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जम्मू-कश्मीर के बारामूला में एक और बीजेपी नेता का अपहरण, मेहराजुद्दीन मल्ल की तलाश में जुटे अधिकारी

कश्मीर में एक भाजपा नेता की गोली मारकर हत्या करने के एक सप्ताह बाद, बारामुला जिले में एक भाजपा कार्यकर्ता मेहराजुद्दीन मल्ल (Mehrajuddin Malla) का अज्ञात व्यक्तियों द्वारा अपहरण कर लिया गया है।

भाजपा नेता मेहराजुद्दीन मल्ल जम्मू-कश्मीर के बारामूला जिले में वाटरगम नगर समिति के उपाध्यक्ष भी हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, मेहराजुद्दीन मल्ल को उस समय एक सैंट्रो कार में अगवा कर लिया गया, जब वह अपने दोस्त से मिलने के लिए सड़क से गुजर रहे थे।

मेहराजुद्दीन मल्ल का कथित तौर पर सोपोर शहर के रास्ते से अपहरण कर लिया गया। वो सोपोर में म्युनिसिपल कमेटी के वाइस प्रेसिडेंट हैं। मेहराजुद्दीन मल्ल के अपहरण के बाद अधिकारियों ने खोज अभियान शुरू कर दिया है।

पुलिस के सूत्रों का मानना है कि जम्मू-कश्मीर पुलिस को प्राप्त इनपुट के आधार पर, अल बद्र समूह के पाकिस्तानी आतंकवादी इन घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। हालाँकि, इस बारे में अभी तक किसी भी प्रकार का आधिकारिक अंतिम बयान नहीं मिला है।

ज्ञात हो कि कुछ दिन पहले ही जम्मू-कश्मीर के बांदीपोरा में बीजेपी नेता शेख वसीम बारी, उनके भाई और पिता की आतंकवादियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। उनके पिता, बशीर अहमद और भाई, उमर बारी भी हमले में घायल हुए थे। तीनों को अस्पताल में मृत घोषित कर दिया गया।

हमले के बाद, पुलिस ने मारे गए भाजपा नेता के 10 सुरक्षा गार्डों को हिरासत में लिया और उनसे सवाल किया गया था कि जब भाजपा नेता पर हमला हुआ था तो उनमें से कोई भी उसके साथ क्यों नहीं था? जम्मू-कश्मीर पुलिस ने कहा था कि भाजपा नेता की हत्या के पीछे लश्कर के दो आतंकवादी थे।

घाटी में भाजपा के जनप्रतिनिधियों पर किए गए हालिया हमले पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों की हताशा को दर्शाते हैं। दरअसल, महज वर्ष 2020 में ही, नए केंद्र शासित प्रदेश में विभिन्न अभियानों के तहत 130 से अधिक आतंकवादियों को सुरक्षा बलों ने मार गिराया है।

दूसरी ओर, पाकिस्तान लगातार जम्मू-कश्मीर में शांति प्रक्रिया को विफल करने की कोशिश कर रहा है, जो कि घाटी में निरंतर ही आतंकी हमलों को अंजाम देने के लिए प्रशिक्षित आतंकवादियों को भेजकर नियंत्रण रेखा के पास लगातार संघर्ष विराम उल्लंघन कर रहा है।

मृतक के परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए, जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने भी ट्वीट करते हुए लिखा था : “मैं इस हमले की निंदा करता हूँ। इस दुख की घड़ी में उनके परिवारों के प्रति मेरी संवेदना है। मुख्य रूप से मुख्यधारा के राजनीतिक कार्यकर्ताओं को हिंसक रूप से लक्ष्य बनाना बेरोकटोक जारी है।”


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बुधवार, 8 जुलाई को अज्ञात आतंकवादियों द्वारा भाजपा नेता वसीम बारी की निर्मम हत्या का संज्ञान लेते हुए वसीम बारी के परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की थी।

सलमान खान से पूछताछ नहीं: कोर्ट में खारिज हुई सल्लू के ख़िलाफ़ याचिका, मुंबई पुलिस ने भी नकारा

सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या मामले में मुम्बई पुलिस की कार्रवाई जोरो पर है। अब तक कुल 35 लोगों से पूछताछ की जा चुकी है, जिनमें से संजय लीला भंसाली जैसी बड़ी हस्तियाँ भी शामिल हैं। सुशांत सिंह राजपूत के परिजनों और उनकी महिला मित्र रहीं रिया चक्रवर्ती से भी पुलिस ने पूछताछ की। अब खबर आई है कि इस मामले में सलमान खान को समन नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने सलमान को इस मामले में समन करने संबंधी याचिका को अस्वीकार कर दिया। ये याचिका मुजफ्फरपुर के सुधीर ओझा ने दायर की थी।

वहीं मुम्बई पुलिस ने भी अभिनेता सलमान खान से पूछताछ करने वाली खबरों को नकारते हर कहा है कि पुलिस की ऐसी कोई योजना नहीं है। डीसीपी ने बताया कि सुशांत सिंह राजपूत आत्महत्या मामले में सलमान खान को समन नहीं भेजा जाएगा। आरोप है कि सलमान खान पहले सुशांत सिंह राजपूत के साथ फ़िल्म बनाने वाले थे लेकिन बाद में उन्होंने ये फ़िल्म नहीं बनाई। हाल ही में सलमान की मैनेजर रही रेशमा शेट्टी से पुलिस ने पूछताछ की है, जो बॉलीवुड में कई बड़ी हस्तियों के लिए काम कर चुकी हैं। बांद्रा थाने में रेशमा से लगभग पाँच घंटों तक पूछताछ की गई।

रेशमा सलमान के मैनेजर के तौर पर साल 2010 से ही चर्चा में आती रही हैं। वो 2018 तक सलमान का काम संभालती रहीं, उसके बाद अक्षय कुमार के लिए काम करने लगीं। हालाँकि, प्रोफेशनल रूप से वो अभी भी अभिनेत्री आलिया भट्ट और कटरीना कैफ के साथ भी जुड़ी हुई हैं। पुलिस ने कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा से भी पूछताछ की है। हालाँकि, पूछताछ में हुए खुलासों के बारे में पुलिस अब तक सार्वजनिक रूप से कुछ भी बोलने से बचती रही है।

हाल ही में मुजफ्फरपुर में अधिवक्ता सुधीर कुमार ओझा ने के सेलेब्रिटीज के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराया था। उन सब पर बॉलीवुड में नेपोटिज्म और गैंगबाजी का आरोप लगाया गया था। मुजफ्फरपुर के चीफ जुडिशल मजिस्ट्रेट ने कहा कि ये मामला कोर्ट के ज्यूरिडिक्शन से बाहर का है। सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या को एक महीने हो चुके हैं और इस मौके पर उनके साथ काम करने वाले कई लोगों ने अपना दर्द सोशल मीडिया के माध्यम से साझा किया।

कई मीडिया रिपोर्ट्स में इसकी भी चर्चा थी कि नेपोटिज्म को बढ़ावा देने वाले सलमान खान ने सुशांत सिंह राजपूत को नज़रअंदाज़ किया और सूरज पंचोली को प्रमोट करने के लिए हर तिकड़म आजमाया। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया था कि पंचोली के कारण उन्होंने सुशांत को खरी-खोटी भी सुनाई थी। हम इन ख़बरों की सच्चाई का दावा तो नहीं करते लेकिन बिहार की जनता ज़रूर इसके कारण सलमान खान से नाराज़ है।

