देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान मुंबई की पी.डी मेल्लो रोड पर बने पुलिस चेकपॉइंट के पास एक बाइक चालक ने पुलिस अधिकारी द्वारा रोके जाने पर उन्हें टक्कर मारकर बुरी तरह जख्मी कर दिया। जानकारी के अनुसार, जब पुलिस के निर्देश के बावजूद चालक नहीं रुका तब पुलिसकर्मी ने युवक की बाइक का हैंडल पकड़कर उसे रोकने की कोशिश की। लेकिन उसने उस वक्त रुकने की जगह स्पीड़ बढ़ा ली और अधिकारी को सड़क पर घसीटते हुए आगे ले गया। गुरुवार को घटी इस घटना में डोंगरी थाने के असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर गंभीर रूप से चोटिल हुए। उनके हाथ, पाँव और कंधे में चोट आई। बाद में मौक़े पर तैनात अन्य पुलिसकर्मी ने बाइक चालक को गिरफ्तार किया। पूछताछ में उसकी पहचान खजाबी शेख नईम के रूप में हुई।
डोंगरी पुलिस थाने में तैनात सब इंस्पेक्टर अराफत सिद्दकी ने इस संबंध में बताया, नईम पर भारतीय दंड संहिता के तहत मामला दर्ज किया गया है। उसपर आरोप है कि उसने ड्यूटी पर तैनात एक सुरक्षाकर्मी को उसका कर्तव्यों का निर्वहन करने से रोकने के इरादे से चोट पहुँचाई। उसे हिरासत में लेने के बाद अदालत में पेश किया गया, जहाँ अदालत ने शुक्रवार तक के लिए उसे पुलिस हिरासत में भेज दिया।
Mumbai lockdown: Speeding biker drags on-duty policeman posted at a checkpoint, one Sheikh Naeem arrestedhttps://t.co/0KPPpwHDgP
गौरतलब है कि लॉकडाउन का उल्लंघन करने के अलावा नईम ने चेकप्वाइंट पर तैनात पुलिस टीम के रुकने के आदेश के बावजूद अचानक अपनी बाइक की गति को बढ़ाया और भागने के लिहाज़ से आगे बढ़ने की कोशिश की। मगर, इस दौरान असिस्टेंट इंस्पेक्टर विजेंद्र धुरत उसके बाइक के रियर हैंडल को पकड़ने में कामयाब रहे। इसके बाद आरोपित नईम ने उन्हें करीब 25 फीट दूर तक घसीटा।
मगर, थोड़ी आगे जाकर नईम अपना संतुलन खो बैठा और धुरत के साथ बाइक से गिर गया। बाइक भी दूर जा गिरी। इस वाकये में धुरत के हाथ, पैर और कंधे में चोटें आईं। बाद में उन्हें नजदीकी अस्पताल ले जाया गया और मौक़े पर ड्यूटी पर तैनात अन्य पुलिस कर्मियों द्वारा नईम को गिरफ्तार कर लिया गया।
बता दें, कोरोना महामारी के बीच सुरक्षाकर्मियों और स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले की खबरें आम होती जा रही हैं। कल की यदि बात करें तो महाराष्ट्र के औरंगाबाद में जिलाधिकारी दफ्तर के पास की एक वीडियो वायरल हुई थी। जिसमें 5 लोगों का समूह पुलिस अधिकारियों को परेशान कर रहा था। इसके अलावा 26 मार्च को भी लॉकडाउन के दौरान ताजूद्दीन और कुतुबुद्दीन नाम के 2 युवकों ने बंगलुरू पुलिस को चोट पहुँचाई थी। इसके बाद यूपी, बिहार, झारखंड, इंदौर से ऐसे कई मामले सामने आए।
मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह सरकार ने भोपाल और इंदौर में इंटरनेशनल इंडियन फिल्म अकादमी यानी ‘आइफा’ सेरेमनी आयोजित करवाने के लिए कमलनाथ सरकार द्वारा आवंटित 700 करोड़ रुपए मुख्यमंत्री सहायता कोष में ट्रांसफर करने का निर्णय लिया है। ‘आइफा’ का आयोजन मार्च 2020 में में किया जाना था। 700 करोड़ रुपए खर्च कर 90 देशों में इसका टेलिकास्ट करने का प्लान था।
कमलनाथ की योजना इस मेगा इवेंट के जरिए राज्य की ब्रांडिंग करनी थी। उस समय भी शिवराज सिंह चौहान ने तत्कालीन एमपी सरकार को सलाह दी थी कि इस आयोजन पर इतना पैसा खर्च करने की जगह इसका इस्तेमाल किसानों की कर्ज माफ़ी तथा बाढ़ राहत में किया जाना चाहिए।
शिवराज सिंह चौहान ने ‘आइफा’ के कैंसिल होने के मौके पर कहा था कि ‘आइफा’ प्रदेश में बड़े स्तर पर प्लान किया गया था। लेकिन वर्तमान समय में यह पैसा COVID-19 के खिलाफ लड़ाई में उपयोग करने के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष में ट्रांसफर किया जा रहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार मध्य प्रदेश में अब तक 259 संक्रमण के मामले सामने आए है। इनमें 16 की मौत हो चुकी है। अब तक रिकवरी शून्य है।
मध्य प्रदेश में कोरोना मामलों में आई अचानक तेजी के कारण राज्य के मुख्यमंत्री ने बुधवार को तीन बड़े शहरों भोपाल, इंदौर और उज्जैन को पूरी तरह से सील करने का फैसला किया था। साथ ही संक्रमण के खतरे को देखते हुए 14 जिलों को पूरी तरह लॉकडाउन करने का भी निर्णय लिया गया है।
राज्य सरकार ने आवश्यक सेवाएँ प्रबंधन अधिनियम (एस्मा) को भी तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया है। इससे COVID-19 के खिलाफ जारी लड़ाई के दौरान राज्य में जरूरी सेवाओं की आपूर्ति में बाधा नहीं आएगी। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने कहा, “जिला प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति में कोई दिक्क्त न आने पाए। कोई भी व्यक्ति इन क्षेत्रों में न दाख़िल हो सकेगा न इनसे निकल पाएगा। प्रत्येक विभाग के संसाधनों और सेवाओं का कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई के लिए उपयोग किया जाना चाहिए।” मुख्यमंत्री का यह निर्णय राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ राज्य की स्थिति की समीक्षा के बाद आया।
हरियाणा के पंचकुला में आशा कर्मचारी, आँगनबाड़ी कार्यकर्ताओं व महिला पुलिसकर्मी पर हमला करने के आरोप में पुलिस ने 4 युवकों को गिरफ्तार किया। युवकों की पहचान जावेद, नदीम, इशाक और आजाद के रूप में हुई। पुलिस ने इन्हें पकड़ने के बाद लोकल कोर्ट में पेश किया। वहाँ से इन्हें 14 दिन की पुलिस कस्टडी में भेजा दिया गया।
सेक्टर 16 पुलिस चौकी इंचार्ज जगदीश सिंह ने जानकारी देते हुए बताया कि उपायुक्त मुकेश कुमार आहूजा के निर्देशानुसार आशा वर्करों की एक टीम पुलिसकर्मियों के साथ सर्वे के लिए इंदिरा कॉलोनी गई थी। जहाँ पर कुछ युवकों ने उन्हें सर्वे करने से रोकने के लिए बहस शुरू कर दी। जब पुलिस ने इसमें हस्तक्षेप किया तो भीड़ और हिंसक हो गई। थोड़ी देर बाद उन्होंने पुलिस का कॉलर पकड़ लिया और आशा वर्करों व पुलिसकर्मियों की टीम पर हमला किया।
Javed, Nadeem, Isaq and Azad arrested for attack on ASHA workers and police personnel in Panchkula, Haryana: Read detailshttps://t.co/H4Setvky75
हमले में महिला पुलिस कर्मी घायल हो गई। जिसकी सूचना मिलने के बाद, पुलिस ने 9 आरोपितों के खिलाफ विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया। इनमें से 4 आरोपित गिरफ्तार कर लिए गए हैं। जबकि 5 आरोपित अभी फरार हैं। सेक्टर 14 के थाने में इन पर धारा 188, 186, 323 और 34 के तहत मामला दर्ज किया गया है।
जानकारी के अनुसार, बुधवार से आशा वर्करों की एक टीम पुलिस की टीम को साथ लेकर इंदिरा कॉलोनी में डोर टू डोर जाकर सर्वे कर रही थीं। लेकिन गुरुवार को सर्वे के दौरान कुछ युवकों ने टीम का विरोध करना शुरू कर दिया। फिर उग्र युवकों ने आशा वर्करों व पुलिस के समझाने पर भी उनकी बात नहीं मानी और उन पर हमला बोल दिया। इस हमले में महिला पुलिस कर्मी घायल हो गई।
हमले के बाद आरोपित मौके से फरार हो गए। सूचना पाकर सेक्टर-16 पुलिस मौके पर पहुँच गई। पुलिस ने 9 आरोपितों के खिलाफ विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज करके 4 आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद इन्हें अदालत में पेश किया गया, जहाँ से उनको 14 दिन की न्यायिक हिरासत में हिसार जेल भेज दिया गया। गिरफ्तार आरोपितों का नाम नदीम, जावेद, ईसाक और आज़ाद है।
गौरतलब है कि कोरोना के बढ़ते संक्रमण के बीच स्वास्थ्यकर्मियों और सुरक्षाकर्मियों के साथ अभद्र व्यवहार की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं। इन मामलों में अधिकांश जगहों पर आरोपित मुस्लिम पाए जा रहे हैं, जो कभी स्वास्थ्यकर्मियों के कार्य को एनआरसी से जोड़ रहे हैं तो कभी सुरक्षाकर्मियों व सफाईकर्मियों पर थूक रहे हैं। पिछले दिनों का मामला भी याद दिला दें जब तबलीगी जमात के लोग अस्पताल में नर्सों के सामने नंगे होकर घूमने लगे थे और उनसे अश्लील बातें कर रहे थे।
गालीगलौज, हाथापाई, पथराव, गोलीबारी। यह सब कुछ बिहार के भागलपुर में पुलिस को गुरुवार की रात झेलना पड़ा। शब-ए-बारात पर एक कब्रिस्तान के बाहर जमा हुई भीड़ को हटाने पहुँची पुलिस पर हमला किया गया। गनीमत ये रही कि किसी पुलिसकर्मी को गोली नहीं लगी, लेकिन पत्थरबाजी में होमगार्ड का एक जवान बुरी तरह घायल हो गया।
मामला हबीबपुर के मोमिन टोला स्थित कब्रिस्तान का है। पुलिस दल पर पथराव की खबर पाकर सिटी एसपी सुशांत कुमार सरोज साथी पुलिसकर्मियों ट्रैफिक डीएसपी आरके झा, लॉ एंड ऑर्डर डीएसपी नेसार अहदम, पुलिस मुख्यालय के डीएसपी और कई थानों के थानाध्यक्ष जवानों के साथ वहाँ पहुँचे और मामले को शांत करने की कोशिश की।
इसके बाद पुलिस ने फ्लैग मार्च किया और लोगों से घर के अंदर रहने की अपील की। मस्जिद के लाऊडस्पीकर से भी मौलवियों ने लोगों से घर पर ही रहने की अपील की तब कहीं जाकर लोग अपने-अपने घर लौटे। पुलिस ने पूरे इलाके में डेरा डाल दिया है।
बता दें कि गुरुवार की शाम हबीबपुर पुलिस गश्ती में मोमिन टोला स्थित कब्रिस्तान के पास पहुँची तो देखा कि काफी संख्या में दूसरे मजहब के युवक कब्रिस्तान की तरफ जा रहे थे। पुलिस ने उन्हें एक साथ इतनी संख्या में उधर जाने से रोका तो वे पुलिस से उलझ गए। पुलिस ने खदेड़ कर कुछ युवकों को पकड़ने की कोशिश की पर वे भागने लगे। तभी वहाँ पर खड़े युवकों ने पहले गाली-गलौज की और फिर पुलिस से हाथापाई करने लगे। कुछ ही देर में उन्होंने पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया।
पुलिस ने उन लोगों को चेतावनी दी कि अगर लॉकडाउन का उल्लंघन किया जाएगा तो सख्त कार्रवाई होगी। हबीबपुर थानाध्यक्ष को उपद्रवियों को चिह्नित कर उन पर कार्रवाई के लिए कहा गया है। एसएसपी आशीष भारती ने इस बाबत कहा है, “लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग का जो भी पालन नहीं करेंगे उन पर कार्रवाई होगी। हबीबपुर की घटना में शामिल लोगों को चिह्नित करने के लिए कहा गया है। उनके खिलाफ कार्रवाई होगी।”
उल्लेखनीय है कि शब-ए-बारात दूसरे समुदाय के लोगों के लिए इबादत और फजीलत की रात होती है। माना जाता है कि इस रात को अल्लाह की रहमतें बरसती हैं। शब-ए-बारात की पाक रात को समुदाय के लोग इबादत करते हैं और अपने गुनाहों से तौबा करते हैं। इस्लामिक मान्यताओं के मुताबिक, इस रात को अगर सच्चे दिल से इबादत की जाए और गुनाहों से तौबा की जाए तो अल्लाह हर गुनाह से पाक कर देता है।
शब-ए-बारात की पूरी रात समुदाय के पुरुष मस्जिदों में इबादत करते हैं और कब्रिस्तान जाकर मृतक परिजनों की तरफ से अल्लाह से माफी माँगते हैं। लेकिन इस साल लॉकडाउन की वजह से लोगों को घर पर ही रहकर इबादत करने की अपील की गई थी।
कोरोना संकट से वैसे तो पूरा देश परेशान है, लेकिन पंजाब में मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। दरअसल पंजाब में कोरोना वायरस के कम्युनिटी ट्रांसमिशन की पुष्टि करते हुए मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा है, “कल (9 अप्रैल 2020) सामने आए 27 कोरोना पॉजिटिव मामलों में से अधिकांश कम्युनिटी ट्रांसमिशन के हैं। इनकी कोई ट्रैवल हिस्ट्री नहीं है। यह हमारे लिए काफी चिंता का विषय है।”
#Breaking | Punjab CM @capt_amarinder confirms community spread of COVID-19 in the state & says,' out of the 27 cases positive cases reported yesterday, most of them are of community transmission, they have no travel history and that is our worry.'
दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित तबलीगी जमात के मरकज से 651 लोग पंजाब लौटे हैं। अमरिंदर सिंह ने बताया कि इनमें से 636 ट्रेस कर लिए गए हैं जबकि 15 अन्य की तलाश जारी है।
As of today we have 132 confirmed #COVID19 cases in Punjab, out of which 11 people have died. Total number of samples we have collected so far is 2877, for a state which has 28 million people this is not much: Punjab Chief Minister Captain Amarinder Singh https://t.co/qees5rz7Ge
उन्होंने कहा कि कुल मिला कर अब तक राज्य में 132 मामले सामने आए हैं, जिनमें से 11 लोगों की मौत हो चुकी है। पंजाब में अब तक सिर्फ 2877 लोगों का सैंपल इकट्ठा किया गया है। खुद मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह मान रहे हैं कि यह आँकड़ा काफी कम है। उनका कहना है कि 2.80 करोड़ की आबादी वाले राज्य में सिर्फ 2877 लोगों का सैंपल इकट्ठा होना काफी नहीं है।
शुक्रवार को सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि हम सिर्फ किसानों को लॉकडाउन में छूट देंगे, क्योंकि इस बार अच्छी फसल हुई है। कोरोना के आँकड़े भयावह हैं। चीजें अच्छी नहीं हैं और लोगों को सुरक्षित रखना हमारा कर्तव्य है। अभी लॉकडाउन हटाना सही नहीं होगा।
गौरतलब है कि इससे पहले अमरिंदर सरकार ने राज्य में मास्क पहनना अनिवार्य कर दिया था। सरकार की तरफ से कहा गया था कि घर से बाहर निकलते समय मास्क पहनना अनिवार्य होगा। ऐसा नहीं करने पर कार्रवाई की जाएगी।
कोरोना से जंग जीतने के लिए देश में 14 अप्रैल तक लॉकडाउन जारी है। इसका पालन कराने के लिए पुलिस-प्रशासन की लाख कोशिशों के बाद भी समुदाय विशेष का एक वर्ग बाज नहीं आ रहा। मध्य प्रदेश में लॉकडाउन के बीच गुरुवार को एक मस्जिद में 40 लोगों ने एकत्र होकर नमाज अदा की। इसकी जानकारी मिलने पर पुलिस ने सभी के खिलाफ में मुकदमा दर्ज किया है।
Madhya Pradesh: Case registered against 40 ppl who were found offering prayers inside a mosque in Chaurai, Chhindwara. Chaurai station in-charge says,”They were found offering prayers in the mosque, violating sec-144. Case registered under Epidemic Act & relevant sections”.(9.04) pic.twitter.com/92PvO4C8sP
मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के एक गाँव की मस्जिद में बड़ी संख्या में लोग नमाज अदा करने के लिए जुट गए। इस बात की जानकारी जब पुलिस को हुई तो वह तत्काल मौके पर पहुँच गई। सामूहिक नमाज अदा करने के आरोप में 40 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है।
पुलिस निरीक्षक मुकेश द्विवेदी ने बताया कि पुलिस को लॉकडाउन का उल्लंघन कर बड़े पैमाने पर लोगों के इकट्ठा होने की सूचना मिली थी। सूचना पर चौरई तहसील के खैरीखुर्द गाँव में गुरुवार रात को पहुँची पुलिस ने देखा कि एक मस्जिद में गाँव के सरपंच सहित 40 लोग सामूहिक तौर पर नमाज अदा कर रहे थे।
मुकेश द्विवेदी ने बताया कि इस पर पुलिस के गश्ती दल द्वारा सभी 40 नमाजियों के खिलाफ में धारा 144, धारा 188 और धारा 269 के तहत मामला दर्ज किया गया है। साथ ही आरोपियों के खिलाफ आपदा प्रबंधन अधिनियम और मध्य प्रदेश जन सुरक्षा कानून 1949 की संबद्ध धारओं के तहत मामला दर्ज किया गया हैं। चेतावनी देने के बाद सभी को जमानत पर छोड़ दिया गया है।
आपको बता दें कि छिंदवाड़ा में अब तक 4 कोरोना पॉजिटिव के केस सामने आ चुके हैं, जिनमें से 1 की मौत हो चुकी है। साथ ही मध्य प्रदेश में लगातार बढ़ते मामले को देखते हुए जहाँ भी कोरोना पॉजिटिव केस सामने आए हैं उन सभी इलाकों को प्रदेश सरकार ने पूरे तरह से सील कर दिया है। वहीं ऐसे लोगों के संपर्क में आने वाले लोगों को होम क्वारंटाइन किया गया है।
माध्य प्रदेश में अब तक कोरोना से 16 लोगों की मौत हो चुकी है। संक्रमित लोगों की संख्या बढ़कर 259 हो गई है। गौरतलब हो कि गुरुवार को मध्य प्रदेश के इंदौर में देश के पहले कोरोना संक्रमित डॉक्टर ने दम तोड़ दिया था।
कोरोना महामारी के बीच मीडिया गिरोह की हरकतें अब बिलकुल बर्दाशत करने लायक नहीं रह गई हैं। बीते दिनों सिर्फ़ प्रधानमंत्री की अपीलों का अनुसरण करने वाले लोगों को ये गिरोह उल-जुलूल बातें कहते नजर आए थे। मगर अब तो इन्होंने हद कर दी है कि ये देश की स्थिति जानते हुए लॉकडाउन का विरोध कर रहे हैं। उसके खिलाफ़ लोगों को भड़का रहे हैं और उन्हें बाहर आने की वजह दे रहे हैं। जी हाँ, जिस समय सरकार, प्रशासन, स्वास्थ्यकर्मी, सुरक्षाकर्मी हर कोई देश के नागरिकों से घरों में रहने की अपील कर रहा है। बार-बार उन्हें कोरोना से बचाए रखने की कोशिश कर रहा हैं। उस बीच मीडिया गिरोह के बुजुर्ग सदस्य विनोद दुआ अपनी अनर्गल बातों व फालतू के तर्कों को वीडियो के माध्यम से ला लाकर समाज में जहर फैलाने के लिए अग्रसर हैं।
Liberal Jamaat wants πiots in India.
One Jamaat spreading Corona, the other is inciting people to come on roads so that millions d!e in πiots or by Corona
Whole world is in lockdown, but these vultures can’t see India effectively controlling an epidemic pic.twitter.com/SARhSVDKPL
सब जानते-समझते-परखते हुए कि जिस तरह देश में कोरोना मामले बढ़ रहे थे, उस समय देश में लॉकडाउन व सोशल डिस्टेंसिंग का फैसला लेना कितना आवश्यक था और इस फैसले को लेने में देरी की जाती तो हालात बदतर हो सकते थे। बावजूद इसके विनोद दुआ ने अपने तथाकथित बुद्धिजीवि होने का प्रमाण पेश किया है। एचडब्ल्यू न्यूज नेटवर्क पर स्थिति का विश्लेषण करते हुए उन्होंने कई वीडियोज़ में सरकार और पुलिस पर सवाल उठाए हैं।
उन्होंने अपने एपिसोड नंबर 253 में जहाँ पुलिस को जल्लाद कहकर अमानवीय बताया है। वहीं ये भी पूछा है कि अगर लॉकडाउन से पहले लोगों को तैयारी के लिए कम समय दिया जाएगा तो वो पैनिक नहीं होंगे तो क्या करेंगे? वीडियो के अंत तक उनका कहना है कि सरकार ने जो 1500 करोड़ रुपए दिए हैं उससे देश का काम नहीं चलेगा। क्योंकि वो चवन्नी-अठन्नी हैं। इसके लिए 5-6 लाख करोड़ रुपयों की आवश्यकता है। ताकि लोगों को सड़कों पर उतरने से रोका जा सके।
लॉकडाउन के बाद सामने आई वीडियोज़ में वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ हर तथ्य से लोगों को भड़का रहे हैं। सरकार को संवेदनहीन बता रहे हैं और देश की पुलिस को अंग्रेजों के समय वाली पुलिस जैसी पुलिस बता रहे हैं। इसके अलावा अपनी ताजा वीडियो (एपिसोड 261) की शुरुआत में ही लॉकडाउन के मामले में नागरिकों के सामने सविनय अवज्ञा करने की भी बात कर रहे हैं।
वे अपनी वीडियो के जरिए लोगों को विकल्प दे रहे हैं कि या तो वे लॉकडाउन को मानने से अंदर ही अंदर इंकार कर दें। जैसे सिविल नाफरमानी। क्योंकि कोरोना वायरस से लड़ने के लिए लॉकडाउन काफी नहीं है। या फिर ये लोग फूटकर सड़कों पर आ जाएँ क्योंकि आखिर वे कब तक एनजीओ या सरकारी संगठन के दिए खाने को खाकर जिंदा रहेंगे। इसके अलावा वो इस समय में भी लोगों को बेरोजगारी के नाम पर वीडियो में डराते हैं। साथ ही कहते हैं सरकार और स्वयं सेवी संस्था इस समय जो भी कर रहे हैं। उससे काम नहीं चलने वाला। यानी वे सबके प्रयासों को खारिज कर देते हैं।
हैरानी की बात है न कि आखिर लंबे समय से पत्रकार के रूप में पहचाने जाने वाला ये शख्स ऐसी बातें कैसे कर सकता है। इसका काम तो इस घड़ी में लोगों से अपील करने का होना चाहिए था कि वे खुद को सुरक्षित रखें। जहाँ से जो मदद मिले उसका फायदा उठाएँ… फिर आखिर वे यह सब क्यों कर रहे हैं?
