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कानपुर किडनैपिंग और हत्या: CM योगी ने निलंबित किए 4 अधिकारी, फिरौती के ₹30 लाख की भी होगी जाँच

उत्तर प्रदेश के कानपुर में बिकरू हत्याकांड मामले के बीच लैब असिस्टेंट संजीत यादव के अपहरण और हत्या के मामले ने पूरे राज्य को झकझोर दिया। संजीत का अपहरण 22 जून को उसके दोस्त ने अपने साथियों के साथ मिलकर किया था।

अपहरण के पीछे फिरौती मुख्य कारण था। हालाँकि, बाद में पता चला कि फिरौती की रकम पाने से पहले ही उसकी हत्या कर दी गई और उसका शव पांडु नदी में फेंक दिया गया।

इस खबर को सुनते ही संजीत के पूरे परिवार में कोहराम मच गया। दूसरी ओर पुलिस भी लगातार नदी से उसके शव को निकालने की कोशिशों में जुटी है

इन सभी हलचल के बीच प्रदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मामले पर संज्ञान लेते हुए बड़ी कार्रवाई की है। खबरों के मुताबिक, सीएम योगी ने आईपीएस ऑफिसर अपर्णा गुप्ता, तत्कालीन डिप्टी एसपी मनोज गुप्ता समेत चार अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया है। साथ ही फिरौती के पैसे की जाँच का आदेश दिया गया है। अब आगे मामले की जाँच एडीजी बीपी जोगदंड को सौंपी गई है। उन्हें तुरंत ही कानपुर पहुँचने का आदेश दिया है।

गौरतलब है कि कानपुर के बर्रा से 22 जून को लैब टेक्नीशियन संजीत यादव (28) का अपहरण उसके ही दोस्त ने अपने साथियों के साथ मिलकर किया था। बाद में उसे 26 जून को मौत के घाट उतार दिया गया।

अपहरणकर्ता इतने चालाक थे कि वे संजीत को मारने के बाद भी फिरौती के पैसे माँगते रहे। आखिरकार 13 जुलाई को उन्हें ये रकम मिल गई और सभी पुलिस को चकमा देकर फरार भी हो गए। लेकिन, बृहस्पतिवार की रात पुलिस ने मामले का खुलासा करते हुए दोस्त कुलदीप, रामबाबू समेत 5 लोगों को गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस ने बताया कि कुलदीप संजीत के साथ सैंपल कलेक्शन का काम करता था। उसने रतनलाल नगर में किराए पर कमरा ले रखा है। 22 जून की रात शराब पिलाने के बहाने वह संजीत को अपने कमरे पर लाया। जहाँ सबने उसे बंधक बना लिया।

4 दिन तक बेहोशी के इंजेक्शन देकर उसे बंधक बनाए रखा गया। लेकिन 26 तारीख को संजीत ने उनके चंगुल से भागने की कोशिश की, तभी किडनैपर्स ने उसका गला दबा कर उसे मार डाला। 27 जून को उसका शव पांडु नदी में फेंक दिया गया

यहाँ बता दें संजीत यादव की बहन का आरोप है कि थानेदार से लेकर पुलिस अफसर तक सभी भाई की मौत के जिम्मेदार हैं। वहीं, पुलिस के मुताबिक अपहरण की साजिश में संजीत के ही कुछ दोस्त शामिल थे। पुलिस ने कुछ आरोपितों को गिरफ्तार कर मीडिया के सामने पेश किया। दो आरोपितों महिलाओं में से भी एक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस के मुताबिक, 26 जून को अपहृत संजीत यादव ने भागने की कोशिश की थी, तभी अपहरणकर्ताओं ने गला दबाकर हत्या की और 27 जून को संजीत का शव नहर में फेंक दिया। गिरफ्तारी के बाद आरोपितों ने अपना जुर्म कबूल लिया है। आरोपितों ने बताया कि वो फिरौती मिलने के बाद संजीत को छोड़ने वाले थे लेकिन संजीत ने भागने की कोशिश की।

उल्लेखनीय है कि मामले के उजागर होने के बाद पुलिस की लापरवाही देखते हुए एसएचओ बर्रा और चौंकी इंचार्ज को निलंबित किया गया है। वहीं सीएम योगी ने भी इस पर गहरी नाराजगी जताई और कड़ा एक्शन लेते हुए 4 अधिकारियों को निलंबित किया।

जुम्मा ने 5 साल में मार डाले अपने ही 5 बच्चे, बेटियों को बेहोश कर नहर में फेंक दिया था

हरियाणा में जुम्मा नाम के एक शख्स को जींद पुलिस ने उसकी दो बेटियों- मुस्कान (11) और निशा (7) के क़त्ल के मामले में गिरफ्तार किया है। सफीदों कस्बे के दीदवारा गाँव से 15 जुलाई को लापता होने के बाद पुलिस ने 20 जुलाई को हांसी-बुटाना लिंक (एचबीएल) नहर से उनका शव बरामद किया था। जुम्मा ने पंचायत के सामने ही 5 साल में अपने 5 बच्चों की हत्या की बात भी कबूली है।

गुमशुदा लड़कियों के शव से हुआ था संदेह

गुमशुदा लड़कियों की शिकायत उसके पिता जुम्मा, जो कि एक मजदूर है और उनकी गर्भवती पत्नी द्वारा दर्ज की गई थी, जो अपने छठे बच्चे को जन्म देने वाली थी। हालाँकि, जिस तरह से दोनों लड़कियों के शव नहर से बरामद किए गए, उससे उनकी हत्या की आशंका को लेकर पुलिस को संदेह हुआ। पुलिस ने इसके बाद हत्या का मामला दर्ज किया।

इस बीच, आरोपित जुम्मा ने बेटियों की हत्या के अपराध को यह दावा करते हुए स्वीकार किया कि उसने ऐसा कैथल के एक आलिम के कहने पर अपनी गरीबी को खत्म करने के लिए किया। पुलिस के मुताबिक, उसने बेटियों को नशीला पदार्थ पिलाया और बेहोश होने के बाद उन्हें नहर में फेंक दिया।

जुम्मा ने कबूली अपने सभी 5 बच्चों की हत्या की बात

जुम्मा ने अपनी 2 बेटियों का ही कत्ल नहीं किया था। जुम्मा ने पंचायत के सामने कबूल किया कि उसने पिछले 5 सालों में अपने सभी 5 बच्चों को मार डाला है। सबसे पहले, उसका एक बेटा 5 साल पहले सोते हुए मृत पाया गया था। फिर, कुछ साल बाद, खेलते समय उसकी बेटी की अचानक मृत्यु हो गई थी।

