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5 राज्य, 111 मुस्लिम MLA: बंगाल में TMC के 42 मुस्लिम उम्मीदवारों में से 41 जीते, केरल-असम में भी बोलबाला

पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और पुडुचेरी में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे रविवार (मई 2, 2021) को मतगणना के बाद घोषित किए गए। इन पाँचों राज्यों में मुस्लिम वोटों के लिए भाजपा विरोधी दलों में गजब की हाथापाई हुई। कॉन्ग्रेस ने तो पश्चिम बंगाल में फुरफुरा शरीफ दरगाह के मौलाना अब्बास सिद्दीकी की ISF और असम में बदरुद्दीन अजमल AIUDF के साथ गठबंधन किया। पाँचों राज्यों में बड़ी संख्या में मुस्लिम विधायक चुने गए।

बंगाल में TMC के लिए मुस्लिमों का जबरदस्त ध्रुवीकरण

सबसे पहले बात पश्चिम बंगाल की। यहाँ अकेले तृणमूल कॉन्ग्रेस ने 42 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था, जिसमें से मात्र एक की ही हार हुई है। साथ ही ISF को भी 1 सीट मिली, जिससे राज्य में मुस्लिम विधायकों की संख्या 42 है। हालाँकि, 2016 और 2011 में क्रमशः 59 और 56 मुस्लिम विधायकों को जीत मिली थी। इस बार ये संख्या कम इसीलिए भी है क्योंकि भाजपा को हराने के लिए हुए ध्रुवीकरण में CPI-कॉन्ग्रेस पहली पसंद नहीं बनी।

पहले इन दोनों दलों के भी बड़ी संख्या में मुस्लिम विधायक हुआ करते थे। ममता बनर्जी के पक्ष में मुस्लिमों के बीच ऐसी लहर थी कि 5 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM का खाता तक नहीं खुला और 40 सीटों पर कॉन्ग्रेस व CPI के समर्थन से लड़ने वाली सिद्दीकी की ISF को मात्र 1 पर सफलता मिली। नए मुस्लिम विधायकों में चंदननगर के पूर्व कमिश्नर हुमायूँ कबीर भी शामिल हैं।

असम में BJP के आठों मुस्लिम उम्मीदवारों को देखना पड़ा हार का मुँह

असम की बात करें तो यहाँ भी पश्चिम बंगाल की तरह अधिकतर क्षेत्रों में मुस्लिमों और घुसपैठियों का दबदबा रहा है। जहाँ पिछली बार यहाँ 29 मुस्लिम विधायक जीते थे, नव-निर्वाचित विधानसभा में मुस्लिमों की संख्या 31 होगी। 2011 के चुनाव में यहाँ 28 मुस्लिम उम्मीदवारों को जीत मिली थी। नए मुस्लिम विधायकों में से 16 कॉन्ग्रेस के और 15 परफ्यूम कारोबारी मौलाना बदरुद्दीन अजमल की AIUDF के हैं।

खास बात ये है कि भाजपा ने भी इस बार असम में मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था। पार्टी ने 8 मुस्लिम उम्मीदवारों पर भरोसा जताया लेकिन उनमें से एक भी जीत कर विधानसभा नहीं पहुँच सका। वहाँ पार्टी को ऐसा झटका लगा है कि प्रदेश अध्यक्ष रंजीत कुमार दास ने अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ की जिला, प्रखंड और राज्य समितियों को ही भंग कर दिया है। यहाँ तक कि भाजपा के सहयोगियों के खाते में भी एक भी मुस्लिम विधायक नहीं आया।

केरल में कॉन्ग्रेस के कट्टरवादी गठबंधन साथी के 15 मुस्लिम MLAs

केरल की बात करें तो यहाँ मुस्लिम और ईसाई समुदाय के बीच संघर्ष चलता रहता है और यहाँ भी कॉन्ग्रेस ने एक और इस्लामी पार्टी IUML (मुस्लिम लीग) के साथ गठबंधन किया था। 140 सदस्यीय विधानसभा में यहाँ 32 मुस्लिम उम्मीदवारों को जीत मिली है। इनमें से 15 तो अकेले IUML के ही हैं। बाकी के 3 कॉन्ग्रेस और 9 CPI(M) के हैं। दो अन्य दलों के खाते में एक-एक मुस्लिम विधायक आए। निर्दलीय विजेताओं में भी 3 मुस्लिम उम्मीदवार हैं।

तमिलनाडु और पुडुचेरी में मुस्लिम विधायकों की संख्या कम

अंत में दक्षिण के दोनों प्रदेशों की बात करते हैं, जहाँ राष्ट्रवाद की कोई लहर नहीं थी और इससे जुड़े मुद्दे चुनावी फिजाँ में नहीं थे। तमिलनाडु विधानसभा की 234 सीटों में से मात्र 5 ही मुस्लिमों के खाते में गए। इसी तरह पुडुचेरी में मात्र एक मुस्लिम विधायक चुने गए। असदुद्दीन ओवैसी ने कई सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। इस तरह इन 5 राज्यों में 111 नए मुस्लिम विधायक होंगे।

हिंसा की गर्मी में चुप्पी की चादर ही पत्रकारों के लिए है एयर कूलर

ममता बनर्जी ने पत्रकारों को कोविड वॉरियर घोषित कर दिया। आदर्श विश्व में पत्रकार योद्धा ही होता है पर वह आदर्श विश्व की बात है और यहाँ पश्चिम बंगाल की बात हो रही है। मिलने वाली सुविधाओं से अलग रख कर देखा जाए तो पत्रकार को कोविड वॉरियर घोषित करना सिम्बोलिजम से अधिक कुछ नहीं था पर लगा जैसे पत्रकारों ने इसे गिफ्ट के तौर पर रिसीव किया और प्रदेश में हो रही हिंसा पर चुप्पी साधकर रिटर्न गिफ्ट भी दे दिया।

