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102 बच्चों की मौत के बाद भी नहीं जागी कॉन्ग्रेस सरकार: कोटा के अस्पताल की ख़िड़कियाँ टूटी, हीटर गायब

राजस्थान के कोटा के जेके लोन अस्पताल में बच्चों की मौत ने सबको झकझोर दिया है। लेकिन इससे प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार को कोई फर्क पड़ता नहीं दिख रहा। कोटा में केवल जेके लोन अस्पताल ही नहीं, बल्कि जिले के कई अन्य सरकारी अस्पतालों (सीएचसी व पीएचसी) की हालत भी बेहद जर्जर हैं। इनमें प्रसूतियों एवं शिशुओं के इलाज के लिए न पर्याप्त बेड हैं और न ही उपकरण।

इतना ही नहीं इन अस्पतालों में मरीजों को मिलनी वाली अन्य व्यवस्थाएँ भी माकूल नहीं हैं। इसके कारण भारी संख्या में प्रसूताओं को जेके लोन अस्पताल की ओर रुख करना पड़ता है। इस अस्पताल में दिसंबर से लेकर अब तक 102 बच्चों की मौत हो चुकी है। फिर भी अव्यवस्थाएँ सुधरने का नाम नहीं ले रही है। बीते दिनों NCPCR की टीम ने यहाँ निरीक्षण करने के बाद बताया था कि मेडिकल कॉलेज के परिसर में सुअर घूमते पाए गए और ख़िड़कियाँ-दरवाजे भी टूटे मिले। अब खबर आई है कि ठंड से ठिठुरते मरीजों के लिए पिछले सप्ताह 27 हीटर का इंतजाम किया गया था, वे गायब हैं।

राजस्थान पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसार, मेडिकल कॉलेज के नए अस्पताल में जरूरत के मुताबिक संसाधनों और सेवाओं की बड़ी कमी है। एक नए अस्पताल के गायनिक वार्ड में जहाँ 100 बेड की आवश्यकता है, वहाँ केवल 65 बेड हैं। जिसके कारण कई माँओं को अपने बच्चों के साथ कड़ाके की सर्दी में नीचे ही लेटना पड़ता है। कहा जा रहा है शेष 35 बेडों का अलग से वॉर्ड बनना है। इसके लिए पीडब्ल्यूडी विभाग को प्रस्ताव दिया गया था। जिन्होंने वॉर्ड तो तैयार कर दिया, लेकिन वहाँ दरवाजे नहीं लगाए गए। इसके अलावा शहर के भीमगंजमंडी व सुल्तानपुर सीएचसी में शिशु रोग विशेषज्ञों के पद रिक्त हैं। इसके कारण इलाकों में रह रहे लोगों को जेके लोन अस्पताल की ओर जाना पड़ता है।

राजस्थान पत्रिका के कोटा संस्करण में प्रकाशित खबर

सीएमएचओ डॉ. बीएस तंवर इस बात को मानते हैं कि जिले के अस्पतालों में बच्चों के लिए अलग से बेड नहीं हैं। इसके कारण जच्चा-बच्चा का उपचार सामान्य बेड पर होता है। नए अस्पताल के अधीक्षक डॉ. सीएस सुशील का कहना है कि ट्रॉमा सेंटर के ऊपर नया गायनिक वार्ड तैयार हो रहा है। लेकिन उसके भी छत और दरवाजों का काम बाकी है।

वहीं, जेके लोन अस्पताल में टूटी ख़िड़कियों, सीलन व अन्य अव्यवस्थाओं के कारण सर्दी में होती बच्चों की मौत पर हाड़ौती विकास मोर्चा के संभागीय अध्यक्ष राजेन्द्र सांखला ने स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल का ध्यान आकर्षित करवाया था। इसके बाद उन्होंने अधिकारियों को चेतावनी दी कि अब गैरजिम्मेदारी नहीं चलेगी। उन्होंने अधीक्षक को फोन पर व्यवस्थाएँ सुधारने के निर्देश दिए। साथ ही आदेश दिया कि यदि अस्पतालों में कमी है तो उसका प्रस्ताव दें। धारीवाल ने कल ये भी कहा था कि संसाधनों के अभाव में किसी को मौत नहीं चाहिए। लेकिन आज सुबह ही जेके लोन अस्पताल में कुछ अन्य बच्चों की मौत की खबर ने फिर लोगों को सहमा दिया।

सर्दी से मरीजों को बचाने के लिए पिछले हफ्ते वार्ड इंचार्ज ने अपने-अपने वार्डों में हीटर लगाने की डिमांड नर्सिंग अधीक्षक कार्यालय को दी थी। इसके बाद 27 नए हीटरों की खरीददारी हुई। लेकिन ये 27 हीटर जो डिमांड पर मँगाए गए थे। वो कहाँ लगे, ये किसी को पता ही नहीं चला। मरीज अब भी ठिठुर रहे हैं। ख़िड़कियों से ठंडी हवा आती रहती है। वार्डों की दीवारों में भी सीलन हैं। जिसकी वजह से ठंडी हवाओं से वार्ड और भी ठंडे हो जाते हैं। इससे मरीजों व उनके तीमारदारों की हालत सर्दी से खराब होती है।

इतने गंभीर मामले पर अस्पताल के तीन अलग-अलग अधिकारी अलग-अलग बयान देते नजर आते हैं। नर्सिंग अधीक्षक रामरतन मीणा के अनुसार अस्पताल में नए हीटर आए थे, लेकिन कहाँ गए यह उन्हें नहीं पता है। शिशु विभाग के एचओडी डॉ अमृत लाल बैरवा का कहना है कि नए हीटर के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है। वहीं, जेके लोन अस्पताल के अधीक्षक डॉ. एससी दुलारा का कहना है कि नए हीटर खरीदे गए हैं। लेकिन, ये कहॉं लगाए गए हैं इसकी जानकारी उनके पास नहीं है।

