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शुरुआती रुझानों में भाजपा और जेएमएम के बीच कड़ी टक्कर, क्या मिथक तोड़ पाएँगे रघुवर दास?

81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजे अगले कुछ घंटों में स्पष्ट हो जाएँगे। शुरुआती रुझानों में झामुमो-कॉन्ग्रेस-राजद गठबंधन को बढ़त दिख रही है। यदि अंतिम नतीजे भी इसी तरह के रहे तो एक और राज्य भाजपा के हाथ से निकल सकता है। हालॉंकि पोस्टल बैलेट की गिनती पूरी होने के बाद रुझानों में भाजपा की सीटें धीरे-धीरे बढ़ रही है। इन सबके बीच एक सीट जिसके नतीजे को लेकर सबसे ज्यादा उत्सुकता है वह है जमशेदपुर पूर्वी सीट। यह सीट भाजपा का गढ़ रहा और खुद मुख्यमंत्री रघुवर दास यहॉं से मैदान में हैं। बावजूद इसके दो कारणों से इस बार यहॉं भाजपा की राह मुश्किल मानी जा रही है।

पहला, रघुवर दास को चुनौती केवल कॉन्ग्रेस के गौरव वल्लभ से ही नहीं मिली है। इस सीट से रघुवर कैबिनेट में मंत्री रहे सरयू राय भी मैदान में हैं। राय झारखंड भाजपा के कद्दावर नेताओं में से रहे हैं और चुनाव से ऐन पहले उन्होंने अलग राह पकड़ी थी। इस इलाके में उनकी भी जबर्दस्त पकड़ मानी जाती है।

दूसरा, मुख्यमंत्रियों से झारखंड की जनता का पुराना वैर। यह दिलचस्प है कि झारखंड के 19 साल के राजनीतिक सफर में जो भी मुख्यमंत्री रहा है उसे चुनावी हार का स्वाद चखना पड़ा है। राज्य में अब तक छह मुख्यमंत्री हो चुके हैं। बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, शिबू सोरेन, मधु कोड़ा, हेमंत सोरेन और रघुवर दास। रघुवर एकमात्र ऐसे नेता हैं, जिन्होंने बतौर मुख्यमंत्री पॉंच साल का कार्यकाल पूरा किया है। लेकिन, एक मिथक यह भी है कि मुख्यमंत्री के तौर पर जो भी चुनाव मैदान में गया है उसे हार भी मिली है।

शिबू सोरेन तो मुख्यमंत्री बनने के बाद विधायक तक नहीं बन पाए थे। तमाड़ में राजा पीटर ने उन्हें पटखनी दे दी थी। पिछला विधानसभा चुनाव तो पूर्व मुख्यमंत्रियों के लिए कब्रगाह ही साबित हुआ था। चार-चार पूर्व मुख्यमंत्री चुनाव हार गए थे। मधु कोड़ा और हेमंत सोरेन चुनाव हार गए थे। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी और फिलहाल केंद्र में मंत्री और तीन राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके अर्जुन मुंडा भी जीत नहीं पाए थे। माना जाता है कि खरसांवा से मुंडा की हार ने ही रघुवर दास के रूप में राज्य को पहला गैर आदिवासी मुख्यमंत्री मिलने का रास्ता खोला था।

ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या इस इतिहास को रघुवर दास बदल पाएंगे? जानकार उनकी राह मुश्किल मानते हैं। जैसा कि राजनीतिक विश्लेषक और जन की बात के सीईओ प्रदीप भंडारी ने ऑपइंडिया को बताया- “राज्य में एंटी इंकंबेंसी महत्वपूर्ण फैक्टर है। यदि खुद मुख्यमंत्री चुनाव हार जाएँ या बेहद मामूली अंतर से ही जीत पाएँ तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।”

