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VIDEO: दिल्ली मेट्रो के अंदर JNU और जामिया के छात्रों ने लगाए PM मोदी और अमित शाह के ख़िलाफ़ नारे

नागरिकता संशोधन कानून बनने के बाद एक बहुत बड़ा फायदा हुआ। वे लोग जो अब तक धर्मनिरपेक्षता का चोला ओढ़कर देश की अखंडता और एकता पर बात करते थे, उनकी हकीकत सबके सामने आ गई। सीएए के ख़िलाफ़ हो रहे इन प्रदर्शनों में सरकार के प्रति और हिंदुत्व के प्रति एक अलग ही घृणा देखी गई। हालाँकि, अभी तक ये सब सिर्फ़ प्रदर्शनस्थल पर भीड़ की आड़ में किया जा रहा था। लेकिन, अब ये मौखिक उन्माद दिल्ली मेट्रो के अंदर तक पहुँच चुका है। जी हाँ, सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रही है। जहाँ जेएनयू-जामिया के 5-7 छात्र मिलकर इस्लामोफोबिया का नाम लेकर नारे लगा रहे हैं।

वायरल हुई वीडियो में देखा जा सकता है कि कुछ छात्र और छात्राएँ दिल्ली मेट्रो में अमित शाह तेरे नाम इस्लामोफोबिया, सीएए वापस लो। एनआरसी वापस लो। नरेंद्र मोदी तेरे नाम इस्लामोफोबिया के नारे लगाते हुए आ रहे हैं। इसके साथ ही वे भाजपा,आरएसएस और दिल्ली पुलिस के खिलाफ भी नारेबाजी की। वीडियो को यूजर ने ट्विटर पर शेयर किया है।

गौरतलब है कि इस वीडियो को We the muslim of india के अकॉउंट से शेयर किया गया है। साथ ही इसे मोहम्मद इरफान नाम एक युवक ने भी शेयर किया है। जिसने अपने ट्वीट में लिखा है कि उसने शाहीन अब्दुल्ला एवं जामिया और जेएनयू के छात्रों के साथ मिलकर दिल्ली मेट्रो के अंदर नारे लगाए।

बता दें, इस वीडियो के सोशल मीडिया पर आने के बाद यूजर्स इसपर अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। कुछ का कहना है कि ये समय अब जागने का है और ऐसे जिहादियों को साफ करने का हैं। कुछ का कहना है कि इतना सब देखने के बावजूद भी देश की 80 प्रतिशत जनता देख रही है कि भारत के 20 प्रतिशत लोग किस तरह भारत को जला रहे हैं।

मध्य प्रदेश के दलित युवक की मौत: इरफान, कल्लू, छुट्टू और पठान ने केरोसिन उड़ेल लगा दी थी आग

मध्य प्रदेश के दलित युवक धन प्रसाद अहिरवार की गुरुवार (23 जनवरी 2020) को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में मौत हो गई। केरोसिन उड़ेल कर उसे आग के हवाले कर दिया गया था। 24 वर्षीय अहिरवार को जलाने के आरोप में पुलिस ने अज्जू पठान, कल्लू, इरफान और छुट्टू को गिरफ्तार किया था। एससी/एसटी के तहत मामला दर्ज किया गया है। अहिरवार को 21 जनवरी को एयर एंबुलेंस के जरिए दिल्ली लाया गया था।

मृतक सागर जिले के अयोध्या बस्ती का रहने वाला था। आरोपित भी इसी मुहल्ले के हैं। यह मामला सामने आने के बाद मध्य प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार और पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठे थे। बीजेपी ने राज्य सरकार पर दोषियों को बचाने की कोशिश करने का आरोप लगाया था।

अहिरवार की मौत की जानकारी मुख्यमंत्री कमलनाथ ने ट्वीट कर दी है। उन्होंने पीड़ित परिवार के प्रति संवेदनाएँ जताई है। साथ ही कहा है कि पीड़ित परिवार की हरसंभव मदद के निर्देश दिए गए हैं।

आरोपितों के समुदाय विशेष से जुड़े होने के कारण इस मामले को मेनस्ट्रीम मीडिया ने भी छिपाने की भरपूर कोशिश की। लेकिन, सोशल मीडिया में पीड़ित का वीडियो वायरल होने के बाद कुछ मीडिया संस्थान इस खबर को प्रकाशित करने के लिए मजबूर हो गए थे। अनुसूचित जाति-जनजाति, अधिकारी एवं कर्मचारी संघ (अजाक्स) के अध्यक्ष हीरालाल चौधरी ने कहा था कि पीड़ित युवक को आरोपित काफी दिनों से परेशान कर रहे थे। अगर समय रहते पुलिस ने कार्रवाई की होती तो यह घटना नहीं होती।

गौरतलब है कि आरोपितों ने मामूली विवाद के बाद अहिरवार को आग लगा दी थी। इस घटना से दो दिन पहले भी आरोपितों का धन प्रसाद से विवाद हुआ था। मृतक के भाई धर्मेंद्र अहिरवार ने बताया था कि आरोपितों से बच्चों को लेकर विवाद हुआ था। इसके बाद आरोपितों ने राजीनामा करने का भी दबाव बनाया। 14 जनवरी की रात आरोपितों ने पीड़ित के परिजनों से मारपीट करते हुए धन प्रसाद को घेर लिया और आग लगा दी। बताया जाता है कि आरोपित पीड़ित परिवार को कई दिनों से परेशान कर रहे थे।

मध्य प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता गोपाल भार्गव ने शासन और प्रशासन पर लापरवाही बरतने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा है, “आखिरकार मध्यप्रदेश में शासन-प्रशासन की लापरवाही ने सागर के दलित युवक धन प्रसाद अहिरवार की जान ले ली। समय रहते कमलनाथ सरकार अगर दलित युवक की सुध ले लेती तो आज उस युवक की जान बचाई जा सकती थी।”

मध्य प्रदेश: केरोसिन उड़ेल दलित युवक को लगाई आग, पठान, कल्लू और इरफान गिरफ्तार

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भारत माता से आज़ादी, कश्मीर से आज़ादी के नारे CAA प्रोटेस्ट में क्यों: कॉन्ग्रेस के बड़े नेता ने दागा सवाल

नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) का मामला सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक जा पहुँचा है। इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में 140 से अधिक याचिकाएँ दायर की गई हैं। इन याचिकाओं पर बुधवार (22 जनवरी) से सुनवाई शुरू हो चुकी है। इस बीच, कॉन्ग्रेस नेता और वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी का एक बड़ा बयान आया है। उनका कहना है कि देश-विरोधी नारे नहीं लगने चाहिए। 

अपनी बात उन्होंने गुरुवार (23 जनवरी) को ट्वीट करते हुए कही। उन्होंने लिखा, “भारत माता से आज़ादी, कश्मीर से आज़ादी एक तरह के अलगाववादी नारे हैं, जिनकी CAA के ख़िलाफ़ प्रदर्शन में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। इस तरह के नारे देश पर सवाल खड़े करते हैं और CAA के ख़िलाफ़ चल रहे मज़बूत आंदोलन को कमज़ोर करने का काम करते।”

इससे पहले, सिंघवी ने मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष दलील देते हुए उन्होंने कहा था कि यूपी में NPR की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और 19 ज़िलों के लोगों को डाउटफुल सिटीजन्स (संदिग्ध नागरिक) के तौर पर चिन्हित किया गया है। उन्होंने दलील दी कि ऐसे में अगर सुप्रीम कोर्ट नागरिकता संशोधन क़ानून की प्रक्रिया को नहीं टालेगी तो क्या इससे लोगों के मन में असुरक्षा की भावनी नहीं उत्पन्न होगी? सिंघवी का कहना था कि अगर यह प्रक्रिया पिछले 70 साल से शुरू नहीं हुई तो क्या इसे कुछ महीनों के लिए रोका नहीं जा सकता। 

ग़ौरतलब है कि नागरिकता संशोधन क़ानून संसद में पिछले साल दिसंबर में पास हुआ था। इस क़ानून में पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से सताए जाने के कारण भारत आए धार्मिक अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का प्रावधान है, जो लोग 31 दिसंबर 2014 तक भारत आए हैं। लेकिन, इस क़ानून के पास होने के बाद से ही इसके ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शनों की आड़ में देशभर में हिंसात्मक गतिविधियों को अंजाम दिया जा रहा है। कॉन्ग्रेस और विपक्ष इस क़ानून के लगातार विरोध में बने हुए हैं।

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वाराणसी में दूसरा ‘शाहीन बाग़’ बनाने की कोशिश: पुलिस पर पत्थरबाजी, UP में 1200 के ख़िलाफ़ केस दर्ज

वाराणसी में भी शाहीन बाग़ की तर्ज पर अराजकता फैलाने की साज़िश थी, जिसे पुलिस ने समय रहते नाकाम कर दिया। फिर भी कई प्रदर्शनकारी अड़े हुए हैं और उन्होंने महिलाओं व बच्चों को आगे कर के उपद्रव शुरू कर दिया है। काशी के बेनिया बाग़ में सीएए और एनआरसी के विरोध के नाम पर प्रदर्शनकारियों ने धरना जमा दिया और स्थानीय लोगों के लिए परेशानियाँ पैदा की। गुरुवार (जनवरी 23, 2020) को जब उपद्रवियों ने वहाँ डेरा जमाया तो पुलिस ने कुछ अराजक तत्वों को गिरफ़्तार कर लिया। इसके बाद बड़ी संख्या में भड़के दंगाइयों ने पत्थरबाजी शुरू कर दी।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पहले ही कानपुर में आयोजित एक रैली में कह चुके हैं कि कई लोग अब महिलाओं व बच्चों को सड़क पर प्रदर्शन के लिए छोड़ कर ख़ुद घरों में रजाई में घुस कर सो रहे हैं। उन्होंने यही बात आगरा में आयोजित रैली में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा की उपस्थिति में दोहराई। सीएम योगी ने कहा कि अब दंगाइयों के भीतर संपत्ति जब्त होने का डर बैठ गया है, जो कि अच्छी बात है। साथ ही उन्होंने कहा कि अलग-अलग तरीकों से उपद्रव कर रहे दंगाइयों से निपटने के लिए सरकार भी क़ानून के तहत अलग-अलग रास्ते तलाशेगी।

बेनिया बाग़ में उपद्रवियों ने गिरफ़्तार किए गए अराजक तत्वों को छुड़ाने के लिए पुलिस की नाक में दम कर दिया। पुलिस का प्रयास था कि स्थानीय लोगों को इस झड़प के कारण दिक्कत न पहुँचे। अंततः दर्जनों उपद्रवियों को पुलिस से छुड़ाने में अराजक तत्व कामयाब हुए और पुलिस को वहाँ से खाली हाथ लौटना पड़ा। पुलिस ने फ़िलहाल एक दर्जन उपद्रवियों को शिकंजे में लेकर थाने में रखा हुआ है। एसएसपी ने कहा है कि उपद्रवियों के पीछे अगर किन्हीं राजनीतिक दलों का हाथ है तो उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी।

पुलिस के साथ बदतमीजी कर रहे हैं उपद्रवी

पूरे उत्तर प्रदेश में लगभग 1200 उपद्रवियों के ख़िलाफ़ केस दर्ज किया गया है। अलीगढ़, प्रयागराज और इटावा में कई दंगाइयों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है। रायबरेली के टाउनहॉल में भी कई महिलाएँ बच्चों के साथ विरोध प्रदर्शन करने पहुँची हुई हैं। वाराणसी पुलिस ने स्पष्ट कह दिया है कि शांतिपूर्वक प्रदर्शन करने वालों को कोई दिक्कत नहीं पहुँचाई जा रही है, उलटा उनके लिए अलग से जगह उपलब्ध कराई गई है

केरल में डॉक्टर ने किया CAA का समर्थन, अस्पताल ने नौकरी से निकाला: थरूर ने कहा- मैं क्या करूँ, कोर्ट जाओ