गौरतलब है कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर भी कॉन्ग्रेस नेता असंवेदनशील बयान देकर राज्य सरकार की नाकामियों पर पर्दा डालने की कोशिश में हैं। दूसरी ओर, भाजपा लगातार सरकार का ध्यान इस तरफ आकर्षित करने के प्रयास में है। लोकसभा अध्यक्ष और कोटा के सांसद ओम बिरला ने एक बार फिर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का ध्यान बच्चों की मौत की ओर आकर्षित करवाया है। उन्होंने ट्वीट कर बताया है, “राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पुनः स्मरण पत्र भेजकर संसदीय क्षेत्र कोटा के जेके लोन मातृ एवं शिशु चिकित्सालय में शिशुओं की असमय मृत्यु की प्रतिदिन बढती संख्या को देखते हुए संवेदनशीलता के साथ चिकित्सा सुविधाओं के मजबूत बनाने का आग्रह किया है।”

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बिग BC के इक़बाल अहमद, पत्रकार की तरह लिखो, मजहबी मत बनो, चीजें बेहतर दिखेंगी

नागरिकता संशोधन बिल संसद के दोनों सदनों में पास होता है। फिर यह नागरिकता संशोधन कानून बनता है। कानून के खिलाफ कुछ लोग, कुछ नेता (जो संसद में विरोध नहीं कर पाए, सड़कों पर कर रहे हैं) सड़कों पर उतरते हैं, विरोध के नाम पर दंगा करते हैं। दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया में आगजनी की जाती है, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया जाता है। बवाल इतना बढ़ जाता है कि पुलिस को यूनिवर्सिटी में घुसना पड़ता है, दंगाई हो चुके छात्रों पर लाठियाँ बरसाई जाती हैं।

जामिया मिलिया इस्लामिया चूँकि छात्रों की जगह है, इसलिए उन पर पड़ी लाठियों से देश के बाकी विश्वविद्यालयों के छात्र (सभी नहीं, सिर्फ वामपंथी और एंटी-BJP) खुद को जोड़ कर देखने लगे। उनके अंदर भी CAA विरोध के नाम पर मोदी-विरोध, हिंदू-विरोध का स्वर उबाल मारने लगा। इसी उबाल में IIT कानपुर के कुछ गिने-चुने छात्रों ने 17 दिसंबर को एक प्रदर्शन का आयोजन किया। आयोजन में फैज अहमद फैज की एक कविता (लाज़िम है कि हम भी देखेंगे… सब बुत उठवाए जाएँगे… सब तख़्त गिराए जाएँगे… बस नाम रहेगा अल्लाह का) गाई गई।

पत्रकारिता का स्वघोषित बड़ा नाम लेकिन काम कौड़ी भर का

जब यह कविता गाई जा रही थी, उसी समय कुछ छात्रों ने इसे लेकर विरोध किया। बाद में इसको लेकर IIT प्रशासन को लिखित में शिकायत भी दी गई। इसी संबंध में की गई शिकायतों की जाँच के लिए प्रशासन ने 6 सदस्यी कमिटी का गठन किया। चूँकि फैज वामपंथियों के पसंदीदा नंबर 1 हैं, इसलिए मीडिया गिरोह ने IIT कानपुर की कमिटी वाली खबर को तड़का-मसाले के साथ चलाया। सबकी हेडिंग-रिपोर्टिंग देखकर आप चौंक जाएँगे। चौंक जाएँगे क्योंकि सबने बिना जाने फर्जी खबरें, फर्जी हेडिंग से चलाई।

इकॉनमिक्स टाइम्स ने तो टाइटल में ही झोल कर दिया – मतलब पूरी गलत रिपोर्टिंग!

सच क्या है?

IIT कानपुर में फैज अहमद फैज के नज्म का पाठ किया गया – सच यह है। सच यह है कि आईआईटी ने एक जाँच कमिटी का गठन किया है। लेकिन यह सच नहीं है कि कमिटी ‘फैज की नज्म हिंदू विरोधी है या नहीं’, की जाँच करेगी। क्यों यह सच नहीं है? क्योंकि जो इस कमिटी के अध्यक्ष हैं, वो खुद मीडिया गिरोह द्वारा चलाए जा रहे झूठ का पर्दाफाश कर रहे हैं। नाम है – मनीन्द्र अग्रवाल। प्रोफेसर हैं, डेप्यूटी डायरेक्टर हैं, वहीं IIT कानपुर में ही।

मनीन्द्र अग्रवाल ने 16 दिसंबर मतलब कैंपस में कुछ छात्रों के द्वारा विरोध-प्रदर्शन के ठीक एक दिन पहले भी ट्वीट किया था। ट्वीट में कैंपस के अंदर पब्लिक प्रोटेस्ट को लेकर उन्होंने अनभिज्ञता जाहिर की थी। इसके बाद जब फैज की नज्म का पाठ किया जाता है, उसके खिलाफ शिकायत की जाती है और कमिटी का गठन होता है, तब जो रिपोर्टिंग मीडिया गिरोह द्वारा की जाती है, उस पर मनीन्द्र सिर्फ हँसते हैं, व्यंग्य के तौर पर जवाब देते हैं।

फैज, मुस्लिम और मीडिया

इंडिया टुडे ने सब-टाइटल में खेल किया और जाँच कमिटी को फैज के नज्म के हिंदू विरोधी होने या न होने तक सीमित कर दिया

