Sunday, December 5, 2021
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कानून से खेलो, हिंदुत्व की कब्र खोदो… क्योंकि वे जब आएँगे सारे गुनाह दफन हो जाएँगे

महाराष्ट्र, झारखंड, कर्नाटक, यूपी, दिल्ली... हर जगह एक जैसा प्रपंच। उन्हें पीड़ित बताओ जो संविधान को चुनौती देते हैं, कानून को ठेंगा दिखाते हैं, हिंदुत्व की कब्र खोदने के नारे लगाते हैं, मजहबी उन्मादी भीड़ को हिंसक बनाते हैं। उनके खिलाफ कार्रवाई में अड़ंगा डालो। उनके गुनाह दफ़न कर दो।

बिजनौर के 22 साल के सुलेमान के पीठ पर किसने हाथ रखी होगी कि उसने कॉन्स्टेबल मोहित के पेट में गोली मार दी? मेरठ की उस गली में लौंडों को किसने इशारा किया कि वे सिटी SP अखिलेश नारायण सिंह के सामने भी देश विरोधी नारे लगाने से नहीं डरे? वह कौन है जिसके कहने पर आतंकियों की आपा लदीदा फरज़ाना और आयशा रेना को विरोध का चेहरा बनाने की साजिश रची गई ? जामिया और अलगीढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में ‘हिंदुत्व की कब्र खुदेगी’ से लेकर ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ के नारों का हुक्म किसका था? किसकी शह पर आपके चुने हुए प्रधानमंत्री को वह हिटलर कह निकल जाता है? देश के गृह मंत्री को तड़ीपार कह आपके साथ खड़े रहने की हिमाकत वह कैसे कर लेता है? आगजनी, पथराव, हिंसा का हथियार उसके हाथ कौन थमाता है? राम मंदिर में अड़ंगा डालने वाला कथित इतिहासकार संवैधानिक पद पर बैठे गवर्नर को बोलने से रोकने की ढिठाई कैसे कर लेता है?

इनके लिए न तो संविधान का कोई मतलब है और न वे इस देश के कानून को मानते हैं। उन्हें पता है कि उनके पीछे एक पूरा गिरोह है। लंपट कॉन्ग्रेसियों, नीच वामपंथियों, वहाबियों, ईसाई मिशनरियों, भीमटों का गिरोह। सीमा पार से समर्थन। ये जानते हैं कि अलग-अलग वेश, नारों और झंडों से यह गिरोह बहुसंख्यकों को छलेगा। सत्ता में लौटेगा। तब उनकी पीठ सहलाई जाएगी, हर उस मौके के लिए जब उन्होंने संविधान और कानून को ठेंगा दिखाया होगा।

झारखंड में रविवार (29 दिसंबर 2019) को हेमंत सोरेन के नेतृत्व में नई सरकार बनी। कैबिनेट का पहला फैसला था- पत्थलगड़ी में शामिल लोगों पर दर्ज FIR वापस होगा। वैसे तो पत्थलगड़ी आदिवासियों की एक प्राचीन परंपरा है। अमूमन इसके जरिए मौजा, सीमा, ग्रामसभा और अधिकार की जानकारी दी जाती है। वंशावली, पुरखों और शहीदों की याद में भी पत्थलगड़ी की जाती रही है। लेकिन, 2017 में आदिवासियों की इस परंपरा की आड़ में देश के संविधान और कानून को चुनौती देने का सिलसिला झारखंड से शुरू हुआ था जो पड़ोसी छत्तीसगढ़ तक भी पहुॅंचा। इस दौरान हिंसा, हत्या, रेप, अपहरण जैसी घटनाएँ अंजाम दी गई। एक चुनी हुई सरकार को, देश के कानून को सीधे-सीधे चुनौती दी गई। जॉंच से यह तथ्य भी सामने आए कि इसके पीछे पूरा गिरोह, खासकर ईसाई मिशनरियॉं थी। कायदे से तो इस मामले की सुनवाई अदालतों में होनी चाहिए थी। अदालतों को तय करना चाहिए था कि जिन पर एफआईआर दर्ज हैं, वे दोषी हैं या निर्दोष। लेकिन, एक सरकार ने हिंसा के सारे सूत्रों को झटके में बेदाग कर दिया।

ऐसे में ताज्जुब नहीं होता है कि नतीजों के तुरंत बाद भावी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन रांची के पुरुलिया रोड स्थित कार्डिनल हाउस पहुॅंचते हैं। आर्च बिशप फेलिक्स टोप्पो से आशीर्वाद लेते हैं। आर्च बिशप फेलिक्स टोप्पो खुलकर कहते हैं- हम सब भाजपा से डरे हुए थे। नई सरकार क्रिसमस गिफ्ट है। यहॉं तक कि सत्ता से भाजपा की विदाई के लिए बीते पॉंच साल से चर्चों में एक विशेष प्रेयर तक हो रहा था। एक धर्मगुरु और गैर कानूनी धर्मांतरण का धंधा चलानी वाली मिशनरीज यह सब करने और कहने की हिम्मत केवल इसलिए जुटा पाते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि एक सरकार आएगी और उनके हर गुनाह दफ़न कर देगी।

