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रोहिंग्याओं की तस्वीरों को भारत की बताकर कॉन्ग्रेस ने कहा भारतीय रेलवे को ईस्ट इंडिया कम्पनी से भी बदतर

कोरोना वायरस की महामारी के कारण जारी देशव्यापी लॉकडाउन के बीच अन्य राज्यों में फँसे हुए लोगों का राजनीतिकरण करने के लिए कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से लेकर कॉन्ग्रेस आईटी सेल पूरा जोर लगा रहा है

यही वजह है कि कॉन्ग्रेस के द्वारा सोशल मीडिया पर बांग्लादेशियों और रोहिंग्याओं की तस्वीरों के जरिए झूठ का सहारा लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

‘दलित कॉन्ग्रेस’ नाम के ट्विटर एकाउंट से एक ऐसी तस्वीर शेयर की गई है, जिसमें एक व्यक्ति को अपनी पीठ पर बूढ़ी महिला को ले जाते हुए देखा जा सकता है। कॉन्ग्रेस के इस ट्विटर अकाउंट में बताया गया है कि यह कॉन्ग्रेस का SC विभाग है।

इस ट्वीट में लिखा है – “@narendramodi जी, क्या आप इनके चेहरे की बेबसी को आप पढ़ पा रहे हैं?”

ऐसे ही कॉन्ग्रेस के ही एक अन्य ट्विटर एकाउंट – ‘हिमाचल प्रदेश कॉन्ग्रेस सेवादल’ द्वारा भी एक पोस्ट में यही तस्वीर ‘रोने वाली तीन इमोजी’ के साथ शेयर की गई है। जिसके साथ लिखा है- “आज देश के शासक ने क्या हालत कर दी, एक मजबूर माँ ..!! #HappyMotherDay” कुछ तो करो सरकार..”

बांग्लादेशी रोहिंग्याओं की तस्वीर शेयर कर रही है कॉन्ग्रेस

उल्लेखनीय है कि फर्जी तस्वीर के द्वारा सरकार की कार्यशैली पर भ्रम पैदा करने के लिए कॉन्ग्रेस ने जिन दोनों एकाउंट का इस्तेमाल किया है वो ट्विटर द्वारा भी सत्यापित हैं।

जिस तस्वीर को कॉन्ग्रेस के ये एकाउंट शेयर कर रहे हैं वो बांग्लादेशी रोहिंग्याओं की है। श्रीवास्तव (Srivastava), जो कि कर्नाटक, कॉन्ग्रेस के सोशल मीडिया प्रभारी हैं, ने भी इन्टरनेट से रेंडम तस्वीरें उठाकर शेयर करते हुए लिखा है कि भारतीय रेलवे ईस्ट इंडिया कम्पनी से भी बदतर हैं।

ऐसे में सवाल यह है कि जब ये तस्वीरें भारत की ही नहीं हैं तो फिर कॉन्ग्रेस और उसके कार्यकर्ता इन तस्वीरों में भारत सरकार के बजाए बांग्लादेश की सरकार को टैग करते हुए सवाल क्यों नहीं कर रहे हैं? और यदि ये भारत की तस्वीरें ही नहीं हैं तो फिर कॉन्ग्रेस फर्जी तस्वीरें, फेक ख़बरें शेयर कर क्या साबित करने का प्रयास कर रही है?

वास्तव में मीडिया मैनेजमेंट में लगी हुई कॉन्ग्रेस निरंतर ही कोरोना वायरस की महामारी से पीड़ितों के माध्यम से अपनी राजनीति को नई दिशा देने का मौका तलाश रही है। यही वजह है कि जहाँ पहले उसने अपने खर्चे से श्रमिकों को घर भेजने का झूठा और फर्जी दावा किया, वहीं अब रोहिंग्याओं को अपने झूठ का सहारा बना रहा है।

पुलिस से बहस कर सड़क पर पढ़ी गई जनाजे की नमाज, रजा अकादमी के संस्थापक समेत 125 के खिलाफ मामला दर्ज

मुंबई में डोंगरी पुलिस ने रज़ा अकादमी के संस्थापक सईद नूरी समेत 125 लोगों के खिलाफ सोमवार (मई 11, 2020) को लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन करने के आरोप में केस दर्ज किया। इन लोगों पर आरोप है कि ये सभी लोग जनाजे की नमाज को बिना सोशल डिस्टेंशिंग का पालन किए अता कर रहे थे।

टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार, डोंगरी पुलिस ने बताया, 7 मई को रजा अकादमी से जुड़े 72 वर्षीय नल बाजार निवासी बाबू बाटावाला का इंतकाल हो गया था। इसके बाद उनकी शवयात्रा निकाली गई। जिसमें लॉकडाउन का नियम तोड़ते हुए भारी संख्या में मुस्लिम समाज के लोग शामिल हुए।

पुलिस ने बताया कि बाबू के जनाजे में करीब 150 लोग इकट्ठा हुए। मगर, पुलिस के अनुरोध के बावजूद इन लोगों ने सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने से इंकार कर दिया और पुलिस अधिकारियों से बहस की। इसके बाद इन्होंने ताबूत को रास्ते में रखा और बिना सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किए जनाजे की नमाज अता की।

अब पुलिस ने इस मामले के संबंध में सईद नूरी, सलीम बाटावाला, हासाभाई, मुन्नाभाई और 120 लोगों के ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 188, 269 और 270 के तहत मामला दर्ज किया। मगर, फिलहाल इनमें किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई।

इस मामले में सबसे हास्यास्पद बात ये है कि जिन सईद नूरी के खिलाफ पुलिस ने कल सोशल डिस्टेंसिंग का उल्लंघन करने के आरोप में मामला दर्ज किया है, वही सईद नूरी पिछले दिनों मुंबई पुलिस की ओर से अपने समुदाय के लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग फॉलो करने की सलाह दे रहे थे।

इसके अलावा वे साल 2012 में आजाद मैदान में हुए दंगों में भी आरोपित हैं। जिसमें मुंबई पुलिस के मुताबिक कुल 2.74 करोड़ रुपयों की सार्वजनिक व निजी संपत्ति को क्षतिग्रस्त किया गया।