समुदाय विशेष नाम वाले कवि, पत्रकार, लेखक आदि सब अपना मजहब दिखाने में जुटे हुए हैं। इसी शृंखला में BBC, या बिग BC के इकबाल अहमद ने बिना IIT कानपुर की जाँच के आदेश को पढ़े अपनी हिन्दू घृणा उड़ेल दी है। जबकि जाँच उस आयोजन (मतलब बिना परमिशन के विरोध क्यों और आयोजन के पहले या बाद में सोशल मीडिया पर भड़काऊ पोस्ट डाली गई या नहीं?) को लेकर बैठी है। जबकि इकबाल अहमद लिखता है कि कमिटी को तय करना है कि ‘उनकी कविता कहीं हिंदू विरोधी तो नहीं।’ इस तरह की हिन्दू घृणा अजेंडाबाज़ पत्रकारों में सामान्य हो गई है।

बॉलिवुड के लेखक और स्वघोषित क्रांतिकारी हैं जावेद अख्तर। सांसद भी रह चुके हैं। लेकिन सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं है इन्हें। होती तो प्रतिक्रिया देने से पहले IIT में फोन घुमाकर कमिटी की हकीकत जानने की कोशिश करते। लेकिन नहीं। आखिर हैं तो उसी मीडिया गिरोह के ये भी। और मजहबी तो खैर हैं ही। मजहबी तो फैज अहमद फैज भी थे। क्यों? क्योंकि जैसा उन्हें प्रचारित किया जाता है, अगर वो वामपंथी होते तो अपने नज्म में अल्लाह जैसे शब्द की जगह प्रकृति या इसके समान उर्दू शब्द का प्रयोग करते। यही कारण है कि मजहबी फैज के लिए मजहबी जावेद अख्तर डिफेंस में आते हैं। उन्होंने याद दिलाया कि फैज तो ‘एंटि-पाकिस्तान’ थे और ‘जिया-उल-हक के खिलाफ’ थे।

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हिंदुओं का नरसंहार करने वाले इस्लामी अक्रांता सागरिका घोष को लगते हैं देशभक्त और आजादी के परिंदे

नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के ख़िलाफ़ हुए हिंसक विरोध-प्रदर्शनों के दौरान हिन्दू-विरोधी कट्टरता साफ़ तौर पर दिखी। बावजूद इसके लिबरल गैंग इनकी पर्दादारी कर अपने राजनीतिक एजेंडे को बढ़ाने में लगा है। लिबरल गैंग की एक सदस्य हैं सागरिका घोष। मुख्यधारा की मीडिया की कुख्याता प्रोपेंगेंडाबाज सागरिका ने एक बार फिर इस्लामपरस्त और सीएए विरोधी अपने एजेंडे का प्रदर्शन किया है।

हाल ही में सागरिका घोष ने एक ट्वीट कर जिहादियों का जमकर महिमामंडन किया। जिन जिहादियों का उन्होंने महिमामंडन किया है उन्होंने हिंदुओं के खिलाफ ऐसे-ऐसे अत्याचार किए हैं जिन्हें शब्दों में बयाँ करना मुश्किल है। सागरिका के अनुसार, सिराजुद्दौला, टीपू सुल्तान और बहादुर शाह ज़फ़र जैसे लोग “महान देशभक्त शासक” थे।

लिबरल्स के तर्क केवल और केवल उनके पाखंड की निशानी से अधिक और कुछ नहीं होते। एक तरफ़ तो यह तर्क दिया जाता है कि भारत 1947 से पहले अस्तित्व में नहीं था, जबकि दूसरी तरफ़, इस्लामिक आक्रांताओं का “महान देशभक्त शासक” के रूप में महिमामंडन किया जाता है। स्पष्ट तौर पर, लिबरल गैंग को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे जो कह रहे हैं वह सच है या झूठ। उन्हें केवल अपने एजेंडे को आगे बढ़ाना होना है। वे केवल इसी की परवाह करते हैं। इसके लिए उन्हें इस्लामी निरंकुश शासकों का महिमामंडन करने की ज़रूरत पड़ती रहती है।

टीपू सुल्तान एक उन्मादी नरसंहारक था। उसने न सिर्फ़ हिन्दुओं पर अत्याचार किया बल्कि उनका नरसंहार करने पर वह गर्व भी करता था। इससे उसका जिहादी चरित्र जाहिर होता है। दूसरी तरफ़,
सिराजुद्दौला ने देशभक्ति की भावनाओं की कोई परवाह नहीं की। अपनी शक्ति बनाए रखने के लिए वह ऐसे लोगों को कुचलता रहा। उसके दौर में बंगाल में इस्लामी शासन द्वारा हिन्दुओं के ख़िलाफ़ क्रूरता की गई। यही वजह थी कि उस समय अधिकांश हिन्दुओं ने इस क्षेत्र में ब्रिटिश शासन का स्वागत किया था।
सिराजुद्दौला बंगाल का अंतिम स्वतंत्र नवाब था।

बहादुर शाह ज़फ़र की कहानी बेहद जटिल है। 1857 के युद्ध को ‘स्वतंत्रता के पहले युद्ध’ के रूप में स्थापित किया गया। निश्चित रूप से यह ‘हिन्दू-मुस्लिम एकता की कहानी’ नहीं है, जैसा कि अब तक बताया जाता रहा है। यह एक रणनीतिक उद्देश्य पूर्ति के लिए था, जिसके तहत अस्थायी रूप से एक-दूसरे के साथ सहयोग करने वाले समूह थे।

सागरिका घोष का इतिहास ज्ञान लिबरल संस्करण की विशिष्टता है। इसके अनुसार हिन्दू-मुस्लिम संबंधों की खाई के लिए अंग्रेज जिम्मेदार थे। जबकि सच्चाई यह है कि पिछले हज़ार वर्षों में ऐसा कोई समय नहीं रहा जब हिन्दू-मुस्लिम संबंध अच्छे रहे हों। फिर भी हिन्दुओं और दूसरे माहजब के बीच विभाजन के लिए अंग्रेजों को दोषी ठहराने का प्रयास किया जाता है ताकि नेहरू के सेक्युलर-लिबरल दृष्टि को उचित ठहराया जा सके।

