Home Blog Page 4829

Video: महाराष्ट्र के पुलिस अधिकारी ने पूर्व CM देवेंद्र फडणवीस से की मास्क, स्वास्थ्य किट, सैनिटाइजर की किल्लत की शिकायत

महाराष्ट्र के एक पुलिस अधिकारी का वीडियो सोशल मीडिया वायरल हुआ है। जिसमें पुलिसमैन को पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मास्क, स्वास्थ्य किट और सैनिटाइजर की कमी के बारे में बोलते हुए सुना जा सकता है।

वीडियो में, वाशिम के किन्हीराजा इलाके में ड्यूटी कर रहें एक पुलिस अधिकारी से पूर्व सीएम फडणवीस संपर्क करते है। इसी दौरान पुलिस उनसे स्वास्थ्य किट, मास्क और सैनिटाइजर की कमी के बारे में बताता है और कहता है कि “सर, अगर आप मुख्यमंत्री होते तो ऐसा नहीं होता।”

फडणवीस पुलिस अधिकारी का हौसला बढ़ाते हुए कहते है कि आप लोग हमारे लिए दिन रात सेवा कर रहे हैं, अपना ख्याल रखा करो। उनके साथ आए विपक्षी नेता सुरेश मुंडे और विनोद घागे को भी अधिकारी से इस संक्रमण से सुरक्षित रहने के लिए कहते हुए सुना जा सकता है।

कथित तौर पर, यह घटना रविवार को दोपहर लगभग 1:30 बजे हुई जब फडणवीस मुंबई से नागपुर की यात्रा कर रहे थे। पूर्व सीएम ने किन्हीराजा के शिवाजी हाई स्कूल में रुककर मालेगाँव के किसानों की स्थिति के बारे में जानकारी ली थी।

हालाँकि, इस मुद्दे पर जौलका पुलिस स्टेशन के प्रभारी ने पुलिस अधिकारियों से राजनीति में लिप्त होने से बचने के लिए कहा है। ई-साकल की एक रिपोर्ट के अनुसार, एसआई ने कहा कि “डीएसपी ने पुलिस अधिकारियों को मास्क, सैनिटाइज़र, और शील्ड मास्क प्रदान किए हैं। यदि कोई अतिरिक्त आवश्यकता है, तो कृपया मुद्दे का राजनीतिकरण करने के बजाय डीएसपी कार्यालय से अनुरोध करें”।

रिपोर्टों के अनुसार, महाराष्ट्र में 1153 पुलिसकर्मी कोरोनावायरस से संक्रमित हुए हैं जबकि 11 पुलिसकर्मियों की महाराष्ट्र राज्य में मृत्यु हो गई है। 1153 संक्रमित पुलिसकर्मियों में से 128 अधिकारी हैं, जबकि शेष 1,026 पुलिस कांस्टेबल हैं।

कोरोना वायरस से सबसे ज्यादा प्रभावित महाराष्ट्र

पब्लिक स्वास्थ्य अधिकारी के अनुसार महाराष्ट्र में कोरोनोवायरस का प्रकोप खतरनाक स्तर पर पहुँच गया है, इनमें कई हिस्सों में वायरस फैलने का खतरा है। कोरोनावायरस के खतरे से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों की सूची में महाराष्ट्र पहले स्थान पर है। यह अब तक 33,000 से अधिक एक्टिव कोरोनोवायरस मामलों में 1,198 घातक मामलों के साथ सामने आया है। अकेले महाराष्ट्र की राजधानी, मुंबई में लगभग 20,000 कोरोनोवायरस के मामले सामने आए हैं। मुंबई के अलावा, ठाणे और पुणे भी कोरोना महामारी से बुरी तरह प्रभावित हैं।

‘किसी सरकार में इतनी हिम्मत नहीं कि शरीयत में दखल दे सके’ – AIMIM पर हाई कोर्ट में शिकायत दर्ज

मुंबई में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM का एक बेहद भड़काऊ पोस्टर सामने आने के एक हफ्ते बाद पार्टी के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज हो गई है। लीगल राइट्स ऑबजर्वेटरी के ट्विटर अकॉउंट से ये सूचना आज (मई 19, 2020) सुबह दी गई।

ट्वीट में लिखा गया, “हमने असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM पार्टी के ख़िलाफ़ रजिस्ट्रार बॉम्बे हाई कोर्ट और भारतीय चुनाव आयोग के पास शिकायत दर्ज कर दी है। ये पार्टी भारतीय न्यायपालिका के खिलाफ घृणा पैदा करने वाले अपमानजनक पोस्टरों के जरिए स्वयं न्यायिक तंत्र बनाने की कोशिश कर रही है।”

गौरतलब है कि कुछ दिन पहले असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने एक नया पोस्टर जारी किया था। इस पोस्टर में काफी भड़काऊ और आपत्तिजनक बातें लिखी गई थी। इसमें AIMIM के दो नेताओं इमरान अंधेरीवाला और हाजी नफरत हुसैन का नाम, तस्वीर और मोबाइल नंबर लिखा हुआ था।

पोस्टर में समुदाय विशेष को भड़काने की साजिश साफ तौर पर दिख रही थी। इसमें लोगों से AIMIM पार्टी में शामिल होने की अपील भी की गई थी।

पोस्टर में लिखा था, “ ..अगर तुम अदालतों का चक्कर लगाना छोड़ कर अपने उलमा से ये मसले हल कराओ, तो खुदा की कसम किसी सरकार में इतनी हिम्मत नहीं, कि तुम्हारी शरीअत में दखलअंदाजी कर सके।”

बता दें कि इस पोस्टर को सबसे पहले भाजपा नेता सुरेंद्र पुनिया ने अपनी टाइमलाइन पर शेयर करते हुए मामले पर सबका ध्यान आकर्षित करवाया था।