एक साल पहले, उसके दूसरे बेटे को उल्टी शुरू हुई और बाद में उसकी मृत्यु हो गई। हालाँकि, असामान्य और रहस्यमयी परिस्थितियों में होने वाली मौतों के बावजूद, इस आदमी ने पहले अपने तीन बच्चों के पोस्टमॉर्टम के लिए किसी डॉक्टर या अस्पताल का रुख भी नहीं किया।

जुम्मा और उसकी पत्नी ने हमेशा यही जाहिर किया कि वह अपने बच्चों की असामान्य मौत को लेकर चिंतित हैं। जुम्मा के अपने गुनाह स्वीकार करने के बाद वहाँ मौजूद सभी लोग चौंक गए।

उसके कबूलनामे से हैरान ग्रामीणों ने उसे पुलिस को सौंप दिया, लेकिन पुलिस ने उसके खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई नहीं की। उस व्यक्ति ने लगभग 30 ग्रामीणों के सामने फिर से अपना अपराध स्वीकार कर लिया, जिसके बाद पुलिस को बुलाया गया और उसे उनके हवाले कर दिया गया।

जुम्मा के खिलाफ मामला दर्ज करते हुए, जींद जिले के डीआईजी, अश्विन शेणवी ने कहा, “प्रथम दृष्टया उसने अपने अपराधों को स्वीकार किया, लेकिन मामले में अधिक जानकारी का इंतजार है। हम मामले की जाँच कर रहे हैं और जल्द ही मामले को सार्वजनिक करेंगे।”

एएसपी अजीत सिंह शेखावत ने बताया कि अपने पॉंच बच्चों की हत्या के जुर्म में जुम्मा को गिरफ्तार कर लिया है। उसने हाल ही में अपनी दो बेटियों औरर उससे पहले तीन अन्य बच्चों की हत्या की बात कबूली है।

सिमरन के ट्वीट से स्वास्तिक पर छिड़ी बहस, बताया- यह नाजी निशान नहीं, धर्म और संस्कृति का प्रतीक

दिन की शुरुआत से ट्विटर पर एक ट्रेंड चल रहा है #Swastika। ट्विटर पर मौजूद एक बड़ी आबादी हिटलर के नाज़ी चिह्न और हिन्दू धर्म के स्वास्तिक पर बहस कर रही है।

बहस तब शुरू हुई जब संयुक्त राष्ट्र अमेरिका स्थित ब्रांडीज़ यूनिवर्सिटी की सिमरन तातूस्कर ने दोनों चिह्नों पर बात करने का प्रयास किया। उनके मुताबिक़ दुनिया के लोगों के सामने ऐसी जानकारी दी जा रही है कि दोनों एक जैसे ही हैं, जबकि हकीकत में ऐसा नहीं है।

सिमरन संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के वॉलथम (Waltham) शहर स्थित ब्रांडीज़ यूनिवर्सिटी की छात्र संघ अध्यक्ष हैं। उन्होंने स्वास्तिक के बारे में जानकारी देते हुए कुछ बातें साझा की।

simran tutuskar

उनके मुताबिक़ स्वास्तिक की पहचान केवल एक तरह से की जाती है, “नाज़ी और हिटलर।” जबकि इसका दूसरा पहलू भी है जो स्वभाव में धार्मिक और पवित्र है। लेकिन पढ़ने वालों के सामने स्वास्तिक का यह पक्ष नहीं रखा जाता है। उन्हें इसके बारे में महज़ इतना बताया जाता है कि इसका इस्तेमाल हिटलर की सेना अपने झंडों पर करती थी। 

ठीक यहीं से मुद्दे पर विवाद शुरू हुआ। स्टॉप एंटीसेमीटीमिज्म नाम के ट्विटर एकाउंट से कुछ ट्वीट किए गए। ट्वीट में कहा गया, “सिमरन स्कूलों के पाठ्क्रम में स्वास्तिक के मायने बदल कर पेश करना चाहती हैं। नहीं, वह यहूदी नहीं है! स्वास्तिक को ऐसा चिह्न साबित करना चाह रही हैं, जिसका मतलब शांति है। वह नफ़रत के इस चिह्न को अमेरिका में सामान्य बनाना चाहती हैं।”  

कितनी हैरानी वाली बात है कि ऐसे दो चिह्न जो भले काफी कुछ एक जैसे नज़र आते हैं, लेकिन उनके मतलब में ज़मीन-आसमान का फर्क है। ऐसे चिह्न के सबसे अहम पहलू का ज़िक्र ही नहीं है। वैसे भी हिटलर ने ‘स्वास्तिक’ को कभी अपना चिह्न नहीं बताया, बल्कि उसके लिए वह Hakencruz (Hooked cross) शब्द का उपयोग करता था। लेकिन पश्चिम के तमाम देशों ने लोगों को भ्रम में रखने के लिए दोनों को एक जैसा बताया। साथ ही स्वास्तिक के विरुद्ध दुष्प्रचार भी किया। 

इसके बाद सिमरन ने बताया कि न्यूयॉर्क सीनेट का बिल “नफ़रत फैलाने वाले चिह्नों” पर बात करती है। इस बिल का मूल उद्देश्य छात्रों को ऐसे चिह्नों के बारे में बताना था जिसका इंसानों पर बहुत बुरा असर पड़ा है। इस कड़ी में हिटलर की नाज़ी सेना के चिह्न का ज़िक्र किया था जो ‘स्वास्तिक’ जैसा नज़र आता है।

उन्होंने आगे कहा कि इस बिल में दोनों चिह्नों के बीच का अंतर नहीं बताया गया है, जबकि दक्षिणी और पूर्वी एशिया में स्वास्तिक की धार्मिक और सांस्कृतिक अहमियत है। हिटलर ने जिस स्वास्तिक की नींव रखी उसका मतलब ही डर और होलोकास्ट था। हिटलर ने इसे नफ़रत का पर्याय बना दिया था, वह भुलाया नहीं जा सकता। दुनिया का कोई भी इंसान यहूदियों का दर्द नहीं समझ सकता है। मेरा आशय किसी की भावनाएँ आहत करना नहीं था।