गौरतलब है कि इन दिनों कोरोना के कारण महाराष्ट्र के हालात बदतर हैं। ऐसे में इस तरह की हरकत व मनमानियाँ वहाँ की स्थिति को और बिगाड़ने में उत्तरदायी हो सकती है। इसलिए, उक्त लोगों पर उपयुक्त कार्रवाई आवश्यक है।

बता दें, लॉकडाउन के बाद से ऐसे कई मामले आए है, जहाँ नमाज के नाम पर नियमों का उल्लंघन कई बार हुआ। अभी बीते महीने ग्रेटर नोएडा से नमाज से जुड़ा ऐसा ही मामला आया था। जहाँ लॉकडाउन के बावजूद दो दर्जन लोग जमा हो गए थे और नमाज पढ़ने जा रहे थे। हालाँकि पुलिस को इसकी सूचना मिलते ही एक्शन लिया गया था और 7 लोगों की गिरफ्तारी हुई थी। इससे पहले मध्यप्रदेश में नमाज पढ़ने की खातिर इकट्ठा हुई भीड़ प्रशासन के लिए मुसीबत का कारण बनी थी और उस समय 40 पर मामला दर्ज किया गया था।

इमरान बयान से काम नहीं चलेगा, अब पाकिस्तानी सेना को भारत पर हमला करने का आदेश देना होगा: Pok के प्रधानमंत्री ने दी धमकी

अपने विवादित बयानों के लिए पहचाने जाने वाले POK के प्रधानमंत्री रज़ा फारूख हैदर एक बार फिर गैर जिम्मेदाराना बयान के कारण सुर्खियों में हैं। इस बार उन्होंने पाक पीएम इमरान खान से अपनी फौज के साथ भारत पर हमला करने के लिए कहा है।

न्यूज एजेंसी एएनआई के मुताबिक, रज़ा फारूख कोरोना की स्थिति का जायजा लेने एलओसी के पास स्थित गाँव में आए थे। वहीं उन्होंने ग्रामीणों से मुलाकात के दौरान और मीडिया से हुई बातचीत में ये विवादित बयान दिया।

मीडिया के साथ यहाँ बातचीत में हैदर ने कहा, “पीएम इमरान खान को अब जरूर कार्रवाई करना चाहिए और कड़ा कदम उठाना चाहिए। केवल बयान देने से अब काम नहीं चलेगा। आपको इससे आगे बढ़ते हुए अपनी सेना को भारत पर हमला करने का आदेश देना होगा।”

हैदर ने आगे कहा, “यह हमारा कर्तव्य है कि हम अपने भाइयों एवं बहनों की सुरक्षा करें। भारत पीओके के मौसम के बारे में हाल बता रहा है। इसे देखते हुए हमें भी दिल्ली के मौसम के बारे में अपडेट देना शुरू करना चाहिए।”

गौरतलब है कि हैदर का ये बयान उस समय आया है, जब पीओके कोरोना की गिरफ्त में जकड़ता जा रहा है और वहाँ आवश्यक वस्तुएँ पहुँचाने में भी दिक्कत हो रही हैं। ऐसे में अपनी जनता के लिए सुविधाएँ आश्वस्त करने की जगह रजा फारूख भारत पर हमला करने की बात कर रहे हैं।

बता दें, कुछ समय पहले पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने गिलगिट बाल्टिस्तान में आम चुनाव करने की इजाजत दे दी थी। इसके बाद भारत ने इसपर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया जताते हुए पाकिस्तानी राजनयिक को तलब करते हुए डिमार्शे जारी किया

जिसमें विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में ये कहा कि पीओके और गिलगिट-बाल्टिस्तान भारत का अभिन्न अंग हैं जिसपर पाक का अवैध कब्जा है। इसलिए अब उसे इन क्षेत्रों को तुरंत खाली करना चाहिए।

इसके बाद 5 मई को भारतीय मौसम विभाग ने पीओके और गिलगिट-बाल्टिस्तान के मौसम का हाल बताना शुरू किया। जिससे पाकिस्तान बौखला गया और रजा फारूख जैसे विवादित नेताओं ने भारत पर हमले का बयान दिया।

कुछ महीने पहले की बात करें, तो हैदर ने एक ऐसा ही विवादित बयान कश्मीर पर दिया था। हैदर ने उस समय कहा था कि जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियाँ जरूर जारी रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान सरकार की मौजूदा रणनीति से कश्मीर को अगले 700 वर्षों में भी आजादी नहीं मिलेगी।

‘पत्रकार’ ट्रोल स्वाति चतुर्वेदी ने की PM मोदी की हत्या की साजिश की भविष्यवाणी, जाँच की माँग होने पर ट्वीट किया डिलीट

हिंदुओं और विशेष रूप से मोदी के प्रति वामपंथी गिरोह द्वारा व्यक्त की गई घृणा किसी से छिपी नहीं है। आए दिन पीएम मोदी की मौत या हत्या की कामना करते नजर आते हैं। पिछले दिनों बॉलीवुड अभिनेता ऋषि कपूर की मौत के बाद भी कट्टरपंथी मुस्लिमों के साथ-साथ सोशल मीडिया के वाम-उदारवादियों ने अपनी घृणा को नया स्तर देते हुए लिखा कि ऋषि कपूर की जगह उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौत की खबरों का इंतजार है। 

इन्हीं मोदी विरोधी वामपंथी स्वयंभू पत्रकारों में से एक हैं- स्वाति चतुर्वेदी, जो हमेशा पीएम मोदी के खिलाफ जहर उगलती रहती हैं। मगर सोमवार (मई 11, 2020) को तो उन्होंने सारी हदें पार कर दीं। उन्होंने अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा, “भविष्यवाणी: हम जल्द ही पीएम मोदी की हत्या करने की साजिश के बारे में सुनेंगे।”

