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JNU हिंसा में वामपंथी हुए बेनकाब! एक मोबाइल नंबर, एक व्हॉट्सअप ग्रुप और कई स्क्रीनशॉट से पर्दाफाश

जेएनयू के हॉस्टलों में घुसकर छात्रों के साथ हुई हिंसा निस्संदेह ही शर्मनाक घटना है। लेकिन इस घटना के लिए बिन सोचे समझे केंद्र सरकार या फिर एबीवीपी पर हमलावर हो जाना उतना ही अधिक निंदनीय। रविवार की रात मुँह पर नकाब पहने और हाथ में लाठी लिए परिसर में घुसे कुछ दंगाई कौन थे? कहाँ से आए थे? किस समूह से थे? ये किसी को नहीं मालूम। मगर फिर भी अगर सोशल मीडिया पर देखें तो कुछ ही पल में एक नैरेटिव तैयार किया गया कि ये सब भाजपा के छात्र संघ एबीवीपी का किया धरा है। और तो और ये लोग प्रोपेगेंडा के तहत आनन-फानन में गृहमंत्री से इस्तीफा भी माँगने लगे!

इस पूरे प्रकरण में एबीवीपी के छात्र खुद काफी चोटिल हुए और घटना के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शन में उनकी मौजूदगी भी अन्य समूह जितनी ही रही। लेकिन, फिर भी इसी बीच वामपंथी गिरोह के लोगों द्वारा अपना नैरेटिव सिद्ध करने के लिए, कुछ व्हॉट्सअप चैट वायरल की जाने लगीं और दावा किया गया कि जेएनयू में जो कुछ हुआ, वो सब पहले से निर्धारित था।

उल्लेखनीय है कि इन व्हॉट्सएप स्क्रीनशॉट्स की क्या प्रमाणिकता है, ये किसी को अभी तक नहीं मालूम। मगर, फिर भी जेएनयू की पूर्व अध्यक्ष गीता द्वारा शेयर किए गए स्क्रीनशॉट्स से लेफ्ट का ही पर्दाफाश हो गया… वो कैसे? आइए जानें…

दरअसल, एबीवीपी को बदनाम करने के लिए जिस ग्रुप चैट का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर जेएनयू की पूर्व अध्यक्ष गीता द्वारा शेयर किया गया, उसमें कई नंबर साफ नजर आए। ऐसे में जब इन नंबरों की पड़ताल हुई तो एक नंबर उसमें अमन सिन्हा नामक छात्र का निकला।

अमन सिन्हा द्वारा साल 2016 में किए ट्वीट पर उसका नंबर साफ तौर पर लिखा है। जबकि उसका फेसबुक अकॉउंट देखने पर पता चलता है कि अमन सिन्हा, जिसका नंबर लेफ्ट टेरर डाउन नामक ग्रुप में है और जिसे लेकर दावा किया जा रहा है कि वो एबीवीपी का ‘गुंडा’ है। उसका लेना-देना संघ या भाजपा से नहीं, बल्कि कन्हैया कुमार, उमर खालिद जैसे वामपंथियों और कट्टरवादियों से है। जिनके द्वाया आयोजित कार्यक्रमों में अक्सर उसे देखा जाता है।

अमन सिन्हा की वॉल पर, उसके द्वारा शेयर की गई तस्वीरों से साफ पता चलता है कि इस पूरे कारनामे को सुनियोजित ढंग से अंजाम देने के लिए किसने अपनी भूमिका निभाई।

सोशल मीडिया पर खुलासा होते ही, अन्य यूजर भी अमन सिन्हा से जुड़े कई तथ्य निकालकर लेकर आने लगे। लोगों ने पूछा कि क्या ये वही छात्र है, जिसने अफजल गुरु के शहीदी के नारे लगाए और उसके पोस्टर लेकर घूमा था।

गौरतलब है कि अभी तक रविवार को जेएनयू में छात्रों पर हुए हमले के पीछे लोगों की पहचान का खुलासा नहीं हुआ है। लेकिन लेफ्ट द्वारा लगातार एबीवीपी हमला बोलना खुद उन्हें सवालों के घेरे में घेर रहा है। सोशल मीडिया पर एक ओर जहाँ कई लोग इस हिंसा के लिए उचित कार्रवाई की माँग कर रहे हैं। तो वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो प्रत्यत्क्ष रूप से लेफ्ट को जिम्मेदार बता रहे हैं और अमन सिन्हा का खुलासा होने के बाद उनसे सवाल भी कर रहे हैं।

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…जब आसिफा अपने बच्चों के साथ फँस गईं तो CRPF ने बर्फ में 12 Km पैदल चल पहुँचाया खाना: मिसाल नहीं, परंपरा है यह

भारतीय सेना और सुरक्षा बलों के जवानों के अदम्य साहस की कहानियों से पूरा देश बख़ूबी वाक़िफ़ है। ऐसे क़िस्से कई बार हमारे सामने आए हैं, जहाँ जवानों ने बिना अपनी जान की परवाह किए ज़रूरतमंदों की मदद करके अपने कर्तव्य को पूरी ईमानदारी के साथ पूरा किया। ऐसा ही एक ताज़ा मामला जम्मू-कश्मीर का है। दरअसल, 2 जनवरी को रामबन के पास राष्ट्रीय राजमार्ग में पर भूस्खलन की वजह से आसिफा का परिवार जाम में फँस गया था।

विषम परिस्थितियों में आसिफा ने शाम को 5:30 बजे केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF) की ‘मददगार’ हेल्पलाइन पर सम्पर्क साधा और बताया कि उनका परिवार जाम में फँसा हुआ है। आसिफा ने फोन पर बताया कि उनके बच्चे भूखे हैं और उन्होंने सुबह से कुछ नहीं खाया है। इतना सुनते ही CRPF की 157वीं बटालियन तुरंत एक्शन में आ गई और दाल-चावल, दो-ढाई लीटर दूध, 6 लीटर गर्म पानी, फल और बिस्किट के पैकेट बाँधकर पैदल ही बर्फ़ीले रास्ते पर निकल पड़े। इस टीम में CRPF के जवान जमा देने वाली कड़ाके की ठंड में 12 किमी तक पैदल चले और आसिफा तक पहुँचे।

CRPF की 157वीं बटालियन के कमांडेंट डीपी यादव ने नवभारत टाइम्स ऑनलाइन को बताया कि जम्मू-कश्मीर राजमार्ग पर रामबन के डिगडोल इलाक़े में फँसी आसिफा ने CRPF के जवानों से अपने भूखे बच्चों को खाना मुहैया कराने की मदद माँगी थी। इसके बाद टीम में इंस्पेक्टर रघुवीर सिंह समेत CRPF के अन्य जवानों के साथ खाने का सामना और दूध लेकर पहुँचे।