उन्होंने कहा कि अपनी पोस्ट में दोनों चिह्नों को शामिल करने की वजह उनके बीच का अंतर दिखाना था। साल 2008 में हिन्दू यहूदी लीडरशिप समिट में इस विषय पर विस्तार से चर्चा हुई थी। इसमें इज़रायल के चीफ़ रैबिनेट और हिन्दू धर्म आचार्य सभा शामिल हुए थे। उनके बीच बात हुई थी कि हिन्दू धर्म के लोगों के लिए स्वास्तिक सदियों से पवित्र रहा है। इसलिए मेरा ऐसा मानना है कि हमें दोनों के बारे में पता होना चाहिए। स्वास्तिक के बारे में पढ़ने या पढ़ाने से होलोकास्ट का कोई लेना-देना नहीं है।

स्वास्तिक कई पहलुओं में अहमियत रखता है, घरों से लेकर मंदिरों तक और मंदिरों से लेकर अच्छे काम की शुरुआत तक। हिन्दू धर्म में स्वास्तिक की मौजूदगी हमेशा से अटूट रही है। हिन्दू धर्म ही नहीं बल्कि बौद्ध और जैन धर्म में भी स्वास्तिक को बेहद पवित्र माना जाता है। वर्तमान बिल में स्वास्तिक के इस पहलू पर कोई जानकारी नहीं दी गई है। इसके चलते छात्रों में ऐसा संदेश जाएगा कि स्वास्तिक का मतलब केवल घृणा और डर है। जबकि असलियत में इसके धार्मिक और सांस्कृतिक मायने पूरी तरह अलग हैं। जिसके बारे में छात्रों को पता होना चाहिए।  

कॉन्ग्रेस की लाटायाँ आडवाणी: राम मंदिर, गाय, मोदी सब पर जहर बुझी, ISIS आतंकियों से मोहब्बतें

उनका नाम है लाटायाँ फ़र्न्स-आडवाणी (Latoya Ferns-Advani)। महाराष्ट्र यूथ कॉन्ग्रेस की वे नई प्रवक्ता और मीडिया समन्वयक हैं। पार्टी ने उन्हें यह जिम्मेदारी बीते 11 जुलाई को ही सौंपी है।

लाटायाँ आडवाणी का अतीत देखकर पता चलता है कि कॉन्ग्रेस में जिम्मेदारी पाने के लिए गाय के खिलाफ अभद्र चुटकुले, गोमूत्र पर तंज और इस्लामिक आतंकियों से हमदर्दी रखनी पड़ती है।

यूथ कॉन्ग्रेस भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस की युवा शाखा है। वर्तमान में यह राहुल गाँधी के नियंत्रण में है। लाटाँया आडवाणी का ‘लिंक्ड-इन’ प्रोफाइल बताता है कि वे एक ‘मीडिया और नीति रणनीतिकार’ हैं। उन्होंने डरहम और वारविक विश्वविद्यालय से पढ़ाई की है।

‘डेली टाइम्स’ जैसे पाकिस्तानी प्रकाशन में कॉलम लिखने वाली लटाँया फर्न्स-आडवाणी का ऐसे ही एक ‘लेख’ में मानना ​​है कि आतंकी संगठन आईएसआईएस के ‘लड़ाकों’ को उनका अपना राज्य देकर उन्हें वैध बनाया जाना चाहिए। पाकिस्तानी प्रकाशन की वेबसाइट पर एक लेख में वह लिखती हैं कि आईएसआईएस (ISIS) को एक ‘राज्य’ के रूप में पहचान ना दिए जाने से हम ‘लड़ाकों’ और ‘नागरिकों’ बीच अंतर नहीं कर पाते हैं।

लटाँया आडवाणी ने अपने लेख में न केवल आईएसआईएस आतंकवादियों को ‘लड़ाकों’ के रूप में, बल्कि ‘सेनानियों’ के रूप में जगह दी है। वह कहती हैं कि ‘ISIS सेनानियों’ को ‘पहचाने जाने वाली वर्दी’ ना देने से उन्हें चुपके से घात लगाकर हमला करने का लाभ देती है।

महाराष्ट्र युवा कॉन्ग्रेस प्रवक्ता और मीडिया समन्वयक के रूप में नियुक्त लटाँया फर्न्स-आडवाणी का मानना है कि आईएसआईएस को स्टेट का दर्जा उन्हें पहचान योग्य बनाने में सेना की सहायता करेगा।

इसके अलावा, लटाँया फर्न्स-आडवाणी आतंकवादी शब्द का शुद्धिकरण करना चाहती है, जिसका उपयोग कि आतंकवादियों, आतंकियों का वर्णन करने के लिए किया जाता है। वह दावा करती है कि आईएसआईएस ‘अमेरिका के घृणित लोकतंत्र को बढ़ावा देने और जल्दबाजी वाली एग्जिट स्ट्रेटेजी का नतीजा है।

वास्तव में, ISIS मजहबी हिंसा को बढ़ावा देता है और उन कट्टरपंथियों को तवज्जो देता है, जो काफिर वाली इनकी परिभाषा से सहमत होते हैं।

ऑस्ट्रेलियाई राष्ट्रीय सुरक्षा वेबसाइट के अनुसार, अपने गठन के बाद से, आईएसआईएस ने इराक और सीरिया के क्षेत्रों पर और उसके भीतर सुन्नी और शिया के बीच सांप्रदायिक तनाव पैदा कर कब्जा करने पर ध्यान केंद्रित किया है। लटाँया फर्न्स-आडवाणी की मानें तो इस विचारधारा को वैध बना दिया जाना चाहिए।

उसी लेख में, लटाँया फर्न्स-आडवाणी ने आईएसआईएस द्वारा की गई क्रूरता और बर्बरताओं, जैसे -सार्वजनिक जगहों पर सर कलम करने को सही ठहराया है। जब हमने इस ‘लेख’ में यह जाँच करने की कोशिश की कि कहीं यह व्यंग्य तो नहीं है? लेकिन हमने यह पाया कि यह व्यंग्य नहीं बल्कि महाराष्ट्र युवा कॉन्ग्रेस की प्रवक्ता लटाँया फर्न्स-आडवाणी द्वारा बेहद गम्भीरता से लिखा गया था।