स्वाति चतुर्वेदी के ट्वीट से साफ जाहिर है कि पीएम मोदी की हत्या की साजिश की जा रही है, जिसके बारे में जल्द ही खुलासा होने वाला है। उनके इस ट्वीट के बाद लोगों ने अधिकारियों को सचेत करना शुरू किया और स्वाति चतुर्वेदी के खिलाफ कार्रवाई की माँग की।

लोगों का कहना था कि चूँकि उन्होंने भविष्यवाणी की है, तो इसका मतलब है कि उन्हें उनके विश्वसनीय ‘सूत्रों’ के माध्यम से इसके बारे में ज्यादा जानकारी होगी।

अंकित जैन नाम के यूजर ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “स्वाति चतुर्वेदी को हिरासत में लिया जाना चाहिए और प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश के बारे में पूछताछ करनी चाहिए।”

एक अन्य सोशल मीडिया यूजर ने गृह मंत्रालय से विस्तृत जाँच के लिए आग्रह किया, जिसमें कहा गया कि भारत में राजीव गाँधी की तरह एक और हत्या नहीं हो सकती।

रुपेश कार्तिक नाम के एक यूजर ने स्वघोषित पत्रकार को गिरफ्तार करने की माँग करते हुए लिखा, “स्वाति चतुर्वेदी के पास उस साजिश के बारे में अधिक जानकारी जरूर होगी, क्योंकि वह जीवन भर अर्बन नक्सल रही हैं। और ऐसे भी अर्बन नक्सल को नक्सल बनने में ज्यादा समय नहीं लगता, ऊपर से सामाना नरेंद्र मोदी जी से हो तो इन नक्सलों का दिमाग तो इनकी वाणी की तरह सड़ ही जाता है।”

एडवोकेट चाँदनी शाह ने भी उनके खिलाफ पुलिस शिकायत दर्ज की है और UAPA के तहत उनकी गिरफ्तारी की माँग की है।

भारत का सबसे बड़ा सेक्स कांड: 28 साल पहले कॉन्ग्रेसी सत्ता और चिश्ती के वंशजों ने तब खेला था यह ‘घिनौना खेल

90 के दशक का अजमेर। पत्रकार संतोष गुप्ता अपने दफ्तर में बैठे रहते थे। वहाँ लोगों का आना-जाना लगा रहता था, जो अचानक से ही बढ़ गया था। पूरे 90 के दशक में लोग लड़की की तस्वीर लेकर आते और पूछते थे- “क्या ये वही लड़की है?” दरअसल, वो ऐसे लोग होते थे, जिनकी शादी होने वाली होती थी और वो पहले ही इस बात की पुष्टि करना चाहते थे कि कहीं उनकी होने वाली पत्नी बलात्कार की शिकार तो नहीं। इस कहानी में अजमेर है, चिश्ती हैं, रेप है और ब्लैकमेलिंग है।

यह क्रम संतोष गुप्ता द्वारा अजमेर रेप-कांड का भाँडाफोड़ किए जाने के बाद से लेकर पूरे 90 के दशक के अंत तक चला था। उस समय भले इंटरनेट नहीं था लेकिन इस रेप व ब्लैकमेल स्कैंडल की ख़बरें लोगों के बीच आग की तरह फैली थी।

फरवरी 15, 2018। पुलिस ने इसी दिन इस केस के मुख्य आरोपित सुहैल गनी चिश्ती को गिरफ़्तार किया। इस ख़बर के बाद ही लोगों के बीच लगभग 3 दशक पहले की यादें ताज़ा हो गईं। अजमेर के लोग इस केस पर आज भी बात करने से हिचकिचाते हैं। आखिर बात करें भी तो क्या? ये वो केस है, जिसके बारे में वो समझते हैं कि इसने इस शहर को पूरी दुनिया में बदनाम कर के रख दिया।

अजमेर दरगाह अनुमान कमिटी के जॉइंट सेक्रेटरी मोसब्बिर हुसैन ने एक बार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ से बात करते हुए कहा था कि ये हमारे शहर पर लगा एक बदनुमा धब्बा है। संतोष गुप्ता ने इस केस का खुलासा अप्रैल 1992 को किया था। उन्होंने लड़कियों पर हुए अत्याचार की व्यथा को देश के सम्मुख रखा था।

कौन लोग थे, जिन्होंने इस शहर पर ऐसा दाग लगाया था? ये यहीं के लोग थे, खादिम थे। प्रभावशाली थे, अमीर थे और सफेदपोश थे। वो अपराधी नहीं दिखते थे, वो समाजसेवी के कलेवर में थे। कुल 8 लोगों के खिलाफ शुरुआत में मामला दर्ज किया गया था। इसके बाद जाँच हुई और 18 आरोपित निकले।

ये वही लोग थे, जिन पर सूफी फ़क़ीर कहे जाने वाले ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह की देखरेख की जिम्मेदारी थी। ये वही लोग थे, जो ख़ुद को चिश्ती का वंशज मानते हैं। उन पर हाथ डालने से पहले प्रशासन को भी सोचना पड़ता। अंदरखाने में बाबुओं को ये बातें पता होने के बावजूद इस पर पर्दा पड़ा रहा।

चेन के बारे में तो आपको पता ही होगा। एक के बाद एक को जोड़ कर चेन या श्रृंखला बनाई जाती है। मजहबी ठेकेदार के वेश में रह रहे दरिंदों ने यही तरीका अपनाया था। किसी युवती को अपने जाल में फँसाओ, उससे सम्बन्ध बनाओ, उसकी नग्न व आपत्तिजनक तस्वीरें ले लो, फिर उसका प्रयोग कर के उसकी किसी दोस्त को फाँसो, फिर उसके साथ ऐसा करो और फिर उसकी किसी दोस्त के साथ- यही उस गैंग का तरीका था।

ओमेंद्र भारद्वाज तब अजमेर के डीआईजी थे, जो बाद में राजस्थान के डीजीपी भी बने। वो कहते हैं कि आरोपित वित्तीय रूप से इतने प्रभावशाली थे और सामाजिक रूप से ऐसी पहुँच रखते थे कि पीड़िताओं को बयान देने के लिए प्रेरित करना पुलिस के लिए एक चुनौती बन गया था।