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का समर्थन करना किसी को कितना महँगा पड़ सकता है, इसका उदाहरण कल एक बार फिर सोशल मीडिया के जरिए सामने आया है। सोशल मीडिया पर CAA (The Citizenship Amendment Act, 2019) का समर्थन करने वाले लगातार उन्हें होने वाली असुविधाओं के बारे में बात कर रहे हैं। जैसे कि यदि आप केरल में रहकर CAA का विरोध नहीं करते हैं तो आपको डॉक्टर या अस्पताल इलाज नहीं देगा। ख़ास बात यह है कि ऐसे मामले सामने आने पर कोई भी नेता ऐसे में आपकी मदद के लिए आगे आने को तैयार नहीं दिखाई दे रहा है।

हाल ही में केरल के ही एक डॉक्टर को सिर्फ इस वजह से नौकरी से निकाल दिया गया क्योंकि वह CAA के समर्थन में सरकार और कानून के साथ खड़ा था। ज्ञात हो कि इससे पहले भी केरल में ही एक डॉक्टर इस्लामिक जिहादियों की नजरों में सिर्फ CAA का समर्थन करने की वजह से आ चुके हैं। यह इसी तरह का दूसरा प्रकरण सामने आया है।

ट्विटर पर @vedvyazz नाम से ट्विटर अकाउंट चलाने वाले एक डॉक्टर ने अपनी कहानी लिखी है कि किस तरह से उनकी पूरी पहचान और उनके कार्यस्थल से लेकर उसके घर तक की गोपनीय जानकारी को कुछ CAA विरोधियों द्वारा सार्वजनिक कर दिया गया और आखिर में उन्हें नौकरी से निकाले जाने के बाद डर के कारण अपने ही पैतृक शहर से भागने को मजबूर कर दिया गया।

VedVyazz ने कई ट्वीट्स एक साथ कर के अपनी पूरी कहानी को लिखा है। पहले ट्वीट में उन्होंने लिखा, “अप्रैल में मैं पलक्कड़ केरल में एक नए अस्पताल में नौकरी के लिए आया था। मेरे पुरखों ने पलक्कड़ में ही जीवन बिताया है। और मेरे पिता इस बात से खुश थे कि जिस जगह को छोड़कर हमारे पूर्वज आए थे, मैं वहाँ वापस जा रहा हूँ।”

VedVyazz के सभी ट्वीट्स को आप यहाँ पढ़ सकते हैं, जिनका कि इस रिपोर्ट में हिंदी में अनुवाद किया गया है –

“स्वास्थ्य सम्बन्धी सुविधाओं के लिए पलक्कड़ (केरल) में लोगों के पास पहले बस दो ही विकल्प हुआ करते थे, या तो वो कोयम्बटूर जाएँ या फिर त्रिसूर जाएँ। इस नए अस्पताल को इसीलिए खोला गया था ताकि स्थानीय लोगों को यह सुविधा मिल सके।”

“….इस अस्पताल में मेरी नौकरी ICU में लगी थी। व्यक्तिगत तौर पर मैं वैचारिक रूप से बहुत ज्यादा मुखर हूँ। इसलिए जब CAA विरोधी माहौल शुरू हुआ तो मैं भी ट्विटर पर CAA के समर्थन में अपनी बात लिखता रहा। जैसा कि आतंकवाद से पीड़ित देश में और जहाँ सीमाओं से अवैध घुसपैठिए घुस जाते हों, मैंने भी ऐसे घुसपैठियों को निकाल दिए जाने की इस पहल का समर्थन किया।”

“इस दौरान @yehlog नाम के एक ट्विटर हैंडल ने मेरी सारी जानकारी, मेरा वास्तविक नाम, मैं कहाँ काम करता हूँ आदि सार्वजानिक कर दीं और मुझे रातों-रात एक ऐसा आदमी घोषित कर दिया गया जो कि मुस्लिमों के खून का प्यासा हो।”

“यह हैरान करने वाला था क्योंकि मैं पहले भी अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए भी लिख चुका हूँ। मेरे प्रबंधन को ऐसे ई-मेल भेजे गए कि आपके संस्थान में एक नरसंहार करने वाला कट्टर डॉक्टर काम करता है, जो कि मुस्लिमों के स्वास्थ्य से समझौता कर सकता है।”

“अब अस्पताल के प्रबंधन को लगता है कि मैंने अपने ट्वीट के जरिए (जहाँ कि मैंने किसी धर्म का जिक्र ना कर के सिर्फ घुसपैठियों को निकालने की बात कही है) उनकी छवि को नुकसान पहुँचाया है। और मुझे चौबीस घंटों के अंदर नौकरी छोड़ने के लिए कह दिया गया।”

“आप अपने घर को सिर्फ तीन सूटकेस में फिट नहीं कर सकते। इसलिए सिर्फ तीन घंटों के अंदर मुझे अपने पूर्वजों का शहर इस तरह से छोड़कर भागना पड़ा जैसे कोई चोर उस अपराध के लिए भागता है, जो कि उसने किया ही ना हो।”

VedVyazz ने लिखा है कि उन्हें ICU में कुछ गंभीर रूप से बीमार लोगों के उपचार को छोड़कर फ़ौरन जाना पड़ा और अपनी जानकारी सर्वजनिक हो जाने के बाद उन्होंने अपने ट्विटर अकाउंट को भी डिएक्टिवेट कर दिया। उन्होंने लिखा है कि ऐसा उन्होंने कायरतापूर्वक नहीं बल्कि अपनी गोपनीयता सार्वजनिक कर दिए जाने के डर से किया।

“मुझे नौकरी से निकाल दिए जाने की खबर उन लोगों तक पहुँच गई है, जो कि ऐसा चाहते थे और वो इस बात को लेकर सोशल मीडिया पर जश्न मना रहे हैं। हालाँकि जिसने वास्तव में कुछ खोया है, वो ऐसा संस्थान और ऐसी जगह है, जो पहले से ही कम स्टाफ की समस्या से गुजर रहा है और फिर उसे एक कर्मठ डॉक्टर को नौकरी छोड़ने के लिए कह दिया गया।”

इसके आगे VedVyazz ने अपनी निराशा व्यक्त करते हुए लिखा कि सबसे हास्यास्पद बात तो यह है कि एक आदमी को अपने पूर्वजों की जगह को चौबीस घंटों के भीतर सिर्फ इस वजह से छोड़ना पड़ रहा है क्योंकि वह भारत में अवैध घुसपैठियों के खिलाफ बनाए गए कानून पर सरकार का समर्थन कर रहा था।

