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घाटी में रह रहे हिंदुओं को ट्रेनिंग के साथ हथियार देने की जरूरत: जम्मू कश्मीर के पूर्व DGP का बड़ा बयान

दक्षिण कश्मीर के जिला अनंतनाग में कश्मीरी पंडित सरपंच अजय पंडिता (भारती) की हत्या के बाद पूर्व डीजीपी (पुलिस महानिदेशक) डॉ शीश पाल वैद ने कश्मीर घाटी में अल्पसंख्यक हो चुके हिंदुओं को हथियार मुहैया कराने के साथ ही ट्रेनिंग देने का समर्थन किया है। ताकि आतंकी हमलों से वो खुद की रक्षा कर सकें।

उन्होंने इसकी आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जम्मू संभाग के चिनाब घाटी में हिंदुओं को पहले हथियार दिए गए थे। नब्बे के दशक में इससे हिंदुओं के पलायन को रोकने में बहुत सहायता हुई थी। उन्होंने यह भी कहा कि विलेज डिफेंस कमेटी फॉर्मूला को योजना बनाकर लागू किया जाए तो किसी तरह का कोई नुकसान नहीं है।

यही नहीं उन्होंने इंडिया टुडे से बात करते हुए आतंकियों का सामना करने के लिए मुस्लिम समुदाय के कमजोर वर्ग को भी हथियार देने की पैरवी की है। पुलिस महानिदेशक ने कहा कि घाटी में हिंदू अल्पसंख्यक हैं और आतंकियों के निशाने पर रहता है। इसीलिए आतंकी हमलों से बचाव के लिए उन्हें भी ट्रेनिंग दी जानी चाहिए।

वैद ने कहा कि कश्मीरी घाटी में अल्पसंख्यक हिंदुओं व आतंकियों के निशाने पर रहने वाले मुस्लिम समाज के सदस्यों को हथियार उपलब्ध करवाने का कोई भी नुकसान नहीं है।

आगे उन्होंने कहा कि ग्रामीण स्तर पर ग्रामीण सुरक्षा समितियों का भी घाटी में गठन किया जाना चाहिए। हालाँकि, इसे उन्होंने जल्दबाजी में न उठाकर पूरी योजना के साथ काम करने को कहा। उन्होंने कहा कि कश्मीर घाटी में ग्रामीण सुरक्षा समितियाँ बनाना बेशक मुश्किल काम है परंतु असंभव भी नहीं है। उन्होंने वर्ष 1995 में खुद के एसएसपी ऊधमपुर के पद पर रहते हुए जिले के बाघनकोट क्षेत्र में पहली ग्रामीण सुरक्षा समिति बनाने का भी जिक्र किया। अब ये गाँव रियासी जिले में आता है।

पूर्व पुलिस महानिदेशक ने कहा कि गाँव में सुरक्षा समिति बनाना आसान नहीं था लेकिन योजनाबद्ध तरीके से कोई भी चीज की जा सकती है। उन्होंने बताया, “कश्मीर घाटी से कश्मीरी पंडितों के सामूहिक पलायन के बाद, आतंकवादियों ने जम्मू संभाग के चिनाब घाटी क्षेत्र में अल्पसंख्यक हिंदुओं को निशाना बनाना शुरू कर दिया। चिनाब घाटी में आतंकवादियों द्वारा अल्पसंख्यक हिंदुओं का नरसंहार किया गया। लेकिन जल्द ही ग्रामीण सुरक्षा समितियों का गठन किया गया और लोगों को हथियारों की ट्रेनिंग दी गई। कई इलाकों में तो मुस्लिम भी इन समितियों के सदस्य हैं, क्योंकि उन्हें भी आतंकी हमलों का सामना करना पड़ा। सरकार का यह प्रयास रंग लाया और इससे नब्बे के दशक में हिंदुओं के पलायन को रोकने में मदद मिली थी।”

कश्मीरी हिंदू सरपंच अजय पंडिता की निर्मम हत्या के बाद विस्थापित कश्मीरी पंडितों ने माँग की है कि सरकार को घाटी में हिंदुओं को हथियार देना चाहिए क्योंकि वे आतंकवादियों के सॉफ्ट टारगेट हैं। अजय अनंतनाग जिले के लरकीपोरा इलाके में आने वाला लुकबावन पंचायत हल्का के सरपंच थे। 40 वर्षीय पंचायत सदस्य की हत्या पर इलाके में रोष व्याप्त है। 8 जून को अजय की हत्या की गई। पंडिता की हत्या के बाद कश्मीरी पंडितों के समूह ने घाटी में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की माँग उठाई है। 

मलाला यूसुफजई की वेबसाइट पर भारत का गलत नक्शा: जम्मू कश्मीर और अरुणाचल को दिखाया विवादित इलाका

मूल रूप से पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई फ़िलहाल ब्रिटेन और कनाडा में रहती हैं। कनाडा ने उन्हें मानद नागरिकता भी दी हुई है। मलाला अक्सर विभिन्न मुद्दों पर अपना भारत विरोधी रवैया प्रदर्शित करती रहती हैं। अब उनकी वेबसाइट पर भारत का नक्शा ग़लत दिखाए जाने का मामला उठाया जाना चाहिए। जम्मू कश्मीर को मलाला भारत का अंग नहीं मानती, साथ ही अरुणाचल प्रदेश को भी विवादित मानती है।

अगर आप मलाला यूसुफजई की वेबसाइट पर जाएँगे तो पाएँगे कि इसके भारत वाले हिस्से में देश का जो नक्शा बना हुआ है, वो कहीं से भी भारत सरकार द्वारा मान्य नक़्शे के अनुरूप नहीं है। और न ही ये संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रदर्शित किए जाने वाले नक़्शे पर आधारित है। मलाला की वेबसाइट पर लद्दाख को छोड़ कर लगभग पूरे जम्मू कश्मीर को ही बाकी भारत से अलग रंग में दिखाया गया है और उसे विवादित माना गया है।

जम्मू कश्मीर के कुछ हिस्सों पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा है। इनमें से कुछ हिस्सा उसने चीन को दे रखा है। वहीं लद्दाख का हिस्सा अक्साई चीन है, जिस पर चीन ने अवैध रूप से कब्जा कर रखा है। मलाला की वेबसाइट पर इन इलाक़ों को तो भारत का न बता कर विवादित बताया ही गया है, साथ ही जम्मू कश्मीर के जिस हिस्से पर अवैध कब्ज़ा नहीं है और भारत द्वारा प्रशासित है, उसे भी विवादित की कैटेगरी में डाला गया है।

साथ ही अरुणाचल प्रदेश को भी बिना कारण विवादित दिखा दिया गया है। चीन ने 1951 में तिब्बत पर अवैध कब्जा किया था। सरदार पटेल द्वारा आगाह किए जाने के बावजूद जवाहर लाल नेहरू ने तिब्बत समस्या पर ध्यान नहीं दिया था। तभी से चीन अरुणाचल प्रदेश को तिब्बत का हिस्सा मानता आ रहा है। कुछ ऐसा ही कर के मलाला ने भी एक तरह से चीन के अजेंडे को आगे बढ़ाया है। भारत-चीन तनाव के बीच इस नक़्शे को लेकर सवाल उठना निश्चित है।

मलाला यूसुफजई की वेबसाइट पर भारत का ग़लत नक्शा

अपनी वेबसाइट पर जम्मू कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश को शेष भारत से भिन्न दिखाने वाली मलाला यूसुफजई जम्मू कश्मीर मुद्दे पर भारतीय सेना को भी भला-बुरा कह चुकी हैं। इससे पहले मलाला युसुफ़ज़ई ने किसी काल्पनिक कश्मीरी लड़की से संवाद कर उसके हवाले से कह दिया था कि जम्मू-कश्मीर में सेना की पदचाप सुनाई देने से डर का माहौल है, यह चर्चा का विषय है। उन्होंने कहा था कि भारतीय सेना की वजह से बच्चे पढ़ाई नहीं कर पा रहे।

