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आरोग्य सेतु ऐप का इस्तेमाल जरूरी, पर व्यक्ति और समाज की प्राइवेसी का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक

दिल्ली मे स्थापित टेक्नोलॉजी पॉलिसी क्षेत्र मे शोध कर रहे द डायलॉग (The Dialogue) नाम के थिंक टैंक ने आरोग्य सेतु ऐप से जुड़े हुए प्राइवेसी के मुद्दों को सुलझाने के लिए 14 बिंदुओं की एक रिपोर्ट तैयार की है। कोरोना वायरस से जूझते हुए देशों ने टेक्नोलॉजी का सहारा लेकर इस महामारी से संक्रमित लोगों को ढूँढने का प्रयास करना सही समझा है।

इस समय कांटेक्ट ट्रेसिंग ऐप का इस्तेमाल बेहद जरूरी है। इसके बिना महामारी का मुकाबला करना काफी मुश्किल साबित हो सकता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए द डायलॉग की यह रिपोर्ट दर्शाती है कि भारत जैसे आबादी वाले देश द्वारा आरोग्य सेतु ऐप का इस्तेमाल जरूरी तो है, पर इस ऐप का एक व्यक्ति और समाज की निजता को ध्यान में रखना अत्यंत आवश्यक है।

यह रिपोर्ट जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार एवं निजता के अधिकार को साथ में कैसे प्राप्त करना है, उसके उपाय पर रोशनी डालते हुए 11 प्रमुख सुझाव प्रस्तुत करती है।

इस सामंजस्य को बैठाने के लिए जरूरी है की ऐप के दिशा-निर्देश आवश्यक, कानूनी और आनुपातिक सीमा को ध्यान में रखे। यह रिपोर्ट उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित निजता के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए बनाई गई है। इससे ऐप की कार्यक्षमता पर समझौता किए बिना, इस ऐप के प्रति जनता में विश्वास जागरूक होगा।

इस ऐप की लोकप्रियता और साइबर सुरक्षा मे विकास हेतु ऐप को ओपन सोर्स बनाना महत्वपूर्ण है। ऐप के ओपन सोर्स होने से सभी लोग उसकी तकनीकी खामियों को परख कर उसमें बदलाव का सुझाव दे सकेंगे। इसके आलावा यह रिपोर्ट एक स्वतंत्र ऑडिटर के नियुक्ति का सुझाव प्रस्तुत करती है, जो यह सुनिश्चित करेगा कि निजता के प्रावधानों का पालन हर हाल में किया जा रहा है।

आरोग्य सेतु ऐप की प्राइवेसी पॉलिसी स्पष्ट रूप से एकत्रित डाटा के इस्तेमाल के उद्देश्यों को परिभाषित नहीं करती है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि इस ऐप द्वारा एकत्रित डाटा का शैक्षिक, अनुसंधान एवं आँकड़े जानने के अलावा किसी भी अन्य कार्य के लिए इस्तेमाल किया नहीं जाना चाहिए।

इस ऐप की प्राइवेसी पॉलिसी को इस तरह से डिजाइन किया जाना चाहिए कि न्यूनतम डाटा एकत्र करके अधिकतम फल मिले। रिपोर्ट में इस ऐप को कानूनी वैधता दिलाने के लिए राष्ट्रपति द्वारा एक अध्यादेश के प्रख्यापन का महत्व समझाया गया है।

सुझावों में सभी डाटा को एक निश्चित समय के बाद नष्ट करने (भविष्य की महामारियों से निपटने के लिए आवश्यक डेटा को छोड़कर), डाटा न्यूनीकरण, डाटा एनॉनिमायजेशन (टेक्नोलॉजी के माध्यम से किसी भी डाटा से व्यक्तिगत पहचान की जानकारी मिटाने की क्रिया) भी शामिल है।

जारी की गई रिपोर्ट ये भी सुझाव देती है कि व्यक्तिगत डाटा संग्रहित करने की समय-सीमा 21 दिनों पर तय की जानी चाहिए। इसके साथ ही रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई है कि इस ऐप की प्राइवेसी पॉलिसी में एक ऐसा प्रावधान लाना चाहिए जो एक पूर्व निर्धारित समय के पश्चात गैर व्यक्तिगत (नॉन-पर्सनल) डाटा को सर्वर से हटाने की बात करे।

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि यह ऐप इस महामारी से लड़ने के लिए बहुत जरूरी है। भारत के पास ये एक अच्छा मौका है कि वह इस ऐप के जरिए दुनिया के सामने एक मिसाल रखे और इस ऐप को बाकी देशों की तुलना में सबसे बेहतर बनाने की तरफ अग्रसर करे।

नोट: इस लेख के सह-लेखक आयुष त्रिपाठी हैं।

12 मई से 15 जोड़ी स्पेशल ट्रेनें चलेंगी: सोमवार शाम 4 बजे से रिजर्वेशन, कंफर्म टिकट होने पर ही कर सकेंगे यात्रा

कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए‍ 17 मई तक पूरे देश में लॉकडाउन जारी है। लेकिन रेलवे ने 12 मई से ही ट्रेनें चलाने का फैसला किया है। रेलवे चरणबद्ध तरीके से अपनी सेवाएँ शुरू करने की योजना बना रहा है। भारतीय रेलवे की योजना है कि 12 मई से धीरे-धीरे ट्रेनों का संचालन शुरू किया जाएगा।

जानकारी के मुताबिक 15 जोड़ी ट्रेनों (30 वापसी यात्रा) के साथ इस योजना की शुरुआत की जाएगी। इस दौरान नई दिल्ली स्टेशन से डिब्रूगढ़, अगरतला, हावड़ा, पटना, बिलासपुर, राँची, भुवनेश्वर, सिकंदराबाद, बेंगलुरु, चेन्नई, तिरुवनंतपुरम, मडगांव, मुंबई सेंट्रल, अहमदाबाद और जम्मू तवी को जोड़ने वाली इन ट्रेनों को विशेष ट्रेनों के रूप में चलाया जाएगा।