जगह-जगह विचारधारा और आइडिया ऑफ इंडिया की रक्षा में तत्पर पत्रकारों ने साबित कर दिया कि वे कोरोना काल में दीदी की वजह से योद्धा तो बने ही थे, चुप्पी साध कर साधक भी हो लिए और बिलकुल पिन ड्रॉप साइलेंस में बैठे मौनी बाबा माफिक।

इसी चुप्पी के बीच एक पत्रकार मित्र से मैंने कहा; चुप क्यों हो? कुछ बोलो।

मेरे कहने का असर हुआ और वो बोला। कहने लगा; हमें डिस्टर्ब न करो। अभी हम हिंसा का लेवल नाप रहे हैं।

मैंने आश्चर्य से कहा; हिंसा का लेवल नाप रहे हो! वो कैसे और किसलिए?

वो बोला; कर दी न आम पीड़ितों वाली बात? ये भी नहीं पता कि हिंसा दो तरह की होती है। एक वह जो न हो तब भी उसके खिलाफ तुरंत आवाज उठाई जाए और दूसरी वो जिस पर कुछ बोलने से पहले उसे नापना होता है। जब नाप जोख से पता चलता है कि हिंसा खतरे के निशान से ऊपर पहुँच गई है तब उस पर भर्त्सना का विचार किया जाता है।

मैंने पूछा; हिंसा नापने का भी इंच टेप होता है?

वो बोला; बिलकुल होता है और हमारे पास तो जो है वह अल्टीमेट है।

मैंने पूछा; अल्टीमेट कैसे है? क्या खासियत है उसकी?

मेरी बात सुनकर धीरे से बोला; अरे वह इंचटेप मुझे रवीश कुमार ने गिफ्ट किया था।

उसकी बात सुनकर लगा कि क्या समय है; पत्रकार खतरे को नहीं बल्कि खतरे का निशान देख रहा है।

अजीब-अजीब हेडलाइन गढ़ने के लिए विश्व कप जीत चुके अखबारों के हेडलाइन एडिटर के लैपटॉप का ‘जी-पैड’ जाम है। वे हो रही हिंसा पर एक हेडलाइन तक नहीं लिख पा रहे। उनसे इस विषय पर पूछना भी रिस्की है। ये लोग ऐसे लेवल पर हैं जहाँ यह बोलने में भी नहीं हिचकेंगे कि; हाम तो हेडलाइन गोढ़ने का ख़ातिर बैठा था लेकिन इये भाजोपा का कार्जोकोरता लोग आफ़ीस में आकर हमारा ‘जी-पैड’ जाम कर दिया। सुनने वाले के पास चुप रहने के अलावा और कोई चारा न होगा। वह मन ही मन यह सोच कर चुप रह लेगा कि; ये आदमी हेडलाइन गढ़कर विश्व कप तो जीत ही चुका था, इसकी निगाह अब शायद विश्व बांग्ला कप पर है।

वह जमाना गया जब लगभग हर मीडिया हाउस के पास एक साइलेंस जस्टिफिकेशन डिपार्टमेंट होता था जो ऐसे मौकों पर चुप्पी को जस्टिफाई करने के लिए तरह-तरह के बहाने बनाने का महत्वपूर्ण काम किया करता था। आज बहाने बनाने की जरूरत नहीं पड़ती। आज हर चुप्पी के पीछे के कारणों की समझ सबको है।

इस चुप्पी काल में पत्रकार अपनी-अपनी पोजीशन के अनुसार आचरण कर रहे हैं। महान कहलाए जाने वाले पत्रकार चुप हैं। जिनमें महानता के लक्षण थोड़े कम हैं, वे हो रही हिंसा को न्याय संगत बता रहे हैं। उनसे नीचे की पायदान पर बसने वाले लोग हिंसा कर रहे लोगों की सराहना कर डाल रहे हैं। पश्चिम बंगाल में फिर से मजबूत हुआ लोकतंत्र इस समय हिंसा, बेबसी और चुप्पी का ऐसा संगम है जिसमें सोशल मीडिया का आउटरेज बूड़ उतरा रहा है।

ऐसे काल में आम आदमी मजबूरी वाली अपनी चुप्पी को व्यावहारिक कारण दे सकता है; जैसे चुप न रहे तो कुटाई हो जाएगी पर ऐसे काल में पत्रकार अपनी चुप्पी के लिए ऐसे दर्शन गढ़ लेने की औकात रखता है जिसे देख बड़े-बड़े दार्शनिक दाँतों तले अंगुली दबा लें। ऐसे मौकों पर पत्रकार का दर्शन “पश्चिम बंगाल के लिए राजनीतिक हिंसा कोई नई बात नहीं है” से लेकर “हिंसा की ऐसी घटनाएँ कम्युनल नहीं हैं क्योंकि ये एक वर्ग को आत्मविश्वास देती हैं” तक कहीं भी जा सकता है।

ऐसी चुप्पी के परिणाम स्वरूप आइडिया ऑफ इंडिया की रक्षा तय है। यह इकोसिस्टम कल्याण की भी बात है। पर चुप्पी के एवज में किसी कमिटी या फिर डेलिगेशन में घुस विदेश यात्रा का योग बनवा लेना निजी कल्याण की बात है। ऐसे में इन चुप्पी साधकों के लिए तय करना कठिन नहीं कि हिंसा की गर्मी में चुप्पी की चादर ही असली एयर कूलर है।

