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‘नीच’ कॉन्ग्रेस ने लड़की के साथ मोदी की तस्वीर लगाई, लिखा ऐशो-आराम की ज़िंदगी में मस्त… जानिए सच

कॉन्ग्रेस ने अपने ट्विटर एकाउंट से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फोटो झूठे दावे के साथ शेयर की है। कॉन्ग्रेस ने PM मोदी की फोटो शेयर करते हुए लिखा है – “ऐशो-आराम की जिंदगी।”

कॉन्ग्रेस ने अपने ट्विटर एकाउंट से एक भावुक किन्तु फर्जी वीडियो शेयर किया है, जिसमें यह साबित करने का प्रयास किया गया है कि सरकार किसान की आवाज नहीं सुनती और ‘ऐशो-आराम की जिन्दगी में मस्त’ है।

वीडियो के साथ कैप्शन लिखा है – “बहरी है सरकार, आओ उस तक आवाज़ पहुँचाएँ। होकर एकजुट, उसे हिंद की ताकत दिखलाएँ।” #SpeakUpIndia

लेकिन इस वीडियो में कॉन्ग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उस तस्वीर का इस्तेमाल किया है, जो अप्रैल, 2016 मैडम तुसाद में नरेन्द्र मोदी की प्रतिमा के लिए ली गई थी। लेकिन, कॉन्ग्रेस ने अपने भावुक वीडियो में इसे इस्तेमाल कर यह भ्रामक संदेश देने का काम किया है कि पीएम मोदी कोरोना वायरस के समय किसी आलिशान सैलून में अपने बाल बनवा रहे हैं।

कॉन्ग्रेस का PM मोदी की तस्वीर के साथ भ्रामक दावा यह साबित करता है कि वह सरकार विरोधी षड्यंत्र में किसी भी स्तर तक गिरने को राजी है।

यह तस्वीर उस समय की है, जब मैडम तुसाद के आर्टिस्ट दिल्ली आए थे और उन्होंने पीएम मोदी से कई मुलाकातें की थीं। म्यूजियम के कारीगरों ने पीएम मोदी के शरीर का नाप भी लिया था। मैडम तुसाद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रतिमा क्रीम कलर के कुर्ते पायजामे में हाथ जोड़े हुए है।

PM मोदी की इस तस्वीर को लेकर कई बार ऐसी फेक खबरें भी चलाई गई हैं, जिनमें दावा किया गया था कि नरेन्द्र मोदी ने 15 लाख रुपए में एक मेकअप आर्टिस्ट को हायर किया है। हालाँकि, यह खबर भी कॉन्ग्रेस के वीडियो में किए गए दावे के जितनी ही झूठी थी। ख़ास बात यह है कि तब भी ऐसे फर्जी अफवाहें कॉन्ग्रेस के समर्थक फेसबुक पेज ही चला रहे थे।

कोरोना वायरस के दौरान जारी लॉकडाउन में कॉन्ग्रेस और उनका मीडिया तन्त्र हर प्रकार की भ्रामक और फर्जी खबरें प्रकाशित करता नजर आ रहा है। कोई भी दिन ऐसा नहीं है जब कॉन्ग्रेस या फिर उनके द्वारा पोषित मीडिया ने केंद्र सरकार के खिलाफ फर्जी खबरों से दुष्प्रचार करने का काम ना किया हो।

दिल्‍ली के अस्पताल में ढेर बनाकर रखी जा रही लाशें, शवदाह गृह से लौटाए जा रहे शव: 6 में से काम कर रहीं सिर्फ 2 भट्टियाँ

दिल्‍ली के निगमबोध शवदाह गृह से 8 शवों को वापस अस्‍पताल लौटा दिया गया क्‍योंकि वहाँ पर और शवों के अंतिम संस्‍कार के पर्याप्त साधन मौजूद नहीं थे। दिल्ली स्थित निगमबोध घाट पर शवों के अंतिम संस्‍कार के लिए 6 सीएनजी भट्टियाँ हैं, जिनमें से सिर्फ 2 ही काम कर रही हैं।

हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली लोक नायक अस्पताल के कोरोना वायरस शवगृह के अंदर, 108 शव मौजूद हैं। पोस्टमॉर्टम हाउस के अधिकारियों का कहना है कि वहाँ शवों के सभी 80 भंडारण रैक पूरी तरह भरे हुए हैं और फर्श पर 28 शव एक-दूसरे के ऊपर ढेर लगाकर रखे हुए हैं।

निगमबोध घाट इलेक्ट्रिक शवदाह गृह की छह सीएनजी भट्टियों में से तीन सोमवार तक काम कर रही थीं मगर उनमें से एक उसी रात खराब हो गई। श्मशान के एक अधिकारी ने बताया कि वो अधिक बोझ नहीं ले सके और इसलिए शव वापस लौटा दिए। मंगलवार को अतिरिक्त घंटे काम करने के बाद भी वो सिर्फ 15 शवों को स्वीकार कर सके।

मंगलवार को, आठ शवों को निगमबोध घाट सीएनजी श्मशान से लौटा दिया गया था क्योंकि यह अब और अधिक शवों को रखने की स्थिति में नहीं थी। इसकी छह भट्टियों में से केवल दो ही काम कर रही थीं।

उल्‍लेखनीय है कि दिल्ली स्थित लोकनायक अस्‍पताल दिल्‍ली में कोरोना के इलाज का सबसे बड़ा अस्‍पताल है। इसके पोस्‍टमॉर्टम हाउस में सिर्फ उन लोगों के शव रखे गए हैं, जिनकी मौत कोरोना वायरस से हुई है या जिनके द्वारा कोरोना वायरस संक्रमण की आशंका है। शवों को पीपीई किट में लपेट कर रखा गया है और जो मेडिकल स्टाफ ड्यूटी पर लगे हैं वो भी पीपीई किट पहनकर ही काम कर रहे हैं।

बुधवार (मई 27, 2020) को दिल्ली में कोरोना वायरस के 792 नए मामलों की पुष्टि हुई है। राजधानी दिल्ली में आज कोरोना वायरस के मरीजों की कुल संख्या बढ़कर 15,257 तक पहुँच गई है। इस बीच 15 लोगों की मौत हुई और दिल्ली में मौत का आँकड़ा 303 हो गया।

पूरे देशभर की यदि बात करें तो केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, पिछले 24 घंटे में देशभर में कोरोना वायरस संक्रमण के 6,566 नए मामले सामने आए हैं और 194 लोगों की मौत हुई है। इसके बाद देशभर में कोरोना पॉजिटिव मामलों की कुल संख्या 1,58,333 हो गई है, जिनमें से 4,531 लोगों की अब तक मौत हो चुकी है।

