीड़िताओं को मुआवज़े के रूप में 88 करोड़ रुपए से अधिक वितरित किए, लेकिन झूठे मामलों के लिए केवल 6 लाख की वसूली हो सकी।

झूठे आरोपों का खामियाजा पुरुषों को सामाजिक बहिष्कार, मानसिक उत्पीड़न और आत्महत्या तक भुगतना पड़ता है। यह अन्याय न केवल पीड़ित पुरुषों के साथ होता है, बल्कि समाज को भी गहरे नुकसान पहुंचाता है।

बलात्कार एक जघन्य अपराध है और इसे कठोर सजा मिलनी चाहिए, लेकिन झूठे आरोप भी समान रूप से घातक, अमानवीय और समाज विरोधी हैं। यह वक्त आ गया है कि हमारा देश Gender-Neutral Laws अपनाए , न्याय ऐसा हो जो लिंग के आधार पर न हो, बल्कि सच्चाई और निष्पक्षता पर आधारित हो। सभी नागरिकों के अधिकारों का संरक्षण तब ही संभव होगा, जब पुरुष और महिला दोनों को बराबरी का न्याय मिलेगा। तभी हम एक मजबूत, समावेशी और न्यायपूर्ण समाज की ओर बढ़ सकेंगे।