उन्होंने अपनी टाइमलाइन पर लिखा था, “वाह,ओवैसी साहब और उनके लोग सविंधान और सेक्युलरिज़म बचाने में लगे हुए हैं। आप सब सोते रहना, जागना मना है।”

इसके बाद भाजपा नेता संबित पात्रा ने भी इस पोस्टर को ट्वीट करते हुए लिखा था, “AIMIM कितनी secular पार्टी है वह इस पोस्टर से पता लगता है।”

वहीं, पुनिया के ट्वीट पर प्रतिक्रिया देते हुए एक यूजर ने लिखा, “कल्पना करिए यदि कोई हिंदूवादी नेता इस तरह का पोस्टर लगाए तब इस देश में क्या होता! जब लोग अंबेडकर का फोटो लेकर घूमते हैं या जब वह संविधान की बात करते हैं तब बहुत हँसी आती है क्योंकि ये कभी भी भारत के संविधान या अंबेडकर में भरोसा नहीं रखते उन्हें अपनी शरीयत ही सबसे प्यारी है।”

सभी मजदूर हमारे अपने हैं: CM खट्टर ने बिहार से नहीं लिए रुपए, केजरीवाल ने वसूली थी एक-एक पाई

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने बिहार के सीएम नीतीश कुमार को पत्र लिख कर प्रवासी मजदूरों को वापस भेजे जाने को लेकर निश्चिंत रहने को कहा है। नीतीश कुमार ने हरियाणा में रह रहे बिहारी प्रवासी मजदूरों को लेकर चिंता व्यक्त की थी और लॉकडाउन में फँसे उन मजदूरों पर हो रहे हरियाणा सरकार के तमाम ख़र्चों के भुगतान की बात कही थी। खट्टर का ये पत्र दिल्ली के केजरीवाल और उनके बीच का अंतर भी बताता है।

मनोहर लाल खट्टर ने नीतीश को भेजे पत्र में लिखा कि प्रवासी मजदूरों को लेकर उनकी चिंता उचित और प्रशंसनीय है लेकिन वो आश्वस्त करते हैं कि हरियाणा में रह रहे दूसरे राज्यों के नागरिक उतने ही हमारे हैं, जितने वो अपने राज्य के हैं। खट्टर ने स्वीकार किया कि हरियाणा की आर्थिक, औद्योगिक और कृषि क्षेत्र में दिनोंदिन हो रही उन्नति में अन्य भारतीय राज्यों से आए मजदूरों का ख़ासा योगदान है।

इसके उलट अरविन्द केजरीवाल सरकार ने बिहार सरकार को पत्र लिख कर वापस भेजे गए मजदूरों पर हुए कुल ख़र्च का भुगतान करने को कहा था। केजरीवाल ने लिखा था कि टिकट ख़रीदने और मजदूरों को वापस भेजने में लगभग 6.5 लाख रुपए ख़र्च हुए हैं और जैसे ही पुष्ट आँकड़े आएँगे, दिल्ली सरकार बिहार से भुगतान के लिए आगे की प्रक्रिया अपनाएगी। श्रमिक स्पेशल ट्रेनों से इन मजदूरों को मुजफ्फरपुर भेजा गया था। जबकि ऐसी ही स्थिति में खट्टर ने कहा:

“हरियाणा में आकर काम करने वाला अन्य भारतीय नागरिक भी हमारे लिए हरियाणवी ही है। हमने उन्हें अपनों की तरह रखा है और उनका ख्याल किया है। वे हमारी जिम्मेदारी हैं। हम लगातार उनकी मदद कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे। हम उनकी रक्षा और सम्मान के लिए प्रतिबद्ध हैं। हमारे यहाँ उद्योग वापस खुल रहे हैं और अर्थव्यवस्था पटरी पर आ रही है। मजदूर अपने परिवार से वापस मिल कर आते हैं तो उनका स्वागत है।”

साथ ही मनोहर लाल खट्टर की सरकार ने बिहार से वो धनराशि लेने से भी इनकार कर दिया, जो बिहारी मजदूरों की सुख-सुविधा के लिए ख़र्च किया गया था। खट्टर ने लिखा कि वो इस प्रस्ताव के लिए नीतीश सरकार के आभारी हैं लेकिन वो इस धनराशि को अनुग्रह पूर्वक अस्वीकार करते हैं। सोशल मीडिया पर लोगों ने तुलना करते हुए लिखा कि एक तरफ मजदूरों का किराया उनके राज्यों से वसूलने वाले केजरीवाल हैं जबकि दूसरी तरफ खट्टर ने उदाहरण पेश किया है।

केजरीवाल द्वारा मजदूरों का देखभाल करने के दावों की भी कई बार पोल खुल चुकी है। दिल्ली से बिहार के लिए पैदल निकले प्रवासी मजदूरों ने बताया था कि वह दो दिनों से भूखे हैं, कोई रोजगार नहीं है तो पैदल घर जा रहे हैं। उनका कहना था कि जब भूखे-प्यासे यहाँ मरना ही है, तो रास्ते में ही मर जाएँगे। उन्होंने बताया था कि दिल्ली में खाने-पीने और नहाने-धोने तक में दिक्कत आ रही है, इसीलिए वो पैदल वापस जा रहे हैं।

औरैया हादसे में राजस्थान पुलिस पर गंभीर आरोप: बच गए मजदूरों ने कहा- ‘हमें जबरन बिठाया था चूने से लदे ट्रक में’

उत्तर प्रदेश के औरैया में हुए दर्दनाक हादसे के संबंध में कानपुर पुलिस ने रविवार (मार्च 17, 2020) को एक नया खुलासा किया है। पुलिस का कहना है कि हादसे में बचे प्रवासी मजदूरों ने पूछताछ में राजस्थान पुलिस पर गंभीर आरोप लगाया है।

