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केजरीवाल ने कहा था- मृत्यु हुई तो कोरोना वॉरियर्स को देंगे ₹1 करोड़, जान गँवाने वाले 12 पुलिसकर्मियों के परिजनों के दावे को नकारा

देश की राजधानी में कोरोना संक्रमण का पहला मामला 2 मार्च 2020 को सामने आया था। इसके कुछ दिन बाद चीनी वायरस के संक्रमण पर नियंत्रण पाने के लिए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन घोषित कर दिया गया था। इन सबके बीच दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ऐलान किया था कि ड्यूटी के दौरान जान गँवाने वाले कोरोना वॉरियर्स के परिवारों को राज्य सरकार एक करोड़ रुपए मुआवजा देगी।

दिल्ली के मुख्यमंत्री ने दावा किया था कि उनकी सरकार उन सभी लोगों के परिवार को 1 करोड़ रुपए की मदद देगी जिनकी मृत्यु कोरोना संक्रमितों की देखभाल के दौरान होगी। उन्होंने वादा किया था, “चाहे वह सफाई कर्मचारी हों, डॉक्टर हों, नर्स हों या कोई अन्य कर्मचारी, चाहे वह स्थायी हों या अस्थायी, सरकारी हो या निजी क्षेत्र से जुड़े हुआ हो।” 

लेकिन केजरीवाल सरकार ने ड्यूटी के दौरान कोरोना वायरस की वजह से मरने वाले 15 में से 12 पुलिसकर्मियों के परिजनों के दावों को दिसंबर 2020 में खारिज कर दिया। हिन्दुस्तान टाइम्स में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक़ केजरीवाल सरकार ने दावों को खारिज करते हुए कहा कि इन पुलिसकर्मियों की मृत्यु उस वक्त नहीं हुई, जब वे कोविड ड्यूटी पर थे। 

रिपोर्ट्स के मुताबिक़ 31 पुलिस वालों ने ड्यूटी के दौरान कोरोना वायरस की वजह से अपनी जान गँवाई। इनमें से 15 पुलिसकर्मी ड्यूटी में भी ‘कोविड ड्यूटी’ पर थे। दिल्ली की सरकार ने इन 15 पुलिस वालों के परिवार वालों में 12 परिवारों के दावे खारिज कर दिए हैं। 3 परिवारों का आवेदन लंबित है।

दिल्ली पुलिस के मुताबिक़ पुलिस महकमे द्वारा भेजे गए आँकड़ों से इतर कुछ वादे आप नेताओं, सरकार और खुद दिल्ली के मुख्यमंत्री द्वारा किए गए थे। एक पुलिस अधिकारी के हवाले से हिंदुस्तान टाइम्स ने कहा है, “जिनकी मृत्यु हुई वे फील्ड ड्यूटी पर थे और पूरे शहर में घूम रहे थे। उनके परिजनों को मुआवजे का दावा खारिज होने के बारे में बताना मुश्किल है।” 

मई 2020 के दौरान दिल्ली पुलिस के हवलदार अमित कुमार उत्तर पश्चिमी दिल्ली में ड्यूटी पर थे। इसके बाद वह कोरोना वायरस से संक्रमित हुए और उनकी जान चली गई। उनकी पत्नी गर्भवती थी और उन्हें दूसरा बच्चा होने वाला था। केजरीवाल ने उन्हें 1 करोड़ रुपए देने का ऐलान किया था। 

हवलदार की पत्नी नार्थ एमसीडी स्कूल में पढ़ाती थीं, लेकिन उनकी नौकरी भी छूट गई थी। उनके पति की कोरोना वायरस से मृत्यु हो जाने के बाद जब उन्हें क्वारंटाइन किया गया था तब उन्हें पता चला कि वे गर्भवती हैं। इनके परिवार को किसी भी तरह का आर्थिक सहयोग नहीं किया गया। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ दिल्ली पुलिस के हवलदार योगेंद्र प्रसाद यादव की मौत भी कोविड ड्यूटी के दौरान ही हुई थी। उन्हें सदर दिल्ली के पश्चिम विहार पुलिस थाने में तैनात किया गया था और उनकी मौत 7 जुलाई 2020 को हुई थी। उन्हें ड्यूटी में यह देखने की ज़िम्मेदारी मिली थी दिल्ली के लोग लॉकडाउन का पालन सही से कर रहे हैं या नहीं। 

दिल्ली सरकार द्वारा जारी किए गए अस्वीकृति पत्र के अनुसार, “मृतक रोज़मर्रा (रेगुलर) की ड्यूटी कर रहा था न कि कोविड 19 ड्यूटी जो कि 1 करोड़ रुपए का आर्थिक सहयोग प्राप्त करने के लिए सबसे अनिवार्य पैमाना है।” योगेंद्र प्रसाद यादव के पिता ने दिल्ली सरकार से ‘कोविड ड्यूटी’ की परिभाषा पूछी है। साथ ही दिल्ली के मुख्यमंत्री से अपना वादा निभाने का अनुरोध किया है। दिल्ली पुलिस के लगभग 7 हज़ार पुलिसकर्मी अब तक कोरोना वायरस से संक्रमित हो चुके हैं। इनमें से 500 अभी भी इससे जूझ रहे हैं।        

जिस मौलवी ने कहा- अल्लाह ऐसा वायरस भेज कि 50 करोड़ मरे, बंगाल में उसे साधने में जुटे ओवैसी

पश्चिम बंगाल में इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर राजनीतिक सरगर्मियाँ तेज हैं। बिहार विधानसभा चुनाव में 5 सीटों पर कब्जा करने वाली पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिममीन (AIMIM) के चीफ असदुद्दीन ओवैसी की नजरें भी अब ममता बनर्जी के गढ़ पर है। इसी कड़ी में रविवार (जनवरी 03, 2021) को उन्होंने राज्य का दौरा किया और मौलवी अब्बास सिद्दीकी से मुलाकात की।

ओवैसी हुगली जिले के फुरफुरा शरीफ पहुँचे और वहाँ सिद्दीकी के साथ राज्य के राजनीतिक परिदृश्य और आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर चर्चा की। मुलाकात के बाद उन्होंने कहा, “मैं आज अब्बास सिद्दीकी से मिला। हमारी पार्टी आगामी विधानसभा चुनावों में निश्चित रूप से भाग लेगी। हमारी पार्टी उन फैसलों के साथ खड़ी होगी जो अब्बास सिद्दीकी द्वारा उठाए जाएँगे।”

