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फैज थे कट्टर पाकिस्तानी, हजारों साल पुराना इतिहास बताते थे Pak का: हरिशंकर परसाई की किताब से खुली पोल

फैज़ अहमद फैज़ की कविता ‘हम देखेंगे’ को लेकर आजकल देश में एक नई जंग छिड़ी हुई है। आईआईटी कानपुर ने एक समिति बना कर कैम्पस में इस कविता के पाठ, यूनिवर्सिटी के नियम-कायदे और कविता पाठ के बाद सोशल मीडिया पर देश-विरोधी बातों संबंधी जाँच करने का फ़ैसला लिया। जाँच की बात आने के बाद से ही वामपंथियों ने फैज़ को ‘भारत का राष्ट्रभक्त’ साबित करने के लिए पूरा जोर लगा दिया। ट्विटर पर जावेद अख्तर सरीखे लोगों ने फैज़ के गुणगान में ट्वीट्स किए। फैज़ की कविताएँ शेयर की जाने लगीं।

ऐसे में, दैनिक जागरण के पत्रकार अनंत विजय ने हरिशंकर परसाई की एक रचना का जिक्र किया, जिससे साफ़ पता चलता है कि फैज़ किस सोच वाले व्यक्ति थे और कैसे वो भारत के प्रति घृणा से भरे हुए थे। ‘मार्क्सवाद का अर्धसत्य’ के लेखक अनंत विजय ने ‘हरिशंकर परसाई: चुनी हुई रचनाएँ’ नामक पुस्तक से उद्धरण लेकर फैज़ की सोच के बारे में बताया। उन्होंने लिखा कि फैज़ को ‘भारत-भक्त’ मानने वालों को ये ज़रूर देखना चाहिए। परसाई की इस रचनावली में एक घटना का जिक्र है, जो ताशकंद की है।

दरअसल, इस घटना का अनुभव मलयाली लेखक तकषि शिवशंकर पिल्लई ने साझा की थी। दर्जनों उपन्यास और 600 से भी अधिक कहानियाँ लिख चुके पिल्लई एक लोकप्रिय साहित्यकार थे, जिन्हें साहित्य कदमी अवॉर्ड से भी नवाज़ा गया था। पिल्लई के हवाले से महान व्यंगकार परसाई ने लिखा है कि ताशकंद में एफ्रो-एशियाई लेखकों का एक सम्मलेन हुआ था। इस सम्मलेन में पिल्लई ने प्रस्ताव दिया था कि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के लेखकों को मिल कर एक संयुक्त वक्तव्य जारी करना चाहिए। उस वक्तव्य में ये होगा कि तीनों ही देश साझा संस्कृति, इतिहास और साहित्य-परंपरा का निर्वहन करते हैं।

बकौल हरिशंकर परसाई, पिल्लई के इस प्रस्ताव को पाकिस्तानी फैज़ अहमद फैज़ ने तुरंत नकार दिया। जबकि वहाँ मौजूद बांग्लादेश के लेखक ने कुछ भी टिप्पणी नहीं की थी। तब फैज़ ने स्पष्ट कहा था कि पाकिस्तान का इतिहास 1947 से शुरू नहीं होता है बल्कि ये तो हज़ारों वर्ष पुराना है। दरअसल, पिल्लई ने जब उन्हें याद दिलाया कि पाकिस्तान तो 1947 में भारत से विभाजित होकर अलग हुआ था, तो फैज़ तमतमा गए। पिल्लई ने कहा कि हदें भले ही बन गई हों लेकिन दोनों देशों की संस्कृति तो वही है। पिल्लई के प्रस्ताव पर फैज़ ने कहा- “नहीं। यह हरगिज़ नहीं हो सकता।

इसके बाद फैज़ ने अपने फ़ैसले के पक्ष में जो तर्क दिया, उसे आप भी जानिए। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की हज़ारों वर्ष पुरानी संस्कृति का भारत से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान का इतिहास भी अपना है, जो हज़ारों साल पहले जाता है। फैज़ ने कहा कि पाकिस्तान की संस्कृति या इतिहास का भारत से कोई भी संबंध नहीं है। इसके बाद पिल्लई और फैज़ के बीच जोरदार बहस हुई थी।

दरअसल, उस समय पिल्लई भी नहीं जानते थे कि फैज़ अहमद फैज़ कौन हैं, क्योंकि वो दक्षिण भारतीय थे। बाद में उन्होंने अपने कुछ उत्तर भारतीय मित्रों से बातचीत की तो उन्हें पता चला कि उनके साथ बहस करने वाले फैज़ ही थे। इस संस्मरण को पिल्लई ने लिखा है और हरिशंकर परसाई ने ‘इकबाल की बेइज्जती’ में इसका जिक्र किया है।

फैज़ अहमद फैज़: उनकी नज़्म और वामपंथियों का फर्जी नैरेटिव ‘हम देखेंगे’

‘सभी मूर्तियों को हटा दिया जाएगा… केवल अल्लाह का नाम रहेगा’: IIT कानपुर में हिंदू व देश विरोधी-प्रदर्शन

शादी के 1 हफ्ते पहले Pak में सिख युवक की हत्या, पत्रकार भाई ने कहा- ‘हमें हर साल उठानी पड़ती हैं लाशें’

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर हो रहा उत्पीड़न थमने का नाम नहीं ले रहा है। पाकिस्तान के खैबर पख़्तूनख़्वा में स्थित पेशावर में एक सिख युवक की हत्या के बाद पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की दयनीय स्थिति एक बार फिर सामने आ रही है। ख़बर के अनुसार, पेशावर में एक सिख युवक की हत्या कर दी गई है लेकिन अब तक हत्यारे का कोई सुराग नहीं मिला है। चमकनी पुलिस थाना क्षेत्र में रविवार (जनवरी 5, 2020) को हुई इस वारदात को लेकर इलाक़े के हिन्दुओं व सिखों में भय का माहौल व्याप्त है। डेड बॉडी को पोस्टमॉर्टम के लिए हॉस्पिटल भेजा गया है।

