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टिड्डियों के हमले को जायरा वसीम ने बताया अल्लाह का कहर, सोशल मीडिया पर यूजर्स ने ली क्लास

इस्लाम का हवाला देकर एक्टिंग को अलविदा कहने वाली जायरा वसीम ने देश में टिड्डियों के हमले को घमंडी लोगों पर अल्लाह का कहर बताया है। सोशल मीडिया पर जायरा ने बुधवार को यह बात लिखी।

जायरा ने लिखा, “इसलिए हमने उन पर बाढ़ भेजे, और टिड्डे भेजे, और भेजे जूएँ-चीलड़, और मेंढक भेजे, खून भेजा: ये वैसी चेतावनियाँ हैं जो स्वविश्लेषित हैं: लेकिन वो सब अपने अज्ञान में गहरे डूबे हुए थे- वैसे लोग जो पापी हैं।”

बता दें कि पिछले हफ्ते से देश के उत्तरी भाग में टिड्डियों के कारण किसानों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है और उनकी फसलें बर्बाद हो रही है। ऐसे समय में जायरा वसीम के ऐसे ट्वीट को देखकर नेटिजन्स खासे नाराज दिखे।

ट्विटर पर अधिकतर नेटिजन्स ने जायरा वसीम को उनकी इस टिप्पणी पर आड़े हाथों लिया। लोगों ने प्रश्न उठाया कि जब इन टिड्डियों के कारण लाखों किसान परेशान हैं और उनकी फसल खराब हो रही है, उस समय इस ट्वीट का क्या मतलब?

यूजर्स ने जायरा से पूछा से कि वह इतनी कट्टर मजहबी कैसे हो सकती हैं कि टिड्डों के हमलों से परेशान किसानों के लिए इतनी नफरत दिखाएँ।

इसके अलावा कुछ यूजर्स ने गैर वैज्ञानिक ट्वीट के लिए जायरा का मजाक भी उड़ाया। लोगों ने जायरा पर तंज कसते हुए कहा कि ट्वीट करना इस्लाम में हराम है।

उल्लेखनीय है कि भारत से पहले पूर्वी अफ्रीका और पाकिस्तान में टिड्डियों का कहर बरपा था। सिंध के कई इलाकों समेत कराची में इनके कारण लोगों को पिछले साल नवंबर से काफी परेशानी झेलनी पड़ रही थी। इसके बाद इन टिड्डों ने फरवरी में गुजरात के कुछ इलाकों पर हमला बोला। बाद में ये मध्यप्रदेश व राजस्थान में भी पहुँचे।

ऐसे में ये समझना मुश्किल है कि पूर्व एक्ट्रेस द्वारा इस मामले पर ऐसी टिप्पणी, जिसमें टिड्डियों के आक्रमण को वह इस्लामिक कहर बता रही है, वह किन घमंडी लोगों पर निशाना साध रही हैं।

बता दें, 19 साल की पूर्व एक्ट्रेस ने एक्टिंग करियर को अलविदा कहने से पहले 3 फिल्में की। किंतु, इन फिल्मों के बाद एक दिन सोशल मीडिया पर उन्होंने एक्टिंग को छोड़ने का फैसला सुनाया और इसके पीछे का कारण इस्लाम को बताया। इसके बाद कश्मीर के मुद्दे पर गलत जानकारी देकर अपने फॉलोवर्स को बरगलाया। साथ ही एक दिन अपने प्रशंसकों से ये भी अपील की कि उसकी सराहना करनी बंद की जाए, क्योंकि इससे उसका इमान खतरे में पड़ता है।

जैकलीन कैनेडी की फोटो पास में रख कर सोते थे नेहरू: CIA के पूर्व अधिकारी ने बताए किस्से

सीआईए के पूर्व अधिकारी और “जेएफके फॉरगोटेन क्राइसिसः तिब्बत, द सीआइए एंड द सिनो-इंडियन वार” (JFK’s Forgotten Crisis. Tibet, the CIA, and the Sino-Indian War) के लेखक ब्रूस रिडेल का एक वीडियो हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है। इसमें रिडेल पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी पर अपनी पुस्तक की चर्चा करते देखे जा सकते हैं।

अपनी पुस्तक के संदर्भ में ही रिडेल ने एक दिलचस्प घटना सुनाई। इसमें भारत के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और जॉन एफ कैनेडी की पत्नी जैकलीन कैनेडी का भी जिक्र था। इस क्लिप में, रिडेल का कहना है कि भारत के पहले प्रधान मंत्री संयुक्त राज्य अमेरिका की फर्स्ट लेडी जैकलीन कैनेडी (Jacqueline Kennedy) के प्यार में पड़ गए थे।

जैकलीन कैनेडी, नेहरू से चालीस साल छोटी थीं। हालाँकि ऐसे और भी कई अवसर आए जब नेहरू से कम उम्र की महिलाएँ एक से ज्यादा बार उनका दिल चुरा बैठीं, जिन्हें वो एयर इंडिया से प्रेम पत्र भेजा करते थे, लेकिन जैकलीन कैनेडी के बारे में यह तथ्य एकदम नया है।

यह वीडियो 2016 का है। ब्रूस रिडेल के पास सीआईए के लिए तीस साल काम करने का अनुभव है। वे चार अमेरिकी राष्ट्रपतियों के दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व के सलाहकार भी रह चुके हैं। एक सार्वजनिक कार्यक्रम में यूएसए के लिए भारत और पाकिस्तान के साथ सौहार्द्रपूर्ण संबंध स्थापित करने की दिशा में वे जैकलीन कैनेडी के योगदान की बात कर रहे थे।

उन्होंने कहा, “नेहरू, मैं कहूँगा, फर्स्ट लेडी के प्यार में कैद हो गए थे। उनकी तस्वीर वे सिरहाने में रखते थे।”

जैकलीन केनेडी और जवाहर लाल नेहरू

यह समझते हुए कि यह बात थोड़ी असामान्य थी, ब्रूस रिडेल ने तुरंत कहा, “अब आप जानते हैं, थोड़ा असामान्य है, मैं इस पर बहुत ज्यादा नहीं कहना चाहता। लेकिन यह एक और उदाहरण है कि कैसे इस मामले में फर्स्ट लेडी ने एक भूमिका निभाई थी, जो कि अमेरिकी कूटनीति के सामने बहुत ही असामान्य बात है।”