बता दें कि राज्य में चुनाव लड़ने की घोषणा करने के बाद ओवैसी की पश्चिम बंगाल की यह पहली यात्रा है। एआईएमआईएम के राज्य सचिव ज़मीरुल हसन ने कहा कि ओवैसी बैठक को गुप्त रखना चाहते थे, क्योंकि हमें आशंका थी कि राज्य सरकार कहीं उन्हें हवाई अड्डे से बाहर निकलने से रोक दे। वह कोलकाता हवाई अड्डे से अब्बास सिद्दीकी से मिलने के लिए सीधे हुगली गए।

फुरफुरा शरीफ के पीरजादा सिद्दीकी कई मुद्दों पर राज्य सरकार के खिलाफ बोलते रहे हैं। उन्होंने सीएम ममता को चेतावनी देते हुए कहा था, “पश्चिम बंगाल में चार करोड़ मुसलमान हैं। ममता को यह नहीं भूलना चाहिए कि हम हमेशा पश्चिम बंगाल में धर्मनिरपेक्ष विकल्प के रूप में कॉन्ग्रेस या माकपा को उनकी कब्र से जीवित कर सकते हैं।” फुरफुरा शरीफ का हुगली, बर्दवान, मुर्शिदाबाद और उत्तर तथा दक्षिण 24 परगना जैसे जिलों में काफी प्रभाव माना जाता है।

इस साल की शुरुआत में अब्बास सिद्दीकी के एक वीडियो पर काफी विवाद हुआ था, जिसमें उन्होंने कहा था, “मैं अल्लाह से प्रार्थना करता हूँ कि वह भारत में ऐसा घातक वायरस भेजे जो 50 करोड़ लोगों को मार डाले।”

बीते साल नवंबर में पत्रकार अभिजीत मजूमदार ने एक वीडियो शेयर किया था, जिसमें अब्बास सिद्दीकी बंगाल में मुस्लिमों की जनसंख्या को लेकर दावे कर रहे थे। उन्होंने बताया कि इस वीडियो में मौलवी सिद्दीकी कह रहा था, “हम मुस्लिम यहाँ पर बहुसंख्यक हैं। आदिवासी, मथुआ और दलित हिन्दू नहीं हैं, इसीलिए यहाँ हम मेजोरिटी में हैं।” मजूमदार ने कहा कि यहाँ एक ही रणनीति दिखती है– हिन्दुओं को विभाजित करो, मुस्लिमों को एक करो।

पश्चिम बंगाल के राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि असदुद्दीन ओवैसी ने अब्बास सिद्दीकी को 50 सीटें देने का फैसला लिया है। उनका असदुद्दीन ओवैसी को समर्थन देना राज्य में मुस्लिम वोटों की बड़ी गोलबंदी की ओर इशारा करता है, जिसका सीधा प्रभाव ममता बनर्जी पर पड़ने वाला है। उन्होंने कबूला है कि असदुद्दीन ओवैसी के साथ मिल कर चुनाव लड़ने के लिए एक राजनीतिक फॉर्मूले पर काम हो रहा है।

J&K: आज डीडीसी चुनाव में कमाल, कल घाटी में हो सकते हैं BJP का भविष्य

अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा वापस ले लिया गया था। प्रदेश को दो केंद्र शासित राज्यों में बाँटा गया था। इसके बाद वहाँ पर पहली बार जिला विकास परिषद (डीडीसी) के चुनाव हुए जिसमें भाजपा ने 74 सीटों पर जीत दर्ज की। इस जीत के साथ भाजपा वहाँ एक बड़ी पार्टी बन कर उभरी है। इस जीत में कुछ नाम ऐसे हैं जो आने वाले वक़्त में राज्य में भाजपा की ‘पंचायत से संसद’ की यात्रा में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

मिन्हा लतीफ़ 

दक्षिण कश्मीर के काकपोरा 2 से जीत हासिल करने वाली 22 वर्षीय मिन्हा लतीफ़ क़ानून की अंतिम वर्ष की छात्रा है। घाटी में भाजपा की इस युवा उम्मीदवार की जीत सभी के लिए चौंकाने वाली थी। मिनहा ने इस जीत के बाद कहा था, “मैं पढ़ाई पूरी करने के साथ-साथ अपने क्षेत्र के लिए कुछ करना चाहती थी। मैं चाहती थी कि मेरे पास ऐसी पृष्ठभूमि हो जिससे मेरा भविष्य जन सेवा में सुनिश्चित हो सके।” 

मिन्हा के पिता लतीफ़ भट्ट केंद्र शासित प्रदेश के भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के उपाध्यक्ष हैं। उन्होंने ही अपनी बेटी के सामने डीडीसी चुनाव में लड़ने का प्रस्ताव रखा था। काकपोरा सीट महिलाओं के लिए आरक्षित भी थी। मिन्हा पब्लिक सेक्टर में ही कुछ बेहतर करना चाहती थीं, इसलिए उन्होंने चुनाव लड़ने की बात पर सहमति जताई। आखिरकार उन्होंने पीडीपी प्रत्याशी रुकैया बानो को 14 मतों से हराया था। मिन्हा का कहना है कि वह अपनी पढ़ाई जारी रखने के साथ जिले का विकास भी सुनिश्चित करेंगी।

कुमारी श्वेता

30 वर्षीय कुमारी श्वेता पेशे से होम्योपैथ चिकित्सक हैं। उन्होंने पूर्व विधायक और डोगरा स्वाभिमान संगठन पार्टी की उम्मीदवार कांता अंदोत्रा को 1675 मतों के अंतर से हराया। उनका कहना है, “मैं जगतपुर गाँव से आती हूँ। ये लखनपुर स्थित राजमार्ग से सिर्फ 1 किलोमीटर दूर है फिर भी यहाँ सड़क नहीं है। पिछले साल जब मेरी शादी हुई और मैं बाहर आई तब मुझे कहीं भी जाने के लिए पैदल चलना पड़ता था। तभी मैंने तय किया कि मुझे चुनाव लड़ना है और अपने क्षेत्र के हालात बेहतर करने हैं।” 

श्वेता का मानना है कि डीडीसी चुनाव के बाद घाटी में रहने वाले लोगों के स्थानीय मुद्दे सामने आएँगे। इसके अलावा जम्मू और कश्मीर के बीच की दूरी भी कम होगी। दोनों क्षेत्रों के प्रतिनिधि एक-दूसरे पर फंड्स के बड़े हिस्से पर कब्ज़ा करने का आरोप लगाते थे। अब दोनों क्षेत्रों के पास बराबर चुनावी क्षेत्र हैं, ऐसे में बदलाव की आशा की जा सकती है। उन्होंने कहा, “प्रचार अभियान के दौरान मुझे आभास हुआ कि मेरे क्षेत्र में दवाखानों (डिस्पेंसरी) की संख्या बहुत कम है। स्वास्थ्य सुविधाओं को मद्देनज़र रखते हुए उनकी संख्या बढ़ाना मेरी सबसे पहली प्राथमिकता होगी।”        