बता दें, ये जहर इतना ही नहीं है। विनोद दुआ ने अपनी इन वीडियोज में सरकार प्रशासन सबपर सवाल उठाए हैं। खुद को देश के नागरिकों का हितैषी स्थापित करते हुए उन्हें जमकर भड़काया है। अपने कुतर्कों से उन्हें गुमराह करने की कोशिश की है। वीडियोज की शुरुआत से लेकर अंत तक में विनोद दुआ एक भी बार देश के नागरिकों को कोरोना से बचे रहने की बात कहते नजर नहीं आते। बल्कि सरकार के ख़िलाफ़ बोलते, उनके फैसलों की निंदा करते और लोगों को उकसाते नजर आते हैं।
विश्लेषण की शुरुआत में वे अपनी दिक्कत इस बात पर दिखाते हैं कि आखिर प्रधानमंत्री हर ऐलान रात के 8 बजे क्यों करते हैं और जब करते हैं तो फिर वो फैसला 12 बजे से क्यों लागू होना होता है? जैसे नोटबंदी, जीएसटी आदि। उनका कहना है कि पीएम सिर्फ़ 4 घंटे का समय देते हैं। इससे लोगों को दिक्कत होती हैं। इसके बाद दुआ किसानों की स्थिति बताकर विषय को गंभीर मोड़ देने की कोशिश करते हैं। वे सवाल करते हैं कि गेहूँ बाजार तक कैसे पहुँचेगा और अगर पहुँच भी गया तो लोग उसे कैसे खरीदेंगे। वे सरकार से पूछते नजर आते हैं कि आखिर इस देश में जो लॉकडाउन कर दिया गया है। उसे सिर्फ़ पुलिस के भरोसे क्यों किया गया।
गौरतलब है कि ये वो समय है जब सरकार और देश की जनता अच्छे से जानती है कि इस समय कुछ भी किसी के भी हाथ नहीं है। मगर फिर भी सरकार स्थिति सुधारने के लिए प्रयासरत है। हर देश के पास इस समय लॉकडाउन के अलावा कोई विकल्प नहीं है। क्योंकि इस महामारी की दवाई तैयार होने तक यही एक रास्ता है कि इसकी चेन तोड़ी जाए। जो बिना दूरी बनाए संभव नहीं है।
सरकार मानती है कि इस समय देश का गरीब वर्ग दिक्कत में है। जिसके लिए वह इंतजाम कर रही है। बड़े-बड़े धनवान सामने आ रहे हैं। ऐसे में जनता के मन में ये डालना कि आखिर कब तक वे एनजीओ आदि की मदद पर खाना खाएँगे, उन्हें भड़काना नहीं, तो क्या है? खुद सोचिए, इस संवेदनशील स्थिति में, सरकार के कदमों पर सवाल उठाना कहाँ तक जरूरी है? और कहा तक जरूरी है पुलिस को जल्लाद बताना, जो अपनी जान को खतरे में डालकर नागरिकों की सुरक्षा में तैनात है।
दिल्ली निजामुद्दीन से निकले जमातियों की तलाश में उत्तर प्रदेश पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की टीमें लगातार राज्य में छापेमारी कर रही है। इसी के तहत यूपी पुलिस ने गुरुवार को कई जिलों से घरों में छिपे 48 जमातियों को खोज निकाला साथ ही स्वास्थ्य विभाग ने सभी को क्वारंटाइन कराया है। वहीं रायबरेली क्षेत्र से एक घर में छिपे पाए गए दो जमातियों के खिलाफ में पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया है।
रायबरेली: नसीराबाद की बिलाली मस्जिद में २ जमाती पकड़े गए।फिलहाल पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया है । लोगों का कहना है कि यहां जमात से आए और लोगों के बजी छुपे होने की आशंका है।
अमर उजाला की खबर के मुताबिक गुरुवार को प्रदेश में जारी जमातियों की तलाशी अभियान के तहत पुलिस ने बिजनौर, रायबरेली, रामपुर और अयोध्या में विभिन्न स्थानों पर छिपे 48 जमातियों को पकड़कर क्वरंटाइन किया गया है। इस दौरान सबसे बड़ी संख्या में जमाती बिजनौर जिले में छिपे पाए गए। पुलिस के मुताबिक बिजनौर जिले से असम की पाँच महिलाओं सहित 35 जमातियों को पकड़कर क्वारंटीन किया गया है। जिले में अब तक 487 जमाती पुलिस द्वारा तलाशे जा चुके हैं।
अमर उजाला में प्रकाशित खबर की कटिंग
खबर के मुताबिक रायबरेली में दिल्ली मरकज से लौटे दो जमाती मस्जिद के पास एक घर में पाए गए। दोनों के खिलाफ तथ्य छिपाने के मामले में पुलिस ने नजीराबाद थाने में मुकदमा दर्ज कराया है। मोमिनपुरा निवासी ये दोनों जमाती दिल्ली से लौटकर आँध्र प्रदेश में भी जमात के लिए गए थे। इसके बाद ये कस्बे में वापस आए। इसके बाद से ही इन दोनों का आना-जाना और लोगों से मिलना जारी है, लेकिन किसी को भी अपनी हिस्ट्री के बारे में नहीं बताया।
उधर जिला रामपुर में भी पुलिस ने अपने अभियान के दौरान शाहबाद में अलग-अलग स्थानों पर रहने वाे 10 जमातियों की पहचान की है। इन सभी को पुलिस ने हॉम क्वारंटाइन किया है। अयोध्या जिले के एक गाँव में सूचना पर पहुँची पुलिस ने एक घर में छिपे जमाती को दबोच लिया। जमाती ने दिल्ली मरकज स्थित तबलीगी जमात के मजहबी सम्मेलन में हिस्सा लिया था।
सुल्तानपुर में जिला पुलिस ने वीजा उल्लंघन के आरोप में 10 उलेमाओं के पासपोर्ट को जब्त कर लिया है। रिपोर्ट के अनुसार, कानपुर के हरदोई के बिलग्राम गाँव के एक मदरसे में पढ़ाने वाले शिक्षक के कोरोना पॉजीटिव पाए जाने के बाद पूरे कस्बे को पूरी तरह से प्रशासन ने सील कर दिया है। पुलिस को मिली युवक की हिस्ट्री के मुताबिक शिक्षक घौलपुर(राजस्थान) में पाए गए कोरोना पॉजीटिव जमातियों के संपर्क में था।
वहीं मुजफ्फरनगर में तीन जमाती कोरोना पॉजीटिव पाए जाने के बाद से उन्हें पुलिस ने कोविड अस्पताल मुजफ्फरनगर मेडिकल कॉलेज बेगराजपुर में भर्ती करा दिया है। साथ ही उनके संपर्क में आने वाले लोगों की तलाश की जा रही है। वहीं मेरठ के 829 जमातियों को स्वास्थ्य विभाग ने निगरानी में रखा है, जिनमें से 321 जमातियों ने दिल्ली के निजामुद्दीन में हुए मजहबी सम्मेलन में हिस्सा लिया था।
आपको बता दें कि पुलिस प्रशासन की तरफ से लगातार यह अपील की जा रही है कि जमात में आने वाले लोग खुद ही सामने आएँ और अपनी और अन्य लोगों की सेहत को ध्यान में रखते हुए खुद ही अपनी जाँच कराएँ। इसके बावजूद भी जमाती सामने नहीं आ रहे। इसीलिए उत्तर प्रदेश में पुलिस ने स्वास्थ्य विभाग की टीम के साथ मिलकर सर्च अभियान चलाया हुआ है।
मैथिली में एक गीत के बोल हैं- कियै दुइये दिनक छुट्टी लऽ कऽ गाम एलियै… परेदस में रहने वाले पति को उलाहना देती एक विवाहिता के भावनाओं का दर्पण इस गीत को समझ लीजिए। पलायन के दर्द, चुहल और उलाहना से भरे ढेरों गीत आपको उत्तर प्रदेश-बिहार की लोकभाषाओं में मिल जाएँगे। ऊपर के गीत में विवाहिता परदेस में रहने वाले पति को लंबी छुट्टी लेकर घर नहीं आने पर उलाहना दे रही है। लेकिन, कोरोना वायरस संक्रमण के प्रसार पर काबू पाने के लिए देश भर में लॉकडाउन के ऐलान के बाद दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर हुआ जमावड़ा दो दिन की छुट्टी वाला मसला नहीं था। यह तो उस अनिश्चितिता से जुड़ा था जो कब खत्म होगा इसको लेकर मुकम्मल तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कह चुके हैं कि अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर होगा। रोजगार के लिहाज से कितना नुकसान होगा, खासकर श्रमिकों को इसका सटीक अनुमान लगाना पाना मुश्किल है। यानी, घर की ओर लौटने वाले इस हुजूम को यह नहीं पता था कि रोजगार के मोर्चे पर उसकी वापसी कब तक होगी।
नॉर्वे में चिकित्सक और गिरमिटिया मजदूरों पर आधारित किताब ‘कुली लाइन्स’ के लेखक प्रवीण झा कहते हैं, “लॉकडाउन या अन्य स्थिति में भी काम से छुट्टी होते ही घर लौटना पलायित वर्ग की प्रवृत्ति रही है। उनमें से अधिकतर लोग छुट्टियाँ घर पर ही मनाना चाहते हैं। यह ‘बासा से बाती’ तक जाने की प्रवृत्ति है। लॉकडाउन के बाद दिहाड़ी मजदूरों और प्राइवेट नौकरी करने वालों की छुट्टी हो गई। उनमें इसके कारण (कोरोना संक्रमण) के संज्ञान की कमी है। वे इसकी गंभीरता को नहीं समझते और उनके लिए यह छुट्टी जैसा ही है। लेकिन, ट्रेन-बस बंद होने की वजह से उन्हें पैदल ही झुंड में निकलना पड़ा, यह एक संकट बना।”
इस संकट ने यूपी-बिहार से पलायन को एक बार फिर राजनीतिक बहसों के केंद्र में खड़ा कर दिया है। ऐसा नहीं है कि पलायन केवल यूपी-बिहार से ही होता है या फिर यह नया चलन है। कुली लाइन्स को भी आप पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि गिरमिटिया बनकर केवल पूरबिए ही जहाजों में सवार नहीं हुए थे। दक्षिण से भी बड़ी तादाद में लोग गए थे। लॉकडाउन में ही आपने महाराष्ट्र से मध्य प्रदेश, गुजरात से राजस्थान या अलग-अलग हिस्सों में पैदल, साइकिल, ठेला गाड़ी से लोगों के घर तक कूच करने की कई खबरें पढ़ी होंगी। वे तस्वीरें भी देखी होंगी जिसमें गुजरात से पैदल जाते राजस्थान के लोगों के लिए सड़क किनारे खाने की व्यवस्था करते खुद गुजरात के उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल दिख रहे थे। केरल में तो दिल्ली की तरह ही सैकड़ों की संख्या में प्रवासी घर जाने के लिए सड़क पर उतर आए थे। इनमें यूपी-बिहार के अलावा बंगाल, छत्तीसगढ़, ओडिशा जैसे राज्यों के भी श्रमिक थे। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अन्य प्रदेशों में रह रहे अपने राज्य के लोगों की आवश्यकताओं का ध्यान रखने के लिए संबंधित राज्यों से आग्रह किया था। बकायदा अधिकारी इसके लिए तैनात किए गए थे। इसी तरह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी हेल्पलाइन नंबर शुरू किए। राज्य के प्रवासियों की मदद के लिए डेस्क बनाए। बावजूद घर जाने के लिए एनसीआर से प्रवासी श्रमिकों का हुजूम यूपी बॉर्डर पर उमड़ पड़ा।
इसके कारणों की पड़ताल से पहले पलायन के हालात को समझते हैं।
सोशल डिस्टेंसिंग बेमानी: लॉकडाउन के दौरान यूपी बॉर्डर पर प्रवासी श्रमिकों का हुजूम
पलायन क्या है, क्यों होता है?
