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ताहिर हुसैन ने प्लान किया था हिंदू विरोधी दंगा: अजीत भारती की विस्तृत रिपोर्ट | Ajeet Bharti on Delhi Anti Hindu Riots

दिल्ली हिंदू विरोधी दंगे के आरोपित ताहिर हुसैन को कोर्ट ने ये कहते हुए बेल देने से मना कर दिया कि उसकी इसमें अहम भूमिका रही है। ताहिर हुसैन ने इंसानों को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया। हुसैन ने खुद ही कबूला कि उसी ने मुस्लिम भीड़ को भड़काया था और चाँदबाग, खजूरी खास एवं अपने छत से हिंसा भड़काया था। इसके खिलाफ फिलहाल 16 धाराओं में केस दर्ज हैं।

हुसैन ने इस दंगे में तकरीबन 1.30 करोड़ फूँक दिए। उसने न सिर्फ दंगे का नेतृत्व किया बल्कि पुलिस को भी बरगलाया। उसे पता था कि उस पर केस होने वाला है। इसके लिए उसने बकायदा प्लान बनाया था कि कब, कितनी बार और किसलिए पुलिस को फोन करना है। हुसैन ने प्लानिंग के तहत अपने लड़कों को बताया था कि कहाँ पर हिन्दुओं की कितनी दुकानें जलानी है और इस दौरान वो खुद भी वहीं पर उपस्थित था।

पूरा वीडियो यहाँ क्लिक कर के देखें।

विदेश में पढ़ाई के दौरान मोहब्बत, पहले मजहब फिर सारा के CM पिता फारूक अब्दुल्ला बने रोड़ा: सचिन पायलट की लव स्टोरी

राजस्थान के डिप्टी सीएम सचिन पायलट सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बने हुए हैं। उन्होंने अपनी ही सरकार के खिलाफ बगावत कर दी है और कहा है कि राज्य की अशोक गहलोत सरकार अल्पमत में है। साथ ही उन्हें 25 विधायकों का समर्थन भी हासिल है। इस बयान के बाद ‘रेगिस्तान’ की सियासी धरती गरमा गई है और इसकी आँच दिल्ली तक महसूस की जा रही है।

सचिन पायलट को मंगलवार (जुलाई 14, 2020) को कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा उप मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष के पद से बर्खास्त कर दिया गया। इन सबके बीच सचिन पायलट की पत्नी सारा पायलट भी लोगों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने में कामयाब रही। खबर आई कि सारा पायलट ने भी राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत पर हमला बोला।

हालाँकि, बाद में पता चला कि न्यूज एजेंसी ने गलती से सारा पायलट के फर्जी अकाउंट को सही समझ लिया था। लेकिन इस खबर ने निश्चित रूप से सवालों की झड़ी लगा दी, जिससे सोशल मीडिया के प्रकोप से बच पाना उनके लिए मुश्किल हो गया।

42 वर्षीय सचिन पायलट की राजनीतिक यात्रा की ही तरह उनकी निजी जिंदगी भी काफी दिलचस्प रही है।

जम्मू और कश्मीर के पूर्व सीएम फारूक अब्दुल्ला की बेटी सारा पायलट ने 2004 में सचिन पायलट से शादी की थी। जैसा कि इतिहास रहा है, भारत में मुस्लिम लड़कियों के लिए एक समुदाय के बाहर शादी करना कभी आसान नहीं रहा। सारा पायलट के लिए भी ऐसा ही था। सचिन एक राजस्थानी गुर्जर परिवार से हैं, जबकि सारा एक कश्मीरी मुस्लिम हैं। सचिन पायलट और सारा अब्दुल्ला ने जब पहली बार शादी करने का फैसला किया तो उनका अनुभव बहुत शांतिपूर्ण नहीं रहा।

सारा के पिता फारूक अब्दुल्ला, भाई उमर अब्दुल्ला और बाकी लोगों ने 2004 में अंतर-धार्मिक राजनीति के कारण उनकी दिल्ली में हो रही शादी समारोह का बहिष्कार किया। संयोगवश उमर अब्दुल्ला ने खुद एक सिख लड़की से शादी की है, लेकिन अपनी बहन के हिंदू लड़के से शादी करने पर आपत्ति जताई थी।

सारा और सचिन पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के व्हार्टन स्कूल में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के दौरान एक दूसरे से मिले थे। एक दूसरे को डेट करने के बाद, दोनों ने सारा के परिवार की तरफ से लगातार आपत्तियों के बावजूद 2004 में एक बंधन में बँधने का फैसला किया।

अब्दुल्ला के लिए, जो राज्य विधानसभा चुनावों में अपने राष्ट्रीय सम्मेलन के हारने के बाद एक कठिन दौर से गुजर रहे हैं, यह संभावना थी कि शादी जम्मू-कश्मीर में उपद्रव मचा देगा।

एक मुस्लिम लड़की के हिंदू लड़के से शादी करने के मुद्दे पर मुस्लिम समुदाय के क्रोध का सामना करने की संभावना से चिंतित, सारा के परिवार ने उनकी शादी का विरोध किया। अब्दुल्ला की पार्टी के सदस्यों ने एक बयान जारी किया जिसमें कहा गया था, “केवल मुस्लिम पुरुष अपने धर्म से बाहर शादी कर सकते हैं लेकिन एक मुस्लिम लड़की केवल एक मुस्लिम से शादी कर सकती है।”

यह बताया गया कि कैसे सारा ने कश्मीर घाटी में एक ‘काफिर’ से शादी करने का अभियान शुरू किया। तब कयास लगाए जा रहे थे कि हिंदू लड़के से शादी करवाकर परिवार ने अपनी बेटी को जहन्नुम में भेजने की तैयारी कर ली है। तब मीडियाकर्मियों से बात करने के लिए भी दोनों में से कोई भी परिवार आगे नहीं आया था।

सारा पायलट ने सिमी ग्रेवाल के चैट शो में एक बार अपने मुश्किल दौर के बारे में बात की। उन्होंने कबूल किया, “आधे से ज्यादा वक्त मैं टूटी हुई थी और सचिन मुझे सँभाला करते थे।” यह पूछे जाने पर कि आखिरकार अब्दुल्ला कैसे आश्वस्त हुए थे, सचिन पायलट ने बस इतना कहा, “हम एक साथ खुश थे।” सचिन और सारा की शादी के लगभग 16 साल हो गए हैं और उनके दो बच्चे आरन और विहान हैं।

फ्रांस के पिघलते ग्लेशियर से मिले 1966 के भारतीय अखबार, इंदिरा गाँधी की जीत का है जिक्र

पश्चिमी यूरोप में मोंट ब्लैंक (Mont Blanc) पर्वत श्रृंखला पर पिघलते फ्रांसीसी बोसन्स ग्लेशियरों से 1966 में इंदिरा गाँधी की चुनावी विजय की सुर्खियों वाले भारतीय अखबार बरामद हुए हैं। इनमें से एक एक अखबार का शीर्षक है, “भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री।”

रिपोर्ट्स के अनुसार, यह वही जगह है, जहाँ ठीक उसी वर्ष इस पर्वत पर 54 साल पहले, यानी 1966 में एयर इंडिया का एक विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। इस विमान को भारत की सबसे ऊँची पर्वतमाला कंचनजंघा नाम दिया गया था।