सितम्बर 2019 में मलाला मलाला यूसुफजई ने एक के बाद एक 7 ट्वीट्स कर के लिखा था कि उन्होंने पिछले कुछ दिनों में ऐसे लोगों से बात की हैं, जो कश्मीर में रह रहे हैं या फिर वहाँ कार्यरत हैं। इनमें छात्र, पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता, वकील शामिल हैं। मलाला ने लिखा कि वह कश्मीर की लड़कियों से सीधे बातचीत करना चाहती थीं। उन्होंने ‘कम्युनिकेशन ब्लैकआउट’ का हवाला देकर लिखा था कि लोगों से बात करने में काफ़ी परेशानी का सामना करना पड़ा। मलाला ने आरोप लगाया कि कश्मीर को दुनिया से अलग-थलग कर दिया गया है और उनकी आवाज़ बाहर नहीं जाने दी जा रही।

आज दुग्गल साहब कोरोना विशेषज्ञ बने हैं: योगेन्द्र यादव के अनुसार देश में 15 करोड़ संक्रमित हो चुके होंगे

सीएए और एनआरसी पर सरकार को लगातार कोसने वाले योगेंद्र यादव अब कोरोना विशेषज्ञ बन गए हैं। उन्हें सरकारी डेटा में तो खामियाँ नज़र आ ही रही हैं, साथ ही वो उलटे-सीधे गुणा-भाग कर के कोरोना वायरस संक्रमण के आँकड़ों को लेकर भी लोगों को डरा रहे हैं। उन्होंने ‘इंडियन कॉउन्सिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR)’ के डेटा को लेकर अजीबोगरीब दावे किए। ट्वीट थ्रेड से लेकर अख़बारों में लेख तक, उन्होंने हर जगह अफवाह फैलाई।

आईसीएमआर के सर्वे को लेकर योगेंद्र यादव ने दावा किया कि इसमें 0.73% जनसंख्या के कोरोना पॉजिटिव होने की बात कही गई है। साथ ही उन्होने अनुमान लगाया कि अगर सर्वे में 133 करोड़ जनसंख्या को दायरे में लिया गया है तो भारत की कुल 15 करोड़ लोग कोरोना की चपेट में हैं। ‘दैनिक भास्कर’ में लेख लिख कर भी उन्होंने अपनी इस बात को दोहराई। आइए बताते हैं कि यादव 15 करोड़ के आँकड़े तक कैसे पहुँचे।

उन्होंने 133 करोड़ में से 0.73% कोरोना पॉजिटिव लोगों की संख्या का अंदाज़ा लगाने के लिए इसे गुना कर के 97 लाख का आँकड़ा निकाला। इसके बाद उन्होंने हॉटस्पॉट सिटीज में 15-30% लोगों के कोरोना पॉजिटिव होने की बात एक ख़बर के हवाले से कही। इसके बाद उन्होंने 5 करोड़ की जनसंख्या में से 75 लाख के कोरोना पॉजिटिव होने की बात कही। इस तरह से उन्होंने अनुमान लगाया कि 30 अप्रैल तक 1.72 करोड़ लोग संक्रमित थे।

इसके बाद बड़ी चालाकी करते हुए उन्होंने 30 अप्रैल और अभी के डेटा की तुलना कर के पाया कि अब तक संक्रमितों की संख्या 8.55 गुना बढ़ चुकी है। उन्होंने अपने आँकड़े को भी 8.55 गुना कर दिया, जिससे वो 15 करोड़ के आँकड़े तक पहुँचे। ये एक हास्यास्पद गणित का खेल था क्योंकि ख़ुद आईसीएमआर के सर्वे का सैंपल साइज काफ़ी छोटा था, जिससे सवा अरब से ज्यादा की जनसंख्या के बारे में अनुमान लगाया ही नहीं जा सकता।

सबसे पहली बात तो ये कि ये सैम्पल रैंडम लोगों के बीच से इकठ्ठा नहीं किया गया। जिन्हें कोरोना होने की सम्भावना थी या लक्षण थे या फिर जो कोरोना पॉजिटिव के संपर्क में आए थे, उनका सैम्पल लिया गया था। इसमें पूरी तरह से स्वस्थ जनसंख्या को घुसेड़ कर योगेंद्र यादव ने पूरे गणित को इधर से उधर कर दिया। मान लीजिए कि अगर इलाक़े में 10 कुएँ हैं और सबकी गहराई का औसत योगेंद्र यादव की ऊँचाई से कम है तो क्या वो उस कुएँ में कूद जाएँगे जिसकी गहराई उनसे काफ़ी ज्यादा है। तब वो औसत देखेंगे या फिर उस ख़ास कुएँ की गहराई?

यही खेल उन्होंने जनता के सामने भी किया है। उन्होंने यहाँ चुनावी गणित लगा दिया। उन्होंने पोटेंशियल कोरोना संक्रमितों के आँकड़े को स्वस्थ लोगों के आँकड़े में घालमेल कर दिया। यहाँ एक बार गौर करने लायक है कि योगेंद्र यादव के आँकड़ों के हिसाब से अब तक लाखों लोगों की मौत हो जानी चाहिए थी, जो नहीं हुई है। उन्होंने डेथ रेट में यह गणित नहीं लगाया क्योंकि इससे उनकी पोल खुलने का डर था।

मोदी सरकार को घेरने के लिए फर्जी डेटा का खेल खेलने वाले योगेंद्र यादव महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से सवाल नहीं पूछ रहे जबकि अकेले मुंबई में कोरोना के मरीजों की संख्या 1 लाख के पार चली गई है। पश्चिम बंगाल में स्थिति सबसे ज्यादा गड़बड़ है और वहाँ गई केंद्र सरकार की टीम ने ही आँकड़ों में हेराफेरी की बात कही थी। दिल्ली में स्थिति दिन पर दिन बदतर होती जा रही है। योगेंद्र यादव इन तीनों ही राज्यों से सवाल क्यों नहीं पूछ रहे? देखिए, मृत्यु दर को लेकर उन्होंने कैसे ‘दैनिक भास्कर’ में लिखे लेख में सरकार को क्रेडिट देने से इनकार कर दिया। लेख का अंश:

हमारे देश में कोरोना इतना जानलेवा नहीं है जितना दुनिया के बाकी देशों में। अब सरकारी और दरबारी विशेषज्ञ इसी आँकड़ें की आड़ ले रहे हैं। सच यह है कि इसमें सरकार का कोई कमाल नहीं है। या तो हमारे यहाँ आई कोरोना की प्रजाति कम घातक है, या हमारी गर्मी, बीसीजी के टीके या लक्कड़-पत्थर हज़म प्रतिरोध शक्ति के चलते बचाव हो रहा है।

यहाँ उन्होंने बड़ी चालाकी से दिल्ली, चेन्नई और अहमदाबाद का नाम तो लिया लेकिन कोलकाता और मुंबई का नाम नहीं लिया। योगेंद्र यादव अपने काल्पनिक संक्रमितों के आँकड़े को लेकर तो सरकार को दोष देना ही चाहते हैं लेकिन मृत्य दर कम होने को लेकर कहते हैं कि ये सरकार का कमाल थोड़े है। इस दोहरे रवैये को उनके गड़बड़ गणित से भी ऊपर रखा जा सकता है। यानी भारत में कोरोना के कारण ज्यादा जाने नहीं गई हैं तो ये उनके हिसाब से ‘कोरोना की महानता’ है।