इस पूरी घटना पर अपनी निराशा व्यक्त करते हुए VedVyazz ने लिखा है कि वह एक चेतावनी देना चाहते हैं कि वह नरसंहार के दोषी हैं या नहीं लेकिन वह एक नौसिखिया होने के दोषी जरूर हैं। उन्होंने लिखा है- “नौसिखिया, इसलिए क्योंकि मैं यह यकीन करता था कि अपने विचारों को लेकर मुखर होने में कोई हानि नहीं है।”

VedVyazz ने लिखा है कि यहाँ ऐसे संगठन हैं, जो ऐसे डॉक्टर्स को तलाश रहे हैं जो सरकार के समर्थन में हैं और राजनीतिक मुद्दों पर लिखते हैं। मैं पहला शिकार नहीं हूँ और मैं अंतिम नहीं हो सकता हूँ! कुछ लोग कड़ी मेहनत करने वाले ऐसे पेशेवरों की जानकारी उजागर करने के लिए व्याकुल हैं, जो अपने जीवन को संकट में डालते हैं। समय के साथ हमने उनकी वास्तविक पहचान और इरादे को उजागर करना शुरू कर दिया! कुछ कहानियों को बताना पड़ता है, कुछ चुप्पियों को तोड़ना पड़ता है। हमारी लड़ाई अभी शुरू हुई है! जय हिन्द!”

इसके बाद जब कुछ लोगों ने ट्विटर पर VedVyazz के समर्थन में केरल के तिरुअनंतपुरम से कॉन्ग्रेस नेता और सांसद शशि थरूर से मदद माँगनी चाही, तो शशि थरूर ने यह कहकर किनारा कर लिया कि यह उस संस्थान का व्यक्तिगत निर्णय है।

ट्वीट के जवाब में शशि थरूर ने लिखा- “मुझे एक निजी अस्पताल द्वारा एक कर्मचारी के सम्बन्ध में लिए गए निर्णय पर हस्तक्षेप करने का कोई आधार नजर नहीं आ रहा है। उसे अनैतिक रूप से निकाले जाने के खिलाफ कोर्ट जाना चाहिए।”

राज ठाकरे की पार्टी मनसे का झंडा हुआ भगवा, जय शिवाजी-जय भवानी का लगा नारा

बाला साहब की विरासत को संभालने की जद्दोजहद में जुटे राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे नए-नए तरीकों को अपना रहे हैं। एक तरफ शिवसेना मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर उसे बाला साहब के वादे को पूरा करने की बात कहती है तो दूसरी ओर शिवसेना के कॉन्ग्रेस से हाथ मिलाने के बाद मनसे प्रमुख राज ठाकरे अपनी छवि को बदलने की जुगत में लग गए हैं।

मुंबई में गुरुवार को आयोजित पार्टी के पहले अधिवेशन में राज ठाकरे ने अपनी पार्टी का नया भगवा झंडा लॉन्च कर दिया। इस दौरान समर्थकों ने जय शिवाजी-जय भवानी के नारे लगाए। इतना ही नहीं राज ठाकरे ने अपने बेटे अमित ठाकरे को भी सक्रीय राजनीति में उतार दिया। इससे साफ हो गया कि राज ठाकरे अपनी और अपनी पार्टी की विचारधारा को नए सिरे से लोगों के बीच ले जाकर अब विरोधी पार्टियों से खुलकर मुकाबला करने के लिए तैयार हैं।

झंडे को लॉन्च करने से पहले राज ठाकरे ने अपने चाचा बाल ठाकरे को याद किया। दरअसल इस आयोजन को बाला साहब की 94वीं जयंती के अवसर पर आयोजित किया था। वहीं इस बीच शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे पार्टी के सत्ता में 100 दिन पूरे होने पर अयोध्या दौरे पर हैं।

एमएनएस की ओर से महाअधिवेशन के लिए लगाए पोस्टर पूरी तरह से भगवा रंग में है, जिस पर नारा दिया गया ‘महाराष्ट्र धर्म के बारे में सोचो, हिंदू स्वराज्य का निर्धारण करो। साथ ही इसमें महाराज छत्रपति शिवाजी की एक तस्वीर को भी छापा गया है। इसमें संस्कृत भाषा में एक श्लोक भी लिखा गया है। ‘प्रतिपच्चन्द्रलेखेव वर्धिष्णुर्विश्ववन्दिता, शाहसूनो: शिवस्यैषा मुद्रा भद्राय राजते।’ दरअसल शिवाजी ने सांस्कृतिक प्रवृत्ति की शुरूआत की थी, जिसका अनुपालन उनके वंशजों और अधिकारियों ने भी किया था।

मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने लॉन्च किया नया भगवा रंग का झंडा

इस अधिवेशन में राज ठाकरे द्वारा अपने बेटे अमित ठाकरे को सक्रीय रूप से राजनीति में उतारने के पीछे आदित्य ठाकरे का सक्रीय राजनीति में आना ही एक वजह माना जा रहा है। वैसे भी पिछले काफ़ी समय से अमित पार्टी की बैठकों में पदाधिकारियों के साथ भागीदारी निभा रहे थे। माना जा रहा है कि शिवसेना की ओर से आदित्य ठाकरे को जुनावी मैदान में लाकर चुनाव लड़ाया, जिसके बाद वह विधायक बने और फिर उन्हें पार्टी ने अपनी कैबिनेट में भी शामिल किया। इस लिए माना जा रहा है कि अमित ठाकरे युवा वोटरों को अपनी ओर लुभा सकते हैं। वहीं पार्टी नेता संदीप देशपांडे ने कहा कि इस फैसले से महाराष्ट्र में नई ऊर्जा आएगी और महाराष्ट्र की राजनीति में नए मोड़ और नए विकल्प भी खुलेंगे।