रिडेल द्वारा जवाहरलाल नेहरू के बारे में किए गए इस खुलासे के बाद वहाँ मौजूद ऑडियंस ठहाके लगाकर हँसने लगी। यह चर्चा अंतरराष्ट्रीय जासूसी संग्रहालय में हुई।

जैकलीन के माथे पर गुलाल का टीका लगाते नेहरू

जवाहरलाल नेहरू की आशिक मिजाजी की यह एकमात्र घटना नहीं है। एडविना माउंटबेटन के साथ उनका कथित संबंध अक्सर चर्चा का विषय रहता है। हालाँकि हाल ही में एडविना की बेटी ने अपनी एक पुस्तक में खुलासा किया था कि उनकी माँ और नेहरू के बीच कभी भी शारीरिक सबंधों तक नहीं पहुँच सका था, क्योंकि उन्हें कभी भी प्राइवेसी नहीं मिल पाती थी।

खैर, यह सब तब की बातें हैं। जब भारत अंग्रेजों के अधीन था और कई क्रांतिकारी जेल में थे। कुछ अंग्रेजों की बर्बरता के कारण मारे जा रहे थे, या फिर जब भारत दंगों में जल रहा था। लेकिन अमेरिका की फर्स्ट लेडी जैकलीन कैनेडी को लेकर जवाहरलाल नेहरू के दिल में क्या चलता था, इस पर खुलासा करती ये वीडियो खासकर ट्विटर पर काफी ‘वायरल’ है।

PM मोदी पर आपत्तिजनक टिप्पणी: गायक मेनुल एहसान पर FIR, टैगोर पर भी कर चुका है विवादित कमेंट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM MODI) को लेकर सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में त्रिपुरा पुलिस ने बांग्लादेशी गायक मेनुल एहसान नोबल (Mainul Ahsan Noble) पर FIR दर्ज की है।

FIR गुजरात के गाँधीनगर की पंडित दीनदयाल पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले छात्र सुमन पॉल की शिकायत पर दर्ज की गई है। सुमन ने बेलोनिया थाने में 25 मई को शिकायत दी थी।

मैनुल के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराने के बाद सुमन ने इसकी जानकारी ट्विटर पर दी। उन्होंने बताया, “आज मैंने मेनुल एहसाननोबल के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज करवाई है। मैं भारतीय उच्चायुक्त से अनुरोध करता हूँ कि उसका वीजा निरस्त किया जाए। उसके साथ सभी बिजनेस कॉन्ट्रेक्ट कैंसल कर दिए जाएँताकि वह दोबारा भारत न आ सके।”

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार सुमन ने बताया, “इस गायक को हमेशा से अपने देश में खारिज ही किया गया। ये हमारे देश में आया। भारत में प्रसिद्धि अर्जित की और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अपमान करते हुए बांग्लादेश लौट गया। मैं उसके इस बर्ताव को स्वीकार नहीं कर सकता। इसलिए, मैंने उसके खिलाफ शिकायत दर्ज की है।”

त्रिपुरा पुलिस के साइबर अपराध सेल, दक्षिण त्रिपुरा के पुलिस अधीक्षक जल सिंह मीणा के मुताबिक, मेनुल के ख़िलाफ़ FIR, आईपीसी की धारा 500, 504, 505 और धारा 153 के तहत दर्ज की गई है।

रिपोर्ट की मानें तो अधिकारियों का कहना है, “ये मामला साइबर क्राइम सेल को फॉरवर्ड कर दिया गया है। हम उनके साथ लगातार संपर्क में बने हुए हैं। आगे की कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। हालाँकि, ये मामला इंडियन साइबर स्पेस में नहीं है। फिर भी हमने की इसकी जाँच शुरू कर दी है।”

पिछले साल मेनुल ने जी बांग्ला म्यूजिक (ZEE Bangla Music) पर आने वाले शो ‘सारेगामापा’ में तीसरा स्थान प्राप्त किया था। इसके अलावा वह पिछले साल एक कॉन्सर्ट के लिए अगरतला भी गया था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ बोलने से पहले मेनुल ने पिछले साल रवीन्द्रनाथ टैगोर पर भी आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। कहा था कि रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा लिखा गया गीत बांग्लादेशी राष्ट्रगान बनने के लायक नहीं है।

‘भूख’ से मर गया बच्चा: राणा अयूब ने शेयर की HT की खबर, रेलवे ने कर दिया फैक्टचेक

लगातार झूठी खबरें फैलाने के वाले कुछ वामपंथी मीडिया पोर्टल और पत्रकारों ने एक बार फिर अपने प्रोपेगेंडा के तहत खबरें चलाने का प्रयास किया है, लेकिन इस बार इन खबरों का भारतीय रेलवे ने खुलासा कर दिया है।

हिंदुस्तान टाइम्स ने 27 मई, 2020 को “माइग्रेंट्स किड डाइज एज फादर हंट्स फोर मिल्क एट रेलवे स्टेशन” शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की। इसमें दावा किया कि दिल्ली में रहने वाला बिहार का एक साढ़े चार साल का बच्चा, जो श्रमिक ट्रेन में सवार होकर पहुँचा था, उसने भूख के चलते रेलवे स्टेशन पर पहुँचने से पहले ही दम तोड़ दिया।

साभार-हिंदुस्तान टाइम्स

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट को पत्रकार राणा अयूब द्वारा शेयर किया गया। ट्वीट करते हुए राणा ने लिखा, “एक साढ़े चार वर्ष का प्रवासी बच्चा श्रमिक ट्रेन से रेलवे स्टेशन पर पहुँचने से पहले ही मर गया। बच्चे की मौत उस समय हुई कि जब बच्चे का पिता दूध की तलाश कर रहा था।” साथ ही खबर में लिखा गया था कि प्लेटफॉर्म पर भोजन और पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं के न होने के कारण बच्चे की मौत हो गई।

साभार-ट्विटर

जैसा कि अयूब राणा के ट्वीट और हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट में दिखाया गया है कि बच्चे की मौत भूख के कारण हुई। रेल मंत्रालय ने इसके जवाब में ट्विटर पर बताया है कि बच्चा पहले से ही एक बीमारी से पीड़ित था। वह बीमारी का इलाज कराने के बाद दिल्ली से अपने परिवार के साथ लौट रहा था।