फ्रांस के एक अखबार के अनुसार, यूरोप की सर्वोच्च पर्वत श्रृंखला में एअर इंडिया का एक विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिसके मलबे में से कांग्रेसी मुखपत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ और ‘इकोनॉमिक टाइम्स’ समेत कई भारतीय अखबारों की प्रतियाँ मिली हैं।

यूरोपीय पर्वत श्रृंखला के पिघलते ग्लेशियर में भारतीय अखबार मिला है
इनमें से एक एक अखबार का शीर्षक है, “भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री।”

मोंट ब्लैंक पर्वतमाला पर, 1,350 मीटर की ऊँचाई पर एक कैफे-रेस्तराँ चलाने वाले 33 वर्षीय टिमोथी मोटिन को ये अखबार मिले हैं। स्थानीय फ्रांसीसी अखबार ‘ली डाउपिन लिबेरे’ (Le Daupine Libere) ने टिमोथी के बयान के आधार पर लिखा है –

“वे अभी सूख रहे हैं लेकिन बहुत अच्छी स्थिति में हैं। आप उन्हें पढ़ सकते हैं। यह असामान्य बात नहीं है। जब भी हम दोस्तों के साथ ग्लेशियर पर घूमते हैं तो हमें दुर्घटनाग्रस्त विमान का मलबा मिलता है। आपको अनुभव से समझ में आ जाता है कि चीजें कहाँ पर हैं।”

उल्लेखनीय है कि जून 24, 1966 को एयर इंडिया बोइंग 707 विमान हवाई यातायात नियंत्रण से संबंधित किसी संवादहीनता की वजह से पहाड़ों में दुर्घटनाग्रस्त हो गया था जिसमें उस पर सवार चालक दल के सदस्यों समेत सभी 177 लोगों की मौत हुई थी।

जिस टिमोथी मोटिन को यह मिले, उसका कैफै बोसन ग्लेशियर से करीब 45 मिनट की पैदल दूरी पर है। मोटिन ने कहा कि उन्हें किस्मत से अखबार मिल गए क्योंकि जिस बर्फ में वह करीब छह दशक से दबे हुए थे, वह शायद हाल ही में पिघलनी शुरू हुई थी।

साल 2012 के बाद से एयर इंडिया के विमान से जुड़े कई अवशेष मिले हैं। इनमें भारतीय डिप्लोमैटिक मेल का एक बैग भी शामिल है। उसके एक साल बाद फ्रांस के एक अन्य पर्वतारोही को एयर इंडिया के लोगो वाला धातु का एक बक्शा मिला था, जिसमें कीमती पन्ना, नीलम और माणिक मिले थे। साल 2017 में मानव अवशेष भी मिले थे।

नेपाल में हिंदुओं ने जलाया इमरान खान का पुतला: पाक में मंदिर निर्माण रोके जाने और हिंदू समुदाय के उत्पीड़न का किया विरोध

नेपाल में हिंदू समुदाय के कार्यकर्ताओं ने काठमांडू में पाकिस्तानी दूतावास के बाहर पाकिस्तानी हिंदुओं पर हुए अत्याचार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने तख्तियाँ लेकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान का पुतला जलाया। उन्होंने इस्लामाबाद में श्री कृष्ण मंदिर के निर्माण की माँग की।

राष्ट्रीय एकता अभियान के प्रमुख प्रदर्शनकारी विनय यादव ने कहा, “हम पाकिस्तान सरकार के कार्यों की निंदा करते हैं क्योंकि यह एक नागरिक के बुनियादी मानवाधिकारों का उल्लंघन है। इस विरोध प्रदर्शन के जरिए हम माँग करते हैं कि पाकिस्तान, कृष्ण मंदिर के निर्माण को जारी रखने की अनुमति दे।”

अभियान के समन्वयक बिनॉय कुमार ने कहा, “पाकिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यक अभी भी सरकार द्वारा प्रताड़ित किए जा रहे हैं।” उन्होंने आगे कहा, “सरकार हिंदू मंदिरों और मठों के निर्माण की अनुमति नहीं देकर एक और बड़ा अपराध कर रही है।”

इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने “हिंदुओं पर अत्याचार बंद करो और इस्लामाबाद में मंदिरों और मठों का निर्माण होना चाहिए” जैसे नारे लगाए।

गौरतलब है कि पाकिस्तान में इस्लामवादियों ने हाल ही में देश की राजधानी इस्लामाबाद में श्री कृष्ण मंदिर के निर्माण का विरोध किया था। इसके निर्माण के खिलाफ फतवा भी जारी किया गया था। फतवे से इतर, इस्लामाबाद हाईकोर्ट में भी मंदिर निर्माण के खिलाफ याचिका दायर की गई थी। बाद में, जिस चारदीवारी का निर्माण किया गया था, उसे एक इस्लामवादी ने ध्वस्त कर दिया था, जिसने यह संकल्प लिया था कि वह वहाँ कभी भी हिंदू मंदिर का निर्माण नहीं होने देगा।

इससे संबंधित कई वीडियो सामने आए। एक वीडियो में मंदिर निर्माण की जगह पर एक मुस्लिम युवक खुली जमीन पर खड़े होकर अजान दे रहा है। इसके अलावा एक अन्य वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे कुछ पाकिस्तानी कट्टरपंथी मंदिर के लिए रखी नींव को उजाड़ते दिख रहे हैं और एक-एक ईंट उठाकर फेंक रहे हैं।

इसी तरह एक दूसरे वीडियो में एक मौलवी हिंदुओं से अपनी घृणा जाहिर करते हुए पाकिस्तानी हुकूमत को भी धमकाने वाले लहजे में सचेत कर रहा है।

मौलवी कहता है, “मस्जिदों का निर्माण तो यहाँ चंदा से हो रहा है। लेकिन मंदिर का निर्माण पाकिस्तान के खजाने से पैसे निकालकर किया जा रहा है।” मौलवी आगे आवाज ऊँची करते हुए कहता है, “अगर तुम मंदिर बनाओगे तो पाकिस्तानी गैरतमंद कौम तुम्हारी गर्दनें काट कर मंदिर के बाहर फिरने वाले कुत्तों को सामने डाल देंगी।”

केजरीवाल शिक्षा मॉडल: ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’ के सिद्धांत की भेंट चढ़ते छात्रों का भविष्य चर्चा में क्यों नहीं आता

राजधानी दिल्ली में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले 98% विद्यार्थियों के सीबीएसई की 12वीं परीक्षा पास करने के साथ ही ‘केजरीवाल एजुकेशन मॉडल’ की काफी चर्चा हो रही है। खुद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने भी अपनी पीठ थपथपाते हुए कहा है कि ‘दिल्ली शिक्षा मॉडल’ ने कक्षा 12वीं की सीबीएसई परीक्षाओं में पास होने वाले सरकारी स्कूलों में 98% बच्चों के साथ इतिहास बनाया है।

लेकिन 98% रिजल्ट के पीछे की सच्चाई दिलचस्प है। आम आदमी पार्टी और केजरीवाल के समर्थकों ने ‘सरकारी स्कूलों ने प्राइवेट स्कूलों को भी पछाड़ दिया है’ के नैरेटिव बनाने में लगभग सफलता हासिल कर भी ली है और सरसरी निगाह से यही लगता है मानो अरविन्द केजरीवाल सरकार ने वास्तव में दिल्ली के सरकारी स्कूलों में मिलने वाली शिक्षा का कायापलट किया है।