सागरिका घोष ने अपने ट्वीट में इस तथ्य को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया है कि नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के विरोध का वर्तमान उन्माद पूरी तरह से इस्लामी चरमपंथियों द्वारा संचालित है। इन विरोध-प्रदर्शनों में “हिन्दुओं से आज़ादी” और “काफ़िरों से आज़ादी” जैसे नारे सुनाई पड़े। साफ़ तौर से प्रदर्शनकारी उसी विचारधारा का पालन करते हैं जिसका टीपू सुल्तान ने किया था।

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जिस LKS का कॉन्ग्रेस और उसके साथियों ने बहिष्कार किया, उसी की शान में राहुल गाँधी ने कसीदे पढ़े

एक संगठन है LKS। यानी लोक केरल सभा। केरल के प्रवासियों के इस संगठन का एक सम्मेलन हाल में संपन्न हुआ है। इस सम्मेलन का केरल के विपक्षी गठबंधन UDF ने बहिष्कार किया। इसमें कॉन्ग्रेस भी शामिल है। लेकिन कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी ने इसी संगठन की तारीफों के पुल बॉंध दिए। यह बात सामने आने के बाद कॉन्ग्रेस और यूडीएफ के उसके साथियों की जमकर किरकिरी हो रही है।

केरल के वायनाड से सांसद राहुल गाँधी ने 12 दिसंबर को लिखे पत्र में LKS की सराहना की। इसे भारतीय प्रवासी से जुड़ने का एक “महान मंच” बताया। राहुल गाँधी ने पत्र में लिखा,

“मैं मलयाली प्रवासी सदस्यों को उनकी अभूतपूर्व सफलता और राज्य के योग्य राजदूतों को बधाई देता हूँ। लोक केरल सभा प्रवासी भारतीयों से जुड़ने और उनके योगदान को पहचानने का एक बेहतरीन मंच है।”

केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से गुरुवार (2 जनवरी) को राहुल गाँधी का यह पत्र पोस्ट किया गया।

इसके बाद यूडीएफ को बेहद शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा। राहुल गाँधी ने LKS की प्रशंसा ऐसे समय में की जब राज्य के विपक्षी दलों अन्य नेताओं ने उससे दूरी बना राखी थी। बीजेपी नेता और केंद्रीय राज्य मंत्री, वी मुरलीधरन LKS के सम्मलेन के मुख्य अतिथि थे। लेकिन उन्होंने भी इसमें भाग नहीं लिया।

विपक्ष के नेता रमेश चेन्निथला ने जून 2019 में दो कारोबारियों की आत्महत्या के विरोध में LKS उपाध्यक्ष का पद छोड़ दिया था। मृतकों में कन्नूर से साजन परील और पुनालुर से सुगाथन शामिल थे। दोनों को कथित तौर पर उनके महँगे निर्माणों के लिए सरकार की ओर से प्रशासनिक मंज़ूरी नहीं दी गई। विपक्ष ने तिरुवनंतपुरम में लोक केरल सभा द्वारा आर शंकर नारायणन थम्पी हॉल के पुनर्निर्मित करने के खर्च पर भी नाराज़गी जताई थी।

LKS का तीन दिवसीय बैठक शुक्रवार (27 दिसंबर) को सम्पन्न हुआ था। राहुल गाँधी का प्रशंसा-पत्र सामने आने के बाद कॉन्ग्रेस नेता उनके बचाव में जुट गए हैं। पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल का कहना है कि राहुल गाँधी के पत्र में कुछ भी राजनीतिक नहीं है। उन्होंने त्रिशुर में कहा, “UDF ने जब LKS का बहिष्कार करने का फैसला किया उससे पहले ही यह पत्र भेजा जा चुका था।”

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CAA विरोध के नाम पर अब बंगाल को जलाएगा PFI, ममता के सांसद अबू ताहिर भी होंगे साथ!

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध के नाम पर उत्तर प्रदेश में हुई हिंसा में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) की संलिप्तता सामने आई है। इस कट्टरपंथी संगठन के अब तक 25 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं। राज्य के डीजीपी ओपी सिंह ने पीएफआई पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव तैयार कर गृह विभाग को भेजा है। यूपी में कसते शिकंजे के बाद अब इस कट्टरपंथी संगठन की नजर पश्चिम बंगाल पर है।

PFI के सदस्य हसीबुल इस्लाम ने 5 जनवरी को बंगाल के मुर्शिदाबाद में CAA के विरोध में प्रदर्शन का ऐलान किया है। उसका दावा है कि सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस के स्थानीय सांसद अबू ताहिर खान भी प्रदर्शन में शामिल होंगे।

हालाँकि, हसीबुल इस्लाम के इस दावे को अबू ताहिर खान ने खारिज किया है। उन्होंने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा, “मुझे ऐसे किसी भी प्रदर्शन की जानकारी नहीं है। अगर उन्होंने मेरा नाम अपने पोस्टर पर लिख दिया है, तो मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता।”