25 साल छोटे गुरु के शिष्य, जिनके सामने झुका अकबर भी.. 20 बार हरिद्वार जाने वाले वैष्णव संत कैसे बने सिखों के तीसरे गुरु

सिख पंथ में 10 गुरुओं में से गुरु नानक, गुरु तेग बहादुर और गुरु गोविंद सिंह के बारे में तो काफी कुछ लिखा जा चुका है, लेकिन तीसरे गुरु अमर दास के बारे में लोगों को अधिक जानकारी नहीं है। मार्च 26, 1552 को उन्होंने 73 वर्ष की उम्र में सिखों के तीसरे गुरु के रूप में दायित्व संभाला और 95 वर्ष की उम्र में अपने निधन तक इस पद पर रहे। 60 वर्ष की उम्र में सिखों के दूसरे गुरु अंगद से प्रभावित होकर वो सिख संप्रदाय का हिस्सा बने थे।

गुरु अमर दास जब सिखों के गुरु थे, तब दिल्ली में मुग़ल बादशाह अकबर का राज़ था। उसके अब्बा हुमायूँ को दिल्ली की सत्ता से बेदखल होने के बाद दर-दर की ठोकरें खानी पड़ी थीं और उसका जन्म भी इसी दौरान हुआ था, ऐसे में उसे पता था कि अगर हिंदुस्तान में अपने साम्राज्य का विस्तार करना है तो हिन्दुओं को खुश रखना पड़ेगा और यही कारण है कि उसने अपने दरबार में हिन्दुओं को अहम पद दिए और उनके हित में फैसले लेने का दिखावा किया।

हिन्दू राजाओं को हिन्दू शासकों से ही लड़वाने में वो दक्ष था। एक कहानी अकबर की गुरु अमर दास से मुलाकात की भी है। गुरु अमर दास लंगर भी चलाते थे, जिसमें जात-पात से लेकर अमीर-गरीब तक का भेद भी मिट जाता था। उनका कहना था कि ईश्वर की नज़र में सभी मनुष्य एक हैं। यही वो समय था जब अकबर के कानों तक भी ये बात पहुँची और वो सिखों के बारे में और अधिक जानने के लिए उत्सुक हो उठा।

1571 में बादशाह अकबर की गोइंदवाल साहिब में गुरु मार दास से मुलाकात हुई, जो अभी तरनतारन जिले में स्थित है। तब तक लंगर प्रथा सिख समुदाय का एक अभिन्न अंग और पहचान बन चुकी थी। गुरु अमर दास ने एक सीधा नियम बना रखा था – पहले तो सारे भेदभाव बिठा कर बाकी लोगों के साथ भोजन करना है और फिर उनसे सभा में मुलाकात करनी है। उनका कहना था कि राजा हो या सम्राट, सभी ईश्वर के बनाए हुए हैं और उन्हें ईश्वर के सामने झुकना चाहिए।

अकबर ने भी वहाँ आकर इन नियमों का पालन किया क्योंकि वो इस तरह की व्यवस्था देख कर हतप्रभ था। अकबर के समय मुगलों और सिखों के बीच कोई संघर्ष नहीं हुआ। जहाँगीर के सत्ता संभालने और गुरु अर्जुन दास द्वारा अमृतसर में दास ने अमृतसर में स्वर्ण मंदिर का निर्माण शुरू करवाया, तब से तनाव का दौर शुरू हुआ और ये लड़ाई इस्लामी कट्टरवाद बनाम सनातन धर्म की होती चली गई।

अकबर ने उन्हें जमीन देनी चाही, जिस पर कोई कर नहीं लगता। लेकिन, गुरु अमर दास ने इस तोहफे को अस्वीकार कर दिया। बाद में ये भूमि बीबी भानी को दी गई और फिर बीबी भानी के पति रामदास को। गुरु रामदास ही बाद में अपने ससुर गुरु अमर दास के उत्तराधिकारी बने। अमृतसर के बासरके में भल्ला खत्री परिवार में जन्मे गुरु अमर दास के बारे में बहुत कम लोगों को ये पता है कि वो एक वैष्णव संत भी हुआ करते थे।

वैष्णव मत में विश्वास रखने वाले अमर दास को हरिद्वार की यात्रा खासी पसंद थी और वो वहाँ अक्सर तीर्थाटन के लिए जाया करते थे। कम से कम उन्होंने 20 बार हरिद्वार की यात्रा की। इन्हीं यात्राओं में से किसी एक के दौरान उन्हें एक अज्ञात साधु मिला, जिसने उन्हें कोई गुरु बनाने को कहा। उनकी ये इच्छा जल्द ही पूरी हुई जब उनके परिवार में बीबी अमारो की शादी हुई। वो गुरु अंगद देव की बेटी थीं।

उनके माध्यम से ही वो गुरु अंगद से मिले और अगले 12 वर्षों तक एक चित्त से उनकी सेवा की। तड़के सुबह वो सूर्योदय से 3 घंटे पहले उठ जाया करते थे और गुरु के स्नान के लिए नदी से पानी लाते थे। दिन में वो लंगर में सेवा देते थे। भोजन पकाने और परोसने से लेकर साफ़-सफाई तक का जिम्मा उन्होंने उठाया था। फिर वो गुरु के लिए लकड़ियाँ चुन कर लाते थे। सुबह और शाम का समय प्रार्थना और ध्यान में जाता था।