वहीं, राजस्थान स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, राज्य में आज सुबह 10.30 बजे तक कोरोना पॉजिटिव के 131 नए मामले सामने आए हैं, छह लोगों की मौत हुई है और चार लोग ठीक हुए हैं।

नहीं रहे 26/11 के हीरो हरिश्चंद्र श्रीवर्धानकर: कसाब को पहचाना था, आतंकी इस्माइल को ऑफिस बैग से मारा था

हरिश्चंद्र श्रीवर्धानकर का कल (27 मई 2020) को ठाणे जिले के कल्याण स्थित उनके आवास पर निधन हो गया। वे 70 साल के थे। मुंबई के 26/11 हमले में जिंदा पकड़े गए आतंकी अजमल कसाब की अदालत में पहचान करने वाले वे मुख्य गवाह थे।

श्रीवर्धनकर मूल रूप से कोंकण के हरिहरेश्वर के रहने वाले थे। वह खाद्य और नागरिक आपूर्ति विभाग के सेवानिवृत्त कर्मचारी थे। उनके परिवार में पत्नी, दो पुत्र, दो पुत्री और एक बहू है।

26 नवंबर 2008 को मुंबई में जब पाकिस्तान से आए दस आतंकियों ने हमला किया था तो हरिश्चंद्र को दो गोलियॉं लगी थी। उन्हें कामा अस्पताल के निकट कसाब और उसके साथी अबू इस्माइल ने गोली मारी थी। उन्होंने अपने ऑफिस बैग से इस्माइल को मारा भी था।

सूत्रों ने बताया, ‘‘मंगलवार की रात उनका निधन हो गया।’’ हरिश्चंद्र पहले ऐसे गवाह थे जिन्होंने विशेष अदालत के समक्ष कसाब की पहचान की थी और उसके खिलाफ गवाही दी थी। कसाब एकमात्र आतंकवादी था जिसे जिंदा पकड़ा गया था और 21 नवंबर 2012 को पुणे की यरवदा जेल में उसे फांसी पर लटकाया गया था।”

कुछ दिनों पहले श्रीवर्धनकर को असहाय अवस्था में रास्ते में पाया गया था। वह बीमार थे। गरीबी से लाचार उनके परिवार वाले उनका इलाज नहीं करा पा रहे थे। सूत्रों के मुताबिक पूर्व सीएम देवेंद्र फडणवीस ने कुछ हफ़्ते पहले कल्याण के एक निजी अस्पताल में जाकर श्रीवर्धनकर के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी ली थी। साथ ही उन्होंने भाजपा की तरफ से श्रीवर्धनकर के परिवार को 10 लाख रुपए प्रदान करने की घोषणा भी की थी।

हल्के में ले रहा था चीन अब बातचीत पर उतरा, डोभाल-जयशंकर-रावत की तिकड़ी से खाया मात

चीनी सेना द्वारा वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर सड़क और अन्य निर्माण को लेकर भारत के आक्रामक रुख ने इस बार चीन को कई तरह की चुनौतियाँ दी हैं। और यह मात्र एक संयोग ही माना जा सकता है कि यह सब भारत के पहले प्रधानमंत्री और अक्साई चीन सीमा क्षेत्र विवाद की नींव रखने वाले जवाहरलाल नेहरू की पुण्यतिथि के दौरान घटित हो रहा है।

आखिरकार भारत में चीनी राजदूत सुन वेइदॉन्ग ने अपने बयान में कहा है कि बीजिंग और नई दिल्ली को कभी भी आपसी रिश्तों में अंतर नहीं आने देना चाहिए और बातचीत के माध्यम से उन्हें हल करना चाहिए। NSA अजीत डोभाल, विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर और सीडीएस बिपिन रावत के लिए यह एक बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा सकती है कि कम्युनिस्ट सत्ता वाला तानाशाही देश चीन बातचीत के माध्यम से विवादों को खत्म करना चाहता है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन की सेना के बढ़ते दुस्साहस के कारण भारत की ओर से यह दिन-रात का रेस्क्यू ऑपरेशन था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एनएसए द्वारा सभी घटनाक्रमों के बारे में अपडेट रखा गया था। इस दौरान विदेश मंत्री जयशंकर ने चीनी दूत के साथ व्यक्तिगत संबंधों का भी लाभ उठाया, जिन्होंने 2009 से 2013 तक बीजिंग में भारत के राजदूत के रूप में तैनात होने पर एक्सटर्नल अफेयर्स मंत्रालय के साथ मिलकर काम किया था।

ट्रम्प ने कल सुबह ही ट्वीट करते हुए लिखा, “हमने भारत और चीन दोनों को सूचित किया है कि अमेरिका उनके इस समय जोर पकड़ रहे सीमा विवाद में मध्यस्थता करने के लिए तैयार, इच्छुक और सक्षम है।”

वास्तव में जब भी डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत के मामलों में ऐसी किसी मध्यस्थता की पहल की बात सामने रखी है, उसके कुछ ही पलों बाद भारत में मोदी सरकार ने कोई ना कोई ऐसा बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया है, जो बिना किसी आक्रामक कूटनीति और स्पष्ट दिशा-निर्देश के सम्भव नहीं माना जा सकता था। इसमें जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निष्क्रिय करने से लेकर पाकिस्तान पर की गई एयर स्ट्राइक जैसे फैसले महत्वपूर्ण हैं।

ये कुछ कदम मोदी सरकार ने अन्य देशों की मध्यस्थता की माँग को ठुकराकर लिए हैं और यह संदेश दिया है कि भारत अब इतना सक्षम और शक्तिशाली है कि वह अपने भाग्य का फैसला स्वयं करना जनता है। वरना एक समय यहाँ ऐसे भी नेता रहे, जिन्हें भारत की जनता के भाग्य को ब्रिटिश शासक, उनके वायसराय और बाद में संयुक्त राष्ट्र की मेहरबानी पर छोड़ देने में ही भलाई नजर आती थी।

पूर्वी लद्दाख में सीमा तनाव के अलावा, भारत और चीन की सेनाएँ तकरीबन पिछले एक माह से ही उत्तरी सिक्किम में आमने-सामने थे। चीन द्वारा सफेद झंडे दिखाने के पीछे भारत सरकार और सेना का आक्रामक रवैया ही सबसे बड़ी वजह माना जा सकता है। कल ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत और चीन के बीच जारी विवाद में मध्यस्थता की पेशकश की थी।

भारत और चीन के बीच करीब 3,500 किलोमीटर लंबी सीमा है, जिसे वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) कहते हैं। एलएसी पर लद्दाख और उत्तरी सिक्किम में अनेक क्षेत्रों में चीन की सेना ने हाल ही में सैन्य ठिकानों का निर्माण किया है। चीन एक लंबे समय से ही उस क्षेत्र में सड़क का निर्माण कर रहा था, ताकि जरूरत पड़ने पर सेना तेजी से मोर्चे पर पहुँचाई जा सके।