एजाज़ अहमद खान और एजाज़ हुसैन

दो नाम ऐसे हैं जिन्होंने घाटी के संवेदनशील क्षेत्रों में जीत दर्ज की है। ये हैं, उत्तरी कश्मीर के बांदीपुरा स्थित तुलैल से जीत दर्ज करने वाले एजाज़ अहमद खान और खूनमोह से जीत हासिल करने वाले इंजीनियर एजाज़ हुसैन। भाजपा उम्मीदवार एजाज़ अहमद खान इस जीत का पूरा श्रेय पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को देते हैं। 

उन्होंने कहा कि पार्टी ने क्षेत्र में जिस तरह काम किया उसकी वजह से ही उन्हें जीत हासिल हुई। एजाज़ पूर्व विधायक फ़ाकिर मोहम्मद खान के बेटे हैं। वहीं खूनमोह से भाजपा के टिकट पर जीत हासिल करने वाले इंजीनियर एजाज़ हुसैन ने बताया कि वह 2006 से भाजपा के साथ हैं। वह पार्टी के युवा मोर्चा के पदाधिकारी भी हैं।

सतपाल निश्चल की हत्या का पाकिस्तान ही जिम्मेदार नहीं, भारत का ​सेक्युलर-लिबरल पॉलिटिक्स भी दोषी

जम्मू-कश्मीर में बीते दिनों आतंकवादियों ने सतपाल निश्चल की गोली मार कर हत्या कर दी। उन्हें हाल ही में डोमिसाइल सर्टिफिकेट मिला था। इससे उन्हें कश्मीर में अचल संपत्ति खरीदने और अन्य चीजों के अधिकार मिले थे। दुखद बात यह है कि यही उनकी हत्या की वजह भी बनी। 70 वर्षीय बुजुर्ग सतपाल पिछले चालीस वर्षों से कश्मीर में रह रहे थे और गुरुवार को डोमिसाइल सर्टिफिकेट प्राप्त करने के कारण मारे जाने वाले वह पहले व्यक्ति बन गए।

सतपाल निश्चल की हत्या की जिम्मेदारी आतंकी संगठन ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ (TRF) ने ली है। इस आतंकी संगठन ने सोशल मीडिया पर धमकी देते हुए एक बयान भी जारी किया। बयान में कहा गया कि जिन लोगों ने डोमिसाइल सर्टिफिकेट हासिल किया है वे सभी ‘आरएसएस’ एजेंट हैं। वह ऐसे सभी लोगों के नाम और पते जानता है। यह भी जानता है कि वे क्या करते हैं। टीआरएफ ने धमकी दी है कि अगला नंबर ऐसे ही अन्य लोगों का हो सकता है।

सतपाल निश्चल कश्मीर में चल रहे सिविलाइज़ेशन वॉर में जान गँवाने वाले पहले व्यक्ति नहीं हैं। उनकी हत्या इसलिए नहीं की गई है क्योंकि वह एक कश्मीरी नहीं थे या उन्होंने कश्मीरियों के खिलाफ कोई काम किया हो। उनकी हत्या तो इसलिए की गई कि वह इस्लाम के अनुयायी नहीं थे।

हैरानी की बात है कि म्यांमार के रोहिंग्या जम्मू कश्मीर में ‘घुसपैठ’ करने में कामयाब रहे हैं। आज वे बिना किसी खतरे के वहाँ रह रहे हैं। लेकिन कश्मीरी पंडितों को उनके घरों से बाहर कर दिया गया और वे तीन दशक बाद भी वापस नहीं लौट पाए। ऐसा क्यों है?

कुछ लोगों को भ्रम है कि कश्मीर में आतंकवाद कश्मीरी स्वतंत्रता से संबंधित है और इस्लाम का इससे बहुत कम लेना-देना है। मीडिया में मौजूद प्रोपेगेंडाबाज भी इस नैरेटिव को आगे बढ़ाने की भरसक कोशिश करते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि वहाँ पर अवैध रोहिंग्या मुस्लिम अप्रवासी को तो शरण मिल जाता है, लेकिन कश्मीरी पंडितों को भगा दिया जाता है। भारत के अन्य क्षेत्र के हिंदुओं को ‘आरएसएस एजेंट’ करार दिया जाता है। यह सब दिखाता है कि यह कश्मीरियत के बारे में नहीं, बल्कि इस्लामी आतंकवाद के बारे में है।

दुर्भाग्य की बात यह है कि कुछ ही दिनों में सतपाल निश्चल का नाम भुला दिया जाएगा और कश्मीर में दशकों से जारी हिंसा का सिलसिला यूँ ही जारी रहेगा। इसके बाद अधिकारी खुद को यह कहते हुए सांत्वना देंगे कि पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी हत्या के लिए जिम्मेदार हैं।

हो सकता है कि आतंकवादियों को पाकिस्तान का समर्थन प्राप्त हो। लेकिन क्या कोई गंभीरता से इस बात को मानेगा कि कश्मीर में हिंदुओं की स्थिति पाकिस्तानी हिंदुओं से अलग नहीं होती, अगर वहाँ पर भारतीय सेना नहीं होती। फिर भी इस्लामी कट्टरपंथ की वास्तविक समस्या को ढँकने के लिए हम पर कश्मीरी प्रोपेगेंडा थोपा जाता है।

वैसे देखा जाए तो इसका कोई सरल समाधान भी नहीं है। अंतत: सिविलाइज़ेशन वॉर में लोगों को अपने खून की कीमत ही चुकानी पड़ेगी और इतिहास इस तथ्य का प्रमाण है कि इसके लिए पहले से ही बहुत सारे रक्त का बलिदान किया जा चुका है और आगे भी जारी रहेगा।

कश्मीर में भारतीय राज्य और भारतीय नागरिक जिस दुश्मन का सामना कर रहे हैं, वह है- राजनीतिक इस्लाम। दूसरी ओर, धर्मनिरपेक्षता का भारतीय ब्रांड इस मामले पर वैचारिक स्पष्टता को रोकने के लिए ओवरटाइम काम करता है, ताकि खतरे का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सके। जब कश्मीर की बात आती है तो बहुसंस्कृतिवाद हमारी ताकत है। कश्मीर में राजनीतिक इस्लाम के खतरे को बेअसर करने का एकमात्र तरीका क्षेत्र की सांस्कृतिक समृद्धि है।