पटना में राजपूत समाज ने भी सलमान खान के पोस्टर्स जलाए। लोगों ने सलमान, करण और आलिया को ‘नेपोटिज्म गैंग’ का वाहक मान लिया है। गुरुवार (जून 18, 2020) को राजपूत समाज लोगों ने ‘बीइंग ह्यूमन’ का कपड़ों की दुकान की तरफ गए और मैनेजर पर दबाव डाल कर दुकान को बंद करवाया। इनमें राजपूत समाज के साथ अन्य लोग भी शामिल थे। इस विरोध प्रदर्शन को पूरा समर्थन मिला।

अनस कुरैशी ने शिव मंदिर के उपाध्यक्ष को पीट-पीट कर मार डाला… क्योंकि उन्होंने भगवा पहना था

महाराष्ट्र के पालघर में साधुओं की निर्मम हत्या के बाद अब मामला उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले का है। यहाँ अब्दुल्लापुर इलाके में शिव मंदिर के उपाध्यक्ष की हत्या सिर्फ़ इसलिए कर दी गई क्योंकि उन्होंने गले में भगवा लपेटा हुआ था।

शिव मंदिर के उपाध्यक्ष कांति प्रसाद की हत्या मामले में पुलिस ने अनस कुरैशी नाम के युवक को आरोपित बनाकर जेल भेजा है। बाकी आरोपितों की तलाश की जा रही है। फिलहाल, एहतियातन गाँव में पुलिस बल तैनात है।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, अब्दुल्लापुर के बाजार में शिव मंदिर के उपाध्यक्ष कांति प्रसाद मंदिर की दुकानों में ही अपनी दुकान करते थे। मंदिर में साफ सफाई से लेकर हर पूजा-पाठ कराने की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर थी। वे अक्सर साधू की वेशभूषा में रहते थे। इसी के साथ उनके गले में हमेशा भगवा दुपट्टा होता था।

सोमवार (जुलाई 13, 2020) को वह अपने इसी परिधान में गंगानगर स्थित बिजलीघर में बिजली का बिल जमा कराने गए। लेकिन वापस लौटते समय उन्हें ग्लोबल सिटी के पास अनस कुरैशी मिल गया। उसने कांति प्रसाद का भगवा दुपट्टा देखकर उन पर धार्मिक टिप्पणी की और विरोध करने पर उनकी पिटाई भी कर दी।

कांति प्रसाद ने गाँव लौटकर इस बारे में सबको बताया और उसके परिजनों से भी इस संबंध में शिकायत की। मगर, अनस कुरैशी तभी पीछे से आ गया और उन्हें फिर बेरहमी से मारने लगा। जब कांति प्रसाद के परिवार वालों को इस मामले की खबर हुई तो वह उन्हें भावनपुर थाने ले गए। लेकिन, थाने में कांति प्रसाद की तबीयत बिगड़ने लगी। इसके बाद एंबुलेंस बुलाया गया और उन्हें मेडिकल कॉलेज में एडमिट करवा दिया गया।

इस दौरान कांति प्रसाद की शिकायत के आधार पर पुलिस ने अनस के खिलाफ धार्मिक टिप्पणी करने, मारपीट और जान से मारने की धमकी देने का मुकदमा दर्ज कर लिया। किंतु मंगलवार को उपचार के दौरान कांति प्रसाद की मौत हो गई।

कांति प्रसाद की मौत से हिंदू संगठनों में रोष व्याप्त हो गया और थाने पर उन्होंने जमकर हंगामा किया। पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अनस पर धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज किया और उसे गिरफ्तार कर लिया। इस गिरफ्तारी की पुष्टि मेरठ पुलिस ने ट्वीट करके भी दी।

डिग्री को मत बनाएँ कोविड-19 प्रभावित: परीक्षा पर कॉन्ग्रेस, AAP, TMC के लोकलुभावन बयान से गलत संदेश

क्या अंतिम सेमेस्टर की परीक्षाएँ विश्वविद्यालय में रद्द करना राजनीतिक नंबर बनाने का मुद्दा बन गया है? क्या अंतिम सेमेस्टर की परीक्षाएँ कराने या न कराने के फैसले का राजनीतिकरण किया जाना चाहिए?

मूल्यांकन, मूल्यांकन व्यवस्था, परीक्षा और डिग्री की विश्वासनीयता बनाए रखते हुए विद्यार्थियों और शिक्षकों का सर्वाधिक हित किस में है? क्या शिक्षाविदों, यूजीसी, विश्वविद्यालय सांविधिक निकाय और निर्वाचित छात्र निकायों पर इस बारे में सामूहिक रूप से निर्णय लेने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता?

क्या यह जरूरी नहीं है कि एक ऐसा हल निकाला जाए जिसमें कि इस महामारी में विद्यार्थी किसी भी तरह के जोखिम और तनाव से बच सकें और उनकी डिग्री भी समाज और संभावित नियोक्ताओं की नजरों में संदेहास्पद ना बने? डिग्री का स्तर न गिरे।

इस मामले में उपर दिए यह ऐसे बुनियादी सवाल हैं, जिन्हें जल्दबाजी में निर्णय लेने से पहले संज्ञान में लेना चाहिए। इस संदर्भ में बहुत से शिक्षकों और विद्यार्थियों की आशंका सही है कि ओपन बुक परीक्षा मूल्यांकन प्रक्रिया के माध्यम से प्राप्त डिग्री से मानकों का स्तर गिरेगा और आगे यह जाकर उनकी नौकरियों के अवसरों को भी प्रभावित करेगा।

विश्वविद्यालय अधिनियम के अनुसार, शिक्षा और परीक्षा के स्तर को बनाए रखना विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी है। इसलिए उन्हें किसी भी ऐसे समाधान को अस्वीकृत करना चाहिए जो निर्धारित मापदंडों पर खरा नहीं उतरता हो और विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा व गरिमा के अनुकूल ना हो। ओपन बुक परीक्षा का सुझाव देते हुए यूजीसी ने ऐसी किसी परीक्षा कराने का सुझाव नहीं दिया, जो बिना परीक्षक के संपन्न हो।

शिक्षाविदों के एक वर्ग ने इसे पारदर्शी और निष्पक्ष मूल्यांकन मॉडल माना है, जो अंतिम सेमेस्टर के विद्यार्थियों की डिग्री के स्तर को प्रभावित नहीं करेगा लेकिन यह शिक्षाविद विद्यार्थियों और शिक्षकों के बुनियादी सवालों का उत्तर नहीं दे पा रहे हैं। क्या यह मॉडल नकल, बाहरी हस्तक्षेप, समान अवसर इत्यादि सुनिश्चित करेगा?