शुरुआती दौर में चीन ने पश्चिमी राजमार्ग का प्रयोग अपने सैनिकों को भेजने के लिए किया। चीन की सेना निर्माण कार्य में प्रयोग होने वाले भारी वाहनों जैसे ट्रकों के जरिए अपने सैनिकों को वहाँ चुपचाप तैनात कर रहा था।

कोरोना वायरस, ताईवान, हॉन्गकॉन्ग और दक्षिण चीन सागर को लेकर हर और से बैकफुट पर खड़ा चीन भारत को अपना रुख ढीला करने पर मजबूर कर दुनिया को अपने वर्चस्व का संकेत देना चाहता था। उसने नेपाल से लेकर अपने प्राचीन मित्र पाकिस्तान तक का सहारा भी लिया। लेकिन चीन के हाथ सिर्फ और सिर्फ फजीहत ही लगी है।

नेहरू की देन है अक्साई चीन विवाद

एक समय था जब संसद में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि लद्दाख के अक्साई चिन क्षेत्र के कुछ हजार वर्ग किलोमीटर के बंजर भू-भाग पर चीन ने कब्जा कर लिया है, लेकिन इसके लिए कोई चिंता की बात नहीं है क्योंकि वहाँ घास तक पैदा नहीं होती। यही नहीं, नेहरू ने यहाँ तक बयान दिया था कि हमें तो पता भी नहीं कि वो आखिर है कहाँ?

इसमें कोई शक नहीं कई चीन आज भी भारतीय नेतृत्व में नेहरू के उसी बयान की झाला का अंदाजा लगाकर अपने सैन्य अभियानों को चला रहा था। लेकिन नतीजा यह हुआ है कि अपनी उग्र, शत्रुपूर्ण रवैए के लिए मशहूर चीन को पीछे हटकर बातचीत का सहारा लेना जरुरी समझा है।

जब अंग्रेज सावरकर को कोल्हू में बैल की जगह जोतते थे, जब गाँधी अफ्रीका से भारत लौटे भी नहीं थे: कहानी कालापानी की

विनायक दामोदर सावरकर, यानी वीर सावरकर। ये महज एक नाम नहीं है बल्कि संघर्ष की एक ऐसी गाथा है, जिसका वर्णन शब्दों से परे है। जिस व्यक्ति ने एक दशक से भी ज्यादा समय तक कालापानी की सज़ा भुगती, आज उसे अपमानित किया जाता है। जिसने रानी लक्ष्मीबाई, पेशवा नाना और वीर कुँवर सिंह जैसों की वीरता को दुनिया के सामने लाया, उसके योगदानों पर हँसा जाता है। क्यों? क्योंकि वो एक हिन्दू राष्ट्रवादी थे।

क्या होता है कालापानी? क्या आपके जेहन में किसी भी अन्य स्वतंत्रता सेनानी का नाम आता है, जिन्होंने कालापानी की सज़ा इतने लम्बे वक़्त तक भुगती हो? या फिर किसी ऐसे ही नेता का नाम, जिन्होंने कालापानी की सज़ा भुगती हो। दिमाग पर जोर डालना पड़ेगा। खोजना पड़ेगा। आज़ादी में नेहरू और गाँधी का भी योगदान था लेकिन उन्हें कभी कालापानी नहीं हुई। कालापानी मतलब यातना। कालापानी मतलब नरक। कालापानी मतलब क्रूर अत्याचार। कालापानी मतलब 24 घंटे त्रासदी वाला जीवन। क्या ये सबके वश की बात थी?

कालापानी में कक्ष कारागारों को सेल्युलर जेल कहा जाता था। वहाँ कड़ा पुलिस पहरा रहता था। सावरकर अपनी पुस्तक ‘काला पानी’ में इस नारकीय यातना का वर्णन करते हैं। 750 कोठरियाँ, जिनमें बंद होते ही कैदी के दिलोदिमाग पर घुप्प अँधेरा छा जाता था। अंडमान के सुन्दर द्वीप पर ये अंग्रेजों का नरक था। यद्यपि ‘काला पानी’ एक गद्य उपन्यास की तरह है, जिसे सावरकर ने अपनी जीवनी के रूप में नहीं लिखा है और इसके तमाम पात्र भी काल्पनिक हैं, लेकिन यातनाओं और जेल का जो विवरण है, वो समझने वाले समझ जाते हैं कि सत्य है।

इस पुस्तक के बारे में कहा जाता है कि इस पर फ़िल्म बनाने के लिए सावरकर के पास ऑफर आया था। उनके निजी सचिव बाल सावरकर लिखते हैं कि सुधीर फड़के इस पर फिल्म बनाना चाहते थे लेकिन उनकी माँग थी कि रफीउद्दीन नामक किरदार को बदल दिया जाए और उसकी जगह किसी हिन्दू पात्र को दे दी जाए। सावरकर को ये स्वीकार्य नहीं था। उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि वो इस तरह एक दूसरे मजहब के किरदार का नाम हिन्दू का करने की अनुमति कभी नहीं दे सकते।

सावरकर ने कह दिया कि अगर उन लोगों को समुदाय विशेष को शिष्ट और साधु प्रवृत्ति का दिखाने की इतनी ही हूल मची है तो कोई एक नया किरदार गढ़ लें लेकिन वो इस तरह से पहले से बने हुए किरदार के नाम में परिवर्तन की अनुमति नहीं देंगे। आज भी बॉलीवुड का यही ट्रेंड है। समुदाय विशेष के किरदार को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया जाता है। उन्हें एक इमानदार दोस्त, त्यागी व्यक्ति और भोले-भाले इंसानों के रूप में चित्रित किया जाता है जबकि पंडितों को चुंगला, बातें इधर-उधर करने वाला और शोषणकर्ता के रूप में दिखाया जाता है।

वीर सावरकर ने जिक्र किया है कि किस तरह वहाँ इंसानों को जानवरों से भी बदतर समझा जाता था। अंग्रेज उन्हें कोल्हू के बैल की जगह जोत देते थे। पाँव से चलने वाले कोल्हू में एक बड़ा सा डंडा लगा कर उसके दोनों तरफ दो आदमियों को लगाया जाता था और उनसे दिन भर काम करवाया जाता था। जो काम बैलों का था, वो इंसानों से कराए जाते थे। जो टालमटोल करते, उन्हें तेल का कोटा दे दिया जाता था और ये जब तक पूरा नहीं होता था, उन्हें रात का भोजन भी नहीं दिया जाता था। उन्हें हाँकने के लिए वार्डरों तक की नियुक्ति की गई थी।