ख़बर के अनुसार, इंस्पेक्टर रघुवीर सिंह ने बताया कि उनके लिए बच्चों तक खाना पहुँचाने का काम अलग तरह का था। उन्होंने बताया कि इस काम के लिए तुरंत 6 जवानों की टीम बनाई गई। 2 किमी पैदल चलने के बाद उन्हें मार्ग पर लंबा जाम दिखा, लेकिन, उस परिवार तक पहुँचने में कुल 12 किमी चलना पड़ा। उन्होंने बताया कि महिला का फोन आया था इसलिए उन्हें और उनकी टीम को आसिफा के परिवार को खोजने में किसी तरह की कोई समस्या नहीं हुई। 

इंस्पेक्टर ने बताया कि वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि आसिफा के दो बच्चे हैं, जिनमें से एक की उम्र 3 साल और दूसरे की उम्र 4 साल थी और वो भूख से बेहाल थे। इस दौरान उन्होंने बच्चों और उनके परिवार से कहा,

“हमने कहा कि घबराने की ज़रूरत नहीं है। खाना आ गया है। यह सुनकर उनके चेहरे पर चमक आ गई। बच्चों के होंठों पर मुस्कान आ गई। हमने उस परिवार से कहा कि हमारे साथ चलिए, लेकिन गाड़ी में बैठी दोनों महिलाओं ने पैदल चलने में असमर्थता जताई।”

इसके बाद इंस्पेक्टर सिंह ने कहा कि अगर जाम नहीं खुलेगा तो वो उनकी मदद के लिए उन्हें उठाकर अगले स्टेशन तक ले चलेंगे। इस पर महिलाओं का कहना था कि वो अपने बच्चों के साथ वहीं रुकेंगी। उन्होंने कहा कि जाम में और भी बहुत सी गाड़ियाँ फँसी हुई हैं, इसलिए उन्हें किसी तरह का कोई ख़तरा नहीं है, उन्हें सिर्फ़ खाना चाहिए था।

पूरी घटना के सन्दर्भ में इंस्पेक्टर रघुवीर सिंह का कहना था कि बच्चों ने जब तक खाना खा नहीं लिया, तब तक वो और उनकी टीम वहीं रुके रहे। उन्होंने आसिफा को अपना फोन नंबर भी दिया और कहा कि अगर उन्हें और खाने की ज़रूरत हो तो बताएँ। इतना कहकर जवानों की टीम वहाँ से रवाना हो गई और रात को 11 बजे अपने कैंप में पहुँच गए। इंस्पेक्टर सिंह ने बताया कि यह बात बहुत सुकून देने वाली थी कि जम्मू पहुँचने पर उस परिवार का फोन आया और उन्होंने CRPF का शुक्रिया अदा किया।

ग़ौरतलब है कि कश्मीर में टेलीफोन सेवा बंद होने पर ‘मददगार’ हेल्पलाइन ने हज़ारों लोगों की मदद की थी। इसने देश के अलग-अगल हिस्सों में रहने वाले लोग जो कि कश्मीर में परिजनों के साथ सम्पर्क नहीं कर पा रहे थे, उनके लिए भी इस हेल्पलाइन को शुरू किया गया था। लोग ‘14411’ नंबर और 9469793260 नंबर पर सम्पर्क कर कश्मीर में अपने परिजनों से सम्पर्क कर पा रहे थे। इस हेल्पलाइन से बाबा अमरनाथ की वार्षिक यात्रा में भी लोगों की मदद की थी।

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‘रजिस्ट्रेशन कराने गईं छात्राओं के प्राइवेट पार्ट पर हमला, बाथरूम ले जाकर दुर्व्यवहार’ – JNU मामले में गंभीर आरोप

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में रविवार (जनवरी 5, 2019) शाम वामपंथियों ने एक बार फिर से हिंसा को अंजाम दिया। इस दौरान मास्क पहने वामपंथी गुंडों ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं की पिटाई करने के साथ ही लड़कियों के प्राइवेट पार्ट पर हमला किया, कई लड़कियों के साथ बाथरूम में ले जाकर दुर्व्यवहार भी किया गया।

दरअसल ये भिड़ंत JNU के वामपंथी छात्रसंघ के द्वारा सर्वर डाउन करने को लेकर हुआ। बता दें कि रविवार को रजिस्ट्रेशन का आखिरी दिन था। एबीवीपी के छात्र रजिस्ट्रेशन के लिए गए थे। मगर लेफ्ट विंग के छात्रों ने सर्वर रूम को लॉक कर दिया और वाई-फाई काट दिया। जिसकी वजह से उनका रजिस्ट्रेशन नहीं हो पाया। इसके बाद संगठन के छात्र विवेकानंद मूर्ति के पास रजिस्ट्रेशन की माँग कर रहे थे। इस बीच लेफ्ट के लोगों ने आकर एबीवीपी समर्थित छात्रों पर हमला कर दिया। जेएनयू एबीवीपी प्रेसिडेंट दुर्गेश कुमार ने इसकी जानकारी दी।

बीजेपी सांसद मीनाक्षी लेखी ने दावा किया कि जब कुछ छात्राएँ मैनुअली रजिस्ट्रेशन करवाने जा रहे थीं तो उनके हिप और प्राइवेट पार्ट्स पर लाठी-डंडों से हमला किया गया। इतना ही नहीं, कई छात्राओं को बाथरूम में ले जाकर उनके साथ दुर्व्यवहार भी किया गया। मीनाक्षी लेखी ने कहा कि कई छात्रों ने उन्हें बताया कि कुछ लोग जामिया से भी जेएनयू आए थे। मीनाक्षी लेखी का कहना है कि पीड़ित लड़कियाँ इन बातों को बताने में भी शर्मिंदा हैं।

बता दें कि रविवार को मास्क पहने गुंडों ने हॉस्टल में जम कर पत्थरबाजी भी की। उन्होंने छात्रों के साथ-साथ गार्डों को भी निशाना बनाया। हालाँकि, वामपंथियों के नेतृत्व वाले जेएनयू छात्र संगठन ने इन आरोपों से इनकार किया है और दावा किया है कि एबीवीपी झूठ फैला रही है। एबीवीपी ने कहा है कि अभी छात्रों का इलाज पहली प्राथमिता है। इसके बाद संगठन इस मामले की पुलिस में शिकायत दर्ज कराएगा।

वैसे पिछले 2-3 महीने से JNU कैंपस के अंदर जिस तरह की राजनीति चल रही है, उसके बिंदुओं को जोड़ने पर बहुत कुछ स्पष्ट होने लगता है। मसलन विरोध के नाम पर क्लास नहीं होने देना, विरोध के नाम पर शोध कर रहे प्रोफेसरों को लैब में जाने से रोकना, विरोध के नाम पर एम्बुलेंस का रास्ता रोकना या फिर पुलिस से पहचान छिपाने के लिए क्या-क्या हथकंडे अपनाना – यह सुब कुछ इन्हीं लिबरलों के द्वारा किया जा रहा है।