उम्मीद है कि दिल्ली विश्वविधालय ने इस बारे में एक याचिका का उत्तर देते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय को सम्भावित नकल एवं विद्यार्थियों को समान अधिकार का ध्यान रखने का आश्वासन दिया होगा।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 10 अगस्त से ओपन बुक टेस्ट करवाने का आदेश दिया है। इस मामले में महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि विद्यार्थी परीक्षा और मूल्यांकन की किसी भी विश्वसनीय पद्धति से बचना नहीं चाहते। ज्यादातर विद्यार्थी जिन्हें शिक्षकों का समर्थन भी है, वे उन सभी प्रश्न पत्रों/पाठ्यक्रमों का निष्पक्ष मूल्यांकन व प्रत्येक प्रश्नपत्र के ग्रेड प्राप्त करना चाहते हैं, जो उन्होंने अंतिम सेमेस्टर में पढ़े हैं।

हालाँकि, उनकी मूल चिंता यह है कि मूल्यांकन विश्वसनीय पद्धति अपनाकर ही किया जाए और जो डिग्री उन्हें मिले, उस पर कोविड-19 प्रभावित होने का ठप्पा ना लगे। दूसरी ओर, कॉन्ग्रेस, आम आदमी पार्टी और तृणमूल कॉन्ग्रेस आदि पार्टियों के द्वारा विश्वविद्यालय परीक्षाएँ रद्द करने और बिना परीक्षा के विद्यार्थियों को डिग्री देने के लोकलुभावन बयान से यह गलत संदेश दिया जा रहा है कि  डिग्री ऐसे ही प्राप्त हो जाएगी।

ऐसा करने से विद्यार्थियों को फायदा होने की बजाय नुकसान ही अधिक होगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि संकीर्ण राजनीति के कारण विद्यार्थियों के करियर को दाँव पर लगाया जा रहा है। यूजीसी के एक भूतपूर्व चेयरमैन ने कई शिक्षाविदों के साथ मिलकर इस मामले में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के चेयरमैन को पत्र लिखा है। यह विश्वास करना बहुत कठिन है कि इस पत्र में राजनीतिक रूप से प्रेरित चिंता नहीं है।

ऐसा इसलिए, क्योंकि क्योंकि यूजीसी में इन पूर्व चेयरमैन के कार्यकाल में ही अनेक छात्र और शिक्षक विरोधी निर्णय जैसे- सेमेस्टर सिस्टम, विनाशकारी एपीआई, पीबीएएस व्यवस्था आदि को शिक्षा सुधार के नाम पर सरकारी नीति का अनुसरण करके बिना विरोध कॉलेजों और महाविद्यालयों पर लाद दिया गया था।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अभी भी अंतिम सेमेस्टर एग्जाम पर हुई राजनीति से किए गए नुकसान की भरपाई कर सकती है और एक विश्वसनीय मूल्यांकन पद्धति अपनाकर अंतिम सेमेस्टर के विद्यार्थियों का परिणाम घोषित कर सकती है।

एक सर्वोत्तम उपाय आंतरिक मूल्यांकन अपनाना है और पिछले सेमेस्टर के सर्वोत्तम रिजल्ट का समायोजन करके ऐसा किया जा सकता है। जैसा इंटरमीडिएट सेमेस्टर के लिए कई विश्वविद्यालय ने किया भी है।

कॉलजों और विश्वविद्यालयों में अपनाई जा रही सीबीसीएस प्रणाली के अनुसार सभी सेमेस्टर का समान महत्व है। तब यह विश्वसनीय उपाय अंतिम सेमेस्टर में भी लगाया जाना चाहिए। प्रत्येक पाठ्यक्रम/प्रश्नपत्र के ग्रेड अंक तालिका में दर्शाए जाने चाहिए।

साथ ही अंत में सीजीपीए के लिए उसे गिना जाए क्योंकि विद्यार्थियों ने अपने पाठ्यक्रम/प्रश्न पत्र को पूरा किया है और उन्होंने व्यावहारिक परीक्षा, कक्षा परीक्षा देने के साथ अपने असाइनमेंट भी जमा कराए हैं।

कई विद्वानों के हिसाब से परीक्षा-विहीन ऑनलाइन ओपन बुक एग्जाम की तुलना में यह आंतरिक मूल्यांकन का प्रस्ताव अधिक तीव्रगामी, विश्वसनीय और महामारी  में विद्यार्थियों को सुरक्षित रखने के साथ ही उन्हें तनाव से राहत प्रदान करने वाला भी है।

किसी को भी हमारे विद्यार्थियों के साथ राजनीति करने या परीक्षा के नाम पर खिलवाड़ करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। वर्तमान स्थिति में यदि अपेक्षित सावधानी नहीं बरती गईं तो इन विद्यार्थियों की डिग्री पर प्रश्नचिन्ह लगने के साथ-साथ आगे चलकर इनकी डिग्री को कोविड-19 प्रभावित डिग्री कहे जाने का भी खतरा है।

महामारी की चुनौतियों और छात्रों के संपूर्ण हितों को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, विश्वविद्यालय एवं राज्य सरकारों को अपनी परीक्षा व्यवस्था का अवमूल्यन करने वाली घोषणा करने की बजाय उन्हें प्रत्येक प्रश्न पत्र की तार्किक, विश्वसनीयता संचालित, पवित्र मूल्यांकन पद्धति की घोषणा करनी चाहिए।

यह नहीं भूलना चाहिए कि इन विद्यार्थियों ने अंतिम सेमेस्टर को समय दिया है। विद्यार्थियों ने अंतिम सेमेस्टर में सभी प्रश्न पत्रों का अध्ययन किया है और स्वयं को मूल्यांकन के लिए तैयार किया है।भूल से भी ऐसे संकेत न दिए जाएँ कि डिग्री देते समय अकादमिक मापदंडों और मूल्यांकन पद्धति से समझौता किया गया है।

गाय से बिछड़ना नहीं हुआ बर्दाश्त, एक किलोमीटर तक गाड़ी के पीछे भागता रहा सांड: Video हुआ Viral

तमिलनाडु के मदुरई में एक दिल छू जाने वाली घटना सामने आई है। वहाँ सांड और गाय की दोस्ती का एक अनोखा नजारा उस समय देखने को मिला, जब गाय को गाड़ी में बैठाकर सांड से दूर किया जाने लगा। अपने पास से गाय को दूर जाता देख सांड ने गाड़ी का करीब 1 किलोमीटर तक भागकर पीछा किया और फिर गाड़ी रुकवा कर गाय को देखता रहा।

इस घटना की एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर सामने आई है। वीडियो में हम देख सकते हैं कि सांड लॉरी के पीछे-पीछे भाग रहा है और फिर बाद में गाड़ी रुकवा कर अपना सिर चिपका कर गाड़ी से खड़ा हो गया है।

वीडियो में आप देख सकते हैं कि सांड गाड़ी के आगे पीछे घूम रहा है और सिर्फ़ गाय को ही देख रहा है। गाय और सांड के बीच इस गहरे रिश्ते को देखकर दोनों को वापस मिलवा दिया गया है और उन्हें माला पहना कर उनके साथ तस्वीरें भी खिंचवाईं गई।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये घटना 14 जुलाई 2020 को पालमेडु की है। यहाँ चाय की दुकान चलाने वाले मुनियांदिराजा अपनी एक गाय लक्ष्मी और सांड मंजामलई का पालन पोषण करते हैं। वे इस घटना पर बताते हैं कि उन्होंने जब अपनी गाय लक्ष्मी को बेचा तो उसे गाड़ी में चढ़ाकर ले जाया जाने लगा। लेकिन सांड को अलग होने का दर्द बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने उस गाड़ी का एक किलोमीटर तक पीछा किया और रोकने का प्रयास किया।