लेकिन जरा सी रिसर्च करने पर तथ्य यह कहते देखे जा सकते हैं कि आम आदमी पार्टी के शासन से पहले तो यह आँकड़े और भी बेहतर थे। आँकड़े बताते हैं कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों ने ‘केजरीवाल शिक्षा मॉडल’ से बहुत पहले भी प्राइवेट स्कूलों को पछाड़ा है। वर्ष 2009 और 2010 में दिल्ली के सरकारी स्कूलों में 12वीं कक्षा के नतीजे प्राइवेट स्कूलों से बेहतर थे।

गत वर्षों का रिकॉर्ड

‘केजरीवाल शिक्षा मॉडल’ का नैरेटिव

सवाल यह है कि ‘केजरीवाल शिक्षा मॉडल’ को ‘नैरेटिव’ क्यों कहा जा रहा है? इसका जवाब इसी दिल्ली के ‘केजरीवाल शिक्षा मॉडल’ के अंतर्गत आने वाले सीबीएसई बोर्ड के दसवीं के छात्रों के साथ ही उन 9वीं और 11वीं के छात्रों की वास्तविकता बयान करती है, जिन्हें केजरीवाल के शिक्षा मॉडल की महत्वकांक्षा की भेंट चढ़ाया जा रहा है।

केजरीवाल के शिक्षा मॉडल पर रिसर्चर अभिषेक रंजन ने विस्तार से बताया है। अभिषेक रंजन ने ऑपइंडिया के साथ बातचीत में दिल्ली के रिजल्ट के पीछे कुछ ऐसे घटकों के बारे में बताया, जिन्हें कि मीडिया में स्थान नहीं दिया जाता है।

इसमें पहला महत्वपूर्ण बिंदु छात्रों को दसवीं और बारहवीं से ठीक एक क्लास पहले आक्रामक तरीके से फ़ेल करना। दूसरा, उनका पसंदीदा विषय लेने से रोकने और तीसरा आँकड़ों की मदद से मीडिया शिक्षा मॉडल का महिमामंडन करना। यानी, इस वर्ष 2018-19 में अगर सरकारी स्कूलों का आँकड़ा 94% था, तो दिल्ली के ही प्राइवेट स्कूलों के आँकड़े भी 90% से ऊपर ही थे।

कम होती छात्रों की संख्या

इस सबके अलावा दिल्ली के सरकारी स्कूलों में घट रहे नामांकन पर कभी भी बहस नहीं की गई है। सरकार द्वारा जारी इकॉनोमिक सर्वे की रिपोर्ट के आँकड़े इसका प्रमाण भी देते हैं। इस सर्वे के अनुसार, वर्ष 2014-15 में जहाँ दिल्ली के प्राइवेट स्कूलों का शेयर 31% था, वर्ष 2017-18 में वह बढ़कर 45.5% से भी अधिक हो गया।

दिल्ली स्कूल में घटते नामांकन

इन बिन्दुओं पर विस्तार से नजर दौड़ाने पर पता चलता है कि इस साल जो बच्चे पास हुए हैं, वे वर्ष 2016-17 में 9वीं कक्षा में थे। तब इनके 47.7% सहपाठी 9वीं क्लास में फेल कर दिए गए थे।

यानी, लगभग आधे बच्चे ही 9वीं कक्षा से 10वीं में गए। और उनमें भी 2018 की परीक्षा में 32% फेल हो गए। इनमें से कई बच्चों ने तो 11वीं में एडमिशन तक नही लिया। जब यही बच्चे कक्षा 9वीं/10वीं के बैरियर को पास करने के बाद वर्ष 2018-19 में 11वीं कक्षा में पहुँचे, तो फिर से 20% बच्चे फेल कर दिए गए थे।

इन बच्चों को पहली कक्षा में सिर्फ और सिर्फ उस बैच के बोर्ड परीक्षा के पासिंग रिजल्ट को लगभग 100% या आसपास रखने के लिए फ़ेल कर रोक दिया जाता है। यानी, इन सभी बच्चों को आक्रामक रूप से सिर्फ इसलिए इस बड़े स्तर पर फ़ेल कर दिया जाता है, ताकि ‘केजरीवाल शिक्षा मॉडल’ के नैरेटिव को विकसित किया जा सके।

सामान्य शब्दों में कहें तो इस वर्ष दिल्ली के सरकारी स्कूल में पास होने वाले बच्चों की संख्या सिर्फ इस कारण बढ़ी है क्योंकि वर्ष 2017-18 में 29% विद्यार्थियों को फ़ेल कर दिया गया था।

‘कमजोर’ छात्रों को ऐच्छिक विषय के चयन से रोकना

12वीं के रिजल्ट के बाद कल बुधवार (जुलाई 15, 2020) को सीबीएसई बोर्ड के दसवीं के परिणाम आने हैं। इस पर अभिषेक रंजन का कहना है कि दिल्ली 10वीं के नतीजों में भी बच्चों के पास होने का प्रतिशत बहुत अधिक रहेगा। इसके पीछे उन्होंने कारण बताया है कि दिल्ली सरकार ने दिल्ली के स्कूलों में अपने दसवीं कक्षा के 73% छात्रों को बुनियादी गणित (बेसिक मेथ्स) चुनने के लिए मजबूर किया है। जबकि इसका राष्ट्रीय औसत केवल 33% है।

इस बात का खुलासा समाचार पत्र ‘इंडियन एक्सप्रेस‘ में दिसम्बर 2019 में प्रकाशित एक लेख में हुआ था। दिल्ली सरकार द्वारा लगभग 1,000 स्कूलों से प्राप्त आँकड़ों के अनुसार, मात्र 41,386 छात्रों ने ‘स्टैण्डर्ड गणित’ का विकल्प चुना है, जबकि 1,11,001 छात्रों ने बेसिक गणित का विकल्प चुना है। जिसका आशय यह है कि 72.84% छात्रों ने बेसिक गणित को चुना।

ऐसा करने के पीछे ‘केजरीवाल शिक्षा मॉडल’ का सबसे बड़ा रोल सामने आया है। इंडियन एक्सप्रेस की ही एक अन्य रिपोर्ट में पता चला था कि दिल्ली सरकार इस वर्ष गणित पर ध्यान केंद्रित करना चाहती थी क्योंकि बड़ी संख्या में छात्र जिस विषय में असफल होते आ रहे थे और ‘केजरीवाल शिक्षा मॉडल’ के दसवीं कक्षा के कुल प्रतिशत के आँकड़ों को गिरा रहा था, वह विषय गणित ही था। 2019 की बोर्ड परीक्षाओं में मौजूद 1,66,167 छात्रों में से 24,502 केवल एक विषय में फेल हुए थे और वह गणित ही था।

इन सभी नतीजों से निष्कर्ष निकालते हुए इस साल की शुरुआत में, दिल्ली सरकार ने अपने सभी स्कूलों को यह कहते हुए एक निर्देश भेजा था कि जो छात्र गणित में खराब हैं या उनका प्रदर्शन ठीक नहीं, उन्हें स्टैंडर्ड के स्थान पर बेसिक गणित के चयन की लिए तैयार किया जाना चाहिए।