लटाँया फर्न्स-आडवाणी सिर्फ आतंकी संगठनों को ही क्लीन चिट नहीं देतीं बल्कि सोशल मीडिया पर आतंकवादियों की ही भाषा में नियमित रूप से हिंदुओं पर ‘गोमूत्र’ से लेकर अन्य घटिया हिन्दू घृणा से भरे हुए ट्वीट भी करती हैं। जिसके कुछ उदाहरण यहाँ देखे जा सकते हैं, जहाँ लटाँया जनता कर्फ्यू के अवसर पर गोमूत्र पार्टी जैसे ‘जोक’ बनाते हुए देखी जा सकती हैं –

यूथ कॉन्ग्रेस की नई प्रवक्ता बैन के बाद ‘बीफ़ बर्गर’ खाने के लिए व्याकुल हैं –

2015 के एक ट्वीट में लटाँया का कहना है कि गाय उसकी माँ नहीं है, और वह बीफ़ पर प्रतिबंध के बाद भी इसे खाने वाली हैं –

लटाँया पाकिस्तान जाने के लिए भी व्याकुल रहती हैं –

लटाँया के अनुसार, नरेंद्र मोदी पाकिस्तानी एजेंट हैं –

दिल्ली दंगा आरोपितों और मुख्य अभियुक्तों के समर्थन में भी लटाँया डटकर खड़ी हैं –

उसका यह भी मानना है कि ‘बाबरी मस्जिद’ की जगह पर राम मंदिर का कोई अवशेष नहीं है और सुप्रीम कोर्ट का फैसल गलत था –

लटाँया फर्न्स-आडवाणी के लिंक्ड-इन प्रोफाइल के अनुसार वो कॉन्ग्रेस नेता मणि शंकर अय्यर के ऑफिस में काम करती हैं। ये वही मणि शंकर अय्यर हैं, जो केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ पाकिस्तान जाकर हर संभव षड्यंत्र का हिस्सा बनने का कारनामा करना चाहते हैं और भारत विरोध के लिए पाकिस्तान का समर्थन करते आए हैं।

लटाँया का लिंक्ड-इन प्रोफाइल

सहिष्णुता और अधिकार, वामपंथ के टैक्टिकल हथियार: ऐयारों जैसा है कट्टरपंथी कम्युनिस्टों और इस्लामपंथियों का उदारवाद

कम्युनिस्ट और इस्लामिस्ट इन दिनों अपने उदारवादी होने का खूब स्वांग रच रहे हैं। साम्यवादियों और जिहादी कट्टरपंथियों का ये उदारवादी अवतार देवकीनंदन खत्री के उपन्यास चंद्रकांता संतति के ऐयारों जैसा है। उपन्यास में वर्णित ऐयारों की खासियत थी कि वे अपने दुश्मनों को भरमाने के लिए जब चाहे जैसा रूप रख लेते थे।

रूप बदलने में माहिर ये ऐयार धोखेबाजी की अनुपम मिसाल हैं। ये बहरूपिए ऐयारों की तरह आजकल दुनिया भर में इस्लामिस्ट्स और कम्युनिस्ट मानव अधिकारों,  महिला अधिकारों,  अल्पसंख्यक अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सहिष्णुता की वकालत करते नज़र आते हैं।

जबकि सैद्धांतिक और व्यावहारिक तौर पर इन दोनों विचारों से अधिक असहिष्णु और विरोधियों के प्रति निर्दय कोई और नहीं है। इसके लिए किसी और साक्ष्य की आवश्यकता नहीं, बल्कि इन दोनों के मूल ग्रंथों को पढ़ना ही काफी है। इन दोनों विचारधाराओं की असहिष्णुता के उदाहरणों से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं। लेकिन हम कुछ ताज़ा घटनाओं को आपके सामने रखना चाहते है। 

पिछले हफ्ते ही तुर्की की राजधानी इस्तांबुल में राष्ट्रपति इर्दोगन ने हागिया सोफिया संग्रहालय को मस्जिद में बदल दिया। हागिया सोफिया मूलतः एक चर्च है जिसकी भव्य इमारत सन 537 में रोमन सम्राट जस्टीनियन ने बनवाई थी।

1453 में तुर्की के सुल्तान मोहम्मद-II ने जब इस्तांबुल पर कब्ज़ा किया तो उन्होंने इस इमारत को एक मस्जिद में तब्दील कर दिया। वर्तमान उदारवादी तुर्की के निर्माता कमाल अतातुर्क ने इस भवन को एक संग्रहालय में बदल दिया।

उन्होंने हागिया सोफ़िया को सभी मजहबों और संस्कृतियों के लिए खोल दिया। तुर्की के मौजूदा राष्ट्रपति इर्दोगन कट्टरपंथी सोच रखते हैं। उनके इस फैसले पर किंग्स कॉलेज, लन्दन की प्रोफ़ेसर जूडिथ हेरिन ने लिखा है कि इर्दोगन ने ‘प्रतीकात्मक रूप से सहिष्णुता की विरासत का अंत’ कर दिया है।

इस्तांबुल में शताब्दियों से इसाई, मुस्लिम और यहूदी एक साथ रहते आए हैं। हेनिन कहती हैं कि हागिया सोफिया यूनेस्को की एक हेरिटेज इमारत है। वह पूरे विश्व की धरोहर है। उसे सिर्फ मुस्लिमों को सौपना एक तरह से ‘सांस्कृतिक सफाई’ जैसा है।  

याद रखिए, चीन में माओ ने भी ‘सांस्कृतिक सफाई’ की थी। और आज भी सिंकियांग प्रान्त में उइगरों की ‘सफाई’ का अभियान चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में बाकायदा जारी है। उइगरों की दशा पर एक नया वीडियो पिछले दिनों ही खबरों में आया।

इसके अलावा, अनगिनत रिपोर्ट्स मौजूद हैं, जिनमे बताया गया है कि किस तरह उइगरों के अल्पसंख्यक अधिकारों का हनन हो रहा है। महिलाओं को गर्भ धारण न करने देना, रोज़ों के दौरान उपवास न रखने देना तथा विरोध करने वालों को लाखों की संख्या में सुधार गृह रुपी यातना केंद्रों में रखना वहाँ आम चलन है। 

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हिंदुओं के लिए मंदिर बनाने की कोशिश इसी महीने की गई। तो वहाँ कई लोगों ने उसकी दीवार और बुनियाद को तोड़ दिया। तोड़ने वालों ने कहा कि पाकिस्तान एक इस्लामी राष्ट्र है और वहाँ मंदिर बनाना उनके मजहब के खिलाफ है।