मंत्रालय के ट्वीट में यह भी कहा गया कि बच्चे की मौत ट्रेन से उतरने के 5 घंटे पहले हो चुकी थी। साथ ही मंत्रालय ने पत्रकार को झूठी खबर शेयर करने के लिए चेताया भी।

बार-बार फेक न्यूज फैलाने वाली पत्रकार राणा अय्यूब

बीते दिन (27 मई, 2020) को राणा अयूब के अपने इंस्टाग्राम अकाउंट के माध्यम से एक महिला की मौत के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया था। अयूब ने दावा किया था कि महिला की मौत इसलिए हुई क्योंकि सरकार ने लेट हो रही ट्रेन में भोजन और पानी की व्यवस्था नहीं की थी।

अयूब ने दावा किया था कि महिला मुजफ्फरपुर रेलवे स्टेशन पर बेहोश होकर गिर गई और फिर भूख के कारण महिला ने दम तोड़ दिया, जबकि महिला की मौत की सच्चाई कुछ और ही थी।

रेलवे मंत्रालय के अनुसार महिला अपनी बहन, उसके पति और दो बच्चों के साथ ट्रेन में यात्रा कर रही थी। महिला एक लंबी बीमारी से पीड़ित थी और यात्रा के दौरान ही महिला ने दम तोड़ दिया था। इसके बाद भी कई मीडिया हाउस सरकार को नकारा साबित करने के लिए तरह-तरह के आरोप लगा रहे हैं।

रेलवे ने उन सभी भ्रामक खबरों पर चु्प्पी तोड़ी, जिनमें लोगों की मौत के पीछे का कारण रेलवे की लापरवाही बताया जा रहा है। 27 मई, 2020 को दैनिक जागरण ने दावा किया गया कि श्रमिक एक्सप्रेस में लापरवाही के कारण चार लोगों की मौत हो गई थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि श्रमिक एक्सप्रेस पर सवार प्रवासी श्रमिक भोजन और पानी से वंचित हैं और इन लोगों की मौत भोजन और पानी की कमी के कारण हुई है।

हालाँकि भारतीय रेलवे ने मौतों पर गलत सूचना फैलाने वालों के जवाब देने के लिए ट्विटर का सहारा लिया। भारतीय रेलवे ने कहा कि आपात स्थिति के प्रत्येक यात्री को चिकित्सा सुविधा प्रदान की जाती है। इसके अलावा सभी यात्रियों के लिए श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेनों में भोजन और पानी उपलब्ध कराया जाता है।

मंगलवार (26 मई, 2020) को भारतीय रेलवे ने दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट का खंडन किया था, जिसमें दावा किया गया था कि श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेनों में भोजन और पानी की कमी से प्रवासी श्रमिकों की मौत हो रही है। भास्कर ने अपनी रिपोर्ट में रेलवे की कथित लापरवाही को यात्रियों की मौत का कारण बताया था।

हालाँकि भारतीय रेलवे ने भास्कर रिपोर्ट में दिए गए दावे को स्पष्ट रूप से खारिज करते हुए कहा कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के आने तक मौत के कारणों का पता नहीं लगाया जा सकता है। मोहम्मद इरशाद (4 वर्षीय) मुज़फ़्फ़रपुर से बेतिया जाने वाली ट्रेन में सवार था, जिसकी रास्ते में मौत हो गई। रेलवे ने स्पष्ट किया कि बच्चा बीमार था और इलाज के बाद दिल्ली से लौट रहा था।

‘तेरे बाप के बाप के बाप को भी बात करनी पड़ेगी’: सपा MLA अबू आजमी ने महिला अफसर को धमकाया

मुंबई के नागपाड़ा में समाजवादी पार्टी (सपा) नेता और विधायक अबू आसिम आजमी पुलिस अधिकारी शालिनी शर्मा को अपशब्द कहते नजर आए हैं। भाजपा नेता और पूर्व सांसद किरीट सोमैया ने इस घटना का वीडियो ट्विटर पर शेयर किया है।

प्रवासी श्रमिकों को घर भेजने में हो रही कथित समस्याओं को लेकर अबू आजमी नागपाड़ा में समर्थकों के साथ हँगामा कर रहे थे। आजमी का कहना था कि कोरोना वायरस के कारण फँसे मजदूरों को श्रमिक ट्रेन के लिए पुलिस स्टेशन बुलाया जाता है और फिर वहाँ उन्हें  4 से 5 घंटे धूप में खड़ा रखकर वापस भेज दिया जाता है। 

उसी समय उन्होंने वहाँ पर मौजूद शालिनी शर्मा के खिलाफ अमर्यादित टिप्पणी कर दी। अबू आजमी इस वीडियो में कहते हुए सुने जा सकते हैं, “ये औरत कहती है कि आप पुलिस पे इल्जाम लगाते हो, मै बात नहीं करूँगी। तेरे बाप के बाप के बाप को बात करनी पड़ेगी।”

किरीट सोमैया ने यह ट्वीट शेयर करते हुए लिखा है कि अबू आजमी ने यह बात मुंबई सेंट्रल स्टेशन के पास 26 मई की रात नागपाड़ा पुलिस स्टेशन की शालिनी शर्मा महिला पुलिस ऑफिसर के लिए कहे। ठाकरे सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की है।

इस पर विवाद के बाद सपा नेता अबू आजमी ने उल्टा महिला पुलिस अधिकारी पर ही आरोप लगाया है कि प्रवासी मजदूरों को उनको गाँव भेजने में हो रही दिक्कत के चलते उन्होंने नागपाड़ा की पुलिस अधिकारी शालिनी शर्मा से मुलाकात की लेकिन उनके (विधायक) साथ बदसलूकी की।

सपा नेता अबू आजमी का कहना है कि महाराष्ट्र में मजदूरों को श्रमिक ट्रेन के लिए पुलिस स्टेशन बुलाया जाता है और फिर वहाँ उन्हें 4-5 घंटे धूप में खड़ा रखकर वापस भेज दिया जाता है। सपा नेता ने आरोप लगाया कि जब उन्होंने पुलिस से प्रवासी मजदूरों की बदइंतजामी पर सवाल पूछा तो पुलिस अधिकारी ने उनसे बदसलूकी की।

इस से नाराज विधायक अबू आसिम आजमी अपने सैकड़ो कार्यकर्ताओं के साथ पुलिस स्टेशन के बाहर धरने पर बैठ गए और और महिला पुलिस अधिकारी को सस्पेंड करने की माँग करने लगे।