फरवरी 2016 में जेएनयू में राष्ट्रविरोधी नारे लगते हैं। इस मामले में 14 जनवरी 2019 को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल 1,200 पन्नों की चार्जशीट दायर करती है। जेएनयू छात्र संघ का पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार और उमर खालिद मुख्य आरोपित है। शेहला रशीद, वामपंथी नेता डी राजा की बेटी अपराजिता, आकिब हुसैन, मुजीब हुसैन, मुनीब हुसैन सहित 36 छात्र आरोपित हैं। लेकिन, दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार इस मामले में केस चलाने की इजाजत ही नहीं दे रही है। सुरक्षा की यही गारंटी कन्हैया कुमार से लेकर शेहला रशीद तक को देश भर में घूम-घूमकर प्रोपेगेंडा फैलाने की इजाजत देता है। कभी सेना के नाम पर झूठे आरोप लगाने तो कभी आपके चुने हुए प्रधानमंत्री को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी करने की आजादी देता है। इन्हें पता है कि पीठ पर हाथ सहलाने के लिए गिरोह पीछे खड़ा है। मौका मिलते ही उनके दाग भी धो देगा।

महाराष्ट्र में भी अर्बन नक्सलों को क्लीनचिट देने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। महाविकास अघाड़ी की सरकार बनते ही एनसीपी विधायक जितेंद्र आव्हाड ने सुधीर धावले को जेल से रिहा करने की सिफारिश मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से की। भीमा-कोरेगाँव मामले में दर्ज मामले वापस लेने की मॉंग की। जनवरी 2018 को भीमा-कोरेगाँव में हुई हिंसा का धावले मास्टरमाइंड माना जाता है। यदि आने वाले दिनों में अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर धावले से लेकर सुधा भारद्वाज तक देश के किसी कोने में फिर से चुनी हुई सरकार के खिलाफ हिंसा की साजिश रचते दिखें तो चौंकिएगा मत।

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध के नाम पर हिंसा करने वालों को भी बचाने का खेल पहले दिन से ही चल रहा है। छात्रों का हवाला दे सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया गया। प्रियंका गॉंधी सार्वजनिक तौर पर उस पुलिस को अराजक बता रही हैं जो दंगाइयों के निशाने पर थे। उस पर धर्म विशेष के लोगों को प्रताड़ित करने का आरोप लगा रही हैं।

प्रियंका गॉंधी ने ऐसे ही नहीं कह दिया कि यह भगवा आपका नहीं है। जब वे ऐसा कह रही होती हैं, तब उन्हें पता होता है कि छलना ही आपकी नियति है। ज्यादा दिन नहीं हुए जब उनके सामने ही हेमंत सोरेन ने कहा था- गेरुआ पहन बहू-बेटियों की इज्जत लूटने का काम करते हैं। उनकी आँखों ने उस भीड़ में बैठकर इस बात पर आपको भी ताली पीटते देखा था। जबरन धर्मांतरण रुकवाने वाली सरकार को सत्ता से बेदखल करते भी उन्होंने आपको देखा है। वे जानती हैं जब वे लौटेंगी तो भगवा आतंकवाद गढ़कर हिंसक भीड़ का मजहब छिपा लेंगी और आप लिबरल दिखने के लिए ताली पीटते रहेंगे।

वक़्त है चेत जाने का। अपनी आवाज खुद बनने का। मीडिया के भरोसे आप बैठे नहीं रह सकते। यह मीडिया उनका ही पाला-पोसा है। यह मीडिया ‘मेरा गला दबाया’ के उनके झूठे आरोपों पर बवाल काटता है। लेकिन, आपको नहीं बताता कि झूठ बोल रही नेता की सुरक्षा में लगी लेडी अफसर के साथ बदतमीजी हुई थी। वह नहीं बताता है कि वह अधिकारी इतनी कत्वर्यनिष्ठ है कि भाई की मौत होने के बाद भी अपनी ड्यूटी निभा रही थी। यह मीडिया प्राइम टाइम में चुन-चुन कर आपको फ्रेम दिखाता है ताकि मजहबी भीड़ पीड़ित दिख सके। वह सुलेमान के यूपीएसएसी की तैयारी करने की स्टोरी बुनता है ताकि उसके हाथ का कट्टा छिप जाए।

इसलिए नहीं चेते तो 2020 भी किसी 20-20 मैच की तरह हाथ से फिसल जाएगा। वक्त ड्रेसिंग रूम में बैठकर अफसोस करने का नहीं, खुद की आवाज बनने का है।

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अजीत झा
देसिल बयना सब जन मिट्ठा

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