घायल प्रवासी मजदूरों ने बताया कि राजस्थान पुलिस ने ही उन्हें जबरन चूने से लदे ट्रक में बैठाया था, जो यूपी के ओरैया जिले में दुर्घटना का शिकार हो गया। इस दुर्घटना में 26 प्रवासी मजदूरों की जान चली गई, व 36 अन्य घायल हो गए।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, प्रवासी मजदूरों में से एक गुड्डू नाम के मजदूर ने बताया कि उनके साथ 43 लोग राजस्थान से अपने घर पश्चिम बंगाल जाने के लिए निकले थे। राजस्थान में वो पत्थर की खान में काम करते थे। 

गुड्डू बताते हैं कि जब लॉकडाउन में कोई काम नहीं बचा और खाने की समस्या बढ़ने लगी थी, तब उनके साथ काम करने वाले लोगों ने घर लौटने का फैसला किया। वे सभी बस से एक दिन पहले भरतपुर पहुँचे थे। यहाँ पर राजस्थान पुलिस ने उन्हें रोक लिया और आगे नहीं जाने दिया। 

जब इन मजदूरों ने काफी मिन्नतें कीं, तब कहीं जाकर पुलिसवालों का दिल पसीजा, लेकिन उन्होंने तब भी उन्हें साफ कह दिया कि वे किसी को बस से नहीं जाने देंगे। ऐसी स्थिति में सभी मजदूर परेशान हो गए, मगर घंटों के इंतजार के बाद राजस्थान पुलिस ने माल लदे एक ट्रक में सभी लोगों को चढ़ा दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मजदूरों से पूछताछ में पता चला है कि राजस्थान के अलग-अलग जिलों से यूपी, बिहार, बंगाल के प्रवासी मजदूर रवाना हुए। लेकिन हादसे के शिकार मजदूरों को भरतपुर (राजस्थान) में उतार दिया गया। वहाँ से ये कई किलोमीटर पैदल चले। बाद में इन्हें ट्रक में बैठाकर भेजा गया। अब चूँकि लॉकडाउन के समय में ट्रक से मजदूरों को लाने पर रोक है। इसलिए ट्रक ड्राइवरों को इस मामले में दोषी बनाया गया है।

कानपुर रेंज के आईजी मोहित अग्रवाल ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बताया कि पुलिस इन सभी प्रवासियों के बयान को दर्ज कर रही है। उन्होंने कहा कि अगर इनका बयान सत्य पाया गया तो कानून अपना काम करेगा।

अभी तक इस पूरे केस में, प्रशासन ने फतेहपुर सीकरी के एसएचओ भूपेंद्र बालियान, मथुरा कोसीकला के एसओ आजाद पाल और गाजियाबाद के इंदिरापुरम थाने के एसएचओ अमित खारी को शनिवार को निलंबित कर दिया है। इधर, आगरा और मथुरा के एसएसपी व आगरा रेंज के आईजी और डीआईजी से भी स्पष्टीकरण माँगा गया है।

दरअसल, आईजी की जाँच में सामने आया है कि जिन-जिन जिलों से ट्रॉली और डीसीएम गुजरे हैं, वहाँ पर जिला पुलिस की लापरवाही है। क्यूँकि ट्रकों आदि से मजदूरों को नहीं ले जाया सकता। इससे सोशल डिस्टेंसिंग का भी उल्लंघन होता है। 

औरैया की एसपी सुनिति ने बताया कि इस हादसे के बाद दोनों गाड़ियों के ड्राइवर, गाड़ी मालिक और ट्रांसपोर्टर के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। आईपीसी की कई धाराओं के अलावा मोटर वाहन कानून और महामारी कानून के अंतर्गत मामला दर्ज किया गया है।

दोनों ट्रकों के ड्राइवरों को, उनके मालिकों को और ट्रांस्पोर्टर को गिरफ्तार करने के लिए रेड मारी जा रही है। अभी तक की पड़ताल में ये भी पता चला है कि डीसीएम में मध्य प्रदेश से चढ़ने वाले मजदूरों से प्रति व्यक्ति 1500 रुपए किराया लिया गया था वहीं जो मजदूर राजस्थान से चढ़े थे, उनसे 2000 रुपए किराया वसूला गया था।

बता दें कि इस केस में आगे की कार्यवाई के लिए औरैया पुलिस की दो टीमों को राजस्थान भेजा गया है। ताकि वे प्रवासी मजदूरों के आरोपों का सत्यापन कर सकें। वहीं, इस मामले में प्रवासी मजदूरों के आरोपों को राजस्थान पुलिस ने पूरी तरह से खारिज किया है। 

राजस्थान पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि प्रदेश में हर दिन रोडवेज बसों का परिचालन जारी है। ये बस प्रवासी मजदूरों को बॉर्डर तक छोड़ रही हैं।

अधिकारी का यह भी कहना है कि हम जारी गाइडलाइन का पालन कर रहे हैं। इसके साथ ही किसी को भी ट्रक में जाने की अनुमति नहीं दी जा रही है। ना ही ऐसा करने के लिए किसी को कहा जा रहा है।

उल्लेखनीय है कि इस मामले में आगे की कार्रवाई के बाद झारखंड और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों ने भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी है।

झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन ने ट्रक में शवों के साथ घायल मजदूरों को भेजे जाने को लेकर आपत्ति जताई है और स्थिति को अमानवीय तथा अत्यंत संवेदनहीन बताया है।

मजदूरों के आँसू बेच रहा इंडिया टुडे, भरता है नैतिकता का दम्भ: दूसरों को पत्रकारिता सिखाने वालों का सच

मीडिया चैनल ‘इंडिया टुडे’ ने एक बार एक पूरा का पूरा शो ये बताने में ख़र्च कर दिया था कि कैसे मंदिरों में दलितों को नहीं जाने दिया जाता है। इस भ्रम को फैलाने वाले मीडिया संस्थान ने शायद ही कोई ऐसा मौका छोड़ा हो, जब इसने ग़रीबों का हितैषी बनने के दावे न किए हों। गोरखनाथ मंदिर को बदनाम करने के लिए दलितों का इस्तेमाल करने वाला ‘इंडिया टुडे‘ अब इन्हीं दलितों और ग़रीब मजदूरों की तस्वीरें बेच कर रुपए कमा रहा है।