अगर आपको अभी भी लग रहा योगेंद्र यादव का गणित सही है तो आपको जानना ज़रूरी है कि गुमराह कैसे किया जाता है। भारत में अब तक संक्रमित हुए लोगों की संख्या 3.09 लाख है। मृतकों की संख्या 8895 है। यानी, कुल संक्रमितों में से 2.89% की मौत हुई है। अगर योगेंद्र यादव के आँकड़ों की बात करें तो कुल 44 लाख मौत का आँकड़ा बैठता है इसी प्रतिशत के हिसाब से। क्या ये संभव है। सोचिए।

मैनपुरी में सोशल डिस्टेंसिंग को ठेंगा दिखा जुटे नमाजी, अलीगढ़ में नमाज पढ़ने को लेकर मारपीट, 16 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के मैनपुरी और अलीगढ़ की एक मस्जिद में नियमों का उल्लंघन करते हुए कुछ लोग शुक्रवार (12 जून 2020) को नमाज अदा करने के लिए इकट्ठा हुए। दोनों मामले में यूपी पुलिस ने कार्रवाई करते हुए मौके से 16 लोगों को गिरफ्तार किया है।

जानकारी के मुताबिक मैनपुरी के नगला कंवर स्थित एक मस्जिद में जुटे नमाजियों ने न तो मास्क लगा रखा था और न ही किसी कपड़े से मुॅंह ढक रखा था। वे सोशल डिस्टेंस के नियमों का भी पालन नहीं कर रहे थे।

इसकी जानकारी मिलते ही पुलिस ने मौके से 12 लोगों को गिरफ्तार कर लिया। चौकी इंचार्ज सिविल लाइन अमित सिंह ने सभी के खिलाफ लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन करने और ग्राम नगला मुले में कोरोना प्रभाव के चलते लागू नियमों को तोड़ने के आरोप में मुकदमा दर्ज किया है।

पुलिस के मुताबिक गिरफ्तार किए गए नमाजियों की पहचान इस्माइल इमरान, जहीर अहमद, मोहम्मद इस्माइल अंसारी, राशिद, मोहम्मद ओसामा अंसारी, नौशाद, मोहम्मद सादिक, बिलाल, एहतशाम, शमशुद्दीन, मोहम्मद हाफिज के रूप में की गई है।

वहीं अलीगढ़ जिले के अधौन गाँव स्थित मस्जिद में भी कुछ लोग नियमों का उल्लंघन करते हुए नमाज पढ़ने के लिए इकट्ठा हो गए। इस दौरान कुछ लोगों ने इसका विरोध किया तो नमाजियों ने उनके ऊपर पथराव कर दिया।

अमर उजाला की खबर के मुताबिक जमशेर पुत्र कासिम अली ने बताया कि उसके घर के पास एक पुरानी मस्जिद है, जिसमें गाँव के लोग पाबंदी के बाद भी जबरन नमाज पढ़ने के लिए आते हैं। कई बार इन लोगों से कहा गया कि अपने घरों में नमाज अदा करें पर यह लोग नहीं माने।

जमशेर के मुताबिक शुक्रवार को भी यह लोग एकजुट होकर मस्जिद में जुमे की नमाज पढ़ने आए थे। मना करने पहले तो उसके साथ मारपीट की और फिर गली में पथराव करना शुरू कर दिया। सूचना पर पनैठी पुलिस मौके पर पहुँची और मारपीट करने के आरोप में चार लोगों को हिरासत में लेकर उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है।

पनैठी पुलिस चौकी के चौकी इंचार्ज सुमित गोस्वामी ने बताया कि जमशेर और गुलजार के परिवारों के बीच दुकान से सामान लेने के रुपयों को लेकर मारपीट हुई है। पुलिस ने मारपीट करने वाले दोनों पक्ष के चार लोग गुलजार, जमशेर,आरिफ नफासम अली के खिलाफ कार्रवाई की है।

कट्टरपंथियों ने पीटा, घर पर पत्थर फेंके; हिंदू परिवार ने लगाया ‘मकान बिकाऊ है’ का बोर्ड: अमेठी SP ने दिए कार्रवाई के आदेश

उत्तर प्रदेश के अमेठी से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहाँ पर समुदाय विशेष के लोगों से जान का खतरा होने की वजह से एक हिन्दू परिवार पलायन को मजबूर है। पीड़ित परिवार ने अपने घर के बाहर ‘यह मकान बिकाऊ है’ का बोर्ड लगा दिया है। साथ ही उसने फेसबुक पर एक पोस्ट के जरिए मकान बेच कर कहीं और जाने की बात कही है।

जानकारी के मुताबिक अनिल द्विवेदी के बड़े बेटे उत्कर्ष द्विवेदी के साथ कट्टरपंथियों ने मारपीट की और फिर घर पर पत्थरबाजी की। इसके बाद घर में घुस कर भी मारपीट की।

दरअसल 27 मई 2020 की शाम उत्कर्ष द्विवेदी ने अमजद को बाग में बकरियों को आम की नीची डाली से पत्तियाँ खिलाने से रोका तो गाली-गलौज करते हुए घर से और लोगों को बुला लिया। इसके बाद शाहरुख, अमजद, अफजल, कटाले, शब्बीर आदि ने उत्कर्ष को मारपीट कर लहूलुहान कर दिया। जब बीच-बचाव करने के लिए उत्कर्ष की बहन शीतांशु आई तो उसे भी मारा पीटा गया। साथ ही पूरे घर को जान से मारने की धमकी देते हुए भद्दी-भद्दी गालियाँ दी।

उत्कर्ष के छोटे भाई उत्सव द्विवेदी ने फेसबुक के माध्यम से जानकारी दी कि शाम के विवाद के बाद अनिल द्विवेदी को अमेठी कोतवाली में बैठा लिया गया था। घर पर सिर्फ वो और उसकी बहन थी। घर के बाकी लोग भी थाने में ही थे। उत्सव ने बताया कि रात के लगभग 8 बजे अली हुसैन, माने, ननकऊ, रज्जाक, अफजल, शाहरुख, हाजिरन पत्नी जाकिर हुसैन आदि को लाठी- डंडों के साथ घर की तरफ आते देख बहन ने गेट बंद करके ताला लगा लिया। दबंगों ने घर पर पत्थर बरसाते हुए भद्दी-भद्दी गालियाँ दीं और पूरे घर वालों को जान से मारने की धमकी दी।

उत्सव द्विवेदी का फेसबुक पोस्ट

मामले का संज्ञान लेते हुए CO Amethi पीयूष कांत राय, कोतवाल श्याम सुंदर ने घर पहुँचकर उनकी समस्यायों को ध्यानपूर्वक सुना और त्वरित कर्रवाई का आश्वासन दिया है। उत्सव ने इसकी जानकारी फेसबुक के जरिए दी है। इसके लिए उत्सव ने अमेठी पुलिस अधीक्षक ख्याति गर्ग का शुक्रिया अदा किया है।

अमेठी पुलिस का ट्वीट

एसपी ख्याति गर्ग ने कहा है कि घटना पुरानी है। पुलिस ने कार्रवाई भी की है। सीओ को मौके पर जाकर पूरे मामले की फिर से गहनता से जाँच करने का आदेश दिया गया है। जाँच में जो भी दोषी मिलेंगे। उनके विरुद्ध कार्रवाई होगी।