वहीं सोशल मीडिया के माध्यम से मृतक के भाई ने न्याय की गुहार लगाई है। मृतक के भाई हरमिंदर सिंह ने कहा कि अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हो रहे अत्याचार के मामलों को पाकिस्तानी पुलिस द्वारा दबा दिया जाता है। हरमिंदर ने अपने मृत भाई के लिए न्याय की भावुक गुहार लगाते हुए कहा कि वो चाहते हैं कि लोग उनकी आवाज़ बनें। उन्होंने कहा कि एक तरफ पाकिस्तान की सरकार अल्पसंख्यकों के नाम पर बड़ी फंडिंग उठाती है और दूसरी तरफ सिखों, हिन्दुओं व ईसाईयों पर अत्याचार किया जाता है।

“पाकिस्तान में हमारी हालत ये है कि आज मुझे अपने मरे हुए भाई की बॉडी उठानी पड़ रही है”- ये बोल पीड़ित हरमिंदर के हैं, जिन्होंने ट्विटर पर अपनी आपबीती सुनाई। उन्होंने कहा कि वो तब तक चैन से नहीं बैठेंगे जब तक पाकिस्तानी सरकार उनके भाई के कातिलों को सज़ा नहीं दे देती। हरमिंदर ने कहा कि वो न्याय के लिए जहाँ भी जाना होगा, जाएँगे। हरमिंदर ने भावुक अपील करते हुए कहा:

“आज मुझे अपने भाई की लाश उठानी पड़ रही है। कल को मेरे और भी हिन्दू, सिख और ईसाई भाइयों को इस स्थिति से गुजरना पड़ सकता है। पाकिस्तान दुनिया भर में ढिंढोरा पीटता है कि यहाँ अल्पसंख्यक सुरक्षित हैं लेकिन असलियत ये है कि हमें हर साल लाशें उठानी पड़ती हैं। कभी पेशावर में तो कभी स्वात में, ये सिलसिला लगातार चल रहा है। मैं जनता से अपील करता हूँ कि आप हमारी आवाज़ बनें। हमारे नाम पर हर साल अरबों डॉलर की फंडिंग खाई जाती है। हमारी हालत देखिए, हम रोते-बिलखते आपके सामने ही खड़े हैं।”

मृतक का नाम रविंदर सिंह है। मृतक के भाई हरमिंदर सिंह पब्लिक न्यूज़ इस्लामाबाद में बतौर रिपोर्टर कार्यरत हैं। परविंदर की शादी अगले ही हफ्ते होनी थी। ऐसे समय में उनकी हत्या होने से परिवार सदमे में है। वो शादी की तैयारी के सिलसिले में ही पेशावर गए हुए थे, जहाँ उनकी हत्या कर दी गई। 25 वर्षीय परविंदर की हत्या को लेकर पाकिस्तान पुलिस ने कहा है कि वो जाँच कर रही है। अस्पताल में मृतक के परिजन रोते-बिलखते नज़र आए, जिन्हें परिचित ढाँढस बँधा रहे थे।

संयुक्त राष्ट्र ने अपनी रिपोर्ट में पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की दयनीय स्थिति पर चिंता जताई थी। वहीं पाक पीएम इमरान ख़ान लगातार कहते हैं कि वहाँ अल्पसंख्यक ख़ुशी से रह रहे हैं। हाल ही में पाकिस्तान स्थित पंजाब के ननकाना साहिब को घेर कर मुस्लिमों ने पत्थरबाजी की। भड़काऊ नारेबाजी कर रही मुस्लिम भीड़ ने गुरु नानक के जन्मस्थल को तहस-नहस करने की चेतावनी दी। ऐसे में पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं।

ननकाना साहेब गुरुद्वारे पर मुस्लिमों का हमला, कहा- कोई सिख नहीं रहेगा यहाँ, नाम होगा गुलाम-ए-मुस्तफा

कॉन्ग्रेस ने ननकाना साहिब पर हमले के वीडियो को बताया फेक, गुलाम नबी ने कहा- घटना के बारे में पता नहीं

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कोई सिख नहीं रहेगा यहाँ, नाम होगा गुलाम-ए-मुस्तफा: ननकाना साहिब में पत्थरबाजी, मारपीट पर भारत ने जताई कड़ी आपत्ति

उमर ने कबाब से तो महबूबा ने चिकन सूप से की तौबा: नजरबंदी में कश्मीरी नेताओं का बदला जायका

अनुच्छेद-370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में एहतियातन नजरबंद किए नेताओं को रिहा करने का क्रम जारी है। शुक्रवार को चार नेता रिहा किए गए। इनमें नेशनल कॉन्फ्रेंस के अशफ़ाक़ जब्बार और गुलाम नबी, पीडीपी के जहूर मीर और यासिर रेशी तथा कॉन्ग्रेस के बशीर मीर शामिल हैं। सरकार ने कहा है कि धीरे-धीरे सभी नेता रिहा कर दिए जाएँगे।

24 नेता अभी भी नज़रबंद हैं। इनमें पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती भी शामिल हैं। इनके अलावा, सज्जाद लोन, नईम अख्तर और शाह फैसल सहित अन्य नेता श्रीनगर के एमएलए हॉस्टल में नज़रबंद हैं। मीडिया की खबरों की मानें तो नजरबंदी ने नेताओं के जीवनशैली को काफी हद तक बदल दिया है। पूर्व मुख्यमंत्रियों नेशनल कॉन्फ्रेन्स के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला और PDP अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती का ज़ायका तक बदल गया है। उमर अब्दुल्ला न अब कबाब की इच्छा जताते हैं और न महबूबा को चिकन सूप या गोश्ताबा और रिसता चाहिए।