वास्तव में बेसिक गणित उन विद्यार्थियों के लिए एक विकल्प होता है, जो भविष्य में गणित या विज्ञान की जगह कला या फिर अन्य क्षेत्रों में भविष्य बनाते हैं। जबकि स्टैण्डर्ड गणित का विकल्प विज्ञान और गणित के क्षेत्र में जाने वालों के लिए लाभदायक होता है। लेकिन दिल्ली सरकार सिर्फ और सिर्फ पास होने वाले प्रतिशत को ऊँचा बनाए रखने के लिए विद्यार्थियों को बेसिक गणित लेने के लिए बाध्य करती है।

यानी, जब सरकार और स्कूलों कि प्राथमिकता शिक्षा व्यवस्था को मजबूत कर छात्रों के विषय ज्ञान पर मेहनत कर उन्हें अच्छे और मनचाहे भविष्य के लिए तैयार करना होनी चाहिए थी, तब उन्हें राजनीतिक लाभ के लिए आसान रास्ता देकर उनके भविष्य को लेकर गुमराह किया जाता है।

शिक्षा का अधिकार vs ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’

यहाँ पर एक बेहद चौंकाने वाली बात यह भी सामने आई है कि दिल्ली स्कूलों के परीक्षा परिणाम भले ही कैसे भी रहे हों, परीक्षा में बैठने वाले बच्चों की संख्या हर वर्ष बढ़ती नजर आ रही थी, लेकिन जैसे ही दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार आई, परीक्षा में बैठने वाले विद्यार्थियों की संख्या अचानक से घटने लगी।

वर्ष 2007-08 में 72,205 छात्र परीक्षा में बैठे थे। इसके बाद ये निरंतर बढ़ते रहे और वर्ष 2014 में परीक्षा देने वाले छात्रों की संख्या 1,66,257 हो गई। जबकि वर्ष 2015 से यह गिरनी शुरू हो जाती है। 2015 में कुल 1,40,191 छात्रों ने परीक्षा दी, जबकि वर्ष 2018 तक आते-आते यह संख्या मात्र 1,12826 रह गई। यानी एक तरह से ‘केजरीवाल शिक्षा मॉडल’ छात्रों के शिक्षा के अधिकार के विपरीत ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’ के सिद्धांत पर काम करता नजर आता है।

 1998-99 से लेकर 2007-08
2008-09 से लेकर 2017-18

एक सवाल यह भी है कि 12वीं कक्षा के नतीजों के वक्त दिल्ली के शिक्षा मॉडल पर मीडिया मैनेजमेंट कर रही केजरीवाल सरकार दसवीं कक्षा के परिणाम के समय इतनी मुखर नजर नहीं आती है। ऐसा क्यों?

सरकारी बनाम निजी स्कूल

हिन्दुस्तान टाइम्स पर मई, 2019 को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में निजी स्कूलों की सफलता दर 93.18% थी, जो कि सरकारी स्कूलों की तुलना में 21.21% अंक अधिक थी। यानी, जहाँ दिल्ली के सरकारी स्कूलों का सामूहिक प्रतिशत 71.58% था, प्राइवेट स्कूलों का परिणाम 93.18% था।

वहीं वर्ष 2017-18 में सीबीएसई बोर्ड दिल्ली के 10वीं के परीक्षा परिणाम में सरकारी स्कूलों के 69.32% बच्चे उत्तीर्ण हुए थे, जबकि प्राइवेट स्कूलों के बच्चों के पास करने का प्रतिशत 89.45% था। यानी, वर्ष 2017-18 में प्राइवेट और सरकारी स्कूलों के बीच सफलता पाने वाले बच्चों का फासला 20% का था।

आँकड़े बताते है कि वर्ष 2008-2015 तक दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का परीक्षा परिणाम कभी भी 85% से कम नही हुआ। इस वर्ष, यानी 2018-19 में अगर दिल्ली के सरकारी स्कूलों का आँकड़ा 94% था, तो प्राइवेट स्कूलों के आँकड़े भी 90% से ऊपर थे।

लेकिन, इन तमाम नकारात्मक आँकड़ों के बाद भी दसवीं कक्षा के परिणामों के दौरान ‘केजरीवाल शिक्षा मॉडल’ पर बात नहीं की गई, बावजूद इसके कि यह पिछले दशक में बदतर होता रहा है और गत वर्ष अपने निम्नतम स्तर पर आ गया था।

2013 के आँकड़ों को देखकर पता चलता है कि जिस 10वीं कक्षा की परीक्षा में दिल्ली के सरकारी स्कूलों के परीक्षा परिणाम केजरीवाल सरकार के दौरान पिछले दो सालों से बेहद ख़राब आते रहे, उसी 10वीं की परीक्षा में वर्ष 2013 में दिल्ली के सरकारी स्कूल का छात्रों का प्रदर्शन निजी स्कूलों से बेहतर था।

यह नतीजे तब थे, जबकि पिछले साल लगभग 42% बच्चे 9वीं की परीक्षा में ही फेल कर दिए गए थे ताकि अच्छे प्रतिशत के लिए सिर्फ ‘बेहतर’ बच्चे ही अगली कक्षा में भेजे गए। यही नहीं, हाईकोर्ट में अधिवक्ता अशोज अग्रवाल की एक याचिका से पता चलता है कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों में बड़ी संख्या में उन बच्चों को दोबारा नामांकन तक नहीं लेने दिया जा रहा है, जो बोर्ड परीक्षाओं में असफल रहे। पिछले सत्र (2017-18) में ऐसे बच्चों की संख्या 66% थी, जिन्हें नामांकन करने से रोक दिया गया।

कुछ महत्वपूर्ण सवाल, जो ‘केजरीवाल शिक्षा मॉडल’ के महिमामंडन के बीच स्थान नहीं बना पा रहे हैं

ऐसे में, इन सभी आँकड़ों से यह तो स्पष्ट है कि दिल्ली के परीक्षा परिणामों की वास्तविकता से ज्यादा आवश्यक ‘केजरीवाल शिक्षा मॉडल’ की चर्चा बन चुकी है। इस शिक्षा मॉडल के दिवास्वप्न के बीच कुछ बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न हैं, जो केजरीवाल सरकार से पूछे जाने चाहिए।

इन सवालों में सबसे पहला यह है कि राजनीतिक लाभ और मीडिया मैनेजमेंट के लिए बच्चों को आक्रामक रूप से 9वीं और 11वीं में रोक दिया जाना कितना उचित है?

दूसरा यह कि यह तय करने का अधिकार, कि छात्रों को कौनसी गणित पढ़नी चाहिए, और कौनसी नहीं, केजरीवाल सरकार को कौन देता है? यह भी स्पष्ट है कि ऐसे निर्देश विद्यालयों को दिल्ली सरकार द्वारा ही दिए गए हैं, ताकि सिर्फ ‘बेहतर’ छात्र ही परीक्षा में बैठें।

तीसरा यह कि जब निजी और सार्वजानिक विद्यालयों में सफलता का फासला बेहद मामूली है, तो ऐसे में सरकारी विद्यालयों के ग्लैमराइज कर वहाँ स्टाफ और बच्चों पर तानाशाही पद्धति थोपना कितना तार्किक है? क्या बेहतर परिणाम देना ही स्कूलों का पहला उद्देश्य नहीं होता है?