गौरतलब है कि इससे पहले यूपी के मेरठ और अलीगढ़ आदि जगहों से भी इस तरह की खबरें सामने आ चुकी है। अलीगढ़ में सीएए के विरोध में हुए हिंसा के बाद सदर क्षेत्र के बाबरी मंडी में कुछ लोगों ने अपने घर के बाहर ‘मकान बिकाऊ है’ के पोस्टर लगा दिए। हालॉंकि प्रशासन की ओर से सुरक्षा का भरोसा दिलाए जाने के बाद पोस्टर हटा लिए गए। दंगाइयों ने लोगों के घरों में भी घुसने की कोशिश की थी। बाबरी मंडी चौकी में पुलिसकर्मियों को भी घेर लिया था। इसके बाद यहॉं रहने वाली सावित्री, सुधा, द्वारिका प्रसाद, नेहा गुप्ता समेत कई लोगों ने अपने घरों के बाहर मकान बिकाऊ के पोस्टर लगा दिए।

इसी तरह की खबर बीते साल मेरठ के प्रह्लाद नगर से भी आई थी। दहशत की वजह से बहुसंख्यक समुदाय के लोगों ने अपने घर और दुकान के बाहर बिकाऊ होने का बोर्ड लगा दिया था।

‘जस्टिस’ रवीश कुमार नींद से नहीं जागना चाहते क्योंकि उन्हें वही ‘दंगा साहित्य’ पसंद है जो वास्तविकता से अलग है

लप्रेक के रचनाकार रवीश कुमार का कहना है कि दिल्ली दंगों की चार्जशीट को साहित्य की नजर से देखना चाहिए। उनका कहना है कि ये चार्जशीट पढ़ने में अच्छी लगती हैं और इसी तरह बनाई भी गई हैं। जबकि लोग आज तक ‘जस्टिस’ रवीश कुमार को ही साहित्य की नजर से देख पाने में नाकाम रहे हैं।

रवीश ने ये भी कहा है कि आलोक धन्वा की लड़कियों के लिए लिखी गई कविता ‘भागी हुई लड़कियाँ’ को लड़कों को नहीं पढ़ना चाहिए क्योंकि उन्हें लड़कों से कोई उम्मीद नहीं है। लेकिन ‘फैज-परस्त’ यह वामपंथी प्रोपेगेंडाकार यह नहीं बताता है कि आलोक धन्वा ने अपनी कविता में ‘लड़कियों’ का जिक्र किया था, जिनका जिहादी मानसिकता से कोई लेना देना नहीं होता।

आलोक धन्वा की कविता की लड़कियाँ वो लड़कियाँ होती हैं, जो ‘फक हिंदुत्व’ के नारे नहीं लगातीं, या फिर जिन्हें शाहीन बाग़ में मोदी और अमित शाह को भद्दी गाली देने के लिए ‘लड़की’ नहीं होना पड़ता है, जिन्हें सस्ती लोकप्रियता, टीवी डिबेट का हिस्सा बनने और एक ‘विचारक’ वर्ग की वाहवाही के लिए या फिर उनके मानकों पर खरा उतरने के लिए हिन्दुओं की आस्था को गाली नहीं देनी होती हैं। आलोक धन्वा की कविता की लड़कियाँ वो लड़कियाँ होती हैं, जो दुर्भाग्य से रवीश कुमार जैसे एजेंडाबाजों द्वारा अपने कुतर्क को सही साबित करने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं।

NDTV न्यायालय के न्यायमूर्ति रवीश कुमार के कल शाम प्राइम टाइम का प्रमुख किरदार अमूल्या थी। वही अमूल्या, जो फरवरी माह में ओवैसी के मंच से पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हुए देखी गई थी। धीरे-धीरे लप्रेकी रवीश कुमार की कहानी में वही चिरपरिचित किरदारों के नाम सामने आने लगे। ये नाम थे – ‘गर्भवती’ सफूरा जरगर, उमर ख़ालिद, पिंजड़ा तोड़ गिरोह, लदीदा फरजाना।

यह देखना भी दिलचस्प है कि जो वामपंथ समाज के ताने-बाने को ठुकराता है, उसका उपहास करता है, जो भाई-बहन, माँ-बाप के रिश्ते से सबसे ऊपर सिर्फ ‘साथी कसम’ को रखता है, वह कुछ दिनों से एक लड़की को ‘लड़की’ होने से ज्यादा उसके गर्भ को महत्त्व दे रहा है, मानो सफूरा जरगर कभी विषय थी ही नहीं और विषय उसका गर्भ रहा हो।

जिन अपराधियों को निर्दोष बताने के लिए रवीश कुमार इस्लामिक कट्टरपंथी लदीदा फरजाना जैसों का सहारा लेना पड़ रहा हो, वो खुद उस संक्रामक विचारधारा से किस स्तर तक प्रभावित होंगे यह अंदाजा लगाया जा सकता है।

लेकिन ‘न्यायमूर्ति’ रवीश कुमार के इस दंगा साहित्य से क्रूरता से काट दिए जाने के बाद जलती आग में झोंक दिए गए 20 साल के दिलबर नेगी का जिक्र गायब था, ना ही 51 बार चाकुओं से गोदने के बाद नाले में फेंक दीए गए IB अधिकारी अंकित शर्मा का इसमें जिक्र किया गया। रवीश कुमार के करीब 45 मिनट तक चले इस दंगा साहित्य में पेट्रोल बम गायब थे, आसमानी गुलेलों का जिक्र नहीं था, पत्थरबाजी नहीं थी और ना ही इसमें काफ़िरों को सबक सिखाने वाले नारों का जिक्र था।

रवीश कुमार के सोशल मीडिया एकाउंट्स पर नजर आ रही हरकतों से देखा जा सकता है कि उनके निशाने पर अब पूरी तरह से देश के युवा हैं। यानी, ‘कूल अंग्रेजी’ संगीत पसन्द करने वाले युवा, कॉलेज, लाइब्रेरी बैठने वाले युवा। ये 18-25 वर्ष की उम्र का वो वर्ग होता है जो रियलिटी शो में बैकग्राउंड में बजने वाली गम्भीर धुन पर भावुक हो जाता है और जिंदगी में पहली बार जीवन और मृत्यु, अमीर बनाम गरीबी जैसे दार्शनिक मुद्दों पर लगभग एक-आध दिन चिन्तन करता है। वही युवा जो गिटार के साथ जब तक कुछ शब्द ना बोले जाएँ, उन्हें कविता नहीं मानता।

रवीश कुमार वामपंथ के नशे को अच्छी तरह जानते हैं। वही वामपंथ जो दंगों को ‘क्राफ्ट’ बताता है। इसलिए अब वो प्राइम टाइम में भी भावुक धुनों पर कविता करने लगे हैं। वो समय दूर नहीं जब वे युवाओं को प्रभावित करने के लिए प्राइम टाइम में लूडो खेलते हुए भी देखे जाएँगे।

कल के प्राइम टाइम में आलोक धन्वा की कविता ‘भागी हुई लडकियाँ’ के जरिए ‘न्यायमूर्ति’ रवीश कुमार ने दिल्ली दंगों में सभी आरोपितों को निर्दोष घोषित कर दिया है। उनका कहना है कि पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे चिंता का विषय नहीं होने चाहिए इसलिए अमूल्या निर्दोष है।

शो के आगे बढ़ने पर इसमें नए किरदार दिखते हैं, जिसे सफूरा जरगर के साथ गर्भवती भी बताया जाता है। रवीश कुमार ये बताना भूल गए कि दिल्ली में हुए जिन हिन्दू विरोधी दंगों की साजिश में सफूरा जरगर दोषी पाई गई हैं, उन दंगों में कई ऐसे मासूम प्रभावित हुए हैं। निर्दोषों को इस्लामिक नारों के साथ मार-काट दिया गया। वामपंथी विचारधारा के अकेले ध्वजवाहक रवीश कुमार ने इसके पीछे तर्क दिया है कि ये लोग ‘बस ट्रम्प के जरिए दुनिया का ध्यान ही तो आकर्षित करना चाहते थे।