यही नहीं, पिछले हफ्ते बलुचिस्तान में मकान बनाते हुए बुद्ध की एक प्राचीन प्रतिमा निकली तो उसे लोगों ने मिलकर तोड़ डाला। अफ़ग़ानिस्तान के बामियान में बुद्ध प्रतिमाओं का क्या हश्र हुआ था, ये हम जानते ही हैं। मूल बात है कि इन घटनाओं पर बुद्धिजीवियों आम तौर पर शांत ही रहे हैं।  

उसी तरह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने हॉन्गकॉन्ग में जैसे वहाँ नागरिक अधिकारों की बात करने वालों को कुचल कर रातों-रात कानून बदल दिया गया वह सब ने देखा है। थियानानमेन चौक में टैंकों का इस्तेमाल करके लोकतंत्र की माँग करने वाले विद्यार्थियों को कैसे मौत के घाट उतारा गया था, वह कम्युनिस्टों की कथित ‘उदारता और सहिष्णुता’ का अन्यतम उदाहरण है ही। 

दुनिया के कम्युनिस्टों के मौजूदा आदर्श चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग आजकल विस्तारवाद के घोड़े पर सवार हैं। दूसरे देशों की जमीन हड़प कर उसे चीन के कब्जे में करना, ताकत का बेजा इस्तेमाल करके देशों को धमकाना इन दिनों चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का नया शगल है।

भारत, वियतनाम, इंडोनेशिया, जापान, ताइवान, हॉन्गकॉन्ग आदि एक के बाद एक शी जिनपिंग और कम्युनिस्ट पार्टी की इस विस्तारवादी नीति का शिकार हुए है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को अंतरराष्ट्रीय कानूनों, परंपराओं, मर्यादाओं और देशों के बीच आपसी समझौतों की कोई चिंता नहीं है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की तरह इस्लामिस्ट भी दूसरों के हितों और अधिकारों को मानने के लिए तैयार नहीं है। 

पर हैरानी की बात है कि अमेरिका में ‘ब्लैक लाइफ मैटर्स’ से लेकर भारत में सीएए के खिलाफ हुए आंदोलनों में कम्युनिस्ट और इस्लामिस्ट दोनों एक साथ नागरिक अधिकारों,  मानव अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सहिष्णुता की बात करते हुए नजर आते हैं।

जो चीन अपने यहाँ फेसबुक, ट्विटर, यहाँ तक कि टिकटॉक तक की इजाजत नहीं देता, वह भारत को टिकटॉक पर रोक न लगाने पर नसीहत देता है। ‘ब्लैक लाइफ मैटर्स’ आंदोलन को अमेरिका और यूरोप में अति वामपंथियों और इस्लामिक कट्टरपंथियों ने हाईजैक कर रहा लिया।

ये ही दोनों विचार रखने वाले भारत में भी नागरिकता कानून विरोधी आंदोलन में ‘शाहीन बाग़’ को एक नई क्रांति का उद्घोष बता रहे रहे थे। बाद में इन्हीं तत्वों ने इसे अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प की दिल्ली यात्रा के दौरान दंगों में तब्दील कर दिया।

ज़ुबान पर ‘ला इलाहा ईलइल्लाह’ और हाथ में लाल झंडा उठाने वालों का ये ताज़ा गठजोड़ बेमेल पर बेहद खतरनाक है। हिंसा और नागरिकों का रक्त इन विचारधाराओं के लिए मानो एक खेल जैसा ही है। 

इन दोनों विचारों ने उदारवाद का मुलम्मा अपने ऊपर जानबूझकर चढ़ाया है। ये जानते हैं कि उदारवादी लोकतान्त्रिक समाज में अधिकारों की बात करना फैशनेबल है। इन मूलतः हिंसावादी विचारों को इससे प्रमाणिकता मिलती है।

इसलिए उदारवादी लोकतंत्र में प्रदर्शन के अधिकार का उपयोग करके ये तत्व इन देशों में उग्र हिंसात्मक कार्रवाई कर रहे हैं। असलियत तो ये है कि कट्टरपंथी इस्लाम और वामपंथियों, दोनों का ही लोकतान्त्रिक व्यवस्था और उसके मूल्यों से कोई लेना देना नहीं है। लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग ये उन्हीं लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को नष्ट करने के लिए कर रहे हैं।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रदर्शन करने का अधिकार लोकतांत्रिक समाजों की एक बड़ी ताकत है। इन्हीं दो खंभों पर लोकतंत्र की पूरी व्यवस्था टिकी हुई है। लेकिन अनुदारवादी कम्युनिस्टों और कट्टर जिहादी इस्लाम मानने वालों ने उदारवादी लोकतंत्र की इस ताकत को अब कमजोरी में बदल दिया लगता है।

भारत जैसे उदारवादी देशों में संविधान में दिए गए अधिकारों का इस्तेमाल ये कट्टरवादी ताकतें संविधानों को उखाड़ फेंकने के लिए ही कर रही हैं। ये तत्त्व जानते हैं कि वोट के द्वारा कभी भी वे इन लोकतांत्रिक देशों में अपनी पैठ नहीं बना सकते। इसलिए हिंसा में विश्वास रखने वाले यह मुट्ठी भर लोग आम लोगों को कुछ विषयों पर बरगला कर इन समाजों के बीच हिंसा का राज स्थापित करना चाहते हैं।  

ये अराजकतावादी कहने को बहुत थोड़े हैं। पर बुद्धिजीवियों,  मीडिया और अकादमिक संस्थानों में इनकी गहरी पैठ है। इसका इस्तेमाल करके वह उदारवादी लोकतांत्रिक समाजों में असंतोष, क्रोध, निराशा,  प्रतिहिंसा और सामाजिक वैमनस्य का भाव पैदा कर रहे हैं।

पूरी दुनिया में इन दिनों कोरोना का प्रकोप है। कोरोना से निकली भयंकर तबाही से दुनिया बहुत तकलीफ में है। लोगों के रोजगार खत्म हो गए हैं। सामाजिक ढाँचा अस्त-व्यस्त है। कई देशों में अर्थव्यवस्था पूरी तरह चौपट हो गई है। महामारी के कारण लाखों लोगों की मौत हो गई है। कुल मिलाकर समूची मानवता कोरोना से त्राहि-त्राहि कर रही है। अफरातफरी के इस माहौल में कट्टरपंथी इस्लाम और कम्युनिस्ट दोनों को एक मौका मिल गया है। उन्हें लगता है कि कोरोना से उत्पन्न परिस्थितियों का इस्तेमाल वे इन लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को कमजोर करने में कर सकते हैं। 