इस घटना को देखकर तमिलनाडु के उप मुख्यमंत्री के बेटे जयप्रदीप ने गाय को वापस से पैसे देकर खरीदा और मंदिर में दान करके वापस से उसे सांड से मिलवा दिया। अब इस घटना की वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। लोगों का कहना है कि कौन कहता है जानवर आपस में प्यार नहीं करते।

जब मेरी डिलीवरी हुई, तब नवाजुद्दीन घर पर लाए थे लड़कियाँ, उनके भाई ने मारा था मुझे थप्पड़: बीवी अंजना पांडे

नवाजुद्दीन सिद्दकी पिछले कुछ समय से अपने पारिवारिक मसलों के चलते सुर्खियों में हैं। पहले उनकी भतीजी ने उनके भाई पर यौन शोषण के आरोप लगाए। अब उनकी पत्नी ने उनके भाई पर मारपीट करने का आरोप लगाया है।

नवाजुद्दीन को तलाक के लिए नोटिस भेज चुकी आलिया सिद्दकी ने कहा है कि नवाज के भाई अपने घर की औरतों के साथ मारपीट करते हैं और एक भाई ने उन्हें भी एक बार थप्पड़ मारा था।

आलिया की मानें तो नवाज निकाह के बाद भी अपनी गर्लफ्रेंड से बातें करते थे और कभी अपनी पत्नी के समर्थन में आवाज नहीं उठाते थे। जब आलिया की डिलीवरी हुई तो वो घर पर दूसरी लड़की को भी लेकर आ गए थे। इसका मालूम आलिया को अस्पताल से लौटने पर हुआ था।

पिंकविला को दिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में उन्होंने कहा, “नवाज के दो या तीन भाई हैं, जो पूरी तरह पागल हैं। उनके पास दिमाग नहीं है, वो इसी तरह के माहौल में बड़े हुए हैं इसलिए वो लोग ऐसे बन गए हैं। उनकी परिवार में महिलाओं की बिल्कुल इज्ज़त नहीं की जाती। उनका जब मन करता है, वो अपने घर की औरतों को तब मारते हैं।”

आलिया सिद्दकी ने कहा:

“उनके भाई अयाज़ अपनी पत्नी पर तो हाथ उठाते ही हैं साथ ही दूसरों की बीवियों पर भी हाथ उठाते हैं। वह मेरे साथ भी मारपीट करना चाहते थे। उन्होंने मुझे एक बार थप्पड़ मारा था। उस वक्त कुछ बहुत बड़ा ऐसा हुआ था, जो मेरी बेटी की इज्जत से जुड़ा था और मैंने उनके खिलाफ बोला था। मैंने इसके बारे में पहले कभी बात नहीं की, पर मैं इसके बारे में बाद में बात करूँगी। मैंने उनका विरोध किया इसलिए उन्होंने मुझे थप्पड़ मारा था।”

आलिया सिद्दकी से अब अंजना किशोर पांडे बन चुकीं नवाज की पत्नी की शिकायत है कि उनके पति ने हमेशा गलत लोगों का साथ दिया। वे कहती हैं, “जब मेरे साथ या उनकी भतीजी शाशा के साथ कुछ भी गलत हुआ तो वो चुप रहे। उन्होंने उन लोगों का साथ दिया जो गलत कर रहे थे।” आलिया कहती हैं कि नवाज के भाइयों के ऐसे ही रवैये के कारण उन्हें कई महिलाएँ छोड़ कर गईं।

पिंकविला को दिए इस इंटरव्यू में आलिया सिद्दीकी ने नवाजुद्दीन सिद्दीकी के बारे में बात करते हुए कहा,

“हमारी शादी से पहले और शादी के बाद भी काफी लड़ाई होती थी। जब मैं प्रेग्नेंट थी तो मुझे चेकअप के लिए खुद ही ड्राइव करके जाना पड़ता था। मेरे डॉक्टर हमेशा मुझे कहते थे कि मैं पागल हूँ और मैं पहली ऐसी महिला हूँ, जो डिलीवरी के लिए अकेले आई है। मेरा लेबर पेन शुरू हुआ तो नवाज व उनके माता-पिता वहीं थे। लेकिन उस समय भी मेरे पति मेरे साथ नहीं थे। वह अपनी गर्लफ्रेंड से कॉल पर बात किया करते थे। मुझे इसका पता उनके फोन बिल्स से चला था।”

आलिया के अनुसार, नवाज के दूसरी महिलाओं से संबंधों के बारे में उन्हें उनका देवर यानी नवाज का भाई बताता था। उसने आलिया को उन लड़कियों के नंबर भी दिए थे, जिन 3-4 से नवाज बात कर रहे थे।

वे बताती हैं, “6 साल साथ रहने के बाद भी मेरी पहली डिलीवरी के समय उनके मन में मेरे लिए इमोशन नहीं थे। जब मैं डिलीवरी के बाद घर लौटी तो मुझे पता चला कि मेरे घर पर मेरी गैरमौजूदगी में कुछ और लड़कियाँ आई थीं। ये बात मुझे नवाज के भाई ने ही बताई। शमस मुझे इस संबंध में सब बताता था। लेकिन मैं ये बात नवाज को नहीं कह सकती थी कि मुझे उसकी सभी जानकारी शमस से मिलती है। इसलिए हम में हमेशा लड़ाई होती रहती थी।”

यहाँ बता दें कि नवाज को तलाक नोटिस भेजने के बाद आलिया अब इस मामले पर खुलकर अपनी बातें रख रही हैं। उन्होंने 10 साल की शादी में नवाज पर एक्ट्रा मैरिटल अफेयर से लेकर घरेलू हिंसा तक का आरोप लगाया है। उन्होंने उनके गैर जिम्मेदाराना रवैये को भी उजागर किया है और उनके घर पर धोखेधड़ी, मनी लॉन्ड्रिंग आदि का आरोप लगाया है।

गहलोत ने की राहुल गाँधी के खिलाफ गैंगबाजी, 26 सीटों पर समेटा पार्टी को: सचिन पायलट ने कहा – ‘मैं अभी भी कॉन्ग्रेसी’

राजस्थान के उप-मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद सचिन पायलट ने अपने राजनीतिक भविष्य के बारे में बहुत कुछ साफ़ करते हुए कहा है कि वो भाजपा में नहीं जाएँगे। उन्होंने कहा कि वो गहलोत नहीं हैं और न ही अपने लिए कुछ चाहते हैं, उनकी इच्छा है कि राजस्थान में उन वादों को पूरे किए जाएँ, जिन्हें चुनाव के वक़्त किया गया था।

सचिन पायलट ने कहा कि वसुंधरा राज सरकार में अवैध माइनिंग के खिलाफ कॉन्ग्रेस ने अभियान चलाया था। इसकी वजह से उन सब का अलॉटमेंट कैंसल हुआ था लेकिन अशोक गहलोत ने सत्ता में आने के बाद इस बारे में कुछ नहीं किया।