₹8000 से लेकर ₹20,000 तक में बिक रही मजदूरों के पलायन की ‘इंडिया टुडे’ की तस्वीरें

आज पत्रकारिता के दौर में ‘Ethics’ यानी नैतिकता का ख़ूब हवाला दिया जाता है। अंग्रेजी टीवी न्यूज़ चैनलों के वो एंकर्स, जिन्होंने कभी ग्राउंड का मुँह भी नहीं देखा है, वो भी सोशल मीडिया पर दूसरों को पत्रकारिता सिखाने में अव्वल आने की कोशिश करते हैं। हर एक ग़रीब की ग़रीबी का दोष न सिर्फ़ सरकार पर मढ़ा जाता है बल्कि अपने विरोधियों को भी देश की तमाम समस्याओं के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए वो पूछते हैं कि तुमने आख़िर इन समस्याओं के समाधान के लिए किया ही क्या है?

नैतिकता सिखाने वालों का जरा मार्केटिंग मॉडल भी देख लें, जो इसी नैतिकता को बेचने पर आधारित है। सुप्रसिद्ध लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने कुछ स्क्रीनशॉट्स ट्वीट किए। इनमें दिख रहा है कि प्रवासी मजदूरों के पलायन वाली तस्वीरों को बेचा जा रहा है।

विक्रेता के रूप में ‘इंडिया टुडे ग्रुप’ का नाम दर्ज है और इन तस्वीरों के दाम 8000 रुपए से लेकर 20,000 रुपए तक हैं। इसके अलावा इस पर 18% अतिरिक्त टैक्स भी है। चर्चा से पहले बता दें कि हमें उनके तस्वीरें बेचने से कोई समस्या नहीं है।

अवस्थी ने लिखा कि वो देश के कोने-कोने से अपने घर लौटने वाले प्रवासी मजदूरों की हृदयविदारक तस्वीरों की बिक्री को देख कर हैरान हैं। उन्होंने लिखा, “इन बेचारे प्रवासी मजदूरों को तो पता तक नहीं होगा कि उनकी टूटी चप्पलों से लेकर उनके आँसू और फ़टे हुए बैग तक, सब बिक गए।” उन्होंने पूछा कि सभी को अपना घर चलाना होता है लेकिन क्या इन तस्वीरों से कमाई करना सही है? ये सवाल जायज है।

जिस ‘मार्केटिंग मॉडल’ पर आजकल की पत्रकारिता चल रही है, उस हिसाब से देखने पर ये ठीक लगता है। लेकिन, उस ‘मार्केटिंग मॉडल’ के जरिए कमाई करने वालों के नैतिकता के भाषणों और पत्रकारिता की परिभाषाओं को देखें तो ये दोहरे रवैये से ज्यादा कुछ भी नहीं।

ये वही लोग हैं जो निजीकरण और निगमीकरण को ‘बेच दिया’ कह कर सरकार को बदनाम करने का बीड़ा उठाए हुए हैं। जबकि ख़ुद लाचार और बेसहारा ग़रीबों की तस्वीरें बेच कर कमाई कर रहे हैं।

कैपिटलिज्म का मॉडल, सोशलिज्म का दिखावा: मजदूरों की तस्वीरों की बिक्री का बैकग्राउंड

सवाल है कि 20,000 रुपए में बिकने वाले इन मजदूरों की तस्वीरों से हुई कमाई का कितना हिस्सा उन ग़रीबों तक जाएगा? क्या आमजनों के हित के लिए पत्रकारिता करने का दावा करने वाले (जो कभी ये खुल कर स्वीकार नहीं करते कि वो बम्पर कमाई के लिए ये कर रहे हैं), बताएँगे कि लाचारी और बेबसी की इस तस्वीरों को बेच कर होने वाली कमाई से किस ग़रीब को फायदा हो रहा है? अगर नहीं हो रहा है तो ‘नैतिक पत्रकारिता’ का भाषण क्यों?

यहाँ थोड़ी सी बात कैपिटलिज्म की। कैपिटलिज़्म क्या कहता है? ये कहता है कि अगर जनता किसी चीज के लिए रुपए नहीं देना चाह रही है तो उस चीज को ख़त्म कर दिया जाना चाहिए। इंटरनेट के जमाने में टीवी न्यूज़ चैनलों के समक्ष यही दुविधा खड़ी होते जा रही है।

सूचनाएँ तो लोगों को सोशल मीडिया से मिल ही जा रही हैं और वो भी लगभग मुफ़्त में, तो अब इन मीडिया संस्थानों ने कमाई के लिए अपने ही द्वारा बखान किए जाने वाले नैतिकता से ही समझौता कर लिया है।

यहाँ हम एकदम से नॉन-प्रॉफिट जर्नलिज्म की बात नहीं कर रहे। हम ‘इंडिया टुडे’ द्वारा मजदूरों की तस्वीरें बेचने को ग़लत नहीं बता रहे। हम बात कर रहे हैं राजदीप सरदेसाई और राहुल कँवल जैसों की, जो पत्रकारिता के मामले में कुछ ज्यादा ही जजमेंटल हैं।

कँवल जब अपने चैनल की टीआरपी को फ्लटर कर के उसका बखान करते हैं और उनके ट्वीट्स में जिस तरह से ‘रिपब्लिक टीवी’ को ‘हल्ला-गुल्ला वाला न्यूज़ चैनल’ बताया जाता है, ये बताता है कि पत्रकारिता सिखाने वालों को हम कोई सलाह नहीं दे रहे, बल्कि उनकी ही बनाई परिभाषाओं पर उन्हें ही तौल रहे।