कोई भी पीड़िता आगे नहीं आना चाहती थी। उनका भी परिवार था, समाज था, जीवन था और ये लड़ाई उन्हें हाथी और चींटी जैसी लगती थी। केस लड़ने, आरोपितों के ख़िलाफ़ बयान देने और पुलिस-कचहरी के लफड़ों में पड़ने से अच्छा उन्होंने यही समझा कि चुप रहा जाए।

इस रेप-कांड की शिकार अधिकतर स्कूल और कॉलेज जाने वाली लड़कियाँ थीं। लोग कहते हैं कि इनमें से अधिकतर ने तो आत्महत्या कर ली। जब ये केस सामने आया था, तब अजमेर कई दिनों तक बन्द रहा था। लोग सड़क पर उतर गए थे और प्रदर्शन चालू हो गए थे। जानी हुई बात है कि आरोपितों में से अधिकतर समुदाय विशेष से थे और पीड़िताओं में सामान्यतः हिन्दू ही थीं।

28 साल से केस चल रहा है। कई पीड़िताएँ अपने बयानों से भी मुकर गईं। कइयों की शादी हुई, बच्चे हुए, बच्चों के बच्चे हुए। 30 साल में आखिर क्या नहीं बदल जाता?

हमारी समाजिक संरचना को देखते हुए शायद ही ऐसा कहीं होता है कि कोई महिला अपने बेटे और गोद में पोते को रख कर 30 साल पहले ख़ुद पर हुए यूँ जुर्म की लड़ाई लड़ने के लिए अदालतों का चक्कर लगाए। शायद उन महिलाओं ने भी इस जुल्म को भूत मान कर नियति के आगोश में जाकर अपनी ज़िंदगी को जीना सीख लिया है और उनमें से अधिकतर अपने हँसते-खेलते परिवारों के बीच 30 साल पुरानी दास्तान को याद भी नहीं करना चाहतीं।

18 आरोपितों में से एक ने आत्महत्या कर ली। फारूक चिश्ती तब यूथ कॉन्ग्रेस का नेता हुआ करता था, जिसे मानसिक रूप से विक्षिप्त घोषित कर दिया गया। ऐसा नहीं है कि सुनवाई नहीं हुई। सेशन कोर्ट ने 1998 में 8 आरोपितों को आजीवन कारावास की सज़ा तो सुनाई लेकिन इसके 3 सालों बाद 2001 में राजस्थान हाईकोर्ट ने इनमें से 4 को बरी कर दिया।

2003 में सुप्रीम कोर्ट ने मोइजुल्लाह उर्फ पट्टन, इशरत अली, अनवर चिश्ती और शमशुद्दीन उर्फ मैराडोना की सज़ा ही कम कर डाली। इन सबको मात्र 10 वर्षों का कारावास मिला। इनमें से 6 के ख़िलाफ़ अभी भी मामला चल रहा है। सुहैल चिश्ती 2018 में शिकंजे में आया था। एक आरोपित अलमास महाराज फरार है, जिसके ख़िलाफ़ सीबीआई ने रेड कॉर्नर नोटिस तक जारी कर रखी है। लोगों का मानना है कि वो अमेरिका में हो सकता है।

2007 में मानसिक विक्षिप्त घोषित आरोपित फारूक चिश्ती को अजमेर की एक फ़ास्ट ट्रैक अदालत ने दोषी मान कर सज़ा सुनाई और राजस्थान हाईकोर्ट ने इस निर्णय को बरकरार भी रखा। लेकिन, हाईकोर्ट ने उसके द्वारा तब तक जेल में बिताई गई अवधि को ही सज़ा मान लिया। चिश्तियों में अभी सिर्फ़ सलीम और सुहैल ही जेल में है। इस मामले में 200 से भी अधिक पीड़िताएँ हैं लेकिन कुछ ने ही बयान दिया। अफसोस, इनमें से शायद ही कोई अपने बयान पर कायम रही हों।

संतोष गुप्ता अपना अनुभव बताते हुए कहते हैं कि शुरू से ही पुलिस का जोर दोषियों को सज़ा दिलाने पर कम और कथित रूप से पैदा होने वाली ‘क़ानून व्यवस्था के विपरीत स्थिति’ से निपटने की तैयारी में ज्यादा था। सामाजिक स्तर पर इस केस का एक बुरा असर ये पड़ा था कि अजमेर की लड़कियों की शादी कराने में काफी मशक्कतें करनी पड़ती थीं। लोग उनके चरित्र पर सवाल उठाते थे। पूरे शहर को एक ही नज़र से देखा जाने लगा था।

इस केस पर बाद में टीवी मीडिया पर शो से लेकर किताबें तक लिखी गईं लेकिन एक चीज जो आज तक कहीं नहीं दिखा, वो है- न्याय। अगर उस समय पुलिस ने इस केस में आरोपितों पर शिकंजा कसा होता तो शायद उन्हें फाँसी की सज़ा भी मिल सकती थी।

एक और चीज जानने लायक है कि उस समय पीवी नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री थे और कॉन्ग्रेस पार्टी के अध्यक्ष भी वही हुआ करते थे। पूरे 5 सालों तक उन्होंने सरकार और संगठन को चलाया था। फारूक चिश्ती इंडियन यूथ कॉन्ग्रेस के अजमेर यूनिट का अध्यक्ष था। नफीस चिश्ती कॉन्ग्रेस की अजमेर यूनिट का उपाध्यक्ष था। अनवर चिश्ती अजमेर में पार्टी का जॉइंट सेक्रेटरी था। ऐसे में ये कहा जा सकता है कि शक्तिशाली कॉन्ग्रेस पार्टी, उसकी तुष्टिकरण की नीति और आरोपितों का समाजिक व वित्तीय प्रभाव- इन सबने मिल कर न्याय की राह में रोड़े खड़े कर दिए थे।

