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केवल 900 मरे हैं, 6 साल में यह सबसे कम है: बच्चों की मौत पर अशोक गहलोत ने कहा- यह नई बात नहीं

3 दिन की रेखा, 2 दिन की कांता, 1 दिन की नरगिस सहित 6 बच्चे कोटा के जेकेलोन अस्पताल में 23 दिसंबर को मर गए। अगले दिन यानी 24 दिसंबर को इसी अस्पताल में 1 दिन के तोली सहित 4 और बच्चों की मौत हो गई। दो दिन में 10 बच्चे और एक महीने में 77 बच्चों की मौत हो चुकी है। आपके लिए भले ये बच्चे हों, लेकिन राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार के लिए महज नंबर हैं। यकीन नहीं होता तो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की बातों पर गौर कर लें। शनिवार को मीडिया से बात करते हुए गहलोत ने कहा कि राज्य के हर अस्पताल में रोजाना 3-4 मौतें होती हैं। यह कोई नई बात नहीं है। लगे हाथ उन्होंने यह भी दावा किया कि इस साल केवल 900 मौतें हुई हैं जो बीते 6 साल में सबसे कम है।

गहलोत ने इतनी असंवेदनशील बात तब कही जब पत्रकारों ने उनसे बच्चों की मौत की जिम्मेदारी को लेकर सवाल किया। उन्होंने कहा, “6 साल में सबसे कम मौतें हुई हैं। एक भी बच्चे की मौत दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन 1500, 1300 मौतें भी बीते सालों के दौरान हुई है। इस साल यह आँकड़ा 900 है। देश और राज्य के हरेक अस्पताल में रोज कुछ मौतें होती ही हैं। कदम उठाए जाएँगे।”

मुख्यमंत्री गहलोत के मुताबिक उन्होंने इस मामले में जाँच कराई है और एक्शन भी लिया जा रहा है। उनके मुताबिक अपनी सरकार के पिछले टर्म में भी उन्होंने अस्पतालों के ऑपरेशन थिएटर को लंबे अंतराल के बाद अपग्रेड करवाया था। इससे पहले शुक्रवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने ट्वीट कर बच्चों की असमय मौत की तरफ मुख्यमंत्री गहलोत का ध्यान खींचा था।

पत्रिका के कोटा संस्करण में प्रकाशित खबर

यहाँ बता दें कि मामले के तूल पकड़ने के बाद मुख्यमंत्री ने चिकित्सा शिक्षा सचिव वैभव गालरिया को कोटा पहुँचकर हालात देखने के निर्देश दिए थे। जिसके बाद गालरिया ने वहाँ पहुँचकर जाँच कमेटी के साथ अपनी जाँच शुरू की और निरीक्षण करने के बाद अव्यवस्थाओं के लिए अधीक्षक डॉ. एच एल मीणा को जिम्मेदार मानते हुए पद से हटया गया। अब डॉ. सुरेश दुलारा इस अस्पताल के नए अधीक्षक होंगे।

आज भाजपा के एक प्रतिनिधिमंडल ने भी अस्पताल पहुँचकर हालात का जायजा लिया है। इसके बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी के वहाँ न पहुँचने पर सवाल उठाए। लोगों ने कहा कि प्रियंका और राहुल गाँधी को कॉन्ग्रेस शासित प्रदेशों में हो रही इस तरह की घटनाएँ नजर नहीं आती।

मौलाना आज़ाद का जिक्र सुन बौखलाए इरफान हबीब, केरल के गवर्नर आरिफ मोहम्मद खान पर चीख पड़े

राम मंदिर मामले में अड़ंगा डाल चुके वामपंथी इतिहासकार इरफान हबीब को मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का नाम तक सुनना गॅंवारा नहीं है। शायद इसलिए क्योंकि राष्ट्रीयता और भारतीयता में मौलाना का यकीन गहरा था। धर्म के आधार पर भारत के विभाजन का उन्होंने विरोध किया था। पाकिस्तान परस्तों को चेताया था।

ताजा घटना केरल के कन्नूर की है। यहॉं भारतीय इतिहास कॉन्ग्रेस को राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान संबोधित कर रहे थे। इस दौरान संशोधित नागरिकता कानून (CAA) के विरोध में हुए प्रदर्शन पर चर्चा करते हुए उन्होंने मौलाना आजाद का हवाला दिया। फिर क्या था इरफान हबीब सीधे मंच पर पहुॅंच गए और राज्यपाल को बोलने से रोकने की कोशिश की। केरल गवर्नर के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से यह जानकारी दी गई है। ट्वीट कर बताया गया है कि जब राज्यपाल ने मौलाना आजाद का हवाला दिया तो इरफान हबीब मंच पर पहुॅंच गए। उन पर चिल्लाने लगे। राज्यपाल के सुरक्षाकर्मियों के साथ धक्का मुक्की की।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कन्नूर विश्वविद्यालय में आयोजित इस समारोह में आरिफ मोहम्मद खान मुख्य अतिथि थे। उनसे पहले कॉन्ग्रेस को संबोधित करते हुए माकपा के राज्यसभा सदस्य केके रागेश और इतिहासकार इरफान हबीब ने नागरिकता संशोधन कानून का मुद्दा उठाया था। लेकिन जब आरिफ खान ने इस मुद्दे पर दोनों वक्ताओं द्वारा उठाए गए मुद्दे पर जवाब देना शुरू किया तो वहाँ बैठे कुछ प्रतिनिधियों और छात्रों ने उनका विरोध शुरू कर दिया और इसी बीच इरफान हबीब भी स्टेज पर चढ़ आए। बताया जा रहा है कि जैसे ही राज्यपाल ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में हुए प्रदर्शन के बारे में कार्यक्रम में बोलना शुरू किया, तभी इतिहासकार इरफान हबीब स्टेज पर पहुँचे और उन्होंने न केवल उनके भाषण को बाधित किया, बल्कि उन्हें बोलने से रोकने की कोशिश भी की। इसके बाद राज्यपाल ने कहा कि विरोध करने का हक सभी को है, लेकिन आप किसी को चुप नहीं करा सकते।