वैसे, महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि पीएफआई के प्रदर्शन में सत्ताधारी टीएमसी के सांसद शामिल होंगे या नहीं। हम सब जानते हैं कि किस तरह ममता बनर्जी की अगुवाई वाली सरकार अपनी राजनीतिक विरोधी भाजपा को राज्य में कार्यक्रम आयोजित करने की इजाजत देने से आनकानी करती रहती है। ऐसे में पीएफआई जैसे कट्टरपंथी समूह को प्रदर्शन की इजाजत किसने दी? यदि इजाजत नहीं दी गई है तो इसका सार्वजनिक तौर पर ऐलान करने के लिए इस समूह के लोगों पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई? यह सवाल इसलिए भी जरूरी हो जाता है क्योंकि सीएए के विरोध में बंगाल में समुदाय विशेष के लोगों द्वारा हिंसा, आगजनी, ट्रेनों पर हमले की कई घटनाएँ सामने आ चुकी है।

गौरतलब है कि पीएफआई खुद को गैर सरकारी संगठन बताता है। लेकिन सिमी का छोटा रूप कहे जाने वाले इस संगठन पर कई गैर-कानूनी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप है। गृह मंत्रालय का तो ये भी कहना है कि इस संगठन के लोगों के संबंध जिहादी आतंकियों से हैं। साथ ही इन पर इस्लामिक कट्टरवाद को बढ़ावा देने का भी आरोप है।

इसके अलावा बता दें कि यूपी में हुई हिंसा को लेकर भी कहा जा रहा है कि जाँच के दौरान पीएफआई से लिंक मिलने के पुख्ता प्रमाण मिले हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि संगठन से जुड़े आरोपितों के यहाँ से आपत्तिजनक सामग्रियाँ, साहित्य, सीडी आदि मिले थे। इसको आधार बनाकर पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया को बैन करने का प्रस्ताव उत्तर प्रदेश सरकार ने भेज दिया है।

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PFI के 150 कट्टरपंथी इस्लामी अलग-अलग राज्यों से जब आते हैं दिल्ली तो होता है जामिया दंगा: DP का खुलासा

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पाकिस्तान से जान बचाकर भागी हिंदू लड़की को राजस्थान में परीक्षा देने की इजाजत नहीं

बीते दिनों पाकिस्तान से भागकर आए तीन हिंदू बच्चों को दिल्ली के स्कूल में दाखिला पाने के लिए कई दिनों तक संघर्ष करना पड़ा था। उन्हें तो न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के बाद इंसाफ मिल गया था। लेकिन, अब एक ऐसा ही मामला राजस्थान से आया है। दमी कोहली नामक एक पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थी को राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड कथित तौर पर परीक्षा फॉर्म भरने की इजाजत नहीं दे रहा है। सभी प्रूफ जमा किए जाने के बाद भी उससे योग्यता प्रमाण पत्र माँगा जा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दमी कोहली कुछ साल पहले अपने परिवार के साथ पाकिस्तान के सिंध प्रांत से भारत आई थी। उसे और उसके परिवार को धार्मिक प्रताड़ना के कारण पाकिस्तान छोड़ना पड़ा था। उसने 10वीं तक की पढ़ाई पाकिस्तान में की है और अब जोधपुर से सटे आंगनवा रिफ्यूजी कैंप में रहती है। इसी जगह उसने साल 2018 में एक स्कूल में 11वीं में एडमिशन लिया था। उसने ग्याहरवीं की परीक्षा पास की और अब उसे 12वीं की परीक्षा देने की दरकार है। लेकिन शिक्षा बोर्ड उससे योग्यता प्रमाण-पत्र माँग रहा है।

समाचार एजेंसी एएनआई को दिए साक्षात्कार के अनुसार दमी कोहली बताती हैं, “2018 में मैंने स्कूल में एडमिशन लिया। मैंने साल भर पढ़ाई की और 11वीं की परीक्षा पास की। मेरे पास मार्क्स शीट भी है। अगली बोर्ड परीक्षा में महज एक महीने बचे हैं और मुझे नोटिस देकर बताया गया है कि परीक्षा में शामिल होने की इजाजत नहीं मिलेगी।” बता दें, अपनी बच्ची के साथ हुई नाइंसाफी पर लड़की के पिता ने बताया कि उनकी बेटी को बोर्ड परीक्षा में इजाजत नहीं दिए जाने का नोटिस थमाया गया है। वहीं हिंदू बच्ची का कहना है कि उसने स्कूल को सभी प्रूफ दिए हैं और उसे शिक्षा का अधिकार मिलना चाहिए।

गौरतलब है दमी कोहली के इस मामले ने राजस्थान में तूल पकड़ लिया है। जिसके बाद शिक्षा मंत्री गोविंद डोतासरा ने इस पर संज्ञान लिया और बताया कि पाकिस्तानी दूतावास को पत्र भेजकर लड़की के सिलेबस की पूरी जानकारी माँगी गई है।

शिक्षा मंत्री ने कहा, “उसने (दमी कोहली) पाकिस्तान बोर्ड से 10वीं की पढ़ाई पूरी की और अब राजस्थान में 12वीं की परीक्षा देना चाहती है। हमने पाकिस्तानी दूतावास को एक पत्र भेजकर उसके सिलेबस की जानकारी माँगी है। हमलोग राजस्थान और वहाँ के सिलेबस को मिला रहे हैं।”

शिक्षा मंत्री डोतासरा ने कहा है कि अगर उन्हें पाकिस्तान से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलती है तो लड़की को परीक्षा की इजाजत दी जाएगी। इसके अलावा अगर पाकिस्तान ने कुछ नहीं भी बताया तो भी वह नियमों में बदलाव कर उसे परीक्षा देने की अनुमति देंगे। बता दें, राजस्थान बोर्ड ने पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थी लड़की दमी कोहली का 12वीं का परीक्षा फॉर्म खारिज कर दिया है, क्योंकि उसने पाकिस्तान बोर्ड से 10वीं की पढ़ाई की है।

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केरल विधानसभा में पास हुआ ‘CAA विरोध प्रस्ताव’ गैरकानूनी और असंवैधानिक: आरिफ मोहम्मद खान