सावरकर जहाँ भी जाते थे, वहाँ उनके ‘अपने लोग’ मिल ही जाते थे। इसी तरह अंडमान में ही कुछ ऐसे वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी रह रहे थे, जो 1857 के युद्ध में अपने रोल के कारण यहाँ बंद थे। ये ऐसे लोग थे, जो बुढ़ापे तक सज़ा काटने के बाद वहीं बस गए थे। ऐसे देशभक्तों ने सावरकर से संपर्क किया था और उन लोगों की बातचीत होते रहती थी। उनके अनुभवों से सावरकर ने कई चीजें सीखीं। तभी उन्होंने अंडमान में कागज़-कलम न मिलने पर दीवारों पर कीलों, काँटों और अपने नाखूनों तक से साहित्य रचे। कई पंक्तियों को कंठस्थ किया और आमजनों तक पहुँचाया।

भले ही ‘काला पानी’ में सावरकर ने काल्पनिक पात्र गढ़ें हों लेकिन वो सभी वास्तविक पात्रों से ही प्रेरित थे। उनके नाम बदले हुए थे। अंडमान में कई छँटे हुए बदमाश भी थे, जिनका जिक्र किया गया है। सावरकर अपनी एक अन्य पुस्तक ‘मेरा आजीवन कारावास‘ में लिखते हैं कि उन्हें भी कोल्हू के बैल का काम दिया गया था। उससे पहले उनसे छिलका कूटवाने का काम लिया जाता था। अचानक एक दिन अंग्रेजों ने कहा कि ये करते-करते उनके हाथ कठोर हो गए होंगे, इसीलिए अब उन्हें कोल्हू वाला काम दिया जा रहा है।

सिर चकराता था। लंगोटी पहन कर कोल्हू में काम लिया जाता था। वो भी दिन भर। शरीर इतना थका होता था कि उनकी रातें करवट बदलते-बदलते कटती थी। अन्य बंदीगण सावरकर से प्रेम करने लगे थे, इसीलिए वो आकर उनकी मदद कर देते थे। उनके कपड़े तक धो देते थे और बर्तन माँज देते थे। सावरकर के रोकने के बाद वो मिन्नतें करने लगते थे, जिसके बाद सावरकर ने उन्हें मना करना छोड़ दिया क्योंकि उन बंदियों को इसमें ही ख़ुशी होती थी। धीरे-धीरे यातनाएँ और भी असह्य होती चली गईं।

स्थिति ये आ गई कि सावरकर को आत्महत्या करने की इच्छा होती। इतनी भयंकर यातनाएँ दी जातीं और वहाँ से निकलने का कोई मार्ग था नहीं, भविष्य अंधकारमय लगता- जिससे वो सोचते रहते कि वो फिर देश के किसी काम आ पाएँगे भी या नहीं। एक बार कोल्हू पेरते-पेरते उन्हें चक्कर आ गया और फिर उन्हें आत्महत्या का ख्याल आया। सावरकर लिखते हैं कि उनके मन और बुद्धि में उस दौरान तीव्र संघर्ष चल रहा था और बुद्धि इसमें हारती हुई दिख रही थी।

सावरकर के बारे में क्या कहते थे वाजपेयी

सावरकर काफी देर तक उस खिड़की को देखते रहते, जहाँ से लटक कर पहले भी कैदियों ने आत्महत्या की थी। कई दिनों तक सोचने के बाद उन्होंने निश्चय किया कि अगर मरना ही है तो एक ऐसा कार्य कर के मरें, जिससे लगे कि वो सैनिक हैं। सोच-विचार के बाद उन्होंने न सिर्फ अपने बल्कि कई अन्य कैदियों के मन से भी आत्महत्या का ख्याल निकालने में सफलता पाई। वहाँ उन्होंने कोल्हू पर ही संगठन का काम शुरू किया, बंदियों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया, उन्हें देशप्रेम सिखाया। अंग्रेज उन्हें बाकी बंदियों से दूर रखना चाहते थे। उन्हें बाद में रस्सी बाँटने का काम दे दिया गया था।

वहाँ अंडमान में कई राजबंदी रहा करते थे। सावरकर उनसे जब पहली बार मिले, तभी उन्हें उनके दुखों का अंदाज़ा हो गया था। उन्होंने अंग्रेजों के भय को दरकिनार कर के उनसे सबका परिचय लिया। उसी समय उन्होंने उन सभी से कहा था कि देखना, एक दिन जब भारत आज़ाद होगा तो इसी जेल में हम सबके पुतले लगे होंगे। सावरकर ने कहा-

“आज भले ही पूरे विश्व में हमारा अपमान हो रहा हो लेकिन देखना, एक दिन यही जगह एक तीर्थस्थल बन जाएगा और लोग कहेंगे कि देखों यहाँ हिन्दुस्तानी कैदी रहा करते थे। ऐसा ही होगा। ऐसा होना चाहिए।”

आज वो कमरा किसी तीर्थस्थल से कम नहीं है, जहाँ सावरकर रहा करते थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी वहाँ जाकर काफी देर तक ध्यान धरा था। सेल्युलर जेल में सावरकर की प्रतिमा लगी हुई है। वहाँ लोग जाते ही अभिभूत हो जाते हैं और सावरकर के त्याग को याद करते हैं। पोर्ट ब्लयेर विमानक्षेत्र का नाम ही वीर सावरकर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है। सावरकर का सपना तभी पूर्णतया सच होगा, जब हिन्दुओं के भीतर जाग्रति आएगी और भारत पुनः विश्वगुरु बनेगा। दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी हमेशा कहा करते थे कि हमें सावरकर को ठीक से समझने की ज़रूरत है।

महात्मा गाँधी 1915 में दक्षिण अफ्रीका में 21 वर्ष बीता कर भारत लौटे थे, जिसके बाद उन्होंने कॉन्ग्रेस की सभाओं में दिलचस्पी लेनी शुरू की थी। इसके उलट सावरकर को 1911 में ही सेल्युलर जेल में भेज दिया गया था, जब उनकी उम्र महज 28 वर्ष की थी। गाँधी जब भारत लौटे थे, तब उनकी उम्र 45 वर्ष थी। सावरकर को 50 साल के कारावास की सजा सुनाई गई थी। उससे पहले वो लन्दन में रहे थे। उन्हें वहाँ भी गिरफ्तार किया गया था। आज़ादी के बाद भी उन्हें नेहरू सरकार ने सम्मान नहीं दिया।