घर में घुस कर मार रहे हैं RSS कार्यकर्ता और UP पुलिस: राणा अयूब का झूठ बेनकाब

प्रोपेगेंडा पत्रकार राणा अयूब ने उत्तर प्रदेश में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) विरोधी प्रोटेस्ट की आड़ में झूठ फैलाया। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में लेख लिख भारत की नकारात्मक छवि बनाने का प्रयास करने वाली राणा अयूब वेस्टर्न मीडिया के लिए नई अरुंधति राय बन बनती जा रही हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से वो झूठ और अफवाहों का ऐसा जाल बिछाती हैं कि लोगों को उनकी बातें सच लगने लगती हैं। अबकी उन्होंने यूपी पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए हैं। राणा अयूब ने लिखा कि मुज़फ्फरनगर और कानपुर से कुछ हृदय विदारक ख़बरें आ रही हैं।

बकौल राणा अयूब, इन दोनों जिलों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और और पुलिस साथ मिल कर मुस्लिम बहुल इलाक़ों में हमला कर रही है। घरों में घुस कर कथित अल्पसंख्यकों को मारा जा रहा है। राणा अयूब ने दावा किया कि ऐसा ख़ुद स्थानीय लोगों ने उन्हें बताया है। उन्होंने आगे आरोप लगाया कि मजहब विशेष के लोगों के घर और गाड़ियों को आग के हवाले किया जा रहा है। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस व संघ कार्यकर्ताओं की क्रूरता के कारण कथित अल्पसंख्यक समुदाय के लोग पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं। राणा अयूब ने इस घटना की तुलना 2002 के गुजरात दंगों से की।

साथ ही राणा अयूब ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रामलीला मैदान में हुई विशाल रैली पर भी तंज कसा। उन्होंने पूछा कि क्या धारा-144 सिर्फ़ प्रदर्शनकारियों के लिए है? बाद में लोगो ने उन्हें याद दिलाया कि न तो दिल्ली के सभी क्षेत्रों में धारा-144 लागू है और न ही रामलीला मैदान या उसके आसपास वाले इलाक़ों में।

इसके बाद राणा अयूब को यूपी पुलिस ने फटकार लगाई। उत्तर प्रदेश पुलिस ने साफ़ कहा कि वो ऐसे किसी को आरोप का खंडन करती है। साथ ही पुलिस ने अयूब को एक ‘जिम्मेदार रिपोर्टर’ की परिभाषा भी समझाई और कहा कि वो अपने बयान की पुष्टि के लिए सबूत पेश करें। इसके बाद राणा अयूब ने दावा किया कि खंडन करने से कुछ नहीं होगा। उन्होंने पुलिस को कोई सबूत नहीं दिया और कहा कि उनकी टाइमलाइन पर सबूत पड़े हुए हैं। अयूब ने कहा कि और नए एविडेंस भी आएँगे।

हालाँकि, यूपी पुलिस ने जब राणा अयूब की टाइमलाइन को खँगाला तो उसमें ऐसा कुछ भी नहीं मिला, जिससे पता चल सके कि उन्होंने पुलिस व आरएसएस पर जो आरोप लगाए हैं, वो सही हैं। यूपी पुलिस ने कहा कि राणा अयूब की टाइमलाइन पर जो भी है, वो दिखाता है कि पुलिस क़ानून-व्यवस्था कायम करने के लिए कार्रवाई कर रही है और इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है। यूपी पुलिस ने कहा:

“आपकी टाइमलाइन को देख कर ये पता चलता है कि उपद्रवियों की भीड़ ने एक पुलिस चौकी और कई वाहनों को आग के हवाले कर दिया है। अगर आप कोई स्पष्ट सबूत दे पाती हैं तो आपका स्वागत है।”

जैसा कि अपेक्षित था, राणा अयूब के पास अपने झूठे बयान की पुष्टि के लिए कोई सबूत नहीं था। फिर भी, हारून रियाज सहित कई बुद्धिजीवियों ने उनकी बातों का समर्थन किया और इस अफवाह को आगे बढ़ाया। हारून ने तो यहाँ तक दावा किया कि यूपी में भाजपा सांसद संजीव बालियान ने ही मुस्लिमों के ख़िलाफ़ हिंसा की शुरुआत की है।

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त्रिशंकु दिख रहे झारखंड का कौन होगा ‘दुष्यंत’: बाबूलाल मरांडी या सुदेश म​हतो?