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जातिवादी ज़हर फैलाने वाले दिलीप मंडल की MCU में नो एंट्री, छात्रों के विरोध के बाद लिया गया फ़ैसला

मध्य प्रदेश के भोपाल में स्थित माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय ने कहा है कि वो अब प्रोफेसर दिलीप मंडल की सेवाएँ नहीं लेगा। छात्रों की जाति पूछ कर कथित उच्च-जाति के छात्रों से भेदभाव करने वाले मंडल पर आरोप है कि वो जाति के आधार पर छात्रों को भड़काते हैं। दिलीप मंडल सोशल मीडिया पर भी अक्सर जहरीले बयानों के कारण सुर्ख़ियों में बने रहते हैं। मंडल को एमसीयू द्वारा लेक्चर के लिए बुलाया जाता था। उन्हें प्रति लेक्चर के हिसाब से भुगतान किया जाता था।

दिलीप मंडल के बारे में बयान देते हुए रजिस्ट्रार दीपेंद्र बघेल ने बताया कि छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से उनकी शिकायत की थी, जिसके बाद ये फ़ैसला लिया गया। यूनिवर्सिटी ने मंडल का पक्ष जानने के लिए उनके पास कई स्पीड पोस्ट व ईमेल भेजे लेकिन उनकी तरफ़ से कोई जवाब नहीं आया। मंडल ने एक बार भी जवाब देना ज़रूरी नहीं समझा। इसीलिए, अब निर्णय लिया गया है कि उन्हें भविष्य में लेक्चर के लिए आमंत्रित नहीं किया जाएगा। विश्वविद्यालय प्रशासन के पास दिलीप मंडल की कारगुजारियों के ख़िलाफ़ कई सबूत मिले हैं, जो उनके ख़िलाफ़ जाँच में कारगर सिद्ध होंगे।

दिलीप मंडल के ट्वीट का विरोध कर देने पर कई छात्रों को एमसीयू से निष्काषित कर दिया गया था। इस मामले को पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी उठाया था। विधानसभा में गूँजने के बाद मामले ने तूल पकड़ा। शिवराज ने आरोप लगाया था कि दिलीप मंडल का विरोध करने पर छात्रों के साथ आतंकियों की तरह व्यवहार किया गया। सांसद प्रज्ञा ठाकुर ने विश्वविद्यालय के कुलाधिपति एवं उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू से इस मामले की शिकायत की थी। बाद में दबाव के बाद छात्रों का निष्कासन वापस ले लिया गया था।

दिलीप मंडल से नाराज़ होकर छात्रों ने विश्वविद्यालय परिसर में धरना दिया था। इसके बाद उलटा छात्रों के ख़िलाफ़ ही शासकीय कार्य में बाधा पहुँचाने का मामला दर्ज कर लिया गया था। पुलिस ने भी छात्रों की पिटाई की थी। इसके बाद मामले की जाँच के लिए एक समिति बनाई गई थी। सीसीटीवी फुटेज के आधार पर 23 छात्रों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की गई थी।

पुलिस गिरफ्तार करने के बाद यूनिवर्सिटी के बगल के एमपी नगर थाने ले जाने की बजाए ठंड की रात में पुलिस छात्रों को लगभग 20 किलोमीटर दूर बिलखिरिया थाने ले गई थी। थाने में देर रात छात्रों के कपड़े उतरवाए गए थे। इसके बाद छात्रों को कुछ कागजों पर दस्तख़त के लिए मजबूर किया गया था। छात्रों का कहना था कि अक्सर जातिगत पोस्ट लिखकर ये सवर्ण जातियों को टारगेट करते हैं। उनके अलावा प्रोफेसर मुकेश कुमार पर भी ऐसे ही गंभीर आरोप लगे थे।

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…जिसका दादा हिंदू नरसंहार का सहयोगी, छोटा भाई 15 मिनट में हिंदुओं को देख लेने की धमकी दे – वो ओवैसी ‘झूठा’

असदुद्दीन ओवैसी ने हमेशा अपनी योग्यता का इस्तेमाल उन लोगों पर हमला करने के लिए किया, जो उनके इस्लामी राजनीति पर सवाल उठाते रहे और उनकी आलोचना करते रहे हैं। वह अक्सर कहते हैं कि उन्होंने जिन्ना के पाकिस्तान या दो-राष्ट्र के सिद्धांत को खारिज कर दिया। यह भी कहा कि उन्हें हमेशा भारतीय मुसलमानों पर गर्व है। यह बयान सबसे अधिक बार तब दिया जाता है कि जब ओवैसी देश में मुस्लिमों के लिए विशेषाधिकार की माँग कर रहे हों या यह साबित करने के लिए कि मुस्लिम समुदाय धर्मनिरपेक्ष है जबकि हिंदुत्व के अनुयायी सांप्रदायिक हैं।

AIMIM प्रमुख औवेसी ने उत्तर प्रदेश के मुसलमानों पर अत्याचार का आरोप लगाने के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री द्वारा एक फर्जी वीडियो साझा करने के बाद फिर से यह टिप्पणी की। ओवैसी ने कहा, “हमें भारतीय मुसलमानों पर गर्व है और इंशाल्लाह, फैसले के दिन तक, भारतीय मुसलमानों पर गर्व रहेगा।” हालाँकि, ओवैसी के शब्दों पर यकीन नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर उनके भाई ने एक बार माँग की थी कि देश में 15 मिनट के लिए पुलिस को हटा दिया जाए ताकि मुसलमान हिंदुओं को दिखा सकें कि कौन असली बॉस है। हालाँकि उनके इस बयान को लेकर उन्हें किसी भी तरह की कानूनी कार्रवाई नहीं झेलनी पड़ी।

दोबारा प्रधानमंत्री के तौर पर चुने गए मोदी। और उसके बाद ऐसे बयानों की मानो हवा निकल गई। चूँकि हम अकबरुद्दीन ओवैसी के उस विवादास्पद बयान को गंभीरता से नहीं लेते, इसलिए हमें बड़े ओवैसी मतलब असदुद्दीन ओवैसी को भी गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। ऐसे में हमें खुद से सवाल करना होगा कि क्या वह वास्तव में सच बोल रहे हैं?