एक तूफानी रात में उन्होंने अंधड़ के बीच अपने गुरु के लिए व्यास नदी से पानी लाया। वो खुद गिर गए लेकिन पानी को कुछ नहीं होने दिया। इस दौरान उनके गिरने से एक महिला की निद्रा भंग हो गई थी, जिसने उन्हें बेघर कह दिया था। जब गुरु अंगद को ये बात पता चली तो उन्होंने अमर दास को ‘बेघरों का घर’ और कमजोरों का समर्थक कहा। गुरु बनने के बाद गोइंदवाल को ही अमर दास ने अपना मुख्यालय बनाया।

उन्होंने भारत के अलग-अलग हिस्सों में 22 ‘मँजियों’ की नियुक्ति की, जो गुरु नानक का सन्देश जनता तक पहुँचाते थे। कुरुक्षेत्र की यात्रा भी की थी। महिलाओं के उत्थान के लिए गुरु अमर दास हमेशा सक्रिय रहते थे। वो इस्लाम के पर्दा प्रथा के खिलाफ थे। उन्होंने महिलाओं को कई जिम्मेदारियाँ दे रखी थीं। उन्होंने अकबर से माँग रखी थी कि हरिद्वार के तीर्थाटन पर कर न लिया जाए, जिसे मुग़ल बादशाह ने स्वीकार कर लिया।

गोइंदवाल में ही उनकी और अकबर की बैठक का नतीजा निकला कि प्राचीन मद्र देश के अमृत सरोवर और उसके आसपास के इलाके का हिस्से को वापस किया गया। बाद में वहाँ कई निर्माण कार्य शुरू हुए और अब वहाँ सिखों का पवित्र स्थल भी है। जब गुरु अमर दास हजारों लोगों के साथ यमुना नदी पार कर के हरिद्वार पहुँचे थे तब वहाँ के साधुओं और संन्यासियों ने उनका बखूबी स्वागत किया था।

इस दौरान उन्होंने कर माँगने आए मुगलों के कई लोगों को वापस भेजा। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के लिए जगह का चयन उन्होंने ही किया था, जो आज सिखों का सबसे लोकप्रिय स्थल है। ‘हरमंदिर साहिब’ का अर्थ ही था ‘हरि का मंदिर’। हरि अर्थात ईश्वर। भगवन विष्णु को हरि नाम से पुकारा जाता है। तीर्थाटन, मंदिरों, पर्व-त्योहारों और धार्मिक क्रियाओं को वो धर्म का अभिन्न अंग मानते थे और इन्हें खूब बढ़ावा दिया।

उन्होंने ही ‘आदि ग्रन्थ’ की रचना शुरू की थी, जो बाद में पवित्र गुरुग्रंथ साहिब कहलाया। वो सीधी भाषा में लोगों को समझाते थे, जिस कारण वो लोकप्रिय भी हुए और उनका सन्देश सुनने के लिए दूर-दूर से लोग आते थे। वो जहाँ भी जाते, वहाँ भारी भीड़ जुट जाती। एक और रोचक बात जानने लायक ये भी है कि जिन गुरु अंगद को उन्होंने अपना गुरु मान कर जीवन भर सेवा की, वो उनसे 25 साल छोटे थे।

बंगाल हिंसा के बाद राष्ट्रपति शासन की माँग: आर्टिकल 356 के बारे में जानें सब कुछ

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद से ही जारी ‘व्यापक हिंसा’ को देखते हुए एनजीओ ‘इंडिक कलेक्टिव ट्रस्ट’ ने सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार (4 मई) को एक याचिका दायर की। इसमें राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने, केंद्रीय बलों की तैनाती और शीर्ष अदालत के एक रिटायर्ड जज द्वारा जाँच की माँग की गई है।

2 मई को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों में ममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी की तीसरी बार सत्ता में वापसी के बाद से ही राज्य भर से बीजेपी कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसा की खबरें आ रही हैं। इसी को देखते हुए इंडिक कलेक्टिव ट्रस्ट ने पश्चिम बंगाल में संवैधानिक ढांचे के ध्वस्त होने का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट से राष्ट्रपति शासन की माँग की है।

अब सवाल उठता है कि किसी राज्य में संविधान के जिस अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है, वह क्या है और उसे किन-किन परिस्थितियों में लगाया जा सकता है? आइए जानें अनुच्छेद 356 से जुड़े हर एक सवाल का जवाब।

क्या है आर्टिकल 356

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 356 राष्ट्रपति को किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने का अधिकार देता है। भारत में राष्ट्रपति शासन का अर्थ किसी राज्य सरकार को हटाए जाने और राज्य में केंद्र सरकार का शासन लागू होना होता है। इसे ‘राज्य आपातकाल’ या ‘संवैधानिक आपातकाल’ भी कहा जाता है।

भारत के संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत, यदि राज्य सरकार संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार कार्य करने में असमर्थ है, तो केंद्र सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति राज्य सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू करने की अनुमति देता है। ऐसा होने पर राष्ट्रपति की अनुमित से केंद्र सरकार राज्य मशीनरी का प्रत्यक्ष नियंत्रण अपने हाथ में ले सकती है।

कब लागू होता है अनुच्छेद 356

संविधान के अनुच्छेद 356 के अनुसार, केंद्र सरकार को राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता या संविधान के स्पष्ट उल्लंघन की दशा में उस राज्य की सरकार को बर्खास्त करने और राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने का अधिकार है। साथ ही राष्ट्रपति शासन तब भी लागू किया जा सकता है, जब राज्य विधानसभा में किसी भी दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत हासिल न हो।

संविधान के अनुच्छेद 356 के अनुसार, “यदि वह (राष्ट्रपति) संतुष्ट है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें राज्य की सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार कार्य नहीं कर रही है।”

