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मौखिक दस्त से ग्रस्त गालीबाज अनुराग कश्यप शायद पागलपन के कगार पर, CAA को करेंगे f**k

‘डरा हुआ मुस्लिम नैरेटिव’ गढ़ने में शुमार रहे गालीबाज अनुराग कश्यप ने 9 अगस्त 2019 को यह कहते हुए अपना ट्विटर अकाउंट डिलीट कर दिया था कि “आप सभी की ख़ुशी और सफलता की कामना करता हूँ। यह मेरा आख़िरी ट्वीट है क्योंकि मैं ट्विटर अकाउंट डिलीट कर रहा हूँ। जब मुझे मेरे दिमाग में जो चल रहा है वो बिना डर के बोलने नहीं दिया जाएगा तो बेहतर है मैं कुछ भी ना बोलूँ। गुड बाय।”

मगर जैसे ही जामिया मिलिया इस्लामिया में हिंसा हुई, उन्होंने ट्विटर पर वापसी कर ली और आते ही एक बार फिर से ‘डरा हुआ मुस्लिम’ को बचाने के लिए मोदी सरकार और दिल्ली पुलिस पर भड़ास निकाली। इसके बाद अनुराग कश्यप लगातार मोदी सरकार के खिलाफ जहर उगलने में जुटे हुए हैं और साथ ही अपनी मूर्खता का भी परिचय दे रहे हैं।

इसी कड़ी में शनिवार (जनवरी 11, 2019) तड़के एक ट्वीट करते हुए अनुराग कश्यप ने लिखा, “आज CAA लागू हो गया। मोदी को बोलो पहले अपने कागज, अपनी डिग्री इन “entire political science” दिखाए, और अपने बाप का और ख़ानदान का birth सर्टिफ़िकेट दिखाए सारे हिंदुस्तान को। फिर हमसे माँगे। #f**k CAA”

अनुराग कश्यप के इस ट्वीट से साफ नज़र आ रहा है कि वो पागलपन के चरम पर पहुँच चुके हैं। इस पागलपन में प्रधानमंत्री के लिए अभद्र और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करते नज़र आ रहे हैं और साथ ही ये स्पष्ट दिख रहा है कि इन्हें चीजों को जानने में कोई दिलचस्पी नहीं है, और न ही इसका ज्ञान है, इन्हें तो बस मोदी सरकार का विरोध करके अपने प्रोपेगेंडा की दुकान चलानी है। क्योंकि अगर इन्होंने एक बार भी अच्छी तरह से नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के बारे में पढ़ा होता, तो इन्हें समझ में आता कि ये कानून देश में रह रहे नागरिकों के लिए नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक आधार पर प्रताड़ित हुए अल्पसंख्यकों को नागरिकता देना है।

मगर इन्हें इन बातों से क्या… इन्हें तो बस मोदी विरोधी राजनीति करके अपने जहरीले प्रोपेगेंडा को हवा देनी है। हालाँकि, अनुराग के इस ट्वीट के बाद यूजर्स ने उनकी जमकर क्लास लगाई। एक यूजर ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “दूसरों को क्यूँ कह रहे हो मोदी को बोलने को? हिम्मत है तो उनको सामने जाकर बोलो कि उनके बाप में दम है या नहीं? और “F**K” को अपनी सड़ी फ़िल्मों में दिखाने के लिए रखो ! #CAA पूरे देश में लागू #IndiaSupportsCAA #CAAJanJagran”

राकेश त्रिपाठी नाम के एक यूजर ने लिखा, “निरा मूर्ख है तू, काश कि तेरे अध्यापक ने कान के नीचे जमा कर कनपुरिया कंटाप दिया होता तो तेरी बुद्धि ठिकाने आ गई होती। #CitizenshipAmendmentAct में किससे सर्टिफिकेट माँगा गया है? मूर्खतापूर्ण बयानबाजी के बाद तेरा सर्टिफिकेट जरूर माँगा जाना चाहिए और शिक्षक पर जुर्माना लगाना चाहिए।”

वहीं एक यूजर ने लिखा कि इस तरह की मूर्खतापूर्ण टिप्पणी करके कृपया वो अपनी स्कूली पढ़ाई का अपमान न करें, क्योंकि स्कूल जाता बच्चा भी जानता है कि CAA किसी भारतीय से संबंधित नहीं है।

कृष्ण कौशिक नाम के एक यूजर ने लिखा, “बेटा तू तो कहाँ से बताएगा। पैदा नहीं assemble हुआ था तू।” एक अन्य यूजर ने लिखा, “तब चीख-चीख वो कहते थे भारत में “डर” लगता है..! अब निकलने की बारी आई तो भारत “घर” लगता है..!!”

गैरतलब है कि अनुराग कश्यप इससे पहले भी पीएम मोदी को अनपढ़ बताया था। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा था, “CAA/CAB कहीं नहीं जाने वाला है। इनके लिए कुछ भी वापस लेना नामुमकिन है क्योंकि वो उनके लिए हार होगी। यह सरकार हर चीज़ को हार-जीत में ही देखती है। इनका ईगो ऐसा है कि सब जल जाएगा, राख हो जाएगा लेकिन मोदी कभी ग़लत नहीं हो सकता। क्यों? क्योंकि अनपढ़ लोग ऐसे ही होते हैं।” हालाँकि इस ट्वीट के बाद भी इनकी काफी फजीहत हुई थी और हालिया ट्वीट के बाद ये साफ हो गया कि कौन अनपढ़ है!