स्टेशन पर मृत माँ को जगाता बच्चा… मार्मिक और वायरल वीडियो की कहानी से खेलती राणा अयूब – Fact Check

भारत इस वक्त कोरोना वायरस जैसी खतरनाक महामारी से जूझ रहा है, दिन प्रतिदिन संक्रमित लोगों की संख्या बढ़ती ही चली जा रही है। इस कठिन समय में भी कुछ लोग ऐसे हैं जो सरकार को नीचा दिखाने के लिए इस महामारी का फायदा उठाकर सरकार के खिलाफ झूठा प्रचार प्रसार कर रहे है।

हाल ही में, पत्रकार राणा अयूब ने इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट डाला, जिसमें एक महिला की मृत्यु पर जवाबदेह होने के लिए सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया। उन्होंने दावा किया कि उस महिला की मृत्यु इस कारण हुई क्योंकि सरकार ने उसे ट्रेन में खाना और पानी उपलब्ध नहीं कराया था। साथ ही ट्रेन अपनी समय सीमा से काफ़ी देरी से चल रही थी।

“ट्रिगर अलर्ट। महिला ने गुजरात से ट्रेन ली थी। फिर वो ट्रेन लेट हुई, ट्रेन में किसी प्रकार का खाना नहीं दिया गया। मुजफ्फरपुर स्टेशन पर, वह भूख से मर गई। जहाँ उसका बच्चा अपनी मृत माँ को जगाने की कोशिश कर रहा था। हम रात को कैसे सो पाएँगे? यह कोई मौत नहीं है, यह एक कोल्ड ब्लडेड मर्डर है।” अपनी माँ को जगाने की कोशिश कर रहे एक बच्चे की वीडियो को राणा अयूब ने अपने इंस्टाग्राम एकाउंट पर यही लिख कर पोस्ट किया।

अपने इंस्टाग्राम पोस्ट में, अयूब ने दावा किया कि महिला मुजफ्फरपुर रेलवे स्टेशन पर “बेहोश हो कर गिर गई” और भुखमरी के कारण मर गई।

हालाँकि, संबंधित महिला के निधन के बारे में सच्चाई अयूब की कल्पना के बिल्कुल विपरीत है। रेल मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, महिला, जो अपनी बहन, पति और दो बच्चों के साथ यात्रा कर रही थी, एक लंबी बीमारी से पीड़ित थी और यात्रा के दौरान ट्रेन में ही उसकी मौत हो गई थी।

रेलवे के सूत्रों ने आगे बताया कि रेलवे सुरक्षा बल के प्रभारी निरीक्षक और डिप्टी एसपी मुख्यालय जीआरपी मुजफ्फरपुर, श्री रमाकांत उपाध्याय को ट्रेन में महिला की मृत्यु के बारे में सूचित किया गया था। स्टेशन प्रभारी से अनुमति मिलने के बाद, मृतक के शव को मुजफ्फरपुर रेलवे स्टेशन पर छोड़ दिया गया था और बाद में मुजफ्फरपुर रेलवे डिवीजन के डॉक्टर द्वारा उसकी जाँच की गई थी।

महिला पहले से ही कई बीमारियों से पीड़ित थी। लेकिन अयूब ने न केवल झूठा दावा किया कि महिला की भूख से मृत्यु हो गई, बल्कि उसने एक काल्पनिक कहानी भी बुन ली कि महिला मरने से पहले मुजफ्फरपुर स्टेशन पर गिरी थी।

राणा ने दावा किया कि महिला की भूख से मृत्यु हो गई थी और उसे पानी भी नहीं दिया गया था। जैसा कि भरतीय रेलवे ने कई बार स्पष्ट किया है कि श्रामिक ट्रेनों में यात्रियों को भोजन, पानी और उचित चिकित्सा सहायता दी जाती है।

कई स्पष्टीकरणों के बावजूद, मीडिया का एक निश्चित वर्ग यह साबित करने के लिए ओवरटाइम काम कर रहा है कि सरकार इस महामारी में लापरवाही कर रही है।

भारतीय रेलवे ने भ्रामक रिपोर्टों पर कहा है कि श्रमिक एक्सप्रेस में बीमारियों के कारण लोगों की मौतें हुई हैं। बुधवार, 27 मई, 2020 को, जागरण ने यह दावा करते हुए समाचार प्रकाशित किया कि लापरवाही के कारण श्रमिक एक्सप्रेस में चार लोगों की मौत हो गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि श्रमिक एक्सप्रेस पर सवार प्रवासी कामगार भोजन और पानी से वंचित रहे। जबकि सच्चाई कुछ और ही थी।

भारतीय रेलवे ने कहा कि आपात स्थिति के मामले में प्रत्येक यात्री को चिकित्सा सहायता प्रदान की जाती है। इसके अलावा, सभी यात्रियों के लिए श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेनों में भोजन और पानी उपलब्ध कराया जाता है।

मंगलवार (26मई,2020) को, भारतीय रेलवे ने दैनिक भास्कर की रिपोर्ट को भी फर्जी बताया था, जिसमें दावा किया गया था कि श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेनों में भोजन और पानी की कमी से प्रवासी श्रमिकों की मौत हो रही है। भास्कर ने अपनी रिपोर्ट में रेलवे द्वारा की जा रही लापरवाही के कारण लिए यात्रियों की मौत का आरोप लगाया था।

सावरकर की 10 साल बाद याचिका Vs नेहरू का बॉन्ड भरकर 2 हफ्ते में जेल से रिहाई: किसने कितना सहा?