यदि ‘विविधता वास्तव में हमारी ताकत है’, तो भारत में कश्मीर इसका परीक्षण करने के लिए सबसे उपयुक्त जगह है। लेकिन जब इस तरह के सुझाव दिए जाते हैं, तो हमारे देश में सेक्युलर-लिबरल फासीवाद का रोना रोना शुरू कर देते हैं। यह जानना काफी महत्वपूर्ण है कि सतपाल निश्चल की हत्या इसलिए की गई क्योंकि वह उस विविधता का प्रतिनिधि थे, जिससे घाटी में इस्लामी आतंकवादी सबसे ज्यादा डरते हैं।

सतपाल निश्चल की हत्या कर दी गई क्योंकि कश्मीर में इस्लामी आतंकवादी क्षेत्र के सांस्कृतिक संवर्धन की अनुमति नहीं दे सकते। लेकिन भारत सरकार इस त्रासदी के बाद चुने गए रास्ते से नहीं हट सकती। इसके बजाए, उसे उन अताताइयों को सबक सिखाना होगा, जिन्होंने 70 साल के बुजुर्ग को मौत के मौत के घाट उतार दिया।

यही आगे का रास्ता है। सेक्युलर-लिबरल भारतीय हितों को कमजोर करने के लिए जातीय-वर्चस्ववादी इस्लामी आतंकवादियों के साथ सहयोगी बनने के लिए तैयार हैं। लेकिन भारी दबाव के बावजूद पीछे नहीं हटा जा सकता। अगर ऐसा हुआ तो धारा 370 के निरस्त होने के बाद से कश्मीर ने जो प्रगति की है, वह सब खत्म हो जाएगी।

अब देवी सीता की मूर्ति तोड़ी, आंध्र प्रदेश में मंदिरों पर हमले का सिलसिला जारी

आंध्र प्रदेश में मंदिरों पर हमले की घटनाएँ थम नहीं रही है। विजयवाड़ा के सीताराम मंदिर में देवी सीता की मूर्ति खंडित पाई गई है। यह मूर्ति 40 साल पुरानी बताई जा रही है। यह मंदिर विजयवाड़ा के पंडित नेहरू बस कॉम्पलेक्स में स्थित है।

बीते कुछ दिनों के भीतर इस तरह की यह तीसरी घटना है। इससे पहले विजयनगरम जिले की एक मंदिर में विराजित भगवान राम की 400 साल पुरानी मूर्ति खंडित कर दी गई थी। इसके बाद राजमुंद्री के विघ्नेश्वर मंदिर में भगवान सुब्रमण्येश्वर स्वामी की मूर्ति क्षतिग्रस्त करने का मामला सामने आया था।

बता दें कि रविवार (जनवरी 03, 2021) को विजयवाड़ा के सीताराम मंदिर में देवी सीता की एक मूर्ति टूटी हुई मिली थी। मंदिर के पुजारी ने देवी सीता की मूर्ति खंडित पाए जाने की पुलिस में शिकायत की। सर्कल इंस्पेक्टर सत्यानंद ने मंदिर का दौरा किया। पुलिस जाँच शुरू कर रही है।

पुलिस ने बताया कि सीसीटीवी फुटेज की जाँच कर पता लगाया जा रहा है कि क्या बदमाशों ने मूर्ति को खंडित किया है। इस बीच, हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने मूर्ति खंडित किए जाने के विरोध में मंदिर में धरना-प्रदर्शन किया।

बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव सुनील देवधर ने रेड्डी सरकार को जमकर लताड़ लगाई। उन्होंने कहा, “YSRCP पार्टी और TDP नेताओं द्वारा कल के नाटक के बावजूद, मंदिरों पर हमले जारी हैं।” देवता की मूर्ति तोड़ने की पिछली घटनाओं की ओर इशारा करते हुए, देवधर ने सीएम रेड्डी से सवाल किया कि ‘यह केवल हिंदुओं के साथ ही क्यों हो रहा है?’ 

आंध्र प्रदेश के सीएम पर निशाना साधते हुए, बीजेपी के देवधर ने कहा, “अब बहुत हो गया। वाईएस जगनमोहन रेड्डी, क्या आपकी चुप्पी और निष्क्रियता को उपद्रवियों के लिए छिपे समर्थन के रूप में नहीं माना जाना चाहिए? क्या आप हिंदू भावनाओं को ऐसे ले रहे हैं? विडंबना यह है कि वाईसीपी के सभी हिंदू नेता भी चुप हैं। क्या उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि लोग उन्हें नहीं छोड़ेंगे।”

तेलुगु देशम पार्टी के आधिकारिक प्रवक्ता पट्टाभि ने मंदिर का दौरा किया। पुलिस की ओर से जानवरों द्वारा मूर्ति को खंडित किए जाने की आशंका जताए जाने पर तेदेपा नेताओं की पुलिस से बहस हो गई। पूर्व मंत्री एवं वरिष्ठ तेदेपा नेता देवीनेनी उमामहेश्वर राव ने आरोप लगाया कि वाईएसआरसीपी सरकार अपनी विफलताओं को छुपाने के लिए मंदिरों पर हमले और देवताओं की मूर्तियों के साथ तोड़-फोड़ करवा रही है। तेदेपा विधायक बुद्ध वेंकन्ना ने भी इस घटना की निंदा करते हुए आरोप लगाया कि वाईएसआरसीपी प्रशासन में देवताओं की मूर्तियाँ भी सुरक्षित नहीं है।

गौरतलब है कि हाल ही में आंध्र प्रदेश के राजमुंद्री के विघ्नेश्वर मंदिर में भगवान सुब्रमण्येश्वर स्वामी की प्रतिमा को भी क्षतिग्रस्त कर दिया गया। राजमुंद्री का श्रीराम नगर ईस्ट गोदावरी जिले में पड़ता है। राजमुंद्री को आंध्र की सांस्कृतिक राजधानी भी कहते हैं, लेकिन लोगों का दावा है कि यहाँ ईसाई मिशनरियों का बोलबाला है।

इस घटना से 2 दिन पहले ही विजयनगरम जिले के नेल्लीमरला मंडल में एक पहाड़ी पर स्थित मंदिर में अज्ञात उपद्रवियों ने भगवान राम की 400 साल पुरानी मूर्ति को क्षतिग्रस्त कर दिया था। मूर्ति रामतीर्थम गाँव के पास पहाड़ी की चोटी पर स्थित बोडिकोंडा कोदंडाराम मंदिर में विराजमान थी। उपद्रवी ताला तोड़ मंदिर के गर्भगृह में घुसे और और स्वामी कोदंडारामुडु का सिर काटकर अलग कर दिया। मुख्य मंदिर पहाड़ी की तलहटी में है।