सचिन पायलट ने ‘इंडिया टुडे’ को दिए गए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में कहा कि 2017 में हुए एक संशोधन को हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था, जिसका प्रयोग कर के वसुंधरा राजे ने खुद के लिए जयपुर में एक सरकारी बँगला रख लिया था और वो भी जीवन भर के लिए। सचिन पायलट का दावा है कि गहलोत ने वसुंधरा से वो बँगला खाली कराने की बजाए उलटा इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी।

सचिन पायलट ने कौशिक डेका को दिए गए इंटरव्यू में स्पष्ट आरोप लगाया कि अशोक गहलोत अपने पूर्ववर्ती वसुंधरा राजे की मदद करने में लगे थे लेकिन सीएम ने उनके और उनके समर्थकों को वो सम्मान और जगह नहीं दी, जिसके वो हकदार थे। बकौल पायलट, अधिकारियों को उनका आदेश न मानने को कहा गया था और न ही उनके पास फ़ाइलें भेजी जाती थीं। कैबिनेट और सीएलपी की बैठक भी महीनों तक नहीं हुई।

सचिन पायलट ने पूछा कि उनके पद पर बने रहने का फायदा ही क्या है, जब वो जनता से किए गए वादे को पूरा करने में सक्षम नहीं हो पा रहे थे? बकौल पायलट, उन्होंने कई बार पार्टी फोरम पर इन मुद्दों को उठाया और पार्टी प्रभारी अविनाश पांडे के समक्ष भी अपनी बात रखी। सचिन पायलट ने कहा कि उन्होंने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से भी बात की लेकिन जब बैठकें ही नहीं होती थीं तो चर्चा और बहस के लिए जगह ही कहाँ थी? पायलट ने ‘इंडिया टुडे’ के कौशिक डेका से कहा:

“इससे मेरे सम्मान को चोट पहुँची है। 2019 लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस पार्टी ने अपने मैनिफेस्टो में देशद्रोह का कानून हटाने की वकालत की थी और बाद में इसी कॉन्ग्रेस सरकार ने इस कानून का इस्तेमाल अपने ही मंत्री के खिलाफ किया। मैंने अन्याय के खिलाफ ये कदम उठाया। जब सदन चल रहा हो तब ह्विप जारी किया जाता है लेकिन सीएम ने बैठक के लिए ऐसा कर दिया। उन्होंने मुझे अपने घर बुलाया, पार्टी मुख्यालय में भी नहीं। भाजपा के साथ मेरे मिले होने के आरोपों में कोई सच्चाई नहीं है। मैंने कॉन्ग्रेस को राजस्थान में जिताने मे इतनी मेहनत की है। मैं अपनी ही पार्टी के विरुद्ध क्यों जाऊँगा?”

राजस्थान में कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बावजूद सचिन पायलट ने कहा कि वो अभी भी कॉन्ग्रेस में ही हैं और अपने समर्थकों से विचार-विमर्श कर के यह तय करेंगे कि आगे क्या कदम उठाने हैं। सचिन पायलट ने इस बात से भी इनकार कर दिया कि वो भाजपा जॉइन करने वाले हैं। उन्होंने कहा कि फिलहाल वो अपने लोगों के लिए काम करना जारी रखेंगे। पायलट ने बताया कि उन्होंने ज्योतिरादित्य सिंधिया से पिछले 6 महीने से मुलाकात नहीं की है।

सचिन पायलट ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने पार्टी को 2018 में अपने नेतृत्व में जीत दिलाने के बावजूद कभी मुख्यमंत्री पद की माँग नहीं रखी थी। साथ ही उन्होंने कहा कि 200 सदस्यीय विधानसभा में जब कॉन्ग्रेस 21 सीटों पर सिमट गई थी, तब उन्होंने प्रदेश में पार्टी की कमान संभाली। पायलट ने बताया कि जब वो 5 वर्षों तक पुलिस के अत्याचार के खिलाफ लड़ रहे थे, संगठन को मजबूत कर रहे थे और जनता के साथ काम कर रहे थे, तब गहलोत के मुँह से एक शब्द भी नहीं निकल रहा था।

सचिन पायलट ने कहा कि अशोक गहलोत ने अनुभवी होने की बात करते हुए सीएम पद ले तो लिया लेकिन 2 बार मुख्यमंत्री रहने के बावजूद उन्होंने पार्टी को 2003 और 2013 में 56 और 26 सीटों पर समेट दिया। बकौल पायलट, गहलोत ने 2019 लोकसभा चुनाव में भी अच्छे प्रदर्शन का पार्टी को भरोसा दिलाया था। पायलट ने कहा कि राहुल गाँधी के कहने पर ही उन्होंने इस निर्णय को स्वीकार किया।

पायलट ने आरोप लगाया कि सीएम गहलोत उन्हें अपमानित करने में लगे रहे। उन्होंने कहा कि राहुल गाँधी के अध्यक्ष पद से हटते ही गहलोत ने उनके खिलाफ गैंगबाजी शुरू कर दी थी। हालाँकि, उन्होंने स्वीकार किया कि प्रियंका गाँधी ने जरूर उनसे फोन पर बात की है लेकिन वो व्यक्तिगत बातचीत थी और उससे कोई निष्कर्ष नहीं निकला। उन्होंने कहा कि वो स्वतंत्रता से काम करना चाहते हैं, उन्हें पावर नहीं चाहिए।

इससे पहले खबर आई थी कि सचिन पायलट ने अधिकतर कॉन्ग्रेस नेताओं का फोन कॉल रिसीव करना ही बंद कर दिया है। राजस्थान में पार्टी के प्रभारी अविनाश पांडेय ने भी स्वीकार किया था कि पायलट को कई कॉल्स और मैसेज किए गए लेकिन वो जवाब नहीं दे रहे हैं। राज्य में ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ के आरोपों को लेकर एफआईआर दर्ज की गई है और उसकी जाँच चल रही है, जिस सम्बन्ध में दो भाजपा नेताओं को भी गिरफ्तार किया गया था।

कामराज का फॉर्मूला या गाँधी परिवार का ‘फैमिली प्लान’? कॉन्ग्रेस के इतिहास का जो पक्ष कोई नहीं देखता

कल का मद्रास और आज का चेन्नई। चेन्नई का मरीना बीच। बीच पर कई शख्सियतों की प्रतिमा लगी हुई है। एक आदमकद प्रतिमा दो बच्चों के साथ है। बच्चों के कंधों पर हाथ रखे जो शख्स खड़ा है वह है, के. कामराज। यानी कुमारास्वामी कामराज।

तमिल नेता कामराज के बारे में आप गूगल करेंगे तो ढेर सारी चीजें उपलब्ध हैं। गुलाम भारत से लेकर आजाद भारत की उनकी राजनीतिक-सामाजिक यात्रा की तमाम बातें। इन सारी सूचनाओं में जो बात सामान्य है, वह है हर किसी ने कामराज को एक ही चश्मे से देखा है। खासकर, उनके उस फॉर्मूले को जिसे ‘कामराज प्लान’ कहते हैं। मौत के 45 साल बाद भी सियासत में कामराज अपनी उसी योजना की वजह से प्रासंगिक बने हुए हैं।