81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजे सोमवार (23 दिसंबर 2019) को आएँगे। नतीजे भाजपा के उस प्रयोग के लिए लिटमस टेस्ट साबित हो सकता है जो उसने 2014 के आम चुनावों की शानदार जीत के बाद शुरू किया था। उस साल महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड के विधानसभा चुनावों के बाद भाजपा ने मुख्यमंत्री के तौर पर जिन चेहरों को आगे बढ़ाया, वह उन राज्यों की परंपरागत राजनीति से हटकर था। हरियाणा में किसी जाट चेहरे की बजाए मनोहर लाल खट्टर को वरीयता दी। महाराष्ट्र की राजनीति में मराठों का दबदबा होने के बावजूद ब्राह्मण देवेंद्र फडणवीस को आगे बढ़ाया। झारखंड को रघुवर दास के रूप में पहला गैर आदिवासी मुख्यमंत्री दिया।

2019 के आम चुनावों में भाजपा ने 2014 से भी बड़ी जीत हासिल की। लेकिन, इस साल महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजे वैसे नहीं आए। हरियाणा में वह बहुमत से दूर रह गई और दुष्यंत चौटाला की जजपा के साथ सरकार चला रही है। महाराष्ट्र में नतीजों के बाद उसे साझेदार शिवसेना ने झटका दे दिया। झारखंड में भी एग्जिट पोल बता रहे हैं कि भाजपा का प्रदर्शन 2014 के मुकाबले कमतर होने जा रहा है।

इसकी वजह क्या है? जैसा कि राजनीतिक विश्लेषक और जन की बात के सीईओ प्रदीप भंडारी ने ऑपइंडिया को बताया- एंटी इंकबेंसी फैक्टर। उन्होंने कहा, “राज्य में एंटी इंकंबेंसी महत्वपूर्ण फैक्टर है। यदि खुद मुख्यमंत्री चुनाव हार जाएँ या बेहद मामूली अंतर से ही जीत पाएँ तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।” जन की बात के सर्वे के अनुसार भाजपा 22 से 30 सीटें जीत सकती है। झामुमो, कॉन्ग्रेस और राजद गठबंधन को 37 से 46 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है।

सी-वोटर और एबीपी न्यूज़ के सर्वे में भाजपा को 32 और झामुमो गठबंधन को 35 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। इंडिया टुडे और एक्सिस माय इंडिया के एग्जिट पोल में भाजपा को 22 से 32 तो जेएमएम की अगुवाई वाले गठबंधन को 38 से 50 सीटों तक मिलने का अनुमान जताया गया है।

एग्जिट पोल से एक चीज तो स्पष्ट है कि भाजपा पर विपक्षी गठबंधन को बढ़त हासिल है। लेकिन, छोटे राज्यों में एक-दो फीसद वोट भी इधर-उधर होने पर अंतिम नतीजे अनुमान से बिल्कुल अलग हो जाते हैं। ऐसी सूरत में किसी एक पक्ष को स्पष्ट बहुमत मिल सकता है। लेकिन इसकी संभावना कम दिखती है, क्योंकि 2014 में भी भाजपा अकेले दम पर 41 सीटें जीतने में सफल नहीं हो पाई थी। उस समय 72 सीटों पर चुनाव लड़कर भाजपा 37 सीटें जीतने में कामयाब रही थी। उसकी सहयोगी आजसू को उस चुनाव में पॉंच सीटे मिली थी। बाद में राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की पार्टी जेवीएम के भी आठ में से छह विधायक भाजपा के साथ आ गए थे। यहॉं गौर करने वाली बात यह है कि 2014 में भाजपा इतनी सीटें तब जीत पाई, जब उसकी स्थिति बेहद मजबूत बताई जा रही थी और विपक्ष को पस्त।