अक्टूबर 1992 में एक पत्रकार मैदान सिंह की हत्या कर दी गई थी, जो अजमेर में ‘लहरों की बरखा’ नामक दैनिक पत्रिका का संचालन करते थे। हॉस्पिटल में घुस कर उन्हें मार डाला गया था। इस हत्याकांड के लिंक इसी सेक्स स्कैंडल से जुड़े थे। इससे पहले भी उन पर गोलीबारी हुई थी, जिसमें उन्होंने कॉन्ग्रेस के पूर्व विधायक डॉक्टर राजकुमार जयपाल को आरोपित बनाया था। इसके अलावा नेता के दोस्त सवाई सिंह को भी आरोपित बनाया गया था, जो अजमेर का लोकल माफिया था।

इन सबके बावजूद पुलिस ने उनके बयान को नज़रअंदाज़ किया और पत्रकार मैदान सिंह की हत्या कर दी गई। एक अन्य आरोपित नरेंद्र सिंह की गिरफ़्तारी के बाद ही पुलिस ने कॉन्ग्रेस नेता को गिरफ्तार किया। इसके पीछे पुलिस को एक बड़े राजनीतिक-आपराधिक गठजोड़ की बू आई थी।

कहते हैं, ये रेप स्कैंडल किसी बड़े परिवार के एक लड़के और 9वीं कक्षा की एक लड़की के बीच प्रेम संबंध से शुरू हुआ था। लड़के के दोस्तों ने उन दोनों की अश्लील तस्वीरें निकाल ली थीं और लड़की को अपने दोस्तों से जान-पहचान कराने को कहा था। फिर तो इसका सिलसिला ही चल पड़ा। बाद में तो पुलिस ने भी माना कि उन्होंने जानबूझ कर खादिमों के विरुद्ध लीगल एक्शन नहीं लिया।

पुलिस को डर था कि इससे साम्प्रदायिक तनाव फैलेगा। इस स्कैंडल को सामने लाने वाले ‘नवज्योति’ के संपादक रहे दीनबंधु चौधरी ने कहा कि वो इसी उलझन में थे कि लड़कियों के खिलाफ हुए अत्याचार को तस्वीरों के जरिए बयाँ किया जाए या नहीं। फिर उन्होंने आगे बढ़ने का निश्चय किया और इन तस्वीरों के सामने आने के बाद ही प्रशासन की तंद्रा टूटी और वो भी तब, जब लोग सड़कों पर उतर आए।

मुख्यमंत्री भैरों सिंह शेखावत की सरकार ने जाँच के आदेश तो दिए लेकिन तब तक काफ़ी देर हो चुकी थी। कहा जाता है कि कॉन्ग्रेस नेता जयपाल का भी इस सेक्स स्कैंडल में हाथ था और पत्रकार मदन सिंह की हत्या भी इसी कारण हुई।

मदन सिंह इस पूरी घटना के तथ्यों का पर्दाफाश करने में लगे हुए थे। पुलिस ने इस हत्याकांड को गैंगवार का नतीजा करार दिया था। पुलिस ये मानने को तैयार ही नहीं थी कि इसका सेक्स स्कैंडल से कुछ लेना-देना हो सकता है। मदन और उनके भाइयों के आपराधिक इतिहास की बात करते हुए पुलिस ने दावा किया था कि पत्रकारिता उस परिवार के लिए एक कवर थी।

उस वक़्त अजमेर में 350 से भी अधिक पत्र-पत्रिका थी और इस सेक्स स्कैंडल के पीड़ितों का साथ देने के बजाए स्थानीय स्तर के कई मीडियाकर्मी उल्टा उनके परिवारों को ब्लैकमेल किया करते थे। आरोपितों को छोड़िए, इस पूरे मामले में समाज का कोई भी ऐसा प्रोफेशन शायद ही रहा हो, जिसने एकमत से इन पीड़िताओं के लिए आवाज़ उठाई हो।

आरोप यह भी है कि जिस लैब में फोटो निकाले गए, जिस टेक्नीशियन ने उसे प्रोसेस किया, जिन पत्रकारों को इसके बारे में पता था- उन सबने मिल कर अलग-अलग ब्लैकमेलिंग का धँधा चमकाया। पीड़ित लड़कियों और उनके परिवारों से सबने रकम ऐंठे। ऐसे में भला कोई न्याय की उम्मीद करे भी तो कैसे? कभी 29 पीड़ित महिलाओं ने बयान दिया था, आज गिन कर इनकी संख्या 2 है। सिस्टम ने हर तरफ से इन्हें तबाह किया।

शिक्षकों को बिना ट्रेनिंग कोरोना ड्यूटी, मना करने पर निलंबन की धमकी: मुंबई में BMC और शिवसेना की मनमानी

महाराष्ट्र सरकार कोरोना वायरस संक्रमण को हैंडल करने में लगातार फेल हो रही है। बृहन्मुम्बई महानगरपालिका (BMC) पर भी शिवसेना का ही शासन है। ऐसे में मुंबई में भी स्थिति का नियंत्रण से बाहर होने उद्धव ठाकरे की नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। BMC ने सभी स्कूली शिक्षकों को ‘कोरोना कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग’ के लिए रिपोर्ट करने का निर्देश दिया है। शिक्षक इस काम में लगाए जाने से नाराज़ हैं क्योंकि इससे उन्हें भी संक्रमण का ख़तरा बढ़ जाएगा।

बीएमसी के कई ऐसे शिक्षक हैं, जो 55 वर्ष ये इससे अधिक की उम्र के हैं। भारत सरकार कह चुकी है कि बच्चों और बुजुर्गों को घर में ही रखा जाए क्योंकि उनमें संक्रमण का ख़तरा ज्यादा है। ऐसी में बुजुर्ग शिक्षकों को कोरोना वायरस के मरीजों के संपर्क में आने वालो लोगों को ट्रेस करने भेजना ख़तरे से खाली नहीं हो सकता है। कई शिक्षकों के साथ पहले से ही कुछ मेडिकल समस्याएँ हैं, ऐसे में उन्हें इस काम में लगाए जाने वाले क़दम की आलोचना हो रही है।