बता दें कि मंदिरों पर हो रहे हमले को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने कहा था, “जगन रेड्डी ईसाई हो सकते हैं। लेकिन यह सोचना कि वह अपने शक्ति का इस्तेमाल हिंदुओं को धर्मांतरित करने के लिए कर सकते हैं, गलत है। अगर सत्ता में लोग धर्मांतरण का सहारा लेते हैं, तो यह विश्वासघात होता है। किसी को भी इस तरह की धार्मिक असहिष्णुता नहीं दिखानी चाहिए। अयोध्या के राम मंदिर में ‘जय श्री राम’ का नारा गूँजता है। ठीक इसी तरह, रामतीर्थम के राम मंदिर को हमेशा उत्तर आंध्र में सम्मान के साथ देखा गया है। ऐसे मंदिर में उपद्रवियों ने भगवान राम की मूर्ति के साथ बर्बरता की है, लेकिन सरकार दोषियों को पकड़ने के लिए कोई कदम नहीं उठा रही है।”

पाकिस्तान के बलूचिस्तान में अपहरण के बाद 11 कोयला खनिकों की गोली मारकर हत्या

बलूचिस्तान के माच (Mach) इलाके में रविवार (जनवरी 03, 2021) को बंदूकधारी आतंकवादियों ने 11 कोयला खनिक को गोली मार कर मौत के घाट उतार दिया। 4 घायल बताए जा रहे हैं। आतंकवादी कोयला खनिकों को अगवा कर पास के पहाड़ी में ले गए और पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिमी बलूचिस्तान प्रांत में उन पर गोलियाँ चला दी।

पाकिस्तानी मीडिया Dawn के मुताबिक लेविस फोर्स के एक अधिकारी मोअज्जम अली जतोई ने बताया कि 6 कोयला खनिकों की मौके पर ही मौत हो गई थी, जबकि पाँच जो गंभीर रूप से घायल थे, उनकी अस्पताल ले जाते समय मौत हो गई।

जतोई ने कहा कि प्रारंभिक जाँच में पता चला है कि हमलावरों ने शिया हजारा समुदाय से संबंध रखने वाले कोयला खनिकों की पहचान की और उन्हें मार डाला। वहीं अन्य लोगों को छोड़ दिया गया, उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाया गया। फिलहाल किसी ग्रुप ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है।

घटना के बाद पुलिस, फ्रंटियर कॉर्प्स और जिला प्रशासन के अधिकारियों की भारी टुकड़ी घटनास्थल पर पहुँची। बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री जाम कमाल खान ने इस घटना की निंदा की है और संबंधित अधिकारियों से जाँच रिपोर्ट माँगी है। उन्होंने कहा, “जिन्होंने इन निर्दोष कोयला खनिकों को निशाना बनाया, वे किसी भी रियायत के लायक नहीं हैं।”

पाकिस्तानी पत्रकार अनस मल्लिक ने ट्विटर पर लिखा कि माच में पूर्ण रूप से नरसंहार को अंंजाम दिया गया है। भीषण तरीके से मारे गए 11 कोयला खनिकों में अधिकतर शिया हजारा समुदाय से थे। उन्होंने उम्मीद जताई है कि बलूचिस्तान सरकार इसमें शामिल लोगों के खिलाफ ठोस कार्रवाई करेगी। क्वेटा के उपायुक्त मुराद कास के अनुसार, अभी तक कोई मामला दर्ज नहीं किया गया है।

वहीं बलूचिस्तान में हुई इस दर्दनाक घटना के बाद ट्वीट करते हुए पाकिस्तान के पीएम इमरान खान ने कहा कि माच में 11 निर्दोष कोयला खनिकों की निंदनीय हत्या आतंकवाद का एक और कायरतापूर्ण अमानवीय कृत्य है। उन्होंने इन हत्यारों को पकड़ने और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए सभी संसाधनों का उपयोग करने के निर्देश दिए हैं।

गौरतलब है कि पिछले दिनों बलूचिस्तान नेशनल पार्टी (बीएनपी) के नेता मीर नवाब अमानुल्लाह जेहरी की खुजदार में देर रात गोली मारकर हत्या कर दी गई। हमलावरों ने जेहरी के 14 साल के पोते और दो मित्रों को भी गोलियों से छलनी कर दिया था। बीएनपी अध्यक्ष और नेशनल एसेंबली के सदस्य अख्तर मेंगल ने जेहरी की हत्या को पार्टी और बलूचिस्तान की जनता के लिए काला दिवस करार दिया था।

मुनव्वर फारूकी अगर ‘शार्ली एब्दो’ होता तो उसकी गर्दन नीचे पड़ी होती… लटर-पटर बंद करो लिबरलों

12 सितम्बर 2001 को इस्लामी आतंकवाद ने दुनिया को दहलाया था और अमेरिका के ट्विन टॉवर्स पर हुए हमले में करीब 3000 लोग मारे गए। ये एक घटना हुई। विनोद (काल्पनिक नाम) ने इसका विरोध किया। अफजल (बेहद ही काल्पनिक नाम) ने इसका समर्थन किया। कुछ दिन बाद अफजल ने विनोद के घर में घुस कर पेशाब कर दिया। विनोद ने उसे धक्का देकर बाहर निकाल दिया। मीडिया ने कहा, “विनोद और ओसामा में कोई अंतर नहीं।” तथाकथित कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी के मामले में यही हो रहा है। उसकी गिरफ़्तारी की तुलना ‘शार्ली एब्दो नरसंहार’ से की जा रही है।

हिन्दू देवी-देवताओं को गाली देकर अपना व्यापार चलाने वाला, अपने हमनाम बुजुर्ग शायर के इस्लामी कट्टरवाद का अनुसरण करने वाला और देश के चुने हुए जनप्रतिनिधियों को अपमानित कर के तालियाँ पिटवाने वाले एक कॉमेडियन को जब कोई आक्रोश में एकाध चाँटा लगा देता है और पकड़ के पुलिस को सौंप देता है तो सीधे इसकी तुलना हिरोशिमा और नागासाकी बम ब्लास्ट से करने वाले पैदा हो जाते हैं। कौन हैं ये लोग? कहाँ से आते हैं?