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ केरल विधानसभा में पास किए गए प्रस्ताव को केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने गैरकानूनी और असंवैधानिक करार दिया है। उनका कहना है कि नागरिकता विशेष रूप से केंद्र का विषय है, इसलिए इस प्रस्ताव का वास्तव में कुछ महत्व नहीं है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्होंने कहा, “इस प्रस्ताव की कोई कानूनी और संवैधानिक वैधता नहीं, क्योंकि नागरिकता केंद्र का मामला है। इसका राज्य से कोई मतलब ही नहीं है।”

यहाँ बता दें कि केरल के राज्यपाल शुरुआत से ही सीएए का विरोध करने वालों के ख़िलाफ़ रहे हैं। लेकिन अब उन्होंने बतौर राज्यपाल विधानसभा में पास किए प्रस्ताव को भी खारिज करते हुए कहा है कि ये प्रस्ताव स्पष्ट रूप से गैरकानूनी और असंवैधानिक है। स्पष्ट है कि अब केरल विधानसभा में राज्य सरकार द्वारा पास किए गए प्रस्ताव का कोई अर्थ नहीं रहा। क्योंकि इस प्रस्ताव पर आगे काम करने के लिए पिनरई विजयन सरकार को राज्यपाल के हस्ताक्षर लेने अनिवार्य हैं, जो खुले तौर पर इसकी मुखालफत कर रहे हैं।

गौरतलब है कि इससे पहले केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ केरल विधानसभा द्वारा पारित प्रस्ताव को असंवैधानिक बताया था। केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने संविधान के अनुच्छेद 245/46 और 256 का हवाला देते हुए कहा था कि केरल विधानसभा का प्रस्ताव गलत है और संविधान की भावनाओं के खिलाफ है।

अपनी बात को रखते हुए कानून मंत्री ने हैरानी प्रकट की थी कि जिस सरकार ने संविधान की शपथ ली है, वह गैर संवैधानिक बात कर रही है कि सीएए राज्य में लागू नहीं होने देंगे। यह कानून संसद द्वारा पारित है। नागरिकता लेना-देना संविधान की सातवीं अनुसूची का विषय है और इस पर कानून बनाने का अधिकार केवल संसद को है। इसलिए संसद नागरिकता संबंधी किसी विषय पर कानून बना सकती है।

मौलाना आज़ाद का जिक्र सुन बौखलाए इरफान हबीब, केरल के गवर्नर आरिफ मोहम्मद खान पर चीख पड़े

₹40 लाख/व्यक्ति/साल की कमाई, काम मु###नों को कट्टरपंथी बनाना: केरल में टेरर फंडिंग का नया खेल

₹40 लाख/व्यक्ति/साल की कमाई, काम मुस्लिमों को कट्टरपंथी बनाना: केरल में टेरर फंडिंग का नया खेल

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस्लामिक कट्टरपंथी संगठनों के टेरर फंडिंग के बारे में विवरण माँगा है। यह विवरण खासकर मध्य-पूर्व के देशों से आने वाली फंडिंग को लेकर है। गृह मंत्रालय ने मंगलवार (31 दिसंबर) को राज्यों व ख़ुफ़िया एजेंसियों से यह विवरण माँगा। ऐसी एक रिपोर्ट आई थी, जिसमें विदेशी सरज़मीं से इस तरह की फंडिंग का उदाहरण था। इस रिपोर्ट के आधार पर ही गृह मंत्रालय ने यह विवरण मँगाया है। इस संबंध में विभिन्न एजेंसियों ने बताया कि कट्टरपंथी संगठनों को संयुक्त अरब अमीरात, कतर और तुर्की से धन प्राप्त होता है।

दरअसल, गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट से ख़ुलासा हुआ है कि केरल में ऐसे लोगों को सलाना 40 लाख रुपए तक दिए जाते हैं, जो युवाओं को कट्टरपंथी बनाने के लिए तैयार करते हैं। केरल वर्षों से कट्टरता का केंद्र बना हुआ है और राज्य में कई समूह हैं, जो कट्टरपंथी इस्लाम का प्रचार करते हैं।

ख़बर के अनुसार, एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी ने बताया,

“19 सितंबर को कट्टरपंथी इस्लामी संगठन के एक वरिष्ठ सदस्य ने दुबई का दौरा किया, जहाँ उसे कट्टरपंथी विचारधाराएँ फैलाने के लिए भारतीय मुद्रा में 40 लाख रुपए देने की पेशकश की गई।”

इसका सीधा मतलब है कि वहाँ उस व्यक्ति को इतनी बड़ी राशि देने की बात की गई, ताकि वो बड़े स्तर पर युवाओं को कट्टरपंथी विचारधारा से जोड़ सके। उसे यह भी कहा गया कि वो अधिक से अधिक युवाओं की भर्ती करे। इसी तरह की एक और घटना भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के सामने आई, जिसमें उसी संगठन के सदस्य कतर और तुर्की के कुछ लोगों से मिले और ग़ैर-मुस्लिम समुदायों के ख़िलाफ़ जेहाद फैलाने के लिए धन की माँग की।

एक अधिकारी ने स्पष्ट किया कि केरल में कट्टरपंथी उग्रता है। और वहाँ कई युवा कट्टरपंथी इस्लामी समूहों द्वारा फँसाए जा रहे हैं। उन्होंने बताया, “पहले इन समूहों को पहचानने की ज़रूरत है और बाद में इस तरह की अवैध गतिविधियों के ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।”

अधिकारी ने बताया, “एक दर्जन से अधिक लोगों को गिरफ़्तार किया गया है। NIA ने ISIS के संदिग्ध सदस्यों के ख़िलाफ़ ग़ैर-क़ानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत कई मामले दर्ज किए हैं।”