इस योजना के दोबारा मूल्यांकन का इससे बेहतर वक्त नहीं हो सकता। मार्च में मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस ने भविष्य की उम्मीदों को खोया है। अब राजस्थान में उसको तिलांजलि दी है। युवा नेतृत्व के नाम पर वह राहुल और प्रियंका गॉंधी से इतर किसी को मजबूत होते नहीं देखना चाहती। संगठन की मजबूती का मतलब वह परिवार की मजबूती से अलग नहीं तलाश पाती। जबकि इस पारिवारिक नेतृत्व ने ही उसे अपने सबसे बुरे दौर में पहुॅंचाया है।

क्या कॉन्ग्रेस कामराज प्लान की वजह से यहॉं तक पहुॅंची है? इस योजना में उसकी बीमारी का इलाज छिपा है? यह योजना कागज पर कुछ और जबकि असल में परिवार के लिए चुनौती दिखने वालों को ठिकाने लगाने की दवा है? जवाब तलाशने से पहले कामराज की यात्रा पर नजर डाल लेते हैं।

कौन थे कामराज?

15 जुलाई 1903 को तमिलनाडु के विरूधुनगर में कामराज का जन्म हुआ था। असल नाम कामाक्षी कुमारस्वामी नाडर था। पर बाद में कामराज के नाम से ही जाने गए। आजादी के आंदोलन के दौरान कई बार गिरफ्तार हुए और करीब 10 साल जेल में गुजारे। 1954 में मद्रास के मुख्यमंत्री चुने गए। लेकिन लोगों को आश्चर्य तब हुआ जब अपनी कैबिनेट में धुर विरोधी सी. सुब्रमण्यम और एम. भक्त वत्सलम को भी शामिल कर लिया। कुछ-कुछ नेहरू की पहली कैबिनेट जैसा ही। वे तीन बार तब के मद्रास और आज के तमिलनाडु के मुख्यमंत्री चुने गए।

पहली साख उस योजना से कमाई जिसकी आज पूरे भारत में खूब चर्चा होती है। मिड डे मील। कामराज ने मिड डे मील, फ्री यूनीफॉर्म जैसी योजनाओं से स्कूली शिक्षा-व्यवस्था में कमाल कर दिया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि कोई भी गॉंव बिना प्राथमिक स्कूल के न रहे। कक्षा 11वीं तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा लागू की। तमिल में बच्चों को शिक्षा मिले इसकी व्यवस्था की।

इसका ही असर था कि अंग्रेजों के जमाने में राज्य की साक्षरता 7 फीसदी के करीब थी, वह बढ़कर 37 फीसदी हो गई। इसी योगदान के प्रति कृतज्ञता जताने के लिए मरीना बीच पर बच्चों के साथ उनकी प्रतिमा लगी है।

गौर करने वाली बात यह है कि खुद कामराज की पढ़ाई छठी में छूट गई थी। शायद वही टीस रही होगी कि उन्होंने अपने प्रदेश के हर बच्चे तक शिक्षा पहुॅंचाने को अपना मकसद बना लिया था।

नेहरू की नजर

चकवर्ती राजगोपालाचारी पहले भारतीय गवर्नर जनरल थे। तमिलनाडु से ही आते थे। कॉन्ग्रेस में नेहरू विरोधी माने जाते थे। कामराज ने गृह राज्य में ही उनकी सियासत को ठिकाने लगा दिया। फिर आया 1962। चीन-भारत का युद्ध हुआ। इसके परिणामों ने कॉन्ग्रेस और नेहरू दोनों की छवि को नुकसान पहुँचाया। नेहरू उधेड़बुन में थे।

उनकी उम्मीदों का दीया हैदराबाद की पार्टी मीटिंग में जला। कामराज ने उनसे कहा कि वे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर प्रदेश कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष बनना चाहते हैं। पहले तो नेहरू के कुछ पल्ले नहीं पड़ा। जब कामराज ने विस्तार से अपनी योजना के बारे में बताया तो नेहरू को यह भा गया। उनसे कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर इसका खाका तैयार कर मिलो।

इस्तीफों वाला प्लान

कामराज ने प्लान तैयार कर नेहरू को सौंपा। अगस्त 1963 में कॉन्ग्रेस वर्किंग कमेटी ने इसे पास कर दिया। नतीजतन नेहरू की कैबिनेट के 6 सदस्यों और 6 कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्रियों को इस्तीफे देने पड़े। वजह इन्हें संगठन में दायित्व देकर उसे मजबूती प्रदान करना था।

2 अक्टूबर 1963 को कामराज ने भी सीएम पद से इस्तीफा दे दिया। नेहरू कैबिनेट से जिनकी विदाई हुई उनमें लाल बहादुर शास्त्री, मोरारजी देसाई, जगजीवन राम जैसे नाम थे।

भारतीय राजनीति में इसे ही ‘कामराज प्लान’ के नाम से जाना जाता है।

पहला किंगमेकर

सीएम पद से इस्तीफे के बाद कामराज कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिए गए। मई 1964 में नेहरू का निधन हो गया और कामराज की परीक्षा की असली घड़ी आई। दो दावेदार थे शास्त्री और मोरारजी। शास्त्री नेहरू खेमे के माने जाते थे। सो सर्वसम्मति की बात कह कामराज ने मोराराजी के दावे को खारिज कर दिया और शास्त्री पीएम चुन लिए गए।

फिर आया जनवरी 1966। शास्त्री की मौत हो गई। कामराज के सामने फिर से वही चुनौती। दावेदार वही मोरारजी। इस बार सर्वसम्मति की बात पर नहीं माने। वोटिंग के लिए अड़ गए। कामराज ने इंदिरा गॉंधी के पक्ष में लॉबिंग की और बाजी उनके हाथ ही लगी।

पसंद के दो पीएम बना कामराज ने देश के पहले किंगमेकर की छवि बनाई।

सूरज ढलान पर

इंदिरा गॉंधी जब पीएम चुनी गईं तब उनके विरोधी उन्हें ‘गूँगी गुड़िया’ कहते थे। गूॅंगी गुड़िया को कुर्सी पर बिठाना कामराज के राजनीतिक जीवन का आखिरी सफल दाँव था। इसके बाद उनका सूरज ढलने लगा। पटकथा गूँगी गुड़िया ने ही लिखी। 1967 के आम चुनावों में कई राज्यों में कॉन्ग्रेस की हार हुई। खुद कामराज भी हारे।

इंदिरा ने दबाव बनाया कि चुनाव हारने वाले नेता पद छोड़ें। कामराज को पार्टी अध्यक्ष पद से जाना पड़ा। अब वे इंदिरा का विकल्प मोरारजी में देख रहे थे। मोरारजी तो बाद में कॉन्ग्रेस छोड़ जनता पार्टी की सरकार का मुखिया बनने में कामयाब रहे, लेकिन कामराज फिर कभी कामयाब नहीं हुए। यहॉं तक कि पार्टी तोड़ना भी कारगर नहीं रहा।