दैनिक जागरण की ख़बर के अनुसार, उमर अब्दुल्ला को कबाब बेहद पसंद है। वहीं महबूबा मुफ़्ती को चिकन, चिकन सूप और वाजवान में रिसता व गोश्तबा के अलावा चाइनीज़ खाना पसंद है। ख़बर के अनुसार दोनों नेताओं को जब हिरासत में लिया गया था, तब उन्हें कई दिनों तक उनकी इच्छानुसार मांसाहारी खाना दिया गया था। दरअसल, जेल मैन्युअल के मुताबिक़ शाकाहारी और मांसाहारी दोनो तरह का खाना क्रमानुसार उपलब्ध कराया जाता है। लेकिन, पिछले एक महीने से दोनों नेता मांसाहार को छू तक नहीं रहे।

दोनों नेताओं की सुरक्षा में तैनात अधिकारियों ने बताया कि उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती की खुराक में साग, दाल, सब्जी, चपाती और चावल शामिल है। इसके अलावा, वो फलों का सेवन भी करते हैं। उन्होंने बताया कि दोनों नेताओं को जहाँ रखा गया है वहाँ खाना पकाने की अनुमति नहीं है। लेकिन, चाय के लिए प्रावधान किया गया है। दोनों नेताओं को जब चाय और हल्का नाश्ता लेने की इच्छा होती है तो संबंधित कर्मियों द्वारा उनके लिए चाय व हल्का नाश्ता दिया जाता है। यह सुविधा उनसे मिलने-जुलने वाले लोगों के लिए भी है। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि इन नेताओं से मिलने वाला कोई निकट संबंधी हो तो वो खाना भी ला सकता है, लेकिन उस खाने की जाँच अनिवार्य होती है।

महबूबा मुफ़्ती का अजीत डोभाल के कश्मीर दौरे पर कटाक्ष: पिछली बार बिरयानी, क्या इस बार हलीम?

J&K: बाप-दादा की करनी पर लड़े उमर अब्दुल्ला-महबूबा मुफ्ती, अब अलग रखे गए

370 तो गियो लेकिन J&K में तिरंगा सुरक्षित हाथों में, आँखें फाड़ कर देखो महबूबा कंधे की ज़रूरत किसे है

‘अल्लाह का शुक्र है कि ‘पापा मोदी’ की कोई औलाद नहीं, वरना…’ – JNU वाली शेहला रशीद ने फिर उगला जहर

जेएनयू के पूर्व छात्र नेता शेहला रशीद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत टिप्पणी की है। शहेला ने सोशल मीडिया के माध्यम से पीएम मोदी पर टिप्पणी की। शेहला रशीद ने ट्विटर पर लिखा- “अल्लाह का शुक्र है कि नरेंद्र मोदी की कोई औलाद नहीं है। अगर उनके बच्चे होते तो उन्हें स्कूल में काफ़ी शर्मिंदा होना पड़ता।” ये पहली बार नहीं है जब शेहला रशीद ने पीएम मोदी को लेकर ऐसी टिप्पणी की हो। शेहला ने 2018 में भाजपा समर्थकों को ट्रोल करते हुए लिखा था कि वो अपने ‘पापा मोदी’ को कहें कि वो अनुच्छेद 370 हटा कर दिखाएँ और राम मंदिर बना कर दिखाएँ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर उनके वैवाहिक जीवन या परिवार को लेकर कई विपक्षी नेता व एक्टिविस्ट टिप्पणी करते रहे हैं। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू ने पीएम मोदी पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि जिस व्यक्ति ने अपनी पत्नी को छोड़ दिया हो, वो पारिवारिक सिस्टम का सम्मान कैसे कर सकता है? यूपी की पूर्व सीएम मायावती ने भी कहा था कि भाजपा की महिला नेताओं को डर है कि पीएम मोदी की संगत में आकर उनके पति भी उन्हें छोड़ देंगे, इसीलिए वो अपने पति को प्रधानमंत्री से नहीं मिलने देती हैं। इसी तरह एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने भी कहा था कि पीएम मोदी के बाल-बच्चे और बीवी नहीं हैं, इसीलिए वो ये नहीं जानते हैं कि परिवार क्या होता है?

शेहला रशीद ने इसी श्रृंखला में नया बयान जोड़ा है। कई लोगों ने शेहला के इस बयान से आपत्ति भी जताई, वहीं कई अन्य लोगों ने जवाब भी दिया। एक व्यक्ति ने लिखा कि अगर शेहला के बच्चे होते तो वो अभी तक आतंकी कैम्पों में ट्रेनिंग के लिए भेज दिए गए होते। एक यूजर ने पूछा कि शेहला अपने ख़ुदा से ज़्यादा मोदी को क्यों याद करती हैं? एक व्यक्ति ने याद दिलाया कि पीएम मोदी के बेटे-बेटी अगर होते भी तो वो कब का स्कूल की पढ़ाई पूरी कर चुके होते। एक ट्विटर यूजर ने कहा कि बच्चे तो राहुल गाँधी के भी नहीं हैं।

शेहला रशीद ने जम्मू कश्मीर की राजनीति में क़दम रखा ही था कि उनके नेता शाह फैसल तुर्की भागते हुए पकड़े गए। वो फ़िलहाल पुलिस की हिरासत में हैं। अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के साथ ही शेहला की राजनितिक महत्वाकांक्षाएँ भी धूमिल हो गईं और उन्होंने राजनीति से दूरी बना ली। फ़िलहाल वह ‘फ्रीलान्स प्रोटेस्टर’ के रूप में अजीबोगरीब टिप्पणियाँ करती रहती हैं।