हम साफ तौर पर कह सकते हैं कि असदुद्दीन ओवैसी झूठ बोल रहे हैं, जब वह कहते हैं कि उनके पूर्वजों ने दो-राष्ट्र सिद्धांत और जिन्ना को खारिज कर दिया था। जबकि ऐसे बहुत से भारतीय मुसलमान हैं, जिन्होंने पाकिस्तान को अस्वीकार कर दिया था। लेकिन यह साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं कि असदुद्दीन ओवैसी के परिवार ने आज तक पाकिस्तान को अस्वीकार नहीं किया। वास्तव में, वह एक ऐसे परिवार से आते हैं जिनके नाम स्वतंत्र भारत के इतिहास में सांप्रदायिक सद्भाव और सहिष्णुता का सबसे खराब रिकॉर्ड रहा हो।

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) एक रजाकारों की विरासत है। एक जिहादी आतंकी समूह, जिसने निजाम के राज्य में हिंदुओं के खिलाफ अनगिनत अत्याचार किए। जिसे भारत के लौह पुरुष सरदार पटेल द्वारा कुचल दिया गया था। वर्ष 1927 में स्थापित मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन निज़ाम समर्थक पार्टी थी। जो कि निज़ाम के हैदराबाद को पूरी तरह से भारतीय संघ में विलय नहीं करना चाहती थी।

अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एमआईएम के कासिम रिज़वी ने नेतृत्व वाले रजाकारों को बुलवाया। दरअसल रजाकार मूल रूप से जिहादी भीड़ थी, जिसे एमआईएम ने सड़कों पर होने वाली हिंसा को रोकने के लिए इस्तेमाल किया। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र रहे रिजवी को वर्ष 1946 में एमआईएम का अध्यक्ष चुना गया था, जिसने रजाकारों का नेतृत्व किया था। तब उसने इस क्षेत्र में हिंदुओं के खिलाफ सबसे जघन्य अपराध किए थे। यहाँ तक कि रजाकारों ने महिलाओं और बच्चों के साथ छेड़छाड़ और बलात्कार किए, हिंदुओं का उत्पीड़न किया और हिंदुओं की हत्याएं कीं। लेकिन जल्द ही सरदार पटेल ने सामने आकर इस पागलपन का अंत कर दिया। उन्होंने निज़ाम को घुटने के बल लाया और उसे भारतीय संघ में प्रवेश करने के लिए मजबूर कर दिया। ऑपरेशन पोलो भारत सरकार द्वारा शुरू किया गया था, जिससे रजाकार भारतीय सेना से दंग थे। यही कारण था कि उन्होंने विनम्रतापूर्वक आत्मसमर्पण कर दिया। जिसके बाद निजाम के मंत्री लईक अली और कासिम रिज़वी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। जिसके चलते रिजवी ने आखिरकार नौ साल की जेल की सजा काटी और फिर उसे इस शर्त पर रिहा किया गया कि वह पाकिस्तान के लिए रवाना हो जाएगा। जिसे उसने पूरा किया।

हालाँकि, पाकिस्तान जाने से पूर्व एमआईएम की एक बैठक में रिजवी ने एमआईएम के नेतृत्व को असदुद्दीन ओवैसी के दादा अब्दुल वाहिद ओवैसी को पार्टी का पुनरुद्धार करने के लिए सौंप दिया। जिसके बाद एमआईएम ने अखिल भारतीय एमआईएम के रूप में खुद को फिर से चुना और चुनाव लड़ने के लिए खुद को आगे बढ़ाया। इस प्रकार साफ तौर पर असदुद्दीन ओवैसी के परिवार को एआईएमआईएम के नेतृत्व में एक नरसंहारकारी व्यक्ति द्वारा सौंपा गया था। जो चाहता था कि हैदराबाद या तो स्वतंत्र रहे या पाकिस्तान में मिल जाए।

रजाकार और एमआईएम को केवल भारतीय सेना और भारत के लौह पुरुष सरदार पटेल की इच्छाशक्ति के कारण अपने पागलपन को छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था। असदुद्दीन ओवैसी ने यह दावा करने के लिए कि उनके पूर्वजों ने पाकिस्तान को खारिज कर दिया है और दो-राष्ट्र सिद्धांत की थ्योरी को खारिज कर दिया है तो यह बिल्कुल झूठ है। इसके अलावा उनके दादा साफ तौर पर नरसंहार के एक सहयोगी थे। जिन्होंने रजाकारों का नेतृत्व किया, जबकि उन्होंने हिंदुओं के खिलाफ अत्याचारों की मेजबानी की। इसके अलावा उनके भाई अकबरुद्दीन ओवैसी के आचरण से साबित होता है कि रजाकारों के समय से उनकी विचारधारा में कोई ख़ास बदलाब नहीं आया है। यह तो केवल उनकी रणनीति है जो कुछ बदल गई है।

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JNU में आतंक के 8 घंटे: मास्क लगाए गुंडों ने मचाई तबाही, छात्र-छात्राओं से लेकर टीचर-गार्ड तक घायल

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में वामपंथियों ने रविवार (जनवरी 5, 2019) को जम कर उत्पात मचाया। न सिर्फ़ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं की पिटाई की गई बल्कि अन्य छात्रों को भी उनके हॉस्टल रूम में घुस-घुस कर मारा पीटा गया। कई तस्वीरों में गुंडे मास्क पहन कर हाथ में डंडे लिए घुमते दिख रहे हैं। उपद्रवियों ने लोहे के रॉड से अन्य छात्रों की पिटाई की। ये वारदात पेरियार हॉस्टल में हुई। कई छात्र गंभीर रूप से घायल हुए हैं। कई अन्य छात्रों को हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है।

जेएनयू एबीवीपी के अध्यक्ष दुर्गेश ने बताया कि क़रीब 500 की संख्या में वामपंथी छात्र अचानक से हॉस्टल में जमा हो गए। वो सभी लाठी-डंडों और रॉड से लैस थे। उन्होंने हॉस्टल में तोड़फोड़ मचानी शुरू कर दी। फिर वो कमरे में घुस-घुस कर छात्रों की पिटाई करने लगे। एबीवीपी नेता व जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष पद के प्रत्याशी मनीष को इस घटना में ख़ासी चोट आई है। एबीवीपी की महसचिव निधि त्रिपाठी ने अधिक जानकारी देते हुए बताया:

“जेएनयू में पिछले कई दिनों से नक्सली गिरोह का आतंक चरम पर है और वे छात्रों को सेमेस्टर के लिए रजिस्ट्रेशन नहीं करने दे रहे हैं। आज जब छात्रों ने वामी नक्सलियों की बात नहीं मान कर रजिस्ट्रेशन की माँग की तो छात्रावास के कमरों में घुसकर लाठी और लोहे की रॉड से हमला किया। कई छात्र बुरी तरह से घायल हैं।”

जेएनयू हॉस्टल में आतंक

मास्क पहने गुंडों ने हॉस्टल में जम कर पत्थरबाजी भी की। उन्होंने छात्रों के साथ-साथ गार्डों को भी निशाना बनाया। हालाँकि, वामपंथियों के नेतृत्व वाले जेएनयू छात्र संगठन ने इन आरोपों से इनकार किया है और दावा किया है कि एबीवीपी झूठ फैला रही है। एबीवीपी ने कहा है कि अभी छात्रों का इलाज पहली प्राथमिता है। इसके बाद संगठन इस मामले की पुलिस में शिकायत दर्ज कराएगा।