भाजपा के कमजोर होने की सूरत में जिस राजनीतिक हालात की सबसे ज्यादा उम्मीद दिखती है, वह है त्रिशंकु विधानसभा। राज्य का राजनीतिक इतिहास भी इसकी तस्दीक करता है। यही कारण है कि बिहार से अलग होकर अस्तित्व में आया झारखंड 19 साल के सफर में ही राजनीति के इतने मोड़ देख चुका है कि उसकी सियासी चालों पर हमेशा पूरे देश की नजर बनी रहती है। 2000-14 के बीच 9 मुख्यमंत्री और 3 बार राष्ट्रपति शासन देख चुके इस राज्य ने रघुवर दास के तौर पर पहली बार कार्यकाल पूरा करने वाला सीएम देखा है। इस राज्य में निर्दलीय सीएम रह चुका है। अलग राज्य आंदोलन की वजह से ‘गुरुजी’ कहलाने वाले शिबू सोरेन मुख्यमंत्री रहते एक राजनीतिक नौसिखिए से परास्त हो चुके हैं। इस राज्य ने राजनीति का वह थ्रिलर भी देखा है, जब विधायकों को दिल्ली लेकर जा रहे विमान को रोकने के लिए खुद डिप्टी सीएम एयरपोर्ट तक दौड़ गया था।

सो, त्रिशंकु नतीजे होने पर यह राज्य सियासत का नया पन्ना खोल सकता है। इस स्थिति में जो दो चेहरे बेहद महत्वपूर्ण होंगे वे हैं- बाबूलाल मरांडी और राज्य के उप मुख्यमंत्री रह चुके आजसू प्रमुख सुदेश महतो। सी-वोटर के सर्वे में जेवीएम को 3 और आजसू को 5 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। एक्सिस माय इंडिया का पोल जेवीएम को 2 से 4 तो आजसू को 3 से 5 सीटें दे रहा है।

एग्जिट पोल के बाद से ही इन दोनों नेताओं के अगले कदम को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही है। पहले बात आजसू की। रघुवर सरकार में शामिल रही आजसू बात नहीं बनने पर इस बार अकेले चुनावी मैदान में उतरी थी। सुदेश महतो पहले ही कह चुके हैं कि अलग चुनाव लड़ने का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में भाजपा के साथ गठबंधन नहीं होगा। वैसे भी झारखंड के सियासत में आजसू ज्यादातर वक्त भाजपा के साथ ही रही है। तो क्या आजसू का समर्थन भाजपा के पक्ष में तय माना जाए? यह इस बात पर निर्भर करेगा कि भाजपा बहुमत से कितनी दूर रहती है। विपक्षी गठबंधन के मजबूत दिखाई पड़ने की सूरत में आजसू उसके साथ भी उसी तरह जा सकती है, जैसे वह निर्दलीय मधु कोड़ा के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल हुई थी। उस वक्त पार्टी विधायक चंद्रप्रकाश चौधरी कोड़ा कैबिनेट में मंत्री थे, तो खुद सुदेश विपक्ष में बैठते थे।

किंग मेकर की स्थिति में जो दूसरा शख्स हो सकता है वह हैं, बाबूलाल मरांडी। मरांडी का राजनीतिक सफर भाजपा से ही शुरू हुआ था। रिश्तों में दरार पड़ने के बाद 2006 में उन्होंने अपनी पार्टी जेवीएम बना ली। इसके बाद से ही वे राज्य में भाजपा के विकल्प के तौर पर उभरने की कोशिश में लगे हैं। लेकिन, अब तक कामयाबी नहीं मिल पाई है। वे भाजपा के खिलाफ विपक्ष का व्यापक महागठबंधन बनाने की असफल कोशिश भी कर चुके हैं। अब तक जेवीएम ने जितने भी विधानसभा चुनाव लड़े हैं वह 10 फीसद के करीब वोट लाने में कामयाब रही है। पिछला ​लोकसभा चुनाव जेवीएम ने कॉन्ग्रेस गठबंधन के साथ लड़ा था। लेकिन, सीटों पर पेंच फॅंसने के बाद विधानसभा चुनाव में रास्ते अलग हो गए। मोटे तौर पर अनुमान लगाया जा रहा है कि मरांडी का झुकाव जेएमएम गठबंधन की तरफ हो सकता है। लेकिन, काबिलेगौर यह है कि अब तक ऐसा देखा गया है कि चुनाव के बाद मरांडी की पार्टी के ज्यादातर विधायक भाजपा के साथ चले जाते हैं। इस बार भी ऐसी किसी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

मौजूदा हालातों से ऐसा लगता है कि चुनाव से पहले सुदेश और बाबूलाल भले मनमाफिक समझौते करने में नाकामयाब रहें हो, नतीजों के बाद उनकी लॉटरी लग सकती है। उनका रुख ही तय करेगा कि झारखंड में भी भाजपा को हरियाणा की तरह सत्ता तक पहुॅंचाने वाला ‘दुष्यंत’ मिलेगा या फिर महाराष्ट्र खुद को दोहराएगा!