उन्होंने बताया कि केरल में संदिग्ध आतंकी संगठनों पर नकेल कसने के बाद से, कुछ कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों ने विदेशी धरती से धन प्राप्त करने के बाद भारत-विरोधी गतिविधियों में शामिल होना शुरू कर दिया है। गृह मंत्रालय को बताया गया कि केरल में कई ऐसे छोटे समूह हैं, जो मुस्लिम युवाओं को सक्रिय रूप से कट्टरपंथी बना रहे हैं। विदेशी (जो भारत विरोधी हैं) केरल के इन समूहों की पहचान करते हैं, फिर उन्हें बड़ी रकम की पेशकश करते हैं।

भारतीय ख़ुफ़िया ब्यूरो ने हमेशा से कट्टरपंथी समूहों के ख़तरे के बारे में चेतावनी दी है। अब पाकिस्तान में हुए एक अध्ययन में भी इस बात की पुष्टि हुई है कि केरल का आतंकी संगठन ISIS से भी संबद्धता रखता है।

पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट एंड सिक्योरिटी स्टडीज के प्रबंध निदेशक अब्दुल्ला ख़ान द्वारा आयोजित ‘दक्षिण एशिया में विस्तार की संभावनाएँ’ शीर्षक से एक अध्ययन के मुताबिक़, भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान में विलायत-ए-हिन्द एक नया अध्याय है, जो जल्दी से शिक्षित युवाओं को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। इसके अनुसार, भारतीय नागरिक, विशेष रूप से केरल के लोग इस्लामिक स्टेट को दूसरे समूह की तुलना में अधिक आकर्षक लगते हैं। केरल के 54 लोग पिछले तीन वर्षों में ISIS में शामिल हो चुके हैं।

जानकारी के अनुसार, लगभग 1000 वहाबी प्रचारक (कट्टर इस्लाम के प्रचारक) केरल राज्य में आए, अपनी विचारधारा को फैलाया, पानी की तरह पैसा बहाया और फिर वहाँ से चले गए। उन्होंने नई मस्जिदों के निर्माण पर भारी खर्च किया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि इन धार्मिक स्थलों से कट्टचरपंथी विचारधारा का प्रचार किया जाएगा।

केरल में जो नई मस्जिदें बन रही हैं, उनका निर्माण भी उसी तरह से हो रहा है जैसा कि सऊदी अरब में हुआ है। यह सिर्फ़ एक छोटा सा संकेत है कि राज्य के लोग वहाबी विद्वानों द्वारा प्रचारित कट्टरपंथी शैली का पालन करने के लिए कितने तैयार हैं।

इसके अलावा, सऊदी से केरल में धन की आमद देश के किसी अन्य हिस्से की तुलना में सबसे अधिक है। यह वही केरल है, जहाँ एक शख़्स ओसामा बिन लादेन की मौत पर उसका पोस्टर लिए विलाप करते हुए दिखा था और अजमल कसाब को फाँसी दिए जाने के बाद उसने प्रार्थना भी की थी। इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारियों ने बताया कि बड़ी संख्या में युवा इस्लाम की इस कट्टरपंथी शैली से आकर्षित हो रहे हैं, लेकिन साथ में उन्होंने यह भी बताया कि कुछ बुजुर्ग हैं, जो इसका विरोध करने की कोशिश करते हैं।

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मध्य प्रदेश में अफसर बनना है तो पढ़ना पड़ेगा नेहरू को, कॉन्ग्रेसी सरकार ने लागू किया नया पाठ्यक्रम

वर्तमान में कॉन्ग्रेस शासित राज्य मध्य प्रदेश में लोक सेवा आयोग (MPPSC) की परीक्षा पास कर क्लास 1 अधिकारी बनने के लिए अब अभ्यर्थियों को देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के विचारों को भी पढ़ना अनिवार्य होगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि ‘राज्यसेवा परीक्षा’ के लिए पीएससी (MPPSC) द्वारा जारी संशोधित पाठ्यक्रम में पं. नेहरू को शामिल किया गया है। उन्हें दार्शनिक और विचारकों की सूची में राज्यसेवा के पाठ्यक्रम में जगह दी गई है। ये संशोधित पाठ्यक्रम राज्यसेवा परीक्षा-2020 से लागू होगा।

नई दुनिया की रिपोर्ट के अनुसार पीएससी सचिव रेणु पंत ने इस बदलाव पर कहा, “हमने सिलेबस को बेहतर और भविष्य के अधिकारियों की आवश्यकता के हिसाब से अपडेट किया है। यह विद्यार्थियों के लिए भी सुविधाजनक होगा।”

गौरतलब है कि नए पाठ्यक्रम में प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा के पेपरों की संख्या और परीक्षा योजना में किसी तरह का बदलाव नहीं किया गया है। पीएससी की मुख्य परीक्षा में पहले की तरह कुल 6 पेपर ही होंगे। इनमें से 4 पर्चे सामान्य अध्ययन के होंगे, जिनके पाठ्यक्रम को पुनः निर्धारित किया गया है। पहले पेपर में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है।

लेकिन सामान्य अध्य्यन के दूसरे पेपर में संविधान, शासन व्यवस्था व राजनैतिक प्रशासन के साथ ही अर्थशास्त्र, समाज शास्त्र और मानव संसाधन विकास को जोड़ा गया है। इसी पेपर की चौथी इकाई भारतीय राजनीतिक विचारकों की रखी गई है। इसमें विचारकों के रूप में कुल 8 लोगों को शामिल किया गया है। इनमें कौटिल्य, महात्मा गाँधी, सरदार पटेल, जयप्रकाश नारायण (जेपी), डॉ अंबेडकर, राममनोहर लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय के साथ पंडित जवाहरलाल नेहरू का नाम शामिल है।