इरफान हबीब ने चिल्लाते हुए राज्यपाल से कहा, “तुम्हें तो गोडसे का उल्लेख करना चाहिए।” इतना ही नहीं, इस दौरान इतिहासकार इरफान हबीब अपना आपा खो बैठे और उन्होंने राज्यपाल के एडीसी और सुरक्षा अधिकारियों को भी धक्का दिया।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक, कहा जा रहा है जिन छात्रों ने कार्यक्रम में केरल राज्यपाल का विरोध किया, उनमें दिल्ली के जामिया मिलिया, AMU, और जेएनयू के कुछ छात्र भी शामिल थे। जिन्होंने इस बीच राज्यपाल के खिलाफ कुछ प्रतिनिधियों ने नारे भी लगाए। जिसके कारण वहाँ मौजूद पुलिस को उन छात्रों को बाहर निकालना पड़ा।

इस घटना पर बात करते हुए आरिफ मोहम्मद खान ने पत्रकारों से कहा कि वह इस मुद्दे पर बोलना नहीं चाहते थे। लेकिन उनसे पहले कुछ वक्ताओं ने सीएए को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शन का मुद्दा उठाया तो राज्यपाल के तौर पर उनकी संविधान की रक्षा करने की जिम्मेदारी है, इस नाते उन्हें उन लोगों द्वारा उठाए गए मुद्दे पर स्थिति साफ करने के लिए बोलने के लिए मजबूर होना पड़ा।

बता दें कि भाजपा महासचिव एमटी रमेश ने राज्यपाल के विरोध को सरकार प्रायोजित करार दिया है। उन्होंने इस पूरी घटना की जाँच कराने की माँग की और साथ ही इसे राज्यपाल की सुरक्षा में चूक का मामला बताया। गौरतलब है कि बीते दिनों कॉन्ग्रेस ने भी आरिफ मोहम्मद खान को भेजा एक न्योता रद्द कर दिया था। खान ने सीएए का समर्थन करते हुए कहा था कि इसके जरिए मोदी सरकार ने महात्मा गॉंधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस द्वारा किए गए वादे को पूरा किया है।

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वे देश विरोधी नारे लगा रहे थे, आपत्तिजनक पर्चे बाँट रहे थे: ‘पाकिस्तान चले जाओ’ पर ADG

नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के ख़िलाफ़ देशभर में विरोध-प्रदर्शनों का दौर जारी है। कई जगहों पर विरोध-प्रदर्शनों की आड़ में उपद्रवियों ने पुलिस को निशाना बनाया और उनपर जानलेवा हमले किए। इस बीच, उत्तर प्रदेश में मेरठ के एसपी सिटी अखिलेश नारायण सिंह का एक वीडियो वायरल होने के बाद राजनीति तेज़ हो गई है। जहाँ, एक तरफ प्रियंका गाँधी ने इस वीडियो को ट्वीट करते हुए सवाल खड़ा किया, तो वहीं दूसरी तरफ़ एसपी सिटी डॉ. अखिलेश नारायण सिंह ने कहा है कि पाकिस्तान के पक्ष में नारे लगाने वाले उपद्रवियों को हमने वहाँ से भगाया।

इस मामले पर एडीजी प्रशांत कुमार का कहना है कि पुलिसकर्मियों की तरफ से कोई गोलीबारी नहीं हुई थी। उन्होंने एसपी का बचाव करते हुए कहा कि वायरल हुआ वीडियो बीते 20 दिसंबर को मेरठ शहर में हुए उपद्रव के बाद का है। उन्होंने बताया कि इसमें तथ्य यह है कि वहाँ भारत-विरोधी और पड़ोसी देश (पाकिस्तान) ज़िंदाबाद के नारे लगाए जा रहे थे और कुछ लोग पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (PFI) और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया (SDPI) के आपत्त्तिजनक पर्चे बाँट रहे थे।

इस सूचना पर एसपी सिटी और एडीएम सिटी मौक़े पर पहुँचे। उन्होंने उपद्रवियों से कहा था आप जाना चाहते हैं तो कहीं भी जाए लेकिन यहाँ उपद्रव ना करें। उन्होंने कहा कि घटना के एक सप्ताह बाद इस तरह का वीडियो वायरल होना विशेषकर जब कल शुक्रवार (27 दिसंबर) को शांति का माहौल था, एक साज़िश का हिस्सा है, जिससे यहाँ के हालात सामान्य ना हो पाएँ।

इस मामले में मीडिया से एसपी सिटी ने कहा था कि जो कुछ भी वीडियो में सुना गया है वह प्रदर्शनकारियों के उस समूह को जवाब था जो पाकिस्तान के समर्थन में ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ के नारे लगा रहे थे। बता दें कि अब इस मामले ने तूल पकड़ लिया है और मेरठ के एडीजी ने कहा कि उक्त युवाओं के ख़िलाफ़ देशद्रोह की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया जा रहा है।