लेकिन 1966 के उनके सफल प्लान ने यह तय कर दिया था कि अब नेहरू-गॉधी परिवार से इतर कॉन्ग्रेस का कोई भविष्य नहीं होगा। 2 अक्टूबर 1975 को कामराज ने अंतिम सॉंसे ली।

इंदिरा ने भी अगले साल भारत रत्न देकर ‘एहसान’ चुका दिए।

फैमिली प्लान

राजनीति में जब भी कोई राजनीतिक पार्टी ढलान पर होती है तो कामराज प्लान की चर्चा होती है। खुद यूपीए 2 के दौरान कॉन्ग्रेस ने भी इस पर चर्चा की थी। 2019 के आम चुनावों के बाद भी इस पर बात हुई। लेकिन, कुछ तथ्य ऐसे भी हैं, जिनसे इस प्लान के मकसद को लेकर सवाल उठते हैं।

आज भी कॉन्ग्रेस की वेबसाइट पर इस प्लान के लिए लिखा गया है, “कामराज ने नेहरू को एक प्लान सुझाया जिसमें कहा गया कि कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को सरकार में अपने पद छोड़कर पार्टी के लिए काम करना चाहिए।”

लेकिन दिवंगत पत्रकार कुलदीप नैयर अपनी आत्मकथा बियॉन्ड द लाइन्स में इस प्लान के छिपे एजेंडे की ओर इशारा करते हैं। उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री का जिक्र करते हुए लिखा है, “मैंने शास्त्री से पूछा कि नेहरू के प्रति इतने वफादार होने के बावजूद उन्हें क्यों निशाना बनाया गया था। उन्होंने जवाब दिया कि पंडितजी को मजबूरी में ऐसा करना पड़ा था, ताकि यह न लगे कि अपने आलोचकों से पीछा छुड़ाने के लिए ही उन्होंने कामराज प्लान रचा था।”

शायद यही कारण था कि बाद में नेहरू ने शास्त्री को बिना विभाग का मंत्री बना दिया और वे उनकी डिप्टी की हैसियत से काम भी करने लगे थे। नेहरू के जिस उत्तराधिकार को लेकर कुछ समय पहले तक कॉन्ग्रेस में कलह के आसार दिख रहे थे, वो इस योजना की वजह से अचानक सुलझ गई। तमिलनाडु प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी मॉंगने वाले कामराज को पूरी पार्टी ही चलाने के लिए मिल गई।

बताते हैं कि 13 जनवरी 1966 की रात दिल्ली के 4, जंतर मंतर रोड बंगले पर एक बैठक हुई थी। इस बैठक में कामराज पर पीएम बनने के लिए दबाव बनाया गया। लेकिन कामराज ने इस सुझाव को यह कहकर ठुकरा दिया कि वे हिंदी और अंग्रेजी नहीं जानते।

गौर करने वाली बात यह है कि जो शख्स 1966 में नेहरू की बेटी को पीएम बनाने के लिए भाषा को बाध्यता बता अपनी दावेदारी खारिज कर देता है, वही व्यक्ति 1963 में इसी बाधा के साथ देश के कोने-कोने में मौजूद कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष बनने और संगठन चलाने के लिए मुफीद था।

नैयर ने अपनी आत्मकथा में लिखा भी है, “चीन पर अपनी नीति को लेकर नेहरू कई प्रमुख कैबिनेट मंत्रियों की कटु आलोचना से आहत महसूस कर रहे थे। तभी कामराज ने सुझाव दिया कि कैबिनेट के सदस्यों को संगठन का काम कर पार्टी को मजबूत करना चाहिए। मेरी अपनी सूचना थी कि यह नेहरू का विचार था और कामराज इसे अभिव्यक्त कर रहे थे।”

इलाज या बीमारी

कामराज प्लान कागज पर बेहद साफ-सुथरा है। इसने नेहरू के उत्तराधिकार को लेकर कॉन्ग्रेस में किसी तरह की कलह को झटके से खत्म कर दिया। उनके विरोधियों को करीने से किनारे लगा दिया।

लेकिन, यही वह प्लान था जिसने कॉन्ग्रेस के भीतर आंतरिक लोकतंत्र का ढाँचा भी कमजोर किया। यह सुनिश्चित किया कि पार्टी पर परिवार की पकड़ इतनी मजबूत हो कि कोई उसे चुनौती न दे सके। यह दूसरी बात है कि बाद में इसके शिकार खुद कामराज भी हो गए।

इसमें कोई शक नहीं कि नेहरू-गाँधी परिवार से इतर आजाद भारत में जितने भी कॉन्ग्रेस अध्यक्ष हुए उनमें कामराज सबसे ताकतवर रहे। लेकिन इंदिरा की ताजपोशी के बाद कॉन्ग्रेस अध्यक्षों के आप नाम याद करिए परिवार से बाहर का कोई व्यक्ति याद नहीं आएगा। सीताराम केसरी की चर्चा होती भी है तो अलग वजहों से, जबकि कामराज के बाद भी नेहरू-गाँधी परिवार से अलग सात लोग इस जिम्मेदारी को सँभाल चुके हैं।

कामराज प्लान से ही परिवार ने वो ताकत हासिल की कि वह देश को 10 साल तक कठपुतली पीएम के हवाले कर दे। इसकी वजह से ही परिवार मौका मिलने पर राजस्थान को अशोक गहलोत के हवाले कर देता है, जबकि यह तथ्य सार्वजनिक है कि 2013 के विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त के बाद गहलोत ने खुद को प्रदेश की सियासत से अलग कर लिया था। उस मुश्किल वक्त सचिन पायलट ने संघर्ष किया। 2014 के आम चुनावों में प्रदेश में कॉन्ग्रेस का खाता नहीं खुला फिर भी वे लगातार लगे रहे। इसके नतीजे 2018 के विधानसभा चुनाव में दिखे। पर उनकी दावेदारी किनारे कर दी गई।

इसी तरह मध्य प्रदेश में खुद को छिंदवाड़ा तक सीमित रखने वाले कमलनाथ को ज्योतिरादित्य सिंधिया पर वरीयता दी गई। आखिरकार परिवार जानता है कि इनको कमान देने पर ‘युवराज’ के लिए चुनौती खड़ी हो जाएगी।

कॉन्ग्रेस जब भी कामराज प्लान को झाड़ने-पोंछने की बात करती है तो उसका एक ही उद्देश्य होता है। हर उस आवाज को कुचलना जो परिवार के लिए भविष्य में चुनौती बने।

₹9 लाख अस्पताल में रहने की कीमत : बेंगलुरु में बिल सुनते भागा कोरोना संदिग्ध, नहीं हुआ एडमिट

जहाँ कोरोना वायरस पूरी दुनिया के लिए महासंकट बन कर उभरा है, वहीं संक्रमितों और उनके परिवारों पर आर्थिक बोझ भी कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। इसकी बानगी बेंगलुरु में तब देखने को मिली, जब एक मरीज को कोलंबिया एशिया हॉस्पिटल ने 9.09 लाख रुपए का संभावित बिल थमा दिया। जबकि उसे कोरोना भी नहीं हुआ था, वो सिर्फ कोरोना संदिग्ध था। मरीज को हॉस्पिटल में 10 दिन आईसीयू में वेंटीलेटर पर रहना था, जिसके बाद हॉस्पिटल ने ये अनुमानित बिल थमाया।