दोनों ही सवालों के जवाब स्पष्ट हैं। ये लिबरल-सेक्युलर-कट्टर इस्लामी गिरोह के लोग हैं, जो मोदी विरोधी गुट से आते हैं। ये कहानी वही विनोद और अफजल वाली है। विनोद के घर में घुस कर अफजल लगातार उसके माता-पिता और पूर्वजों को गालियाँ बक रहा है और जब विनोद ने उसे धक्का देकर निकाल दिया तो वो बड़े-बड़े नरसंहारकों से भी भयानक हो गया। मीडिया का ये गुट चाहता है कि विनोद का घर अफजल का बाथरूम बन जाए और विनोद को आपत्ति जताने तक का भी हक़ न हो।

ये वही हैं, जो दिल्ली में 50 लोगों को मौत के घाट उतार देते हैं और इनके खिलाफ एक चार्जशीट तक भी दायर हो जाए तो ये पीएम मोदी की तुलना 60 लाख लोगों को मरवाने वाले हिटलर से करने लगते हैं। जबकि अगर इन्होंने हिटलर राज में अपनी इस गुंडई का हजारवाँ हिस्सा भी प्रदर्शित किया होता तो इनके शरीर में कहाँ-कहाँ शॉक दिए जाते, ये इन्हें भी नहीं पता। यहाँ ये कट्टरवाद का झंडा लिए घूम भी रहे हैं और सामने वाले पर हर वो इल्जाम लगा रहे हैं, जिसमें वो खुद हद से ज्यादा फिट बैठते हैं।

अप्रैल 2013 में ‘बिजनेस टुडे’ पत्रिका में एमएस धोनी को भगवान विष्णु बना दिया जाता है। खुद को नास्तिक बताने वाला अर्मिन नवाबी माँ काली की आपत्तिजनक तस्वीर पोस्ट कर के उन्हें ‘सेक्सी’ बताता है। ‘पीके’ फिल्म में आमिर खान भगवान शिव का अपमान करता है। कोई कट्टरवादी अपने सोशल मीडिया हैंडल्स से खुलेआम भगवान राम और सीता की आपत्तिजनक तस्वीरें पोस्ट करता है। ऐसे सैकड़ों इन्सिडेंट्स हुए हैं।

इनमें से किसी एक को कभी कुछ नहीं हुआ। वो इसीलिए, क्योंकि हिन्दू इस विश्व का सबसे उदार और सहिष्णु समुदाय है। उनके खिलाफ अगर किसी ने आक्रोशित होकर विरोध का एक स्वर उठा भी दिया तो ये बड़ी खबर बन गई और ऐसा दिखाया गया जैसे पूरे देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी (FOE) के लिए कोई जगह ही नहीं रही। हिन्दुओं के लिए भावनाएँ आहत होने पर विरोध में चूँ करने की तुलना नरसंहार से हो रही है।

ये वही बात हुई कि ओसामा बिन लादेन एक साथ 3000 लोगों का नरसंहार कर के भी ‘अच्छा शौहर’ के रूप में देखा जाता है। रियाज़ नाइकू कइयों को मौत के घाट उतार कर भी ‘गणित का शिक्षक’ बना रहता है और विनोद अपने घर में पेशाब करते अफजल को धक्का दे दे, तो वो इन दोनों से भी बड़ा ‘आतंकी’ साबित कर दिया जाता है। हिन्दू देवी-देवता कोई कॉमिक आइटम हैं क्या? मोदी-शाह ने इन कथित कॉमेडियनों का कर्जा खाया है कि वो उनसे अपमानित होते रहें?

ये भूमिका थी। मध्य प्रदेश की घटना पर वापस आते हैं, जहाँ इंदौर में एक कार्यक्रम में हिन्दू देवी-देवताओं को अपशब्द कह कर और मोदी-शाह को अपमानित कर तालियों की अपेक्षा करने वाले मुनव्वर फारूकी को कुछ लोगों ने पुलिस को सौंप दिया। इन लोगों की भावनाएँ आहत हुईं और उन्होंने प्रतिक्रिया दी। फारूकी के दोस्त को कोर्ट में वकीलों ने भी एकाध चाँटा लगा दिया। अब किसी को पकड़ कर सबूतों के साथ पुलिस को सौंपना कब से अपराध हो गया?

वहाँ के हिन्दुओं ने कार्यक्रम का वीडियो बनाया है और उस वीडियो को सबूत के रूप में पुलिस को सौंपा है। लेकिन, इधर सोशल मीडिया पर कुछ लिबरल-सेक्युलर-कट्टरवादी एक्टिव हो गए। कर्नाटक कॉन्ग्रेस के नेता श्रीवत्स ने ‘भक्तों’ पर तंज कसते हुए लिखा कि ये लोग शार्ली एब्दो को FOE के रूप में देखते हैं, जबकि मुनव्वर फारूकी को FOE का अधिकार नहीं देना चाहते। उन्होंने लिखा कि अमेरिका में कोई भेदभाव नहीं है और सब बराबर हैं, जबकि भारत में हिंदुत्व का राज है और कोई धर्मनिरपेक्षता नहीं है।

उन्होंने आगे लिखा, “भाजपा भक्त कभी स्वतंत्रता या बराबरी के अधिकारी को लेकर सजग नहीं हैं। वो असहिष्णु लोग हैं, जो अपने हिसाब से अपना स्टैंड बदलते रहते हैं।” अगर ऐसा है, तो कभी कोई ‘भक्त’ हाफिज सईद, लखवी, बुरहान वानी, लादेन या अफजल का गुणगान करता हुआ क्यों नहीं पाया जाता? जब ‘भक्त’ हमेशा अपना स्टैंड बदलते रहते हैं तो कभी वो अलकायदा और ISIS का समर्थन क्यों नहीं करते?