अनुराग कश्यप ने फिर फैलाया झूठ: नरेंद्र मोदी के शब्दों को बताया हिटलर की पंक्ति, पर्दाफाश

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आतंकियों की गिरफ्तारी का बदला! शमीम और तौफिक ने पूरी प्लानिंग के साथ दिन-दहाड़े सब-इंस्पेक्टर को मार डाला

केरल की सीमावर्ती कन्याकुमारी ज़िले में एक वरिष्ठ सब-इंस्पेक्टर की रहस्यमय तरीक़े से हत्या करने के दो दिन बाद, जाँचकर्ताओं ने दोनों आरोपितों की पहचान कर ली है – अब्दुल शमीम (25 वर्ष) और तौफिक (27 साल)। जाँचकर्ताओं ने शमीम को “स्व-घोषित जिहादी” करार दिया है। उन्होंने शक़ जताया है कि इस सप्ताह बेंगलुरु में तीन कथित आतंकवादी संदिग्धों की गिरफ़्तारी का बदला लेने के लिए सब-इंस्पेक्टर की हत्या की गई।

ख़बर के अनुसार, सब-इंस्पेक्टर विल्सन (57 वर्ष) की बुधवार (8 जनवरी) को सुबह साढ़े नौ बजे के क़रीब तमिलनाडु के कालियाक्कविलाई के पास एक चेकपोस्ट पर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इसके अलावा, उनके शरीर पर चोट के भी निशान थे। पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज से आरोपित की पहचान कन्याकुमारी के शमीम और तौफ़िक (27) के रूप में की है।

पुलिस ने बताया कि शमीम 2014 में एक हिन्दू मुन्नानी नेता की हत्या के मामले में पिछले महीने ज़मानत मिलने के बाद से फ़रार था। एक पुलिस अधिकारी ने बताया, “उसके आत्मसमर्पण करने की संभावना नहीं है। वह एक ऐसा व्यक्ति है, जिसे अगर मौक़ा मिला तो वो गिरफ़्तारी से पहले आत्महत्या कर लेगा।

पुलिस को शुरुआती जाँच में लगा था कि दोनों आरोपित एक SUV कार से चेकपोस्ट पर पहुँचे थे। और कहीं सब-इंस्पेक्टर शमीम को पहचान न ले, इस डर से उसने विल्सन पर गोली चला दी होगी। लेकिन, अब पुलिस का मानना कि अपने संदिग्ध सहयोगियों मोहम्मद हनीफ़ खान (29), इमरान खान (32) और मोहम्मद जैद (24) को बेंगलुरु में गिरफ़्तार किए जाने का बदला लेने के लिए शमीम ने योजनाबद्ध होकर हत्या की वारदात को अंजाम देने की साज़िश रची थी।

पुलिस उप-महानिरीक्षक (तिरुनेल्वेली क्षेत्र) प्रवीण कुमार अबिनपु ने बताया,

“हमने दोनों आरोपितों (विल्सन की हत्या में शामिल) की पहचान कर ली है, हम जल्द ही उन्हें गिरफ़्तार कर लेंगे। हमारे पास जानकारी है कि बुधवार की देर रात हत्या के बाद वो दोनों केरल भाग गए हैं। वाहन जाँच के दौरान हत्या नहीं की गई थी।”

यह पूछे जाने पर कि क्या शमीम के सहयोगियों को गिरफ़्तार किया जाना इस हत्या का मक़सद था और इस हत्या के ज़रिए तमिलनाडु पुलिस को एक संदेश देना भी शामिल था? इसके जवाब में अबिनापु ने कहा, “हमें लगता है कि इस हमले के पीछे वही (सहयोगियों की गिरफ़्तारी) कारण है।”

इंडियन एक्सप्रेस के सूत्रों ने बताया कि सीसीटीवी फुटेज में शमीम और तौफ़िक को चेकपोस्ट के पास एक जमात कार्यालय की ओर भागते देखा गया। पुलिस ने बताया कि दोनों दूसरे दरवाज़े से भाग गए, जो केरल को जोड़ने वाली सड़क पर खुलता है।

पुलिस के अनुसार, आरोपित शमीम और दो अन्य- एस सैयद अली नवास (25) और सी खाजा मोइदीन (52) को बेंगलुरु में गिरफ़्तार किया गया था। ये तीनों पाँच साल पहले हिन्दू मुन्नानी नेता केपी सुरेश कुमार की हत्या के आरोप में जेल गए थे। पुलिस अधिकारी ने बताया, “वे तीनों ज़मानत पर बाहर आने के बाद एक महीने से अधिक समय से फ़रार थे। शमीम और नवास दोनों कन्याकुमारी से हैं, और मोइद्दीन कुड्डालोर से है।”

हिन्दू नेता सुरेश कुमार की हत्या के अलावा, मोईदीन का हाजा फकरुदीन (42) के साथ भी गहरा रिश्ता था। उसके सम्पर्क में आने के बाद वो आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट में कथित तौर पर युवाओं को भर्ती करने का काम करता था।

2017 में, NIA ने मोईदीन, फकरुदीन और अन्य के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया था और 13 मार्च, 2018 को एक आरोप पत्र भी दायर किया था। इसमें आरोप लगाया गया कि था कि मोईदीन ने “जनवरी, 2014 के दौरान सीरिया में ISIS/ ISIL/ Daish में शामिल होने के लिए हाजा फकरुदीन की असलियत जानते हुए उसकी सहायता की।” 12 दिसंबर, 2019 को ज़मानत पर छूटने के बाद, मोईदीन पर आरोप है कि उसने संभावित भर्तियों को जारी रखने के लिए दक्षिण बेंगलुरु क्षेत्र में कई बैठकें कीं।

बेंगलुरु में आयोजित बैठकों का हिस्सा आरोपित शमीम और तौफ़िक भी होते थे, इसमें मोइदीन हिस्सा लेता था। कन्याकुमारी में हत्या की वारदात को अंजाम देने के बाद से पुलिस आरोपितों की तलाश में जुट गई है। जानकारी के अनुसार, हत्या की घटना के करीब तीन दिन पहले शमीम और तौफिक बेंगलुरु में थे।