अपने मूल जगह से दूसरे स्थान तक आवाजाही ही पलायन है। यह थोड़े समय के लिए और स्थायी भी हो सकता है। स्वैच्छिक के साथ मजबूरी में भी पलायन होता है। देश से बाहर, देश के एक राज्य से दूसरे राज्य, अपने ही राज्य में एक जिले से दूसरे जिले और खुद के जिले के भीतर भी लोग पलायन करते हैं। ग्रामीण इलाकों से शहरी इलाकों में बड़े पैमाने पर पलायन के कारण निम्न हैं,
कृषि पर अत्यधिक निर्भरता
रोजगार के अवसर न होना
क्षेत्रीय विकास में असमानता
शैक्षणिक सुविधाओं की कमी
बेहतर इलाज के लिए भी लोग पलायन करते हैं, लेकिन यह अल्पकालिक ही होता है। इसके अलावा राजनीतिक हालात, जातीय-सामाजिक संघर्ष, धार्मिक उत्पीड़न, गृहयुद्ध जैसे हालात भी पलायन का कारण बनते हैं। हालॉंकि भारत, खासकर यूपी-बिहार जैसे राज्यों के संदर्भ में स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों का अभाव और शैक्षणिक सुविधाओं की कमी, इसकी दो मुख्य वजहें हैं। इन दोनों राज्यों से इलाज के लिए भी अल्पकालिक पलायन बड़े पैमाने पर होता है।
आँकड़ों में पलायन
भारत में पलायन की मौजूदा स्थिति का कोई आधिकारिक आँकड़ा नहीं है। इस संदर्भ में 2011 की जनगणना के आँकड़े एक तस्वीर पेश करते हैं। इसी आँकड़े, इकोनॉमिक सर्वे और एनएसएओ सर्वे के आधार पर विशेषज्ञ अनुमान लगाते हैं। हम यहॉं इसे 2011 के आधिकारिक आँकड़ों के आधार पर ही समझने की कोशिश करेंगे। इससे पता चलता है:
देश की हिंदी पट्टी पलायन का प्रमुख केंद्र है। उत्तर प्रदेश और बिहार से लगभग 2,09,00,000 लोग पलायन कर देश के दूसरे राज्यों में गए। यह आँकड़ा देश में होने वाले एक राज्य से दूसरे राज्य में पलायन का 37 प्रतिशत था।
देश के दो बड़े महानगरों दिल्ली और मुंबई की ओर पलायन करने वालों की कुल संख्या 99 लाख थी, जो वहॉं की आबादी का करीब एक तिहाई हिस्सा था।
हिंदी पट्टी के चार प्रमुख राज्यों (उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश) की एक राज्य से दूसरे राज्य में पलायन में 50 प्रतिशत हिस्सेदारी थी।
खुद के राज्य में भी पलायन करने वाले लोग 2001-2011 के बीच बढ़े। इसे कागजी भाषा में अंतर-जिला पलायन कहते हैं। 2001 की जनगणना में अंतर-जिला पलायन 30% था, जो 2011 की जनगणना में बढ़कर 58% हो गया।
एक राज्य से दूसरे राज्य में पलायन करने वाले आधे लोगों का ठिकाना महाराष्ट्र, दिल्ली, गुजरात, उत्तर प्रदेश और हरियाणा थे।
दूसरे प्रांतों से पलायन कर सबसे ज्यादा लोग महाराष्ट्र पहुँचे।
खुद के राज्य के भीतर पलायन करने का आँकड़ा 2001 के 33% से बढ़कर 2011 में 55% हो गया था। एक ही राज्य के एक जिले से दूसरे जिले में पलायन का आँकड़ा 30% से बढ़कर 58% हो गया था।
लोग राज्य के भीतर एक जिले से दूसरे जिले ही नहीं जा रहे थे। जिलों के भीतर भी पलायन हो रहा है। यह आँकड़ा 33% से बढ़कर 45% तक पहुँच गया था।
यानी घर के करीब अवसरों को प्राथमिकता देने का भी चलन बढ़ा है। इसका सबसे बड़ा कारण छुट्टी होते ही बासा से बाती तक लौटने की वही प्रवृत्ति है, जिसके बारे में प्रवीण झा इशारा करते हैं।
यहॉं यह याद रखना जरूरी है कि दशक भर में इन आँकड़ों में व्यापक तब्दीली आई होगी।
2011 के आँकड़ों से एक दिलचस्प सूरत यह उभरती है कि पलायन कर दूसरे राज्य में जाने और दूसरे राज्यों से पलायन कर आने वाले लोगों का ठिकाना बनने, दोनों लिहाज से सूची में उत्तर प्रदेश ऊपर से है। बिहार के साथ ऐसी स्थिति नहीं होने के कारणों पर आगे गौर करेंगे। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट बताती है कि बिहार के छह जिलों (मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, सारण, पटना, सीवान) से सर्वाधिक पलायन होता है। यूपी में पलायन वाले शीर्ष 10 जिले हैं: देवरिया, गोरखपुर, आजमगढ़, बस्ती, गोंडा, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, इलाहाबाद, जौनपुर और वाराणसी। इनके साथ ओडिशा के गंजम जिले को शामिल कर दें, तो देश में पलायन करने वाले 25 फीसदी पुरुष इन्हीं 17 जिलों से थे। जाहिर है जब लॉकडाउन हुआ तो सबसे ज्यादा मारामारी भी इन्हीं जिलों तक पहुॅंचने की थी। मोटे तौर पर कहें तो सड़क पर उतरे ज्यादातर प्रवासी पूर्वांचल के थे।
2018 के इकोनॉमिक सर्वे के अनुसार सबसे अधिक पलायन वाले देश के 75 जिलों में 39 यूपी के हैं। इसमें 9 जिले उत्तराखंड के और 8 बिहार के हैं। इकोनॉमिक सर्वे के अनुसार, 1991-2001 के दशक में माइग्रेशन की दर 2.4% थी, जो 2001-11 के दशक में लगभग दोगुनी बढ़कर 4.5% पर पहुॅंच गई। अनुमानों के मुताबिक, हर साल 50 से 90 लाख लोग देश के भीतर पलायन करते हैं।
पलायन: अवसर या अभिशाप?
पलायन होता तो बेहतरी की तलाश में ही है। लेकिन, यह स्वैच्छिक कारणों और मजबूरी दोनों वजहों से होता है, इसलिए इस सवाल का जवाब तलाशना जरूरी हो जाता है कि यह अवसर है अथवा अभिशाप? जैसा कि प्रवीण झा ने बताया, “पलायन को अगर प्रवास कहें तो यह अवसर है। यह एक तथ्य है कि भारत के समृद्ध राज्यों (गुजरात और पंजाब) से प्रवास होता रहा है और विदेशी धन का संचार उन्हें समृद्ध करता रहा है। इसे विस्थापन में ‘पुल फैक्टर’ कहते हैं, जब आप बेहतर अवसर के लिए किसी स्थान पर जाते हैं। वहीं, पलायन शब्द संताप से जुड़ा है। इसमें ‘पुल फैक्टर’ से अधिक ‘पुश फैक्टर’ की भूमिका है। बिहार से अस्सी-नब्बे के दशक के पलायन में इसी फैक्टर की भूमिका है, जहाँ पलायन की वजह उद्योगों का बंद होना और जंगलराज रहा।”
बिहार: पलायन के जड़ में क्या है?