या फिर केजरीवाल शिक्षा में भी अपनी IRS सेवा के निजी अनुभव को – “मैं वहाँ बहुत पैसा कमा सकता था” वाले नजरिए से ही देखना चाहते हैं और उन्हें लगता है कि स्कूलों को अच्छे परिणाम देने के बजाए स्विमिंग पुल या फिर अन्य गतिविधियों में ज्यादा रूचि लेनी चाहिए थी और अब स्विमिंग पुल के साथ स्कूल परीक्षा में भी अच्छे परिणाम देकर समाज पर कोई विशेष उपकार कर रहे हैं?

‘अगर यहाँ एक भी मंदिर बना तो मैं सबसे पहले सुसाइड जैकेट पहन कर उस पर हमला करूँगा’: पाकिस्तानी शख्स का वीडियो वायरल

हाल ही में पाकिस्तान के इस्लामाबाद में एक हिंदू मंदिर निर्माण को लेकर खूब विरोध हुआ। कई संगठनों और नेताओं ने इसे इस्लाम विरोधी करार दिया और भयावह नतीजों की चेतावनी तक दे डाली। इसी बीच सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें एक युवक पाकिस्तान में मंदिर बनाने या बुतपरस्ती करने पर उसे खुद बम से उड़ाने की बात कहते हुए देखा जा सकता है।

पाकिस्तान के सामाजिक कार्यकर्ता राहत ऑस्टिन में इस वीडियो को ट्वीट किया है। इस वीडियो में एक व्यक्ति कहता है –

“ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुन रसूलुल्लाह। मैं अपने अल्लाह को हाजिर नाजिर जानते हुए अपनी कौम, अपने पाकिस्तान से एक अहद (वादा) करता हूँ कि अगर हमारी पाकिस्तान की धरती पर और इस सरजमीं पर किसी भी जगह बुतखाना या मंदिर बनाया गया, तो इस हकूमत के अभी मैं खिलाफ हूँ, लेकिन अगर ऐसा हुआ तो इस हकूमत का सबसे बड़ा दुश्मन मैं होऊँगा। और जिस जगह पर मंदिर बनाया गया, उन कश्मीर की माओं-बहनों की कसम खाकर कहता हूँ कि सबसे पहले खुद वो जैकेट सीने के ऊपर मैं पहनूँगा और कोशिश करूँगा कि सबसे पहला हमला मेरी तरफ से हो उन बुतों और उस मंदिर को तबाह करने के लिए।”

ये वीडियो ऐसे समय पर सामने आया है जब पाकिस्तान में हिन्दुओं के मंदिर को लेकर सियासत गर्म है। कुछ दिनों पहले ही ‘इस्लामाबाद कैपिटल डेवलपमेंट अथॉरिटी’ ने मंदिर के लिए ज़मीन दी थी। लेकिन मज़हबी शिक्षा देने वाली संस्था जामिया अशर्फ़िया मदरसा के एक मुफ़्ती ने इसके ख़िलाफ़ फ़तवा जारी कर दिया था। इतना ही नहीं, मंदिर का निर्माण रोकने के लिए एक वकील हाईकोर्ट तक पहुँच गया।

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में कट्टरपंथियों के दबाव में प्रशासन ने श्रीकृष्ण मंदिर के निर्माण कार्य पर रोक लगा दी है। अब वहाँ तोड़फोड़ किए जाने की खबरें भी सामने आई हैं।

इस ​हरकत को अंजाम देने वाले का नाम मलिक शनी अवन बताया जा रहा। इस्लामाबाद के लोग इस घटना के बाद उसे ‘हीरो’ ​की तरह पेश कर रहे। उसकी जम कर प्रशंसा की जा रही है।

सोशल मीडिया में पाकिस्तानी उसकी तारीफ कर रहे हैं, जिससे वहाँ पहले से ही डर के साए में जी रहे हिन्दुओं के लिए माहौल और ज्यादा असुरक्षित हो गया है। मलिक शनी ने न सिर्फ मंदिर की संपत्ति को नुकसान पहुँचाया बल्कि ऐसा करते हुए वीडियो भी शूट किया।

ऐसा एक ही नहीं बल्कि कई विडियो सोशल मीडिया पर आजकल शेयर किए जा रहे हैं। कुछ ही दिन पहले एक पिता अपने मासूम बेटे से मंदिर के खिलाफ संदेश देते हुए देखा गया था।

वीडियो में बच्चा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को संदेश दे रहा था और कह रहा था, “खान साहब! अगर इस्लामाबाद में मंदिर बना तो ये याद रखना मैं उन हिंदुओं को चुन चुन के मरूँगा। समझ गए? अल्लाह हाफिज।”

यह भी देखा गया है कि हिन्दुओं के खिलाफ ऐसे नफरती संदेशों को एक विशेष समुदाय द्वारा बहुत सराहना भी मिलती है। यही नहीं, पाकिस्तान के शीर्ष नेता भी यह संदेश देते देखे गए कि पाकिस्तान में हिन्दू मंदिरों की जरूरत ही क्या है?

विकास दुबे के गुर्गे शशिकांत की पत्नी का ऑडियो: सुनिए फोन पर रिश्तेदार को बता रही पूरी घटना, छीने गए हथियार बरामद

यूपी के कानपुर में आठ पुलिसकर्मियों की हत्या का गुनहगार विकास दुबे भले ही पुलिस एनकाउंटर में मारा गया हो लेकिन उस केस की एक-एक परते अब खुलने लगी है। मंगलवार (जुलाई 14, 2020) को पुलिस ने विकास दुबे के सहयोगी, फरार अपराधी और 50 हजार के इनामी शशिकांत उर्फ सोनू पांडेय को गिरफ्तार किया।

उसकी निशानदेही पर वारदात में लूटी गई INSAS व AK 47 रायफल और कारतूस बरामद किए गए। अब घटना वाली रात का ऑडियो वायरल हो रहा है। कानपुर कांड में पकड़े गए शशिकांत की पत्नी का ऑडियो वायरल हो रहा हैं। ऑडियो में शशिकांत की पत्नी रिश्तेदार को फोन करके पूरी घटना के बारे में बता रही है।

पढ़िए शशिकांत की पत्नी का आडियो जिसमें वो घटना के बारे में अपने किसी रिश्तेदार को बता रही है : 

शशिकांत की पत्नी – हैलो भाभी…

दूसरी तरफ से – हाँ…

शशिकांत की पत्नी –  भाभी, बाहर दो आदमी मरे पड़े हैं मेरे दरवाजे पर, आँगन में एक आदमी मरा पड़ा है मेरे दरवाजे पर। ये सब लोग भाग गए हैं, क्या कहेंगे जब पुलिस आएगी। 

दूसरी तरफ से – वे लोग हैं कौन? 