हमारी दोस्ती चाहिए तो अपने हिस्से का आरक्षण मुस्लिमों को भी दें दलित: शेहला रशीद की नई शर्त

शेहला को परेश रावल ने दिखाया आईना, कहा- तुम्हें इंटरनेट की पड़ी है, कश्मीरी पंडित सालों से बेघर हैं

…जरूरत पड़े तो शेहला राशिद को गिरफ्तार करो, कोर्ट ने दिया आदेश: भारतीय सेना को किया था बदनाम

‘पापा मोदी’, हिम्मत है तो राम मंदिर बनाओ और अनुच्छेद 370 हटाओ: कबूल हुई शेहला रशीद की दोनों दुआएँ

देखती रह गई कॉन्ग्रेस और शिवसेना, पवार की जेब में चला गया ‘घर और खजाना’

महाराष्ट्र में सभी मंत्रियों के विभाग के बँटवारा कर दिया गया। इसके साथ ही उद्धव ठाकरे सरकार के मंत्रियों ने अपने-अपने मंत्रालयों का प्रभार संभालने की शुरुआत कर दी। मंत्रियों के नामों की घोषणा तो पहले ही कर दी गई थी, जिसमें एनसीपी का दबदबा रहा था। इसी तरह सारे मलाईदार विभाग भी पवार के मंत्रियों के पास गया है। ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकतर मलाईदार विभाग एनसीपी को दिया गया है। वहीं शिवसेना ने शहरी क्षेत्रों से जुड़े विभाग अपने पास रखे हैं। कॉन्ग्रेस को बचे-खुचे मंत्रालयों को देकर संतुष्ट कर दिया गया है। मंत्रिमंडल में एनसीपी का दबदबा दिख रहा है।

सबसे पहले कॉन्ग्रेस की बात करते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को पीडब्ल्यूडी विभाग और प्रदेश अध्यक्ष बालासाहब थोराट को राजस्व मंत्रालय दिया गया है। दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के बेटे अमित देशमुख को चिकित्सा एवं संस्कृति मंत्रालय दिया गया है। बाकी कॉन्ग्रेस नेताओं को आदिवासी विकास, स्कूली शिक्षण, जनजातीय विकास, मत्स्य, ओबीसी कल्याण और डेयरी विकास देकर निपटा दिया गया है। कॉन्ग्रेस पार्टी की एक तरह से फजीहत ही हुई है क्योंकि जो भी विभाग शिवसेना और एनसीपी से बच गए, वो सोनिया गाँधी की पार्टी को थमा दिए गए हैं।

मंत्रिमंडल में सबसे जबरदस्त उपस्थिति शरद पवार की एनसीपी की है। पूर्व उपमुख्यमंत्री छगन भुजबल को उपभोक्ता मामले और जयंत पाटिल को जल संसाधन मंत्रालय मिला है। सबसे बड़ी बात ये है कि एनसीपी ने वित्त और गृह- ये दोनों ही महत्वपूर्ण मंत्रालय अपने पास रखा है। उपमुख्यमंत्री अजित पवार को वित्त मंत्रालय दिया गया है, वहीं पवार परिवार के क़रीबी अनिल देशमुख को गृह मंत्रालय दिया गया है। ग्रामीण विकास, सामाजिक न्याय, आवास और अल्पसंख्यक मामले सहित कई महत्वपूर्ण मंत्रालय शरद पवार की पार्टी के पास रहेगा।

शिवसेना ने शहरी इलाक़ों में अपनी पैठ और मजबूत करने के लिए उससे जुड़े मंत्रालयों को अपने ही मंत्रियों की झोली में डाला है। आदित्य ठाकरे ने पर्यटन और पर्यावरण रखा है। अर्बन क्षेत्रों से जुड़े शहरी विकास और उद्योग मंत्रालय भी शिवसेना ने ही रखा है। कृषि मंत्रालय भी शिवसेना ने ही रखा है। वहीं ख़ुद मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के पास कोई बड़ा विभाग नहीं है। उनके पास न्यायपालिका और जनसम्पर्क सरीखे मंत्रालय हैं। यानी, उद्धव भले ही मुख्यमंत्री हों और कॉन्ग्रेस भी सरकार में शामिल हो, लेकिन मंत्रिमंडल में पवार का पावर ही दिख रहा है।

बता दें कि कॉन्ग्रेस के अधिकतर विधायक ग्रामीण क्षेत्रों से ही जीत कर आए हैं लेकिन उसे इससे जुड़ा एक भी मंत्रालय नहीं दिया गया। तीनों पार्टियों के कई नेताओं में मंत्रिमंडल के गठन के समय से ही असंतोष उपज रहा था, जो विभागों के बँटवारे के बाद और तेज़ हो गया है।

सत्ता के लिए तीन-तिकड़म में लगी थी शिवसेना-कॉन्ग्रेस-एनसीपी, महाराष्ट्र में 300 किसानों ने कर ली आत्महत्या

सावरकर पर एक सुर में बोली भाजपा-शिवसेना, राहुल गाँधी के विवादित बोल से दाँव पर महाराष्ट्र सरकार

‘न्यूट्रल पत्रकार’ राजदीप ने कॉन्ग्रेस के कार्यक्रम में अपनी पुस्तक को किया प्रमोट, दिया महाराष्ट्र पर लेक्चर

दिल्ली की सुनहरी मस्जिद पर लहरा रहा था लाल झंडा और मचा था कत्लेआम, अब उसी से ललकार रहा ईरान