दरअसल, सोशल मीडिया पर 20 दिसंबर का एक वीडियो वायरल हो रहा है। इसमें एडीएम सिटी अजय तिवारी और एसपी सिटी अखिलेश नारायण सिंह हिंसा के दौरान गली के अंदर भाग रहे कुछ उपद्रवियों से कहा था कि जहाँ जाओगे, चले जाओ। हम ठीक कर देंगे। काली पट्टी बांधकर विरोध जता रहे हो, खाओगे यहाँ और गाओगे वहाँ का। एसपी का ये बयान वायरल होने के बाद मेरठ पुलिस ने दावा किया कि कुछ उपद्रवियों ने काली पट्टी बाँधकर पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाए थे।

नागरिकता (संशोधन) कानून की आवश्यकता क्यों?

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J&K: अब शेख अब्दुल्ला की पैदाइश पर छुट्टी नहीं, भारत में विलय के 72 साल बाद 26 अक्टूबर को अवकाश

आर्टिकल 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने शुक्रवार (दिसंबर 27, 2019) को नए साल 2020 के लिए सरकारी छुट्टियों का कैलेंडर जारी किया। नए कैलेंडर में शहीदी दिवस (जुलाई 13) की छुट्टी खत्म कर दी गई है। साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला के अब्बा मरहूम शेख अब्दुल्ला के जन्मदिवस (दिसंबर 05) पर भी अब सरकारी छुट्टी नहीं होगी।

इसके अलावा प्रशासन ने नए कैलेंडर में 26 अक्टूबर को मनाए जाने वाले विलय दिवस पर राजकीय अवकाश रखा है। लेकिन विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले महाराजा हरि सिंह की जयंती पर छुट्टी का नहीं होगी।

ये सारी जानकारी सामान्य प्रशासन विभाग के उपसचिव जीएल शर्मा की ओर से शुक्रवार देर रात सूची जारी कर दी गई। सूची के अनुसार, 2020 में जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश में 27 सरकारी छुट्टियाँ होंगी। 2019 की तुलना में एक छुट्टी कम। नई सूची में सिर्फ़ विलय दिवस का अवकाश ही नया है।

उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर की तरह लद्दाख ने भी अपना कैलेंडर जारी करते हुए शहीदी दिवस और शेख अब्दुल्ला के जन्मदिवस पर अवकाश रद्द कर दिया है। इसके बाद अब लद्दाख में कुल छुट्टियों की संख्या 46 रह गई है। वर्ष 2019 में कुल 51 छुट्टियों की सूची जारी की गई थी। इसमें गजटेड छुट्टियाँ 28, कश्मीर संभाग की 4, जम्मू संभाग की 3, स्थानीय-12 तथा प्रतिबंधित छुट्टियाँ 4 थीं। वर्ष 2020 के लिए जारी सूची में गजटेड छुट्टियाँ 27, कश्मीर संभाग की 4, जम्मू संभाग की 3, स्थानीय-04 तथा प्रतिबंधित छुट्टियाँ 4 हैं।

यहाँ बता दें कि जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के लगभग 72 साल बाद विलय दिवस पर अवकाश का ऐलान हुआ है। भारतीय जनता पार्टी, पैंथर्स पार्टी समेत कई राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन बरसों से विलय दिवस पर अवकाश की माँग कर रहे थे। वहीं, जम्मू-कश्मीर में अब तक शहीदी दिवस की छुट्टी हुआ करती थी। यह अवकाश 13 जुलाई 1931 को कश्मीर में महाराजा के खिलाफ हुए एक विद्रोह में मारे गए लोगों की याद में मनाया जाता था। 13 जुलाई को हर साल जम्मू-कश्मीर में सरकारी स्तर पर शहीदी दिवस मनाया जाता था।

आजम खान की जुबान बोले राहुल गॉंधी,‘रेप इन इंडिया’ के बाद चड्डी पर पहुँचे

उत्तर प्रदेश में 2017 में विधानसभा चुनाव हुए थे। कॉन्ग्रेस ने सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। चुनाव में औंधे मुॅंह गिरने के बाद यह गठजोड़ टूट गया। लेकिन, अब लगता है कि इस गठजोड़ ने राहुल गॉंधी पर गहरा असर छोड़ा था। यही कारण है कि सपा नेताओं की तरह ही विवादित बयान देने में वे महारत हासिल करते जा रहे हैं।

इस साल जब लोकसभा चुनाव हुए थे तो सपा नेता आजम खान ने अपनी प्रतिद्वंद्वी महिला उम्मीदवार पर निशाना साधते हुए कहा था कि उनकी अंडरवियर का रंग खाकी है। शनिवार (28 दिसंबर 2019) को उसी जुबान में कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी भी चड्डी तक पहुॅंच गए। बीते दिनों ही राहुल ने ‘मेक इन इंडिया’ का माखौल उड़ाते हुए कहा था कि ‘रेप इन इंडिया’ बना दिया है।

गुवाहाटी में एक रैली को संबोधित करते हुए राहुल गाँधी ने कहा, ”हम बीजेपी और RSS को असम की हिस्ट्री (इतिहास), भाषा, संस्कृति पर आक्रमण नहीं करने देंगे। असम को नागपुर नहीं चलाएगा, असम को RSS की चड्डी वाले नहीं चलाएँगे। असम को असम की जनता चलाएगी।”