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फ्री कश्मीर फ्रॉम इस्लामिक टेररिज़्म: कश्मीरी पंडित ने 15 देशों के राजनयिकों को दिखाई ‘हकीकत’

आपने अक्सर कश्मीर में पाकिस्तान जिंदाबाद का नारे लगाते हुए, कभी सेना पर पत्थरबाजी होते हुए तो कभी प्रदर्शनकारियों द्वारा आईएसआई के समर्थन में झण्डा या पोस्टर को लहराते हुए देखा होगा। लेकिन शुक्रवार को जम्मू से एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसे हर एक देशभक्त अपनी आँखों से देखना चाहता है। इसमें दो कश्मीरी पंडित हाथों में एक पोस्टर लहराते हुए देखे गए। कश्मीरी पंडितों के हाथों में लगे इस पोस्टर पर लिखा हुआ था ‘फ्री कश्मीर फ्रॉम इस्लामिक टेररिज़्म’। यह तस्वीर ऐसे समय में सामने आई, जब कश्मीर की हालातों को जायजा लेने के लिए 15 देशों के राजनयिकों का एक प्रतिनिधिमंडल दौरे पर था।

अपने दौरे के दूसरे दिन यानी शुक्रवार (10 जनवरी,2020) को ये राजनयिक जम्मू के जगती प्रवासी टाउनशिप पहुँचे। जब राजनयिक टाउनशिप की ओर जा रहे थे तभी दो कश्मीरी पंडित फ्री कश्मीर फ्रॉम इस्लामिक टेररिज्म का पोस्टर लिए देखे गए।

आए दिन कश्मीर में पाकिस्तानी समर्थक हाथों में पत्थर लिए भारत से आज़ादी की माँग करते हैं। इसकी माँग के लिए वह हिंसक विरोध प्रदर्शन करने से नहीं चूकते। यहाँ तक कि इस दौरान प्रदर्शनकारी सेना पर पत्थरबाजी करने से भी नहीं चूकते। और ऊपर से पाकिस्तान आए दिन भारत की सेना पर कश्मीर में बेगुनाहों पर गोली चलाने और उनके साथ बर्बरता करने का झूठा आरोप लगाता रहता है। यहाँ तक कि पाकिस्तान इस झूठ को विश्व के विभिन्न मंचों पर भी उठाता रहा है। हालाँकि पाकिस्तान को हर जगह से मुँह की खानी पड़ी है।

अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त करने के बाद पहली बार 15 देशों के राजनयिक केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर के दौरे पर हैं। कश्मीर घाटी का जायजा लेने के बाद विदेशी प्रतिनिधियों ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में स्थानीय लोगों ने पाकिस्तान के उन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है, जिनमें पड़ोसी मुल्क द्वारा कहा जा रहा था कि घाटी में रक्तपात हो रहा है। इसके अलावा प्रतिनिधियों ने बताया कि कश्मीर के लोग पाकिस्तान के झूठ को पूरी तरह से खारिज करते हैं और वहाँ के लोगों का कहना है कि वो पाकिस्तान को एक इंच भी जमीन नहीं देंगे। साथ ही लोगों ने जम्मू-कश्मीर में हत्याओं के लिए पाकिस्तान को दोषी ठहराया और विदेशी राजनयिकों को पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए कहा। इससे पहले यूरोपीय संसद के सांसदों के एक समूह ने जमीनी हकीकत जानने के लिए जम्मू-कश्मीर का दौरा किया था।

दो दिवसीय यात्रा के पहले दिन के दौरान प्रतिनिधिमंडल श्रीनगर में सामान्य स्थिति के गवाह भी बने। उन्होंने कहा कि श्रीनगर की सड़कों पर आम दिन की तरह ही दुकानें खुलीं और सब कुछ बिलकुल सामान्य रहा। प्रतिनिधिमंडल ने जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक नेताओं से भी मुलाकात की थी। उनको सेना के 15 कोर मुख्यालय भी ले जाया गया, जहाँ उन्हें सेना के शीर्ष कमांडरों द्वारा कश्मीर में सुरक्षा स्थिति के बारे में जानकारी दी गई। विदेशी राजनयिकों के प्रतिनिधिमंडल ने सिविल सोसायटी के सदस्यों और स्थानीय मीडिया से भी मुलाकात की।

पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का नहीं? शशि थरूर ने भारत का ग़लत नक़्शा पोस्ट कर तो यही संदेश दिया!

जम्मू-कश्मीर में इस ‘साहसिक’ कदम के लिए अमेरिकी कॉन्ग्रेस के सांसद ने की मोदी की सराहना

जम्मू-कश्मीर में वर्षों से बंद 50 हजार मंदिर खोलने की तैयारी में सरकार, जल्द होगा सर्वे: गृह राज्यमंत्री

IIM-A के 90 से अधिक पूर्व छात्रों ने दिया CAA को समर्थन, पूरे देश में NRC लागू करने की माँग

देश में नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के समर्थन में अब IIM अहमदाबाद के 90 से अधिक पूर्व छात्रों ने समर्थन जाहिर किया है। इन छात्रों ने पूरे देश में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को भी जल्द लागू करने की माँग उठाई है।