सबसे बड़ी बात कि उन शिक्षकों को बीएमसी प्रशासन की तरफ से धमकी भी दी गई है कि अगर वो इस काम के लिए रिपोर्ट नहीं करते हैं तो उन्हें सस्पेंड किया जा सकता है।

बीएमसी ने इस काम के लिए कोई लिखित आदेश भी नहीं जारी किया है। जब शिक्षकों ने लिखित आदेश की माँग की तो कहा गया कि पहले वो रिपोर्ट करें, लिखित आदेश बाद में आएगा। पालघर, वसई और दहानू जैसे क्षेत्रों में भी कई शिक्षक रह रहे हैं, जिनका मुंबई आना-जाना काफी कठिन है। सभी शिक्षक अलग-अलग वार्ड में रहते हैं। वो अपने-अपने स्कूलों वाले क्षेत्रों में रहते हैं। उनके लिए ट्रान्सपोर्टेशन की भी सुविधा नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वो इन नॉन-शैक्षणिक ड्यूटी को करेंगे कैसे, जिसमें उनके ख़ुद बीमार पड़ने का ख़तरा है।

जहाँ एक तरफ कोरोना से जुड़े कार्यों में मेडिकल कर्मचारियों तक को ट्रेनिंग देने की ज़रूरत पड़ती है, इन शिक्षकों को बिना किसी प्रशिक्षण के कोरोना से सम्बंधित ड्यूटी करने बोला गया है। शिक्षकों ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपील की है कि लोग उनके लिए आवाज़ उठाएँ, ताकि उन्हें इस ख़तरे में नहीं पड़ना पड़े।

इससे पहले सायन अस्पताल में रिकॉर्ड किए गए एक वायरल वीडियो में, शव काले रंग के प्लास्टिक बैग में लिपटे हुए दिखाई दे रहे थे, जो इलाज के लिए कोविड-19 रोगियों के ठीक बगल में रखे हुए हैं। इस घटना के बाद अस्पताल के प्रबंधन और राज्य के अधिकारियों के बारे में गंभीर सवाल उठे थे। ऐसी भी ख़बर आई थी कि सरकार ने कोरोना महामारी की रोकथाम के लिए महामारी विभाग को इस्लामिक धर्मगुरू और स्थानीय मौलवियों के साथ योजना बनाने के लिए भी कहा है।

अर्नब के खिलाफ सैकड़ों FIR की एक जैसी भाषा पर कोर्ट ने सिब्बल से किया सवाल, कॉन्ग्रेस नेता ने माना- अधिकतर फोटोकॉपी

पालघर मामले में सोनिया गाँधी पर सवाल उठाने के बाद रिपब्लिक टीवी के एंकर अर्नब गोस्वामी के ख़िलाफ़ अलग-अलग राज्यों में दर्ज हुई सैकड़ों FIR को रद्द करने की याचिका पर कल (मई 11, 2020) कोर्ट में सुनवाई हुई।

अर्नब गोस्वामी द्वारा दायर इस याचिका में माँग की गई कि कॉन्ग्रेस ने उनके ख़िलाफ़ जो कई सारी एफआईआर करवाई हैं उन्हें रद्द किया जाए। इस बीच सुप्रीम कोर्ट की नजर सभी एफआईआर पर गई और कोर्ट ने हैरानी से सवाल पूछा कि आखिर गोस्वामी के ख़िलाफ़ दर्ज सभी एफआईआर की भाषा एक जैसी क्यों है?

सुनवाई के दौरान न्यायाधीश शाह ने जब कपिल सिब्बल से पूछा- अर्नब के ख़िलाफ दायर सैकड़ों एफआईआर के शब्द एक जैसे क्यों हैं? तो इसपर कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता सिब्बल को शर्मसार होना पड़ा और उन्हें मानना पड़ा कि अधिकतर एफआईआर फोटोकॉपी हैं।

इस बीच सॉलिस्टर जनरल तुषार मेहता ने मुंबई पुलिस पर निशाना साधा। उन्होंने अपनी राय रखते हुए कहा, “ये एक ऐसा मामला है जहाँ पुलिस का व्यवहार अनापेक्षित रहा और अगर पहली नजर में ये साबित होता है तो इस मामले में किसी स्वतंत्र जाँच एजेंसी से जाँच कराने की आवश्यकता है।”

तुषार मेहता ने इस मामले में आगे अपनी बात रखते हुए कहा कि अगर ये मामला स्वतंत्र एजेंसी द्वारा संभाला जाता है तो एजेंसी को खुद पर यकीन दिलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी और आरोपित भी नहीं कह पाएगा कि उसका शोषण किया गया।

अर्नब के ख़िलाफ़ ‘जाँच’ नहीं ‘प्रतिशोध’ चाहती हैं कॉन्ग्रेस

इस सुनवाई में अर्नब गोस्वामी के वकील हरीश साल्वे ने दावा किया कि ये एक ऐसा मामला है जहाँ कोई राजनैतिक पार्टी एक पत्रकार पर निशाना साध रही है। उन्होंने शिकायतों पर गौर कराते हुए कहा कि हर एफआईआर उसी पार्टी के सदस्यों ने दर्ज करवाई है, जिसे केंद्र सरकार से परेशानी है और जो पत्रकार को सबक सिखाना चाहते थे।

उन्होंने सुनवाई में बेंच के आगे अपना पक्ष रखते हुए कॉन्ग्रेस पर आरोप लगाया कि इन केसों के जरिए कॉन्ग्रेस पार्टी केवल एक अप्रिय आवाज को दबाना चाहती है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि यह मामला केवल अर्नब को लेकर है। जिसका उद्देश्य जाँच के दौरान बचकाने सवाल पूछकर अर्नब को सबक सिखाना है। ये सब केवल अर्नब और उनके प्रोफेशन को एक पाठ सिखाने के लिए है कि हम जो कर रहे हैं, वह उनके अनुसार गलत है।