बता दें क हाल ही में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में मनसे ने 101 विधानसभा सीटों पर अपने प्रत्यासी उतारे थे, लेकिन पार्टी अपनी 1 सीट ही निकाल पाई थी। वहीं शिवसेना की पुरानी दोस्त बीजेपी अब उसकी सियासी दुश्मन बन चुकी है, तो कभी वैचारिक विरोधी रही कॉन्ग्रेस-एनसीपी ही आज उसकी सबसे बड़ी सारथी हैं। ऐसे में शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे की राजनीतिक विरासत के असल वारिस बनने की जंग तेज हो गई है। आशंका ये भी जताई जा रही है कि राज ठाकरे अपनी हिंदुत्ववादी छवि के साथ भविष्य में बीजेपी के क़रीब भी आ सकते हैं। बता दें कि पिछले दिनों राज ठाकरे ने पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस से मुलाक़ात की थी।

RSS पर प्रोपेगेंडा पढ़ेंगे कॉन्ग्रेसी, सोनिया और प्रियंका गाँधी की मौजूदगी में बँटी किताब

सियासी मैदान में भाजपा का मुकाबला करने में नाकाम रही कॉन्ग्रेस अब अपने कार्यकर्ताओं को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर प्रोपेगेंडा पढ़ाएगी। इसके लिए बकायदा कार्यकर्ताओं को पोथी थमाई गई है। इसे ‘कैप्सूल’ नाम दिया गया है, जो ‘दुश्मन को समझो, और उसका हथियार को जानो’ वाली नीति के तहत आता है। रायरबरेली में कॉन्ग्रेस के जिला और शहर अध्यक्षों के प्रशिक्षण कार्यक्रम में यह किताब बॉंटी गई। कार्यक्रम में पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गॉंधी और महासचिव प्रियंका गॉंधी भी मौजूद थीं।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक ये किताब देखकर ​कॉन्ग्रेस नेता भी भौंचक रह गए। कॉन्ग्रेस का कहना है कि इससे उनके नेता प्रतिद्वंद्वियों पर वार करने में सिद्धहस्त हो जाएँगे। कई वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि इसे अलग तरह से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे इतिहास की दोबारा पढ़ाई के रूप में देखा जाना चाहिए। नेताओं ने कहा कि चीन की एक कहावत से प्रेरित होकर ये क़दम उठाया गया है। उस कहावत के अनुसार, अगर आप ख़ुद को और अपने दुश्मन को अच्छी तरह समझते हैं तो आप 100 युद्ध भी जीत सकते हैं। इस ‘कैप्सूल’ में सावरकर, गोलवरकर, एबीवीपी, दुर्गा वाहिनी और भारतीय विचार केंद्र जैसी हस्तियों व संगठनों के बारे में जानकारी है।

बुधवार (जनवरी 22, 2020) को हुए सेशन में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी और पार्टी अध्यक्ष प्रियंका गाँधी भी मौजूद थीं। दोनों नेताओं ने पार्टी कैडर को ‘मिशन 2022’ के लिए तैयारी करने को कहा। उसी वर्ष यूपी में विधानसभा चुनाव भी होने हैं। प्रियंका गाँधी ने सम्मलेन में कहा, “कॉन्ग्रेस के समर्थन में आवाज़ उठने लगी है। हमें इस आवाज़ को और मजबूत बनाना है। इसे भावना में तब्दील करना है। इससे 2022 में हमें जनसमर्थन मिलेगा।

2022 विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस राज्य में अपने कैडर को पुनर्जीवित करने में लगी हुई है। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गढ़ में भाजपा ने सबको मात देकर प्रचंड बहुमत से सरकार बनाई और लोकसभा चुनाव में भी इस करिश्मे को दोहराया। ऐसे में, राज्य में चौथे नंबर पर फिसली देश की सबसे पुरानी पार्टी अब ‘दुश्मन को जानने’ में लगी हुई है। अब वह शाह की रणनीति की तर्ज पर ‘माइक्रो मैनेजमेंट’ करने में लगी हुई है। सभी सदस्यों को एक डायरी दी जा रही है, जिसमें वो अपने-अपने बूथ क्षेत्र के बारे में रोज लिखेंगे। बता दें कि अमित शाह ने भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद ‘बूथ स्तर मैनेजमेंट’ परंपरा को आगे बढ़ाया था।

नेताओं को अपने-अपने बूथ क्षेत्र में होने वाले अपराधों का भी ब्यौरा नोट करने को कहा गया है, ख़ासकर वो अपराध जो महिलाओं के ख़िलाफ़ होते हैं। पार्टी का कहना है कि राजमर्रा की घटनाओं से नेता जितने अवगत रहेंगे, वो उन मामलों को उठाने में उतना ही सक्षम होंगे। कॉन्ग्रेस नेताओं को नए-नए संपर्क बनाने और पार्टी की विचारधारा को फैलाने का भी टास्क दिया गया है। इन डायरियों में लिखी गई चीजों के आधार पर समय-समय पर तय किया जाएगा कि देश की सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले राज्य में कॉन्ग्रेस पार्टी को कैसे ज़्यादा से ज़्यादा मजबूत किया जाए।

कॉन्ग्रेस नेताओं से कहा गया है कि वो सीएए और एनआरसी को लेकर लोगों को कॉन्ग्रेस का पक्ष समझाएँ। साथ ही पहली बार वोट डालने वाले वोटरों को लुभाने का टास्क भी दिया गया। नेताओं को सोशल मीडिया पर सेशन आयोजित करा कर तकनीकी रूप से सक्षम बनाने की पहल की गई।

जो दो किताबें कॉन्ग्रेस नेताओं में बाँटी गई हैं, उनमें से एक का नाम है ‘गंगो जमन के खिलाफ आरएसएस और भाजपा के लोग’ और दूसरी किताब का नाम ‘हम कॉन्ग्रेस के लोग : दुष्प्रचार और सच’ है। पहली पुस्तक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वेशभूषा में एक व्यक्ति को दिखाया गया है और इसमें भगवा ध्वज भी दिख रहा है। इसमें बताया गया है कि स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा न लेने वाला और तिरंगे का विरोध करने वाला आरएसएस हिन्दू-मुस्लिम एकता के ख़िलाफ़ काम कर रहा है।