वर्तमान में पूरे विश्वभर में अलग-अलग स्थानों पर नौकरी कर रहे IIM अहमदाबाद के 90 से अधिक छात्रों ने CAA के समर्थन में एक याचिका दायर की है। इन पूर्व छात्रों का कहना है कि CAA के साथ NRC लागू किए जाने से देश में किसी भी समुदाय को कोई खतरा नहीं है और इसके विरोध में झूठ और अफवाहें सिर्फ हिंसा फैलाने के लिए गढ़े जा रहे हैं। इसके अलावा इन छात्रों ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा संशोधित किया गया NRC देश के लिए बेहद जरुरी है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इन छात्रों ने देश भर में इस कानून (CAA) के विरोध में किए गए हिंसक प्रदर्शनों और पुलिस द्वारा शान्तिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे लोगों के खिलाफ भी भारी पुलिस बल इस्तेमाल करने के लिए उनकी निंदा की है। IIM अहमदाबाद के इन पूर्व छात्रों का मानना है कि देशभर में NRC लागू किए जाने से पड़ोसी देशों से भारत में घुसने वाले अवैध आप्रवासियों पर रोक लगेगी। बांग्लादेश द्वारा अपने नागरिकों को वापस बुलाने के लिए किए गए सहयोग की ओर इशारा करते हुए पूर्व छात्रों ने याचिका में लिखा है कि भारत NRC वाला अकेला देश नहीं है।

ज्ञात हो कि नागरिकता कानून को लेकर देशभर में एवं कई विश्वविद्यालयों में प्रदर्शन किए जा रहे हैं। एक बड़ा वर्ग यदि इस कानून के समर्थन में है तो वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे भी लोग हैं जो इस कानून सम्बंधित अफवाहों के माध्यम से लगातार हिंसा भड़काने का कार्य भी कर रहे हैं।

छात्रों द्वारा दायर याचिका की प्रति –

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जिन-जिन लोगों ने इस पर हस्ताक्षर किए हैं, उनके नाम (ज्ञात कारणों से) छिपा लिए गए हैं
‘

‘जिन्ना वाली आजादी’ के नारे से गूँजा शाहीन बाग: CAA के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन का पर्दाफाश, Video Viral

कॉन्ग्रेस और लेफ्ट गंदी राजनीति कर रहे, मैं उनके साथ नहीं: CAA-NRC पर ममता बनर्जी ने विपक्ष को मारी ‘लात’

7660% बढ़ गया कॉन्ग्रेस का ‘चंदा’… वो भी सिर्फ एक साल में! मंदी का रोना रोने वाली पार्टी मालामाल

देश भले ही मंदी के दौर से गुज़र रहा हो लेकिन देश की दो बड़ी राजनीतिक पार्टियों को चन्दा मिलने में कोई कमी नहीं आई है। कमी तो बहुत दूर दोनों ही पार्टियों को छप्पर फाड़कर चंदा मिला है। इतना ही नहीं कॉन्ग्रेस जैसी विपक्षी पार्टी भी इसमें पीछे नहीं रही। 2017-18 की तुलना में कॉन्ग्रेस ने अपनी आय में करीब चार गुना इजाफा किया है। पार्टी के चुनावी बॉन्ड की बात करें तो यह 5 करोड़ रुपए से बढ़कर 383 करोड़ रुपए पर पहुँच गई। सभी पार्टियों ने अपनी-अपनी ऑडिट रिपोर्ट को चुनाव आयोग को सौंप दिया है, वहीं से यह डेटा लिया गया है।

दरअसल कॉन्ग्रेस की पिछले वर्ष 2017-18 में आय कुल 199 करोड़ रूपए थी जो कि इस वर्ष 2018-19 में बढ़कर 918 करोड़ रुपए हो गई है। इसी के साथ कॉन्ग्रेस पार्टी की आय में करीब 361 प्रतिशत का इज़ाफा हुआ है। इस आय में 383 करोड़ रुपए चुनावी बॉन्ड से आए हैं, जो कि पिछले वर्ष यह राशि मात्र 5 करोड़ रुपए थी। हालाँकि कॉन्ग्रेस की आय भाजपा की आय के आधे से भी कम है।

वहीं देश सबसे बड़ी पार्टी भारतीय जनता पार्टी(BJP) की बात करें तो 2410 करोड़ रुपए के साथ बीजेपी की आय दो गुनी हुई है। अग़र वर्ष 2017-18 की बात करें तो बीजेपी की आय 1027 करोड़ रुपए थी। इस साल पार्टी की आय में करीब 134 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। वहीं इस आय में 1450 करोड़ यानी कि करीब 60 प्रतिशत हिस्सा चुनावी बॉन्ड के ज़रिए मिला है। वहीं पार्टी को पिछले वर्ष मात्र 210 करोड़ रुपए चुनावी बॉन्ड के जरिए मिले थे। बता दें कि बीजेपी को देश के सभी राजनीतिक दलों में सबसे अधिक चंदा मिला है।

दरअसल भारतीय स्टेट बैंक (SBI) राजनीतिक पार्टियों को चंदा देने के लिए चुनावी बॉन्ड ज़ारी करता है और इन पर नोटों की तरह कीमत छपी होती है। चुनावी बॉन्ड्स एक हजार, दस हजार, एक लाख, 10 लाख और एक करोड़ रुपए के मल्टीपल्स में खरीदे जा सकते हैं और ये ब्याज मुक्त होते हैं। इसे कोई भी व्यक्ति या कंपनी ख़रीद सकती है और उसे 15 दिन के अंदर इसे अपनी मनपसंद राजनीतिक पार्टी को देना होता है। हालाँकि इस ऑडिट रिपोर्ट के आने के बाद चुनावी बॉन्ड्स को लेकर राजनीतिक दलों में विवाद छिड़ गया है।

प्रियंका गाँधी के साथ UP कॉन्ग्रेस अध्यक्ष नाव से गंगा के रास्ते जा रहे थे रामघाट, लहरों में जा गिरे

₹575 करोड़ Pak को और पानी भी: गृहमंत्री और कैबिनेट के खिलाफ जाकर जब नेहरू ने लिया था वो फैसला

रट लें जनगणना में पूछे जाएँगे ये 31 सवाल, कोई 32वां गिनाए तो पत्थर ले सड़क पर न करें ‘छपाक’