सबसे हैरानी की बात इस सुनवाई में ये निकलकर सामने आई कि कपिल सिब्बल ने कॉन्ग्रेस पर आरोप लगाए जाने को ‘साम्प्रदायिकता’ बताया और जब हरीश सालवे ने कहा कि उन्हें मामले में जाँच करवाने में कोई आपत्ति नहीं है अगर मामला सीबीआई को दिया जाए। तो उन्होंने आपत्ति जताते हुए जवाब में ये कहा कि सीबीआई के हाथ में मामला जाने का मतलब है तुम्हारे हाथ में मामला जाना।

इस अजीबोगरीब रिप्लाई को सुनने के बाद हरीश साल्वे ने दो टूक कहा कि कपिल सिब्बल का बयान साबित करता है कि ये पूरा मामला पॉलिटिकली मोटिवेटिड है और वे चाहते हैं सिर्फ इस मामले में वही जाँच करें।

गौरतलब है कि पिछले दिनों अर्नब पर दायर कई प्राथमिकियों के मद्देनजर मुंबई पुलिस ने उनसे 12 घंटे पूछताछ की थी। बाद में मालूम चला कि जिस पुलिस अधिकारी ने उनसे पूछताछ की वो कोरोना पॉजिटिव पाया गया। इस संबंध में हरीश साल्वे ने कोर्ट को सूचित भी किया

वहीं अर्नब गोस्वामी ने इस मामले में सीबीआई जाँच की माँग करते हुए कोर्ट को कहा ये मामला केंद्र और राज्य की समस्या है और मुझे इसका हिस्सा बना दिया गया है।”अर्नब ने कहा, “बेशक मैं मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट जा सकता हूँ, मेरा अनुरोध ये है कि सीबीआई मामले में जाँच करें और रिपोर्ट फाइल करे।”

बता दें, हाल ही में रजा अकादमी द्वारा दायर एफआईआर में गोस्वामी को बांद्रा में मस्जिद के पास इकट्ठा प्रवासियों की भीड़ के मामले में साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने का आरोपित बनाया गया है और कपिल सिब्बल रजा अकादमी की ओर से उनके वकील हैं।

लॉकडाउन में साइकिल पर सब्जी बेचकर घर चलाने वाली लड़की को डिब्रूगढ़ पुलिस ने भेंट की बाइक

कोरोना महामारी के समय में लॉकडाउन का पालन कराने के लिए पुलिस द्वारा दिखाई गई सख्ती की कई लोगों ने आलोचना की। मगर, इस बीच कई जगह से सुरक्षा में तैनात पुलिस की कुछ ऐसी तस्वीरें भी आईं, जिन्होंने लोगों का दिल जीत लिया।

हाल की बात करें, तो दिल खुश करने वाली ये तस्वीरे असम से आई है। यहाँ डिब्रूगढ़ पुलिस ने एक सब्जी बेचने वाली बच्ची को उसकी सुविधा और व्यापार के लिए बाइक तोहफे में दी।

डिब्रूगढ़ पुलिस ने ट्विटर अकॉउंट पर इस बारे में जानकारी देते हुए बताया गया,“जनमोनी गोगोई नाम की बच्ची इस समय में अपने घर का लालन-पालन करने के लिए साइकिल पर सब्जी बेचती है। इसलिए हमने उसके आत्मसम्मान से प्रेरित होकर और अपने डीजीपी सर के निर्देशों को ध्यान में रखते हुए कि हमें खुद को पुलिस फोर्स से अर्थव्यवस्था के सूत्राधार में बदलना है, उसे उसके व्यवसाय के लिए बाइक भेंट की है।”

इस पर एक अन्य यूजर ने भी लिखा, “ये असम के डिब्रूगढ़ से जनमोनी गोगोई है। ये एक स्टूडेंट है। मगर, लॉकडाउन के दौरान इसने अपने कंधों पर अपने परिवार का जिम्मा उठाया और साइकिल पर सब्जी बेचनी शुरू की। अब डिब्रुगढ़ पुलिस उसकी लगन देखते हुए उसके घर गई और उसे उसके व्यापार के लिए एक बाइक भेंट की।”

गौरतलब है कि सोशल मीडिया पर डिब्रूगढ़ पुलिस के इस कदम को बहुत सराहा जा रहा है। यूजर्स इन तस्वीरों को शेयर करते हुए पुलिस की काफी तारीफ कर रहे हैं और जनमोनी को भी आशीष दे रहे हैं। कोई बच्ची को महान बेटी बोल रहा है, तो कोई उसे योद्धा पुकार रहा है।

कुछ लोग ऐसे भी हैं जो डिब्रुगढ़ पुलिस के आत्मीय भाव को देखकर फूले नहीं समा रहे। यूजर्स इस कदम को एक आइडल उदाहरण बता रहे हैं और डिब्रूगढ़ पुलिस को धन्यवाद दे रहे हैं।

लोगों का कहना है कि इस बच्ची की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है। इसने किसी पुलिस पर पत्थर नहीं फेंका, सार्वजनिक और निजी संपत्ति को जलाया नहीं। और न ही इसने कभी पीएम, सीएम, डीएम को कोसा। इसने अपने घर परिवार की जिम्मेदारी उठाई और अपनी व अपने परिवार की मदद करने की ठानी। ये कर्म योगी है।

बता दें कि यूजर्स इस बाइक की तस्वीर को देखकर पुराने गाने और यादों को भी ताजा कर रहे हैं और बता रहे हैं कि एक समय ऐसा था जब कोयंबटूर के हर घर में ये काम करने वाला घोड़ा (tvs XL100 बाइक) होता था।

पूजास्थल में तोड़फोड़ और हंगामा: पत्थरबाजी और सांप्रदायिक हिंसा के बाद भैंसा में कर्फ्यू, 25 गिरफ्तार

तेलंगाना के निर्मल जिला स्थित भैंसा क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव और हिंसा के बाद पुलिस ने वहाँ कर्फ्यू लगा दिया है। पुलिस ने बताया है कि दो समुदायों के बीच हुई झड़प के बाद अब तक 25 लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका है। रविवार (मई 10, 2020) की रात को दूसरे समुदाय का एक व्यक्ति पूजा-स्थल में घुस गया, जिसके बाद वहाँ तनाव व्याप्त हो गया। उसने वहाँ तोड़फोड़ और हंगामा शुरू कर दिया। भैंसा में इसके बाद हिन्दू-मुस्लिम आमने-सामने आ गए और पत्थरबाजी व हिंसा चालू हो गई