सावरकर ने ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ नामक पुस्तक लन्दन में ही गहन अध्ययन कर के लिखा था। वो एक लाइब्रेरी का एक्सेस पाने में कामयाब रहे थे और उन्होंने एक के बाद एक दस्तावेजों का अध्ययन कर के ये साबित किया कि वो प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था, कोई साधारण सिपाही विरोध नहीं। महारानी लक्ष्मीबाई से लेकर पेशवा नाना तक को इतिहास में अमर बनाने का श्रेय सावरकर को भी जाता है, जिन्होंने उन महापुरुषों के बलिदानों के बारे में जनता को अवगत कराया। उनकी किताब को भगत सिंह सहित कई क्रन्तिकारी पढ़ते ही नहीं थे बल्कि उसका अनुवाद भी करते थे।

सावरकर 1960 के दशक में अक्सर अस्वस्थ रहते थे। उससे कई वर्ष पहले 1948 में, जैसा कि हमें पता है, नाथूराम गोडसे ने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हत्या कर दी थी, जिसके बाद सावरकर गिरफ़्तार हुए थे। तब गुस्साई भीड़ ने उनके घर के ऊपर पत्थरबाज़ी की थी। हालाँकि, सावरकर सभी आरोपों से बरी हुए और क़ानून ने उन्हें दोषी नहीं माना। नेहरू सरकार द्वारा आज़ाद भारत में सावरकर को फिर से प्रतिबंधित किया गया, 60 के दशक में भी गिरफ्तार किया गया।

आज ये कह देना बिलकुल आसान है कि सावरकर ने माफ़ी माँगी थी। दरअसल, ये सब इसीलिए किया जाता है ताकि लोग उनका योगदान भूल जाएँ हिंदुत्व की बातें न करें, सावरकर को सम्मान देने में हीन भावना का शिकार हो जाएँ और राष्ट्रवाद के लिए देश में कोई जगह न बचे। ऐसे लोगों को अंडमान की उस कालकोठरी में बंद होकर एक सप्ताह बिताना चाहिए, यातनाएँ सहनी तो दूर की बात है। असल बात तो ये है कि सावकार ने देश के लिए जो सहा, वो सबके बूते की बात नहीं।

अमित शाह की वो एक लाइन… और राजनीति कर रहीं ममता बनर्जी को कहना पड़ा – Thank You

पश्चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी ने एक बार फिर केंद्र सरकार के खिलाफ जहर उगला है। कोरोना वायरस महामारी के बीच पश्चिम बंगाल सरकार की अक्षमता पर गृह मंत्रालय कई बार उन्हें सतर्क कर चुका है, जिससे बौखला कर ममता बनर्जी ने गृह मंत्री अमित शाह को कहा कि उन्हें आकर बंगाल को सम्भालना चाहिए।

बुधवार (मई 27, 2020) को बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कहा – “मैंने अमित शाह से कहा, अगर आपको लगता है कि पश्चिम बंगाल अपने दम पर सब कुछ मैनेज नहीं कर सकता है, तो आप आइए और संभालिए। इस पर अमित शाह ने कहा कि चुनी हुई सरकार को हम कैसे तोड़ सकते हैं। यह कहने के लिए मैं उन्हें धन्यवाद देती हूँ।”

ममता बनर्जी ने बुधवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा- “मैंने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से अपील की है वे स्थिति पर गौर करें। मैं चाहती हूँ कि प्रधानमंत्री इस मामले में हस्‍तक्षेप करें। यह राजनीति करने का समय नहीं है। बिहार समेत बीजेपी शासित अन्‍य राज्‍यों में कोरोना वायरस के केस बढ़ रहे हैं। भारत एक देश है। कोरोना वायरस को फैलने से रोकना चाहिए।”

इसके साथ ही भरतीय रेलवे को निशाना बनाते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि रेलवे प्रवासी श्रमिकों के लिए विशेष रेलगाड़ियाँ अपनी मर्जी और शर्तों पर चला रहा है। इससे कोरोना वायरस के मामले बढ़ेंगे ही। उन्होंने कहा, “मैं नहीं जानती कि रेल मंत्रालय ऐसा क्‍यों कर रहा है। हम दो लाख प्रवासी मजदूरों की जाँच किस तरह करेंगे? क्‍या केंद्र मदद करेगा?”

ममता बनर्जी ने कहा कि बीजेपी उन्हें राजनीतिक रूप से परेशान कर सकती है लेकिन वो राज्य को क्यों नुकसान पहुँचा रहे हैं? साथ ही रेलवे पर आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि आप महाराष्‍ट्र को खाली कर रहे हैं और बंगाल में कोरोना फैला रहे हैं।

केंद्र सरकार से लगातार टकराव कर रही हैं ममता

उल्लेखनीय है कि हाल ही में अम्फान तूफान से हुई भारी तबाही का जायजा लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पश्चिम बंगाल गए थे। उन्होंने हवाई सर्वेक्षण कर प्रभावित इलाकों का जायजा लिया। ममता बनर्जी समेत राज्य अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक की। फिर, हालातों को देखते हुए बंगाल को दोबारा खड़ा करने के लिए ₹1000 करोड़ के राहत पैकेज का ऐलान किया।

पीएम मोदी के इस त्वरित फैसले की तारीफ देश भर में हुई। लेकिन, ममता बनर्जी ने बैठक समाप्त होने के कुछ देर बाद ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिए राहत पैकेज पर सवाल खड़ा कर दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि PM ने 1 हजार करोड़ रुपए का राहत पैकेज घोषित जरूर किया, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि उनके द्वारा दिया गया 1 हजार करोड़ रुपए एडवांस है या पैकेज है।

नए नक्शे पर नेपाल ने संविधान संशोधन टाला, भारतीय इलाके को बताया था अपना हिस्सा

भारत के इलाकों को अपना बताने वाले नक़्शे पर नेपाल ने कदम पीछे हटा लिए हैं। देश के नक्शे में फेरबदल के लिए नेपाल के संविधान में संशोधन किया जाना था। इसके लिए बुधवार (मई 27, 2020) को संसद में प्रस्ताव रखा जाना था। लेकिन अब इस मसले को कार्यसूची से बाहर कर दिया गया है। पार्टियों ने इस मामले पर राष्ट्रीय सहमति बनाने का फैसला किया है।

बताया जा रहा है कि नेपाल सरकार ने आखिरी वक्त पर संसद की कार्यसूची से संविधान संशोधन की कार्यवाही को हटा दिया। नेपाल में नए नक्शे को अपडेट करने को संविधान में संशोधन करने लिए निर्धारित बैठक टाल दी गई है।

इसके साथ ही नेपाल की प्रतिनिधि सभा में संशोधन के लिए संसद में निर्धारित चर्चा भी टल गई है। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने नए नक्‍शे के मसले पर राष्ट्रीय सहमति बनाने के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाई थी लेकिन सभी राजनीतिक दलों में इस मसले पर एक राय नहीं बन पाई। इस बैठक में सभी दल के नेताओं ने भारत के साथ बातचीत कर किसी भी मसले को सुलझाने का सुझाव दिया था।