इस किताब में स्वतंत्रता संग्राम और आरएसएस की भूमिका, आजादी के प्रतीकों का विरोध, संविधान विरोधी आरएसएस-भाजपा, आरएसएस के प्रति नेताओं के विचार, भाजपा-आरएसएस के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति विचार, भाजपा गरीब विरोधी है, भाजपा सामाजिक न्याय को पसंद नहीं करती, भाजपा के भ्रष्टाचार के किस्से, महिलाओं के प्रति आरएसएस-भाजपा के विचार, भाजपा की आर्थिक नीति और वर्तमान आर्थिक हालात, भाजपा की विदेश नीति दब्बू है- ये सारे चैप्टर हैं। इनके नाम से ही साफ़ हो जाता है कि इसके अंदर क्या होगा।

वहीं, दूसरी पुस्तक के कवर पेज पर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की तस्वीर लगी हुई है। इस पुस्तक में निम्नलिखित 12 आरोपों के सिलसिलेवार तरीके से जवाब दिए गए हैं:

  • गाँधी जी ने पाकिस्तान को भारता का रुपया देकर उसकी सहायता की थी।
  • पाकिस्तान पर कॉन्ग्रेस का रुख नरम है।
  • कॉन्ग्रेस ने आतंकवादियों को बिरयानी खिलाई है।
  • भाजपा राष्ट्रवादी पार्टी है और कॉन्ग्रेस देशद्रोहियों का समर्थन करती है।
  • कॉन्ग्रेस सेना के भले के बारे में कुछ नहीं सोचती।
  • नेहरू ने पटेल को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया। अगर नेहरू की जगह पटेल देश के प्रधानमंत्री होते तो देश में कोई समस्या नहीं होती।
  • कॉन्ग्रेस ने सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल और स्वतंत्रता आंदोलन के अन्य नेताओं को तरजीह नहीं दी।
  • कॉन्ग्रेस केवल नेहरू-गाँधी परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है।
  • कॉन्ग्रेस ने वंशवाद की राजनीति को आगे बढ़ाया है।
  • कॉन्ग्रेस ने देश में 70 वर्षों में कुछ नहीं किया।
  • कॉन्ग्रेस ने देश में मुफ्तखोरी वाली लत लगाई है।
  • कॉन्ग्रेस मुस्लिम परस्त है। पार्टी तुष्टिकरण की राजनीति करती है और हिंदू आस्था का सम्मान नहीं करती है।

कुल मिला कर देखें तो अब पार्टी का पूरा ध्यान स्थानीय स्तर के नेताओं को प्रशिक्षित करने पर है, वो भी अपने हिसाब से। कॉन्ग्रेस अब नेताओं को अपने हिसाब से इतिहास पढ़ाएगी और बताएगी कि कौन क्या था? संघ और भाजपा के बारे में लोगों को क्या बताना है, इसके लिए नेताओं को प्रशिक्षित किया जाएगा ताकि वो जनता के बीच जाकर सवालों के जवाब दे सकें और ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपनी तर्कशक्ति से कॉन्ग्रेस के पाले में ला सकें। सोशल मीडिया और बूथ स्तर पर भाजपा की लगातार बढ़ती ताक़त से बेचैन कॉन्ग्रेस ने ये क़दम उठाया है।

कश्मीर पर भूलों का करना था पिंडदान, कॉन्ग्रेस ने खुद का कर लिया

‘मुस्लिम परस्त है कॉन्ग्रेस, CAA की आड़ में हिंदुओं को गाली देने का काम किया है’

सत्ता के लिए अधीर कॉन्ग्रेस न अल्पसंख्यकों की चौधरी बन पाई, न नेहरू से निभा पाई

72 साल में $2 ट्रिलियन, 5 साल में $3 ट्रिलियन: मोदी के आते सरपट दौड़ी अर्थव्यवस्था

जहाँ एक तरफ़ भारत सहित पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से गुजर रही है, वहीं दूसरी तरफ़ ये भी जानने लायक बात है कि पिछले 5 वर्षों में भारत की आर्थिक प्रगति ने काफ़ी तेज़ी से रफ़्तार भरी है। भारत ने मात्र 5 सालों में 2 ट्रिलियन डॉलर से 3 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनने में सफलता हासिल की। अमेरिका में भारत के राजदूत ने उम्मीद जताई कि अगले कुछ ही वर्षों में भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनने में कामयाब रहेगा।

गौर करने लायक बात है कि 2014 में जब नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभाली, तब भारत दुनिया की बड़ी आर्थिक शक्तियों में 11वें स्थान पर था। आज 5 साल बाद भारत दुनिया की 5वीं सबसे बड़ी इकोनॉमी है। भारतीय राजदूत हर्षवर्धन शृंगला ने इस बारे में अहम जानकारियाँ दी। हर्षवर्धन ने कहा कि ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मजबूत इच्छशक्ति और भारत की मजबूत राजनीतिक स्थिरता का कमाल है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने आर्थिक प्रगति के मामले में बड़ी छलांग लगाई है।

भारत को 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने में 60 साल लगे। इसके अगले 12 वर्षों में देश के 2 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का गौरव प्राप्त किया। इसके बाद भारत ने अभूतपूर्व छलांग लगाते हुए मात्र 5 वर्षों में 3 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन कर दुनिया को चौंका दिया। भारतीय राजदूत ने बताया कि ये 5 साल 2014 से लेकर 2019 तक की अवधि है। प्रधानमंत्री के इरादों की बात करें तो वो अगले 5 सालों में 2 ट्रिलियन डॉलर की छलांग लगाने की बात कह रहे हैं।

भारतीय राजदूत हर्षवर्धन ने कहा कि जल्द ही वो समय आने वाला है जब भारत दुनिया के सबसे बड़े फलदायी मानव संसाधन से युक्त होगा। उन्होंने याद दिलाया कि भारत मंगल ग्रह पर उपग्रह भेजने वाला दुनिया का तीसरा देश है। सबसे बड़ी बात तो ये कि इस मिशन में काम करने वाले वैज्ञानिकों की औसत उम्र महज 29 साल है। ये दिखाता है कि आगे भारत के यही वैज्ञानिक अनुभवी बन कर दुनिया भर में देश के गौरव का परचम लहराएँगे।
हर्षवर्धन शृंगला ने कहा कि भारत ने दुनिया भर में कई देशों के साथ ख़ास मित्रता स्थापित की है।