वह साल 1739 का था। पर्सिया से आया नादिरशाह ​ने चॉंदनी चौक की सुनहरी मस्जिद पर लाल झंडा फहराया। वहीं से खड़े होकर वह अपनी फौज को दिल्ली की गलियों को खून से रंगते निहार रहा था। यही झंडा अब ईरान के कोम शहर की जमकारन मस्जिद के गुंबद पर लहरा रहा है। इसे अमेरिका के खिलाफ ईरान के जंग के ऐलान के तौर पर देखा जा रहा है।

ख़बर के अनुसार, लाल झंडा शिया परंपरा में ख़ूनी प्रतिशोध का प्रतीक होता है। झंडे पर लिखा था, ‘जो लोग हुसैन के ख़ून का बदला लेना चाहते हैं’। शिया परंपरा के अनुसार, लाल झंडे पर लगे ख़ून के छींटे मारे गए व्यक्तियों का बदला लेने का प्रतीक है।

शुक्रवार को अमेरिका ने बगदाद में एक एयर स्ट्राइक में ईरान के कमांडर कासिम सुलेमानी को मार गिराया था। इसके बाद शनिवार की रात बगदाद में अमेरिकी दूतावास के बाहर रॉकेट से हमला किया गया। माना जा रहा है कि ये हमला ईरान की ओर से किया गया। ये हमला अमेरिकी दूतावास के नजदीक और अमेरिकी एयरबेस पर हुआ। दो रॉकेट दूतावास के नजदीक गिरे।

इस हमले के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने फिर ईरान को अत्याधुनिक और ब्रैंड न्यू हथियारों से हमला करने की धमकी दी है।  ट्रम्प ने ईरान को सलाह देते हुए ट्वीट किया, “उन्होंने हमला किया और हमने उसका जवाब दिया। अगर वो फिर से हमला करेंगे, जो कि मैं उन्हें सलाह देता हूँ कि वो ना करें तो हम उन पर और ज़ोरदार हमला करेंगे जैसा अब तक कभी नहीं हुआ।”

अमेरिका के राष्ट्रपति ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा कि अमेरिका किसी भी तरह के हमले का जवाब देने में सक्षम है। ट्रम्प ने अपने ट्वीट में कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए लिखा, “संयुक्त राज्य अमेरिका ने दो ट्रिलियन डॉलर अपने सैन्य उपकरणों पर ख़र्च किए हैं। हम सबसे बड़े (सैन्य शक्ति के सन्दर्भ में) और अब तक पूरी दुनिया में सर्वश्रेष्ठ हैं। अगर ईरान अमेरिकन बेस पर हमला करता है या किसी अमेरिकन पर हमला करता है, तो हम अपने ब्रैंड न्यू और बेहद सुंदर उपकरण उनके पास भेजेंगे… बिना किसी संकोच के।”

इधर, सुलेमानी के परिजनों से ईरानी राष्ट्रपति हसन रोहानी ने मुलाकात की। कासिम सुलेमानी की बेटी जेनाब सुलेमानी ने राष्ट्रपति हसन रोहानी से कहा, “मिस्टर रोहानी जब मेरे पिता के दोस्तों को ख़ून बहता था तो वो बदला लेते थे। अब मेरे पिता के ख़ून बहने का बदला कौन लेगा?” इसके जवाब में राष्ट्रपति रोहानी ने कहा, “बिल्कुल मिलेगा, शहीद के ख़ून का बदला लिया जाएगा, चिंता मत करो।”

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने एक अन्य ट्वीट के ज़रिए ईरान को चेतावनी दी है कि यदि वो अमेरिकी जवानों या सम्पत्ति पर हमला करेगा, तो अमेरिका 52 ईरानी स्थलों को निशाना बनाएगा और उन पर बहुत तेज़ी से और ज़ोरदार हमला करेगा। उन्होंने कहा कि ईरान के 52 ठिकाने हमारे निशाने पर हैं, जो ईरान और ईरानी संस्कृति के लिए काफ़ी अहमियत रखते हैं। हम किसी भी तरह के हमले का मुँहतोड़ जवाब देने को तैयार हैं।

ईरानी कमांडर मरा तो उबल पड़े ‘शांतिदूत’, ट्रंप ने बताया- दिल्ली में भी हमले की रची थी साजिश

पाकिस्तान ने F-16 का किया था दुरुपयोग, अमेरिका के विदेश विभाग ने पत्र लिखकर लगाई फ़टकार

NRC की आहट से सहमे घुसपैठिए, रात के अँधेरे में भाग रहे बांग्लादेश

नेशनल रजिस्टर आफ सिटिजन्स (NRC) अभी पूरे देश में लागू नहीं हुआ है। लेकिन, इसकी आहट से सालों से भारत में अवैध रूप से रह रहे घुसपैठियों की नींद उड़ गई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार हर रोज रात को सैकड़ों बांग्लादेशी सीमा पार कर रहे हैं। इनमें से कई को सीमा में घुसते हुए बांग्लादेश बार्डर गार्ड्स (बीजीबी) ने दबोचा भी है।

बीजीबी के महानिदेशक मेजर जनरल मोहम्मद शफीनुल इस्लाम ने 2 जनवरी को बताया था कि नवंबर और दिसंबर में 445 बांग्लादेशी नागरिक वापस आए हैं। उन्होंने माना था कि जॉंच से यह बात सत्यापित हुई है कि ये सभी घुसपैठिए थे। दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट के अनुसार बीजीबी ने जितने लोगों को पकड़ा है, उससे कहीं ज्यादा सीमा पार कर घुसने में सफल रहे हैं।