हिंदुस्तान की पहली घटना! अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्रों ने ही वाइस चांसलर को किया ‘निष्कासित’

रविवार (22 दिसंबर) को अलीगढ़ में इंटरनेट सेवाओं की बहाली के तुरंत बाद, शिक्षकों, छात्रों और ग़ैर-शिक्षण कर्मचारियों ने अपने वाइस चांसलर को निष्कासित कर दिया। बाक़ायदा एक नोटिस जारी करते हुए, यह कहा गया कि उन्होंने अपने वाइस चांसलर प्रोफ़ेसर तारिक मंसूर और विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार एस अब्दुल हामिद को निष्कासित कर दिया है। उन्होंने कहा कि वाइस चांसलर और रजिस्ट्रार से अनुरोध है कि वे वीसी लॉज और रजिस्ट्रार के लॉज को खाली कर दें। नोटिस में घोषित किया गया है कि सभी लोग तब तक विश्वविद्यालय प्रशासन का बहिष्कार करेंगे, जब तक यह दोनों अपना इस्तीफ़ा नहीं दे देते और कैंपस छोड़कर चले नहीं जाते।

AMU के वाइस चांसलर और रजिस्ट्रार को निष्कासित किए जाने का नोटिस (साभार: रिपब्लिक टीवी)

इन सबके मद्देनज़र ध्यान देने वाली बात यह है कि नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में उतरे AMU छात्रों को यह तक नहीं मालूम कि केंद्रीय विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं और वाइस चांसलर को पद से हटाने की भी एक निर्धारित प्रक्रिया होती है। इस प्रक्रिया में भी राष्ट्रपति को ही निर्णय लेना होता है। लेकिन, AMU के छात्रों-शिक्षकों ने मिलकर (वैसे कितने शिक्षक इसमें शामिल हैं, इस पर संशय है क्योंकि जिस लेटर हेड पर यह सूचना आई है, वो छात्रों का है, न कि शिक्षक संघ का) अपनी मर्ज़ी से वाइस चांसलर और रजिस्ट्रार को निष्कासित कर दिया। इसी से पता चलता है AMU के छात्रों का स्टैंडर्ड! जहाँ के छात्रों को अपनी यूनिवर्सिटी के नियम-कानून का अता-पता नहीं है, वो CAA-NRC को क्या खाक समझ पाएँगे!

दरअसल, AMU के छात्र नेताओं ने रविवार (15 दिसंबर) को AMU में हुए विरोध-प्रदर्शन के दौरान छात्रों के ख़िलाफ़ “पुलिस अत्याचार” और “राज्य दमन” की कड़ी निंदा करते हुए AMU के वाइस चांसलर और रजिस्ट्रार के इस्तीफ़े की माँग की थी।

ख़बर के अनुसार, छात्रों का आरोप था कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर तारिक मंसूर ने ही कैंपस में यूपी पुलिस को विरोध-प्रदर्शन के दौरान अंदर घुसने की अनुमति दी थी। उन्होंने हिंसा के बाद कहा था कि उग्र भीड़ से छात्रों की जान और विश्वविद्यालय सम्पत्ति को नुक़सान हो सकता था। इसके बाद स्थिति पर क़ाबू पाने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज और आँसू गैस के गोले दागने पड़े थे।

बता दें कि नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध के बाद, अलीगढ़ में इंटरनेट कनेक्शन बंद होने के सात दिन बाद, अधिकारियों ने रविवार को सेवा बहाल कर दी। बंद के बारे में सूचित करते हुए ज़िला मजिस्ट्रेट ने 15 दिसंबर को कहा था, “छात्रों द्वारा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में विरोध-प्रदर्शन के बाद, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि कुछ असामाजिक तत्व भड़काऊ संदेशों को प्रसारित करने के लिए इंटरनेट सेवाओं का उपयोग कर लोगों के बीच हिंसा भड़का सकते हैं। सोशल मीडिया पर हिंसात्मक सामग्री की रोकथाम के लिए इंटरनेट सेवाएँ रात 10 बजे से अगली रात 10 बजे तक बंद रहेगी।” 