वामपंथी छात्रों पर लगा हिंसा का आरोप

वीडियो में देखा जा सकता है कि हॉस्टल में शीशे के टुकड़े बिखरे पड़े हुए हैं और तोड़फोड़ मची हुई है। साथ ही हाथों में डंडे व रॉड लिए घुमते चेहरे ढके लोगों को भी देखा जा सकता है। गुंडों ने क़रीब 8 घंटे तक हिंसा व दंगे किए। इस वारदात के बाद एबीवीपी के 2 छात्र गायब बताए जा रहे हैं। कुछ अन्य छात्रों का भी कुछ अता-पता नहीं है। इस हमले में 25 छात्र घायल हुए हैं। कुल 11 छात्र अभी भी मिसिंग बताए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि मास्क पहने गुंडों बाहरी भी हो सकते हैं।

एबीवीपी ने दिल्ली पुलिस से गुहार लगाई है कि उसके छात्रों को बचाया जाए। कई छात्राओं ने कुर्सी व टेबल के नीचे छिप कर ख़ुद को मास्क पहने गुंडों के आतंक से बचाया। एक छात्रा वेलेंटिना ब्रह्मा ने बताया कि उसे वामपंथी छात्रों ने पीटा है। उसने पूछा कि अब छात्र रजिस्ट्रेशन के लिए कहाँ जाएँगे?

ABVP के आरोपों के उलट वामपंथी छात्र संगठनों ने JNU में हुई हिंसा का आरोप एबीवीपी पर ही लगाया है। कौन से गुट ने हिंसा की, यह तो पुलिस जाँच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा लेकिन ऊपर के वीडियो में दिख रही महिला सुरक्षा गार्ड ने स्पष्ट बताया है कि पेरियार हॉस्टल के दाढ़ी वाले लड़के ने, जो हरे रंग का शॉल ओढ़े हुए था, उसने लात मारी।

पिछले 2-3 महीने से JNU कैंपस के अंदर जिस तरह की राजनीति चल रही है, उसके बिंदुओं को जोड़ने पर बहुत कुछ स्पष्ट होने लगता है। मसलन विरोध के नाम पर क्लास नहीं होने देना, विरोध के नाम पर शोध कर रहे प्रोफेसरों को लैब में जाने से रोकना, विरोध के नाम पर एम्बुलेंस का रास्ता रोकना या फिर पुलिस से पहचान छिपाने के लिए क्या-क्या हथकंडे अपनाना – यह सुब कुछ इन्हीं लिबरलों के द्वारा किया जा रहा है।

JNU में नक़ाबपोश छात्रों ने लाइट बंद कर किया हंगामा: टेक्निकल स्टाफ को किया बाहर, रजिस्ट्रेशन में डाला व्यवधान

12 प्रोफेसरों और वैज्ञानिकों को बनाया बंधक: लैब में JNU के छात्रों की गुंडई, फोन व कागजात छीने

JNU के VC पर छात्रों ने फिर किया हमला, सुरक्षाकर्मियों ने मुश्किल से बचाया

बीकानेर और जोधपुर में 2433 बच्चों की मौत, गहलोत सरकार की नाकामी पर मीडिया मौन

राजस्थान में मासूमों की मौत का आँकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। अब जब कोटा के जेके लोन हॉस्पिटल में एक वर्ष में 970 बच्चों की मृत्यु की ख़बर आई है, बीकानेर और जोधपुर से भी भयानक तस्वीर सामने आ रही है। प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट के बयान के बाद राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। पायलट ने कहा कि सरकार जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। अगर बीकानेर के आँकड़ो की बात करें तो पीबीएम हॉस्पिटल में दिसंबर महीने में 261 बच्चों की मौत का आँकड़ा सामने आया है। पूरे साल का आँकड़ा और भी भयानक है।

बीकानेर में पिछले एक साल में 1681 बच्चों की मौत हो गई है। इनमें नवजात शिशु से लेकर 13 वर्ष तक के बच्चे भी शामिल थे। राज्य के सरकारी तंत्र ने जो वजह बताई, वो है – कई बच्चों को देरी से अस्पताल लाया गया, कई नवजात कम वजन वाले थे। लेकिन सरकारी बयान के उलट की सच्चाई यह है – एक बेड पर तीन-तीन बच्चों को रख कर इलाज किया गया क्योंकि अस्पताल में पर्याप्त संख्या में बेड नहीं हैं। जिन बच्चों की मौत हुई, उनमें से 1267 नवजात थे। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, हॉस्पिटल में 40 में से 10 वेंटिलेटर ख़राब पड़े हैं। हॉस्पिटल के शिशु रोग विभागाध्यक्ष ने कहा कि बच्चों को ऐसी स्थिति में लाया जाता है, जहाँ से उन्हें बचाना मुश्किल हो जाता है।

बीकानेर में बच्चों की मौत का आँकड़ा भयावह: दैनिक भास्कर के स्थानीय संस्करण की ख़बर

वहीं अगर जोधपुर की बात करें तो वहाँ भी सम्पूर्णानन्द मेडिकल कॉलेज में दिसंबर महीने में 146 बच्चों की मौत की ख़बर सामने आई है। जोधपुर के आँकड़े इसलिए भी चौंकाने वाले हैं क्योंकि ये मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का गृह जिला है और हाल ही में वो यहाँ 2 दिवसीय दौरे पर भी आए थे। अस्पताल का कहना है कि ये आँकड़े सामान्य हैं। यहाँ पूरे वर्ष में 752 बच्चों की मौत का आँकड़ा सामने आया है।

मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय मानक के हिसाब से ये आँकड़े काफ़ी कम हैं। जोधपुर स्थित मेडिकल कॉलेज की नर्सरी को लगातार दो साल से अवॉर्ड मिल रहा है लेकिन यहाँ अक्सर डॉक्टरों की कमी पड़ जाती है।

राजस्थान के विभिन्न अस्पतालों में बच्चों की हो रही मौत पर मीडिया की चुप्पी ख़तरनाक है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा था कि बच्चों की मौत कोई नई बात नहीं है। वहीं प्रदेश के चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा ने कहा था कि भाजपा सीएए से ध्यान भटकाने के लिए आरोप लगा रही है। उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट का कहना है कि पिछले एक साल से सत्ता में रही सरकार जिम्मेदारियों से नहीं बच सकती। उन्होंने कहा कि पूर्ववर्ती सरकारों को दोष देने से काम नहीं चलेगा। कोटा के प्रभारी मंत्री प्रताप सिंह ने तो स्थानीय अधिकारियों और डॉक्टरों को लापरवाह बता कर इतिश्री कर ली।

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मदरसा छात्रों और मौलवी के मलद्वार से बहा था खून, UP पुलिस का टॉर्चर: मीडिया गिरोह की साजिश का भंडाफोड़