उन्होंने जानकारी दी कि अमेरिका आज भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है। इसके अलावा दोनों देशों के लोगों के बीच ‘पीपल टू पीपल कॉन्टेक्ट’ भी काफ़ी अच्छा है। उन्होंने हृयूस्टन में आयोजित ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम की याद दिलाते हुए कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उपस्थिति में पीएम मोदी ने 50,000 लोगों को सम्बोधित किया, ये प्रवासी भारतीयों के लिए गौराव का क्षण था।

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CAA से नागरिकता पाने वाले 70-75% SC/ST, OBC गरीब, फिर रावण-कन्हैया जैसे इसका विरोध क्यों कर रहे

भारत में नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने वालों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। लोग बढ़-चढ़ कर इसे मुस्लिम विरोधी कानून बता रहे हैं और अपने मुस्लिम बंधुओं की सुरक्षा के लिए प्रदर्शनों में शामिल हो रहे हैं। हालाँकि, ये बात सब जानते हैं कि सीएए का भारतीय मुस्लिमों से कुछ लेना-देना नहीं हैं। इसका उद्देश्य केवल तीन इस्लामिक देशों की अल्पसंख्यक आबादी को नागरिकता देना है। जिन्हें उनके मुल्क में धार्मिक आधार पर प्रताड़ित किया गया। मगर, फिर भी एनआरसी की उलाहना देकर इसे रोल बैक करवाने का पूरा प्रयास किया जा रहा है। साथ ही मोदी सरकार पर बेबुनियादी इल्जाम मढ़े जा रहे हैं कि वो भारत को हिंदू राष्ट्र बना रहे हैं।

इन इल्जामों के बीच SC/ST कमीशन के चेयरमैन और तीनों देशों से प्रताड़ित होकर भारत आए शरणार्थियों पर गहन शोध कर चुके Ex Dgp बृजलाल ने एक बड़ा खुलासा किया है। बतौर एससी/एसटी कमीशन चेयरमैन उन्होंने बताया है कि भारत में जिन शरणार्थियों को सीएए के तहत नागरिकता मिलने वाली है। उनमें 70 से 75 प्रतिशत दलित, ओबीसी और गरीब है। जिन्हें अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से भगाया गया था।

अब यहाँ गौर देने वाली बात है कि एक ओर एस/एसटी एक्ट के अध्यक्ष अपने गहन शोध के बाद इस बात को सरेआम बता रहे है कि इस कानून से अधिकांश दलितों, ओबीसी और गरीबों का फायदा होगा। लेकिन फिर भी, दिल्ली के शाहीन बाग, लखनऊ के घंटाघर जैसी जगहों पर इकट्ठा प्रदर्शनकारी इसे मानवाधिकारों के विरुद्ध बताकर सरकार की आलोचना कर रहे हैं, उनकी मंशा पर सवाल उठा रहे हैं और पूरे देश में बेवजह डर का माहौल बना रहे हैं। यहाँ तक की दलितों के अधिकारों की बात करने वाले रावण और कन्हैया जैसे लोग भी इस विरोध को हवा दे रहे हैं।

अब क्या इन परिस्थितियों को जानते-समझते-देखते हुए मान लिया जाए कि प्रदर्शन पर बैठे ये समुदाय विशेष के लोग और उनके समर्थन में आए तथाकथित सेकुलर लोग सरकार के प्रति अपनी कुँठा में मानवता को ताक पर रख चुके है। जिन्हें अब ये भी होश नहीं है कि एनआरसी (जो अभी तक आया भी नहीं) की आड़ में ये सीएए को वापस लेने के लिए जो रोना रो रहे हैं, वो इनकी उस दलित विरोधी छवि को खुलकर दुनिया के सामने पेश कर रहा है। जिसकी एक झलक सन् 47 में बँटवारे के दौरान भी देखने को मिली थी। क्योंकि पाकिस्तान बनने के बाद दलितों पर अत्याचार करने वाला ‘मजहबी’ भी कभी ‘हिंदुस्तानी’ ही कहलाता था।

भाजपा प्रवक्ता शलबमणि त्रिपाठी ने SC/ST कमीशन चेयरमैन की वीडियो अपने ट्विटर पर शेयर की है। जिसमें वे सीएए के तहत नागरिकता मिलने वाले दलित लोगों के हालात बयान करने के लिए पाकिस्तान के संविधान निर्माता योगेन्द्र मंडल की कहानी भी सुना रहे हैं। जिन्होंने बँटवारे के दौरान बाबा साहेब की बात नहीं मानी और दलित होने के बावजूद पाकिस्तान में बसे रहे। लेकिन, मात्र 3 साल में ही 25 हजार हिंदुओं का कत्लेआम देखकर उन्हें भी समझ आ गया कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति क्या है और वहाँ उनकी कोई सुनवाई नहीं होगी। नतीजतन 8 अक्टूबर 1950 को इस्तीफा दे दिया। जिसके बाद उन्हें जेल में डालने की पूरी कोशिश हुई। लेकिन वो भारत आ गए और यहाँ गुमनामी में अपना जीवन गुजारा। इसके बाद 5 अक्टूबर 1968 को उनका देहांत हो गया।

इनकी पूरी कहानी आप इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं-
जय भीम-जय मीम की विश्वासघात और पश्चाताप की कहानी: पाक का छला, हिंदुस्तान में गुमनाम मौत मरा

सोचिए, एक शख्स जो अगर भारत में रहता तो बाबा साहेब का उत्तराधिकारी बनता। उसने धर्म के नाम पर बने पाकिस्तान को चुना और उसका नतीजा भुगता। हालाँकि, वो बाद में भारत आ गए, लेकिन उनकी स्थिति आज भी जवाब है उन लोगों को जो इन प्रदर्शनों में पाकिस्तान के समर्थन में आवाज़ उठा रहे हैं और भारत सरकार से पूछ रहे हैं कि आखिर वहाँ के अल्पसंख्यकों को देश में लाने की क्या जरूरत है?