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन की हरकतों को इस रूप में देखा जा सकता है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने कल अपने यूरोप दौरे में ये साफ़ साफ़ कहा कि कोरोना संकट का फायदा उठाकर चीन ने लद्दाख और दक्षिण चीन महासागर जोर आजमाइश शुरू की है।

लेकिन सबसे अचरज की बात है तुर्की और चीन के रवैए  पर भारत के बुद्धिजीवियों की रहस्यमय खामोशी। जो लोग दिन रात अयोध्या में राम जन्मभूमि स्थल पर अस्पताल, धर्मशाला यहाँ तक की शौचालय बनाने तक की राय देते थे, वे हागिया सोफिया को मस्जिद बनाने के फैसले पर बिल्कुल चुप हैं।

इन कथित बुद्धिजीवियों ने दुनिया की इस भव्य इमारत को संग्रहालय के स्थान पर धार्मिक कट्टरता के रूप में परिवर्तित होने पर एक शब्द तक कहा नहीं है। भारत में नागरिक अधिकारों के लिए हल्ला मचाने वाले हॉन्गकॉन्ग में नागरिक अधिकारों के अतिक्रमण पर खामोशी धारण किए हुए हैं। ऐसा क्यों है?

असल में इस्लामिस्ट और कम्युनिस्ट, दोनों ही उदारवादी लोकतंत्र में दिए गए अधिकारों का उपयोग टैक्टिकल, यानी रणनीतिक रूप से करते हैं। उनकी आस्था न तो लोकतंत्र में है, न ही लोकतंत्र में दिए गए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार में।

अल्पसंख्यक अधिकार, महिला अधिकार और सहिष्णुता – यह सब इनके लिए आस्था के विषय नहीं है बल्कि टैक्टिकल हथियार है। इनका इस्तेमाल वे तभी तक करते हैं जब तक वे अल्पमत में है। 

जिस समाज में ये अल्पमत में होते हैं, वहाँ ये एक और कार्ड खेलते हैं, वो हैं पीड़ित दिखने यानी ‘Victimhood’ का कार्ड! ये दोनों ही ताकतें इस खेल में माहिर हैं। दोनों के ताज़ा उदाहरण देना काफी होगा। भारत में इन दिनों वारवरा राव नाम के अति वामपंथी एक्टिविस्ट को लेकर ये कार्ड खेला जा रहा है। 

जबकि, वे स्वयं कह चुके हैं कि उनका सशस्त्र क्रांति में ही भरोसा है। उनके विचार, कृत्य की चर्चा न करके अब उनकी ज़्यादा उम्र, उनके लेखन की बात उनके हितैषी कर रहे हैं। अगर कानून सबके लिए समान है, तो फिर इन ‘एक्टिविस्ट-नुमा’ लोगों के लिए अलग माँग क्यों? कम्युनिस्टों से पूछना चाहिए कि क्या वे अपनी सत्ता में ऐसी दया दिखाते हैं? 

ऐसा ही किस्सा ब्रिटेन में शमीमा बेगम नाम की आई एस से जुड़ी जिहादी आतंकवादी महिला का है। बांग्लादेशी मूल की ब्रिटिश नागरिक शमीमा 15 साल की उम्र में सीरिया भाग गई और इस्लामिक स्टेट के लड़ाकू दस्ते में शामिल हो गई।

वहाँ वह आत्मघाती दस्तों के लिए बारूदी जैकेट बनातीं थी। उसे अपने किए पर कोई मलाल भी नहीं है। पर शमीमा अब ब्रिटेन वापस आना चाहती है। अब ब्रिटेन में उसके ‘अधिकारों’ की चर्चा हो रही है।

उसका मासूम चेहरा एक तरह का पोस्टर बन गया है। शमीमा को ऐसे पेश किया जा रहा है, मानो वह परिस्थितियों की मारी है और ‘बेचारी’ के साथ ज़्यादती हो रही हैं। लोकतान्त्रिक व्यवस्था की उदारता और नर्म कानूनों का इस्तेमाल करके अदालत से एक आदेश भी आ गया है कि वह ‘अपने देश’ में आकर मुकदमा लड़े।

लोकतंत्र की इस अन्तर्निहित उदारता का इस्तेमाल लोकतंत्र के विरोधी बखूबी कर रहे हैं। ताकत को कमजोरी में बदलने के इस नेरेटिव में मीडिया का एक वर्ग भी सक्रिय भूमिका निभाता है। 

दिलचस्प है कि इस्लामिस्ट या कम्युनिस्ट जैसे ही कहीं का शासन सँभालते हैं, अपने विरोधियों का हर अधिकार, यहाँ तक कि जीने तक का हक़ भी छीन लेते हैं। उनका सबसे पहला काम ही होता है दूसरों के अधिकारों को पूरी तरह खत्म करना। दोनों विचार शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के सिध्दांत में कोई यकीन नहीं रखते।

हमने कुछ ताजा घटनाओं का यहाँ उल्लेख किया है। लेकिन इतिहास कट्टर इस्लामिक जिहादियों की बर्बरता और कम्युनिस्ट शासकों द्वारा दूसरों की नृशंस हत्या के उदाहरणों से भरा पड़ा है।

रूस में बोल्शेविक क्रांति के बाद से स्टालिन, चीन में माओ और अब शी जिनपिंग – ये सब कम्युनिस्टों के अत्याचार और दूसरों को बलपूर्वक दबाने के कुछ नमूने हैं। उधर इस्लाम का इतिहास तो रक्तरंजित है ही। भारत ने ही पिछले 1000 साल में  कट्टरपंथी इस्लाम के हाथ जितना सहा है उस पर कई ग्रन्थ लिखे जा सकते है। 

सबसे ज्यादा खतरनाक वे लोग हैं जो उदारवाद का चोगा ओढ़कर समाज के अलग-अलग हिस्सों में अंदर तक घुसे बैठे हैं। ये ताकतें लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग अंदर ही अंदर लोकतंत्र को कमजोर, और अंततोगत्वा नष्ट करने के लिए कर रहे हैं।