उसके बाद रेलवे कुछ अन्य मार्गों पर विशेष ट्रेनें संचालित करेगी। हालाँकि यह कोचों की उपलब्धता पर निर्भर करेगा, क्योंकि 20,000 कोचों को कोविड-19 केयर सेंटर के रूप में आरक्ष‍ित किया गया है। प्रतिदिन 300 श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलाने के लिए भी पर्याप्त संख्या में कोच रिजर्व हैं।

रेल मंत्रालय के अनुसार इन ट्रेनों में आरक्षण के लिए बुकिंग 11 मई को शाम 4 बजे से शुरू होगी और केवल IRCTC की वेबसाइट से ही टिकट बुक किए जा सकेंगे। रेलवे स्टेशनों पर टिकट बुकिंग काउंटर बंद रहेंगे और कोई काउंटर टिकट (प्लेटफॉर्म टिकट सहित) जारी नहीं किया जाएगा।

केवल वैध कंफर्म टिकट वाले यात्रियों को रेलवे स्टेशनों में प्रवेश करने की अनुमति होगी। यात्रियों को प्रवेश के दौरान मास्क अनिवार्य होगा और प्रस्थान के समय स्क्रीनिंग से गुजरना होगा और सिर्फ बिना कोरोना लक्षण वाले व्यक्तियों को ही यात्रा की अनुमति दी जाएगी।

हिंदुओं के घर फूँके, महिलाओं का यौन उत्पीड़न, बच्चों को पीटा: पाकिस्तान के सिंध और पंजाब की घटना

पाकिस्तान के सिंध और पंजाब प्रांत में एक बार फिर हिंदुओं को निशाना बनाया गया है। सिंध में उनके घरों को आग के हवाले कर दिया गया। पंजाब में महिलाओं का सरेआम यौन उत्पीड़न किया गया।

सिंध में हुए हमले का वीडियो मानवाधिकार कार्यकर्ता और वकील राहत ऑस्टिन ने शेयर किया है। उन्होंने लिखा है कि सिंध के मटियारी हाला में हिंदुओं के घरों में आग लगा दी गई। पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को पीटकर घर से बाहर निकलने को मजबूर कर दिया गया।

ऑस्टिन ने अपने ट्वीट में लिखा है कि सिंध में हिंदू हजार साल से रह रहे हैं। मुस्लिम पहले शरणार्थी के तौर पर आए और अब हिंदुओं को निशाना बना रहे हैं।

सोशल मीडिया में शेयर किए जा रहे वीडियो में आप घर से आग की लपटें निकलते देख सकते हैं। पीड़ित हिंदू परिवार की महिलाएँ और बच्चे ,चीखते-चिल्लाते दिखाई दे रहे हैं। वहीं सैकड़ों की संख्या में मौजूद भीड़ में से कुछ लोग घटना का वीडियो बना रहे हैं।

जानकारी के मुताबिक स्थानीय हिंदुओं का भील समुदाय इस इलाके में दशकों से रह रहा है, लेकिन यहाँ का बहुसंख्यक समुदाय (मुस्लिम) उनको अपना निशाना बनाते हुए आए दिन हमला करता रहता है। यहाँ रहने वाले लोग हिंदुओं को प्रताड़ित कर घर खाली करने के लिए मजबूर करते हैं।

दूसरी खबर पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के रहीमयार के चक नंबर 121 की है। इसे लेकर भी मानवाधिकार कार्यकर्ता राहत ऑस्टिन ने ट्वीट कर जानकारी दी है कि यहाँ रहने वाले एक शख्स और उसकी पत्नी पर कुछ लोगों ने हमला कर दिया। आरोप है कि महिला के साथ लोगों के सामने यौन प्रताड़ना भी की गई। इतना ही नहीं घटना में घायल हुए पति-पत्नी को इलाके से जाने के लिए मजबूर किया गया।

पिछले महीने भी पाकिस्तान के सिंध प्रांत में घोटकी के बाहरी इलाके में राजा फार्म क्षेत्र में स्थित हिंदुओं के घरों को आग लगा दिया गया था। इस घटना में कम से कम तीन बच्चे जिंदा जल गए थे।

आपको बता दें कि इससे पहले शनिवार (9 मई, 2020) को लाहौर की एक चर्च पर भी हमला किया गया था। बताया गया कि जमीन विवाद को लेकर चर्च को निशाना बनाया गया। इस दौरान अज्ञात हमलावरों ने चर्च में जमकर तोड़फोड़ की और चर्च की दीवार व बाउंड्री को तोड़ दिया था। घटना के बाद पीड़ित ईसाई समुदाय के नेताओं ने पुलिस मे शिकायत दर्ज कराई।

1857 का स्वतंत्रता संग्राम, मुस्लिम तुष्टिकरण और साम्प्रदायिकता… बाद में अलीगढ़ वाले सैयद अहमद की भूमिका

डलहौजी ने भारत से जाने के बाद, 29 फरवरी, 1856 को विक्टोरिया को एक पत्र लिखा। उसने अपनी महारानी को बताया कि भारत में शांति कब तक बनी रहेगी, इसका कोई भी सही आकलन नहीं है। उसने पत्र में आगे लिखा कि इसमें कोई छिपाव भी नहीं है कि किसी भी समय संकट उठ खड़ा हो सकता है।

भारत का अगला गवर्नर-जनरल कैनिंग बना और उसने भी डलहौजी के मत की पुष्टि की। जैसा कि अनुमान था, हकीकत में ही उपरोक्त चिट्ठी के एक साल के अन्दर ही भारत में स्वतंत्रता संग्राम शुरू हो गया था।