रिपोर्ट में स्थानीय लोगों के हवाले से बताया गया है कि रोजाना 300 से 400 लोग भारत से बांग्लादेश लौट रहे हैं। बांग्लादेश के झिनाइदा जिले से सटे सीमावर्ती महेशपुर उप जिला से ही नवंबर से अब तक हजारों लोगों ने रात के अँधेरे में बांग्लादेश में प्रवेश किया है। बांग्लादेशी बॉर्डर गॉ‌र्ड्स ने पिछले महीने करीब 300 लोगों को महेशपुर उप जिला से पकड़कर पुलिस को सौंपा था।

रिपोर्ट के अनुसार बांग्लादेश में घुसने की कोशिश करते अधिकांश लोगों ने वहॉं की एजेसियों को बताया है कि वे काम के सिलसिले में अरसे से भारत में रह रहे थे। इनके पास से भारतीय पहचान पत्र भी बरामद हुए हैं। रिपोर्ट में अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि अंतरराष्ट्रीय सीमा के बड़े इलाके में फेंसिंग और बिजली नहीं है। इलाका नदियों और घने जंगलों से घिरा है। इसका फायदा उठाकर लोग सीमा पार कर रहे हैं। इसे देखते हुए बांग्लादेश ने सीमावर्ती गॉंव के लोगों को साथ मिलकर सुरक्षा कमेटी बनाई है। बीएसएफ अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि असम में एनआरसी लागू होने के बाद से वहॉं से भी बांग्लादेशी अब अपने देश लौटने लगे हैं।

गौरतलब है कि एनआरसी को भारत का आंतरिक मामला बताते हुए बांग्लादेश के विदेश मंत्री एके अब्दुल मोमेन पहले ही अपने नागरिकों को वापस लेने की बात कह चुके हैं। उन्होंने कहा था, “हम बांग्लादेशी नागरिकों को वापस आने की अनुमति देंगे, क्योंकि उनके पास अपने देश में प्रवेश करने का अधिकार है।” मोमेन ने बताया था कि भारत से अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशियों की सूची भी मुहैया कराने का अनुरोध किया गया है। बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख हसीना के अंतरराष्ट्रीय मामलों के सलाहकार गौहर रिजवी ने भी कहा था कि भारत में अवैध रूप से रह रहे लोग वापस लिए जाएँगे।

भारत के साथ रिश्ते सुनहरे दौर में, अवैध रूप से रह रहे हर बांग्लादेशी को बुलाएँगे: पीएम शेख हसीना का सलाहकार

घुसपैठियों की घर वापसी के लिए बांग्लादेश तैयार, भारत से माँगी लिस्ट

बांग्लादेशी या रोहिंग्या मुसलमान इस देश का नहीं है, उसकी पहचान कर, अलग करना समय की माँग

तीसरी बार विधायक बना, फिर भी नहीं बनाया मंत्री: MLA कैलाश गोरंट्याल कॉन्ग्रेस से देंगे इस्तीफा

महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी की मुश्किलें खत्म होती नहीं दिख रही। कैबिनेट विस्तार के बाद साझेदार दलों शिवसेना, कॉन्ग्रेस और एनसीपी में बगावत के सुर तेज हो गए हैं। जालना से कॉन्ग्रेस विधायक कैलाश गोरंट्याल ने पार्टी से इस्तीफा देने की बात कही है। इससे पहले पुणे में विधायक संग्राम थोपटे को मंत्री नहीं बनाए जाने पर उनके समर्थकों ने कॉन्ग्रेस कार्यालय में तोड़फोड़ की थी।

कैबिनेट में जगह न मिलने से नाराज गोरंट्याल ने कहा कि अपने समर्थकों के साथ पार्टी से इस्तीफा देने का उन्होंने फैसला किया है। उन्होंने कहा, “मैंने और मेरे समर्थकों ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष को इस्तीफा सौंपने का फैसला किया गया। मैं तीसरी बार विधायक चुना गया हूॅं। मैंने अपने लोगों के लिए काम किया है। बावजूद मुझे मंत्री नहीं बनाया गया है।”

30 दिसंबर को कैबिनेट विस्तार किया गया था। 36 मंत्रियों ने शपथ ली थी। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने विभागों का बँटवारा कर दिया है। गृह और वित्त जैसे बड़े महकमे एनसीपी के हिस्से में गए हैं। अनिल देशमुख को गृह और उप मुख्यमंत्री अजित पवार को वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई है। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे को पर्यटन और पर्यावरण विभाग की जिम्मेदारी दी गई है। कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण पीडब्ल्यूडी मंत्री बनाए गए हैं।

कैबिनेट विस्तार के बाद शिवसेना विधायक अब्दुल सत्तार की नाराजगी की खबरें भी आई थी। कहा जा रहा था कि कैबिनेट मंत्री नहीं बनाए जाने से नाखुश सत्तार ने इस्तीफा दे दिया है। हालॉंकि फिलहाल उन्हें मनाने में पार्टी कामयाब हो गई है। औरंगाबाद से विधायक सत्तार राजस्व, ग्रामीण विकास, बंदरगाह भूमि विकास महकमे में राज्य मंत्री बनाए गए हैं।

बता दें कि कैलाश गोरंट्याल जालना में शिवसेना के अर्जुन कोटकर को विधानसभा चुनाव में हराकर विधायक बने थे। जालना कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष शेख महमूद ने बताया कि गोरंट्याल तीन बार से विधायक हैं और उन्होंने ज़िले में कॉन्ग्रेस को मज़बूत करने के लिए बहुत काम किया है। उन्होंने गोरंट्याल का समर्थन करते हुए कहा, “हमने पार्टी नेतृत्व को अपना इस्तीफा सौंपने का फ़ैसला किया है।”