बता दें कि नेपाल में किसी भी संविधान संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का नेशनल असेंबली में दो-तिहाई बहुमत है, लेकिन इसे निचले सदन में संविधान संशोधन प्रस्ताव पास कराने के लिए उसे अन्य दलों से समर्थन की आवश्यकता होगी। निचले सदन में उसकी दो तिहाई बहुमत से 10 सीटें कम हैं।

हलाँकि, नेपाली कॉन्ग्रेस ने नए नक्शे को जारी करने के सरकार के कदम का समर्थन किया है। साथ ही उसका यह भी कहना है कि संविधान संशोधन प्रस्ताव के लिए पार्टी में चर्चा की आवश्यकता है। सत्तारूढ़ दल ने सभी से अपनी राजनीतिक माँगों को इसके साथ नहीं जोड़ने का आग्रह किया है।

नेपाली कॉन्ग्रेस के नेता कृष्ण प्रसाद सिटौला ने कहा है कि मानचित्र को अपडेट करने का निर्णय आगामी केंद्रीय कार्य समिति की बैठक में लिया जाएगा। इसलिए पार्टी ने संशोधन को कुछ समय के लिए टालने का अनुरोध किया है।

गौरतलब है कि नेपाल की ओर से अपने नए राजनीतिक नक्शे में भारतीय क्षेत्र दिखाए जाने पर भारत के विदेश मंत्रालय ने नेपाल को भारत की संप्रभुता का सम्मान करने की नसीहत दी थी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा था, “हम नेपाल सरकार से अपील करते हैं कि वो ऐसे बनावटी कार्टोग्राफिक प्रकाशित करने से बचें। साथ ही भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करें।”

साथ ही भारत ने यह भी कहा था कि नेपाल सरकार अपने फैसले पर फिर से विचार करे। अनुराग श्रीवास्तव ने कहा था कि नेपाल सरकार, इस मामले में भारत की स्थिति से भलीभाँति वाकिफ है। बता दें कि नेपाल ने 18 मई को नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था। इसमें कालापानी, लिपुलेख और लिमिपियाधुरा को अपने क्षेत्र के रूप में दिखाया था। नेपाल ने अपने नक़्शे में कुल 335 वर्ग किलोमीटर के इलाके को शामिल किया था। इसके बाद 22 मई को संसद में संविधान संशोधन का प्रस्ताव पेश किया था।

लद्दाख में घास नहीं जमती, कश्मीर मुस्लिम बहुल: नेहरू कृपा से आज फिर खड़े हैं अक्साई चीन पर सैनिक

आज ही अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक ट्वीट में कहा है कि वे भारत और चीन के बीच सीमा विवाद में मध्यस्थता को तैयार हैं। दिलचस्प बात यह है कि आज ही भारत के नाम हर प्रकार के सीमा विवाद करने के बाद खुद को भारत रत्न देने वाले देश के पहले प्रधानमंत्री और लार्ड माउंटबेटन के अच्छे दोस्त जवाहर लाल नेहरू की भी पुण्यतिथि है।

तिब्बत पर चीन के बलात कब्जे के बाद तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने नेहरू को चीन की ओर से सतर्क रहने की ओर इशारा भी किया था। 1950 के अक्टूबर में जवाहरलाल नेहरू को लिखे एक पत्र में सरदार पटेल ने चीन तथा उसकी तिब्बत के प्रति नीति से सावधान किया था और कहा था कि चीन का रवैया कपटपूर्ण और विश्वासघाती है।

अक्साई चीन क्षेत्र

सरदार पटेल पहले ही कर चुके थे नेहरू को सतर्क

सरदार पटेल ने अपने पत्र में चीन को अपना दुश्मन, उसके व्यवहार को अभद्रपूर्ण और चीन के पत्रों की भाषा को किसी दोस्त की नहीं, भावी शत्रु की भाषा कहा था। लेकिन नेहरू हमेशा से चीन से बेहतर ताल्लुक़ चाहते थे।

सरदार पटेल के पत्र जवाब में नेहरू ने लिखा, “तिब्बत के साथ चीन ने जो किया, वह गलत था, लेकिन हमें डरने की ज़रूरत नहीं। आख़िर हिमालय पर्वत स्वयं हमारी रक्षा कर रहा है। चीन कहाँ हिमालय की वादियों में भटकने के लिए आएगा?”

दिसम्बर 1950 में सरदार पटेल के निधन के बाद नेहरू को उनकी नीतियों पर टोकने वाला शायद ही कोई बाकी था। इसके बाद भी नेहरू के चीन के साथ शिष्टाचार जारी रहे। आखिरकार वर्ष 1954 में भारत ने स्वीकार कर लिया की तिब्बत पर चीन का ही अधिकार है। इस पर नेहरू ने पंचशील समझौते के हस्ताक्षरों ने आखिरी मोहर भी लगा दी।

ठीक इससे पहले, जिसके बारे में बहुत लोग अनभिज्ञ ही हों, वह घटना भी घटी जब वर्ष 1953 में ही UNSC (संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद) के स्थायी सदस्यता की पेशकश भारत को हुई। लेकिन नेहरू ने इसे अस्वीकार करते हुए भारत की जगह चीन को UNSC की स्थायी सदस्यता की वकालत की थी।

इस बारे में सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ नेहरू में सर्वपल्ली गोपाल, खंड 11 के पेज संख्या 248 में लिखा है, “नेहरू ने सोवियत संघ की भारत को UNSC के छठे स्थायी सदस्य के रूप में प्रस्तावित करने की पेशकश को ठुकराते हुए कहा था कि भारत की जगह इसमें चीन को स्थान मिलना चाहिए।”

इसके बाद नेहरू जी के इस ‘योगदान’ का दंश भारत हर आए दिन भुगतता नजर आ रहा है। नेहरू देश के सामरिक हितों के प्रति कितने सतर्क और निश्चिन्त थे, उसका यह सबसे बड़ा उदाहरण कहा जा सकता है।

आख़िरकार पंचशील के बाद चीन ने अक्साई चीन क्षेत्र की ओर अपने कदम बढ़ाने शुरू कर दिए। यह भी उल्लेखनीय है कि भारत-चीन के बीच औपनिवेशिक ब्रिटिश साम्राज्य सिर्फ इस कारण से मैकमोहन रेखा खींच गया था, ताकि असम के चाय के बागान चीन से सुरक्षित रह सकें, लेकिन अक्साई चीन में उन्हें ऐसी महत्वाकांक्षा नजर न आई।

अंग्रेजों और नेहरू की मेहरबानी का नतीजा यह हुआ कि 1956 में आखिरकार चीन ने अक्साई चीन क्षेत्र में सड़क निर्माण शुरू कर अपना दुस्साहसी अभियान शुरू कर दिया।