ब्रिटेन की तरफ से कोई प्रतिक्रिया होती, इससे पहले ही देश में स्वतंत्रता की लड़ाई व्यापक हो चुकी थी। इस तथ्य की पुष्टि हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में 13 जुलाई, 1857 को पूछे गए एक प्रश्न से हो जाती है। उस दिन ईस्ट इंडिया कंपनी के बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल के अध्यक्ष और गवर्नर-जनरल (1842-1844) रह चुके ऐलनबरो ने बताया कि यह ‘खतरनाक और लगातार फैल रहा हैं’। उसने संसद को यह भी बताया कि हमारा साम्राज्य खतरे में है और स्थिति बद-से-बदतर होती जा रही है।

भाषण के इन अंशों से स्पष्ट और पर्याप्त है कि संग्राम से ईस्ट इंडिया कंपनी, संसद और ब्रिटिश क्राउन सभी की नींवें हिल चुकी थी। स्वतंत्रता संग्राम का असर इतना तीव्र था कि विक्टोरिया को खुद हस्तक्षेप करके पूरी व्यवस्था में परिवर्तन करना पड़ गया था।

विक्टोरिया ने 19 जुलाई, 1857 को अपने प्रधानमंत्री पामर्स्टन को एक पत्र भेजा। उस चिट्ठी में ब्रिटेन की महारानी ने संग्राम को ‘भयभीत’ करने वाला अनुभव बताया। उसी दौरान पामर्स्टन ने भी एक पत्र लिखा। जिसके अनुसार उसे खुद भी अंदाजा नही था कि संग्राम देश भर में फैल जाएगा। इस चिट्ठी के आखिरी में ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने संग्राम का कारण हिन्दू संतों को बताया।

स्वतंत्रता संग्राम जब शुरू हुआ तो ब्रिटेन के प्रधानमंत्री पामर्स्टन थे। जब यह समाप्ति की ओर था तो वहाँ सरकार का नेतृत्व डर्बी के हाथों में था। दोनों का जिक्र इसलिए जरूरी है क्योंकि पामर्स्टन ने ही ईस्ट इंडिया कंपनी से सत्ता का हस्तांतरण क्राउन को दिए जाने का प्रस्ताव रखा। जिसे उसने हॉउस ऑफ कॉमन से पास करवा लिया था। जबकि डर्बी के कार्यकाल में यह प्रस्ताव अधिनियम बना। इस अधिनियम की एक महत्वपूर्ण उपज ‘सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फ़ॉर इंडिया’ नाम से नए विभाग का सृजन था। वैसे तो यह पूर्ववर्ती कंपनी के कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर के अध्यक्ष का ही नया नाम था, लेकिन इस बार इसकी कार्यशैली में परिवर्तन किया गया था।

भारत का पहला सेक्रटरी एडवर्ड हेनरी स्टेनली को बनाया गया जोकि डर्बी का बेटा था। विक्टोरिया ने खुद 1 नवम्बर, 1858 को इस विभाग के संदर्भ में घोषणाएँ की थीं। अब भारत के गवर्नर जनरल के नाम के आगे वायसराय शब्द जोड़ दिया गया था। ब्रिटेन की महारानी से सेक्रेटरी ऑफ स्टेट के माध्यम से वायसराय को आदेश और अधिनियम मिलने का प्रावधान भी शामिल किया।

वास्तव में, सेक्रेटरी ऑफ स्टेट की भूमिका एक कुख्यात साजिशकर्ता के रूप में थी। इसका एक उदाहरण 1883 में मिलता हैं। उस समय मुस्लिम राजनीति एक अंग्रेज लेखक डब्लूएस ब्लंट से बहुत हद तक प्रभावित थी। ब्लंट के माध्यम से ही भारतीय मजहबी नेताओं में पैन-इस्लामिज्म की धारणा तेजी से फैलनी शुरू हुई थी। इसने कोई दोराय नही है कि इस एक विचार ने भारतीय राष्ट्रवाद को बहुत नुकसान पहुँचाया था।

वास्तव में, पैन इस्लामिक मूवमेंट की शुरुआत अफगानिस्तान के जमाल अफगानी ने की थी। वह 1881 के आसपास भारत आया था और गुप्त रूप से मजहबी नेताओं को खलीफा के समर्थन के लिए भड़काता था। राष्ट्रवादी नेता बिपिन चन्द्र पाल अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, “इन सभी (मजहब विशेष के लोग) में पैन-इस्लामिक वाइरस का टीकाकरण किया गया। इसके बाद उन्होंने हिन्दुओं से राजनैतिक दूरियाँ बनाना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे हमारे राष्ट्रीय प्रयासों में हिन्दुओं और प्रबुद्ध मुस्लिमों के बीच गहरी खाई उत्पन्न होने लगी।”

समुदाय विशेष के बीच पनप रहे इस मूवमेंट की जानकारी ब्रिटिश सरकार को थी। उस वक्त के सेक्रटरी ऑफ़ स्टेट, हेमिल्टन ने वायसराय एल्गिन को 30 जुलाई, 1897 को एक पत्र लिखा, “पैन-इस्लामिक काउंसिल के माध्यम से हमें भारत में साजिश और उत्तेजनाओं को भड़काने का नया अवयव मिल गया है।” सेक्रेटरी ऑफ स्टेट का यही एक वास्तविक काम था, जिसकी जिम्मेदारी विक्टोरिया ने दी थी। इन षड्यंत्रों को पूरा करने की जिम्मेदारी वायसराय को मिली हुई थी।।

स्वतंत्रता संग्राम के बाद ब्रिटिश क्राउन का एकतरफा नियम था कि मुस्लिमों को हिन्दुओं के ब्रिटिश विरोधी आंदोलन में शामिल नहीं होने देना है। इसके लिए उन्होंने मजहबी तुष्टिकरण का इस्तेमाल किया। पिछले 150 सालों के इतिहास में इसके प्रारम्भिक निशान अलीगढ़ में मिलते हैं।

सैयद अहमद ने 1869 में इंग्लैंड का दौरा किया और अगले साल भारत लौटने के साथ ही मुस्लिमों में अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिमी संस्कृति के प्रसार के लिए जोरदार प्रचार शुरू कर दिया। उन्होंने 1877 में अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना की।