Chhapaak अभी भी कानूनी पेंच में फँसा हुआ… वकील को क्रेडिट देने का मामला अब पहुँचा दिल्ली हाईकोर्ट

बॉलीवुड अभिनेत्री दीपिका पादुकोण अभिनीत फ़िल्म ‘छपाक’ तमाम विवादों के बीच अपनी तय दिन यानी शुक्रवार (10 जनवरी) को सिनेमाघरों में रिलीज़ तो हो गई, लेकिन इससे जुड़ा विवाद अभी भी थमने का नाम नहीं ले रहा है। एसिड अटैक पीड़िता लक्ष्मी अग्रवाल का केस लड़ने वाली वकील को क्रेडिट देने के निचली अदालत के फ़ैसले के एक दिन बाद Fox Studios और फ़िल्म की निर्देशक मेघना गुलज़ार ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक अपील दायर की है।

पटियाला हाउस कोर्ट में अपने आपराधिक मुक़दमे में एसिड अटैक पीड़िता लक्ष्मी अग्रवाल का केस लड़ने वाली अपर्णा भट्ट ने फ़िल्म ‘छपाक’ की रिलीज़ से ठीक पहले उसकी रिलीजिंग पर रोक लगाने की याचिका दायर की थी।

फ़िल्म में क्रेडिट न दिए जाने को लेकर महिला वकील अपर्णा भट्ट ने फेसबुक पर लिखा था कि कैसे वे इस बात से नाराज़ हैं कि फ़िल्म छपाक के मेकर्स ने उन्हें अपनी फ़िल्म में कोई क्रेडिट नहीं दिया। उन्होंने ये भी कहा था कि वे इस मामले में क़ानून की मदद लेंगी। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया था कि वो दीपिका पादुकोण और बाकी लोगों के बराबरी की नहीं हैं, लेकिन इस मामले में वे चुप नहीं बैठेंगी।

एसिट अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी अग्रवाल का केस लड़ने वाली महिला वकील अपर्णा भट्ट की याचिका पर सुनवाई के बाद, दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने गुरुवार (9 जनवरी) को छपाक की निर्देशक मेघना गुलज़ार को मूवी में वकील को उचित क्रेडिट देने का आदेश दिया था।

कोर्ट के आदेश में महिला वकील के दावों को वैध पाए जाने का उल्लेख था। कोर्ट का कहना था, “यह आवश्यक है कि वास्तविक फुटेज और चित्र प्रदान करके वकील के योगदान को स्वीकार किया जाए।” साथ ही कोर्ट ने निर्माताओं से फ़िल्म स्क्रीनिंग में लाइन जोड़ने के लिए भी कहा कि “अपर्णा भट्ट महिलाओं के प्रति यौन और शारीरिक उत्पीड़न के मामलों से लड़ती रहती हैं।”

इस आदेश में उल्लेख किया गया था कि अगर अपर्णा भट्ट को क्रेडिट दिए बिना वास्तविक फुटेज और छवियों को फ़िल्म की स्क्रीनिंग दिखाई जाती है, तो यह महिला वकील के साथ एक गंभीर अन्याय होगा और यह भट्ट के योगदान और उनके प्रयासों को जनता तक पहुँचाने से भी रोकेगा।

बॉलीवुड फ़िल्म ‘छपाक’ लगातार विवादों से घिरती जा रही है, वहीं दूसरी तरफ़ अभिनेत्री दीपिका पादुकोण ने फ़िल्म के प्रमोशन का दाँव खेलते हुए मंगलवार (7 जनवरी) को JNU हिंसा में वामपंथी छात्रों से मिलकर एक और विवाद को हवा दे डाली। दीपिका पादुकोण उन वामपंथी छात्रों के समर्थन में खड़ी थीं, जिन्होंने शीतकालीन सेमेस्टर के लिए पंजीकरण कराने वाले छात्रों के साथ न सिर्फ़ हिंसा की बल्कि सर्वर रूम पर क़ब्ज़ा कर पूरी पंजीकरम व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया था।

पादुकोण ने, छात्रों के साथ अपनी एकजुटता दिखाने के लिए, पंजीकरण की प्रक्रिया के दौरान वामपंथी गुंडों द्वारा पीटे गए असली पीड़ितों की अनदेखी करते हुए आरोपित आइशी घोष और उसके दोस्तों से मुलाक़ात की।

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प्रियंका गाँधी के साथ UP कॉन्ग्रेस अध्यक्ष नाव से गंगा के रास्ते जा रहे थे रामघाट, लहरों में जा गिरे

कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव व यूपी प्रभारी प्रियंका गाँधी शुक्रवार (जनवरी 10, 2019) को वाराणसी पहुँचीं। वो यहाँ पर नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के खिलाफ गिरफ्तार हुए लोगों से मिलने गईं थीं। उन्होंने पहले राजघाट पर स्थित रविदास मंदिर में दर्शन किया। इसके बाद वह नाव से गंगा के रास्ते रामघाट पहुँचीं।

इस दौरान प्रियंका के साथ नाव पर जाते वक्त यूपी कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष अजय सिंह लल्लू गंगा की लहरों में जा गिरे। नाव पर चढ़ते समय संतुलन बिगड़ गया, जिससे अजय सिंह का पाँव फिसला और वो गंगा में गिर गए। हालाँकि वहाँ मौजूद सुरक्षाकमिर्यों और कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने उन्हें तुरंत संभाल लिया। 

रविदास मंदिर में दर्शन करने के बाद प्रियंका गाँधी ने विजिटर बुक में लिखा, “मैं लंबे समय से यहाँ आना चाहती थी। रविदास मंदिर में दर्शन करने की मेरी इच्छा आज पूरी हो गई है। रविदास समुदाय के लोगों और मंदिर के सभी सेवादारों को बहुत-बहुत बधाई और धन्यवाद।” इसके बाद उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर में भी दर्शन किया।