ये तथाकथित बुद्धिजीवी कभी पिंजरा तोड़ तो कभी असहिष्णुता के नारे देते हुए नज़र आते हैं।  पर उनका असली उद्देश्य भारत जैसी उदार लोकतान्त्रिक व्यवस्था को कमजोर करना और उसे तोड़ना है। ऐसे ऐयारों के नक़ाब उतारने ज़रूरी हैं।

शौच के लिए गई 14 साल की लड़की के साथ दुष्कर्म: आरोपित खलील ने विरोध करने पर दी जान से मारने की धमकी

उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में एक नाबालिग के साथ उसके गाँव के ही युवक ने दुष्कर्म किया। घटना के बाद पीड़िता के परिवार वालों ने नज़दीकी थाने में मामले की शिकायत दर्ज कराई। आरोपित का नाम खलील है जिसे मामले के शिकायत के आधार पर गिरफ्तार किया जा चुका है। साथ ही पीड़िता को जाँच के लिए स्थानीय अस्पताल भेज दिया गया है। 

इसके अलावा पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने घटनास्थल का मुआयना किया है। इलाके में फिलहाल हालात संवेदनशील बने हुए हैं। सीतापुर के सकरन थाना क्षेत्र में आने वाले गाँव की निवासी 14 वर्षीय किशोरी बुधवार की शाम के वक्त खेत गई थी। 

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, उसी गाँव के निवासी आरोपित खलील नाम के युवक ने किशोरी के साथ दुष्कर्म किया। विरोध करने पर पीड़िता को जान से मारने की धमकी दी। जैसे ही वह खलील के चंगुल से आज़ाद हुई, वह भाग कर अपने घर आई। 

इसके बाद उसने अपने सभी घरवालों को पूरे घटनाक्रम से अवगत से कराया। जिसके तुरंत बाद परिवार वालों ने आरोपित खलील के विरुद्ध मामला दर्ज कराया। पुलिस ने शिकायत का संज्ञान लेते हुए आरोपित को गिरफ्तार कर लिया। मामला दो अलग समुदायों से संबंधित है इसलिए क्षेत्र की स्थिति संवेदनशील बनी हुई है। 

गुरूवार की सुबह एसएस उत्तरी राजीव दीक्षित और सीओ पियूष कुमार घटनास्थल का मुआयना कर चुके हैं। पुलिस आरोपित खलील को अदालत में पेश कर चुकी है, जिसके बाद उसे जेल भेजा जा चुका है। इलाके में तनाव बरकरार होने की वजह से भारी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात कर दिए गए हैं। 

पहले महाराष्ट्र सरकार के पास नहीं थे कर्मचारियों को वेतन देने के पैसे, अब बाँटेंगे मदरसों में वेतन

महाराष्ट्र सरकार ने प्रदेश में स्थित मस्जिदों और मौलवियों के लिए एक बड़ा ऐलान किया है। शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस की धर्म निरपेक्ष गठबंधन सरकार ने मौलवियों और मस्जिदों को 1.80 करोड़ रूपए बतौर वेतन देने का ऐलान किया है।  

ख़बरों के मुताबिक़ महाराष्ट्र सरकार के अल्पसंख्यक विकास मंत्री नवाब मलिक ने यह सूचना जारी की। उन्होंने कहा मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में प्रदेश के 121 मदरसों को 1.80 करोड़ रूपए बतौर वेतन दिए जाएँगे। नवाब मलिक ने यह भी बताया कि यह राशि डॉ जाकिर हुसैन मदरसा आधुनिकरण योजना के तहत जारी की जाएगी। 

महाराष्ट्र सरकार ने यह योजना राज्य के मदरसों की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए शुरू की थी। इसके अलावा योजना का उद्देश्य राज्य के मदरसों का आधुनिकरण करना और उनकी बुनियादी सुविधाएँ पूरी करना था। 

इस राशि की मदद से नए मदरसों में आने वाले शिक्षक को वेतन दिया जाएगा और पढ़ने वाले बच्चों को छात्रवृत्ति भी दी जाएगी। यह योजना साल 2013 के दौरान कॉन्ग्रेस और एनसीपी की गठबंधन सरकार में शुरू की गई थी।

लेकिन इस योजना का एक और पहलू भी है। जुलाई के पहले हफ्ते में महाराष्ट्र सरकार में मंत्री विजय वाडेत्तिवर ने कहा था कि सरकार आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रही है। जिसकी वजह से सरकार को कर्मचारियों का वेतन देने के लिए क़र्ज़ लेना पड़ेगा। मंत्री जी का यह भी कहना था कि केंद्र सरकार से आर्थिक मदद न मिलने पर ऐसा हो रहा है। 

इसलिए उन्हें सरकारी कर्मचारियों का वेतन देने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन वहीं दूसरी तरफ वही महाराष्ट्र सरकार मदरसों के आधुनिकरण के लिए मौलवियों को वेतन बाँटने वाली है। वही सरकार अब फंड जारी करके मदरसों की मदद करेगी।  

HC से पायलट खेमे को राहत: याचिका पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश, स्पीकर नहीं कर पाएँगे अयोग्यता की कार्रवाई

सचिन पायलट गुट को राजस्थान की हाईकोर्ट से राहत मिली है। विधानसभा स्पीकर के द्वारा दिए गए नोटिस पर अभी स्टे लगा दिया गया है। हाईकोर्ट की ओर से सचिन पायलट और राजस्थान के अन्य बागी विधायकों के मामले में फिलहाल फैसले को लेकर कोर्ट की ओर से यथास्थिति का आदेश जारी किया गया है। यानी, विधानसभा स्पीकर विधायकों को अयोग्य करार नहीं दे पाएँगे। हालाँकि, अन्य मामलों को लेकर अभी भी हाईकोर्ट में सुनवाई होती रहेगी।

इसके बाद अब गेंद सुप्रीम कोर्ट के पाले में चली गई है। सचिन पायलट गुट को इस मामले में हाईकोर्ट की ओर से तात्कालिक राहत मिल गई है, जिसके बाद राजस्थान विधानसभा के स्पीकर पायलट खेमे पर फिलहाल कोई भी कार्यवाही नहीं कर सकेंगे।

पायलट और कॉन्ग्रेस के बागी विधायकों ने पिछले शुक्रवार को हाईकोर्ट की मदद ली थी। एक याचिका दाखिल करते हुए पायलट खेमे ने स्पीकर डॉ सीपी जोशी के अयोग्यता नोटिस को चुनौती दी थी।