इतिहासकारों के अनुसार सैयद के प्रयास सामाजिक और धार्मिक सुधारों तक ही सीमित नहीं थे। इतिहासकार आरसी मजूमदार लिखते है कि उन्होंने मजहबी राजनीति को उस ओर मोड़ दिया जोकि सिर्फ हिंदू विरोधी बन गई थी। एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज हिंदुओं के खिलाफ प्रचार का मुख्य केंद्र बन गया था। उसका निर्देशन एक ब्रिटिश व्यक्ति बेक के पास था जोकि सैयद अहमद का करीबी दोस्त और मार्गदर्शक था।

कॉलेज का मुखपत्र अलीगढ़ इंस्टीट्यूट गजट का संपादन बेक के पास था। उसका मानना था कि भारत के लिए संसदीय व्यवस्था अनुपयुक्त है और इसके स्वीकृत होने की स्थिति में, बहुसंख्यक हिन्दुओं का वहाँ उस तरह राज होगा, जो किसी मुगल सम्राट का भी नहीं था। यह कोई संयोग नहीं था कि मोहम्मद अली जिन्ना ने भी इसी आधार पर पाकिस्तान की माँग की थी। यह सब पूर्व सुनियोजित था, बस किरदारों में समय-समय पर बदलाव होते रहे।

अगली योजना में, आगा खान के नेतृत्व में 1 अक्तूबर, 1906 को 36 मुस्लिमों का एक दल वायसराय मिन्टों से मिला। समुदाय के लोगों ने अपनी कुछ साम्प्रदायिक माँगे रखी और मिन्टों ने भी उनकी सभी माँगों पर सहमती जताते हुए कहा, “मैं पूरी तरफ से आपसे सहमत हूँ। मैं आपको यह कह सकता हूँ कि किसी भी प्रशासनिक परिवर्तन में समुदाय विशेष अपने राजनैतिक अधिकारों और हितों के लिए निश्चिंत रहे।”

इस प्रतिनिधि दल का रचना खुद ब्रिटिश सरकार ने की थी। अंग्रेजों की योजना में समुदाय विशेष को उस राजनैतिक संघर्ष से दूर रखना था जिसका संचालन हिन्दुओं द्वारा किया जा रहा था। इस संदर्भ में, लेडी मिन्टो लिखती हैं, “यह मुलाकात भारत और भारतीय इतिहास को कई सालों तक प्रभावित करेगी। इसका मकसद 60 मिलियन लोगों को विद्रोही विपक्ष के साथ जुड़ने से रोकने के अलावा कुछ नहीं हैं।”

ब्रिटिश प्रधानमंत्री रहे रामसे मैक्डोनाल्ड ने इस मुलाकात को ‘डिवाइड एंड रूल’ पर आधारित जानबूझकर और ‘पैशाचिक’ काम बताया। अपनी पुस्तक ‘एवकिंग ऑफ़ इंडिया’ में उन्होंने लिखा है, “इस योजना का पहला परिणाम दोनों समुदायों को अलग करना और समझदार एवं संविधानप्रिय राष्ट्रवादी लोगों के लिए अड़चनें पैदा करना था।”

मैक्डोनाल्ड यह भी खुलासा करते हैं कि मजहबी नेता कुछ एंग्लो-इंडियन अधिकारियों से प्रेरित थे। इन अधिकारियों ने शिमला और लन्दन कई तार भेजे। इसमें हिन्दुओं एवं दूसरे मजहब के बीच एक सोची-समझी कलह और द्वेष के आधार पर मजहबी नेताओं ने अपने लिए विशेष समर्थन माँगा। तुष्टिकरण के इसी आधार पर करांची में 30 दिसंबर, 1906 को आल इंडिया मुस्लिम लीग की स्थापना हुई।

प्लासी के युद्ध (1757) के बाद ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जड़ों को उखाड़ फेंकने का सुनहरा अवसर 1857 का स्वतंत्रता संग्राम था। चूँकि यह हिन्दुओं द्वारा शुरू किया गया था तो दूसरे मजहब वालों ने इसमें दिलचस्पी लेनी बंद कर दी। जैसा कि एक नवाब ने एक ब्रिटिश अधिकारी को बताया कि संग्राम में अधिकतर हिन्दू थे और वह उन्हें पसंद नहीं करता था। इसलिए उसने उन्हें कोई सहायता नहीं की। उस नवाब का कहना था कि वह अंग्रेज़ो की सर्वोपरिता को स्वीकार करने के लिए भी तैयार है।

इन बीते 50 सालों में मजहबी नेताओं ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ राजनैतिक आंदोलन से खुद को अलग कर लिया था। उन्हें लगने लगा कि मुस्लिम हित अंग्रेजों के हाथों में ही सुरक्षित है। अंग्रेजों ने भी इसका इस्तेमाल भारत में अपनी सरकार बचाने के लिए किया। इस बात का फायदा उठाकर मजहबी नेताओं ने पाकिस्तान के नाम से भारत विभाजन को हवा देना शुरू कर दिया। अंततः 1947 में भारत को विभाजन की त्रासदी को झेलना पड़ा।

दिल्ली: सरकारी रिकॉर्ड में केवल 68, श्मशान-कब्रिस्तान में कोरोना प्रोटोकॉल से 300 से अधिक का अंतिम संस्कार

दिल्ली में कोरोना से होने वाली मौतों के सरकारी और जमीनी आँकड़ों में काफी फासला दिख रहा है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार श्मशान और कब्रिस्तान में 300 से अधिक अंतिम संस्कार कोरोना प्रोटोकॉल के तहत हुए हैं। लेकिन, सरकारी दस्तावेजों में यह संख्या केवल 68 है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली सरकार के मुताबिक शनिवार तक कोरोना से सिर्फ 68 लोगों की मौत हुई थी। लेकिन कोरोना वायरस प्रोटोकॉल के तहत किए गए अंतिम संस्कारों की संख्या 300 से अधिक है।