भक्ष्य रँड बहुमस्त देखता ‘सिंह’ धावले बग्गीकडे गोळी सुटली, गडबड मिटली, दुष्ट नराधम चीत पडे (रैंड नाम का भक्षी जब दिखाई पड़ा तो ‘शेर’ बग्गी की तरफ भागे! गोली छूटी, गंदगी साफ हो गई, दुष्ट आदमी मारा गया)

ये साल 1899 था, जब अंग्रेज अधिकारी वाल्टर चार्ल्स रैण्ड की हत्या मामले में तीनों चापेकर भाइयों को फाँसी की सजा दी गई। चापेकर बंधुओं की वीरता और बलिदान पर 16 साल के विनायक दामोदर सावरकर ने ‘चाफेकरांचा फटका’ नाम से एक मराठी कविता लिखी।

बताया जाता है जिस दिन तीनों भाइयों में सबसे छोटे 20 साल के वासुदेव हरि चाफेकर को फाँसी हुई, उसी रात अष्ठभुजा माँ दुर्गा की प्रतिमा के सामने 16 साल के सावरकर ने चापेकर बंधुओं के मार्ग पर चलने का प्रण लिया।

इसके बाद से लेकर साल 1966 में अपने देह त्यागने से पहले उनकी लिखी आखिरी कविता ‘येमृत्यो! येतूंये, यावयाप्रती’ तक सावरकर के लिए कविता और क्रांति साथ-साथ चली। अपनी मृत्यु के करीब 55 सालों के बाद भी अपने किसी भी समकालीन नेता के मुकाबले सावरकर आज सबसे ज्यादा चर्चा में हैं।

अपने जीवन भर राजनीतिक रूप से वो चाहे कितने भी हाशिए पर रहे हों, लेकिन आज वो राजनीति के केंद्र में हैं। कॉन्ग्रेस का कोई ना कोई नेता आए दिन उन्हें अपशब्द कह रहा होता है। खुद को प्रगतिशील साबित करने के लिए जरूरी है कि आप सावरकर का अपमान करते नज़र आएँ।

यही वजह है कि आज स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर की 137वीं जन्म जयंती के अवसर पर ये आवश्यक हो जाता है कि पीछे मुड़कर देखा जाए कि सावरकर के जीवन में ऐसा क्या है जो कॉन्ग्रेस को इतना परेशान कर रहा है।

कॉन्ग्रेस को लगता है कि देश को आज़ाद कॉन्ग्रेस ने कराया है, इसलिए देश पर राज करने का स्वाभाविक हक कॉन्ग्रेस का है। उस पर यह भी नेहरू जी ने कॉन्ग्रेस की आज़ादी की लड़ाई का नेतृत्व किया है, इसलिए सिर्फ उनका परिवार ही वो पवित्र परिवार है, जिसका सदस्य देश का प्रधानमंत्री बन सकता है।

इसलिए आजाद भारत के 70 सालों में से करीब 55-60 साल राज करने वाली कॉन्ग्रेस आज जब पहली बार सत्ता से 10 साल के लिए बाहर हुई है, तो वो देख रही है कि चुनौती मिल कहाँ से रही है। और इस चुनौती के मूल में उसे दिखाई देती है हिन्दुत्व की विचारधारा।

कॉन्ग्रेस को लगता है कि अगर हिन्दुत्व के इस विचार का सामना करना है तो इसे लिखने वाले सावरकर को ही अलोकप्रिय बना दिया जाए। देश की आजादी की लड़ाई में सभी बड़े नेताओं के आपस में मतभेद थे। गाँधी-अंबेडकर, सुभाष-गांधी, सावरकर-गाँधी, जिन्ना-गाँधी, भगत सिंह-गाँधी, लेकिन आज कॉन्ग्रेस के निशाने पर सावरकर को छोड़कर इनमें से कोई भी महापुरुष निशाने पर नहीं है।

क्योंकि सत्ता पर जो चुनौती दे रहे हैं, वो सावरकर के विचार से आने वाले माने जाते हैं। इसलिए मंच से सावरकर को गाली है और जेएनयू में लगी उनकी प्रतिमा पर कालिख!

कॉन्ग्रेस और भारत का प्रगतिशील तबका जैसा सूक्ष्म आकलन सावरकर के जीवन का करता है या जैसा मापदंड सावरकर के लिए अपनाता है, वैसा मापदंड वो किसी भी दूसरे नेता के लिए नहीं अपनाता। जैसे कि 1923 में नाभा रियासत में गैर कानूनी ढंग से प्रवेश करने पर जवाहरलाल नहेरू को 2 साल की सजा सुनाई गई थी।

लेकिन सिर्फ 2 हफ्ते की सजा के बाद ही ये स्थिति हो गई कि जवाहरलाल नेहरू ने अब कभी नाभा में प्रवेश ना करने का बॉन्ड भर कर अपनी सज़ा माफ कराई, साथ ही उनके पिता उन्हें छुड़ाने के लिए वायसराय तक सिफारिश लेकर पहुँच गए। लेकिन इसके बाद भी नहेरू भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी हैं, लेकिन 50 साल की सजा पाए सेल्युलर जेल में 10 साल काटने वाले सावरकर अगर दया याचिका लिखते हैं तो वो कायर कहे जाते हैं। यानी, नेहरू बॉन्ड भरकर जेल से रिहाई ले सकते हैं, लेकिन सावरकर दया याचिका नहीं लिख सकते।

ये आपको हर जगह दिखेगा। सावरकर ने अपने जीवन के 27 साल जेल या नज़रबंदी में काटे। साल 1910 से लेकर 1924 तक वो काला पानी समेत विभिन्न जेलों में रहे तो वहीं 1924 से लेकर 1937 तक वो रत्नागिरी में नज़रबंद थे। जिस समय देश को आजाद कराने वाले बड़े-बड़े नेता, जिनसे अंग्रेज थर-थर काँपते थे, गोलमेज़ सम्मेलन में हिस्सा लेने लंदन जाया करते थे, उस समय सावरकर को रत्नागिरी से एक कदम बाहर रखने की इज़ाजत नहीं थी। लेकिन इसके बाद भी सावरकर अंग्रेजों के साथी थे और गोलमेज़ सम्मेलन में हिस्सा लेने वाले अंग्रेजों से देश को आज़ाद करा रहे थे।

रत्नागिरी में नज़रबंदी के दौरान सावरकर को 60 रुपए महीने पेंशन के तौर पर अंग्रेज सरकार देती थी। उनके शहर से बाहर जाने या किसी भी प्रकार के नौकरी करने पर रोक थी। अंग्रेजों से पेंशन पाने पर सावरकर आलोचना के पात्र हैं लेकिन जब असहयोग आंदोलन के बाद पाँच साल की सजा पाए गाँधी जी को सिर्फ दो साल मे ही छोड़ दिया गया क्योंकि उन्हें अपेन्डिक्स का ऑपरेशन कराना था तो ऐसा करना ठीक है।

गाँधी जी की पाँच साल की सजा दो साल में बदली जा सकती है, ऐसा करने पर वो अंग्रेजों के चमचे नहीं कहलाते, लेकिन 60 रुपए की पेंशन लेते ही सावरकर पर सवाल खड़े हो जाते हैं। जिस पर 1899 में दक्षिण अफ्रिका में बोअर के युद्ध में अंग्रेजों की तरफ से बतौर सार्जेंट युद्ध में मेडिकल कोर की तरफ से शामिल होने पर गाँधी जी को मेडल मिल चुका था। सोचिए, ऐसा कोई मेडल अंग्रेज सरकार ने सावरकर को दे दिया होता तो आज कॉन्ग्रेस क्या कर रही होती?