शशिकांत की पत्नी – भाभी वो सब पुलिस वाले हैं, विकास भैया ने मारा है। इन सब लोगों ने मारा है। पुलिस वाले हैं।

इतने में फोन के पीछे से आवाज आती है कि सबसे पहले फोन नंबर डिलीट कर दो।

दूसरी तरफ से – हाँ, नंबर डिलिट कर दो सारे। 

शशिकांत की पत्नी : हाँ, सब मोबाइल स्वीच ऑफ करके छुपा दे रहे हैं।  

दूसरी तरफ से – नंबर सारे डिलिट कर दो, कह देना हमको कुछ नहीं पता और अंदर बैठी रहना।  

शशिकांत की पत्नी – भाभी बताइए, वो पूछेंगे तुम्हारा आदमी कहाँ गया, दिन में ड्यूटी करके आया था तो क्या बताएँगे, पापा भी भाग गए हैं।  

दूसरी तरफ से – तो कह देना आया ही नहीं वहाँ से उसकी डबल शिफ्ट थी।  

शशिकांत की पत्नी : तो वहाँ से पता चल ही जाएगा। 

दूसरी तरफ से -कह देना हमको क्या पता,  हमको बताया ही नहीं। हमको क्या पता, आप बता रहे हैं तो पता चला 

शशिकांत की पत्नी – ये बताइए अगर हम मोबाइल स्वीच ऑफ कर दें तो मोबाइल की लोकेशन नहीं पता चलेगी, ये अपना भी मोबाइल यही छोड़ गए हैं। 

दूसरी तरफ से – तुम अंदर ही बैठी रहो।

शशिकांत की पत्नी : हम स्विच आफ कर रहे हैं।

दूसरी तरफ से – तुम पहले इस नंबर को डिलीट कर दो, मेरा वाला भी सोनू वाला भी डिलीट कर देना, तुम ऐसे ही रख दो फोन। स्विच आफ मत करो।

शशिकांत की पत्नी – वो कहेंगे तुम्हारे आँगन में आदमी मारा गया तुमने पुलिस को फोन क्यों नहीं किया। हम फोन ही हटा देते हैं। कहेंगे मेरे पास फोन ही नहीं था। 

दूसरी तरफ से -हाँ हाँ, ये ठीक रहेगा। पुलिस पूछे तो बता देना हमको कुछ नहीं पता। हम तो घर के अंदर थे।

शशिकांत की पत्नी – भाभी अब क्या होगा, हम बहुत परेशान हैं।  

दूसरी तरफ से – तुम चिंता ना करो, भगवान सब ठीक करेगा, शांत रहो।

शशिकांत की पत्नी -ठीक है। 

दूसरी तरफ से – मौका मिले तो निकल जाओ।

शशिकांत की पत्नी – अब इस समय रात में कहाँ निकले। 

जानकारी के मुताबिक शशिकांत ने गिरफ्तारी के बाद कैमरे के सामने स्वीकार किया है कि गोली जबरदस्ती विकास दुबे ने चलवाई थी। शशिकांत ने बताया, “घटना को अंजाम देने वालों में मैं, अमर दुबे, विकास दुबे, प्रभात मिश्रा, बउवा, अतुल दुबे शामिल थे। विकास ने हमारे ऊपर दबाव बनाया कि तुम गोली नहीं चलाओगे तो तुम्हे मार डालेंगे।”

शशिकांत ने आगे बताया, “गोली इसलिए चलाई क्योंकि ये तय कर लिया था कि हमें पुलिसवालों को बस मारना है। पुलिस के जरिए हमें पहले ही सूचना मिल गई थी। पुलिस से ही सूचना आई थी कि हमें पुलिस वालों को मारना है। हमारे सामने 3 पुलिस वालों की हत्या हुई थी। सीओ साहब और 2 दारोगा की हत्या हुई थी। हथियार विकास ने मँगवाए थे। विकास दुबे ने फोन करके बुलवाया था। विकास ने कहा था कि आज गोली चलनी है। बंदूक राइफल सब थी।”

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश को दहला देने वाले कानपुर के चौबेपुर के बिकरू गाँव कांड में पुलिस की कार्रवाई गति पकड़ चुकी है। विकास दुबे के गैंग ने दो व तीन जुलाई की रात में सीओ सहित आठ पुलिसकर्मियों की हत्या की। इसके बाद पुलिस तत्काल एक्शन में आ गई। इस केस में नामजद 21 में से 12 के खिलाफ कार्रवाई हो गई है।

शशिकांत के पिता प्रेम कुमार पांडेय को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया था। एडीजी कानून व्यवस्था प्रशांत कुमार का कहना है कि लूटी गई रायफलें शशिकांत ने ही विकास के घर और अपने घर मे छिपाई थीं। एडीजी ने बताया कि विकास दुबे के घर से सर्च के दौरान पुलिस से लूटी गई एक- 47, रायफल, 17 कारतूस और शशिकांत के घर से इंसास रायफल और 20 कारतूस बरामद हुए हैं। 

कोरोना इलाज के लिए 500 की जगह सिर्फ 80 बेड: ममता बनर्जी के झूठ का वहीं के डॉक्टर ने किया पर्दाफाश

पश्चिम बंगाल के कामरहाटी में एक अस्पताल है-सागर दत्त अस्पताल। इस अस्पताल के एक डॉक्टर ने बंगाल सरकार पर आरोप लगाया है कि वे स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर सही दावे नहीं कर रहे और कोरोना के सही आँकड़े भी पेश नहीं कर रहे।

एबीपी न्यूज से बात करते हुए डॉ गुप्ता ने कहा कि बंगाल सरकार कोरोना से जुड़े अपडेट पर राज्य सरकार की वेबसाइट पर भ्रामक जानकारी प्रकाशित कर रही है।

डॉक्टर के इस साक्षात्कार की क्लिप को भाजपा के राष्ट्रीय सचिव सुनील देवधर ने भी अपनी टाइमलाइन पर साझा किया है। उन्होंने लिखा, “डॉक्टर आगे आकर बंगाल सरकार के झूठ को उजागर कर रहे हैं। ममता सरकार, लोगों से स्वास्थ्य संरचना और केसों के बारे में झूठ बोल रही है।”

इस साक्षात्कार में हम देख सकते हैं कि एंकर डॉक्टर से पूछता है कि आखिर सागर दत्त अस्पताल, जिसे राज्य सरकार ने कोविड-19 मरीजों के इलाज के लिए सेंटर में तब्दील कर दिया है। वहाँ पर 417-420 बेड खाली होने के बावजूद लोगों को भर्ती करने से क्यों मना किया जा रहा है? जिस पर डॉक्टर गुप्ता एंकर को जवाब देते हुए कहते हैं कि ये बहुत दुखद है कि राज्य सरकार वास्तविक आँकड़ों पर और स्वास्थ्य सुविधाओं पर झूठ बोल कर लोगों को भ्रमित कर रही है।

डॉक्टर आगे कहते हैं कि राज्य सरकार की वेबसाइट पर लिखा है कि कोरोना के मरीजों का इलाज करने वाले सेंटर्स में 500 बेड हैं। लेकिन बावजूद इसके सागर दत्त मेडिकल कॉलेज में जरूरत के मुताबिक 500 बेड नहीं हैं। वहाँ केवल 80 बेड हैं जिनपर उपचार हो रहा है। इसके अलावा अस्पातल में कोई सीसीयू भी नहीं है कि मरीज की गंभीर हालात होने पर उसका इलाज किया जा सके।

डॉ गुप्ता इस साक्षात्कार को देते हुए अपनी चिंता भी जाहिर करते हैं। वे कहते कि अगर सरकार इसी तरह झूठे दावे करेगी और सही आँकड़े नहीं पेश करेगी तो इससे और ज्यादा पैनिक क्रिएट होगा। उनका कहना है कि राज्य की स्वास्थ्य स्थिति बेहद गंभीर हालत में है।

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में राज्य सरकार के ख़िलाफ़ डॉ गुप्ता का ये बयान, बेहद चौंकाने वाला खुलासा इसलिए भी है क्योंकि इससे पहले वहाँ के स्वास्थ्य विभाग ने दावा किया था कि सागर दत्त मेडिकल कॉलेज में हर हफ्ते 50 बेड जोड़े जा रहे हैं। लेकिन सागर दत्त के ही ये डॉक्टर अब कह रहे हैं कि वहाँ 500 नहीं सिर्फ़ 80 बेड है।