कोरोना वायरस मरीज की मौत के बाद केंद्र सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार उसका अंतिम संस्कार किया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, कोरोना वायरस प्रोटोकॉल के मुताबिक शनिवार तक कुल 314 अंतिम संस्कार दिल्ली में हुए हैं। इनमें से 225 हिंदू थे। इनमें से 153 का अंतिम संस्कार निगमबोध और 72 का अंतिम संस्कार पंजाबीबाग श्मशान घाट किया गया।

दैनिक भास्कर में प्रकाशित खबर

आईटीओ स्थित कब्रिस्तान में शनिवार तक कोरोना वायरस प्रोटोकॉल के तहत दफनाए गए लोगों की संख्या 89 थी। रिपोर्ट के मुताबिक 3 को शनिवार को ही दफनाया गया। इस बात की पुष्टि प्रशासनिक समिति के सचिव हाजी फैजुद्दीन ने की है। उन्होंने आगे बताया कि अस्पताल के अधिकारी संक्रमित मरीज की लाश को लाने से पहले ही कब्रिस्तान के कर्मचारियों को सूचना दे देते हैं।

इस बात की पुष्टि नॉर्थ एमसीडी की स्थायी समिति के अध्यक्ष जयप्रकाश जेपी ने भी की है। उन्होंने बताया कि इससे जुड़े सभी दस्तावेज एमसीडी के पास है। इसे लेकर जेपी ने दिल्ली सरकार पर राजनीति करने और आँकड़ों में हेरफेर करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सरकार को दुनिया को सच्चाई बतानी चाहिए और समाज को जागरुक करना चाहिए।

साउथ एमसीडी के (स्थायी समिति) के अध्यक्ष भूपेंद्र गुप्ता ने कहा, “हम यहाँ लाए जाने वाले कोरोना वायरस के मरीजों का अंतिम संस्कार करने के लिए कंप्रेस्ड नेचुरल गैस (सीएनजी) का उपयोग करते हैं। उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस रोगियों के लिए निर्धारित सभी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए पंजाबी बाग श्मशान में 72 दाह संस्कार किए गए हैं।”

आँकड़ों में हेरफेर का आरोप

ऐसा नहीं है कि केवल कोरोना वायरस प्रोटोकॉल के तहत होने वाले अंतिम संस्कारों से ही दिल्ली सरकार के आधिकारिक मौतों के आँकड़ों मेल नहीं खा रहे। अस्पतालों के मौत का डाटा भी सरकारी रिकॉर्ड से अलग है। रिपोर्ट के मुताबिक एम्स में कोरोना से 18 लोगों की मौत हुई है और राम मनोहर लोहिया अस्पताल के कोरोना वायरस से 52 लोगों की मौत हुई है।

राम मनोहर लोहिया अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक ने बताया कि अस्पताल में 52 कोरोना वायरस रोगियों की मौत हुई है, जबकि 528 कोरोना वायरस से संक्रमित मरीज यहाँ भर्ती किए गए हैं। इसके अलावा 3 लोगों की मौत एम्स के झज्जर केंद्र में हुई है और 15 लोगों की मौत एम्स के ट्रामा सेंटर में हुई है।

लेडी हार्डिंग अस्पताल, लोकनायक अस्पताल और राजीव गाँधी अस्पताल में भी कोरोना वायरस की मौतों पर आँकड़ों से हेरफेरी के आरोप सामने आए हैं। सूत्रों ने दैनिक भास्कर को बताया कि लोकनायक अस्पताल में 47 लोगों की, राजीव गाँधी अस्पताल में 6 लोगों की और 3 की लेडी हार्डिंग में मौत हुई है। लेकिन दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य बुलेटिन में इससे अलग आँकड़े पेश किए गए हैं। इसमें लोकनायक अस्पताल में 26, राजीव गाँधी अस्पताल में 5, जबकि लेडी हार्डिंग में किसी की भी मौत नहीं दिखाई गई है।

दिल्ली सरकार का दावा आँकड़ों में कोई हेरफेर नहीं

अपोलो अस्पताल ने किसी भी तरह के आँकड़ों में हेरफेर के आरोपों का पूरी तरह से खारिज किया है। उन्होंने कहा है कि सरकार का डाटा उनके रिकॉर्ड से मिलान करता है, जिसमें कि कोरोना वायरस से 8 मौतें दर्ज हैं। वहीं दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने कहा है कि आँकड़ों को छिपाया नहीं जा सकता है। अस्पतालों को कोरोना वायरस के मरीजों और उनकी मौतों के बारे में राज्य सरकार को जानकारी देनी ही होती है और वही जानकारी केन्द्र को दी जाती है।

पश्चिम बंगाल सरकार पर भी है आँकड़ों को छिपाने का आरोप

पश्चिम बंगाल की ममता सरकार पर भी कोरोना वायरस के आँकड़ों को छिपाने का आरोप लग चुका है। यह सामने आया है कि राज्य में महामारी के प्रकोप को कम करने के प्रयासों में पारदर्शिता की कमी है। पहले इंटर-मिनिस्ट्रियल सेंट्रल टीम (IMCT) ने भी हॉटस्पॉट्स इलाकों में मरीजों की लगातार देखरेख की आवश्यकता पर जोर दिया था।

राज्य सरकार द्वारा महामारी को लेकर जारी किए गए आँकड़ों में हेरफेर को भी IMCT ने इंगित किया था। आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल सरकार ने एक समय में राज्य में कोरोना वायरस मरीजों की संख्या 744 बताई थी, उसी समय केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्य में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या 931 बताई थी।

‘दिस इज बियॉन्ड साइंस’: लद्दाख का तापमान बताने चले पाकिस्तान का गणित बिगड़ा

भारत सरकार ने निर्णय लिया कि भारतीय मौसम विभाग अब पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर का भी मौसम बताएगा। इसके बाद लोगों को गिलगित-बाल्टिस्तान के मौसम की भी जानकारी मिलने लगी।