1812 में पटना की जनसंख्या करीब 3 लाख थी। कलकत्ता (यानी आज की कोलकाता) की 1.75 लाख। 1871 में पटना की जनसंख्या 1.6 लाख रह गई तो कलकत्ता की बढ़कर 4.5 लाख हो गई। पटना जैसा हाल ही भागलपुर और पूर्णिया का भी हुआ। इसका कारण था अंग्रेजों के राज में कलकत्ता में उद्योगों का फलना-फूलना और बिहार खासकर मिथिला के इलाके में देशी उद्योगों का दम तोड़ना। इसी तरह यूपी में कानपुर जैसे शहरों में उद्योग-धंधों ने जोर पकड़ा। नतीजतन, बिहार से पलायन इन शहरों की ओर तेज हुआ। कालांतर में कलकत्ता और कानपुर जैसे शहर के उद्योग भी उजड़ते गए। जिसकी परिणति आज हम दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, गुड़गॉंव, सूरत, अहमदाबाद, मुंबई जैसे बड़े महानगरों में यूपी-बिहार के लोगों के इतने बड़े पैमाने पर पलायन के तौर पर देखते हैं। 2011 की जनगणना के आँकड़े भी इसकी गवाही देते हैं।
प्रवीण झा भी बताते हैं, “बिहार-यूपी से पलायन का इतिहास दो सौ वर्ष या उससे भी अधिक का है। इसमें ‘पुल-पुश फैक्टर’ के अतिरिक्त प्रवासी प्रवृत्ति भी है। मारवाड़ियों और पंजाबियों की तरह यह प्रवृत्ति बिहार-यूपी के किसान-मजदूर वर्ग में भी गिरमिटिया युग से ही रही है। इनकी बिदेसिया प्रवृत्ति है कि बाहर जा कर धन कमाओ और गाँव भेजो। यह उस वक्त भी होता था, जब बिहार-यूपी अपेक्षाकृत समृद्ध थे।” उनके अनुसार सामंतवादी व्यवस्था और कर्ज उतारने का दबाव भी इसका एक कारण रहा है। गंगा के दक्षिण के लोगों में प्रवासी प्रवृत्ति शुरू से रही है। वे कहते हैं, “यकीनन, आधुनिक समय में ‘पुश फैक्टर’ इसका बड़ा कारण है। लेकिन, इसके साथ एक और प्रवृत्ति देखी जा रही है, जिसे ‘इंटैगलमेंट’ कहते हैं। यानी, जंगलराज खत्म होने के बाद भी लोग वापस नहीं लौट रहे। इसकी वजह है उनका फँस जाना। वे बाहर नौकरी करने लगे, उनका परिवार अब बिहार लौटना नहीं चाहता और वे फँस चुके हैं।”
पटना कॉलेज के पूर्व प्राचार्य और समाजशास्त्री नवल किशोर चौधरी इसकी वजहें सामाजिक और आर्थिक दोनों मानते हैं। उनके अनुसार बिहार से पलायन ने इन वजहों से जोर पकड़ा;
90 के दशक में बिहार ने जातीय हिंसा का भीषण दौर देखा है। प्रभावित इलाकों के अलग-अलग हिस्सों से अलग-अलग वर्ग का सामूहिक पलायन हुआ।
राज्य में उद्योग-धंधे एक-एक कर बंद होते गए और नए लगे नहीं। इससे न केवल रोजगार के नए अवसर ही पैदा नहीं हुए, बल्कि पहले से उपलब्ध अवसर भी समाप्त हो गए। इसने लोगों को बड़े पैमाने पर देश के दूसरे राज्यों में श्रमिक के तौर पर जाने के लिए मजबूर किया।
सत्ता में बदलाव के बाद उपेक्षित वर्ग में इस भावना ने जोर पकड़ा कि महानगरों में जाकर मजदूरी कर लेंगे, लेकिन अपने गॉंव में नहीं करेंगे। हमारी सामाजिक सरंचना भी ऐसी है जिसमें स्थानीय स्तर पर जो काम करने में लोग लज्जा महसूस करते हैं, वही काम वे बाहर जाकर आराम से करते हैं। उनके मन में यह भाव होता है कि यहॉं उन्हें कोई देख नहीं रहा।
पुश्तैनी धंधों के खात्मे ने भी श्रमिक के तौर पर पलायन के लिए लोगों को मजबूर किया। यह दो तरह से हुआ। मसलन, गॉंवों में नाई, लुहार, कुम्हार का जो काम कर रहे थे उनमें से एक वर्ग ऐसा था जो इस काम को आगे ले जाने को तैयार नहीं था। वह शहरों की ओर निकल गया। जो लोग पुश्तैनी धंधे से जुड़े रहना चाहते थे उनके लिए गॉंवों से अन्य वर्गों के पलायन के कारण रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया। धीरे-धीरे उन्होंने भी महानगरों की राह पकड़ ली।
हर साल आने वाली बाढ़ और सुखाड़ ने भी ग्रामीण इलाकों से बड़े पैमाने पर निकलकर महानगरों में मजदूरी करने को लोगों को मजबूर किया।
आज आप गॉंवों में जाएँ तो पाएँगे कि पुरुष वे ही रह गए हैं जो वृद्ध हैं या कुछ भी करने में असमर्थ।
सवार होने कीपुरानी मारामारी : बिहार से महानगरों की ओर आने वाली ट्रेनें हों या फिर महानगरों से बिहार जाने वाली ट्रेनें, हालात वही
पटना विश्वविद्यालय में प्राध्यापक शंकर कुमार के अनुसार शिक्षा-व्यवस्था चौपट होने से भी राज्य से बाहर पलायन को गति मिली। उन्होंने बताया, “पहले पटना, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, भागलपुर जैसे शहर शिक्षा के बड़े केंद्र हुआ करते थे। ज्यादातर छात्र बेहतर शिक्षा के लिए इन्हीं शहरों में पहुॅंचते थे। उसके बाद कुछ बनारस या इलाहाबाद जैसे विश्वविद्यालयों में जाते थे। दिल्ली तो काफी कम छात्र ही जाया करते थे। लेकिन, 90 के दशक से इस चलन में बदलाव आना शुरू हुआ। आज बेहतर शिक्षा के लिए बाहर जाना ही एकमात्र विकल्प रह गया। यही कारण है कि अब गॉंव से निकलकर छात्र सीधे दिल्ली, कोटा या दक्षिण भारत के शहरों में जा रहे हैं।”
उन्होंने बताया कि शैक्षणिक व्यवस्था में गिरावट का अंदाजा आप पटना विश्वविद्यालय के हालात से लगा सकते हैं, जिसे कभी ‘पूरब का ऑक्सफोर्ड’ कहा जाता था। बीते तीन-चार दशक में राज्य में नए स्तरीय संस्थान खड़े नहीं हुए हैं। जो पुराने संस्थान हैं उनकी प्रतिष्ठा अब वैसी नहीं रही। हालत यह है कि राज्य के ज्यादातर विश्वविद्यालय तीन साल में ग्रेजुएशन की डिग्री नहीं दे पाते। ऐसे में कोई छात्र अपना कीमती समय क्यों बर्बाद करना चाहेगा।
बिहार के वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर इसकी एक वजह कानून-व्यवस्था की स्थिति को भी मानते हैं। उनके अनुसार गिरावट अस्सी के दशक से ही शुरू हो गई थी। लेकिन जिस दौर को हम जंगलराज के नाम से जानते हैं उसने पलायन को नई रफ्तार दी। वे कहते हैं, “कानून-व्यवस्था बिगड़ने के मतलब है कि उसका असर कृषि से लेकर व्यापार-उद्योग सब पर पड़ा। मजदूरों का तबका इन्हीं से जुड़ा होता है। डर से व्यापारी राज्य से निकले तो स्थानीय स्तर पर लोगों के रोजगार भी छिन गए। सुरक्षित जीवन की तलाश में आम लोग भी दूसरे राज्यों में निकल गए।”
उन्होंने बताया कि बिहार से पलायन की एक बड़ी वजह रेल भाड़ा सामान्यीकरण कानून भी है। आजादी के बाद केंद्र सरकार का बनाया यह कानून 90 के दशक में खत्म हुआ। इस कानून के तहत धनबाद से रॉंची कोयला की ढुलाई में जितना रेल किराया लगता था, उतने ही भाड़े में यह धनबाद से मद्रास भी पहुॅंच जाता था। इसने उद्योगपतियों को समुद्र किनारे कोयला आधारित उद्योग लगाने को प्रोत्साहित किया। सुरेंद्र किशोर कहते हैं, “यदि यह कानून अंग्रेजों के जमाने में होता तो टाटा नगर न होता। फिर टाटा बंबई जैसे शहरों में अपना उद्योग खड़ा करते। केंद्र सरकार की इस बेईमानी की वजह से बिहार को कम से कम 10 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। उद्योगों का राज्य में अपेक्षित विकास नहीं हुआ। न खेती का पंजाब की तरह विकास हुआ। आबादी बढ़ती गई। स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा नहीं हो रहे थे। ऐसे में पलायन होना ही था।”
उन्होंने बताया कि बिहार की सत्ता में नीतीश कुमार के आने के बाद स्थिति में सुधार तो हुआ लेकिन पूॅंजी निवेश नहीं हुआ। इसकी वजह प्रशासन पर उद्योगपतियों का विश्वास नहीं होना है। उन्हें यह भी डर रहता है कि यदि लालू फिर सत्ता में लौट गए तो दोबारा वैसे ही हालात पैदा हो जाएँगे। उनके अनुसार इन 15 सालों में पलायन में थोड़ी कमी आई है। राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद जब सड़कों का निर्माण बड़े पैमाने पर हुआ था तो कुछ साल के लिए पलायन के दर में कमी देखी गई थी। कुछ लोग राज्य में लौटे भी थे। नीतीश सरकार की लोक कल्याणकारी योजनाओं से भी इसमें मदद मिली।
लेकिन, जिस अनुपात में आबादी बढ़ी, न यह उल्लेखनीय है और न ही इससे व्यापक असर पड़ा।
जगदीश चंद्र झा ने Migration and Achievements of Maithil Pandits में लिखा है कि बेहतर अर्थ लाभ के लिए मैथिल हमेशा से देश के अन्य क्षेत्रों में जाते रहे हैं। हालॉंकि तब और अब के पलायन में एक मोटा फर्क है। तब लोग जड़ों की ओर लौटते वक्त अमूमन अपने साथ कृषि की नई तकनीक, स्वस्थ जीवन जीने के तरीके, घरेलू उद्योग लगाने के गुर सीख कर आते थे। इसकी वजह से पुराने वक्त में बिहार में पलायन के साथ उद्योग फल-फूल भी रहा था। मसलन, मधुबनी में मलमल, दुलालगंज में सस्ते कपड़ों और किशनगंज में कागज का उद्योग चला। दरभंगा हाथी दाँत से बने सामान का प्रमुख उत्पादन केंद्र बना। खगड़िया, किशनगंज जैसे इलाके पीतल, कांसे के बर्तन के लिए जाने जाते थे। भागलपुर सिल्क तो मुंगेर घोड़े की नाल, स्टोव, जूते के लिए प्रसिद्ध था। पूर्णिया सिंदूर उत्पादन और निर्यात के साथ टेंट हाउस के सामान बनाने के लिए प्रसिद्ध था।
इसके अलावा चीनी मिल, वस्त्र, जूट, तंबाकू, दाल मिल, आटा चक्की मिलें, तेल मिल वगैरह के साथ-साथ आजाद भारत में कई सार्वजनिक उपक्रम भी राज्य के अलग-अलग हिस्सों में लगे। निजी क्षेत्र में रोहतास इंडस्ट्रीज लिमिटेड (डालमिया नगर), अशोक पेपर मिल (दरभंगा), हिन्द इंजीनियरिंग कम्पनी (बरौनी) जैसे कई बड़े नाम थे। बरौनी में 1946 में खाद कारखाना स्थापित किया गया। फिर यहीं तेल शोधक कारखाना भी लगा। मुंगेर के जमालपुर में रेलवे वर्कशाप तो मोकामा में भारत वैगन एवं इंजीनियरिंग कम्पनी लिमिटेड शुरू किया गया। बिहार से अलग होकर बने झारखंड वाले हिस्से की पहचान ही उद्योगों और खनिजों से थी। अलग-अलग शहर अलग-अलग कामों के लिए जाने जाते थे। मसलन;