इतना ही नहीं, सागर दत्त अस्पताल के इस डॉक्टर का ये भी मानना है कि ये स्थिति सिर्फ़ उनके सेंटर तक सीमित नहीं होगी। बल्कि कई अन्य कोविड सेंटर्स का भी बंगाल में यही हाल होगा और वह भी इसी परेशानी से जूझ रहे होंगे। लेकिन, फिर भी राज्य सरकार ने इस मामले पर अपनी आँखों पर पट्टी बाँधी हुई है। वे कहते हैं कि राज्य के डॉक्टरों का मानना है कि आने वाले समय में बंगाल की स्थिति और भी बद्तर होने वाली है।

दूध बेचने से लेकर हॉलैंड में F-16 उड़ाने तक: किस्सा राजेश पायलट का, जिसने सत्ता के सबसे बड़े दलाल को जेल भेजा

आज हम आपको एक ऐसे नेता के बारे में बताने जा रहे हैं, जो न तो किसी राजनीतिक खानदान से थे, न किसी राजघराने से और सबसे बड़ी बात तो ये कि 35 वर्ष की उम्र से पहले वो राजनीति में भी सक्रिय नहीं थे। बावजूद इसके उन्हें जनता का ऐसा प्यार मिला कि उन्होंने भरतपुर की महारानी तक को चुनाव में पटखनी दे दी। आपने राजेश्वर प्रसाद का नाम नहीं सुना होगा लेकिन राजेश पायलट से आप ज़रूर परिचित होंगे। सचिन उनके ही बेटे हैं।

जब राजेश्वर प्रसाद को नहीं पता था कि वो राजेश पायलट हैं

दरअसल, जून 1964 में ही राजेश्वर प्रसाद ने कोयम्बटूर स्थित एयरफोर्स अकादमी में पायलट पाठ्यक्रम में दाखिला लिया था। अक्टूबर 29, 1966 को उनकी नियुक्ति फ्लाइंग ब्रांच में हुई। वहाँ उन्होंने 13 वर्षों तक ‘ट्रांसपोर्ट एंड फाइटर स्क्वाड्रन’ में काम करते रहे। तब भी वो राजेश्वर प्रसाद ही थे। लेकिन, नवम्बर 1979 में जैसे ही उन्होंने सरकारी सेवा को अलविदा कह राजनीति में क़दम रखा, वो राजेश पायलट बन गए।

दरअसल, उस समय पायलट होना आज की तुलना में ज्यादा दुर्लभ था और अधिक सम्मान की भी बात थी। यही कारण था कि जब वो भरतपुर से पर्चा दाखिल कर रहे थे, तब कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने उनसे अपने नाम के आगे ‘पायलट’ लिखने का आग्रह किया। उन्होंने समर्थकों के आग्रह को स्वीकार किया और वो जैसे ही निर्वाचन अधिकारी के दफ्तर से बाहर निकले, ‘राजेश पायलट ज़िंदाबाद’ से पूरा इलाक़ा गूँज उठा।

न तो उनकी पत्नी रमा और न ही सचिन ने कभी कोई विमान उड़ाया है लेकिन ‘पायलट’ इस पूरे परिवार की पहचान ही बन गई। दरअसल, राजेश पायलट जब 10 साल के थे तब वो एक बँगले के बाहर नौकरों के लिए बने घर में रहते थे। एक डेयरी में वो काम करते थे और उन्हें घर-घर दूध पहुँचाने की जिम्मेदारी दी गई थी। किसे पता था कि जिस बँगले के बाहर वो रहते हैं, कुछ ही सालों में वो उनका अपना होगा।

वो राजनीति में आए। केंद्रीय मंत्री बने। 1988 में वो सड़क एवं परिवहन मंत्री थे, तब वो हॉलैंड के दौरे पर गए थे। वहाँ के एक मंत्री ने उनसे पूछा कि उनके नाम में ‘पायलट’ क्यों लगा हुआ है। जब उन्हें कारण पता चला तो वो बहुत प्रभावित हुए। राजेश पायलट के नाम 1971 के उस ऐतिहासिक भारत-पाकिस्तान युद्ध में देशसेवा का अनुभव था, जिसमें भारत ने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर डाले थे।

उस दौरान उन्होंने एयरक्राफ्ट ‘डी हैवीलैंड कनाडा DHC-4 कैरिबो’ उड़ाया था। उस युद्ध में वो ‘बॉम्बर पायलट’ की भूमिका में थे। उन्होंने जब एयरफोर्स ज्वाइन किया था, तब उन्हें पायलट ऑफिसर की भूमिका दी गई थी। बाद में उन्हें फ्लाइंग ऑफिसर और फिर फ्लाइट लेफ्टिनेंट के रूप में प्रमोट किया गया। जब उन्होंने राजनीति में आने की ठानी, तब उनकी पोस्टिंग राजस्थान के जैसलमेर में थी।

जब राजेश पायलट ने हॉलैंड में उड़ाया F-16

अब वापस आते हैं, हॉलैंड वाले किस्से पर। हॉलैंड के अपने समकक्ष को उन्होंने बताया कि वो पहले भारतीय वायुसेना के अधिकारी थे और उन्होंने भारत-पाकिस्तान युद्ध में एयरक्राफ्ट उड़ाया भी था और उन्हें अच्छा-ख़ासा अनुभव भी है। इसके बाद फिर क्या था! हॉलैंड में उनके मेजबानों ने उनसे आग्रह शुरू कर दिया कि वो सुपरसोनिक फाइटर एयरक्राफ्ट F-16 उड़ाएँ। पायलट को उनका आग्रह स्वीकार करना पड़ा।

लेकिन, यहाँ एक समस्या भी थी। राजेश पायलट की बाईपास हार्ट सर्जरी हुई थी। ऐसे में इस तरह एयरक्राफ्ट उड़ाने के लिए मेडिकल रूप से फिट होना आवश्यक है। लेकिन, राजेश पायलट का जब मेडिकल टेस्ट किया गया तो वो फ्लाइंग के लिए एकदम फिट निकले। इसके बाद उन्हें एक ‘टू सीटर ट्रेनर’ में ड्यूअल कन्ट्रोल के साथ F-16 उड़ाने के लिए दिया गया। पायलट ने न सिर्फ एयरक्राफ्ट को उड़ाया बल्कि हवा में आकृतियाँ भी बनाईं।

ये था राजेश पायलट का जज्बा। उन्हें राजनीति में आए लगभग एक दशक होने वाले थे लेकिन उनका अंदर का वो वायुसेना अधिकारी अभी भी ज़िंदा था, जिसने पाकिस्तान पर बम बरसाया था। हालाँकि, वो जैसे ही भारत लौटे, उनके द्वारा हॉलैंड में डच आसमान में F-16 उड़ाने की ख़बरें सुर्खियाँ बनीं। भारतीय वायुसेना ने सोचा कि जब राजेश हॉलैंड में ऐसा कर सकते हैं तो अपने देश में क्यों नहीं?