पाकिस्तान ने इसकी नक़ल करते हुए श्रीनगर और लद्दाख सहित जम्मू-कश्मीर के कई हिस्सों का तापमान बताने की ठानी। इस चक्कर में वो बेसिक ‘नम्बर सिस्टम’ भी भूल बैठा।

‘रेडियो पाकिस्तान’ ने बताया कि लद्दाख में अधिकतम तापमान -4 डिग्री सेंटीग्रेट है और न्यूनतम तापमान -1 डिग्री सेंटीग्रेट है। इन दौरान वो ये भी भूल गया कि -4 और -1 में कौन बड़ा है और कौन छोटा। ऋणात्मक संख्याओं के लिए पाकिस्तान ने धनात्मक संख्याओं वाले नियम का प्रयोग करते हुए -4 को -1 से बड़ी संख्या मान ली। इसके बाद लोगों ने उसका जमकर मजाक उड़ाया।

एक व्यक्ति ने कहा कि पाकिस्तान के गणित के शिक्षक रियाज नायकू को मारा जा चुका है, इसीलिए उसका गणित बिगड़ गया है। बता दें कि आतंकी संगठन हिजबुल के कमांडर रियाज को भारतीय सेना ने हाल ही में मार गिराया था। आदित्य तिवारी नामक ट्विटर यूजर ने लिखा कि नक़ल करो लेकिन ध्यान रखो कि इससे शक्ल न बिगड़े। एक यूजर ने एक फोटो ट्वीट किया, जिसमें कोई व्यक्ति दर्जन भर कैलकुलेटर लेकर इस हिसाब को समझने में लगा हुआ है।

कुछ ने इसे ‘मदरसा लॉजिक’ करार दिया। एक ने अंदाज़ा जताया कि कहीं दोनों का औसत निकालने पर 1971 डिग्री न आ जाए। बता दें कि पाकिस्तान से कट कर बांग्लादेश का निर्माण इसी साल हुआ था, जब उसे भारत के हाथों बड़ी हार मिली थी। कुछ ने पाकिस्तानियों को पढ़ाई-लिखाई करने की सलाह दी। एक ने सुपरस्टार रजनीकांत का डायलॉग शेयर किया- ‘दिस इज बियॉन्ड साइंस’। एक ने तो बिहार स्थित मोकामा के बाहुबली नेता अनंत सिंह के डायलॉग को “%४# का रेडियो पाकिस्तान” बताते हुए पेश किया।

एक ट्विटर यूजर ने याद दिलाया कि वो पाकिस्तान है और सबकुछ भारत के उलट ही करता है, इसीलिए समझाने से कोई फायदा नहीं। कुछ ने ‘वेलकम’ फिल्म का अनिल कपूर वाला संवाद शेयर किया, जिसमें वो कहते हैं कि बोलने दे, तकलीफ हुआ है बेचारे को। एक ने लिखा- “मैथ हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल ज़िंदा हैं।” हाल ही में भारत ने पाकिस्तान को तुरंत POK खाली करने की भी चेतावनी दी है।

रसूलाबाद में लॉकडाउन का पालन कराने गई पुलिस टीम पर डंडे, ईंट-पत्थरों से हमला, 2 महिला कांस्टेबल समेत 7 घायल

कानपुर देहात के रसूलाबाद कोतवाली क्षेत्र में लॉकडाउन का पालन कराने गई पुलिस पर कुछ युवकों ने डंडे और ईंट-पत्थरों से हमला कर दिया। गिहार बस्ती (कंजर डेरा) में हुए इस हमले में दो महिला कांस्टेबल, 3 दरोगा समेत 7 लोग घायल हो गए

पुलिस टीम पर हमले की सूचना मिलते ही कई थानों की पुलिसफोर्स और आला अधिकारी मौके पर पहुँच गए। एडिशनल एसपी अनूप कुमार ने बताया कि जिन पुलिसकर्मियों को चोटें आई है, उनको प्राथमिक उपचार के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भेजा गया है।

बता दें कि रविवार (मई 10, 2020) को पुलिस क्षेत्र में लॉकडाउन का पालन करवा रही थी। बस्ती के कुछ लोगों ने दुकान खोलकर भीड़ जमा कर रखी थी। जब पुलिस ने उनसे लॉकडाउन का पालन करने के लिए कहा तो वे उग्र हो गए। इसके बाद उनलोगों ने पुलिस की टीम पर हमला कर दिया।

एडिशनल एसपी अनूप कुमार का कहना है कि इलाके में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया है और साथ ही मामले में आरोपितों को चिह्नित कर मुकदमा दर्ज कर लिया गया। आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए तलाश जारी है। जल्द से जल्द आरोपित को गिरफ्तार कर लिया जाएगा।

गौरतब है कि पुलिस पह हमले की यह पहली घटना नहीं है। पिछले दिनों कानपुर में कोरोना संक्रमण के हॉटस्पॉट चमनगंज में पुलिस और मेडिकल टीम पर स्थानीय लोगों ने हमला किया था। 50 से 60 की संख्या में लोगों ने टीम पर पथराव किया था। इसी तरह पश्चिम बंगाल के हावड़ा में भी लॉकडाउन का पालन कराने गई पुलिस पर लोगों ने हमला बोल दिया था

क्विज में इस्लाम पर सवाल: प्रोफेसर को जान से मारने की धमकी, अमेरिकी कॉलेज को माँगनी पड़ी माफी

अमेरिका के एरिजोना के स्कॉट्सडेल कम्युनिटी कॉलेज के एक प्रोफेसर को क्विज में इस्लाम पर सवाल पूछना भारी पड़ गया। दरअसल प्रोफेसर ने क्विज में मल्टीप्ल चॉइस प्रश्न के तहत इस्लाम पर कुछ सवाल किए थे।

सवालों का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और कॉलेज को इसके लिए सार्वजनिक तौर पर माफी माँगनी पड़ी।