दंगाप्रिय वामपंथी इस ‘अटेंशन’ के लिए पूरी दिल्ली को जला सकते हैं। लोगों को घसीटकर उन्हें बर्बरता से मार सकते हैं। छतों से ‘काफ़िरों’ पर पेट्रोल बम बरसा सकते हैं और पत्थरबाजी तो मानो ये अब मौलिक अधिकार समझने लगे हैं।

इस शो में रवीश कहते हैं कि JNU छात्र उमर खालिद ही क्यों बार-बार सामने आ जाते हैं। और जब उन पर गोली चलाई गई थी, तब किसीने उस घटना पर ध्यान क्यों नहीं दिया था? यहाँ पर यह बताना भी जरूरी है कि जिस एकमात्र प्राणी को उस समय उमर खालिद पर गोली लगने का गवाह बताया गया था, वह खालिद सैफ़ी भी कुछ ही दिनों पहले दिल्ली दंगों में आरोपित पाया गया है और ताहिर हुसैन और रवीश कुमार के प्रिय छात्र उमर खालिद के बीच दंगों की मीटिंग करवाने का मुख्य आरोपित है।

कविताओं के जरिए भारत के सांस्कृतिक गौरव का उपहास करने से यदि आत्ममुग्ध रवीश कुमार को फुर्सत मिले, तो उन्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि वो अब बचपन में सुनाया गया कोई वो घिसापिटा चुटकुला बन कर रह गए हैं, जिसे सुनाने में भी इंसान को लज्जा महसूस करनी चाहिए, बावजूद इसके रवीश उसे उसी शान से रोजाना घिसते रहते हैं।

उन्होंने अपने प्राइम टाइम में बेहद चालाकी से बताया कि दंगों की क्रोनोलॉजी जामिया में पुलिस द्वारा छात्रों को पीटने से हुई थी लेकिन इन मासूम छात्रों की पत्थरबाजी के हुनर पर दो शब्द भी नहीं रखे। उन्होंने यह नहीं बताया कि उन मासूम छात्रों के अंदर लाइब्रेरी में बैठकर पत्थरों को बटुआ बना देने का चमत्कारी गुण भी मौजूद है, जिन्हें रवीश कुमार अब अपनी TRP का आखिरी विकल्प बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

सत्ता विरोध करना, संस्थाओं को झूठा साबित करना, गुनहगारों को दंगा साहित्य की शरण देना ही रवीश के पास अब प्रासंगिक रहने का आखिरी हथियार बाकी रह गया है। या फिर यह भी सम्भव है कि रवीश आज भी नेहरू-इंदिरा के अहंकार के उस दौर से आतंकित हैं, जब मनचाहे तरीकों से सत्ता, समाज और संस्थाओं को अपने नियंत्रण में रखा करती थी। लप्रेकी रवीश इस नींद से जागना नहीं चाहते क्योंकि उन्हें ‘दंगा साहित्य’ पसंद है।

वामपंथी उदारवादियों के प्रपंचकारियों के इस शगल की भेंट हमेशा से कितने ही बेकसूर अपनी जान गंवा देते हैं। कितने ही युवा इन दंगों में अपना भविष्य तलाशना शुरू कर देते हैं। फिर एक समय आता है, जब ये लोग वास्तव में यकीन करना शुरू कर देते हैं कि सत्ता और समाज तो वाकई में उनका दुश्मन है और वो इसे तबाह करने के हर षड्यंत्र का हिस्सा बनना चाहते हैं।

एर्टुग्रुल: एक सिरफिरा लुटेरा, हत्यारा और बलात्कारी कैसे बन गया दक्षिण एशिया के मुस्लिमों का नायक?

पिछले दिनों तुर्की के एक टेलीविजन धारावाहिक एर्टुग्रुल (Ertugrul) पर सऊदी अरब और मिस्त्र ने अपने देशों में प्रसारण पर रोक लगा दी थी। इस सन्दर्भ में मिस्त्र की सबसे प्रमुख फतवा काउंसिल ने बयान देते हुए कहा कि तुर्की इस धारावाहिक के माध्यम से मध्य पूर्व में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। काउंसिल ने तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब इरदुगान पर आरोप लगाते हुए कहा कि वे ‘उस्मानी साम्राज्य’ (ऑटोमन एम्पायर) को फिर से स्थापित करना चाहते है। यह अरब देशों की संप्रभुता को ख़त्म कर उन्हें उस्मानी साम्राज्य के अधीन करने की रणनीति है।

तुर्की और अरब देशों का यह टकराव कोई नया नहीं है, बल्कि इसका इतिहास शताब्दियों पुराना है। इस तथ्य को समझने के लिए हमें इस्लाम धर्म के संस्थापक पैगम्बर मोहम्मद के कालखंड को टटोलना होगा। जब 632 ईसवी में पैगम्बर का निधन हुआ, तो उनके बाद खिलाफत की शुरुआत हुई।

खिलाफत का मतलब साफ है कि सम्पूर्ण विश्व का इस्लाम ही एकमात्र धर्म रहेगा और केंद्रीय शक्ति के तौर पर एक बादशाह यानी खलीफा होगा। इस सोच के साथ पहला खलीफा अबू बकर बना, जो कि एक अरबी था। इसी के नेतृत्व में इस्लाम का प्रसार अरब से बाहर होना शुरू हुआ। दो साल के अंतर्गत फिलिस्तीन पर अरबों का कब्ज़ा हो गया। सीरिया और मेसोपोटामिया जैसी पुरानी संस्कृतियों पर भी इस्लामिक हमले शुरू हो गए।

अबू बकर के बाद उमर, उस्मान, अली और हसन को खलीफा बनाया गया। चूँकि इसका सम्बन्ध सीधे पैगम्बर मोहम्मद से था, इसलिए इस खिलाफत को राशिदुन कहा गया। इन्होंने अपनी राजधानी मदीना को बनाया। इस खिलाफत के दौर में सीरिया, फिलिस्तीन, मिस्त्र, इराक, ईरान, त्रिपोली, मंगोलिया, बुखारा, ताशकंद, समरकंद, अरमेनिया, जार्जिया और अजरबेजान पर इस्लाम का कब्जा हो चुका था।

राशिदुन खिलाफत में खलीफा हसन के दौरान आपसी तनाव चरम पर पहुँच गया था। जिसका फायदा उठाकर सीरिया के शासक मुआविया ने उम्मैय्यद खिलाफत की स्थापना की। अब इस्लाम का केंद्र मदीना की जगह दमिश्क बन गया। इस दौरान इस्लाम का फैलाव स्पेन से लेकर भारत के सिन्धु प्रदेश तक हो चुका था।

इन बीते वर्षों में उम्मैय्यद खलीफाओं ने अरबों की ताकत को लगभग ख़त्म कर दिया था। अरबों के पास अब जो कुछ बचा था, उसे अब्दुल्ला अब्बास ने 749 ईसवी में समाप्त कर दिया। अब्बास एक अफगानी मूल का था, जिसने विद्रोह कर उम्मैय्यद की जगह अब्बासिद खिलाफत की शुरुआत की।

प्रसिद्ध इतिहासकार एचजी वेल्स अपनी पुस्तक ‘ए शोर्ट हिस्ट्री ऑफ़ द वर्ल्ड’ में इस परिवर्तन का वर्णन करते हैं, “उम्मैय्या खिलाफत के सभी पुरुषों का नरसंहार कर उनके शवों को एक जगह इकट्ठा किया, फिर उस पर एक चमड़े की चादर बिछाकर अब्बास ने अपने समर्थकों के साथ खाना खाया। वस्तुतः यह शिया और सुन्नी संघर्ष था, क्योंकि उम्मैय्य्द सुन्नी थे और अब्बासिद शिया थे। खिलाफत के इस तीसरे स्वरुप- अब्बासिद की राजधानी दमिश्क के स्थान पर बग़दाद बन गई।