लाख उद्योग: गया, पूर्णिया तेल मिल: पटना, मुंगेर, शाहाबाद कागज व लुग्दी उद्योग: डालमिया नगर, समस्तीपुर, दरभंगा, पटना, बरौनी प्लाईवुड: हाजीपुर चमड़ा उद्योग: गया, दीघा, मोकामा सीमेंट उद्योग: डालमिया नगर, खेलारी तंबाकू उद्योग: मुंगेर, बक्सर, गया, आरा शराब कारखाना: मुंगेर, पटना, मानपुर, पंचरूखी शीशा उद्योग: पटना बंदूक उद्योग: मुंगेर बटन उद्योग: दलसिंहसराय दियासलाई: कटिहार कंबल उद्योग: गया, पूर्णिया, औरंगाबाद, मोतिहारी बीड़ी उद्योग: बिहारशरीफ, झाझा, जमुई हथकरघा उद्योग: मधुबनी, भागलपुर, बिहारशरीफ, गया, पटना, मुंगेर बर्तन उद्योग: सीवान, बिहटा
इनमें से ज्यादातर उद्योग कृषि आधारित थे। इसकी वजह से किसानों के लिए खेती आज की तरह घाटे का सौदा नहीं थी। साथ ही मजबूरी में दूसरे राज्यों में पलायन ही एकमात्र विकल्प नहीं था।
वीरानी ही पहचान: दरभंगा का अशोक पेपर मिल
जंगलराज से लेकर सुशासन तक वही पलायन
बिहार में संस्थानों में गिरावट का दौर 80 के दशक में ही शुरू हो गया था। 90 के दशक में लालू यादव सत्ता में आए। 15 साल तक प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष तौर पर सत्ता की बागडोर उन्हीं के हाथों में रही। इस दौरान राज्य में कानून-व्यवस्था के हालात इतने बिगड़ गए कि उस दौर को आज भी ‘जंगलराज’ के तौर पर याद किया जाता है। बीते 15 साल से राज्य की सत्ता में नीतीश कुमार बने हुए हैं। अपने शुरुआती कार्यकाल के कामों के दम पर उन्होंने ‘सुशासन बाबू’ की छवि गढ़ी। बावजूद पलायन के मोर्चे पर कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखता। इसकी वजह जानने के लिए हम दो क्षेत्रों पर नजर डालते हैं।
शैक्षणिक ढाँचा: एक स्कूल है नेतरहाट। कभी बिहार की शान हुआ करता था। अब झारखंड में है। नीतीश कुमार सत्ता में आए तो उन्होंने राज्य में नेतरहाट के मुकाबले का एक स्कूल तैयार करने का सपना देखा। 2010 में बड़ी घोषणाओं के साथ छठी से बारहवीं तक की पढ़ाई के लिए जमुई जिले की पहाड़ियों के मनोरम माहौल में सिमुलतला आवासीय विद्यालय की शुरुआत की। 10वीं और 12वीं के नतीजों के लिहाज से इस समय यह राज्य का अव्वल स्कूल है। लेकिन दशक भर के छोटे से सफर में ही गड़बड़ियों, उपेक्षा और घपलों का प्रतीक भी बन गया है। सिमुलतला का सफर बताता है कि संस्थान खड़ा करने के लिहाज से सुशासन भी फिसड्डी ही रहा है।
इस स्कूल के संस्थापक प्राचार्य रहे और अब पटना विश्वविद्यालय के प्राध्यापक शंकर कुमार बताते हैं कि शिक्षा के लिहाज से बिहार में 80 के दशक से पहले का समय गोल्डन पीरियड रहा है। अस्सी का दशक अपने साथ कैंपस में अराजकता और नेताओं का दखल लेकर आया। फिर कॉन्ग्रेस की वित्त रहित शिक्षा नीति ने बेड़ा गर्क कर दिया। इसने शिक्षकों को हर गलत काम में संलिप्त होकर धन और संसाधन जुटाने को मजबूर किया। यह धारणा बनी कि डिग्री बेचोगे तो पैसा आएगा। इससे शैक्षणिक गुणवत्ता में तेजी से गिरावट आई।
उन्होंने बताया कि 90 में जब लालू आए तो उन्होंने शिक्षा क्षेत्र को उसके हाल पर छोड़ दिया। पतन का सिलसिला जारी रहा। परीक्षाओं में खुलेआम नकल होने लगी और शिक्षण संस्थान डिग्री बॉंटने के कारखाने बन गए। नीतीश कुमार अपने साथ शिक्षा के क्षेत्र में नियोजन लाए। वित्त रहित शिक्षा नीति विश्वविद्यालयों से निकल कर स्कूलों तक पहुॅंच गई। बकौल शंकर कुमार, “उन्होंने इंगेजमेंट पर फोकस रखा, लेकिन नॉलेज बेस्ड सिस्टम डेवलप करने पर ध्यान नहीं दिया। अच्छे लड़के कैंपस से दूर होते ही गए और अब हालत यह है कि 12वीं के बाद ही छात्रों का पलायन होने लगा है।”
असल में यह क्वालिटी ही थी जिसके कारण 80 के दशक तक बिहार से शिक्षा के क्षेत्र में नाम मात्र का पलायन देखने को मिलता था। पटना की छोड़िए हर इलाके में कोई न कोई प्रतिष्ठित कॉलेज था। मसलन, सीएम साइंस कॉलेज (दरभंगा), आरके कॉलेज (मधुबनी), जीडी कॉलेज (बेगूसराय), राजेंद्र कॉलेज (छपरा), कुंवर सिंह कॉलेज (आरा), मारवाड़ी कॉलेज (भागलपुर), लंगट सिंह कॉलेज (मुजफ्फरपुर), गया कॉलेज (गया), सेंट जेवियर्स (रॉंची), सेंट कोलंबस (हजारीबाग) वगैरह। पटना साइंस कॉलेज तो प्रेसिडेंसी कॉलेज के टक्कर का माना जाता था।
शंकर कुमार बताते हैं, “ये कॉलेज अच्छे लड़कों को अपने जिले में ही रोक देते थे। वे अच्छी शिक्षा के लिए बाहर जाने को मजबूर नहीं थे। आज हालत यह है कि कॉलेजों में सीट तो खाली नहीं है, लेकिन अच्छे लड़के कैंपस में नहीं आ रहे। अच्छे छात्रों का आना बंद हुआ तो शिक्षकों की गुणवत्ता में भी कमी आई और आखिर में पूरा सिस्टम ध्वस्त हो गया।”
वे बताते हैं कि बिहार में एजुकेशन हब बनने की भरपूर क्षमता है। आप दूसरे राज्यों के किसी भी अच्छे संस्थान में जाइए वहॉं पढ़ने और पढ़ाने वाले, दोनों बिहार के मिलेंगे। लेकिन लालू के जमाने में कानून-व्यवस्था खराब होने के कारण ऐसा नहीं हो पाया। नीतीश भी इसके लिए माहौल तैयार नहीं कर पाए। यदि ऐसा हो जाता तो न केवल पलायन रुकता, बल्कि रोजगार भी बड़े पैमाने पर पैदा होता। शिक्षा इंडस्ट्री ढेर सारे अप्रत्यक्ष रोजगार भी पैदा करता है। इससे शिक्षा के अलावा दूसरे क्षेत्रों में पलायन भी रुकता।
उन्होंने बताया, “हाल के सालों में कुछ निजी संस्थान राज्य में आए हैं। लेकिन वे या तो किसी औद्योगिक घराने से जुड़े हैं या नेताओं की उनमें भागीदारी है। बेहतर संस्थान खड़ा करने के लिए सबसे जरूरी चीज है उसमें राजनीतिक हस्तक्षेप का न होना। अब तक का अनुभव बताता है कि ऐसा होने पर संस्थानों का लर्निंग आउटपुट बेहद खराब होता है।” इस लिहाज से नीतीश का 15 साल का कार्यकाल भी खरा नहीं उतरता। नतीजतन, पलायन में भी कमी नहीं आ सकी।
शंकर कुमार कहते हैं, “शिक्षा के क्षेत्र में पलायन रोकने की एक ही शर्त है क्वालिटी एजुकेशन का अवसर पैदा करना।” क्या बिहार में कभी यह मुख्य धारा की राजनीति का मुद्दा बन पाएगा। शंकर कुमार कहते हैं- शिक्षा क्षेत्र में असंतोष काफी है। बड़ा मुद्दा बनने की क्षमता भी है। लेकिन यह कब होगा, कैसे होगा यह बता पाना मुमकिन नहीं है।
असल में शंकर कुमार जैसे शिक्षकों की यही निराशा सुशासन की सफलता पर सवालिया निशान भी है और बिहार की प्रतिभाओं के पलायित होने की बेबसी का सच भी।
सामाजिक ढॉंचा: लालू राज के 15 साल और नीतीश कुमार के डेढ़ दशक के बीच क्या फर्क है? समाजशास्त्री नवल किशोर चौधरी के अनुसार एक के एजेंडे में विकास नहीं था तो संभावनाएँ खत्म हो गई। दूसरे के एजेंडे में विकास है, लेकिन विजन स्पष्ट नहीं होने के कारण अवसर पैदा नहीं हुए।
वे कहते हैं, “1990 में जब लालू सत्ता में आए तो उन्होंने खुलकर कहना शुरू किया कि विकास उनका एजेंडा नहीं है। उनका एजेंडा सोशल जस्टिस है। इससे विकास की दौड़ में राज्य करीब-करीब ठहर सा गया। नीतीश कुमार के आने के बाद से विकास की बातें तो खूब हुई है, लेकिन रोजगार के मौके पैदा नहीं हुए। सरकार के एजेंडे में विकास होना ही महत्वपूर्ण नहीं है। उसका मॉडल रोजगारपरक होने पर ही पलायन रुकता है।”
उन्होंने बताया कि लालू के आने के साथ एक खास वर्ग की उपेक्षा हुई। उनकी लगातार अनदेखी की गई। जातीय संघर्ष तेज हुआ। कृषि की स्थिति अच्छी नहीं रही। इससे जुड़े उद्योग एक-एक कर बंद होते गए, क्यूंकि यह सरकार की प्राथमिकता नहीं थी। इसने सभी वर्गों को राज्य से बाहर पलायन के लिए मजबूर किया। सत्ता में बदलाव से जो वर्ग उपेक्षित हुआ उस पर केवल सामाजिक असर ही नहीं हुआ। साइकोलॉजिकल और कल्चरल इफेक्ट भी दिखा। इसकी वजह से उपेक्षित वर्ग के गरीब गॉंव में काम करने को तैयार नहीं होते, लेकिन महानगरों में मजदूरी करते भी उन्हें संकोच नहीं होता। इसने भी पलायन को रफ्तार दी।
उन्होंने बताया सत्ता से लालू की विदाई के बाद से राज्य में उद्योग लगाने के नाम पर चर्चा खूब हुई है। पर जमीन पर कोई ठोस पहल नहीं की गई। उद्योगपतियों का कॉन्फ्रेंस कर निवेश नहीं लाया जा सकता। इसका सरकार की प्राथमिकता में होना जरूरी है। यह इन 15 सालों में भी नहीं दिखा है। विकास के नाम पर सड़कें, फ्लाईओवर, बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें जरूर बनी हैं। लेकिन ऐसे ज्यादातर काम बाहर के लोगों को दिए गए हैं। स्थानीय स्तर पर कंस्ट्रक्शन वर्कर के तौर पर कुछ लोगों को काम मिला है। इतनी बड़ी आबादी को राज्य के बाहर जाने से रोकने के लिए स्मॉल और मीडियम इंडस्ट्रीज का विकास जरूरी है, जो नहीं हो पाया। बकौल चौधरी- नीयत में खोट भले न दिखता हो पर नीतियों में खामियों की भरमार है।
शायद, पलायन की रफ़्तार पर ब्रेक लगाने में नीतीश कुमार की नाकामी की सबसे बड़ी वजह भी यही है।
पलायन मजबूरी तो लॉकडाउन में वापसी की मारामारी क्यों?