इसी तरह प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘ऑल्टन्यूज़’ की सह-संस्थापक सैम जावेद ने शार्ली एब्दो की FOE के दक्षिणपंथी झंडाबरदार एक कॉमेडियन से ऑफेंड महसूस कर रहे हैं? असल में इनका मकसद ये तो है ही कि अपने देवी-देवताओं को गालियाँ देने वालों का विरोध करने वाले हिन्दुओं को गलत साबित करें , लेकिन इससे भी बड़ा इनका मकसद है कि ये उन लोगों को सही साबित कर सकें, जिन्होंने शार्ली एब्दो के दफ्तर में घुस कर 12 लोगों की बेरहम हत्या कर दी थी।

लखनऊ में कमलेश तिवारी सिर का एक बयान के कारण कलम कर दिया जाता है। वो भी तब, जब वो इसी के लिए जेल की सज़ा भुगत कर आए होते हैं। फ्रांस में शिक्षक सैमुअल पैटी का गला रेत दिया जाता है। ऐसी न जाने कितनी ही घटनाएँ हैं, जहाँ मुस्लिमों की भावनाएँ आहत करने के नाम पर खून बहाए गए, लेकिन हिन्दुओं की भावनाएँ आहत होने पर प्रतिकार स्वरूप सोशल मीडिया पर दो शब्द लिख देना भी सैमुअल पैटी और कमलेश तिवारी के हत्यारों से भी बड़ा अपराध बन जाता है।

जब भारती, रवीना टंडन और फराह खान जैसी बड़ी फ़िल्मी हस्तियाँ बाइबिल के एक शब्द को लेकर कुछ मजाक कर देती हैं तो उन्हें सोशल मीडिया पर, मीडिया में और वेटिकन के पादरी से मिल कर हस्तलिखित माफीनामा सौंप कर- तीन तरह से माफी माँगनी पड़ती है। लेकिन, हिन्दू देवी-देवताओं को गाली देकर विरोध कर रहे हिन्दुओं को ही दोषी ठहरा कर हर कोई खुद को ‘बहादुर’ दिखाना चाहता है।

लिबरलों द्वारा शार्ली एब्दो के कार्टूनिस्टों की हत्या, सैमुअल पैटी की गर्दन काटने को मुनव्वर फारूकी की गिरफ्तारी के समानांतर रखना, बताता है कि इनके तर्क कितने वाहियात हैं। जहाँ कुछ बोलने के लिए किसी राष्ट्र के कानून के खिलाफ जा कर हत्या और कुछ बोलने पर राष्ट्र के कानून के आलोक में की गई गिरफ्तारी बराबर बात है। मुनव्वर फारूकी अगर ‘शार्ली एब्दो’ होता, तो उसकी गर्दन नीचे पड़ी होती, कानून के हिसाब से कोर्ट और पुलिस कार्रवाई नहीं कर रही होती। अगर ये ‘शार्ली एब्दो के बराबर घटना होती, तो मुनव्वर फारूकी के साथ-साथ उसके दोस्तों, दोस्तों के रिश्तेदारों- सभी की गर्दन जमीन पर पड़ी होती।

सूचित करते चलें कि मध्य प्रदेश के इंदौर में हिन्दू देवी-देवताओं और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर अभद्र टिप्पणी करने के आरोप में शनिवार को गिरफ्तार कथित कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी समेत 5 आरोपितों को 13 जनवरी तक न्यायिक हिरासत के तहत जेल भेज दिया गया है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) अमन सिंह भूरिया ने फारूकी और अन्य चार को जमानत देने से इनकार कर दिया। फारूकी की तरफ से वकील अंशुमन श्रीवास्तव ने अदालत में बहस की, जो कॉन्ग्रेस का नेता भी है।

‘नहीं लगवाऊँगा BJP की कोरोना वैक्सीन’ कहने के बाद अखिलेश यादव ने लिया यू टर्न

कोरोना वैक्सीन पर बेतुके बयानों के बाद सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सुर बदल गए हैं। शनिवार को उन्होंने इसे बीजेपी की वैक्सीन बताते हुए कहा था कि वे इसे नहीं लगवाएँगे। लेकिन अगले ही दिन उन्होंने टीकाकरण की तारीख जल्द तय करने की डिमांड रखी है।

सोशल मीडिया पर भारी आलोचनाओं के बाद अखिलेश यादव ने रविवार (3 दिसंबर, 2020) को ट्वीट किया, “कोरोना का टीकाकरण एक संवेदनशील प्रक्रिया है इसलिए भाजपा सरकार इसे कोई सजावटी-दिखावटी इवेंट न समझे और अग्रिम पुख़्ता इंतज़ामों के बाद ही शुरू करे। ये लोगों के जीवन का विषय है अत: इसमें बाद में सुधार का ख़तरा नहीं उठाया जा सकता है। गरीबों के टीकाकरण की निश्चित तारीख तय हो।”

हालाँकि अखिलेश यादव ने टीका नहीं लगवाने वाले अपने पहले फैसले के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की है। बता दें उन्होंने शनिवार को कहा था कि कोरोना टीका बीजेपी का है। वे कोरोना वैक्सीन नहीं लगवाएँगे, क्योंकि उन्हें इस टीके पर भरोसा नहीं है। अखिलेश ने दावा किया कि जब उत्तर प्रदेश में उनकी सरकार बनेगी तो वे प्रदेश की जनता को मुफ्त टीका लगवाएँगे।

सिर्फ अखिलेश ही नहीं उनकी पार्टी के विधायक आशुतोष सिन्हा ने तो यहाँ तक कह दिया कि हमें लगता है कि बीजेपी वाले बाद में कह देंगे कि जनसंख्या कम करने के लिए, नपुंसक बनाने के लिए लगा दिया वैक्सीन। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी ही नहीं किसी को भी वैक्सीन नही लगवाना चहिए।

उल्लेखनीय है कि देश में कोरोना वैक्सीन को लेकर ड्रग्‍स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) ने रविवार को बड़ा ऐलान करते हुए सीरम इंस्टीट्यूट की वैक्सीन कोविशील्ड (Covishield) और भारत बायोटेक की वैक्सीन कोवैक्सीन (Covaxin) के आपातकाल इस्तेमाल की अंतिम मंजूरी दे दी है। वहीं वैज्ञानिकों की इस सफलता पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पूरे देश को बधाई दी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट करते हुए कहा, “वैश्विक महामारी के खिलाफ भारत की जंग में एक निर्णायक क्षण! SerumInstIndia और BharatBiotech की वैक्सीन को DCGI की मंजूरी से एक स्वस्थ और कोविड मुक्त भारत की मुहिम को बल मिलेगा। इस मुहिम में जी-जान से जुटे वैज्ञानिकों-इनोवेटर्स को शुभकामनाएँ और देशवासियों को बधाई।”

उन्होंने आगे कहा, “हर भारतीय को गर्व होगा कि जिन दो टीकों को आपातकालीन उपयोग की मंजूरी दी गई है वे भारत में बने हैं!” पीएम मोदी ने देश को, वैज्ञानिकों को और नवोन्मेषकों को बधाई देते हुए कहा, “यह आत्मनिर्भर भारत के सपने को पूरा करने के लिए हमारे वैज्ञानिक समुदाय की इच्छाशक्ति को दर्शाता है। वह आत्मनिर्भर भारत, जिसका आधार है- सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।”