इस खिलाफत के दौरान दसवी-ग्यारहवीं शताब्दी में तुर्कों ने इस्लाम धर्म अपना लिया था। वे सामान्यतः घुमंतू लोग थे, जो कि दूसरी-तीसरी शताब्दी से अल्ताई पर्वत श्रृंखला, येनिसेय नदी के दक्षिण और बैकाल झील के इलाकों में घुमा करते थे। एक लम्बे अंतराल के दौरान इन तुर्कों ने एकजुट होकर अपनी राजनैतिक ताकत को मजबूत कर लिया था। इस क्रम में, दसवीं सदी के आसपास से इनके और अब्बासिद खलीफाओं के बीच मध्य एशिया में लगातार कई अभियान हुए। इन लगातार युद्धों से अब्बासिद कमजोर होते चले गए और धीरे-धीरे इस्लाम की केंद्रीय ताकत तुर्कों के पास चली गई।

इन तुर्कों में ओग़ुज़ एक प्रभावशाली जाति थी और इसमें काई कबीला सबसे प्रमुख था। एर्टुग्रुल इसी काबिले के मुखिया सुलेमान शाह का बेटा था। सुलेमान का राज्य उत्तर-पूर्वी ईरान में था। दूसरी तरफ मध्य एशिया में मंगोलों का प्रभुत्व तेजी से फैलता जा रहा था। 13वीं शताब्दी की शुरुआत में मंगोलों ने उत्तर-पूर्वी ईरान पर हमला कर दिया, जिससे सुलेमान को वहाँ से भागना पड़ा। सीरिया के रास्ते में फरात नदी को पार करते समय वह घोड़े से गिर गया और वहीं उसकी हत्या कर दी गई। एलेग्जेंडर डब्लू. हिडन अपनी पुस्तक ‘The Ottoman dynasty’ (1895) में शाह की मौत पर लिखते हैं कि उनके बेटों की मौजूदगी में उन्हें नदी में डुबाया गया था।

सुलेमान के तीन बेटों में एर्टुग्रुल सबसे छोटा था। पिता की हत्या के बाद दो बड़े भाइयों ने मंगोलों की गुलामी स्वीकार कर ली। जबकि एर्टुग्रुल को एक तुर्क-पर्शियन सेज्लुक सल्तनत की सुरक्षा का काम मिल गया। इस सल्तनत पर बाइज़ेंटाइन (पूर्वी रोमन साम्राज्य) की तरफ से लगातार हमले होते रहते थे। एर्टुग्रुल का काम इन हमलों से सल्तनत की रक्षा करना था। इसलिए उसे पश्चिमी आनातोलिया (वर्तमान तुर्की का हिस्सा) के आसपास सल्तनत के अधीन शासन करने का प्रभार दिया गया। अनातोलिया की सीमा मंगोलों से लगती थी।

साल 1277 तक मंगोलों ने पर्शिया, ईराक और पूर्वी आनातोलिया पर कब्ज़ा कर लिया था। इससे तुर्क-पर्शियन सेज्लुक सल्तनत लगभग समाप्त होने की कगार पर पहुँच गई। इस स्थिति का फायदा उठाकर एर्टुग्रुल जैसे छोटे जागीरदारों ने अपने रियासतों को स्वतंत्र घोषित करना शुरू कर दिया। तीन साल बाद यानी 1280 में जब एर्टुग्रुल की मृत्यु हुई तो उसकी जागीर का नेतृत्व उसके बेटे उस्मान को मिला।

एर्टुग्रुल के बारे में कुछ ज्यादा कुछ भी ख़ास नहीं लिखा गया है। इतिहासकारों ने अधिकतर ध्यान उसके बेटे उस्मान और उस्मानी साम्राज्य के विस्तार पर दिया है।

फिर भी एर्टुग्रुल के बारे में एलेग्जेंडर डब्लू. हिडन ने थोड़ा-बहुत जरूर लिखा है। अपनी पुस्तक में वे उससे सम्बंधित एक मिथ्य का जिक्र करते हुए लिखते हैं, “एर्टुग्रुल ने एक अजीब सा सपना देखा, जिसमें वह किसी अनजान जगह पर एक संन्यासी से मिला। जहाँ उसने एक पुस्तक को देखकर पूछा कि यह क्या है? उसे जवाब मिला कि यह कुरान है। एर्टुग्रुल ने उस पुस्तक को पूरी रात बैठकर पढ़ा। लगातार पढ़ने के चलते सुबह उसकी आँख लग गई। तभी उसे एक आवाज़ सुनाई दी- अब तुमने मेरे शब्दों को इतनी इज्जत के साथ पढ़ा है इसलिए तुम्हारे वंशजों को इस दुनिया में लगातार सम्मान मिलेगा।”

इसके विपरीत, वाशिंगटन विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर पीटर एफ शुगर ने ‘हिस्ट्री ऑफ़ ईस्ट सेंट्रल यूरोप’ पुस्तक में एर्टुग्रुल को ‘गाजी’ कहकर संबोधित किया है। इस्लाम में ‘गाजी’ की उपाधि मूर्तिपूजकों, गैर-मुस्लिमों, अल्लाह को न मानाने वाले अथवा काफिरों की हत्या करने वाले को दी जाती है।  

वास्तव में तुर्क आक्रमणकारी थे, जो कि सिर्फ लूटपाट, हत्या और गैर-मुस्लिमों पर अमानुषिक अत्याचार के लिए ही बदनाम रहे। इनका पूरा इतिहास हिन्दुओं, यहूदियों और ईसाइयों के नरसंहारों से भरा हुआ है। इजरायली इतिहासकार बैनी मोरिस ने डोर जीएवी के साथ मिलकर ‘द थर्टी इयर जेनोसाइड– द टर्किज डिस्ट्रक्शन ऑफ़ इट्स क्रिस्चियन माइनॉरिटीज’ पुस्तक लिखी है। अपनी इस पुस्तक में उन्होंने उस्मानी साम्राज्य द्वारा 25 लाख ईसाइयों की हत्या का जिक्र किया है।     

इन्ही तुर्कों में से एक बाबर ने 16वीं शताब्दी की शुरुआती दशकों में भारत पर हमला किया था। राणा सांगा की हार के बाद बाबर ने हिन्दुओं की हत्या कर उनके सिर का एक स्तंभ बनवाया। चंदेरी के दुर्ग पर भी कब्जा करने के बाद उसने हिन्दुओं के सिरों की एक मीनार बनवाई थी। हिन्दुओं के खिलाफ इन अत्याचारों के लिए बाबर को भी एर्टुग्रुल की तरह ‘गाजी’ की उपाधि दी गई थी।

बाबर के वंशजों को मुग़ल कहा गया। इसमें गैर-मुस्लिमों पर अत्याचारों का सबसे क्रूरतम उदाहरण औरंगजेब ने पेश किया था। उसने हजारों हिन्दू मंदिरों का ध्वंस किया और नए मंदिरों के निर्माण पर रोक लगवा दी। उसके आदेश पर बनारस, मथुरा, पाटन, जोधपुर, उदयपुर, अयोध्या और हरिद्वार जैसे अनेक धार्मिक स्थानों पर मंदिरों को तोड़ दिया गया। हिन्दुओं पर अतिरिक्त टैक्स लगाए गए। उन्हें उनके त्यौहार और जन्मोत्सव मनाने पर भी मनाही थी। इसके अतिरिक्त हिन्दुओं का बड़ी संख्या में नरसंहार किया और उन्हें जबरन इस्लाम में धर्मान्तरित करवाया गया।