भारत का पूरा क्रांतिकारी आंदोलन कॉन्ग्रेस के अहिंसा से आज़ादी पाने वाले विचार के विरोध में था। ‘बम का दर्शन’ और ‘बम की पूजा’ ये दो लेख इस विवाद के शीर्ष बिन्दू हैं, लेकिन बड़ी चालाकी से ‘भगत सिंह बनाम सावरकर’ का विमर्श खड़ा किया जा रहा है।

भगत सिंह को वामपंथी/नास्तिक और सावरकर को हिन्दुत्व का झंडा पकड़ाकर आमने-सामने खड़ा कर दिया जाता है। बड़े-बड़े संपादक और स्तम्भकार खुले आम झूठ बोलते नज़र आते हैं कि भगत सिंह की फाँसी पर सावरकर ने दो शब्द नहीं लिखे, जबकि सच ये है कि रत्नागिरी में नज़रबंद रहते हुए भी सावरकर ने भगत सिंह और राजगुरू के लिए कविता लिखी, जो उन दिनों महाऱाष्ट्र में होने वाली प्रभात फेरियों में गाई जाती थी।

जिसकी शुरूआती पंक्ति है –

हा भगतसिंग, हाय हा
(Woe is me, oh Bhagat Singh, oh)
जाशि आजि, फांशी आम्हांस्तवचि वीरा, हाय हा!
(For us today to the gallows you go)
राजगुरू तूं, हाय हा!
(Woe is me, oh Rajguru, oh!)
राष्ट्र समरी, वीर कुमरा पडसि झुंजत, हाय हा!
(O Brave One, battling in the national war you go!)

एक और झूठ जो सावरकर के नाम से परोसा जाता है वो ये है कि सब से पहले देश के विभाजन की बात सावरकर ने 1937 में की थी। जबकि, सच ये है कि 1933 के तीसरे गोलमेज़ सम्मेलन में ही चौधरी रहमत अली ‘Pakistan Declaration’ के पर्चे बाँट रहे थे।

1937 से पहले दर्जन बार कई नेता इस तरह की बातें कर चुके थे लेकिन बड़ी होशियारी से देश के विभाजन की त्रासदी के जवाबदेही को कॉन्ग्रेस और मुस्लिम लीग के खाते से निकाल कर सावरकर के हिस्से में डालने की कोशिश की जाती रही हैं।

एक कवि, विचारक, क्रांतिकारी, राजनेता, भाषाविद के तौर पर वीर सावरकर का जीवन इतना बड़ा है कि एक लेख में उनके हर पहलू पर बात नहीं की जा सकती। उनके हर विचार से आप सहमत हो ये जरूरी नहीं। बहुत सारे लोग गाँधी जी से या भीमराव अंबेडकर से किसी भी दूसरे नेता से कई मुद्दे पर सहमत नहीं होते, लेकिन इसका ये अर्थ नहीं कि उनके त्याग और समर्पण को हम उपहास और अपशब्द का विषय बना दें।

कॉन्ग्रेस अपनी राजनीतिक लड़ाई अपने दम पर लड़े लेकिन अगर उसे लगता इतिहास के किसी महापुरुष का अपमान करके वो अपना कद ऊँचा कर रही है तो ये उसकी भूल है। क्योंकि कीचड़ अगर सामने से फेंका गया तो कॉन्ग्रेस संभाल नहीं पाएगी।

लेखक: अविनाश त्रिपाठी

श्रमिक ट्रेनों में 31 नवजात शिशुओं की गूँजी किलकारियाँ: यात्रा के साथ चल रहा है जीवन चक्र

कोरोना वायरस का प्रसार रोकने के लिए लॉकडाउन के बाद लाखों प्रवासी मजदूरों को उनके गृहराज्य भेजने की समस्या सरकार के सामने एक चुनौती बनकर उभरी। इसके समाधान हेतु सरकार ने श्रमिक ट्रेनें शुरू की, ताकि गरीब मजदूरों को उनके घर भेजा जा सके। इन ट्रेनों के चलने के बाद खट्टी-मीठी कुछ ऐसी कहानियाँ सामने आई, जिन्हें मजदूरों ने घर पहुँचने के बाद नहीं, बल्कि सफर के बीच अनुभव किया।

ऑपइंडिया को प्राप्त सूचना के अनुसार, श्रमिक ट्रेनों में गृहराज्य जाने के रास्ते में 31 नवजात शिशुओं ने जन्म लिया। सबसे शुरुआती मामला 10 मई 2020 का है। इस दिन केतकी सिंह नाम की महिला सूरत से प्रयागराज लौट रही थीं। सफर के दौरान बीच रास्ते में ही उन्हें प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। उन्होंने सतना में आरपीएफ की देखरेख में बच्चे को जन्म दिया। 

यात्रा के दौरान माँ ने दिया नवजात को जन्म

इसी प्रकार, 18 मई को 21 वर्षीय एक महिला ने कटिहार में मेडिकल टीम और रेलवे प्रशासन की देखरेख में अपने बच्चे को जन्म दिया और फिर अपने स्वस्थ बालक के साथ घर रवाना हुई।

इसी दिन नीतू देवी ने उत्तर प्रदेश लौटते हुए अपनी बेटी को जन्म दिया। जब मेडिकल टीम ने जच्चा-बच्चा दोनों की जाँच की तो दोनों स्वस्थ पाए गए। इसके बाद महिला को भी उसके घर लौटने की अनुमति दे दी गई।

ऐसे ही अनेकों मामले आए, जब बच्चे को जन्म देते ही प्रसूति ने अपने आगे के सफर को जारी रखने के लिए जोर दिया और अपनी व अपने बच्चे की देखरेख अपने गृहराज्य में करने की बात कही।