अनुच्छेद 356 के अनुसार, यदि राज्य के संवैधानिक मशीनरी या विधायिका संवैधानिक मानदंडों का पालन करने में विफल रहती है तो राज्य के राज्यपाल की रिपोर्ट मिलने पर केंद्र सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुमति देता है।

राज्य में संवैधानिक मशीनरी के ध्वस्त होने का निर्धारण राष्ट्रपति द्वारा किसी भी समय किया जा सकता है, राज्यपाल से रिपोर्ट प्राप्त होने पर, या स्वत: संज्ञान लेकर।

इन परिस्थितियों में लागू होता है राष्ट्रपति शासन

  • राज्य में संवैधानिक ढांचा पूरी तरह से ध्वस्त हो गया हो
  • राज्य सरकार अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वाह करने में विफल रहे
  • राज्य सरकार शांति-व्यवस्था बनाए रखने (दंगे रोकने) में विफल रहे
  • विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत न हासिल हुआ हो
  • सबसे बड़ा दल सरकार बनाने से इनकार कर दे
  • सत्तारूढ़ गठबंधन बिखर जाए और सदन में अपना बहुमत खो दे
  • युद्ध, महामारी या प्राकृतिक आपदाओं जैसे अपरिहार्य कारणों से चुनाव स्थगित हो जाएँ
  • विधानसभा गवर्नर द्वारा तय समय में मुख्यमंत्री के तौर पर किसी नेता को न चुन पाए
  • पूरे भारत में या राज्य के किसी भी हिस्से में पहले से ही एक राष्ट्रीय आपातकाल हो
  • चुनाव आयोग प्रमाणित करे कि राज्य में चुनाव नहीं हो सकते

अनुच्छेद 356 लागू होने पर होता है किसका शासन

आर्टिकल 356 लागू होने के बाद राज्य का शासन विधानसभा के बजाय राज्यपाल के हाथों में आ जाता है, जिसे केंद्र की सलाह पर राष्ट्रपति मनोनीत करते हैं। यानी राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद केंद्र के प्रतिनिध के तौर पर राज्यपाल राज्य का शासन चलाता है।

राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद राज्य में मुख्यमंत्री का पद खाली हो जाता है और निर्वाचित मंत्रिमंडल कोई भी काम नहीं कर सकता है। राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद गवर्नर के पास उनकी सहायता के लिए अन्य प्रशासकों को नियुक्त करने का अधिकार होता है। ये प्रशासक आमतौर पर निष्पक्ष रिटायर्ड सिविल सेवक होते हैं।

कब तक लागू रह सकता है अनुच्छेद 356

यदि दोनों सदनों द्वारा अनुमोदित हो तो राष्ट्रपति शासन 6 महीने तक जारी रह सकता है। इसे संसद की मँजूरी के साथ अधिकतम तीन साल के लिए बढ़ाया जा सकता है।

कंगना के अकॉउंट सस्पेंशन पर स्वरा-कुब्रा-ऋचा ने जताई खुशी, Koo संस्थापकों ने कहा- स्वाभिमान के साथ यहाँ रखें विचार

सोशल मीडिया माइक्रो ब्लॉगिंग वेबसाइट ट्विटर से बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत का अकॉउंट सस्पेंड होने के बाद एक खास तबके में खुशी का माहौल है। इसी क्रम में बॉलीवुड के कई सितारों ने भी कंगना के प्रति अपनी कुंठा निकालते हुए ट्विटर के फैसले को सराहा।

वेब सीरीज ‘सेक्रेड गेम्स’ में ‘कुकु’ का किरदार करने वाली एक्ट्रेस कुब्रा सैत ने खुशी जाहिर करते हुए कहा, “आमीन! मैं उस मानसिक स्थिति में थी कि अगर मैं कभी इससे मिलती तो मैं इसे अपने बाएँ पैर से मार देती, लेकिन, यह तरीका बेहतर है। मैं परमानेंट राहत की उम्मीद करती हूँ। सोशल मीडिया इसके बिना बेहतर हो सकता है।”

तनु वेड्स मनु में कंगना की सहेली का रोल निभाने वाली स्वरा भास्कर ने स्वाति मालिवाल का ट्वीट रीट्वीट किया और इमोजी के जरिए बताया कि उन्हें कंगना के अकॉउंट सस्पेंड होने से कितनी खुशी मिली है। इसी तरह ऋचा चड्ढा भी इस घटना पर अपनी प्रतिक्रिया देने से नहीं चूँकी।

स्वरा भास्कर का ट्वीट
ऋचा चड्ढा का ट्वीट

इनके अलावा भी तमाम यूजर्स हैं जो कंगना के ट्विटर सस्पेंशन पर अपनी खुशी व्यक्त कर रहे हैं। लेकिन दूसरी ओर ट्विटर के देसी वर्जन कू (koo) ने उनका स्वागत किया है। कंगना ने इस फरवरी में कू पर अकॉउंट बनाकर कहा था कि नई जगह समय लेगी लेकिन भाड़े का घर भाड़े का होता है, अपना घर कैसा भी हो अपना ही होता है।

उनके इसी पोस्ट पर ‘कू’ के सह-संस्थापक अप्रामेया राधाकृष्णन ने अपना कू किया। राधाकृष्णन ने ‘कू’ पर लिखा, ‘‘यह कंगना रनौत का पहला कू था। उनका कहना सही है कि कू घर जैसा लगता है, बाकी सब किराए जैसा।’’

वहीं दूसरे सह संस्थापक ने कंगना को आश्वासन दिया कि कू कंगना का घर ही है। यहाँ वह स्वाभिमान के साथ अपने विचार सबके सामने रख सकती हैं।