इस तरह तुर्कों ने विश्व के कई हिस्सों पर कब्जा किया, वहाँ की संपत्तियों को लूटा, लड़कियों का बलात्कार किया, बच्चों और औरतों को गुलाम बनाया और करोड़ों की संख्या में गैर-मुस्लिमों का जबरन धर्म-परिवर्तन अथवा नरसंहार किया। इसके अलावा, इसी बीच तुर्की के बादशाहों ने खुद ही अपने को खलीफा भी घोषित कर दिया और अरबों पर भी अपना अधिपत्य बना लिया था।

तुर्कों के इस अमानवीय सत्ता का अंत प्रथम विश्वयुद्ध के बाद साल 1924 में जाकर हुआ। दरअसल, आपसी गृहयुद्ध और सत्ता के प्रति अहंकार ने कथित तुर्की खलीफा को कमजोर  कर दिया था। अतंतः प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति तक तुर्कों के उस्मानी साम्राज्य को ब्रिटेन और फ्रांस ने मिलकर बिलकुल खत्म कर दिया।

वर्तमान में तुर्की फिर से अपनी इस सत्ता को पाने की कोशिश कर रहा है। इस सन्दर्भ में उसने अत्याचारों के उस्मानी कालखंड को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के लिए एर्टुग्रुल का सहारा लिया। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि उस्मानी साम्राज्य की शुरुआत एर्टुग्रुल के साथ ही होती है। इसके लिए तुर्की में एर्टुग्रुल पर साल 2014 में एक धारावाहिक बनाया गया, जिसे वहाँ के मुस्लिमों ने बेहद पसंद किया।

इस बढ़ती लोकप्रियता को भुनाने के लिए पाकिस्तान के सरकारी टेलीविज़न (PTV) ने भी एर्टुग्रुल को अपने यहाँ प्रसारित करना शुरू कर दिया। पीटीवी ने इस सीरीज को उर्दू में डब किया, जिसके बाद इसने पाकिस्तान के साथ ही भारत के कट्टरपंथियों पर अपना प्रभाव बनाना शुरू कर दिया। अभी इस धारावाहिक को नेटफ्लिक्स पर भी इंग्लिश सबटाइटल के साथ प्रसारित किया जा रहा है।

आज एक सिरफिरा लुटेरा, हत्यारा और बलात्कारी कैसे दक्षिण एशिया- भारत और पाकिस्तान के मुस्लिमों का नायक हो सकता है? वास्तव में, गलती उनकी भी नहीं है। यह पूरा खेल जिहादी-लेफ्ट इतिहासकारों का है, जिन्होंने पिछले 70 सालों में विदेशी हमलावरों को ‘नायक’ के तौर पर पेश किया है। जबकि राजा दाहिर, पृथ्वीराज चौहान, राजा हेमू, राणा सांगा, महाराणा प्रताप जैसे नायकों को इतिहास के पन्नों में समेट दिया गया। 

फैक्ट चेक: क्या भूत भी बना रहे हैं बॉडी? जानिए क्या है इस खुले हुए जिम में बॉडी बनाने वाले भूतों का सच

उत्तर प्रदेश के झाँसी का एक वीडियो वायरल हो रहा है। इस वीडियो के आधार पर दावा किया जा रहा है कि एक पार्क में स्थित झूले में भूत एक्सरसाइज कर रहा है। ये एक खुले जिम की तरह का पार्क है, जहाँ विभिन्न तरह के व्यायाम के लिए यंत्र लगे हुए हैं। ऐसे में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जो रात के अँधेरे का था। इस वीडियो में अँधेरे में झूला अपने-आप हिलते हुए दिखाई दे रहा है।

पूर्व क्रिकेटर आकाश चोपड़ा ने भी इस वीडियो को ट्वीट करते हुए बताया कि ये उन्हें व्हाट्सप्प से प्राप्त हुआ है। उन्होंने पूछा कि कौन व्यायाम कर रहा है यहाँ? सोशल मीडिया पर इसे लेकर तरह-तरह के दावे किए गए। किसी ने कहा कि भूत बॉडी बना रहा है तो किसी ने वहाँ भूतों द्वारा खेलने की बात कही। ये मामला झाँसी पुलिस तक भी पहुँचा, जिसके बाद वो भी ‘भूत’ का पता लगाने के लिए उस पार्क में स्थित झूले के पास पहुँचे।

ये वीडियो झाँसी के सीपरी बाजार स्थित कांशीराम पार्क का है। शुक्रवार (जून 12, 2020) को दिन भर झूले और भूत वाली बात धड़ल्ले से सोशल मीडिया में शेयर होती रही। पार्क में पहुँचे क्षेत्राधिकारी ने पहली ही मीडिया को बताया था कि ग्रीस के कारण ऐसा हो रहा है। बाद में यूपी पुलिस ने सोशल मीडिया के माध्यम से इसे स्पष्ट किया। आसपास के क्षेत्रों में भी इसे लेकर चर्चा का बाजार गर्म था।

झाँसी पुलिस ने अपनी तहकीकात के बाद बताया कि उक्त झूले में ग्रीस काफ़ी अधिक है, जिसके कारण एक बार अगर कोई इसे हिला दे तो ये कुछ सेकण्ड्स तक हिलता ही रहता है। साथ ही पुलिस ने जानकारी दी कि किसी शरारती तत्व ने झूला हिलाकर वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दिया है। पुलिस ने जाँच की और झूले को हिलाकर उसका वीडियो बनाया। उस वीडियो को भी कई जगह शेयर करते हुए भूत वाला दावा किया गया।

फ़िलहाल, यूपी पुलिस उन शरारती तत्वों को तलाश रही है। पुलिस ने बताया है कि भूत की बात अफ़वाह है। इससे पहले यूपी के आईपीएस अधिकारी राहुल श्रीवास्तव ने भी जानकारी दी कि ऐसा करने वाले असामाजिक तत्वों को जल्द ही ‘हॉन्टेड’ लॉकअप में डाला जाएगा। श्रीवास्तव ने बताया कि पुलिस को जैसे ही इस अफवाह की सूचना मिली, वो मौके पर पहुँची। ‘मूविंग स्विंग’ नामक झूले को लेकर ये अफवाह फैलाई गई।

हत्या के दोषी को केरल के सीएम सहित वामपंथी कुनबे की श्रद्धांजलि, 51 बार पार्टी के बागी नेता को चाकु से गोदा था

केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन ने शुक्रवार को विवादों को न्योता देते हुए पीके कुंजानाथन को श्रद्धांजलि दी। हत्या के मामले में दोषी करार दिए गए कुंजानाथन का गुरुवार (11 मई 2020) को निधन हुआ था। विजयन सहित केरल CPI(M) के नेता उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए इस कदर जुटे जैसे किसी नायक की मौत हुई हो।

आंतों में इंफेक्शन होने की वजह से तिरुवनंतपुरम के मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में कुंजानाथन हो गया था। वे 72 वर्ष के थे। कोझिकोड जिले में सीपीआई (एम) के बागी नेता टीपी चंद्रशेखरन की 2012 में हत्या कर दी गई थी। इस मामले में कुंजानाथन सहित 11 लोग 2014 में दोषी पाए गए थे। हालॉंकि तबीयत खराब होने की वजह से कुंजानाथन को बाद में जमानत दे दी गई थी।

सीपीआई (एम) की कन्नूर एरिया कमिटी के मेंबर रहे कुंजानाथन सीएम विजयन के सहयोगी रहे थे। रामचंद्रन की हत्या में उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। मुख्यमंत्री पिनारई विजयन ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि वे ऐसे कॉमरेड थे जिसने नि:स्वार्थ भाव से पार्टी की सेवा की।