दरअसल, 67 साल के एक बुजुर्ग मरीज अपने कोरोना टेस्ट के परिणाम का इन्तजार कर रहे थे, उन्हें साँस लेने में परेशानी भी आ रही थी। लेकिन, बेंगलुरु के कोलंबिया एशिया हॉस्पिटल ने इतना बिल बताया कि उनके परिवार ने उन्हें एडमिट कराने से ही इनकार कर दिया। 1.4 लाख रुपए तो केवल वेंटीलेटर का चार्ज बताया गया। इसके अलावा सिर्फ दवाओं और मेडिकल सप्लाइज के लिए ही 2 लाख रुपए माँगे गए।

लेबोरेटरी इन्वेस्टीगेशन के लिए 2 लाख रुपए का बिल थमाया गया। इसी तरह रूम रेंट के लिए 75,000 रुपए, प्रोफेशनल फी के रूप में 75,000 रुपए, नर्सिंग चार्ज के रूप में 58,500 रुपए, रेडियोलोजी और फिजियोथेरेपी के लिए 35,000 रुपए और इक्विपमेंट और सर्जिकल आइटम्स के लिए 25,000 रुपए का बिल थमाया गया। इतने सारे चार्जेज सुन कर मरीज ने अपने परिवार सहित वहाँ से निकलना उचित समझा।

साथ ही संभावित बिल में ये भी लिखा हुआ था कई अन्य सेवाओं के जुड़ने के बाद अंत में आने वाला बिल इससे भी ज्यादा का हो सकता है। ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ के अनुसार, मरीज का रविवार (जुलाई 12, 2020) को संत जॉन्स हॉस्पिटल में कोरोना का टेस्ट हुआ था। अचानक से उन्हें साँस लेने में दिक्कत आने लगी, जिसके बाद परिवार वाले उन्हें लेकर हॉस्पिटल गए। कर्नाटक के मंत्री के सुधाकर ने कहा कि इतना चार्ज वसूलना गलत है और इसकी जाँच होगी।

इससे पहले 70 साल के एक बुजुर्ग को कोरोना संक्रमण की वजह से अस्पताल में 62 दिन दाखिल रहना पड़ा था। इसके बाद हॉस्पिटल ने उन्हें 1.1 मिलियन डॉलर (करीब 8.35 करोड़ रुपए) का बिल थमा दिया था। सिएटल शहर के स्वीडिश मेडिकल सेंटर में 4 मार्च को कोरोना संक्रमित होने के कारण भर्ती कराया गया था। इसके बाद अस्पताल ने जब 62 दिनों बाद उन्हें छुट्टी दी तो उन्हें 181 पन्नों का बिल थमा दिया गया।

बकरीद पर कुर्बानी की छूट माँग रहे महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेसी नेता, गणेशोत्सव पर लगाए गए हैं कई सारे प्रतिबंध

महाराष्ट्र की महा विकास अघाड़ी सरकार में शिवसेना के पास भले ही मुख्यमंत्री का पद हो, मगर दबदबा कॉन्ग्रेस का दिनोदिन बढ़ता जा रहा है। ताजा मामला दो त्योहारों से जुड़ा है। एक गणेशोत्सव और दूसरा बकरीद।

एक ओर जहाँ महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस मंत्री असलम शेख लगातार बकरीद पर मुस्लिम समुदाय को छूट दिलवाने के लिए सरकार पर दबाव बना रहे हैं और उप मुख्यमंत्री अजीत पवार के साथ बैठक तक की बातें कर रहे हैं

वहीं, सरकार ने गणेशोत्सव के लिए कई प्रतिबंधों के साथ निर्देश भी जारी कर दिए हैं। इन निर्देशों में सरकार ने गणेश प्रतिमा को घर लाने की छूट तो दी है है। मगर विसर्जन के लिए अगले साल का समय दिया है।

अभी हाल में हमने महाराष्ट्र में देखा था कि महामारी के बावजूद वहाँ एक मुस्लिम बहुल इलाके मुंब्रा में ईद उल फितर के मद्देनजर विशेष तौर पर राहत दी गई थी। उस समय महामारी का प्रकोप होने के बाद भी दुकानें खुली थीं और लोग सड़कों पर दिखे लेकिन अब फिर खबर है कि कई नेता इस बकरीद पर भी छूट के साथ कुर्बानी करने की माँग कर रहे हैं।

इसके लिए उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र भी लिखा है। इस पत्र में उन्होंने माँग की है कि ईद उल अदहा (बकरीद) मुस्लिमों का प्रमुख त्यौहार है। इसलिए कुछ शर्तों के साथ इसे भी मनाने की छूट दी जाए। बता दें कि 1 अगस्त को ईद उल अदहा पूरे देश में मनाया जाना है।

उल्लेखनीय है कि एक ओर जहाँ महाराष्ट्र में ईद उल अदहा को लेकर लगातार उद्धव सरकार पर दबाव बनाया जा रहा है। उसी बीच गणेशोत्सव को लेकर सरकार द्वारा जारी की गई गाइडलाइन पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। लोगों का पूछना है कि क्या ये निर्देश वाकई उचित हैं?

बता दें कि गणेशोत्सव के लिए जारी गाइडलाइन में महाराष्ट्र सरकार ने कई पाबंदियों के साथ गणेशोत्सव मनाने के निर्देश दिए हैं। इन गाइडलाइन्स में बताया गया है कि किसी भी मंडल को गणेशोत्सव के लिए पहले इजाजत लेनी होगी। इसके अलावा कहीं भी गणेश जी की प्रतिमा 4 फीट से ज्यादा नहीं होगी और घरों में लाई जाने वाली मूर्तियाँ भी 2 फीट की होनी चाहिए।

राज्य सरकार की गाइडलाइन में ये भी अपील की गई है कि लोग अपने घरों में किसी धातु की गणेश प्रतिमा लाएँ और उसका विसर्जन अगले साल या फिर फरवरी माह में करें। इसके अलावा जो लोग भी मिट्टी की प्रतिमा लाते हैं, वो अपने घर के पास स्थिति तालाब में गणेश विसर्जन कर दें।

इन्हीं निर्देशों के बाद कॉन्ग्रेस नेता व पूर्व मंत्री आसिफ नसीम खान ने मुख्यमंत्री से अपील की है, “जैसे सरकार ने गणेशोत्सव मनाने की छूट दी है। वैसे ही हम अपील करते हैं कि उपयुक्त रोक के साथ मुस्लिम समुदाय को ईद उल अदहा मनाने की अनुमति दी जाए।” उन्होंने कहा है कि इस गुहार पर सीएम प्राथमिकता के साथ निर्णय लें ताकि मुस्लिम समुदाय अपना त्योहार मना पाए।

गौरतलब है कि इन दो त्यौहारों के मद्देनजर अब महाराष्ट्र की उद्धव सरकार की मंशा पर सवाल उठने लगे हैं। लोगों का ऐसे अलग-अलग रवैये पर पूछना है कि अगर कुर्बानी के लिए इजाजत मिल सकती है, तो फिर गणेशोत्सव बड़े स्तर पर मनाने की क्यों नहीं?