सोशलिज्म के अंतर्गत पत्रकारिता को ‘स्पॉन्सर्ड’ नहीं होना चाहिए, ऐसा बताया गया है। सत्ता से सवाल पूछने का दम्भ भरने वाल पत्रकार इसी मॉडल को फॉलो करने का दिखावा करते हैं, जहाँ सार्वजनिक चर्चा के लिए जगह हो। वे राजनीतिक दबाव के आगे न झुकने की बातें करते हुए निडर और साहसी होने का दावा करते हैं।

लेकिन मजदूरों की बिकती तस्वीरों को देखें तो ये कौन साबित होते हैं? दरअसल, ये कैपिटलिज्म के मॉडल पर काम करने वाले ऐसे लोग हैं, जो सोशलिज्म के मॉडल पर जनहित की बात करने का दम्भ भरते हैं। लेकिन हाँ, खुल कर तो ये दोनों को ही स्वीकार करने में डरते हैं।

यही लोग निजीकरण और निगमीकरण को ‘बेच डाला’ कहते हैं

आपको याद होगा, जब अप्रैल 2018 में केंद्र सरकार ने डालमिया ग्रुप को लाल किले के मरम्मत और रख-रखाव की जिम्मेदारी सौंपी थी, तब पत्रकारों के एक बड़े समूह ने हल्ला मचाया था कि मोदी सरकार ने ऐतिहासिक इमारत को बेच डाला। हालाँकि, ये करार सिर्फ़ पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए था।

इसके तहत पर्यटन सुविधाओं को उन्नत करने की जिम्मेदारी कम्पनी को दी गई थी। लेकिन पर्यटकों को ज्यादा अच्छी सुविधा देने वाले इस स्कीम को दुष्प्रचारित किया गया।

ऐसा दिखाया गया था जैसे कि किसी क्रिकेट स्टेडियम की तरह लाल किले पर पान बहार के एडवर्टाइजमेंट वाले पोस्टर्स चिपके रहेंगे और ये सार्वजनिक संपत्ति नहीं रह जाएगी। निजीकरण और निगमीकरण को ‘बेच डाला’ कह कर हर जगह सोशलिस्ट सामग्रियों के आधार पर नैतिकता का ज्ञान देने वाले इस वर्ग विशेष को प्राइवेट कंपनियों और सरकार के बीच हुए हर करार में खोट दिखता है, भले ही वो जानते के हित में ही क्यों न हों।

हमें ‘इंडिया टुडे’ या किसी भी संस्थान द्वारा किसी भी प्रकार के उनके कंटेंट्स को बेचे जाने पर कोई आपत्ति नहीं है। हमें दिक्कत है इस बात से कि जो वो करते हैं, दूसरों को वैसा ही करने पर नैतिकता की सलाह देते हैं।

ये वही लोग हैं जो अक्षय कुमार पर निशाना साधते हैं कि वो सामाजिक मुद्दों पर फ़िल्म बनाते हैं और रुपए कमाते हैं। सारे सेलेब्रिटीज में अक्षय कुमार ने पीएम केयर्स से लेकर बीएमसी तक को सबसे ज्यादा डोनेशन दिए। आख़िर पता तो चला कि उसका कोई हिस्सा जनता के काम आया। लेकिन, नैतिकता के दम्भ में डूबे इन पत्रकारों का क्या?

आप बेचिए, सड़क की खर-पतवार से लेकर भूख से मरते हुए बच्चों तक की तस्वीरें बेचिए। लेकिन, जब आप नैतिकता की बात करेंगे तो हम नहीं तो दूसरे कुछ लोग आपसे जरूर पूछेंगे कि फोटो खींचने वक़्त उस बच्चे को आपने भोजन दिया था या नहीं?

वो आपसे पूछेंगे कि आपने उसकी तस्वीरें बेच कर जो कमाई की, उसका कितना हिस्सा उस बच्चे को या उसके परिवार को गया? अगर सत्ता से सवाल पूछना ही पत्रकारिता है तो सत्ताधीश तो हर क्षेत्र में हैं, मीडिया में भी।

…जब पुलिस कमिश्नर ही पहुँच गए चर्च, पादरियों के साथ गाया गाना: लॉकडाउन के सवाल पर बोले – ‘आशीर्वाद लेने गया था’

बेंगलुरु के पुलिस आयुक्त भास्कर राव का एक वीडियो सोशल मीडिया पर इस वक़्त तेज़ी से वायरल हो रहा है। इसमें वे लॉकडाउन का उल्लंघन कर शहर के एक स्थानीय चर्च में ईसाई पुजारियों के एक समूह के साथ प्रार्थना करते नजर आ रहे हैं।

बता दें कि ये वही भास्कर राव हैं, जिन्हें कर्नाटक में कोरोनो वायरस की लड़ाई लड़ने में और लोगों से लॉकडाउन का पालन कराने के लिए सबसे ज्यादा सराहा गया था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, भास्कर राव पिछले हफ्ते बेंगलुरु के सेंट मार्क कैथेड्रल चर्च में मौजूद थे, जहाँ उन्हें चर्च के गाना गाने और बजाने वालों के साथ गाते देखा गया था। इसके बाद वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया गया, जो वायरल हो गया।

इस वीडियो में वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी भास्कर राव, ईसाई पुजारियों के साथ चर्च में गा रहे थे। साथ ही कई अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, अतिरिक्त पुलिस आयुक्त सौमेंदु मुखर्जी को भी गिरजाघर में एक साथ प्रार्थना और गाते हुए देखा गया।

गौरतलब है कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों सहित चर्च में भीड़ को एक दूसरे के साथ खड़े होकर सामाजिक दूरियों के मानदंडों का उल्लंघन करते देखा जा सकता है। क्या इन लोगों पर लॉकडाउन के नियम लागू नहीं होते?

सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रिया

चर्च में बेंगलुरु के टॉप पुलिसकर्मियों की उपस्थिति से नाराज़ लोगों ने सोशल मीडिया के जरिए उन पर कई सवाल खड़े कर दिए। कई सोशल मीडिया यूज़र्स ने राव से पूछा कि आख़िर उन्हें इस लॉकडाउन में चर्च जाने की क्या आवश्यकता पड़ गई थी।

सोशल मीडिया यूज़र्स ने सवाल किया कि लॉकडाउन अवधि के दौरान पुलिस प्रमुख इस तरह की धार्मिक सभा में कैसे भाग ले सकते हैं, जब सभी धर्मों और धर्मों से जुड़ी सारी मंडलियाँ देश भर में प्रतिबंधित हैं।

एक यूजर ने पूछा कि कमिश्नर भास्कर राव द्वारा रेड ज़ोन के तहत एक चर्च में प्रार्थना करना नियमों का उल्लंघन नहीं है क्या? उन्होंने यह भी बताया कि सारे मंदिर दो महीने से बंद हैं।

“सरकार ने लोगों को मंदिरों, मस्जिदों और चर्चों में जाने पर प्रतिबंध लगा दिया था। जितनें भी लोग पूजा पाठ करते थे, वे सब भी इस वक़्त बंद हैं। सरकारी नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए आयुक्त इस नियम का उल्लंघन कैसे कर सकते हैं? एक यूजर ने पूछा।

IPS भास्कर राव की सफाई

वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी भास्कर राव ने डेक्कन हेराल्ड से बात करते हुए अपनी सफाई में कहा कि वह सभी धार्मिक स्थानों का दौरा कर रहे थे, ताकि कोरोनो वायरस संकट से लड़ने के लिए आशीर्वाद माँगा जा सके।

उन्होंने कहा, “यह लॉकडाउन नियमों का उल्लंघन नहीं है क्योंकि सभी का मेडिकल परीक्षण हुआ था और सभी ने सोशल डिस्टेंसिग को बनाए रखा था”।

साथ ही उन्होंने कहा की वे विभिन्न समुदाय के नेताओं के साथ बातचीत कर रहे है ताकि उनकी मदद से हम लोगों के अंदर कोरोनो वायरस महामारी की स्थिति पर जागरूकता पैदा कर सके। जो इस समय अत्यधिक महत्व रखता है।

फैजल सिद्दीकी ने TikTok पर एसिड अटैक को किया प्रमोट, 1.34 करोड़ हैं फॉलोवर

सोशल मीडिया एप्लीकेशन टिक-टॉक (TikTok) पर एक वीडियो वायरल हुआ है, जिसमें एसिड अटैक का महिमामंडन किया गया है। ट्विटर पर लोगों ने फैज़ल सिद्दीकी के इस वीडियो को लेकर नाराज़गी जताई और कार्रवाई की माँग की। अतुल आहूजा ने इस वीडियो को लोगों के सामने रखते हुए कहा कि एसिड अटैक झेलने का अर्थ क्या है, ये शायद ही कोई समझ सकता हो। उन्होंने लिखा कि इससे डरावना शायद ही कुछ हो।

इस वीडियो को ट्वीट करते हुए अतुल ने कहा कि टिक-टॉक (TikTok) पर किसी को इस तरह से एसिड अटैक को मजाक बना देने का अर्थ है कि एसिड अटैक झेलने वाली महिलाओं को रोज होने वाली पीड़ा का मखौल उड़ाना। ये वीडियो टिक-टॉक (TikTok) पर फैज़ल सिद्दीकी ने डाला है। फैज़ल के फॉलोवरों की संख्या 1.34 करोड़ है। इस वीडियो में फैज़ल कहता है- “उसने तुम्हें छोड़ दिया, जिसके लिए तुमने मुझे छोड़ा था?” इसके बाद लड़की के चेहरे पर एक लिक्विड फेंका जाता है और उसका चेहरा पूरा जल जाता है।

कुछ लोगों ने इस वीडियो में एक्ट करने वाली युवती के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई की माँग की और कहा कि एक महिला होने के नाते उसे तो कम से कम एसिड अटैक पीड़ितों की व्यथा के बारे में सोचना चाहिए था लेकिन फिर भी वो इस क्रूर अपराध के महिमामंडन में हाथ बँटा रही है। दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता तजिंदर बग्गा ने राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा को टैग कर के कार्रवाई की माँग की। शर्मा ने कहा कि वो टिक-टॉक (TikTok) और पुलिस, दोनों के समक्ष इससे लेकर जाएँगी।

सामाजिक कार्यकर्त्ता आशीष ने तो इस वीडियो के खिलाफ शिकायत भी दर्ज कराई। उन्होंने कहा कि इस तरह से टिक-टॉक (TikTok) पर एसिड अटैक को प्रोमोट किया जाना बर्दाश्त करने लायक नहीं है। उन्होंने अपनी शिकायत में लिखा कि टिक-टॉक (TikTok) के नवाब गैंग का हिस्सा फैज़ल सिद्दीकी ख़ुद को सोशल इन्फ्लुएंसर बताता है। उन्होंने लिखा कि इस तरह के वीडियो के द्वारा ये दिखाया जा रहा है कि अगर कोई महिला आपको रिजेक्ट करती है तो आप उस पर एसिड अटैक कर के इसका बदला लो, जो ग़लत है।

बता दें कि फैज़ल सिद्दीकी ने दीपिका पादुकोण की फ़िल्म ‘छपाक’ का समर्थन किया था, जिसमें एसिड अटैक पीड़ित महिलाओं की व्यथा दिखाने का दावा किया गया था। दीपिका फिल्म के प्रमोशन के लिए जेएनयू गई थीं, इसीलिए फैज़ल ने ऐसा किया था। दीपिका ने भी एसिड अटैक को लेकर लोगों को वीडियो बनाने की सलाह दी थी, जिसके बाद उनकी आलोचना हुई थी। उनके टिक-टॉक चैलेन्ज को लोगों ने एसिड अटैक पीड़ित महिलाओं के दर्द का मजाक बताया था।