कॉन्ग्रेसी खेमें में नाराज़गी का पहला सुर पुणे में सुनने को मिला था, जब 1 जनवरी को पुणे के विधायक संग्राम थोपटे के समर्थकों ने इसलिए कॉन्ग्रेस कार्यालय में तोड़-फोड़ की क्योंकि थोपटे को मंत्री पद नहीं दिया गया था। थोपटे के अलावा, पूर्व गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे की बेटी प्रणीति शिंदे को भी मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी गई थी। बता दें कि महाराष्ट्र कैबिनेट में कॉन्ग्रेस के 12 कॉन्ग्रेसी नेताओं को जगह मिली है। इसके अलावा, कैबिनेट विस्तार में एनसीपी विधायक प्रकाश सोलंके को जगह नहीं मिल सकी, महाराष्ट्र की मजलगाँव सीट से एनसीपी विधायक प्रकाश सोलंके का कहना था कि वो विधानसभा सदस्य के रूप में इस्तीफ़ा देंगे।

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जिस अस्पताल में मर गए 110 बच्चे, वहाँ कॉन्ग्रेसियों ने चलाए लात-घूँसे: नईमुद्दीन समर्थकों ने कपड़े फाड़े

कोटा के जेके लोन अस्पताल में दिसंबर से अब तक 110 बच्चों की मौत हो चुकी है। मौत के इस सिलसिले ने राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार के नकारेपन को उजागर कर दिया है। शनिवार (4 जनवरी 2020) को यह अस्पताल कोटा के कॉन्ग्रेसियों की गुटबाजी का भी शिकार बन गया। अस्पताल में ही कॉन्ग्रेस के दो गुट भिड़ गए। लात-घूॅंसों की बौछार के बीच कपड़े तक फाड़ डाले गए। जायजा लेने पहुॅंचे राज्य के उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट भी धक्का-मुक्की से बच नहीं पाए।

राजस्थान पत्रिका की रिपोर्ट के मुताबिक पायलट जैसे ही पहुॅंचे, अस्पताल के भीतर जाने के लिए कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता पुलिस के साथ धक्का-मुक्की करने लगे। रोके जाने पर कॉन्ग्रेसियों ने हंगामा किया। इस दौरान पायलट भी अपने ही पार्टी के कार्यकर्ताओं की धक्का-मुक्की की चपेट में आ गए। पायलट के जाने के बाद प्रदेश कॉन्ग्रेस सचिव नईमुद्दीन गुड्डु और उसके समर्थकों ने कॉन्ग्रेस नेता कुंदन यादव को अस्पताल परिसर में ही पीट डाला। कुंदन के कपड़े तक फाड़ डाले। किसी तरह पुलिस ने उन्हें बचाया। कॉन्ग्रेसियों के इस बवाल के कारण मरीजों और उनके तीमारदारों को परेशानी झेलनी पड़ी। काफी देर तक अस्पताल में अराजकता का माहौल रहा।

राजस्थान पत्रिका के कोटा संस्करण में 5 जनवरी 2020 को प्रकाशित खबर

वहीं, अस्पताल का निरीक्षण करने के बाद पायलट ने अपनी ही सरकार के लोगों पर निशाना साधते हुए कहा कि हम सालभर से सरकार चला रहे है। ऐसे में पूर्ववर्ती सरकार पर इल्जाम लगाने का कोई तुक नहीं बनता है। बकौल पायलट, सबकी जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।

पायलट से पहले प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री रघु शर्मा ने भी अस्पताल का दौरा किया था। इस दौरान उनके ही एक दावे की पोल खुल गई थी। शर्मा ने अस्पताल की खस्ताहालत का दोष पूर्ववर्ती भाजपा सरकार पर मढ़ने की कोशिश करते हुए कहा था कि कॉन्ग्रेस ने 2012 में इस अस्पताल के लिए 5 करोड़ रुपए का बजट मंजूर किया गया था। लेकिन, सरकार बदलने के बाद 5 करोड़ के बदले 1.7 करोड़ रुपए ही जारी किए गए। अब पता चला है कि अस्पताल के पास 6 करोड़ रुपए पड़े थे। लेकिन, इनका इस्तेमाल उपकरण वगैरह को ठीक करने के लिए नहीं किया गया।

इससे पहले प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कोटा में बच्चों की मौत को नागरिकता संशोधन कानून से भी जोड़ चुके हैं। 2 जनवरी को उन्होंने कहा था, “सीएए के खिलाफ पूरे देश में जो माहौल बना हुआ है, उससे ध्यान हटाने के लिए इस मुद्दे को उठाया जा रहा है। मैं पहले ही कह चुका हूॅं इस साल शिशुओं की मौत के आँकड़ों में पिछले कुछ सालों की तुलना में काफी कमी आई है।”

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‘राफेल उड़ा रहे होते अभिनंदन तो नतीजा अलग होता, लेकिन फैसला लेने में 10 साल लगा दिए’

राफ़ेल लड़ाकू विमान ख़रीद सौदे को लेकर हुए विवाद का ज़िक्र करते हुए पूर्व वायुसेना प्रमुख बीएस धनोआ ने शनिवार (4 जनवरी) को कहा कि इस तरह के विवाद रक्षा ख़रीदों को धीमा कर देते हैं। इससे सशस्त्र बलों की क्षमताओं पर असर पड़ता है। पूर्व एयर चीफ़ मार्शल ने आईआईटी बंबई द्वारा आयोजित ‘टेकफेस्ट कार्यक्रम’ में राफ़ेल विवाद का ज़िक्र किया और कहा,

“अगर अभिनंदन मिग-21 की जगह राफ़ेल उड़ा रहे होते, तो उस हवाई युद्ध (बालाकोट हवाई हमले के बाद भारत-पाकिस्तान गतिरोध के दौरान) का परिणाम अलग होता। वो राफ़ेल क्यों नहीं उड़ा रहे थे, क्योंकि आपको यह तय करने में दस साल लग गए कि आप कौन-सा विमान ख़रीदना चाहते हैं।” 