इन प्रदर्शनों में शामिल लोगों को जानने समझने की जरूरत है कि योगेंद्र मंडल जैसे सैंकड़ों लोग हैं, जो मुस्लिम लीग द्वारा गुमराह किए जाने के कारण सन 47 से इस्लामिक देश में घुटन का जीवन गुजार रहे थे और उन कट्टरपंथियों को इंसानियत की तर्ज पर तोल रहे थे। लेकिन, अपनों के साथ होती हिंसा और बर्बरता देखकर उन्हें भी योगेंद्र मंडल की तरह समझ आ गया कि ‘समुदाय विशेष’ मुस्लिमों की बहुसंख्यक आबादी उन्हें कभी उनके धर्म के साथ नहीं स्वीकारेगी। जिस कारण वे भारत लौट आए।

अब एक सवाल- मोदी सरकार के आने के बाद अक्सर रोहिंग्याओं को वापस भेजने वाली बात पर बौखला जाने वाला समाज, मानवमूल्यों का पाठ पढ़ाने वाले लोग, उन्हें देश की नागरिकता देने की बात पर ‘सरकार का क्या बिगड़ जाएगा?’ जैसे सवाल करने वाले लोग पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान के ज़्यादातर दलितों को नागरिकता दिए जाने पर क्यों बौखलाए हुए हैं? आखिर क्यों? जबकि इन बेचारों ने तो अपने मुल्क में रोहिंग्याओं की भाँति न किसी समुदाय को कोई नुकसान पहुँचाया और न कोई अपराध किए। इन्हें तो इनके अल्पसंख्यक होने की सजा मिली थी, वो भी उस सरजमीं पर जहाँ मजहब के नाम पर कट्टरपंथी मुस्लिमों की जकड़ थी। तो आखिर इनको भारत में नागरिकता क्यों न दी जाए और आखिर क्यों इनका विरोध हो? क्या सिर्फ़ इसलिए कि यहाँ की मुस्लिम आबादी भी पाकिस्तान की मुस्लिम आबादी की तरह नहीं चाहती कि वे यहाँ पर रहें?

7 को पीटकर अधमरा किया, 2 किमी तक घसीटा फिर सिर धड़ से अलग कर दिया

झारखंड में पत्थलगढ़ी की भेंट चढ़े 7 लोगों का शव बरामद कर लिया गया है। इस मामले में 3 लोगों की गिरफ्तारी हुई है। घटना राज्य के पश्चिमी सिंहभूम जिले के गुदड़ी प्रखंड के बुरुगुलीकेरा गॉंव की है। मृतकों की उम्र 20 से 30 साल के बीच की है। सभी के सिर कटे हुए और पूरा शरीर क्षत-विक्षत है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एसआईटी का गठन कर पॉंच दिनों की भीतर जॉंच रिपोर्ट मॉंगी है। गुदड़ी थाना प्रभारी अशोक कुमार को निलंबित कर दिया गया है।

घटना 19 जनवरी के शाम की ही है। पुलिस को इसकी भनक मंगलवार को लगी। शव बुधवार को बरामद किए गए थे। मीडिया रिपोर्टों के बाद पत्थलगड़ी समर्थकों ने सातों युवकों की ग्रामसभा में पहले जमकर पिटाई की। अधमरे हालत में उन्हें घसीटकर करीब दो किमी जंगल में ले गए। वहॉं सभी के हाथ-पैर बॉंध कर सिर कलम कर दिया गया। घटना के बाद से पूरे गॉंव में सन्नाटा पसरा है। गॉंव को छावनी में तब्दील कर दिया गया है। सीआरपीएफ, रैफ और जिला बल के 200 जवान कैंप कर रहे हैं।

मृतकों में बुरुगुलीकेरा ग्राम पंचायत के उपमुखिया जेम्स बुढ़ भी हैं। बुढ़ और अन्य मृतक पत्थलगढ़ी का विरोध कर रहे थे। प्रभात खबर की रिपोर्ट के अनुसार दूसरे पक्ष ने मृतकों पर 16 जनवरी की रात उनके घर में घुसकर मारपीट करने और सामानों को क्षतिग्रस्त करने का आरोप लगाया है। बताया जाता है कि इसके विरोध में ही ग्रामसभा बुलाई गई थी। सभा में नौ लोगों को मौत की सजा सुनाई गई। इसी दौरान दो लोग गायब हो गए। इससे नाराज लोगों ने शेष सात लोगों को बंधक बना लिया और उनकी पिटाई शुरू कर दी। ग्रामीणों ने कहा कि सड़े हुए आलू को फेंक दिया जाना चाहिए। इसके बाद सातों को घसीटकर जंगल ले जाया गया। जब यह घटना हुई उस समय मृतकों के परिजन भी ग्रामसभा में मौजूद थे। हत्या का मामला उजागर होने के बाद सभी शव बरामद करने में पुलिस को 21 घंटे लगे।

इस घटना के बाद से हेमंत सोरेन की अगुवाई वाली झामुमो, कॉन्ग्रेस और राजद की सरकार निशाने पर है। असल में, शपथ लेने के बाद हेमंत सोरेन ने चार घंटे के भीतर ही पहली कैबिनेट बैठक में पत्थलगड़ी आंदोलन के दौरान दर्ज एफआईआर वापस लेने का फैसला किया था। पिछली बार भी इस आंदोलन के दौरान जमकर हिंसा हुई थी। अपहरण, गैंगरेप जैसी घटनाओं को अंजाम दिया गया था।

प्रभात खबर के रांची संस्करण में प्रकाशित रिपोर्ट

गौरतलब है कि पत्थलगड़ी आंदोलन की शुरुआत खूँटी से ही हुई थी। झारखंड में आदिवासी हितों के नाम पर राजनीति करने वाले हेमंत सोरेन ने चुनाव से पूर्व ही स्पष्ट कह दिया था कि उनकी सरकार बनते ही पत्थलगड़ी हिंसा के आरोपितों पर से सभी केस हटा लिए जाएँगे और उन्होंने किया भी। मसलन वो दोपहर 2:19 पर शपथ लेते हैं और 5: 45 शाम में कैबिनेट की पहली मीटिंग में ही FIR वापसी का फैसला लेते हैं।

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