‘…चाहो तो पूरे 22 करोड़ को लेकर आ जाओ’ – शिखर धवन ने अफरीदी को दी चैलेंज

जम्मू कश्मीर पर भारत-विरोधी रुख का खुलेआम प्रदर्शन करने वाले पाकिस्तानी क्रिकेटर शाहिद अफरीदी को भारतीय सलामी बल्लेबाज शिखर धवन ने करारा जवाब दिया है। शाहिद अफरीदी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भी आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था। शिखर धवन उर्फ़ ‘गब्बर’ ने उन्हें ललकारते हुए कहा कि तुम चाहे पूरे 22 करोड़ लोगों को लेकर आ जाओ, यहाँ का एक-एक व्यक्ति सवा लाख के बराबर है।

शिखर धवन ने ट्विटर पर लिखा, “इस वक़्त जब सारी दुनिया कोरोना से लड़ रही है, उस वक़्त भी तुमको कश्मीर की ही पड़ी है? कश्मीर हमारा था, हमारा है और हमारा ही रहेगा।” धवन ने पाकिस्तान की जनसंख्या का जिक्र करते हुए अफरीदी से कहा कि बाकी गिनती अपने-आप देख लेना। धवन के इस ट्वीट को लोगों ने हाथोंहाथ लिया। काफ़ी सारे पाकिस्तानियों ने धवन के प्रोफाइल पर पहुँच कर गाली-गलौज भी की।

बता दें कि जम्मू कश्मीर के पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले हिस्से में जाकर शाहिद अफरीदी ने भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भला-बुरा कहा था। अफरीदी ने कहा था-

“कोरोना से भी बड़ी बीमारी मोदी (प्रधानमंत्री मोदी) के दिलो-दिमाग में हैं और वह बीमारी मजहब की बीमारी है। मजहब को लेकर वह सियासत कर रहे हैं और हमारे कश्मीरी भाई-बहनों और बुजुर्गों के साथ जुल्म कर रहे हैं। उन्हें इसका जवाब देना ही होगा।”

उन्हें जवाब देते हुए पूर्वी दिल्ली के सांसद और पूर्व क्रिकेटर गौतम गंभीर ने तंज कसते हुए अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा था कि यह 16 साल का शख्स कहता है कि पाकिस्तान की 7 लाख सेना को 20 करोड़ लोगों का समर्थन है। पर बावजूद इसके ये पिछले 70 साल से कश्मीर की भीख माँग रहे हैं।

गंभीर ने कहा कि अफरीदी, इमरान और बाजवा जैसे जोकर भारत और PM मोदी के खिलाफ जहर उगल कर पाकिस्तान के लोगों को बेवकूफ बना सकते हैं। इसके साथ ही गंभीर ने अफरीदी को बड़ा इशारा करते हुए लिखा कि इन लोगों को निर्णायक दिन तक कश्मीर नहीं मिलेगा। बांग्लादेश याद है ना आपको? 

हरभजन सिंह ने भी करारा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि वो देश के लिए बन्दूक तक उठा लेंगे। भज्जी ने कहा कि शाहिद अफरीदी से उनकी दोस्ती यहीं ख़त्म हो गई और उन्होंने अफरीदी के फाउंडेशन के लिए दान की अपील की थी लेकिन अब ये दोबारा नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि अफरीदी हद पार कर गए हैं। युवराज सिंह ने भी कहा कि उन्होंने मानवता के आधार पर अफरीदी के लिए मदद माँगी थी लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।

हिंदुओं की दुकान से खरीदारी पर मुस्लिम महिलाओं को कट्टरपंथियों ने धमकाया, गाली-गलौज की: देखें Video

कर्नाटक के दावणगेरे जिले से एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है। यहाँ मुस्लिम गुंडे हिंदुओं की दुकान से सामान खरीदने वाली मुस्लिम महिलाओं को निशाना बना रहे हैं।

इससे संबंधित कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है। वीडियो में हिंदू दुकान से सामान खरीदने पर मुस्लिम महिलाओं के मुस्लिम भीड़ को साथ गाली-गलौज करते हुए देखा जा सकता है। एक वीडियो में मुस्लिम भीड़ ने दावणगेरे की सड़कों पर मुस्लिम महिलाओं के एक समूह से सवाल-जवाब करना शुरू कर दिया, जो हिंदू दुकान से खरीददारी करने निकली थीं।

वीडियो में देखा जा सकता है कि रमजान के पवित्र महीने में जैसे ही हिंदुओं के स्वामित्व वाली एक लोकप्रिय कपड़े की दुकान ‘बीएस चन्नबसप्पा एंड संस’ से बुर्का-पहने महिलाएँ बाहर निकलती हैं कि मुस्लिमों की भीड़ उन पर आक्रामक हो जाती है। उनको चारों तरफ से घेर लिया जाता है और सवाल-जवाब किए जाते हैं।

इतना ही नहीं उनके हाथ से कपड़ों की थैली भी छीन ली जाती है और कपड़े रखकर थैली को फेंक दी जाती है। शायद इसलिए क्योंकि उस थैली का रंग ‘भगवा’ था। वीडियो में महिलाओं को आक्रामक मुस्लिम भीड़ से जाने देने की विनती करते हुए देखा जा सकता है।

इसी घटना का एक दूसरा वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे मुस्लिम मुस्लिम महिलाओं को हिंदू स्टोर से खरीदे गए सामान को वापस करने के लिए मजबूर किया जाता है।

एक लड़का बुर्का पहने मुस्लिम महिला के हाथ से नारंगी रंग के थैले छीन लेता है और फिर मुस्लिम भीड़ दो मुस्लिम महिलाओं को ऑटो में बैठने के लिए मजबूर करता है, ताकि वो हिंदू दुकान जाकर सामान वापस करके आएँ।