वहीं फ्रंटलाइन वॉरियर्स को धन्यवाद देते हुए पीएम मोदी ने कहा, “विपरीत परिस्थितियों में असाधारण सेवा भाव के लिए हम डॉक्टरों, मेडिकल प्रोफेशनल्स, वैज्ञानिकों, पुलिसकर्मियों, सफाईकर्मियों और सभी कोरोना वॉरियर्स के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। देशवासियों का जीवन बचाने के लिए हम सदा उनके आभारी रहेंगे।”

3 महीने पहले इस्लाम छोड़ मोहम्मद अनवर बने थे देव प्रकाश, कट्टरपंथियों ने जला डाला घर: एक्शन में UP पुलिस

उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने की घटना हुई है। रायबरेली जिले के रहने वाले एक व्यक्ति ने इस्लाम धर्म त्याग कर हिन्दू धर्म स्वीकार किया था। क्षेत्र के कट्टरपंथियों को यह बात पसंद नहीं आई, इसलिए उन्होंने उसके घर को आग के हवाले कर दिया। इस घटना के दौरान घर में उसके बच्चे भी मौजूद थे। किसी तरह सभी ने अपनी जान बचाई लेकिन घटना में उनका पूरा घर जल कर राख हो गया। 

सितंबर 2020 में रायबरेली, सलोन स्थित रतासो गाँव के निवासी मोहम्मद अनवर ने केकोगना घाट पर हिन्दू धर्म में वापसी की थी। धर्मांतरण के बाद मोहम्मद अनवर ने अपना नाम देव प्रकाश पटेल रख लिया था। धर्मांतरण के बाद उसके तीन बच्चों रेहान, अली और ख़ुशी का नाम देव नाथ, देवी दयाल और दुर्गा देवी कर दिया गया था। देव प्रकाश पटेल ने मुंडन करवाने के बाद पूरे विधि-विधान से हिन्दू धर्म में वापसी की थी। 

लेकिन उसके आस-पास रहने वाले कट्टरपंथियों को यह बात हज़म नहीं हुई। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ शनिवार (2 जनवरी 2021) को ग्राम प्रधान ताहिर अहमद ने देव प्रकाश पटेल के घर को आग के हवाले कर दिया। इस घटना के दौरान घर में मौजूद सभी लोग सो रहे थे। देव प्रकाश ने किसी तरह अपनी और अपने बच्चों की जान बचाई। लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद उसका घर पूरी तरह जल कर राख हो गया है। 

सलोन एसएचओ पंकज त्रिपाठी ने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया, “आरोपितों पर एफ़आईआर दर्ज कर ली गई है। पुलिस ने मामले की जाँच शुरू कर दी है, वारदात को अंजाम देने वालों को जल्द से जल्द गिरफ्तार कर लिया जाएगा।” 

दरअसल देव प्रकाश पटेल धर्मांतरण से पहले फ़कीर बिरादरी से ताल्लुक रखते थे। कुछ साल पहले उनकी पत्नी का निधन हो गया था। उनके दो बेटे और एक बेटी थी। उनके सामने जीवनयापन की बड़ी चुनौती थी।

इस बीच आस-पास रहने वाले हिन्दू परिवारों ने बिना किसी भेदभाव के उनकी काफी मदद की थी। वह इस बात से काफी प्रभावित हुए और उन्होंने इस्लाम धर्म त्याग दिया। देव प्रकाश ने हिन्दू धर्म स्वीकार करने से पहले प्रशासनिक अधिकारियों को भी सूचित किया था। साथ ही यह भी कहा था कि उन्होंने यह कदम अपनी इच्छा से उठाया है।                  

इबोला खोजने वाले डॉक्टर ने ‘Disease X’ को लेकर चेताया, कोरोना से भी ज्यादा घातक

इस वक्त दुनिया कोरोना महामारी से जूझ रही है। लेकिन, इबोला की खोज करने वाले डॉक्टर की मानें तो दुनिया पर इससे भी घातक महामारी का खतरा मँडरा रहा है। इसे नाम दिया गया है Disease X। 1976 में इबोला वायरस की खोज में मदद करने वाले प्रोफेसर जीन जैक्स मुएंबे तांफुम (Jean-Jacques Muyembe Tamfum) का कहना है कि अफ्रीका के वर्षा वनों से नए और घातक वायरस के फैलने का खतरा है।

प्रोफेसर तांफुम ने कहा कि हम अब ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहाँ नए वायरस आएँगे और इसी वजह से इंसानियत पर खतरा भी बना रहेगा। उन्होंने इंसानों से जानवरों में बीमारी के प्रसार को लेकर कहा कि यह मानवता के लिए कहीं अधिक खतरनाक हो सकता है और इसकी शुरुआत अफ्रीका के वर्षा वनों से होने की आशंका है।

हाल ही में अफ्रीका के कॉन्गो में एक मरीज में Hemorrhagic Fever के लक्षण दिखे। इसके बाद मरीज को आइसोलेट कर दिया गया और उसके सैंपल इबोला टेस्ट के लिए भेज दिए गए। इस दौरान तमाम मेडिकल एक्सपर्ट एक सवाल से जूझ रहे थे कि क्या होगा अगर महिला को इबोला ना हो? क्या होगा अगर महिला किसी नए वायरस से पैदा होने वाली ‘Disease X’ की पेशेंट जीरो हो? हालाँकि महिला का रिपोर्ट निगेटिव आया। लेकिन उनकी बीमारी आज भी रहस्य बनी हुई है।

WHO के अनुसार, ‘Disease X’ में X अज्ञात है। यानी एक अज्ञात बीमारी जो आने वाले वक्त में दुनिया में फैल सकती है। दुनिया के जाने-माने मेडिकल साइंटिस्ट्स का कहना है कि ‘Disease X’ का डर जायज है।

बता दें नया वायरस कोरोना की तरह से तेजी से फैल सकता है लेकिन इससे मरने वालों की संख्‍या इबोला से भी 50 से 90 फीसदी ज्‍यादा हो सकती है। गौरतलब है कि प्रोफेसर जीन ने वायरस का पता लगाने के लिए जिस नमूने को लिया था, उसे बेल्जियम और अमेरिका भेजा गया जहाँ वैज्ञानिकों ने पाया कि यह खून में वार्म के आकार के वायरस मौजूद है। बता दें इबोला होने पर खून बहने लगता था और मरीज की मौत हो जाती है।

कॉन्गो के Yambuku Mission Hospital में पहली बार रहस्यमय बीमारी की पुष्टि इबोला के रूप में हुई थी और तब हॉस्पिटल के 88 फीसदी मरीज और 80 फीसदी स्टाफ की जान इबोला ने ले ली थी।