उन्होंने कहा, ”असम समझौते की भावना को समाप्त नहीं किया जाना चाहिए, जिस वजह से शांति आई है।” कॉन्ग्रेस नेता ने कहा कि उन्हें संदेह है कि बीजेपी की नीतियों के कारण असम हिंसा के रास्ते पर लौट रहा है। राहुल गाँधी ने कहा, ”बीजेपी जहाँ भी जाती है, नफ़रत फैलाती है। असम में युवा विरोध कर रहे हैं, अन्य राज्यों में भी विरोध हो रहा है। आप उन्हें क्यों मार रहे हैं? बीजेपी लोगों की आवाज़ नहीं सुनना चाहती।”

उन्होंने कहा,

”ये (NRC और NPR) नोटबन्दी नंबर 2 है। इससे हिन्दुस्तान के गरीबों को बहुत नुकसान होने जा रहा है। नोटबन्दी तो भूल जाइए, ये उससे दोगुना झटका होगा। इसमें हर गरीब आदमी से पूछा जाएगा कि वह हिन्दुस्तान का नागरिक है या नहीं। लेकिन, उनके जो 15 दोस्त हैं उनको कोई दस्तावेज़ दिखाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।”

राहुल गाँधी के इस विवादित बयान पर पलटवार करते हुए राज्यसंभा सांसद और RSS विचारक राकेश सिन्हा ने कहा, ”राहुल गाँधी देश की राजनीति के विमर्श और संस्कृति और भाषा को न्यूनतम स्तर पर ले जा रहे हैं। वे गाली-गलौज वाली भाषा का उपयोग कर राजनीति के स्तर को गिरा रहे हैं। RSS पर उनका बयान इसका ताज़ा उदाहरण है।”

एक ट्वीट में उन्होंने कहा है, “अब ‘चड्डी’ के बाद आगे और किस किस ‘पोशाक’ का नाम लेकर गाली देंगे? ध्यान रखिएगा देश की राजनीति को चाणक्य, चन्द्रगुप्त, गाँधी, लोहिया, दीनदयाल जी जैसे लोगो ने सींचा है।”

वहीं, दूसरी तरफ़ कॉन्ग्रेस की महासचिव प्रियंका गाँधी ने लखनऊ में CAA के मुद्दे पर मोदी सरकार को कायर करार देते हुए कहा, “जिन्होंने देशभर में NRC की चर्चा शुरू की वे आज कहते हैं कि चर्चा ही नहीं हुई। यह देश उनको पहचान रहा है। उनकी कायरता को पहचान रहा है। उनके झूठ से उब चुका है।”

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8 दिन के लिए जेल भेजी गई पायल रोहतगी, लोगों ने पूछा- सावरकर के अपमान पर राहुल गाँधी की गिरफ्तारी कब

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तीन तलाक पीड़िताओं से योगी सरकार ने निभाया वादा, नए साल से 6000 रुपए पेंशन

उत्तर प्रदेश सरकार ने ट्रिपल तलाक पीड़िताओं को नए साल पर बड़ी राहत देने का ऐलान किया है। योगी सरकार पीड़िताओं को सालाना 6000 रुपए पेंशन देगी।

बता दें मोदी सरकार ने कानून बनाकर ट्रिपल तलाक को गैर कानूनी कर दिया है। कानून बनने के बाद यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार ने तत्काल कार्रवाई शुरू कर दी थी। सीएम योगी ने तलाक पीड़िताओं से मुलाकात की थी और पेंशन देने का वादा किया था। हालाँकि, उस समय पीड़ित वर्ग के लिए पेंशन की राशि तय नहीं हुई थी। लेकिन अब वित्त मंत्रालय 6000 रुपए सालाना की राशि तय की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पीड़ित महिलाओं को 6000 रुपए की सालाना राशि नए साल से मिलनी शुरू हो जाएगी। आँकड़ों के मुताबिक करीब दस हजार महिलाओं को पहले तीन महीने में ही पेंशन की राशि दी जाएगी।

बता दें, एक ओर तीन तलाक कानून पर मजहबी ठेकेदार जहाँ सवाल उठाकर इसे मजहब में हस्तक्षेप करार देने में जुटे हुए थे। वहीं जानकारी के मुताबिक उत्तर प्रदेश में केवल एक साल में ही 270 से ज्यादा तीन तलाक मामले दर्ज हुए हैं। जिनकी पीड़ा को समझते हुए योगी सरकार ने ये फैसला 25 सितंबर को किया था।

उस समय योगी सरकार ने कहा था कि जिन पीड़ित महिलाओं के पास आवास नहीं हैं, उन्हें प्रधानमंत्री आवास या फिर मुख्यमंत्री आवास से घर दिया जाएगा। इन परिवारों को प्रधानमंत्री की आयुष्मान योजना या फिर मुख्यमंत्री की आरोग्य योजना से स्वास्थ्य बीमा का लाभ भी दिया जाएगा। इसके अलावा वक्फ संपत्तियों में इन महिलाओं को हक दिलाने के लिए भी योजना बनाने का आश्वासन योगी सरकार ने महिलाओं को दिया था।

बता दें, इस दौरान सीएम योगी ने हिन्दू महिलाओं के अधिकारों को लेकर भी महत्वपूर्ण बात कही थी। उन्होंने कहा था कि शादी के बाद किसी दूसरी महिला से संबंध रखने वाले हिंदू पुरुषों पर भी कार्रवाई की जाएगी। साथ ही हिंदू परित्यक्ता महिलाओं को भी ऐसा ही न्याय दिलाया जाएगा।

शौहर ने दिया तीन तलाक, ‘अब्बा’ ने हलाला के नाम पर किया बलात्कार: MP में शर्मनाक घटना

सुबह शौहर ने दिया तीन तलाक, रात को साथी के साथ कमरे में घुस आया ससुर, कट्टा दिखाकर किया बलात्कार

छोटे कपड़े पहनकर नाइट पार्टी में जाने को कहता था इमरान, नूरी ने नहीं मानी बात तो दे दिया तीन तलाक!