इस दौरान प्रियंका गाँधी ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के सामाजिक कार्यकर्ताओं और छात्रों समेत 59 लोगों से मिली, जो कि 19 दिसंबर 2019 को सीएए के खिलाफ विरोध करने को लेकर जेल गए थे। हाल ही में वो जमानत पर रिहा हुए थे। प्रियंका गाँधी ने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी एक ऐसी लीगल सेल बनाएगी, जो सीएए के विरोध में देश भर में जेल जाने वाले लोगों को मुकदमा लड़ने में न्यायिक सहायता दे सके। आगे प्रियंका ने कहा कि CAA के विरोध में जेल जाने वालों के साथ उनकी पार्टी खड़ी है। कॉन्ग्रेस पार्टी की सरकार आएगी तो सभी के मुकदमे खत्म किए जाएँगे। इस समय मुकदमा लड़ने में कॉन्ग्रेस पार्टी मदद करेगी। 

हालाँकि, इस दौरान कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं और मीडिया को मंदिर से दूर रखा गया, जिसका कॉन्ग्रेसी कार्यकर्ताओं ने विरोध किया। कार्यकर्ताओं ने अपनी ही पार्टी के नेताओं पर आरोप लगाया कि वे उन्हें प्रियंका से मिलने नहीं दे रहे। पंचगंगा घाट और राजघाट पर प्रियंका गाँधी से मिलने गए कार्यकर्ता रोके जाने पर नाराज होकर आपस में ही भिड़ गए और वहाँ उत्पात भी मचाया जिससे थोड़ी देर के लिए अफरा-तफरी मच गई। कार्यकर्ता इतने पर भी नहीं रूके और राजघाट पर प्रियंका से मिलने के लिए जमकर धक्का-मुक्की भी की। 

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इंडिया टुडे के जासूस पत्रकार जमशेद खान ने ‘पैदा किया’ ABVP छात्र नेता, ABVP ने किया इंकार

इंडिया टुडे ने दावा किया है कि उनकी खोजी पत्रकारों की एक टुकड़ी ने JNU हिंसा के आरोपित को पकड़ लिया है। हालाँकि ABVP ने किसी अक्षत अवस्थी के ABVP से जुड़े होने की खबर से साफ़ इंकार कर दिया है।

इंडिया टुडे ने एक वीडियो ट्वीट करते हुए कहा है कि JNU हिंसा पर उनके द्वारा की गयी ‘मेगा इन्वेस्टिगेशन’ का यह पहला पार्ट है। इंडिया टुडे समूह के पत्रकार राहुल कंवल इस वीडियो में बता रहे हैं कि किस प्रकार उनके 2 खोजी पत्रकारों- जमशेद खान और नितिन जैन की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम ने कथित ABVP कार्यकर्ता अक्षत अवस्थी का पर्दाफाश किया है।

इंडिया टुडे के अनुसार, अक्षत अवस्थी JNU में BA प्रथम वर्ष के छात्र हैं और वो JNU में 5 जनवरी को हुई हिंसा के पहले आरोपित हैं। इस वीडियो में अक्षत नाम का यह युवक बता रहा है कि हिंसा की रात उसने पेरियार हॉस्टल से डंडा निकाला था। इस वीडियो में अक्षत नाम के युवक को यह भी कहते देखा जा रहा है कि वह कानपुर से है और वहाँ यह सब आम है।

इसके जवाब में ABVP ने अपने ट्विटर अकाउंट से ट्वीट में लिखा है कि अक्षत अवस्थी नाम का कोई भी छात्र ABVP से नहीं जुड़ा हुआ है। ट्वीट में स्पष्टीकरण देते हुए लिखा गया है- “जैसा कि इंडिया टुडे समूह दवा कर रहा है, अक्षत अवस्थी ना ही ABVP कार्यकर्ता है और ना ही उनके पास ABVP में कोई पद है। इंडिया टुडे समूह द्वारा यह कैम्पेन सिर्फ तथ्यों से ध्यान भटकाने के लिए चलाया जा रहा है।”

ख़ास बात यह है कि इंडिया टुडे अपनी इन्वेस्टिगेशन का यह वीडियो लेकर ऐसे समय में आया है जब दिल्ली क्राइम ब्रांच के डीसीपी ने JNU में हुई हिंसा का खुलासा करते हुए इसमें 4 लेफ्ट ग्रुप का हाथ बताया है। उन्होंने कहा कि व्हाट्सएप ग्रुप, प्राइम विटनेस के आधार पर आरोपितों तक पहुँचना मुमकिन हो सका, क्योंकि विश्विद्यालय के छात्रों ने 4 जनवरी को सीसीटीवी को डैमेज कर दिया था।

डीसीपी का कहना है कि 4 जनवरी को ही जेएनयू के सीसीटीवी को डैमेज कर दिया गया था, जिसकी वजह से जाँच करने में काफी दिक्कतें हुईं। हालाँकि वहाँ पर मौजूद लोगों के द्वारा मोबाइल से बनाए वीडियो और विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसमें काफी मदद की। पुलिस ने अब तक सभी आरोपितों की तस्वीरें भी जारी कर दी है।

ऐसे में इंडिया टुडे समूह की इस ‘मेगा इन्वेस्टिगेशन’ की सच्चाई संदेहास्पद ही मानी जा सकती है।

शिकारा: कश्मीरी पंडितों की कहानी के वो हिस्से जो अब तक छुपाए गए हैं!