इसी तरह, एक अन्य मुस्लिम भीड़ ने दावणगेरे शहर के एक अन्य हिस्से में इसी तरह एक दुकान पर खरीददारी के लिए गई दो महिलाओं और एक बच्चे को धमकी दी। वीडियो में देखा जा सकता है कि उर्दू में बात कर रहे एक शख्स बुर्का पहने महिला और उसके बच्चे को कपड़े की दुकान में प्रवेश नहीं करने के लिए धमकाता है। बताया जा रहा है कि यह घटना दावणगेरे शहर के क्लॉक टॉवर के पास की है।

उर्दू में बोलने वाली भीड़ को महिलाओं को ‘मालाबार कॉटन्स’ नामक दुकान पर कपड़े खरीदने के लिए धमकाते हुए देखा जा सकता है और बार-बार यह कहते हैं कि वह लगातार चेतावनी देने के बावजूद उस दुकान पर क्यों गईं।

एक डरा हुआ बच्चा भी यह कहते हुए देखा गया कि उन्होंने दुकान से कुछ नहीं खरीदा। हालाँकि ऑपइंडिया इस बात की पुष्टि नहीं कर सका कि ‘मालाबार कॉटन्स’ का मालिक हिन्दू है, मगर वीडियो देखकर लगता है कि यह हाल का ही है, क्योंकि कोरोना वायरस और लॉकडाउन की वजह से लोगों को मास्क पहने हुए देखा जा सकता है।

क्रिकेटर हरभजन सिंह और युवराज सिंह ने शाहिद अफरीदी को दिया करारा जवाब, कहा- अपनी हद में रहें

गौतम गंभीर के बाद अब क्रिकेटर हरभजन सिंह और युवराज सिंह ने पाकिस्तानी क्रिकेटर शाहिद अफरीदी को कश्मीर राग अलापने पर करारा जवाब दिया है।
हरभजन सिंह उर्फ भज्जी ने कहा कि मैंने और युवराज ने मानवता के लिए अफरीदी फाउंडेशन के लिए लोगों से दान देने की अपील की थी। लेकिन उनके ऐसे विचार सुनकर दुख पहुँचा है।

हरभजन सिंह ने कहा, “अब उनसे (शाहिद अफरीदी) जो दोस्ती थी वह यहीं खत्म हो गई। अफरीदी को अपनी हद में रहना चाहिए। हमने मानवता के लिए उनके फाउंडेशन के लिए लोगों से दान देने की अपील की थी, लेकिन अब भविष्य में उनके लिए हम दोबारा कभी ऐसा नहीं कर पाएँगे।”

हरभजन सिंह ने कहा, “अफरीदी ने अपनी सारी हदें पार कर दी हैं। यह बहुत निराश करने वाली बात है कि शाहिद आफरीदी हमारे देश और प्रधानमंत्री के बारे में ऐसी घटिया बातें कर रहा है। इसे बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”

हरभजन सिंह ने कहा, “मैं इस देश में पैदा हुआ और इस देश में मरूँगा मैंने अपने देश के लिए 20 साल क्रिकेट खेला है और भारत के लिए कई मैच जीते हैं। कोई यह नहीं कह सकता कि मैंने अपने देश के खिलाफ कुछ भी किया है। अगर मेरे देश को कहीं भी मेरी जरूरत है, भले ही सीमा पर, मैं अपने देश की खातिर बंदूक उठाने वाला पहला व्यक्ति बनूँगा।”

वहीं क्रिकेटर युवराज ने अफरीदी के कश्मीर राग अलापने और मोदी पर टिप्पणी करने पर ट्वीट करते हुए लिखा, “शाहिद अफरीदी ने हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी पर जो कॉमेंट किया उससे बहुत दुखी हुआ हूँ। एक जिम्मेदार भारतीय होने के नाते मैं उस शख्स के बारे में ऐसे शब्द कभी स्वीकार नहीं करूँगा, जिन्होंने देश के लिए अपना योगदान दिया है। मैंने मानवता के लिए आपकी प्रार्थना पर लोगों से अपील की थी। लेकिन अब ऐसा दोबारा नहीं होगा। जय हिंद।”

दरअसल, इससे पहले अफरीदी के वीडियो सामने आने पर पूर्व ओपनर गौतम गंभीर ने उन पर करारा पलटवार किया था। गंभीर ने तंज कसते हुए अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा था कि यह 16 साल का शख्स कहता है कि पाकिस्तान की 7 लाख सेना को 20 करोड़ लोगों का समर्थन है। पर बावजूद इसके ये पिछले 70 साल से कश्मीर की भीख माँग रहे हैं।

गंभीर यहीं पर ही नहीं रुके। अफरीदी के वार पर गंभीर ने पाक पीएम इमरान और सेना के चीफ बाजवा पर भी पलटवार किया। गंभीर ने कहा कि अफरीदी, इमरान और बाजवा जैसे जोकर को भारत और मोदी जी के खिलाफ जहर उगल कर पाकिस्तान के लोगों को बेवकूफ बना सकते हैं। इसके साथ ही गंभीर ने अफरीदी को बड़ा इशारा करते हुए लिखा कि इन लोगों को निर्णायक दिन तक कश्मीर नहीं मिलेगा। बांग्लादेश याद है ना आपको?

आपको बता दें कि पाकिस्तानी के पूर्व कप्तान शाहिद अफरीदी का एक वीडियो इस समय सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है, जिसमें अफरीदी कहते हुए नजर आ रहे हैं,

“वैसे तो मोदी बहुत दिलेर बनने की कोशिश करते हैं, लेकिन हैं वो डरपोक आदमी। इतने छोटे से कश्मीर के लिए उन्होंने 7 लाख की फौज जमा की, जबकि पाकिस्तान की कुल फौज 7 लाख की है लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि उनके पीछे 22-23 करोड़ की फौज (पाकिस्तान की जनसंख्या) खड़ी है।”