अपने फेसबुक पोस्ट में विजयन ने दावा किया कि कुंजानाथन एक प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज की सेवा में बिताया।

हालाँकि, मुख्यमंत्री द्वारा एक हत्या के आरोपी की जयजयकार और प्रशंसा करना सोशल मीडिया यूज़र्स को अच्छा नहीं लगा। साथ ही नागरिकों ने भी एक हत्यारे को सपोर्ट करने पर सीएम को खूब-खरी खोटी सुनाई।

केवल विजयन ही नहीं, सीपीआई (एम) की केंद्रीय समिति के सदस्यों सहित कई कम्युनिस्ट नेताओं ने कुंजानाथन को श्रद्धांजलि दी। वे अस्पताल भी उनका हालचाल लेने जाते थे। उनके निधन पर ‘शहीद जो कभी नहीं मरेगा’ के नारे भी लगे।

साल 2012 में टीपी चंद्रशेखरन ने वैचारिक मतभेदों के कारण पार्टी छोड़ दी थी। इसके बाद कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा क्रूरतापूर्वक उनकी हत्या कर दी गई थी। जाँच से पता चला था कि चंद्रशेखरन को 51 बार चाकू मारा गया था।

पुलिस को बाद में जाँच के दौरान यह भी पता चला था कि चंद्रशेखरन की हत्या का मास्टरमाइंड कुंजानाथन था। जुलाई 2014 में अदालत ने सीपीआई (एम) नेता को दोषी ठहराया था। हालाँकि इसके बाद में वे विवादों में रहे। 2016 में राज्य में वामपंथी सरकार की वापसी के बाद उन्हें अक्सर परोल दिया जाने लगा। इस साल 14 मई को उन्हें इलाज के लिए तीन महीने की जमानत दी गई थी।

बता दें कि छह साल की सजा के दौरान कुंजानाथन ने 400 से अधिक दिनों के परोल का लाभ उठाया। इस दौरान वे पार्टी के कार्यक्रमों में भी शिरकत करते थे। हत्या का दोषी होने के बावजूद उन्हें सीपीआई (एम) क्षेत्रीय समिति का नेता चुना गया था।

सरकारी खजाने को वामपंथी चपत: CPI (M) के पूर्व राज्यसभा सांसद 7 बार ट्रेन में चढ़े, 63 टिकट का पैसा माँगा

मुफ़्त रेल टिकटों की सुविधा की आड़ में कुछ सांसद एवं पूर्व सांसद किस तरह सरकारी पैसों की बर्बादी करते हैं, इसका उदाहरण CPI (M) के एक पूर्व राज्यसभा सांसद की करतूत से सामने आया है।

इस पूर्व राज्यसभा सदस्य ने जनवरी 2019 में 63 ट्रेन टिकट बुक की। लेकिन इनमें से केवल 7 ट्रेन टिकट का ही उन्होंने लाभ लिया। बावजूद इसके बाकी टिकट कैंसिल नहीं कारवाई। बाद में सभी 63 टिकट के रिम्बरस्मेंट यानी, बिल भुगतान की माँग की। इसके कारण रेल मंत्रालय को संसद सचिवालय द्वारा ₹1,46,920 का अतिरिक्त भुगतान करना पड़ेगा।

इस पूर्व वामपंथी सांसद का नाम सार्वजानिक नहीं किया गया है। मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि वे पश्चिम बंगाल से सीपीआई (एम) के पूर्व राज्यसभा सदस्य थे।

दरअसल राज्यसभा सांसदों को और पूर्व राज्यसभा सांसदों को रेलवे में नि:शुल्क असीमित यात्रा की सुविधा मिलती है। इसके पूरा भार राज्यसभा सचिवालय को उठाना होता है।

संसद के प्रत्येक सदस्य को नियमानुसार पत्नी सहित AC-1 में मुफ़्त यात्रा की सुविधा उपलब्ध होती है। इसके अलावा, इनके साथ यात्रा करने वाले एक अटेंडेंट को भी सेकेंड क्लास AC कोच या एग्जीक्यूटिव क्लास में किसी भी समय पूरे भारत में मुफ्त टिकट अथवा पास प्राप्त है।

सीपीआई (एम) के इस पूर्व राज्यसभा सांसद ने जिन सात टिकटों का इस्तेमाल किया उसकी लागत केवल ₹22,085 है। लेकिन उन्होंने उन्होंने अन्य टिकट कैंसिल नहीं कराया जिसकी वजह से सरकारी खजाने पर ₹1,46,920 का अतिरिक्त भर पड़ा। साल 2019-20 में ऐसे टिकटों जिन पर यात्रा नहीं हुई, लेकिन वो कैंसिल भी नहीं कराए गए, रेलवे ने राज्यसभा सचिवालय को ₹7.8 करोड़ रुपए का बिल भेजा है। ये सभी टिकट माननीय राज्यसभा सांसदों के हैं।

इसी तरह एक वर्तमान राज्यसभा सांसद ने जितने टिकट बुक कराए, उनमें से सिर्फ़ 15% टिकटों पर ही यात्रा की। इस तरह उनके द्वारा बर्बाद किए गए 85% टिकटों का भुगतान अब राज्यसभा सचिवालय को करना है।

ab टिकट कैंसिल नहीं कराया तो खुद करना होगा भुगतान

राज्यसभा सचिवालय को कई सांसदों और पूर्व सांसदों को कई टिकट बुक करने और अभी तक भुगतान की माँग नहीं करने के कई उदाहरण मिले हैं। लेकिन अब यदि राज्यसभा का कोई सदस्य ट्रेन का टिकट बुक करने के बाद यात्रा नहीं करता है, तो उसे खुद किराए का भुगतान करना होगा।

राज्यसभा के महासचिव दीपक वर्मा की ओर से सदस्यों को जारी परामर्श में दी गई जानकारी में यह स्पष्ट किया गया है कि वे यात्रा नहीं करने की स्थिति में ट्रेन बुकिंग को कैंसल करें और अगर ऐसा नहीं करते हैं तो किराया उनसे वसूला जाएगा।

परामर्श में कहा गया है कि रेल मंत्रालय ने भुगतान के दावे का जो ब्यौरा दिया है उसके मुताबिक कुछ सदस्यों ने एक ही दिन एक ही अथवा दूसरे स्टेशनों से जाने वाली कई ट्रेनों में टिकट बुक कराए। उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने राज्यसभा सचिवालय को निर्देश दिया था कि इस मुद्दे को उनके संज्ञान में लाया जाए।

तकनीकी कारणों से हैं बाध्य

फ़िलहाल राज्यसभा सचिवालय ने सांसदों के ये बिल भुगतान अदा करने से मना कर दिया है। राज्यसभा सचिवालय ने रेलवे से आग्रह किया है कि वो सिर्फ उन्हीं टिकटों का किराया वसूल करे, जिन पर सांसदों ने वास्तव में यात्रा भी की हो, लेकिन रेलवे नियमों का हवाला देते हुए इस बात पर क़ायम है कि जो टिकट कैंसिल नहीं कराए गए, उनका पैसा राज्यसभा सचिवालय को देना ही होगा।

इसके पीछे बड़ी वजह यह है कि वर्तमान में रेलवे के पास अपनी ओर से आम नागरिक और सांसदों में भेद करने का कोई नियम नहीं है। सम्भव है कि रेलवे जल्द ही लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों द्वारा ट्रेन बुकिंग के बीच अंतर करने के लिए अपने सॉफ्टवेयर में बदलाव करे।