ऊपर के तथ्यों से आप समझ सकते हैं कि पूर्वांचल, खासकर बिहार से इतने बड़े पैमाने पर पलायन मजबूरी ही है। बावजूद इसके लॉकडाउन में घर लौटने की ऐसी मारामारी मची कि उस सोशल डिस्टेंसिंग का भी किसी को ख्याल नहीं रहा जो कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए सबसे कारगर उपाय माना जाता है। आखिर किस भरोसे सैकड़ों किलोमीटर दूर घर जाने के लिए लोग सड़कों पर आ गए, जबकि वे भलीभॉंति जानते थे कि ट्रेन, बसें सब बंद हैं।
असल में लॉकडाउन की घोषणा होते ही दिल्ली सहित तमाम बड़े शहरों में रह रहे प्रवासी मजदूरों के सामने पहला सवाल यह खड़ा हुआ कि काम नहीं मिला तो क्या करेंगे? क्या खाएँगे? कहॉं रहेंगे? यह भी नहीं कहा जा सकता था कि 21 दिन के बाद लॉकडाउन खत्म हो ही जाएगा और सब कुछ पहले की तरह सामान्य हो जाएगा। इसी उधेड़बुन ने प्रवासी मजदूरों की भीड़ दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर खड़ी कर दी। कुछ सैकड़ों किमी पैदल चलकर घर पहुॅंचे। कुछ रास्ते में रोक दिए गए। कुछ को आखिर में यूपी सरकार ने अपनी बसों से घर तक पहुॅंचाया।
धीरे-धीरे जब चीजें स्पष्ट होने लगी तो साफ हुआ कि इसके पीछे दो तरह की चीज़ें काम कर रही थी। एक, लॉकडाउन से पैदा हुई चुनौतियॉं। दूसरा, उन चुनौतियों की आड़ में अफवाहों को दी गई हवा। इसकी पुष्टि रामबाबू साह जैसों की आपबीती से भी होती है।
मधुबनी जिले के बेनीपट्टी प्रखंड के रहने वाले रामबाबू साह 2003 में दिल्ली आए। करोलबाग में एक कपड़ों की दुकान में काम करने लगे। कुछ साल बाद खुद का जींस के कपड़े बनाने का काम शुरू किया। धीरे-धीरे रामबाबू के परिवार और रिश्तेदारी में जो युवक थे उनमें ज्यादातर दिल्ली पहुॅंच गए। कोई दुकान में काम करने लगा तो कोई फैक्ट्री में। कुछ गार्ड बन गए, कुछ होटलों में लग गए, तो कुछ रामबाबू के साथ उनके धंधे में। आज रामबाबू अपने गॉंव के स्कूल में परिवार के छह लोगों के साथ कैद हैं।
गॉंवों का जुगाड़ तंत्र: इधर घर लौटने के लिए प्रवासी सड़कों पर उतरे, उधर बिहार में बाहरियों की एंट्री रोकने की व्यवस्था में ग्रामीण लग गए
रामबाबू ने फोन पर हुई बातचीत में बताया कि वे 23 लोग दिल्ली में एक ही जगह रह रहे थे। लॉकडाउन होते ही दुकानें, होटल, फैक्ट्री बंद हो गईं। उनलोगों के पास काम नहीं था तो सभी लोग उन्हीं कमरों में सिमटने को मजबूर हो गए, जिसमें इन सालों में कभी एक साथ नहीं रहे थे। उन्होंने बताया, “एक कमरे में हम पॉंच-छह लोग रहते थे। उसी में खाना भी बनाते थे। सबका ड्यूटी का टाइम अलग-अलग था तो कभी दिक्कत नहीं हुई। लेकिन लॉकडाउन के बाद जब सभी लोग कमरे पर आ गए तो मकान मालिक धमकाने लगा कि इतने लोगों को नहीं रहने देंगे। हमलोग राशन भी घर में जमाकर नहीं रखते थे। रोज खरीद कर लाते थे और बनाकर खाते थे। दुकान बंद होने से खाने-पीने का दिक्कत होने लगा। फिर हमें पता चला कि बाजार 21 दिन बाद नहीं खुलेगा। कम से कम दो-तीन महीना बंद रहेगा।”
मैंने उनसे सवाल किया कि बाजार दो-तीन महीने बंद रहने की बात उन्हें कैसे पता चली। उनका जवाब था, “सब यही कह रहा था। मकान मालिक से लेकर आसपास में जिसको हम जानते थे सब यही बोला।”
पटना के करीब पतलापुर पंचायत में हाई स्कूल में प्रवासी श्रमिकों के लिए बनाया गया क्वारंटाइन सेंटर (साभार: indianexpress.com)
रामबाबू के अनुसार उनका साला ड्राइवर का काम करता था। बंदी होने से दो दिन पहले ही मालिक ने उसे छुट्टी दे दी और कहा कि गॉंव चले जाओ सब बंद होने वाला है। उन्होंने बताया कि 27 तारीख को वे सभी लोग पैदल ही करोलबाग से आनंद विहार के लिए निकले थे। मकान मालिक ने उन्हें बताया कि आनंद विहार से बस बिहार लेकर जा रही है। घर से निकलने के बाद इनलोगों को कोई सवारी नहीं मिली। कनाट प्लेस से उन्हें डीटीसी की एक बस मिली जिसने सबको आनंद विहार छोड़ दिया। यह पूछने पर कि रास्ते में किसी ने नहीं रोका कि लॉकडाउन में इतने लोग एक साथ कहॉं जा रहे हो? उनका जवाब था- नहीं। पुलिस की एक-दो जिप्सी गुजरी, लेकिन हमसे किसी ने कुछ नहीं पूछा।
रामबाबू ने बताया, “आनंद विहार पहुॅंचकर पता चला कि बिहार का कोई बस नहीं है। हम लोग आठ-दस घंटा वहीं रहे। फिर सोचे कि जब एक बार निकल गए हैं तो कैसे भी गॉंव पहुँच जाना है।” वे बताते हैं कि हाइवे होते हुए काफी दूर तक पैदल चलने के बाद उनलोगों को सवारी मिली थी। जैसे-तैसे कर 29 मार्च की शाम वे लोग मधुबनी पहुॅंचे। उन्होंने बताया, “मधुबनी से मेरे गॉंव का टेंपू वाला तीन-साढ़े तीन सौ रुपया लेता है। लेकिन, इस बार हर आदमी से हजार रुपया लिया। गॉंव पहुँचने पर भी हमको अपने घर नहीं जाने दिया गया। प्राइमरी स्कूल में रखा है। जितना भी आदमी बाहर से आया है सब स्कूल में ही है। हमको 14 दिन यहीं रहने के लिए कहा है। खाना मिलता है।”
मैंने पूछा कि क्या उनकी किसी तरह की जाँच हुई है? उनका जवाब था- नहीं। जिस दिन आए थे उस दिन खाली पूछा था कि सर्दी-बुखार तो नहीं है। यह पूछे जाने पर कि उनलोगों की निगरानी के लिए गॉंव के स्कूल में प्रशासन की तरफ से कोई व्यवस्था की गई है। जवाब मिला- दिनभर में एक बार चौकीदार आता है। लेकिन, गाम का लोग सब खुद से ही बहुत टाइट किए हुआ है।24 घंटा नजर रखता है कि कोई बाहर नहीं आए। यह पूछे जाने पर कि दिल्ली सरकार की तरफ से प्रवासी श्रमिकों के खाने, रहने की व्यवस्था किए जाने की उन्हें जानकारी थी, तो रामबाबू ने कहा, “हमें नहीं पता था। लेकिन हमको खाने और पैसा-कौड़ी का दिक्कत नहीं था। मकान मालिक बहुत परेशान कर दिया था। दो-तीन महीना बाजार बंद रहता तो दिक्कत हो जाता। इसलिए बस का बात पता चलते ही सोचें कि गॉंव चले जाते हैं। काम-धंधा ज्यादा दिन भी बंद रहा तो उतना दिक्कत नहीं होगा।”
जिंदगी की जद्दोजहद: बसों से इस तरह गंतव्य तक पहुॅंचे प्रवासी श्रमिक
लॉकडाउन बढ़ने और यूपी बॉर्डर से बिहार के लिए बस चलने की जिस अफवाह का जिक्र रामबाबू कर रहे हैं उसमें दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार पर मिलीभगत के भी आरोप लग रहे हैं। 28 मार्च को यूपी सरकार ने भी कहा था कि घर पहुॅंचे लोगों ने बताया है कि उनके बिजली-पानी के कनेक्शन काट दिए गए। उन्हें भोजन और दूध नहीं मिल रहा था। मदद के नाम पर डीटीसी की बस में बिठाकर लोगों को यूपी बॉर्डर पर छोड़ दिया गया। इस बयान के अनुसार दिल्ली में अफवाह फैलाई गई कि यूपी बॉर्डर पर लोगों को गंतव्य तक ले जाने के लिए बसें खड़ी हैं। बॉर्डर पर भारी भीड़ जमा होने और लोगों के पैदल ही कूच करने की खबरों के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लोगों को उनके घर तक पहुॅंचाने के लिए 1000 बसों का प्रबंध करने का निर्देश दिया था।
शुरुआत में योगी के इसी फैसले को बॉर्डर पर जुटी भीड़ के लिए जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की गई थी। लेकिन, तथ्यों से साफ था कि यह फैसला बॉर्डर पर प्रवासियों की भीड़ के बाद किया गया था। बाद में दिल्ली सरकार ने भी दबी जुबान डीटीसी बसें चलाने की बात मानी। लेकिन, दावा किया कि इसकी जानकारी केंद्र सरकार को भी थी। शुरुआत में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने लोगों को गंतव्य तक पहुॅंचाने के फैसले पर यह कहते हुए आपत्ति जताई कि इससे लॉकडाउन का मकसद फेल हो जाएगा। बाद में उन्होंने राज्य की सीमा पर बाहर से आने वाले लोगों को कैंपों में क्वारंटाइन करने की बात कही। आखिर में सरकार ने बसों का प्रबंध कर लोगों को उनके गंतव्य तक पहुॅंचाया। इनमें ज्यादातर लोग अपने गॉंवों के स्कूल, पंचायत भवन, सामुदायिक भवन में रामबाबू और उनके साथ के लोगों की तरह ही रह रहे हैं।
पत्रकार व्यालोक पाठक की मानें तो यह अफवाह भी फैली कि गॉंव में सरकार ग्रामीणों के नाम लिख रही है, जिनको बाद में मुआवजा दिया जाएगा। जबकि सच्चाई यह थी कि गॉंव में भी आइसोलेशन और होम क्वारंटाइन में लोग रखे जा रहे थे और बाहर से आने वालों का नाम लिखा जा रहा था। उनके अनुसार कुछ लोगों ने यह भी बताया कि अभी अगर गॉंव नहीं गए तो तो पट्टीदार लोग जमीन पर कब्जा कर लेंगे। बटाई का काम नहीं मिलेगा।
दरभंगा के सिंहवाड़ा प्रखंड के रहने वाले शाह आलम की दिल्ली में चमड़े की जैकेट की दुकान है। नांगलोई के पास फैक्ट्री भी है। ठंड में उनके पास काफी काम होता है। उन्होंने बताया कि वे तीन भाई दिल्ली में रहते हैं। लेकिन, सितंबर में अपने इलाके से करीब ढाई-तीन सौ लोगों को लेकर दिल्ली आते हैं। इनमें कई उनके रिश्तेदार भी होते हैं। ये लोग हर साल मार्च के अंत में या अप्रैल के पहले हफ्ते तक अपने घर लौट जाते हैं। उन्होंने बताया कि लौटते वक्त वे सभी लोगों का हिसाब करते हैं। गॉंव से दिल्ली आने और फिर यहॉं से गॉंव जाने का खर्चा देते हैं। दिल्ली में रहने के दौरान इनलोगों के खाने और रहने की व्यवस्था करते हैं। ज्यादातर लोग उनकी दुकानों या फैक्ट्री में ही सोते हैं।