अब चूँकि, किसी भी प्रसूति के लिए नवजात के साथ एक सफर तय करना मुश्किल काम है। इसलिए इन माताओं को प्रशासन की ओर से पर्याप्त सुविधाएँ प्रदान की गईं।

नवजात के साथ माता-पिता

इस यात्रा के बीच एक ओर जहाँ कई महिलाओं ने स्वस्थ बच्चों को जन्म दिया और खुशी के साथ घर की ओर आगे बढ़ीं। वहीं, कुछ गर्भवती महिलाओं को अपूरणीय क्षति भी हुई।

मसलन 17 मई को एक महिला ने गोरखपुर जाते हुए अपने जुड़वा बच्चों को खो दिया। जानकारी के मुताबिक, महिला ने समय से पहले (प्रीमैच्योर) दो बच्चों को जन्म दिया। इनमें से एक तो पहले ही निश्चेष्ट था और दूसरे ने जन्म के बाद आखिरी साँस ली।

एक अन्य दिल दहलाने वाली कहानी में जयपुर से गोरखपुर की ओर यात्रा कर रही महिला के साथ हुआ। उसने जयपुर में ही एक मृत बच्चे को जन्म दिया और फिर उसी बच्चे को लेकर गोरखपुर तक सफर किया। बाद में गोरखपुर पहुँचकर उसे प्रशासन द्वारा अस्पताल भेज दिया गया।

25 मई को एक महिला ने बिहार जाते हुए दो जुड़वा बच्चों को जन्म दिया। मगर, स्वास्थ्य सुविधा मिलने के बाद जब बच्चों को और माँ को सागर जिले के अस्पताल में भर्ती किया गया, तो दोनों शिशुओं ने वहाँ दम तोड़ दिया।

श्रमिक ट्रेन में होने वाली मौतें और फैलाए जा रहे झूठ

कोरोना संकट के दौरान जब हम श्रमिक ट्रेनों में नवजातों के जीवनचक्र पर बात करते हैं, तो इस विवाद को भी नकार नहीं सकते कि श्रमिक ट्रेनों में कई मौतें भी हुई। लेकिन कुछ स्वार्थी लोगों ने सोशल मीडिया पर लापरवाही और भूख-प्यास से मौतें होने का दावा कर इसे गलत तरीके से पेश किया।

मसलन, राणा अयूब ने एक वीडियो शेयर की। इसमें मुजफ्फरपुर स्टेशन पर एक महिला ने अपनी आखिरी साँस ली। अयूब ने दावा किया कि मौत भूख के कारण हुई। मगर, जब ऑपइंडिया ने इसकी पड़ताल की, तो मालूम चला कि महिला काफी समय से बीमार थी और ट्रेन में सफर के दौरान उसकी मृत्यु हो गई।

इस मामले में रेलवे सुरक्षा बल के प्रभारी निरीक्षक और डिप्टी एसपी मुख्यालय जीआरपी मुजफ्फरपुर, श्री रमाकांत उपाध्याय को ट्रेन में महिला की मृत्यु के बारे में सूचित किया गया था। स्टेशन प्रभारी से अनुमति मिलने के बाद, मृतक के शव को मुजफ्फरपुर रेलवे स्टेशन पर छोड़ दिया गया था और बाद में मुजफ्फरपुर रेलवे डिवीजन के डॉक्टर द्वारा उसकी जाँच की गई थी।

इसके बाद एक और फर्जी खबर, जो कि 4 साल के बच्चे की मृत्यु को लेकर फैलाई गई। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में बताया या कि 4 साल के मोहम्मद इरशाद, जो मुजफ्फरपुर से बेतिया के लिए ट्रेन में सवार हुआ था, उसकी मौत रेलवे की ओर से लापरवाही बरतने के कारण हुई।

जबकि रेलवे ने अपने स्पष्टीकरण में ये बताया कि बच्चा पहले से बीमार था और दिल्ली से इलाज के बाद लौटा था। इसलिए बच्चे की मृत्यु का कारण पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ही सामने आएगा।

इसी प्रकार 27 मई 2020 को जागरण ने एक रिपोर्ट छापी। इस रिपोर्ट में दावा किया गया कि श्रमिक ट्रेन में रेलवे की लापरवाही के कारण 4 लोगों की मौत हो गई। इस रिपोर्ट में ये भी बताया गया कि प्रवासी मजदूरों को श्रमिक एक्सप्रेस में भोजन व पानी नहीं मिला।

बाद में कारवाँ इंडिया ने भी इसी तरह का झूठ फैलाया। अपनी रिपोर्ट में द कारवाँ ने आरोप लगाया कि 10 प्रवासी मजदूरों की मौत श्रमिक ट्रेन में भूख से तड़पकर हुई। जिसके कारण द कारवाँ को तथ्यों के साथ फटकार भी लगाई गई।

बता दें, फिलहाल, भारतीय रेलवे का भ्रामक रिपोर्टों पर यही कहना है कि श्रमिक एक्सप्रेस में बीमारियों के कारण लोगों की मौतें हुई हैं। उन्होंने फर्जी और बेबुनियादी खबरें फैलाने वालों के ख़िलाफ़ ट्विटर पर ट्वीट करके खबर दी है।

रेलवे ने स्पष्ट किया कि हर जरूरतमंद पैसेंजर को आपातकाल की स्थिति में आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध करवाई जा रही हैं। मगर, इनमें से खाना और पानी सभी यात्रियों के लिए है।

उल्लेखनीय है कि जब हम इस तरह की घटनाओं को अलग से साझा करते हैं, उस समय गलत धारणा बनना निश्चित होता है। यात्रा के दौरान जन्म और मृत्यु उन लोगों के लिए एक सामान्य घटना है, जो प्रतिदिन भारत में ट्रेनों में सफर करते हैं।

आमतौर पर माना जाता है कि लगभग 1 करोड़ लोग प्रतिदिन लंबी दूरी की यात्रा करते हैं। लंबी दूरी की ट्रेन यात्रा के औसत समय और 7.234% की राष्ट्रीय मृत्यु दर के हिसाब के बाद परंपरागत ढंग से भारत में प्रतिदिन यात्रा के दौरान दो दर्जन से अधिक लोग अंतिम साँस लेते हैं।