सबसे पहले दोनों समुदायों के बीच कहासुनी हुई, जो बाद में मारपीट में बदल गई। पुलिस को भीड़ को तितर-बितर करने के लिए काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी। पुलिस द्वारा मामला शांत कराए जाने के बावजूद इलाक़े में हिंसक घटनाएँ होती रहीं। ऐसे में कर्फ्यू लगा कर अतिरिक्त जवानों को भैंसा शहर में भेजा गया। वरिष्ठ अधिकारियों ने पूरी स्थिति की समीक्षा की है। इस घटना में एक व्यक्ति के घायल होने की ख़बर है। मामले से सम्बंधित 4 केस दर्ज किए जा चुके हैं।

बताया गया है कि अब स्थिति ठीक है और इलाक़े में शांति बहाल करा दी गई है। तेलंगाना के गृहमंत्री मोहम्मद महमूद अली ने इसे हल्की-फुल्की घटना करार दी और कहा कि ये दो समुदायों के बीच पत्थरबाजी की वारदात है। उन्होंने जानकारी दी कि अतिरिक्त पुलिस बल तैनात करने के बाद पुलिस ने त्वरित एक्शन लिए हुए शांति व्यवस्था के लिए कदम उठाया है। उन्होंने कहा कि तेलंगाना के लोग हमेशा से गंगा-जमुनी तहजीब में आस्था रखते हैं और भाईचारे में उनका प्रबल विश्वास रहा है।

गृहमंत्री महमूद ने लोगों को अफवाह न फैलाने और अफवाहों पर विश्वास न करने की सलाह दी है। ये घटना शहर के शिवाजीनगर कॉलोनी में हुई। जो व्यक्ति नशे की हालत में पूजास्थल में घुसा था, उसे भी घायल होने के बाद निज़ामाबाद अस्पताल में भर्ती कराया गया है। उसकी हालत स्थिर है। करीमनगर रेंज के अधिकारी भी भैंसा में कैम्प कर रहे हैं। अस्पतालों और मेडिकल की दुकानों को छोड़ कर शहर में बाकी सारी कमर्शियल चीजों को बंद कर दिया गया है। उपद्रवियों ने एक मोटर बाइक और एक ऑटो रिक्शा को भी जला डाला।

इसी साल जनवरी में हिंदुओं के घरों पर विशेष समुदाय के लोगों ने जमकर हमला किया था। जिसके बाद भाजपा नेता पी मुरलीधर राव ने एआईएमआईएम और टीआरएस के गठजोड़ को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया था। वहीं निज़ामाबाद के सांसद अरविन्द धर्मपुरी ने भी आरोप लगाया था कि ओवैसी की पार्टी ने मुस्लिमों को भड़का कर हिंसा की वारदात को अंजाम दिया। लेकिन जब, तेलंगाना में एकमात्र भाजपा विधायक राजा सिंह पीड़ित हिंदुओं से मिलने पहुँचे तो उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था।

सिर्फ 1 कब्रिस्तान में 96 शव, तो कुल मौतें 73 कैसे: दिल्ली सरकार के आँकड़ों पर AajTak की रिपोर्ट से उठे सवाल

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कोरोना के कारण मरने वालों की संख्या को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। एक तरफ दिल्ली सरकार का कहना है कि वायरस के कारण मरने वाले 73 लोग हैं। जबकि आजतक की रिपोर्ट के अनुसार केवल आईटीओ स्थित कब्रिस्तान में कोरोना के कारण दफनाए जाने वालों की संख्या 96 गिनी गई है।

आजतक चैनल पर अपलोड किए गए वीडियो में स्वास्थ्य कर्मचारियों को कब्रिस्तान में प्रोटोकॉल फॉलो करते हुए मृतक को दफनाते देखा जा सकता है।

हम देख सकते हैं कि कैसे सभी स्वास्थ्य कर्मचारी शव को दफनाते हुए हर प्रकार का एहतियात बरत रहे हैं और उन्होंने खुद को बाकायदा पीपीई से कवर भी किया हुआ। इसके अलावा वीडियो में जमीन को खोदने के लिए जेसीबी मशीन भी खड़ी देखी जा सकती है।

मिलन शर्मा की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, कब्रिस्तान के रिकॉर्ड बताते हैं कि वहाँ 5 बीघे की जिस जमीन को कोविड-19 के लिए रखा गया है, उसमें संक्रमितों को दफनाने की संख्या 95 हो गई है और जो बॉडी वीडियो में दिख रही है, वह 96वाँ शव है। इस रिपोर्ट के बाद दिल्ली सरकार के डेटा और वास्तविक मौतों के आँकडों में एक बड़ा फर्क नजर आ रहा है।

मिलन शर्मा की रिपोर्ट में हम देख सकते हैं कि वे इस बात पर सवाल उठा रही हैं कि जब एक ही कब्रिस्तान में कोविड-19 से मरने वालों का आँकड़ा 96 है। तो फिर पूरी दिल्ली में संक्रमण से मरने वालों की संख्या 73 कैसे हो सकती है?

गौरतलब है कि इससे पहले दैनिक भास्कर ने भी दिल्ली सरकार के बताए आँकड़ों पर सवाल खड़ा किया था। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला था कि दिल्ली सरकार ने 2 मई तक कोरोना से मरने वालों की संख्या को 68 बताया। जबकि श्मशान और कब्रिस्तान में अभी तक 300 से अधिक डेडबॉडी पहुँच चुकी है।

इसके अलावा नॉर्थ एमसीडी की स्थायी समिति के अध्यक्ष जयप्रकाश जेपी ने भी दिल्ली सरकार पर राजनीति खेलने का आरोप लगाया था। इतना ही नहीं, अस्पताल में मौतों की संख्या भी इस ओर इशारा करती है कि दिल्ली सरकार जितनी मौतें बता रही है, वे वास्तविक मौतों के आँकड़ों से अलग है।