पूर्व वायुसेना प्रमुख ने इस बात का भी ज़िक्र किया कि बोफोर्स सौदा भी विवाद में रहा था, जबकि बोफोर्स तोप ‘अच्छे’ रहे हैं। उन्होंने कहा कि देश में ऐसी कई एजेंसियाँ हैं जो शिक़ायतें प्राप्त होने पर सौदों की जाँच करती है। उन्होंने कहा कि लोगों को विमानों की कीमतों के बारे में पूछने का अधिकार है, क्योंकि उसमें करदाताओं का पैसा लगा होता है।

पिछले साल सितंबर में सेवानिवृत्त हुए धनोआ ने कहा, “विवाद पैदा होने के चलते रक्षा (साजो सामान) के आधुनिकीकरण के धीमा पड़ने का बाद में आप पर असर पड़ता है।” उन्होंने कहा, “जैसा प्रधानमंत्री ने एक बयान दिया था। लोग इसे राजनीतिक (बयान) कह रहे हैं लेकिन सच्चाई यह है कि जो बयान उन्होंने दिया वह सही है। उन्होंने कहा, ”यदि हमारे पास राफ़ेल होता तो स्थिति पूरी तरह से अलग होती।”

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे (नरेंद्र मोदी सरकार को क्लिन चिट देने) पर एक उत्कृष्ट फ़ैसला दिया। उन्होंने कहा, “मैंने हमेशा ही व्यक्तिगत रूप से यह कहा है… जब राफ़ेल जैसा मुद्दा उछाला जाएगा, यदि आप रक्षा ख़रीद प्रणाली को राजनीतिक रंग देंगे तब पूरी प्रणाली पीछे छूट जाएगी। फिर अन्य सभी फाइलें भी धीमी गति से आगे बढ़ेंगी इससे बहुत से लोग सचेत होना शुरू हो जाएँगे।”

पीएम मोदी ने पिछले साल मार्च में कहा था कि पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर एयर स्ट्राइक के दौरान यदि भारत के पास राफ़ेल लड़ाकू विमान होते तो परिणाम अलग होता। धनोआ ने पूर्ववर्ती कॉन्ग्रेस नीत यूपीए सरकार का नाम लिए बगैर कहा,

”100 प्रतिशत यह (परिणाम) अलग होता। वह (अभिनंदन) राफ़ेल क्यों नहीं उड़ा रहे थे? क्योंकि आपने यह फैसला करने में 10 साल लगाया कि कौन-सा विमान ख़रीदा जाए। इसलिए यह (विलंब) आपको प्रभावित करता है।”

अभिनंदन ने हवाई झड़प के दौरान एक पाकिस्तानी विमान को मार गिराया था, लेकिन अपने मिग-21 विमान के गिरने के बाद वह पकड़ लिए गए थे। हालाँकि बाद में पाकिस्तान ने उन्हें भारत भेज दिया। पूर्व वायुसेना प्रमुख ने यह भी दोहराया कि 26/11 मुंबई आतंकी हमले और इससे पहले 2001 में संसद पर हुए हमले के बाद तत्कालीन सरकारों ने पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर हमला करने के वायुसेना के प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया था।

उन्होंने कहा, ”लेकिन फ़ैसला, जैसा कि मैं कहता रहा हूँ, राजनीतिक फ़ैसले होते हैं। यह (प्रस्ताव) उस वक्त स्वीकार नहीं किया गया। इसलिए इसने आतंकवाद को समर्थन देने वाले देश के अंदर यह विश्वास जगाया कि भारत, आतंकवादी हमले का जवाब नहीं देगा।” धनोआ ने कहा कि पाकिस्तानी वायु सेना (पीएएफ) को बालाकोट में भारतीय वायुसेना की एयर स्ट्राइक की भनक तक नहीं थी।

पूर्व वायु सेना प्रमुख ने कहा कि 1971 के (बांग्लादेश) युद्ध और 1999 के करगिल युद्ध के समय भी पाकिस्तानी थल सेना और पाकिस्तानी वायु सेना (पीएएफ) के बीच समन्वय का अभाव था। उन्होंने कहा, ”जब बालाकोट हुआ, पीएएफ को कोई जानकारी (भारतीय वायुसेना के हमले के बारे में) नहीं थी। बालाकोट में कोई टर्मिनल हथियार नहीं थे। यहाँ तक हम भी आश्चर्यचकित हैं।”

ख़बर के अनुसार, धनोआ ने यह भी कहा कि पठानकोट, उरी और पुलवामा में हुए आतंकी हमले ये संकेत देते हैं कि भारत के परंपरागत प्रतिरोध दुश्मन को भारतीय सरज़मीं पर आतंकी गतिविधियाँ करने से नहीं रोक पा रहे हैं। हालाँकि, यह (भारत के परंपरागत प्रतिरोध) अपने दुश्मन से कहीं बेहतर हैं। उन्होंने कहा, ”इस तरह, बालाकोट एयर स्ट्राइक को सरकार ने पाकिस्तान को यह संदेश देने के लिए मंज़ूरी दी कि आगे से इस तरह की हरक़तों की भारी क़ीमत चुकानी पड़ेगी।”

अपनी बात को जारी रखते हुए उन्होंने कहा, ”इस तरह के रणनीतिक आश्चर्य की एक वजह यह रही कि उन्होंने (पाकिस्तान ने) हमेशा ही हमारे नेतृत्व को कमतर आँका है। उन्होंने कभी उम्मीद नहीं की थी कि हमारा नेतृत्व बालाकोट एयर स्ट्राइक जैसी गतिविधि का आगे बढ़ कर जवाब देगा।”

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