बता दें कि 4 मई को ट्विटर सस्पेंड होने के बाद कंगना रनौत ने इस संबंध में बयान जारी किया था। कंगना ने कहा था, “ट्विटर ने बस मेरी बात को साबित कर दिया कि वे अमेरिकी हैं और एक सफेद शख्स को जन्म से ही एक भूरे रंग के शख्स को गुलाम बनाने का हक मिल जाता है। ट्विटर हमें बताना चाहता है कि क्या बोलना है और क्या नहीं बोलना है। खुशकिस्मती से मेरे पास कई मंच हैं, जिनका इस्तेमाल करके मैं अपनी आवाज को उठाती रहूँगी।”

सुप्रीम कोर्ट से बंगाल सरकार को झटका, कानून रद्द कर कहा- समानांतर शासन स्थापित करने का प्रयास स्वीकार्य नहीं

ममता बनर्जी ने बुधवार (5 मई 2021) को लगातार तीसरी पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। उससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल सरकार को बड़ा झटका दिया। शीर्ष अदालत ने वेस्ट बंगाल हाउसिंग इंडस्ट्रीज रेगुलेशन ऐक्ट-2017 (WBHIRA) को रद्द कर दिया

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने मंगलवार को यह फैसला दिया। बंगाल सरकार ने यह कानून केंद्र सरकार की रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट, 2016 (RERA) की जगह बनाया था। राज्य सरकार के कानून को असंवैधानिक करार देते हुए अदालत ने कहा कि समानांतर शासन स्थापित करने का प्रयास स्वीकार नहीं किया जा सकता।

शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि किसी विषय पर केंद्र सरकार का कानून है तो राज्य सरकार उसी तरह का कानून नहीं बना सकती। बार ऐंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने कहा, “पश्चिम बंगाल ने एक समानांतर शासन स्थापित करने का प्रयास किया है जो संवैधानिक रूप से स्वीकार्य नहीं है।” मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के कानून को केंद्रीय कानून का अतिक्रमण माना। कहा कि इस कानून से एक समानांतर सिस्टम बनाया गया और संसद के अधिकार क्षेत्र में दखल दिया गया। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में राज्य सरकार का कानून अस्तित्व में नहीं रह सकता और उसे निरस्त किया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद-142 के तहत अपने विशेष अधिकार का इस्तेमाल करते हुए कहा कि इस फैसले का असर ‘हीरा’ के तहत पूर्व में जिन हाउसिंग प्रोजेक्ट को मँजूरी मिल चुकी है उन पर नहीं होगा। बंगाल सरकार के इस कानून को एक गैर सरकारी संगठन ने चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि राज्य के कानून के कारण खरीददारों को नुकसान उठाना पड़ा है।

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे 2 मई को घोषित किए गए थे। नतीजों में तृणमूल कॉन्ग्रेस की जीत सुनिश्चित होने के बाद राज्य में खून-खराबे का नया दौर शुरू हो गया था। विपक्षी दलों खासकर बीजेपी कार्यकर्ताओं, उनके घरों और कार्यालयों को निशाना बनाया गया। 14 लोगों की मौत की अब तक खबर आ चुकी है। राजनीतिक हिंसा को लेकर मंगलवार को गैर सरकारी संगठन इंडिक कलेक्टिव ट्रस्ट ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। ट्रस्ट ने अपनी याचिका में कहा है कि राज्य में संवैधानिक मशीनरी ध्वस्त हो गई है। लिहाजा संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जाए।

पूनावाला समूह ने ठुकराई ₹7,394 करोड़ की डील, अबुधाबी और सऊदी अरब की कंपनियों ने दिया था ऑफर: ये रही वजह

सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) के मालिकाना हक वाले पूनावाला समूह ने पिछले वर्ष 1 बिलियन डॉलर (लगभग 7,394 करोड़ रुपए) की डील को ठुकरा दिया था। इस डील से संबंधित दो लोगों ने जानकारी दी कि निजी इक्विटी कंपनियों के समूह के साथ होने वाली यह डील पूनावाला समूह द्वारा अंतिम समय में रद्द कर दी गई थी।

मीडिया रिपोर्ट्स से मिल रही जानकारी के अनुसार पूनावाला समूह को निजी इक्विटी फर्म TPG कैपिटल, अबुधाबी के ADQ और सऊदी अरब के पब्लिक इनवेस्टमेंट फंड (PIF) के समूह से 1 बिलियन डॉलर के समझौते का प्रस्ताव मिला था। इस समझौते की डेडलाइन अक्टूबर 2020 थी लेकिन ऐन मौके पर कंपनी के द्वारा यह समझौता ठुकरा दिया गया।

डील की जानकारी रखने वाले लोगों ने बताया कि कंपनी के मूल्यांकन (Valuation) को लेकर उत्पन्न हुई मत भिन्नता के कारण यह निर्णय लिया गया। इसके अलावा पूनावाला समूह की कंपनी में बिल एण्ड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन द्वारा 300 मिलियन डॉलर (लगभग 2,217 करोड़ रुपए) का निवेश किया गया था। यह भी एक कारण था निजी निवेश समूह के द्वारा दिए गए निवेश प्रस्ताव को ठुकराने का।