पहली बार ऐसा है, जब एक महीने का इंतज़ार काफी लंबा लग रहा है। पहली बार लग रहा है कि हर एक दिन गिनना पड़ेगा शायद, या दिन मुश्किल से कटे। वो भी किसलिए? एक मूवी के लिए। मूवी, एक ऐसे सब्जेक्ट पर है जिस पर कभी किसी ने मुँह खोला तो आस-पास से सबने होंठों पर उंगलियाँ रखवाईं। ऐसा सब्जेक्ट जिस पर देश की सरकारों ने अपना मुँह तो सिला ही साथ ही उस समय की मीडिया ने भी मुँह सिल लिया था और तथाकथित सेक्युलरों, बुद्धिजीवियों ने तो हमेशा ही इस विषय को लेकर गाँधी जी के तीन बंदरों की तरह आँख, कान और मुँह ढँक लिया। बस उनका संदेश उन बंदरों से अलग था।

उन तथाकथित सेक्युलरों, बुद्धिजीवियों का संदेश था कि, देश में अगर कहीं बहुसंख्यकों पर अत्याचार हो रहा है तो चुप रहो, उधर मत देखो, उनकी मत सुनो फिर भले ही वो दर्द से चीख-चिल्ला रहे हों; उनका सब लुट चुका हो, वो अपने ही मकानों से उजाड़े जा रहे हों; कोई उनके ही घर में घुस कर उनके घरों को जला दे, उनकी बहु-बेटियों का बलात्कार करे लेकिन उधर मत देखो, इस पर मत बोलो, उनकी चीखें मत सुनो। 

आखिर क्यों? क्योंकि इस देश में वो बहुसंख्यक हैं। इनके लिए बोलने पर देश की धर्मनिरपेक्षता खतरे में आ जाएगी, इनका साथ दे देने पर ‘बुद्धिजीवी’ नाम का तमगा हाथ से छीन जाएगा। क्योंकि ये कभी न तो बुद्धिजीवी रहे न ही धर्मनिरपेक्ष। क्यों इस देश में धर्मनिरपेक्ष होने का मतलब सिर्फ ’एंटी मेजोरिटी’ बन कर रह गया? ये सवाल उन तथाकथित सेक्युलरों और बुद्धिजीवियों के तबके के मुँह पर ऐसा सवाल है, जिसका जवाब शायद उन्हें कहीं और कभी नहीं मिलेगा।

लेकिन आज उस घटना के 29 सालों के बाद कुछ लोगों ने हिम्मत जुटाई है। जब जनता इन तथाकथित सेक्युलरों और बुद्धिजीवियों के साज़िश से निकल रही है। आज इनका घिनौना सच सामने आ रहा है क्योंकि आज जनता के सामने सोशल मीडिया से लेकर कई तरह के अन्य साधन हैं, जहाँ से वो सटीक जानकारियों तक पहुँच सकते हैं। आज जनता को सूचनाओं के लिए बिके हुए मीडिया संस्थान के आसरे नहीं रहना पड़ रहा है।

आज जब ऐसी सरकार है, जो वाकई धर्मनिरपेक्षता को धर्मनिरपेक्षता के रूप में ही देखती है न कि बहुसंख्यकों के बेवज़ह विरोध को या मुस्लिमों के तुष्टिकरण को धर्मनिरपेक्षता कहती है, तब किसी ने इस विषय को छुआ है और इस पर एक फिल्म बनाई है। वो फिल्म है ‘शिकारा’ और इसका विषय है वर्ष 1990 में कश्मीर से निकाले गए कश्मीरी पंडित।

जनवरी 1990 में अलगाववादियों और आतंकियों ने मिलकर कश्मीर से कश्मीरी पंडितों को उन्हीं के घर से उन्हें निकाल दिया, उन्हीं की ज़मीन से उन्हें बेदखल किया, कश्मीरी पंडितों की औरतों से नृशंसतापूर्वक बलात्कार किया, उनकी हत्याएँ की। ऐसा न केवल साधारण कश्मीरी पंडित बल्कि, ऐसे कश्मीरी पंडितों के भी साथ हुआ, जो सरकारी ओहदे पर थे। उन दिनों में चरमपंथी, अलगाववादी इश्तिहारों, पोस्टरों के ज़रिए कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़ने के लिए धमकाते थे, फिर सामने आकर लोग डराने लगे तब भी उन्हें आशा थी कि ये 7-8 लाख लोगों का मामला है, सरकार जल्द ही कुछ करेगी।

सरकार जल्द ही कोई भरोसेमंद कदम उठाएगी, बुद्धिजीवी कुछ तो बोलेंगे, मीडिया लोगों तक उनकी बात पहुँचाएगी। यह सोचकर वो कश्मीरी पंडित कश्मीर में रुके रहे किंतु कहीं से कोई मदद नहीं आई और अंततः 19 जनवरी 1990 की रात को लाखों कश्मीरी पंडितों को कश्मीर से भागना पड़ा।

जाइए जम्मू के जगती कैंप में और देखिए अपने ही देश में अपने ही घर, अपनी जमीन से भगा दिए गए लोग कैसे रह रहे हैं! जाइए दिल्ली के मजनू का टीला और देखिए वहाँ के कश्मीरी पंडितों के कुछ परिवारों की हालत। देखिए उनकी महिलाएँ क्या काम करने को मजबूर हैं! इनके लिए संविधान क्या कहता था 1990 में? इनके लिए संविधान अब क्या कहता है? इसके लिए न्यायपालिका क्या कह रही थी 1990 में? इनके लिए न्यायपालिका अब क्या कह रही है? इनको फिर से बसाने के लिए क्या किया जा रहा है?