आरती की तरह हाथ घुमा रही थी बेटी तो तोड़ दी टीवी: शाहिद अफरीदी की कट्टरता पर पाकिस्तानी फ़िदा

हाल में ही दानिश कनेरिया के साथ हिंदू होने के कारण पाकिस्तानी क्रिकेट टीम में भेदभाव का मामला सामने आया था। अब पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर शाहिद अफरीदी का एक वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है। इसमें अफरीदी हिंदू परंपराओं का अपमान करते नजर आ रहे हैं और वहाँ मौजूद लोग उनकी बातों पर ताली बजा रहे हैं।

वीडियो में शाहिद अफरीदी एक चैट शो में महिला होस्ट के सवालों का जवाब देते रहे हैं। महिला होस्ट उनसे पूछती हैं कि क्या उन्होंने कभी टीवी तोड़ा है? जिसका जवाब वो ‘हाँ’ में देते हैं और आगे कहते हैं कि उन्होंने ऐसा अपनी बेगम में कारण किया।

टीवी तोड़ने के वाकये के बारे में बताते हुए अफरीदी कहते हैं कि पहले स्टारप्लस के ड्रामे बहुत चला करते हैं, तो वे अपनी बेगम को मना करता था कि अगर उन्हें ये सब देखना हो तो वो अकेले में देख लिया करें। अपने साथ बच्चों को न बिठाया करें। वीडियो के शुरू होने के मात्र 30 सेकेंड में ही अफरीदी के हाव-भाव देखकर समझा जा सकता है कि उनकी दिक्कत ये नहीं है कि उनकी बेगम बच्चों के आगे ड्रामा/ सीरियल देख रही हैं। उनकी दिक्कत ये हैं कि वो बच्चों के आगे हिंदुस्तानी सीरियल देख रही हैं।

अफरीदी आगे बताते हैं कि एक बार वो अपने घर में आए, तो अक्शा या अंशा (उनकी बेटियाँ) में से कोई एक टीवी के आगे हाथ घुमाकर कुछ ‘यूँ-यूँ’ कर रही थीं और टीवी पर स्टार प्लस चल रहा था। अब शाहिद के शब्दों पर गौर कीजिए। वे जिसे ‘यूँ-यूँ’ बता रहे उसे हिंदू परंपराओं में ‘आरती’ कहा जाता है।

हैरानी की बात है कि एक देश जहाँ पर हिंदू भले संख्या में कम हों लेकिन रहते हैं और एक व्यक्ति जिसने अंतराष्ट्रीय क्रिकेट मैचों के लिए कई बार भारत का दौरा किया, भारतीय ख़िलाड़ियों के साथ रहा, भारतीय कार्यक्रमों में शिरकत की… क्या उसे ‘आरती’ शब्द वाकई नहीं पता होगा। या उसने केवल हिंदू परंपरा को हीन दिखाने के लिए ऐसा किया। वे चाहते अपनी बात को सरलता से भी कह सकते थे। लेकिन शायद उनके अंदर की कट्टरता उन पर हावी हो गई। जो चेहरे के साथ उनके शब्दों में भी दिखी। उन्होंने कहा, “एक तो पता नहीं इंडियन ड्रामे में क्या होता है…यूँ-यूँ…क्या कहते हैं उसे।”

कार्यक्रम में हिंदू परंपरा का मजाक उड़ने पर ताली बजाती पाकिस्तानी आवाम

खैर, बात सिर्फ़ उनके शब्दों की नहीं है। शाहिद अफरीदी ने इस चैट शो में खुद स्वीकारा कि अपनी बेटी को ‘हिंदू परंपरा’ का अनुसरण करता देख उन्हें इतना गुस्सा आया कि उन्होंने कोहनी मारकर अपने घर का टीवी ही तोड़ दिया। इसे सुन शो की होस्ट और वहाँ बैठे पाकिस्तानी दर्शक ताली पीट पीटकर हँसने लगे। इन्हें देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि हिंदू परंपरा उनके लिए किसी मजाक से कम नहीं है और उसका ‘विरोधी’ किसी हीरो से।

बता दें , शाहिद अफरीदी और शोएब अख्तर एक ही समय में पाकिस्तानी टीम के दो बड़े नामी खिलाड़ी रह चुके हैं। लेकिन अब दोनों ने ही क्रिकेट से संन्यास ले लिया है। ऐसे में एक शोएब हैं, जो खुलेआम इस बात को स्वीकारते हैं कि उनकी टीम ने हिंदू ख़िलाड़ियों के साथ बदसलूकी की। वहीं दूसरे अफरीदी हैं जो खुलेआम बताते हैं कि उन्होंने ‘हिंदू परंपरा’ से चिढ़कर अपनी टीवी तोड़ दी।