यहाँ स्पष्ट कर दें कि अब तक राज्यसेवा की मुख्य परीक्षा के पाठ्यक्रम में कौटिल्य से लेकर गाँधी, बुद्ध और शंकराचार्य जैसे 20 विचारकों, दार्शनिकों व समाज सुधारकों के नाम शामिल थे, लेकिन नेहरू को जगह नहीं दी गई थी। उन्हें बीते वर्षों में सिलेबस से बाहर कर दिया गया था।

बता दें कि रिपोर्ट के मुताबिक राज्यसेवा की तैयारी करवाने वाले प्रदीप श्रीवास्तव ने बदलाव को बेहतर बताया है। क्योंकि, लोक प्रशासन को भी पाठ्यक्रम में खासी जगह दी गई है। कानून वाला हिस्सा हटाया भी गया है। खास बात ये है कि पं नेहरू को शामिल करने के साथ दीनदयाल उपाध्याय को भी बरकरार रखा गया है। प्रश्न पत्रों में प्रश्नों के अंक का विभाजन और शब्द सीमा भी बदली गई है।

सभी बांग्लादेशी मूल रूप से हिन्दू, इस्लाम तो बाद में आया: प्रियंका चोपड़ा के अमेरिकी शो की लेखिका अहमद

अमेरिका में रहने वाली बांग्लादेश की लेखिका शरबरी जोहरा अहमद का मानना है कि मूल रूप से हिन्दू होने की वजह से बांग्लादेशी लोग भारतीयों की तरह हैं। हालाँकि, लेखिका का कहना है कि अब बांग्लादेशी लोग अपनी जड़ों को भूल गए हैं। शरबरी का जन्म बांग्लादेश के ढाका में हुआ था और वह जब सिर्फ तीन सप्ताह की थीं तभी अमेरिका चली गईं थीं।

लोकप्रिय अमेरिकी टेलीवीजन शो ‘क्वांटिको’ की पटकथा की सहलेखिका शरबरी ने कहा कि उन्हें इस बात का अफ़सोस है कि दक्षिणपंथी धार्मिक समूहों के प्रभाव की वजह से एक बंगाली के तौर पर उनकी पहचान बांग्लादेश में खोती जा रही है। ‘क्वांटिको’ में भारतीय अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने मुख्य भूमिका निभाई है।

लेखिका शरबरी ने पीटीआई-भाषा से बातचीत में कहा, “कैसे बांग्लादेश अपनी हिन्दू विरासत से इनकार कर सकता है? हम मूल रूप से हिन्दू थे। यहाँ इस्लाम बाद में आया। ब्रिटेन ने हमारा उत्पीड़न किया, हमसे छीना और हमारी हत्याएँ की।” उन्होंने कहा कि अविभाजित भारत के ढाका में फलते-फूलते मलमल उद्योग को अंग्रेजों ने तबाह कर दिया।

उन्होंने कहा कि उनकी आस्था के सवाल और बांग्लादेश में पहचान के मुद्दे ने उन्हें ‘Dust Under Her Feet’ उपन्यास लिखने के लिए प्रेरित किया। बांग्लादेश में इस्लाम राजधर्म है। सरबरी ने विंस्टन चर्चिल को ‘नस्लवादी’ बताया। लेखिका ने कहा, “अपने सैनिकों के लिए वह बंगाल से चावल ले गए लेकिन बताए जाने के बावजूद उन्होंने यहाँ के लोगों की परवाह नहीं की।”

लेखिका ने कहा:

“अपनी रिसर्च के दौरान मुझे पता चला कि क़रीब 20 लाख बंगाली चर्चिल की वजह से उत्पन्न कृत्रिम अकाल से मर गए। जब लोग चर्चिल की प्रशंसा करते हैं तो यह वैसा ही है जैसे कि कोई यहूदियों के सामने हिटलर की प्रशंसा करे। वह भयानक इंसान था।”

उन्होंने कहा कि उनकी किताब में यह बताने की कोशिश की गई है कि वाकई उस समय क्या हुआ था। यह किताब द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान कोलकाता की पृष्ठभूमि में लिखी गई है। उस समय बड़ी संख्या में अमेरिकी सैनिक शहर में आए थे।

लेखिका ने कहा कि विडंबना यह थी कि जब ये अमेरिकी सैनिक स्थानीय लोगों से अच्छे थे, तो वे तथाकथित “Black” सैनिकों को अलग कर देते थे। उन्होंने कहा, “कलकत्ता एक कॉस्मोपॉलिटन था और बाक़ी दुनिया को यह जानने की ज़रूरत है कि तब शहर के लोगों का किस तरह से शोषण किया गया, उनके खजाने को लूटा गया, लोगों को बाँटा गया और नफ़रत पैदा की गई।”

लेखिका शरबरी जोहरा अहमद ने कहा, “मेरी माँ के यहाँ जन्म लेने के बाद से ही मेरे पहले उपन्यास के लिए कोलकाता मेरी पसंद था। उन्होंने (माँ) ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के दौर को तब देखा था, जब वह एक बच्ची थीं और उन्हें गहरा आघात पहुँचा था। उन्होंने देखा था कि पार्क सर्कस में अपने घर के पास मु###नों द्वारा एक हिन्दू को कैसे मार दिया गया था।”

डायरेक्ट एक्शन डे – इसे कलकत्ता में नृशंस हत्याओं के रूप में जाना जाता है। 16 अगस्त 1946 को बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक दंगा हुआ था, जो अगले कुछ दिनों तक जारी रहा था। इस हिंसा में हज़ारों लोग मारे गए थे।

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