अक्साई चिन को 1842 में ब्रिटेन ने जम्मू-कश्मीर का हिस्सा घोषित किया था। अब यहाँ पर बनी चीनी सड़क का एक ही मतलब था कि चीन अब भारत के इलाके से होकर तिब्बत तक जा सकता था।

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और चाइनीज प्रीमियर चाऊ एन लाई के बीच अप्रैल 24, 1960 के दिन लद्दाख की सीमा पर बातचीत में नेहरू के संवाद का अंश –

एक नक्शा 1958 में चीनी सरकार द्वारा जारी किया गया, जिसमें अक्साई चीन क्षेत्र की ये सड़कें चीनी नक्शे का हिस्सा बताई गईं।

वर्ष 1960 में भारत-चीन, दोनों देशों के बीच दिल्ली में एक बार फिर समिट का आयोजन हुआ, तब तक भारत द्वारा दलाई लामा को शरण दी जाने के कारण दोनों देशों के रिश्तों में गरमा-गर्मी का माहौल था।

चीनी प्रीमियर चाऊ एन लाई जब भारत पहुँचे तो सड़क पर जनता हाथों में पोस्टर लिए निकली। इन पर लिखा था – “चीन से सावधान” “कठोर रहना नेहरू” “चीनी घुसपैठियों के सामने समर्पण नहीं।”

लेकिन मानो जवाहरलाल नेहरू के अलावा बाकी सभी चीन से सतर्क रहने को जरूरी समझते थे। सोशल मीडिया पर इस मुलाकात के वीडियो आज भी सुरक्षित हैं –

इस समिट का उद्देश्य दोनों देशों के बीच सीमा विवाद पर चर्चा था। लेकिन इसका कोई हल ना निकला। यहाँ से सीमा विवाद बिगड़ता चला गया। इस घटना के ठीक 2 साल बाद 1962 में भारत और चीन की सेनाएँ आमने-सामने थीं।

हर दूसरे दिन चीनी सैनिक भारतीय सेना से उलझते नजर आने लगे। ठीक तभी जवाहरलाल नेहरू ने अपना ऐतिहासिक बयान देते हुए कहा – “Ladakh is a useless, uninhabitable land. Not a blade of grass grows there. We did not even know where it was.”

जिसका हिंदी में अर्थ है – “लद्दाख के अक्साई चिन क्षेत्र के कुछ हजार वर्ग किलोमीटर के बंजर भू-भाग पर चीन ने कब्जा कर लिया है, लेकिन इसके लिए कोई चिंता की बात नहीं है क्योंकि वहाँ घास तक पैदा नहीं होती। हमें तो पता भी नहीं कि वो आखिर है कहाँ?”

नेहरू के इस लापरवाही का जवाब देते हुए वहाँ मौजूद एक सांसद ने कहा था कि उनके सिर पर भी बाल नहीं उगते, तो क्या वह भी चीन को दे दिया जाए?

नेहरू अपने अंतरराष्ट्रीय सीमाओं और देशप्रेम के प्रति कितने सजग थे, इसका उदाहरण इसी बात से मिल जाता है कि लद्दाख को बंजर भूमि बताने वाले नेहरू ने ही कश्मीर को पाकिस्तान को दिए जाने की भी वकालत करते हुए कहा था कि कश्मीर के एक हिस्से को पाकिस्तान को दिया जाना चाहिए, क्योंकि यहाँ पर मुस्लिम बहुलता में हैं।

नेहरू की फॉरवर्ड पॉलिसी

वर्ष 1959 के बाद भारत और चीन के सैनिक लगातार एक-दुसरे से ‘नो मैन्स लैंड’ में उलझते रहे और जो जहाँ पहुँचता, अपने झंडे गाड़ कर चौकियाँ बनाता रहा। चीनी प्रीमियर के बिना निष्कर्ष चीन लौटने के बाद नेहरू ने नवंबर, 1961 में फॉरवर्ड पॉलिसी सामने रखी।

जवाहरलाल नेहरू ने ‘फॉरवर्ड पॉलिसी’ अपनाई, जिसमें कहा गया कि भारत को एक-एक इंच चीन की ओर बढ़ना चाहिए। जबकि वास्तव में जमीनी हकीकत यह थी कि यह ‘बैकवर्ड पॉलिसी’ बन गई। चीनी सेना लगातार भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ करती चली गई और हम लगातार पीछे हटते चले गए।

कुछ माह में ही मानो नेहरू नींद से जागे और संसद में प्रस्ताव रखते हुए चीन के धोखे की बात का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उन्हें दुनिया समझ में आ गई। जवाहरलाल नेहरू ने कहा, “हम आधुनिक दुनिया की सच्चाई से दूर हो गए थे।”

आखिरकार चीन के साथ हुए उस 1962 के युद्ध में भारत के हाथ वह दुर्भाग्यपूर्ण हार आई, जिसके बारे में कुछ इतिहासकार बताते हैं कि उस हार ने नेहरू को उनके आखिरी दिनों तक परेशान रखा। चीनी सैनिकों को जिस अवसर की तलाश थी वह उन्हें मिला। नेहरू का ‘पंचशील’ और ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के नारे भारत की हार के रूप में सामने आए।

भारत के लिए नेहरू अपनी लापरवाही के कारण आज तक इस युद्ध का फैसला अधूरा छोड़कर गए। आज चीन के सैनिक एक बार फिर सीमाओं पर डटे हैं, तनाव का माहौल है, हालाँकि इस बार चीन के सामने नेहरू नहीं बल्कि नरेन्द्र मोदी हैं, जिन्होंने 2014 में अपने पहले कार्यकाल की शपथ लेते हुए खुद को देश का प्रधानसेवक कहा था। फिर भी, चीन के कम्युनिस्ट रवैए के प्रति किसी भी प्रकार की आशा खुद को धोखे में रखना ही होगा।

दलित नाबालिग से चाँद ने किया रेप, दोस्त शान से बनवाया वीडियो: फिर व्हाट्सऐप ग्रुप में डाल दिया video

उत्तर प्रदेश के नोएडा के भंगेल गाँव में एक दलित लड़की से बलात्कार का मामला सामने आया है। पुलिस ने मामले में दोनों आरोपित चाँद उर्फ मुरस्लीन और शान उर्फ सोनू को गिरफ्तार कर लिया है।

जानकारी के मुताबिक आरोपित ने लड़की के साथ दुष्कर्म का वीडियो भी बना लिया था और वीडियो को वायरल करने की धमकी देकर पिछले एक साल से मासूम के साथ बलात्कार कर रहा था। पीड़िता के भाई ने नोएडा पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करवाई, जिसके बाद पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दोनों आरोपितों को गिरफ्त में ले लिया