पूनावाला समूह ने नई स्थापित सब्सिडियरी कंपनी के लिए 10 बिलियन डॉलर (लगभग 73,940 करोड़ रुपए) का मूल्यांकन किया था। इस कंपनी के अंतर्गत ही SII के तमाम वैक्सीन निर्माण कार्यक्रम संस्थापित होने वाले हैं। SII ने पाँच अंतरराष्ट्रीय फार्मा कंपनियों के साथ करार किया है। जिनमें AstraZeneca और नोवावैक्स भी शामिल है। यह करार वैक्सीन की खुराक के निर्माण के लिए किया गया है। इसके तहत टीके की 1 अरब खुराक बनाने के लिए SII प्रतिबद्ध है जिसका आधा हिस्सा अर्थात 50 करोड़ खुराक भारत को उपलब्ध कराई जाएगी।

हालाँकि कंपनी के जानकारों द्वारा यह बताया गया है कि यह पहली बार नहीं है जब पूनावाला समूह द्वारा निवेश को ठुकराया गया है। 2015 में भी कई बार निवेश को लेकर बातचीत शुरू हुई लेकिन कंपनी के मूल्यांकन को लेकर बात पूरी नहीं हो सकी और कंपनी ने अपनी हिस्सेदारी को न बेचने का निर्णय लिया।

हाल ही में भारत में कुछ ‘ताकतवर लोगों’ द्वारा वैक्सीन के लिए धमकी देने के आरोपों के बाद परिवार संग ब्रिटेन गए अदार पूनावाला की वैक्सीन निर्माता कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) ने अब ब्रिटेन में 240 मिलियन पाउंड (334 मिलियन डॉलर, करीब 2400 करोड़ रुपए) का निवेश करने का फैसला किया है।

ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने सोमवार (4 मई 2021) को इसकी जानकारी दी। जॉनसन के डाउनिंग स्ट्रीट कार्यालय द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि पूनावाला की कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) यूके में एक सेल्स ऑफिस, साथ ही वहाँ क्लीनिकल ट्रायल, रिसर्च और डेवलवमेंट में निवेश करने के साथ ही भविष्य में वैक्सीन का निर्माण भी कर सकती है।

कलकत्ता खिलाफत समिति ने ममता सरकार से माँगी ईद-उल-फितर नमाज की अनुमति, जुटती है 2 लाख से अधिक की भीड़

कोलकाता में हर साल ईद-उल-फितर नमाज की व्यवस्था करने के लिए जिम्मेदार कलकत्ता खिलाफत समिति (CKC) को हर बार की तरह इस बार भी रेड रोड पर नमाज के संचालन के लिए राज्य सरकार की अनुमति का इंतजार है। इस अवसर पर हर साल दो लाख से अधिक की भीड़ जमा होती है।

मिलेनियम पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, CKC के एक सदस्य मल्लिक मोहम्मद इशाक ने कहा, ”हमने पहले ही पिछले सप्ताह पूर्वी कमान को एक पत्र भेजा है। हम राज्य सरकार से अनुमति मिलने का इंतजार कर रहे हैं। अगर राज्य सरकार अनुमति देती है, तो कारी फजलुर रहमान कोविड-19 प्रोटोकॉल को बनाए रखते हुए रेड रोड पर नमाज का नेतृत्व करेंगे।”

कोविड -19 महामारी की वजह से लगाए गए लॉकडाउन के कारण पिछले साल खुला प्रार्थना सत्र आयोजित करने की अनुमति से इनकार कर दिया गया था। रेड रोड पर इकट्ठा होने वाली सभा को ईद-उल-फितर के अवसर पर विशेष नमाज के लिए देश में होने वाली सबसे बड़ी सभा कहा जाता है। सीकेसी 1920 से ही शहीद मीनार मैदान में प्रार्थना का आयोजन कर रहा है लेकिन 26 साल पहले इसे रेड रोड पर स्थानांतरित कर दिया गया था।

ईद-उल-फितर को 13 मई या 14 मई को चंद्र दर्शन के आधार पर मनाया जाएगा।

कोरोनावायरस की दूसरी लहर का कहर बंगाल में भी जारी

इस सभा के आयोजन की अनुमति ऐसे समय में माँगी गई है जब कोरोनोवायरस महामारी की दूसरी लहर चल रही है, जिसमें रोजाना 3,00,000 से अधिक नए कोरोनोवायरस मामले सामने आ रहे हैं।

स्वास्थ्य विभाग के आँकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल राज्य में मंगलवार को क्रमश: 107 मौतों और 17,639 मामलों के साथ एक दिन के अब तक के सर्वाधिक मौत और नए केस के मामले दर्ज किए गए।

‘बंगाल से राजनीतिक हिंसा को मिटा कर रहेंगे’: JP नड्डा ने भाजपा नेताओं के साथ ली शपथ, पुलिस पर मंच तोड़ने के आरोप

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा बुधवार (मई 5, 2021) को पश्चिम बंगाल के दौरे पर हैं। इस दौरान उन्होंने मृत भाजपा कार्यकर्ताओं के परिजनों से मुलाकात की, जो TMC के गुंडों द्वारा पिछले 3 दिनों से की जा रही हिंसा के शिकार हुए। उन्होंने कोलकाता में कार्यकर्ताओं को सम्बोधित भी किया। लगभग इसी समय राजभवन में ममता बनर्जी ने भी लगातार तीसरी बार प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।

जेपी नड्डा ने इस दौरान कहा कि भाजपा बाबासाहब भीमराव आंबेडकर द्वारा स्थापित किए गए संवैधानिक सिद्धांतों की स्थापना करेगी और पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा के खिलाफ आवाज़ उठाएगी। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी राज्य में सभी के लिए बराबरी का माहौल सुनिश्चित करेगी। नड्डा ने कहा कि जिन लोगों के पास लोकतंत्र की रक्षा करने का दायित्व है, वही लोग इस हिंसा के साजिशकर्ता हैं।