दोनों पक्षों की जिरह होने और दलीलों की सुनवाई के बाद मंगलवार को फैसला 24 जुलाई तक के लिए सुरक्षित रखा गया था। जिसमें बागी विधायकों पर अयोग्य करार होने का खतरा बरकरार था। हालाँकि, अभी ये अंतिम फैसला नहीं है।

राजस्थान कॉन्ग्रेस में जारी सियासी घमासान के बीच आज जहाँ हाईकोर्ट में सुनवाई की जा रही है, वहीं दूसरी ओर सचिन पायलट ने भी हाईकोर्ट के फैसले से पहले टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में सीएम अशोक गहलोत पर जमकर बयान दिए।

पायलट ने आज स्पष्ट कहा कि उनकी लड़ाई सीएम गहलोत से है। पायलट ने कहा कि वो कॉन्ग्रेस में रहकर ही अपनी लड़ाई लड़ेंगे। इस बीच मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने गुरुवार को एलान करते हुए कहा कि जल्द ही विधानसभा सत्र बुलाया जाएगा और उनकी सरकार बहुमत साबित करेगी।

70 साल बाद पहली बार बिजली से जगमगाया शोपियाँ, सौभाग्य योजना से महज 7 दिन में पहुँची रौशनी

दक्षिण कश्मीर के शोपियाँ जिले के केल्लर (Kellar) क्षेत्र के कई दूरदराज के गाँवों में आजादी के लगभग सत्तर साल बाद बिजली पहुँची है। यह केंद्र सरकार की ‘सौभाग्य योजना’ के तहत सम्भव हो सका है। इसके लिए क्षेत्र में पाँच ट्रांसफार्मर लगाए गए हैं और महज सात दिनों के भीतर चालू कर दिए गए हैं, जिसके बाद इलाके में बिजली पहुँच गई।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इस इलाके में पहली बार बिजली पहुँचने पर सहायक कार्यकारी अभियंता, बिजली विकास विभाग (पीडीडी) फारूक अहमद ने कहा – “केल्लर, शोपियाँ के ये सुदूर इलाके सदियों से ही गैर-विद्युतीकृत गाँव थे और केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित ‘सौभाग्‍य योजना’ के तहत हमने पाँच ट्रांसफार्मर बनाए थे। बाद में ये सात दिनों के भीतर चालू कर दिए और केलरी शोपियाँ के इन गाँवों में बिजली की आपूर्ति की गई।”

गाँव में पहली बार बिजली पहुँचने पर एक ग्रामीण का कहना है – “हमने बिजली के बारे में सुना था, लेकिन हम बहुत लंबे समय तक गुलाम रहे। हमें 70 वर्षों के बाद एक नया जीवन मिला है, अब जब हमारे पास बिजली है और हमारे बच्चे अब शिक्षा क्षेत्र में इसका लाभ ले सकते हैं।”

एक अन्य बुजुर्ग निवासी मोहम्मद एवान ने कहा कि ये गाँव बिना बिजली के ही थे। उन्होंने कहा कि हम अब खुश हैं क्योंकि उनके घरों में उजाला आ गया है। मोहम्मद एवान का कहना है कि पहले वे मोमबत्ती की रोशनी में खाना खाते थे। कुछ बच्चे तेल के लैंप और मोमबत्तियों की मदद से पढ़ाई करते थे।

सौभाग्य : प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना

केंद्र सरकार की ‘सौभाग्‍य’ योजना सितंबर 25, 2017 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू की गई थी। ‘सौभाग्‍य’ योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में सभी घरों (एपीएल और गरीब परिवारों) और शहरी इलाकों में गरीब परिवारों को मुफ्त बिजली कनेक्शन प्रदान किया जाता है।

अमेरिका के जवाब में ‘ड्रैगन’ ने दिखाया अपना असली रंग: चीन ने बंद किया चेंगडू स्थित अमेरिकी वाणिज्य दूतावास

अमेरिका की तरफ से कड़ी प्रतिक्रिया मिलने के बाद चीन ने भी बड़ा कदम उठाया है। चीन ने दक्षिण पश्चिमी चेंगडू शहर स्थित अमेरिकी वाणिज्य दूतावास बंद कर दिया है। ख़बरों के मुताबिक़ चीन ने यह कार्रवाई अमेरिका के ह्यूस्टन स्थित चीनी वाणिज्य दूतावास बंद करने के बाद की है। 

चीन के विदेश मंत्रालय ने इस मामले की सूचना जारी की। जारी की गई सूचना में चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा दक्षिण पश्चिमी चेंगडू शहर स्थित अमेरिकी दूतावास का लाइसेंस रद्द किया जा रहा है। इसके बाद यह अमेरिकी दूतावास पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा। 

चीन के विदेश मंत्रालय ने यह भी लिखा यह कदम ‘जैसे को तैसा’ (tit-for-tat move) पद्धति पर आधारित है। अमेरिका द्वारा की गई कार्रवाई का न तो कोई कारण था और न ही कोई आधार। इसके जवाब में हमने यह ज़रूरी और न्यायसंगत कदम उठाया है।   

अमेरिका के विदेश मंत्री माईक पॉम्पियो ने गुरूवार के दिन कहा ह्यूस्टन स्थित चीनी वाणिज्य दूतावास जासूसी का अड्डा बन चुका है। हाल ही में अमेरिका ने इस वाणिज्य दूतावास को बंद करने का आदेश दिया था। पॉम्पियो ने इस बारे में कई अहम बातें कही, उनके मुताबिक़ चीन के इस काउंसलेट में कई गई कानूनी गतिविधियाँ चल रही थीं। साथ ही तमाम अमेरिकी कंपनी के व्यापार सम्बन्धी दस्तावेज़ भी चुराए जा रहे थे।

इसके बाद पॉम्पियो ने कहा “अंततः हमने यह फैसला लिया है कि इस सप्ताह में यह चीन का यह वाणिज्य दूतावास बंद कर दिया जाएगा। यहां जासूसी और अमेरिकी बौद्धिक विषय वस्तु (intellectual property) की चोरी के अलावा कुछ और नहीं होता है।” पॉम्पियो के मुताबिक़ “अगर आज़ाद दुनिया वामपंथी चीन को नहीं बदलती तो वामपंथी चीन हमें बदल कर रख देगा।”