बृजेश ने 5 साल पहले मुस्लिम युवती से गोरखनाथ मंदिर में की शादी, साले अजहर ने अब कुल्हाड़ी से काटा

उत्तरप्रदेश के महाराजगंज के पनरिया थाना क्षेत्र में अजहरुद्दीन उर्फ़ अजहर नामक एक मुस्लिम युवक ने अपनी बहन के हिंदू पति को कुल्हाड़ी से काट डाला। वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपित युवक खून से लथपथ हालत में खुद थाने पहुँचा और प्रतिशोध में अपनी बहन के पति की हत्या करने की बात को पुलिसकर्मियों के आगे स्वीकारा। युवक की बात सुनते ही पुलिस सन्न रह गई और मौक़े पर पहुँचकर मामले की जाँच की।

बताया जा रहा है कि 28 वर्षीय मृत युवक बृजेश ने 5 साल पहले अपने ही गाँव में रहने वाली सफीबुन नामक मुस्लिम लड़की से गोरखनाथ मंदिर में शादी की थी। शादी के दौरान लड़की ने अपना नाम बदलकर विजयलक्ष्मी कर लिया था। अब चूँकि मामला दो अलग-अलग धर्मों का था, तो लड़की पक्ष को यह संबंध नागवार था। लेकिन बृजेश फिर भी अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ उसी गाँव में रहता था।

जानकारी के मुताबिक, यही बात लड़की के भाई अजहर को भीतर ही भीतर चुभती थी। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि अजहर ने पहले दोनों को समझाने की बहुत कोशिश की थी। लेकिन जब उन्होंने उसकी बात नहीं मानी, तो उसने बृजेश को रास्ते से हटाने की ठान ली।

लंबे समय से बृजेश पर घात लगाए बैठे अजहर को अपनी बहन के पति पर हमला करने का मौका बुधवार को मिला। दोपहर के करीब ढाई बजे उसने बृजेश को चौराहे से वापस घर आते देखा और उस पर कुल्हाड़ी से ताबड़तोड़ हमला कर दिया।

हत्या के बाद बिलखते बृजेश के परिजन (साभार: oneindia.com)

वारदात को अंजाम देते हुए कई ग्रामीणों ने अजहर को देखा और उसे पकड़ने की कोशिश भी की। लेकिन अजहर वहाँ से भागकर सीधे पनियारा थाना पहुँच गया।

इकबाल-ए-जुर्म करते हुए अजहर ने पुलिस को बताया कि उसकी बहन ने दूसरे समुदाय के युवक से शादी की थी। इसलिए उसने बदला लेने के लिए इस घटना को अंजाम दिया।

गौरतलब है पूरा मामला दो समुदायों का जुड़ा होने के कारण गाँव में तनाव फैल गया था। जिसके कारण पुलिस को पूरे गाँव को छावनी में बदलना पड़ा। बताया जा रहा है कि घटना के बाद गुस्साई भीड़ ने आरोपित के घर को जलाने का प्रयास किया था, लेकिन पुलिस ने समय रहते स्थिति को संभाल लिया। जानकारी के मुताबिक अजहर अब पुलिस हिरासत में है। उससे मामले में आगे की पूछताछ की जा रही है। साथ ही गाँव की शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस सतर्क है।

10 साल का बच्चा, 100 से अधिक बार रेप: मदरसे का मौलवी शमशुद्दीन और उसके 3 साथियों की तलाश में पुलिस

एक 10 साल के बच्चे (लड़के) जिसके हाथों से अभी खिलौने छूटे भी नहीं थे, उस मासूम के दामन में वहशीपन की सारी हदें पार करते हुए मदरसे के मौलवी ने अपने साथियों के साथ मिलकर एक ऐसी दर्द भरी दास्तां लिख दी, जिसकी भरपाई तो उनकी मौत से भी नहीं हो सकती।

दरअसल, पाकिस्तान के मानसेहरा ज़िले में 10 साल के एक बच्चे के साथ दरिंदगी भरा ऐसा दुर्व्यवहार किया गया जिससे किसी की भी आत्मा काँप जाए। GNN की ख़बर के अनुसार, एक मदरसे के मौलवी शमशुद्दीन ने अपने तीन साथियों के साथ मिलकर 10 साल के बच्चे का 100 से अधिक बार बलात्कार किया।

पीड़ित बच्चे को बेहद गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसकी सांसे ज़िंदगी और मौत के बीच अभी भी अटकी हुई हैं। बच्चे के साथ बर्बरतापूर्ण बलात्कार की वारदात को इस बेरहमी से अंजाम दिया गया कि उस मासूम की आँखों से आँसू की जगह ख़ून बह रहा था। ख़बर में इस बात का भी ज़िक्र किया गया है कि आरोपितों ने बच्चे के साथ न सिर्फ़ दरिंदगी की बल्कि उस मासूम को कई तरह की अमानवीय यातनाएँ भी दीं।

प्रारंभिक मेडिकल रिपोर्ट मिलने के बाद, पुलिस ने मदरसे के मौलवी के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया है, जबकि फ़रार आरोपितों की धर-पकड़ के लिए छापेमारी की जा रही है। इस बीच, पीड़ित बच्चे की गंभीर हालत को देखते हुए उसे अयूब मेडिकल कॉम्प्लेक्स में ट्रांसफर कर दिया गया। दूसरी ओर, खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री ने घटना को संज्ञान में ले लिया है। मुख्यमंत्री ने आला अधिकारियों को जल्द से जल्द दोषियों को गिरफ़्तार करने के निर्देश दिए हैं।