जेपी नड्डा ने इस दौरान खुद भी शपथ ली और भाजपा के अन्य नेताओं को भी शपथ दिलाई कि वो पश्चिम बंगाल को राजनीतिक हिंसा से मुक्त करा कर रहेंगे। उन्होंने कहा कि TMC वाले शपथ ले सकते हैं, सबका अधिकार है, लेकिन इसी दिन एक शपथ भाजपा भी ले रही है। उन्होंने कहा, “हम शपथ लेते हैं कि हम हमारी जिम्मेदारियों को निभाएँगे। हम जनादेश को स्वीकार करते हुए विपक्ष की भूमिका निभाएँगे।”

उन्होंने कहा, “हमने बंगाल में राजनीतिक हिंसा, तुष्टिकरण और अत्याचार के खिलाफ लड़ाई लड़ी। हम अपनी जिम्मेदारियों के निर्वहन से पीछे नहीं हटेंगे।” इधर भाजपा ने ये भी आरोप लगाया है कि पार्टी मुख्यालय के सामने जेपी नड्डा के धरने के लिए जो मंच बनाया था, उसे कोलकाता पुलिस ने ध्वस्त कर दिया। जेपी नड्डा अपने दौरे में पार्टी के 77 नए विधायकों और सभी 18 सांसदों से मुलाकात भी करेंगे।

चेन्नई की एक NGO ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाल कर माँग की है कि बंगाल के हिंसाग्रस्त इलाकों में अर्धसैनिक बलों की तैनाती हो और वहाँ बिगड़ती कानून-व्यवस्था के आलोक में राष्ट्रपति शासन लगाया जाए। कॉन्ग्रेस के जतिन प्रसाद ने कहा कि TMC के गुंडों द्वारा की जा रही हिंसा अस्वीकार्य है, वो महिलाओं और बच्चों तक को नहीं छोड़ रहे। TMC सांसद महुआ मोइत्रा ने दावा किया कि भाजपा देश भर में ऐसा माहौल बना रही है जैसे बंगाल जल रहा है, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है।

पश्चिम बंगाल ही नहीं, कश्मीर से लेकर तमिलनाडु तक भाजपा नेताओं ने धरना प्रदर्शन करके पश्चिम बंगाल में अपने कार्यकर्ताओं के खिलाफ हुई हिंसा को लेकर रोष जताया। अब तक भाजपा के 12 कार्यकर्ताओं की हत्या का आरोप लगा है। राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने भी ममता बनर्जी को राज्य में कानून का राज स्थापित करने की नसीहत दी, जिसके जवाब में ममता ने कहा कि उन्होंने तो अभी शपथ ली है और अब तक कानून-व्यवस्था चुनाव आयोग के हाथ में थी।

‘लकी अली हमेशा अलग आवाज के लिए याद किए जाएँगे’: उड़ गई मौत की अफवाह, नफीसा ने बताई हकीकत

मशहूर गायक लकी अली के निधन की खबरों ने मंगलवार (मई 4, 2021) को सबको झकझोर दिया। कई लोग ट्वीट कर कहने लगे कि उनका इंतकाल कोविड 19 की चपेट में आने के बाद हुआ। हालाँकि, बुधवार (मई 5, 2021) को उनकी दोस्त नफीसा अली ने इस संबंध में सच्चाई बताई। लकी अली की मौत की खबरों को अफवाह करार देते हुए नफीसा अली ने कहा कि लकी पूरी तरह से ठीक हैं।

नफीसा अली ने ट्विटर पर लिखा, “लकी पूरी तरह से ठीक हैं और हम दोनों ने इसी दोपहर बात की है। वह अपने फार्म पर हैं, परिवार के साथ। कोई कोविड नहीं है और वह अपने बेहतर स्वास्थ्य में हैं।”

एक्स्ट्रेस ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में बताया, “मैंने लकी से कम से कम 2-3 बार दिन में बात की। वह ठीक हैं। उन्हें कोविड नहीं है। उनमें एंटीबॉडीज हैं। वह अपने म्यूजिक और कॉन्सर्ट प्लानिंग में व्यस्त हैं। हम दोनों वर्चुअल कॉन्सर्ट के बारे में बात भी कर रहे थे जो आजकल हो रहे हैं। वह बेंगलुरु में अपने फार्म पर हैं और परिवार भी उनके साथ है। मैंने अभी उनसे बात की है और सभी स्वस्थ हैं।”

बता दें कि पिछले काफी समय से लकी अली मीडिया चर्चा से दूर हैं। उन्होंने ‘क्यूँ चलती है पवन’, ‘ओ सनम’, ‘जाने क्या ढूँढता है’ और ‘मौसम’ सहित कई बेहतरीन गाने गाए हैं। हाल में उनकी कुछ वीडियोज वायरल हुई थी जिसमें वह अपनी खूबसूरत आवाज में गाते नजर आए थे। मंगलवार को भी एक सोशल मीडिया यूजर ने यही लिखा था कि लकी अली को हमेशा उनकी अलग आवाज के लिए याद दिलाया जाएगा।

इसके बाद कोरोना काल को देखते हुए लोग उनके जिंदा होने की बात पूछने लगे। बाद में उस ट्विटर यूजर ने कहा, “लोगों को इन दिनों हो क्या गया है। अंग्रेजी समझ नहीं आती। मैंने लिखा है कि वो हमेशा अपनी आवाज के लिए याद रहेंगे। मैने कब बोला RIP। अपनी नेगेटिव सोच बदलो। लकी जिंदा है। हमेशा दिमाग में मरने की न्यूज रहती है।”