रिपोर्टों के अनुसार, क्विज का पहला सवाल था- “इस्लाम में आतंकवाद __ है।” इसके विकल्प थे, “हमेशा वर्जित”, “जिहाद के संदर्भ में उचित”, “अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत उचित” या “हमेशा उचित”। कथित तौर पर इसका सही जवाब ‘जिहाद के संदर्भ में उचित’ बताया गया था।

दूसरा सवाल था, “इस्लामी सिद्धांत और कानून में आतंकवाद को कहाँ बढ़ावा दिया गया है?” इसके विकल्प थे- “इस्लामी सिद्धांत और कानून में आतंकवाद को बढ़ावा नहीं दिया जाता है”, “मदीना छंद”, “मुहम्मद छंद” और “मक्का छंद।” कथित तौर पर इस सवाल का सही जवाब “मदीना छंद” बताया गया था।

क्विज का तीसरा सवाल था, “आतंकवादी किसका अनुकरण करने की कोशिश करते हैं?” इस सवाल के विकल्प थे, “पैगंबर मोहम्मद”, “इब्न तामियाह”, “सद्दाम हुसैन” और “ओसामा बिन लादेन”। इस सवाल का सही जवाब पैगंबर मोहम्मद बताया गया था।

इन्हीं सवालों के बाद, क्विज सेट करने वाले प्रोफेसर को धमकियाँ मिलनी शुरू हो गईं।

यह फोटो frontpagemag.com से ली गई है।

Frontpagemag के मुताबिक क्विज में पूछे गए सवालों पर आपत्ति जताने वाले लोगों ने प्रोफेसर और कॉलेज को धमकियाँ देनी शुरू कर दी। जानकारी के मुताबिक मुस्लिम लड़कों ने प्रोफेसर को जान से मारने की धमकी दी, जिसके बाद कॉलेज ने सावर्जनिक रूप से सोशल मीडिया पर माफी माँगी।

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Earlier this week, a student at Scottsdale Community College took a quiz as part of the class coursework. The student expressed concern over the wording of three questions related to Islam on the quiz. SCC senior leadership has reviewed the quiz questions and agrees with the student that the content was inaccurate, inappropriate, and not reflective of the inclusive nature of our college. SCC deeply apologizes to the student and to anyone in the broader community who was offended by the material. SCC Administration has addressed with the instructor the offensive nature of the quiz questions and their contradiction to the college’s values. The instructor will be apologizing to the student shortly, and the student will receive credit for the three questions. The questions will be permanently removed from any future tests. We applaud the student for bringing this to our attention – and encourage any student or employee to speak out. SCC does not discriminate on the basis of race, color, national origin, sex, disability or age in our programs or activities. We value inclusiveness because we all benefit by embracing a diversity of voices, viewpoints, and experiences. SCC cultivates success when individuals from a wide variety of backgrounds are respected and empowered to contribute. Chris Haines Interim President Scottsdale Community College

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कॉलेज ने यह भी कहा कि इन सभी प्रश्नों को हटा दिया जाएगा।

सवाल पूछने वाले प्रोफेसर का काटा था हाथ

4 जुलाई 2010 को केरल के इदुकी जिले के प्रोफेसर टीजे जोसेफ का कट्टरपंथी इस्लामिक समूह पॉपुलर फ्रंट इंडिया के सदस्य नजीब समेत कुछ युवकों ने चाकुओं से उनका दाहिना हाथ काट दिया था। घटना उस समय घटी थी, जब जोसेफ अपने परिवार के साथ चर्च से प्रार्थना कर लौट रहे थे। आरोपित युवकों ने आरोप लगाया था कि जोसेफ ने एक परीक्षा ली थी, जिसमें उन्होंने छात्रों से ईशनिंदा वाले प्रश्न पूछे थे।

जोसेफ पर आरोप लगा था कि उन्होंने मलयालम भाषा में एक विवादित प्रश्नपत्र तैयार किया था, जिससे समुदाय विशेष की मजहबी भावनाएँ आहत हुईं। हालाँकि इस बीच कई लोगों ने उन पर सवाल उठाए और कॉलेज प्रशासन ने उन्हें नौकरी से भी निकाल दिया था।

तब इस मामले पर वहाँ की शिक्षा मंत्री ने उन्हें कहा भी कि वे चाहें तो यूनिवर्सिटी के ट्रिब्यूनल में अपना मामला दर्ज करवा सकते हैं। लेकिन फिर भी उन्होंने फैसला किया कि वे कॉलेज के फैसले के ख़िलाफ़ कोई कानूनी कदम नहीं उठाएँगे।

टीजे जोसेफ पर घातक हमले की साजिश रचने और हमलावरों की मदद करने के आरोप में नजीब के खिलाफ आइपीसी की विभिन्न धाराओं, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और गैरकानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। इस मामले में एनआईए ने 13 लोगों को आरोपित बनाया था।

बंगाल: 32 लोग, पीने को सिर्फ 1 लीटर पानी, आसनसोल के अस्पताल में क्वारंटाइन किए गए लोगों का हंगामा

पश्चिम बंगाल के आसनसोल के ESI अस्पताल में क्वारंटाइन में रखे गए लोगों ने शनिवार (मई 9, 2020) को जमकर हंगामा किया। इनका कहना है कि अस्पताल के शौचालय में पानी की व्यवस्था नहीं है और न ही उन्हें पीने का पानी उपलब्ध कराया जा रहा है।

क्वारंटाइन में रखे गए लोगों ने यह भी कहा कि अभी तक उनका कोरोना वायरस टेस्ट नहीं कराया गया है।

क्वारंटाइन सेंटर में फँसे एक शख्स ने शिकायत करते हुए कहा कि 32 लोगों के लिए सिर्फ 1 लीटर पानी उपलब्ध कराया गया। उन्होंने अस्वास्थ्यकर परिस्थिति, जिसके तहत वो जीने को मजबूर थे, की तरफ इशारा करते हुए बताया कि भोजन को गंदे वाहनों में लाया जाता है।