10 साल का एक मासूम, जो एक मौलवी के भेष में छिपे राक्षस को पहचानने में पूरी तरह से असमर्थ था, वो अबोध इस बात से बिल्कुल बेख़बर था कि मौलवी की गंदी नज़रें उसे धर-दबोचने के लिए न जाने कब से उसके कोमल बदन पर गड़ी हुई थीं, और मौक़ा मिलते ही उसने बच्चे को वो ज़ख्म दे डाले जो ताउम्र न उसे जीने देंगे और न मरने देंगे। यह सोचकर भी कलेजा मुँह को आ जाता है कि ऐसे वहशियों के लिए अगर फाँसी की सज़ा भी मुक़र्रर की जाए तो वो भी कम पड़ जाएगी।

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सत्ता के लिए अधीर कॉन्ग्रेस न मजहब विशेष की चौधरी बन पाई, न नेहरू से निभा पाई

देश के लिए बलिदान कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए सबसे ऊपर है। हमारी स्थापना के बाद से, स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और आगे भी हमेशा सबसे पहले भारत है।

कॉन्ग्रेस ने यह ट्वीट शनिवार (28 दिसंबर 2019) को किया। अपने 135वें स्थापना दिवस पर। लेकिन, क्या उसके लिए 2019 का भी यही सच है? इसका आकलन करने के लिए उसके स्थापना दिवस से बेहतर मौका क्या हो सकता है।

2019 के कॉन्ग्रेस पर गौर करने से पहले 2017-18 के उसके कारनामों पर एक नजर डाल लेते हैं। 2014 के आम चुनावों में करारी शिकस्त खाने के बाद हार की समीक्षा के लिए एके एंटनी के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस ने एक समिति बनाई थी। इस समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि पार्टी की हार का एक बड़ा कारण हिंदू विरोधी छवि बन जाना है। यह छवि रातोंरात नहीं बनी थी। न ही इसमें भाजपा और मोदी के उभार का योगदान था। असल में सालों से जो कॉन्ग्रेस तुष्टिकरण के पत्ते फेंक रही थी उसके कारण ही आम हिंदुओं के मन उसकी यह छवि यह गहरी हुई थी। सो, कायदे से इस छवि से बाहर आने के लिए कॉन्ग्रेस को बहुसंख्यकों की भावनाओं का सम्मान करना सीखा। लेकिन, उसने मंदिर-मंदिर प्रदक्षिणा के बहाने इस छवि से बाहर निकलने का रास्ता तलाशा।

यही करण है कि 2017 में गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गॉंधी मंदिरों की सीढ़ियॉं चढ़ते देखे गए।कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने बकायदा ऐलान किया- राहुल गॉंधी जी सिर्फ हिंदू नहीं, बल्कि वह जनेऊधारी हिंदू हैं। गुजरात की सत्ता से कॉन्ग्रेस का वनवास तो खत्म नहीं हुआ, लेकिन अरसे बाद वह लड़ती दिखाई पड़ी। फिर आया 2018। इसी साल के अंत में तीन राज्य मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान भाजपा से छिटक कर कॉन्ग्रेस की झोली में गए। इसी साल राजस्थान विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल ने खुद को कौल ब्राह्मण और दत्तात्रेयी गोत्री बताया।

तीन राज्यों में जीत से उत्साहित कॉन्ग्रेस 2019 के आम चुनावों में औंधे मुॅंह गिरी। दादी इंदिरा गॉंधी जैसी नैन-नक्श का हवाला देकर जिस प्रियंका गॉंधी के लिए दावा किया जाता था कि वह सियासत में पूरी तरह सक्रिय होंगी तो मोदी मैजिक काफूर हो जाएगा, वह पार्टी महासचिव के रूप में उत्तर प्रदेश में कॉन्ग्रेस की परंपरागत सीट से अपने भाई और पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गॉंधी की हार भी टाल नहीं पाईं। आम चुनावों के बाद पार्टी ने जिस अधीर रंजन चौधरी को लोकसभा में अपना नेता चुना उन्होंने पार्टी की फजीहत कराने का कोई मौका नहीं छोड़ा। यहॉं तक कि सदन में ही कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मसला और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को ‘निर्बला’ तक कह डाला। महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव हुए तो वह चौथे नंबर की पार्टी बन गई। हरियाणा में जाटों की हिंसा के सहारे सत्ता में लौटने का उसका सपना टूट गया। झारखंड में वह महज 14 फीसदी वोटरों का भरोसा ही जीत पाई। वैसे भी, लिबरलों को छोड़कर कॉन्ग्रेस से इन चुनावों में किसी को चमत्कार की उम्मीद नहीं थी और वह उम्मीदों पर खरी ही उतरी।

लेकिन अपनी जिस छवि को तोड़ने के लिए 2017-18 में वह तीन-तिकड़म करती दिख रही थी, उससे बाहर निकलने के उसे 2019 में दो बड़े मौके मिले। उसने दोनों हाथों से इसे गॅंवाया। अगस्त में केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त कर आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निरस्त कर दिया। यह मौका था कॉन्ग्रेस के लिए शेष भारत की भावनाओं के सम्मान का। कश्मीर में किए गए नेहरू के प्रयोगों का फातिहा पढ़ने का। लेकिन, इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस ने विरोध के जो सुर दिखाए उसका हवाला लेकर पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र में भारत के खिलाफ पहुॅंच गया। मजहब विशेष की तरफदार बनते-बनते उसकी छवि देश विरोधी हो गई। यही कारण है कि उस समय सोशल मीडिया में ऐसे संदेशों की भरमार थी जिसमें कहा गया था- दरअसल कॉन्ग्रेसी विरोध नहीं कर रहे हैं, कॉन्ग्रेस का पिंडदान कर रहे हैं।