वे कहते हैं, “लॉकडाउन के कारण फैक्ट्री, दुकान बंद करना पड़ा। इतने लोगों को हम कहॉं रखते। इनके खाने की व्यवस्था कहॉं से करते। बाजार में सब कह रहा था कि अब दो-तीन महीना बंद ही रहेगा। हमारा काफी पेमेंट भी फॅंसा हुआ है।” उन्होंने बताया, “मेरे यहॉं काम करने वाले लोगों ने 22-23 मार्च से ही निकलना शुरू कर दिया था। अब सब घर पहुॅंच गया है, फोन पर हमारी सबसे बात हुई है। इस बार सबका पूरा पेमेंट भी नहीं कर पाए। कई लोग गॉंव से फोन किए हैं कि जो पैसा दिए थे वो घर पहुॅंचने में खर्च हो गया। अब हम कहॉं से पैसा भेजे हमारा खुद का पैसा बाजार में फॅंसा है और कब तक मिलेगा कुछ पता नहीं चल रहा।”
सुशासन की सुध: प्रवासी श्रमिकों को घर तक पहुॅंचाने के लिए बिहार सरकार की ओर से बसों का प्रबंध किया गया
असल में दिल्ली में रहने वाले प्रवासी मजदूरों की एक सच्चाई यह भी है। एक बड़ा तबका जो होटल, दुकानों में काम करता है, काम की जगह ही सोता भी है। निर्माण उद्योग में लगे लोग जहॉं काम चलता है, वहीं झुग्गी डाल रहने लगते हैं। गार्ड का काम करने वाले कई लोग मिलकर एक छोटा सा कमरा ले लेते हैं और उसी में रहते हैं। काम चलते रहने से कभी उन्हें परेशानी नहीं होती थी, क्योंकि सबके काम का समय अलग-अलग था।
प्राइवेट सिक्योरिटी कंपनी में काम करने वाले रामचरण मिश्रा कहते हैं, “जिस कमरा में दो-तीन आदमी मुश्किल से रह सकता है, सोचिए उस में छह-सात आदमी जमा हो जाए तो क्या होगा। कहॉं लेटेगा और कहॉं खाना बनाएगा। एक-दो दिन का बात हो तो आदमी गुजर भी कर ले। अभी तो पता ही नहीं है कि ये सब कितना दिन चलेगा। जब बाजार खुलेगा तो कितना को काम मिलेगा। अकेले यहॉं मरने से बढ़िया है कि आदमी गॉंव चला जाए। कम से कम अपना आदमी तो पास रहेगा। हालत ठीक होगा तो फिर आ जाएगा कमाने। यहॉं फॅंसा रहेगा तो गॉंव में परिवार को भी चिंता ही लगा रहेगा।”
सीएसडीएस द्वारा 2017-19 के बीच किए गए ‘पॉलिटिक्स एंड सोसायटी बिटवीन इलेक्शंस’ सर्वे बताता है कि दिल्ली में रहने वाले 22 फीसदी प्रवासी मजदूरों की आय दो हजार, 32 फीसदी की दो से पॉंच हजार, 25 फीसदी की 5 से 10 हजार, 13 फीसदी की दस से 20 हजार रुपए है। 20 हजार से ज्यादा कमाने वाले श्रमिक केवल 8 फीसदी हैं। सीएसडीएस ने हालिया दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान एक सर्वे किया था। इसमें शामिल लोगों में से 20 फीसदी ने बताया कि उनकी मासिक आमदनी 10 हजार रुपए से कम है। इनमें भी सबसे ज्यादा लोग बिहार और यूपी के क्रमश: 33% और 27% थे।
जाहिर है कि आर्थिक सुरक्षा के लिए ही लोग अपना घर छोड़ दिल्ली-एनसीआर या देश के दूसरे में महानगरों में पहुॅंचते हैं। जब इस सुरक्षा के हटने का खतरा पैदा हो गया तो उन्होंने घर लौटने में भलाई समझी। लॉकडाउन बढ़ने और यूपी बॉर्डर से घर तक जाने के लिए बस की व्यवस्था किए जाने की अफवाहों ने इसमें घी का काम किया।
…तो क्या पलायन इस बार बन पाएगा चुनावी मुद्दा
तथ्यों से जाहिर है कि मजबूरी में पलायन बिहार के लिए कोई नई बात नहीं है। साल दर साल इसकी बढ़ती रफ्तार से लगता है कि लोगों ने इसे अपनी नियति मान समझौता कर लिया है। सो, इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी इसके निर्णायक मुद्दा बनने के आसार नहीं दिखते।
जैसा कि चौधरी कहते हैं, “राज्य की राजनीति के लिहाज से यह बहुत छोटा फैक्टर है। यहाँ दो महत्चपूर्ण फैक्टर हैं। पहला, राज्य की राजनीति में तीन महत्वपूर्ण ताकतें हैं बीजेपी, जदयू और राजद। इनमें से दो जिस तरफ होते हैं पलड़ा उधर झुक जाता है। तीनों अलग-अलग होते हैं तो बीजेपी को लाभ होता है, जैसा 2014 के लोकसभा चुनावों में हुआ था। लेकिन 2015 में जब जदयू और राजद मिल गई तो बीजेपी को हार मिली। 2019 के आम चुनावों में बीजेपी-जदयू साथ थी तो राजद के नेतृत्व वाले गठबंधन को हार मिली। दूसरा, जातीय और धार्मिक विभाजन। ये इतना प्रभावी है कि मतदान का वक़्त आते-आते सभी मुद्दे गौण हो जाते हैं।”
वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर के मुताबिक विधानसभा चुनाव में पलायन कोई मुद्दा नहीं होगा, क्योंकि चुनाव एनडीए और लालू के बीच होगा। इस स्थिति में मुद्दा बन जाता है किसी तरह लालू को रोकना। लोगों में यह डर होता है कि लालू आ गए तो फिर 90 का जंगलराज आ जाएगा। इसलिए वे नीतीश सरकार की कमजोरियों को इग्नोर कर देते हैं। आप इसे बिहार के लोगों की मजबूरी भी मान सकते हैं।
पैदल ही मंजिल की ओर…
ऐसे में बिहार के प्रवासियों के लिए गोस्वामी तुलसीदास का लिखा एक दोहा ही सत्य जान पड़ता है; एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास। एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास।
यानी, एक ही भरोसा है। एक ही बल है। एक ही आशा और एक ही विश्वास है। एक ही राम रूपी श्यामघन (मेघ) के लिए तुलसीदास चातक बना हुआ है।
बिहार की राजनीति पलायन रोकने के मोर्चे पर फिलहाल ऐसा भरोसा पैदा करती नहीं दिख रही। न बदलाव के नाम पर पुष्पम प्रिया जैसे प्रवासी पक्षी वह आशा और विश्वास पैदा कर पाते हैं कि पलायित वर्ग उनके लिए चातक बनने को तैयार हो जाएँ।
कोरोना महामारी से बचने के लिए केंद्र सरकार द्वारा ऐलान किए गए देशव्यापी लॉकडाउन में गरीब वर्ग को परेशानी का सामना न करना पड़े, इसके लिए यूपी की योगी सरकार दिन रात प्रयासरत है। इसी कड़ी में आज उन्होंने समीक्षा बैठक की और पहले चरण में 11 लाख मजदूरों के अकाउंट में 1-1 हजार रुपए पहुँचाए। इस दौरान उन्होंने 4 लाख से अधिक शहरी वेंडर्स को सीधे आर्थिक मदद भी ट्रांसफर की। अब इसके बाद यह मदद लगभग 20 लाख मजदूरों तक पहुँचाई जाएगी।
सीएम ने कहा, “जितने भी ठेला, खोमचा, रेहड़ी, रिक्शा, ई-रिक्शा, पल्लेदार, या अन्य सेवाएँ देने वाले लोग हैं, इनके लिए एक सर्वे कराकर हमने प्रशासन को आवश्यक धनराशि उपलब्ध करवाई है। स्वाभाविक रूप से इस समय लॉकडाउन के कारण इन सभी का कार्य प्रभावित है। इन सभी को भरण-पोषण का भत्ता दिया जाना चाहिए। ऐसे दैनिक काम करने वाले लोगों को भी हम धनराशि उपलब्ध करवा रहे हैं।”
नगर विकास विभाग द्वारा चिन्हित दैनिक कार्य करने वाले विभिन्न श्रेणी के लाभार्थियों को DBT के माध्यम से प्रति लाभार्थी ₹ 1000 धनराशि का भुगतान… https://t.co/h677HyIfEG
बता दें, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने प्रदेश के गरीब तबके को ये मदद जारी की। ताकि उनकी आजीविका चलती रहे। इसके अलावा 4 लाख 81 हजार शहरी वेंडर्स को भी मदद दी गई।
Government had decided to extend help to those people whose livelihood has been affected due to #COVID19. In this context, in the first phase, more than 11 lakh construction workers in the state have been provided Rs 1,000 each in their accounts: Uttar Pradesh CM Yogi Adityanath pic.twitter.com/XXuqlUoGif
योगी आदित्यनाथ ने यहाँ जानकारी देते हुए कहा कि मनरेगा के तहत मजदूरी करने वाले करीब 88 लाख ऐसे मजदूर हैं, जिनका भत्ता बढ़ा दिया गया है। जबकि 27 लाख से अधिक मजदूरों का जो बकाया बाकी था, उसे जारी कर दिया गया है। योगी के मुताबिक, प्रदेश में 87 लाख से अधिक परिवारों को समय से पहले पेंशन जारी कर दी गई है, ताकि किसी को कोई परेशानी ना हो।
इस वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने जानकारी दी कि केंद्र सरकार की ओर से प्रदेश को 2 करोड़ से अधिक किसानों को मदद पहुँचाई जा रही है। साथ ही साथ केंद्र की ओर से रसोई गैस, महिलाओं को आर्थिक मदद और राशन की व्यवस्था भी की गई है, जिसे राज्य सरकार जमीनी स्तर पर उतार रही है। सीएम योगी ने बताया कि उत्तर प्रदेश में जिन भी महिलाओं के जनधन अकाउंट हैं उनमें सरकार अगले तीन महीने तक हर महीने में 500 रुपए भेजेगी। खाद्यान भी प्रति यूनिट 5 किलो फ्री दिया जा रहा है। गरीबों के लिए संकट के समय में केंद्र और प्रदेश सरकार मजबूती से खड़ी है।
उल्लेखनीय है कि प्रदेश में कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए योगी सरकार लगातार हालातों पर समीक्षा बैठक कर रही हैं। ताजा जानकारी के अनुसार यूपी में कोरोना केसों की संख्या 400 पार हो गई है। इसलिए योगी सरकार ने राज्य में कोरोना संकट को देखते हुए प्रदेश के 15 जिलों के कोरोना हॉटस्पॉट को सील करने का काम किया है। इनमें गौतमबुद्ध नगर, मेरठ, लखनऊ, गाजियाबाद, कानपुर जैसे जिले शामिल हैं।