जब ऑपइंडिया ने रेल मंत्रालय से अपने इन अनुमानों के बारे में बात की, तो उन्होंने हमारे अनुमानों की पुष्टि की और बताया कि यह सटीक है। उन्होंने कहा कि ऐसी मौतें दुर्भाग्यपूर्ण हैं, लेकिन इस मामले में रेलवे भी बहुत ज्यादा नहीं कर सकता, क्योंकि यह संभावना और जीवन चक्र का मामला है।

इसलिए, हमें ये समझने की जरूरत है कि इस मुश्किल घड़ी में जितना दुखदाई उन मौतों की संख्या है, उतनी ही दुखदाई ये बात भी है कि इन मौतें के नाम पर एजेंडा चलाने के लिए पूरे मामले को स्पिन करके रेलवे पर ‘लापरवाही’ पर आरोप मढ़ा जा रहा है। वास्तविकता ये है कि मृत्यु की जगह किसी की लापरवाही को उजागर नहीं करती, खासकर तब जब एक वर्ग केवल माहौल भड़काने के लिए इस बिंदु पर अपना एजेंडा चला रहा है।

नोट: ऑपइंडिया अंग्रेजी की संपादक नुपुर शर्मा का यह मूल लेख अंग्रेजी में यहॉं पढ़ा जा सकता है।

‘हम पाकिस्तानी, पाकिस्तान का हिस्सा हो कश्मीर’: AMU के शाकिब और शेख ने किया देश विरोधी पोस्ट, FIR

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) आ​ए दिन गलत वजहों से सुर्खियों में रहता है। अब यहॉं के दो छात्रों पर देश विरोधी बातें करने को लेकर एफआईआर दर्ज कराई गई है। इनके नाम शाकिब रसूल भट्ट और शेख अरफात हैं।

दोनों ने ईद के मौके पर सोशल मीडिया में भारत विरोधी और पाकिस्तान के समर्थन में टिप्पणियॉं की। इसको लेकर हिंदूवादी नेता दीपक शर्मा ने अतरौली थाना में तहरीर देते हुए दोनों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की है।

दीपक शर्मा ने अपनी शिकायत में कहा है कि AMU के छात्र शेख अरफ़ात और रसूल भट्ट ने फेसबुक पेज पर पाकिस्तान को अपना मुल्क बताते हुए पोस्ट शेयर की है। पाकिस्तान की ईद मनाने की इच्छा व्यक्त करते हुए भारतीय मुस्लिमों का ध्रुवीकरण करने का प्रयास किया गया। साथ ही कश्मीर का पाकिस्तान का हिस्सा बनने की ख्वाहिश जताई।

उन्होंने आगे कहा कि ऐसे लोगों के अंदर पनप रहे पाकिस्तान प्रेम से करोड़ों भारतीयों की भावनाएँ आहत होती है। ऐसे लोगों को जल्द से जल्द सलाखों के पीछे डाल देना चाहिए, जिससे अन्य कोई देश विरोधी बात न कर सके।

हिंदूवादी नेता दीपक शर्मा आजाद के एफआईआर पर पुलिस ने दोनों छात्रों के खिलाफ धारा 153-A,153- B, सूचना प्रौद्योगिकी संशोधन अधिनियम 2008 और 66-D के तहत मुकदमा दर्ज कर मामले की जाँच शुरू कर दी है।

इससे पहले भी एएमयू में पढ़ रहे जम्मू-कश्मीर के छात्र बसीम हिलाल ने आतंकियों द्वारा पुलवामा हमले में सेना के 42 जवान शहीद और दर्जनों के घायल होने पर, अपने ट्विटर पर “How’s the Jaish” लिखा था। देश के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक ट्वीट करने के आरोप में उस पर मामला दर्ज भी हुआ था।

पिछले दिनों एएमयू में हिंदू छात्रों को निशाना बनाए जाने की घटना भी सामने आई थी। शोध छात्र निखिल माहेश्वरी ने ऑपइंडिया को बताया था कि उन्होंने सोशल मीडिया पर 4 मई को एक व्यंगात्मक पोस्ट की थी। इसके बाद से ही कट्टरपंथी छात्रों ने उनको और उनके परिवार को निशाने पर ले लिया। उनके स्क्रीनशॉट लेकर सोशल मीडिया पर गाली-गलौच की और उनको तथा उनके परिवार को जान से मारने की धमकी दी।

वहीं नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ गोरखपुर के डॉ. कफील द्वारा भी 12 दिसंबर को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में भड़काऊ भाषण दिया गया था। इसके बाद उनके खिलाफ अलीगढ़ के सिविल लाइन्स पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धारा 153-A के तहत केस दर्ज कर गिरफ्तारी भी किया गया था।

पुलवामा में ऐसे किया गया बड़ा आतंकी हमला नाकाम, बम से लदे कार को सेना ने उड़ाया

पुलवामा में 27-28 मई 2020 को एक बड़े आतंकी हमले की साजिश को नाकाम कर दिया गया। सुरक्षाबलों ने पुलवामा के पास एक सैंट्रो गाड़ी की पहचान की। इसमें IED (इंप्रोवाइज्ड एक्स्प्लोसिव डिवाइस) प्लांट की गई थी।

सुरक्षाबलों को इस बात की सूचना मिली थी कि एक कार (सैंट्रो) में करीब 20 किलो विस्फोटक है और उसे कहीं लेकर जाया जा रहा है। सूचना के आधार पर सुरक्षाबलों ने कार को घेर लिया। लेकिन कार के भीतर से गोलीबारी शुरू हो गई। गोलीबारी के बीच इस दौरान अंधेरे का फायदा उठाकर आतंकी भाग निकले। जब कार की तलाशी ली गई तो इसमें IED का पता चला।

सैंट्रो को पुलवामा के रजपुरा रोड के पास शादीपुरा में पकड़ा गया। बम डिस्पोजल स्क्वायड ने समय रहते ही इसे डिफ्यूज कर दिया। इस पूरे मामले की जाँच अब एनआईए करेगी।

आतंकियों के कार से भागने से लेकर उसे सुबह तक निगरानी में रखा गया। किसी अनहोनी की संभावना को देखते हुए आस-पास से इलाके को खाली करा दिया गया था। बम-निरोधक दस्ता जब आया तो इस कार को कंट्रोल्ड एक्सप्लोजन के जरिए विस्फोट किया गया। ऊपर के वीडियो में आप इस बम की क्षमता और इसकी विस्फोटक तीव्रता को देख सकते हैं।