उत्तर प्रदेश में नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के ख़िलाफ़ देश भर में हुए दंगों के बाद ‘लिबरल-सेक्युलर’ मीडिया ने इस्लामी और वामपंथी प्रोपेगेंडाबाज़ों के साथ हाथ मिला लिया है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि यूपी में विरोध-प्रदर्शनों के नाम पर दंगों को अंजाम देने के दौरान पुलिसकर्मियों और मीडियाकर्मियों पर जानलेवा हमले किए गए, उन्हें ज़िंदा जला देने की कोशिश तक की गई। लेकिन, इन सब बातों से बे-ख़बर प्रोपेगेंडाबाज़ों ने फ़र्ज़ी ख़बरों के ज़रिए पुलिस को बदनाम करने का दुष्प्रचार शुरू किया

लिबरल मीडिया गैंग ने पुलिस को लेकर यह झूठ फैलाया कि दंगों के दौरान पुलिस ने मुस्लिम भीड़ पर अत्याचार किए, उन्हें गिरफ़्तार किया। यह भी झूठ फैलाया किया कि पुलिस ने दंगे पर क़ाबू करते हुए लोगों को चोटिल किया, उनका ख़ून बहाया।

ऐसी ही एक एक ख़बर हाल ही में सामने आई कि CAA के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन के बाद सआदत मदरसे के छात्रों को पुलिस ने 20 दिसंबर को हिरासत में लिया था। इस दौरान उन्हें चोटें आईं थी, उनकी हड्डियाँ टूट गईं थी और यहाँ तक ​​कि उनके मलाशय से ख़ून बह रहा था। लेकिन, ये ख़बर झूठी हैं क्योंकि इस मामले पर पीड़ितों ने ख़ुद इस बात से इनकार किया कि पुलिस ने उनका शोषण किया। अब जब उन छात्रों ने ही पुलिस पर लगे आरोपों का खंडन कर दिया तो इसका मतलब यह हुआ कि पुलिस को बदनाम करने के लिए लिबरल मीडिया ने षड्यंत्र रचा था।

टेलीग्राफ ने इस प्रकरण को लेकर एक के बाद एक कई झूठी ख़बरें फैलाई। ऐसी ही एक ख़बर थी 29 दिसंबर की। इसमें यह दावा किया गया था कि एंटी-सीएए दंगों के दौरान, उत्तर प्रदेश पुलिस ने मुजफ्फरनगर शहर के सआदत हॉस्टल-कम-अनाथालय के लगभग 100 बच्चों को हिरासत में लिया और उन्हें प्रताड़ित किया।

टेलीग्राफ ने अपनी ख़बर में लिखा कि हिरासत में लिए गए लड़कों को टॉयलेट जाने से कई बार मना कर दिया गया था और उनमें से कुछ को इतना टॉर्चर किया गया कि उन्हें रेक्टल ब्लीडिंग (मलाशय से खून) हुई थी।

टेलीग्राफ में प्रकाशित ख़बर का स्क्रीनशॉट

कॉन्ग्रेस पार्टी के मुखपत्र नेशनल हेराल्ड ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें यह भी बताया गया कि मदरसा के नाबालिग छात्रों को गिरफ़्तार किया गया था और कुछ को कथित तौर पर प्रताड़ित किया गया, इस वजह से उन्हें रेक्टल ब्लीडिंग (मलाशय से खून) हुई थी।

नेशनल हेराल्ड की ख़बर का स्क्रीनशॉट

यहाँ तक कि British Daily- The Guardian ने भी इस घटना के बारे में आधा-सच ही बताया। उस आधे सच में यह दावा किया गया था कि पुलिस ने मौलवी और उसके 35 छात्रों को हिरासत में लिया, जिनमें 15 कथित तौर पर नाबालिग और अनाथ थे और उन्हें पास के पुलिस बैरक में ले जाया गया, जहाँ उनके कपड़े उतारे गए और मारपीट की गई। इस ख़बर में यह दावा भी किया गया था कि पुलिस ने मौलवी (असद रज़ा हुसैनी) की गुदा में रॉड डाल दी, जिससे उनके गुदा से ख़ून बहने लगा।

The Guardian की रिपोर्ट का स्क्रीशॉट

कविता कृष्णन जो कि अति-वामपंथी कट्टरपंथी तत्व के रूप में भारत विरोधी प्रचार के लिए जानी जाती हैं, उन्होंने भी यूपी पुलिस के ख़िलाफ़ फ़र्ज़ी ख़बरें फैलाना जारी रखा। उसने दावा किया कि मदरसा के बच्चों को यूपी पुलिस द्वारा प्रताड़ित किया गया था, जिससे उनके गुदा से ख़ून बह रहा था।

वामपंथी स्वरा भास्कर ने भी इसी तरह के बयान दिए, जिसमें दावा किया गया कि ‘कथित’ बलात्कार मुजफ्फरनगर में हुआ और इस घटना के लिए उन्होंने यूपी पुलिस को ज़िम्मेदार ठहराया।

इन सभी झूठी ख़बरों का खंडन द प्रिंट ने अपनी एक रिपोर्ट में किया और यह स्पष्ट किया कि सआदत छात्रावास के नाबालिग लड़कों ने ख़ुद दावा किया कि उनके गुदा से ख़ून बहने की ख़बरें झूठी हैं। सीतापुर के रहने वाले 21 साल के इरफ़ान हैदर ने द प्रिंट को बताया कि ‘कुछ मदरसा छात्रों को पुलिस यातना का दंश झेलना पड़ा’ जैसी सारी ख़बरें झूठी थी, इनका कोई आधार नहीं था।

मदरसे के मौलवी असद रज़ा हुसैनी के एक रिश्तेदार और विश्वासपात्र नावेद आलम ने, द प्रिंट को बताया कि यह सच नहीं है। न तो बच्चों और न ही मौलाना साहब को रेक्टल ब्लीडिंग हुई, न ही उन्हें बेरहमी से पीटा गया, जो अपने आप में एक भयानक अनुभव होता। ऐसा कुछ हुआ ही नहीं, इसलिए हमें कोई आरोप लगाने की ज़रूरत नहीं है।

एक अन्य रिश्तेदार, मोहम्मद आज़म ने कहा, “हमें अपना मुँह ख़ुदा को दिखाना है। इसलिए झूठ बोलने का कोई मतलब नहीं है। जो हुआ वह अपने आप में एक बड़ी बात थी।”

ग़ौर करने वाली बात यह है कि मीडिया गिरोह हो या फिर कोई खास वर्ग, CAA की आड़ में विरोध-प्रदर्शन के नाम पर दंगा करने वालों की पोल पुलिस खोल ही देती है। मुज़फ़्फ़रनगर के एसपी सतपाल अंतिल ने बताया था, “मीनाक्षी चौक और महावीर चौक के बीच कम से कम 50000 लोगों की भीड़ थी, जो पुलिस पर हमला कर रही थी और हिंसा और बर्बरता में लिप्त थी। जब हमने भीड़ को रोकने की कोशिश की, तो दंगाइयों एक समूह परिसर के अंदर गया और परिसर के अंदर से हम पर गोलीबारी शुरू कर दी। इसके बाद हमने परिसर में प्रवेश किया और फिर 70 लोगों को गिरफ़्तार किया।”