ऐसा नहीं कि विस्थापित कश्मीरी पंडित अपने-अपने घरों को नहीं लौटना चाहते, लेकिन उनका सवाल है और जायज सवाल है, “हमारी सुरक्षा की गारंटी कौन देगा और वापस लौटकर हम अपनी रोज़ी रोटी कैसे कमाएँगे? वो लोग इस समय कहीं नहीं हैं, उनका अपना कुछ नहीं है। उनका रेजिडेंस प्रूफ रोज बदलता है, जिनके अपने ढेर सारे कमरों वाला मकान था।

कहाँ हैं वो धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी? कहाँ है वो प्रगतिशील मुस्लिमों का झुंड, जो तब तो हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई की माला जपने लगते हैं जब कम संख्या में होते हैं और संख्या में बढ़ते ही उस जगह को हिन्दुओं या अन्य धर्म के लोगों के लिए नरक बना देते हैं? क्यों नहीं उस वक़्त उन्होंने वो एकता दिखाई? क्यों नहीं वो सड़कों पर आए? आखिर क्यों?

आखिर क्यों हर बार इस देश में बहुसंख्यकों से ही उम्मीद कि जाती है कि वही चुप रहे? क्यों बहुसंख्यक, बहुसंख्यक होने की कीमत चुका रहा? क्यों बहुसंख्यक को कहा जाता है कि वो अपनी रोटी का हिस्सा मुस्लिमों को दे जबकि वही मुस्लिम जैसे ही किसी जगह पर बहुसंख्यक की स्थिति में आते हैं, वैसे ही हिन्दुओं के हिस्से की रोटी तो छीन कर खा ही जाते हैं, साथ में उनकी बहू-बेटियों को भी नहीं बख्शते हैं।

आज भी उन सबके मुँह सिले हुए हैं, जिनके मुँह आज से 29 साल पहले सिले हुए थे। लेकिन आज एक सरकार है, जो अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण करने के लिए बहुसंख्यकों को सताती नहीं है कम से कम। मेजॉरिटी को मेजॉरिटी होने की कीमत चुकानी नहीं पड़ती है कम से कम। इसलिए किसी ने कोशिश की है इस विषय पर मूवी बनाने की और वाकई हर दिन उंगली पर गिना जाएगा अब तो। पहली बार किसी मूवी को पहले ही दिन देखना है। नोट किया जाए, 7 फरवरी, 2020 को ‘शिकारा’ रिलीज़ हो रही है।

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ईसाई प्रचारक का अपहरण कर 4 मुस्लिमों ने की लूटपाट, कहा- इस्लाम कबूल करो, नहीं तो चाकू मार देंगे

नॉर्वे के ट्रोंडहेम में इस्लामिक कट्टरपंथी का चेहरा पर्दाफाश हुआ है। जहाँ चार मुस्लिम युवकों ने एक ईसाई मार्ग-उपदेशक (स्ट्रीट प्रीचर) के साथ पहले मारपीट की, उन्हें लूटा और फिर उनके आगे विकल्प रखा कि या तो वो इस्लाम कबूल कर लें, नहीं तो वे उन्हें जान से मार देंगे। पीड़ित की पहचान रोर फ्लॉटम के रूप में हुई है और घटना 28 नवंबर की है।

बार्नाबस फंड की रिपोर्ट के अनुसार रोर ने बताया कि वे लगातार घूम-घूमकर लोगों को धार्मिक उपदेश देते हैं। साथ ही बीमार लोगों के लिए सड़कों पर प्रार्थना भी करते हैं। लेकिन, 28 नवंबर को उनकी मुलाकात चार लोगों से हुई, जो चाहते थे कि फ्लॉटम उनके घायल दोस्त के लिए प्रार्थना करें।

हालाँकि, पहले इन लोगों ने रोर से कहा कि उनके दोस्त के पाँव में चोट आई है, जो एंबुलेंस का इंतजार कर रहा है। लेकिन बाद में इन्होंने फ्लॉटम को सीढ़ी से नीचे ढकेल दिया। उनसे मारपीट की। उनका मोबाइल फोन, बैंक कार्ड छीन लिया। उनके बैंक अकॉउंट से 10,000 क्रोना (1000$) निकाले और उन्हें बंधक बना लिया। इसके बाद अपहरणकर्ताओं ने धर्म उपदेशक पर दबाव बनाया कि वे अरबी शब्दों को उनके पीछे दोहराएँ। दरअसल, वे चाहते थे कि रोर इस्लाम कबूल कर लें।

फ्लॉटम के अनुसार, “वे चारों लोग चाहते थे कि मैं अरेबिक में वो शब्द बोलूँ। मैं डर गया था और मेरे मन में ख्याल आ रहा था कि वे मुझे मार देंगे क्योंकि उन्होंने कहा था कि उनके पास चाकू है और उन्हें कोई गवाह नहीं चाहिए।”

गौरतलब है कि ये पूरा मामला लगभग डेढ़ महीने पुराना हो चुका है। इसपर जाँच अभी भी चल रही है। लेकिन फिलहाल अभी तक इसमें कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है।

फ्लॉटम आज भी काफी इस घटना पर यकीन नहीं कर पाते कि उनके साथ ऐसा कुछ हुआ। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उनका कहना है कि वे बतौर उपदेशक दोबारा सड़कों पर निकलकर अपना कार्य करने पर विचार कर रहे हैं।

उनका कहना है, “मैं सड़कों पर बहुत निकलता हूँ, लेकिन ऐसा मैंने कभी महसूस नहीं किया था। मेरे लिए वो दिन अभी भी कल जैसा है। इस घटना के बाद मैं बहुत आघात हूँ। लेकिन मुझे नहीं लगता कि ये घटना मुझे मेरा काम करने से रोकेगी। मैं सिर्फ़ लोगों को ईश्वर के प्रेम के बारे में बताता हूँ।” बता दें कि नॉर्वे में 5.7 प्रतिशत जनता मुस्लिम की है। जिनमें सुन्नी समुदाय के मुस्लिम बहुसंख्यक हैं और शिया मुस्लिम अल्पसंख्यक।