तब भारत में नया-नया मिग-29 आया हुआ था। वायुसेना ने लगे हाथ उन्हें इसे उड़ाने के लिए निमंत्रण दे दिया। एक जननेता होने के कारण उनका शेड्यूल काफी व्यस्त रहता था लेकिन वो फिर भी इन चीजों के लिए किसी न किसी तरह वक़्त निकाल लिया करते थे। लेकिन राजेश पायलट हिम्मती भी थे। नरसिम्हा राव सरकार में इंटरनल सिक्योरिटी मंत्री रहते उन्होंने ऐसे व्यक्ति पर हाथ डाला, जिसे बड़े-बड़े लोग दंडवत करते थे।

चंद्रास्वामी को भेजा जेल, दबाव के आगे नहीं झुके

चंद्रास्वामी एक ऐसे तांत्रिक थे, जिनके सम्बन्ध इंदिरा गाँधी से लेकर बाल ठाकरे तक से अच्छे थे। उन्हें दिल्ली का सबसे बड़ा पॉवर ब्रोकर कहा जाता था। बैंकॉक के एक व्यापारी ने शिकायत की थी कि चंद्रास्वामी ने उनसे 1 करोड़ रुपए ठग लिए हैं। इसके बाद राजेश पायलट सख्त हुए और सरकारी एजेंसियों को जाँच का जिम्मा सौंपा। चर्चा तो ये भी थी कि चंद्रास्वामी के दाऊद इब्राहिम से भी सम्बन्ध हैं और उन्होंने इस आतंकी को शरण भी दिया था।

जाँच हुई और राजेश पायलट के निर्देश पर हुई कार्रवाई के बाद चंद्रास्वामी को गिरफ्तार किया गया। जब बीच में अड़चनें आईं तो राजेश पायलट और उनके सचिव ने खुद आदेश सम्बंधित पत्र ड्राफ्ट किया और इसके बाद पायलट ने पूछा कि अब बताइए, इसके बाद किस सबूत की ज़रूरत है? इसके 2 दिन बाद ही पायलट से गृह मंत्रालय ले लिया गया। उन्होंने एक ऐसे माफिया पर हाथ डाला था, जो सामानांतर सत्ता चला रहा था।

राजेश पायलट ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष का चुनाव भी लड़ा था, लेकिन सीताराम केसरी के आगे उन्हें हार माननी पड़ी। बाद में कॉन्ग्रेस में सोनिया राज आया और शरद पवार, तारिक अनवर और पीए संगमा ने बगावत किया। तीनों को पार्टी से निकाल बाहर किया गया। तब राजेश पायलट का मत था कि इन तीनों से क्रमवार तरीके से निपटा जाए, उनसे बातचीत की जाए लेकिन उनकी बात नहीं मानी गई।

जून 2000 में अपने ही चुनावी क्षेत्र दौसा के निकट एक कार एक्सीडेंट में उनकी मृत्यु हो गई, जब वो जयपुर के लिए लौट रहे थे। अगर आज वो ज़िंदा होते तो न सिर्फ राजस्थान बल्कि देश में एक बहुत बड़ी राजनीतिक भूमिका निभा रहे होते। उनकी असमय मृत्यु होने के बाद उनके बेटे सचिन ने उनकी राजनीतिक विरासत सँभाली और आज राजस्थान में कॉन्ग्रेस द्वारा नज़रअंदाज़ किए जाने के बाद उन्होंने बगावत कर दी।

गणित 49 सीटों का, जहाँ सचिन पायलट बदल सकते हैं समीकरण

राजेश पायलट का ही प्रभाव है कि आज सचिन पायलट राजस्थान में 49 विधानसभा सीटों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दखल रखते हैं। उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाने जाने के बाद उन्होंने जम कर मेहनत की और अपने पिता के समर्थकों को निराश नहीं किया। राजस्थान में उन्हें गुर्जर और मीणा समुदाय के बीच होने वाले संघर्षों को थामने वाला व्यक्ति भी माना जाता है। दोनों समुदाय अक्सर लड़ते रहते थे और आरक्षण को लेकर आंदोलन होते रहते थे।

उन्होंने 2004 में पहली बार सांसद बनने के साथ ही गुर्जर-मीणा एकता के लिए मुहिम शुरू कर दी थी और रैली पर रैली कर के इन दोनों समुदायों के बीच दूरियों को पाटने के लिए कई रैलियाँ की। ‘नवभारत टाइम्स’ के अनुसार, आज मीणा के साथ 5 विधायक हैं। ये बताता है कि उनके प्रयास फलदाई रहे हैं। इस तरह से वो इन दोनों समुदायों के लोकप्रिय नेता बन कर राज्य की लगभग 17% जनसंख्या के भीतर स्वीकार्यता पाते हैं।

2018 के चुनाव को ही उदाहरण के रूप में लीजिए। पूर्वी राजस्थान में 49 सीट गुर्जर-मीणा का गढ़ हैं। इनमें से 42 सीटों पर कॉन्ग्रेस को विजय मिली, जो सचिन पायलट की ही मेहनत का परिणाम था। एक तो उन्हें सीएम पद नहीं दिया गया और ऊपर से सरकार में भी उन्हें हाशिए पर धकेल दिया गया। अब देखना ये है कि सचिन पायलट किस करवट बैठते हैं लेकिन राजस्थान में बड़ा बदलाव तो तय ही है।

अल्लाह हू अकबर चिल्लाने वाले चोर ने बुजुर्ग पर की पॉटी, सर पर भी मल दिया

पश्चिमी फ्रांस के लॉयर-अटलांटिक में ले क्रॉसिक कम्यून में 53 वर्षीय एक व्यक्ति को 85 वर्षीय बुजुर्ग को लूटने, उसे पीटने और उस पर शौच करने के आरोप में 18 महीने जेल की सजा सुनाई गई है। यह घटना 29 मई की है।

आरोपित ने बुजुर्ग व्यक्ति के घर में खिड़की से घुस कर उसके कपड़े, टेलीफोन और तीन चाकू चुरा लिए। इसके बाद वह भाग गया लेकिन उसके जूते वहीं छूट गए थे, तो वह उसे लेने के लिए वापस आया। इस दौरान उसका मुकाबला 85 वर्षीय बुजुर्ग से हो गया।

Breitbart की रिपोर्ट के अनुसार, आरोपित ने बुजुर्ग को बुरी तरह से पीटा और फिर उसके ऊपर पॉटी कर दिया, उसे उनके सिर पर भी मल दिया। हालाँकि बाद में पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर लिया।

बताया जा रहा है कि जब उसे पुलिस ने गिरफ्तार किया तो वो ‘अल्लाह-हू-अकबर’ चिल्लाते हुए पुलिस को जान से मारने की धमकी देने लगा। कथित तौर पर उसने धमकी देते हुए कहा, “अल्लाह-हू-अकबर, मैं कार के साथ वापस आऊँगा, सब कुछ तोड़ दूँगा, नरसंहार करूँगा।”

प्रवेश पर प्रतिबंध

आरोपित एक हिस्ट्रीशीटर और हत्यारा है। उसे पूर्व में 19 अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया था, जिसमें हत्या भी शामिल था। उसे संत-नाज़ायर क्रिमिनल कोर्ट द्वारा शुरू में 24 महीने जेल में रखा गया था, लेकिन बाद में लगभग 6 महीने की सजा वापस ले ली गई।

कारावास के बाद दोषी को दो साल की परिवीक्षा देनी होगी। रिपोर्टों के अनुसार, ले क्रॉसिक के फ्रांसीसी कम्यून में उसके प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।