कॉन्ग्रेस के लिए दूसरा मौका आया इस साल के आखिरी महीने में। इस्लामी मुल्क पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का रास्ता साफ करने के लिए केंद्र सरकार नागरिकता संशोधन कानून (CAA) लेकर आई। यह मौका था कॉन्ग्रेस के लिए नेहरू की सोच के साथ खड़े होने का। वही सोच जिसकी झलक तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू द्वारा 8 जनवरी 1948 को बीजी खेर को भेजे टेलीग्राम में मिलती है। इसमें नेहरू ने कहा है- स्थितियों को देखते हुए (सिंध में गैर-मुस्लिमों की हत्या और लूट-पाट हो रही थी), सिंध से हिन्दू और सिख लोगों को निकालना होगा। पहले लोकसभा चुनाव के लिए कॉन्ग्रेस के घोषणा पत्र पर टिके रहने का। इस घोषणा पत्र को नेहरू ने खुद तैयार किया था। इसमें कहा गया था- पिछले चार सालों की सबसे बड़ी समस्या पाकिस्तान से आने वाले विस्थापितों का पुनर्वास है। इस पर तात्कालिक और लगातार ध्यान देने की जरूरत है।

जब इस वादे की याद दिलाई गई तो कॉन्ग्रेस को वह भी रास नहीं आया। केरल के गवर्नर आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि मोदी सरकार ने महात्मा गाँधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और कॉन्ग्रेस द्वारा किया गया वो वादा पूरा किया है जो उन्होंने पाकिस्तान में प्रताड़ित किए गए लोगों से किए था। उन्होंने कहा कि इस अधिनियम की नींव साल 1985 और 2003 में रख दी गई थी। मोदी सरकार ने इस अधिनियम को केवल कानूनी रूप दिया है। खान के यह कहने पर कॉन्ग्रेस ने उनसे उस कार्यक्रम में नहीं आने को कहा जिसका उन्हें न्योता भेजा गया था। यहॉं जानना जरूरी है कि आरिफ मोहम्मद पुराने कॉन्ग्रेसी रहे हैं और राजीव गॉंधी की कैबिनेट में भी थे। इस कानून से जिन लोगों को लाभ होना है उनमें बहुतायत दलित और वंचित तबके से हैं। लेकिन, कॉन्ग्रेस की शह पर इसके खिलाफ जिस तरह के हिंसक प्रदर्शन हुए उसने कॉन्ग्रेस के बहुसंख्यक विरोधी होने की धारणा को और मजबूत किया है। यहॉं तक कि दिल्ली से लेकर देश के अन्य हिस्सों में हुए हिंसक प्रदर्शनों में कॉन्ग्रेस के नेता नामजद तक हुए हैं।

बावजूद इसके कॉन्ग्रेस समुदाय विशेष का भरोसा जीतने में भी कामयाब होती नहीं दिख रही। सीएए विरोधी हिंसा के बीच झारखंड में चुनाव हुए। लोकनीति और सीएसडीएस का सर्वे बताता है कि भले ही भाजपा इस राज्य में हार गई हो, लेकिन उसे मजहब विशेष के भी 14 फीसद वोट मिले हैं। यानी, वह दौर भी बीत चुका है कि जब समुदाय विशेष आँख मूॅंद कॉन्ग्रेस के पीछे लग लेते थे।

कॉन्ग्रेस की दुश्वारियॉं इतनी ही नहीं हैं। महाराष्ट्र में भले ही वह पिछले दरवाजे से सत्ता में उसी तरह एडजस्ट हो चुकी हो जैसा उसने 2018 में कर्नाटक में किया था। लेकिन, 2019 में कर्नाटक का प्रयोग असफल साबित हुआ था। महाराष्ट्र के भी लक्षण वैसे ही दिख रहे। झारखंड में तो कॉन्ग्रेस का उसी सरकार के विरोध में धरने पर बैठने का इतिहास ही रहा है, जिनमें वह शामिल रही है। यहॉं तक कि अब उसे चलाने में गॉंधी परिवार की दिलचस्पी भी नहीं दिखती। सोनिया ने तीन राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में एक भी रैली नहीं की। प्रियंका की एकमात्र रैली झारखंड में हुई। राहुल ने महाराष्ट्र और झारखंड में पॉंच-पॉंच तथा हरियाणा में दो रैलियॉं की।

2019 में भी कॉन्ग्रेस के पास कोई रणनीति नहीं दिखी। न उसकी सोच स्पष्ट रही। हॉं, नीयत का खोट हर मौके पर दिखा। चाहे वह कश्मीर का मुद्दा हो या सीएए, एनपीआर या फिर एनआरसी। इन सभी मसलों पर कॉन्ग्रेस के झूठ एक-एक कर सामने आ रहे हैं। ऐसे में 2020 कॉन्ग्रेस के लिए किसी भयावह सपने जैसा साबित हो तो ताज्जुब नहीं होना चाहिए।

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