एक अन्य व्यक्ति ने अस्पताल के अधिकारियों से अनुरोध किया कि वे उनका कोरोना वायरस का टेस्ट करवाएँ और अगर उनका रिजल्ट नेगेटिव आता है, तो उन्हें जाने दिया जाए। वहीं एक व्यक्ति ने कहा, “जब तक हमें रिपोर्ट नहीं मिलती, हम कुछ नहीं खाएँगे।”

अब्दुल करीम हुसैन नाम के एक व्यक्ति ने कहा कि उन्हें बताया गया था कि उनके टेस्ट की रिपोर्ट आने के बाद उन्हें घर जाने दिया जाएगा। लेकिन अभी तक टेस्ट ही नहीं हुए हैं, तो रिपोर्ट मिलने का सवाल ही नहीं है। उन्होंने कहा कि शौचालय में पानी नहीं है। जिस जगह से पीने का पानी लिया जा सकता है, उसे बंद रखा गया है।

बता दें कि पश्चिम बंगाल में 9 मई तक कोरोना संक्रमित मरीजों का आँकड़ा 1786 तक पहुँच गया है। राज्य के आसनसोल से भाजपा सांसद बाबुल सुप्रियो ने पिछले दिनों कोरोना संक्रमितों के लिए किए गए इंतजाम की पोल-पट्टी खोलते हुए ट्विटर पर एक वीडियो शेयर किया था।

वहीं इंटर मिनिस्ट्रियल सेंट्रल टीम (IMCT) ने भी पश्चिम बंगाल सरकार पर सहयोग न करने का आरोप लगाया था। अपूर्व चंद्रा ने अपनी चिट्ठी में कहा था कि उन्होंने राज्य के मुख्य सचिव राजीव सिन्हा को सात और राज्य के गृह, स्वास्थ्य, शहरी विकास और नगर पालिका विभाग के सचिवों को 4 चिट्ठियाँ लिखीं लेकिन एक का भी जवाब नहीं मिला। साथ ही उन्होंने बताया कि 12.8 फ़ीसदी मृत्यु दर के साथ पश्चिम बंगाल में सबसे तेज गति से कोरोना से लोगों की मौत हो रही है।

सतीश भंडारी: जिससे खौफ खाते थे आतंकी, जिसकी हत्या के बाद किश्तवाड़ में शुरू हुआ हिंदुओं का नरसंहार

सतीश भंडारी की 10 मई 1993 को आतंकियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। वे हिंदू रक्षा समिति के जम्मू-कश्मीर राज्य के महासचिव थे। उनके कारण किश्तवाड़ में आतंकी पैरा नहीं जमा पा रहे थे।

यह वह दौर था जब राज्य में हिंदुओं पर इस्लामिक आतंकियों के अत्याचार चरम पर थे। इसके कारण लाखों की संख्या में घाटी से रात के अँधेरे में अपना सब कुछ छोड़ कश्मीरी पंडितों को पलायन करना पड़ा था।

90 के दशक में पाकिस्तान के खुले समर्थन और अलगाववादियों की मदद से आतंकी रोज-रोज नए षड्यंत्र रच रहे थे। डोडा और उधमपुर के पहाड़ी इलाकों में आतंकियों ने अपना खूनी खेल शुरू कर दिया था। राज्य सरकार की गलत नीतियों के कारण आतंकवादियों के हौसले बुलंद थे।

सरकार की गलत नीतियों का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पहले आतंकी संगठन में शामिल होते, फिर ट्रेनिंग लेने पाकिस्तान के लिए जाते, वापस आकर जम्मू-कश्मीर में खून बहाते और पकड़े जाने पर हथियारों के साथ सरकार के सामने समर्पण कर देते। इसके बाद सरकारी मदद से जिंदगी भर ऐश आराम करते, क्योंकि समर्पण के बाद आतंकियों को खाना फ्री और रहना भी फ्री था।

नीतियों से व्यथित होकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इसका मुकाबला करने का निर्णय लिया। इसके लिए आरएसएस ने अपने संहयोगी संगठनो के साथ मिलकर राज्य में ‘संगठित हिंदू जागरण अभियान’ छेड़ दिया।

संघ द्वारा चलाए गए डोडा बचाओ अभियान से आतंकी इतना विचलित हो गए कि उन्होंने हिंदू रक्षा समिति के महासचिव सतीश भंडारी को अपने निशाने पर ले लिया। 10 मई 1993 को आतंकियों ने किश्तवाड़ के गुहड़ी चौक पर सरेआम गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। इसके बाद इलाके में सांप्रदायिक हिंसा फैल गई। इसका फायदा उठाकर सैकड़ों दुकानों को में लूटपाट के बाद उनको आग के हवाले कर दिया गया। इसे देखते हुए सरकार को कर्फ्यू लगाना पड़ा।

इस अभियान के तहत कई देशभक्तों ने भारत माता के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। इसमें आतंकियों से लोहा लेते हुए बीजेपी नेता संतोष ठाकुर, भद्रवाह के संघ कार्यकर्ता स्वामी राज काटल, सुभाष सेन और रुचिर कुमार वीरगति को प्राप्त हो गए, लेकिन अपने जीते जी किश्तवाड़ इलाके में आतंकियों को अपने पैर नहीं जमने दिए। इसके बाद से ही उनकी शहादत पर किश्तवाड़ में हर साल एक कार्यक्रम आयोजित कर शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है।

आपको बता दें कि आतंकियों ने सतीश भंडारी की हत्या करने के बाद 14 अगस्त 1993 को डोडा जिले के किश्तवाड़ा इलाके में सरथल सड़क पर जा रही यात्रियों से भरी बस को अपना निशाना बनाया था। नकाबपोश आतंकियों ने बस में बैठे 16 हिंदुओं को दिनदहाड़े गोलियों से भून डाला था। इसके बाद डोडा के कुलहांड और उधमपुर के बंसतगढ़ इलाकों में भी इस तरह के नरसंहार किए गए।