यूपी पुलिस ने भी ट्विटर के माध्यम से मुज़फ़्फ़रनगर पुलिस के ख़िलाफ़ झूठी अफ़वाहों और दुर्भावनापूर्ण अभियान के बारे में लोगों को सच्चाई से अवगत कराया था। पुलिस ने बताया था कि 20.12.2019 को मुज़फ़्फ़रनगर की घटनाओं में पुलिस कार्रवाई के कारण कोई हताहत नहीं हुआ था। बल्कि इसके उलट, दंगाइयों ने आगजनी कर वाहनों में आग लगाई, एक हिंसक भीड़ ने पुलिस पर फायरिंग की। इसके लिए FIR दर्ज की गई। फिर पुलिस ने विश्वसनीय साक्ष्य के आधार पर उपद्रवियों को गिरफ़्तार किया।

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दंगों से कुछ तस्वीरें, जो बताती हैं पुलिस वाले भी चोट खाते हैं, उनका भी ख़ून बहता है…


प्रेमजाल में फँसा शादीशुदा शाहनवाज़ ने सीता से किया निक़ाह, फिर जीजा और दोस्तों संग मिल कर दी हत्या

सोशल साइट्स पर नए लोगों से चंद दिनों की मुलाक़ात कभी-कभी जानलेवा भी बन जाती है। किसी अनजान शख़्स को एकाएक अपना समझ लेने की भूल कई बार मौत का सबब भी बन जाती है। ऐसा ही कुछ हुआ कानपुर की सीता उर्फ़ नेहा के साथ। सोशल मीडिया के जरिए शाहनवाज़ से हुई उसकी चंद दिनों की मुलाक़ात न जाने कब प्यार में बदल गई पता ही नहीं चला। बात इस हद तक पहुँच गई कि सीता ने अपने परिवार से बग़ावत कर शाहनवाज़ से निक़ाह भी कर ली। सीता को इस बात की बिल्कुल भनक नहीं कि उसके इस फ़ैसले का अंजाम अगले ही पल उसकी मौत का कारण बनने वाला था।

दरअसल, बिठूर-गंगा बैराज रोड पर 27 दिसंबर को पुलिस को दुल्हन के जोड़े में एक युवती के शव मिला। उसके हाथों में मेहंदी लगी हुई थी, शव देखकर यह साफ़ पता चलता था कि पहले युवती की हत्या की गई और उसके बाद शव फेंक दिया गया। जाँच के बाद पता चला कि शव आजमगढ़ के जवाहिर की चौथे नंबर की बेटी सीता का है। मृतका के पिता ने पुलिस को बताया कि कानपुर के शाहनवाज़ के साथ उनकी बेटी का प्रेम-प्रसंग चल रहा था।


दैनिक जागरण के कानपुर संस्करण में प्रकाशित ख़बर

उन्होंने बताया कि अपनी बेटी को समझाया था कि लड़का दूसरे धर्म का है वो उससे शादी न करे। लेकिन, लड़की नहीं मानी और परिवार के ख़िलाफ़ जाकर उसने पहले निक़ाह किया और फिर कोर्ट मैरिज भी की। इसके बाद सीता को लेकर शाहनवाज़ कानपुर चला गया। 

सीता का शव मिलने के बाद पुलिस ने शाहनवाज़ की खोजबीन शुरू कर दी। इसके बाद, पुलिस ने उसे बजरिया के शौक़त अली पार्क स्थित घर से गिरफ़्तार कर लिया। सख़्ती से पूछताछ करने पर उसने अपना ज़ुर्म क़बूल कर लिया। शनिवार (4 जनवरी) को पुलिस उसे लेकर सीता के जेवर बरामद करने के लिए घटनास्थल पर पहुँची। वहाँ पहुँचकर शाहनवाज़ ने जेवर बरामदगी के वक़्त झाड़ियों में छिपाए तमंचे से पुलिस टीम पर फायरिंग कर दी। पुलिस ने भी जवाब में फायरिंग की। शाहनवाज़ के दाहिने पैर में गोली लग गई जिससे वो ज़ख़्मी हो गया और उसे पकड़ लिया गया।

ख़बर के अनुसार, शाहनवाज़ ने पुलिस को बताया कि सीता से उसकी जान-पहचान सोशल साइट पर हुई थी। जान-पहचान के दौरान सीता, शाहनवाज़ से प्यार करने लगी। शाहनवाज़ ने सीता को बताया था कि वो पहले से शादीशुदा है और उसने अपनी बीवी को तलाक़ दे दिया है। इसके बाद वो उससे मिलने आजमगढ़ गया जहाँ वो सीता के परिजनों से भी मिला। 23 जून 2019 को उसने सीता से निक़ाह किया। अक्टूबर के महीने में वो सीता को कानपुर ले आया जहाँ वो एक किराए के कमरे में रहने लगा।

सीता ने शाहनवाज़ से कई बार कहा कि वो उसे उसकी ससुराल ले जाए, लेकिन शाहनवाज़ हमेशा आनाकानी करता रहता था। सीता की यह ज़िद जब ज़्यादा ज़ोर पकड़ने लगी, तो वो परेशान हो गया और इस बारे में उसने अपने बहनोई आमिर ख़ान से मदद माँगी। इसके बाद दोनों ने मिलकर उसे मारने की योजना बनाई। इसके तहत 26 दिसंबर को शाहनवाज़, सीता को लेकर गंगा बैराज पहुँच गया। वहाँ उसने अपने बहनोई आमिर खान और दोस्तों के साथ मिलकर सीता की गला दबाकर हत्या कर दी और शव फेंक दिया।

शाहनवाज़ ने पुलिस को बताया कि वो सीता को गंगा बैराज ससुराल ले जाने के बहाने से ले गया था। ससुराल जाने की बात पर सीता बेहद ख़ुश हुई थी और इसका ज़िक्र उसने अपनी बहन सुशीला से भी किया था। सीता ने अपनी बहन को बताया था कि वो ससुराल जा रही है, इसलिए उसने अपने हाथों और पैरों में मेहंदी लगवाई है। 27 दिसंबर को जब सुशीला ने अपनी बहन का हाल जानना चाहा तो शाहनवाज़ ने उसे यह कह कर टाल दिया कि वो (सीता) व्यस्त है, जुमे के बाद बात कराएगा। इसके बाद से सीता का फोन लगातार ऑफ़ रहा। सीता का शव मिलने की घटना का पता जब उसके घरवालों को लगा तो मानों उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई हो।