घटना करीब साल भर पहले की बताई जा रही है। पीड़िता भंगेल गाँव में अपनी बड़ी बहन के साथ किराए के मकान में रहती है। आरोपित चाँद भी भंगेल में ही रहता है। पुलिस उपायुक्त (द्वितीय जोन) हरीश चंदर के मुताबिक करीब एक साल पहले पीड़िता को कुछ नशीला पदार्श पिलाने के बाद चाँद ने उसके साथ बलात्कार किया। इतना ही नहीं, उसने अपने दोस्त शान उर्फ सोनू ने इस घटना का वीडियो भी बनवाया।

इसके बाद आरोपित वीडियो वायरल कर देने की धमकी देकर एक साल तक रेप करते रहे। पुलिस अधिकारी ने बताया कि लॉकडाउन के कारण पीड़िता अपने गाँव चली गई। इसी बीच आरोपितों ने पीड़िता का वीडियो व्हाट्सऐप ग्रुप में शेयर कर दिया।

उन्होंने बताया कि आरोपित ने कथित रूप से पीड़िता को घटना की सूचना पुलिस को देने पर उसे और उसके परिवार को जान से मारने की धमकी भी दी। शिकायत के बाद हरकत में आई पुलिस ने दोनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। दोनों आरिपितों के खिलाफ कई धाराओं में केस दर्ज किया गया है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों राजस्थान के जयपुर में एक भाई द्वारा तीन दोस्‍तों के साथ मिलकर अपनी सगी 10 साल की मंदबुद्धि बहन से गैंगरेप कर उसे मौत के घाट उतारने का शर्मनाक मामला सामने आया था। जीशान अली ने छोटी बहन का अपहरण करने के बाद सुनसान जगह पर अपने तीन दोस्तों- साजिद अली, अमजद अली और वाजिद अली के साथ बारी-बारी से गैंगरेप किया। इसके बाद गला दबाकर बहन की हत्या कर दी। पुलिस ने चारों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है।

राजस्थान के ही अलवर में मोहम्मद हामिद ने घर पर सोई 10 माह की बच्ची का बलात्कार किया था। 19 वर्षीय आरोपित मोहम्मद हामिद ने जब बच्ची का बलात्कार किया, उस समय वो घर पर सो रही थी। पुलिस ने हामिद को गिरफ्तार कर लिया है।

सिंधिया की राह पर रायबरेली की MLA अदिति सिंह, ट्विटर पर त्याग दिया कॉन्ग्रेस का नाम

उत्तर प्रदेश के रायबरेली से कॉन्ग्रेस की विधायक अदिति सिंह उसी राह पर चलती दिख रही हैं जिस पर कुछ दिनों पहले मध्यप्रदेश में कॉन्ग्रेस के महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया आगे बढ़े थे। दरअसल, अदिति ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से कॉन्ग्रेस का नाम हटा दिया है। ट्विटर हैंडल से INC (Indian National Congress) हटाते ही ट्विटर ने अदिति के आईडी से ब्लूटिक हटा दिया है।

अदिति ने अब अपना हैंडल @AditiSinghRBL कर लिया है। RBL यानी रायबरेली है। अदिति सिंह के इस निर्णय को लेकर तरह-तरह की चर्चाएँ हैं। उनके इस कदम से राजनीतिक सरगर्मियाँ अचानक तेज हो गई हैं।

अदिति सिंह का ट्विटर प्रोफाइल

अदिति सिंह ने अपने सोशल मीडिया की प्रोफाइल से कॉन्ग्रेस के नाम सहित राहुल और सोनिया गाँधी की फोटो भी हटा दी है। विधायक के इस तेवर के बाद अब माना जा रहा है कि वह अब पार्टी से जल्दी ही किनारा कर सकती हैं। इससे पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपना ट्विटर प्रोफाइल और बॉयो बदला था। इसके कुछ महीनों बाद मध्य प्रदेश में बड़ा सियासी उलटफेर हुआ और कमलनाथ सरकार गिर गई थी।

अब उसी तरह कॉन्ग्रेस के गढ़ रायबरेली सदर की विधायक भी अलग राह चुनती दिख रही हैं। अदिति सिंह की इस कवायद को कहीं न कहीं उनकी पार्टी से बगावत से जोड़कर देखा जा रहा है। बता दें पिछले कुछ समय से अदिति सिंह और कॉन्ग्रेस पार्टी के बीच सब ठीक नहीं चल रहा है।

पहले अदिति सिंह ने गाँधी जयंती पर पार्टी के व्हिप का उल्लंघन करते हुए यूपी विधानसभा के विशेष सत्र में हिस्सा लिया, जिसके बाद उन्हें नोटिस भी भेजा गया। हालाँकि कॉन्ग्रेस विधायक ने नोटिस को ठेंगा दिखा दिया था।

वहीं हाल ही में कॉन्ग्रेस और योगी सरकार में बसों की सियासत गर्म हुई तो अदिति सिंह का ट्वीट चर्चा का विषय बना। इसमें उन्होंने कॉन्ग्रेस, महाराष्ट्र और राजस्थान सरकार पर सवाल खड़े किए। इस पूरे मामले में विधायक अदिति सिंह ने योगी सरकार के रुख का समर्थन किया था।

अदिति सिंह ने ट्वीट कर लिखा था, “आपदा के वक्त ऐसी निम्न सियासत की क्या जरूरत, एक हजार बसों की सूची भेजी, उसमें भी आधी से ज्यादा बसों का फर्जीवाड़ा। 297 कबाड़ बसें, 98 ऑटो रिक्शा व एबुंलेंस जैसी गाड़ियाँ, 68 वाहन बिना कागजात के, ये कैसा क्रूर मजाक है। अगर बसें थीं तो राजस्थान, पंजाब, महाराष्ट्र में क्यूँ नहीं लगाई।”

इसके अलावा उन्‍होंने एक और ट्वीट में लिखा था, “कोटा में जब यूपी के हजारों बच्चे फँसे थे तब कहाँ थीं ये तथाकथित बसें, तब कॉन्ग्रेस सरकार इन बच्चों को घर तक तो छोड़िए, बॉर्डर तक ना छोड़ पाई। तब योगी आदित्यनाथ ने रातों रात बसें लगाकर इन बच्चों को घर पहुँचाया। खुद राजस्थान के सीएम ने भी इसकी तारीफ की थी।”

पिछले दिनों ये खबरें भी आईं थीं कि अदिति सिंह को कॉन्ग्रेस ने महिला विंग के महासचिव पद से हटा दिया है। नवंबर में अदिति की विधायक की सदस्यता खत्म करने को लेकर भी कॉन्ग्रेस ने यूपी विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित को नोटिस दिया गया था। अदिति ने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने का भी समर्थन किया था।