इस मामले पर जानकारी देते हुए सीओ अजीत सिंह ने बताया कि शहनवाज़ व उसके बहनोई को जेल भेज दिया गया। वारदात में शामिल शहनवाज़ के दोस्त शारिक उर्फ़ मोनू व जीशान और आमिर के दोस्त हसीब की तलाश की जा रही है।

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बच्चे कह रहे मम्मा आपके टॉप होने का क्या फायदा। आप हमें ज्यादा पढ़ने के लिए मत कहा करो। यह दर्द है सीमा सूर्यवंशी का। सीमा का नाम मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग (MPPSC) की सहायक प्राध्यापक भर्ती परीक्षा की चयनित सूची के मेरिट लिस्ट में हैं। लेकिन, उन्हें अब तक नियुक्ति पत्र नहीं मिला है।

उनके जैसी आरक्षित वर्ग की 91 महिलाएँ मेरिट लिस्ट में होकर भी नियुक्ति पत्र से वंचित हैं। ऐसी ही एक महिला हुमा अख्तर ने ऑपइंडिया को बताया, “मेरिट लिस्ट में जगह बनाने पर हमें प्रोत्साहन मिलना चाहिए था। लेकिन वह भी नहीं मिल रहा जिसके हम हकदार हैं। क्या पिछड़े वर्ग से होकर मेरिट लिस्ट में आना हमारा गुनाह है?”

असल में आरक्षित वर्ग की इन महिलाओं को मेरिट लिस्ट के आधार पर अनारक्षित सीट के लिए चयनित करने का फैसला किया गया। फिर मामला कोर्ट में चला गया। इन महिलाओं का कहना है कि उच्च शिक्षा विभाग के अधिकारी कोर्ट के फैसले की गलत तरीके से व्याख्या कर उनकी नियुक्ति में अड़चनें डाल रहे हैं। राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री जीतू पटवारी से मिलकर भी ये कई बार फरियाद लगा चुकी हैं। थक-हार कर रविवार (5 जनवरी 2020) को इन्होंने भोपाल के नीलम पार्क में धरना दिया। इस दौरान कुछ महिलाएँ अपने बच्चों के साथ ही बैठी थीं। इन्होंने बताया कि 7 जनवरी को होने वाली सुनवाई के दौरान मंत्री जीतू पटवारी के वादे के अनुसार यदि उच्च शिक्षा विभाग ने एफि​डेविट दायर नहीं किया तो वे आमरण अनशन पर बैठने को मजबूर होंगी।

लेकिन, क्या लंबे समय तक आंदोलन से इन्हें इनका हक मिल जाएगा?

अतिथि विद्वानों के अनुभव को देखकर तो ऐसा नहीं लगता। इस कड़ाके की ठंड में भी अतिथि विद्वान राजधानी के शाहजहाँनी पार्क में 28 दिन से धरने पर बैठे हैं। कफन ओढ़कर प्रदर्शन कर चुके हैं। खून से दीया जला चुके हैं। शहर की सड़कों पर शनिवार को शू पॉलिश कर विरोध जताया। लेकिन, सरकार ने अब तक इनकी सुध नहीं ली है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार शनिवार को राज्य कैबिनेट की बैठक में इस मसले पर चर्चा हुई तो कमलनाथ कैबिनेट ही दो खेमों में बँट गई। बैठक के दौरान तय किया गया कि आंदोलनरत करीब 5000 अतिथि विद्वानों को एडजस्ट करने के लिए कॉलेजों में एक हजार नए पद स्वीकृत किए जाएँ। लेकिन इसके खर्च को लेकर वित्त विभाग की आपत्ति और नियमितीकरण को लेकर मंत्रियों जीतू पटवारी, गोविंद सिंह राजपूत, डॉ. गोविंद सिंह और बाला बच्चन की अलग-अलग राय होने के चलते कोई फैसला न हो सका। इसका समाधान खोजने के लिए पॉंच मंत्रियों की जो समिति बनी थी उसने भी बैठक में सुझाव रखे। लेकिन सबके सुझाव अलग-अलग थे। आखिर में सीएम कमलनाथ ने मंत्री जीतू पटवारी, मुख्य सचिव एसआर मोहंती और अपर मुख्य सचिव वित्त अनुराग जैन की एक और कमेटी बना दी।

गौरतलब है कि शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री रहते हुए 2017 में एमपीपीएससी ने सहायक प्राध्यापकों, लाइब्रेरियन और स्पोर्टस ऑफिसर की नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किया। 1992 के बााद पहली बार सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति के लिए प्रक्रिया शुरू की गई थी। विधानसभा चुनाव के कारण परीक्षा 2018 में हुई। लेकिन रिजल्ट आते ही विवाद शुरू हो गए। करीब सालभर नियुक्ति ही नहीं दी गई। फिर सहायक प्राध्यापक के चयनित उम्मीदवारों ने पद यात्रा निकाली। राजधानी भोपाल पहुॅंचकर सिर मुॅंडवाए। इसके बाद 3 दिसंबर को सीएम कमलनाथ ने ट्वीट कर बताया कि उन्होंने पीएससी से चयनित लोगों को नियुक्ति पत्र जारी करने के निर्देश दे दिए हैं।

इस बीच कई मामले कोर्ट भी गए। इनमें से ही एक मामला मेरिट लिस्ट में आने वाली आरक्षित वर्ग की 91 महिलाओं से जुड़ा है। परीक्षा के दौरान ज्यादा अंक पाने वाले आवेदकों को मेरिट लिस्ट के आधार पर अनारक्षित सीट के लिए चयनित किया गया। सामान्य वर्ग की महिला आवेदकों ने इसके खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर की। 18 सितंबर 2019 को हाई कोर्ट का आदेश आया। मेरिट लिस्ट में शामिल श्वेता हार्डिया ने ऑपइंडिया को बताया कि इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि आरक्षित वर्ग की मेरिट लिस्ट में आने वाली महिला उम्मीदवारों का समायोजन सामान्य श्रेणी के कोटे में होगा।

हार्डिया के अनुसार इस आदेश की तरीके से व्याख्या नहीं की गई और उन्हें महाविद्यालयों की च्वाइस फिलिंग की प्रक्रिया से रोक दिया। इसके बाद 14 अक्टूबर को ये महिलाएँ हाई कोर्ट पहुॅंची और आदेश पर स्पष्टीकरण देने की गुहार लगाई। 17 अक्टूबर को हाई कोर्ट ने मेरिटोरियस महिलाओं को नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल करने का आदेश MPPSC और उच्च शिक्षा विभाग को दिया। हार्डिया के अनुसार फिर भी उनको नियुक्ति पत्र नहीं दिया गया है, जबकि ऐसे लोगों को नियुक्ति पत्र दिए गए हैं जिनके नाम चयन सूची के आखिर में हैं।

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