ग़ौरतलब है कि नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध के नाम पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में 15 दिसंबर 2019 को जमकर बवाल कटा था। छात्रों ने एडमिशन ब्लॉक के बाहर निकलकर पुलिस पर पथराव और हवाई फायरिंग की। जवाब में पुलिस ने लाठीचार्ज कर रबर बुलेट दागी। यूनिवर्सिटी में माहौल बिगड़ता देख 5 जनवरी 2020 तक कॉलेज को बंद कर दिया गया और देर रात ही सभी हॉस्टल खाली करा लिए गए थे।

‘जंग की मशाल उठाकर करो प्रदर्शन’ – AMU में भड़काऊ स्पीच देने पर डॉ कफील खान हिरासत में

AMU के छात्रों ने किया पथराव, हवाई फायरिंग: कैंपस में दाखिल हुई पुलिस, हॉस्टल खाली कराए

AMU में हिंदुत्व मुर्दाबाद के नारों के साथ नागरिकता संशोधन बिल की जलाई कॉपियाँ, 720 पर FIR

…जिसने किया CAA का समर्थन, उस युवक पर चाकू व कुल्हाड़ी से हमला: हॉस्पिटल पहुँचे सांसद सूर्या

जहाँ एक तरफ सीएए के ख़िलाफ़ चल रहा विरोध प्रदर्शन जगह-जगह हिंसक हो उठा और कई पुलिसकर्मी घायल हुए, सीएए के समर्थन में आए लोगों पर हमले की ख़बर आ रही है। मोदी सरकार के इस क़ानून के समर्थन में न सिर्फ़ दिल्ली, बल्कि बंगलुरु और मुंबई सहित असम में भी लाखों लोगों से सड़कों पर उतर कर केंद्र सरकार के इस फ़ैसले को अपना समर्थन दिया। बंगलुरु में वरुण नाम के एक व्यक्ति को सीएए के समर्थन का खामियाजा तब भुगतना पड़ा, जब कुछ उपद्रवियों ने उन पर हमला कर दिया। वो फिलहाल हॉस्पिटल में भर्ती हैं।

31 वर्षीय वरुण पर सीएए के विरोधियों ने धारदार हथियार से हमला किया। पीड़ित वरुण जेपी नगर के रहने वाले हैं। बेंगलुरु साउथ के सांसद व युवा भाजपा नेता तेजस्वी सूर्या ने हॉस्पिटल में जाकर उनका हालचाल जाना। तेजस्वी सूर्या ने इस बारे में अधिक जानकारी देते हुए बताया:

“टाउन हॉल में सीएए के समर्थन में एक रैली का आयोजन किया गया था। हमारे कार्यकर्ता वरुण जब उस रैली में भाग लेकर लौट रहे थे, तब उन पर चाकू और कुल्हाड़ी से हमला किया गया। ये हमला काफ़ी क्रूर तरीके से किया गया। उनके सिर में गहरी चोट आई है लेकिन राहत की बात ये है कि अब वो ख़तरे से बाहर हैं। मैं सभी से निवेदन करता हूँ कि शांति बनाए रखें क्योंकि हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं है।”

वरुण पर ये हमला बम्बू बाजार में हुआ। उनके सिर पर चोट के अलावा शरीर के कई अन्य हिस्सों में भी चोटें आई हैं। सांसद तेजस्वी सूर्या ने माँग करते हुए कहा कि पुलिस को इस मामले की निष्पक्ष जाँच करनी चाहिए, जिससे इस हिंसा के गुनहगारों को सज़ा दिलाई जा सके। सूर्या ने हॉस्पिटल कर्मचारियों व मेडिकल सुपरिटेंडेंट से मुलाक़ात कर वरुण का अच्छी तरह इलाज करने को कहा। उन्होंने उनकी सुरक्षा व मामले की जाँच के लिए डीसीपी से भी फोन पर बातचीत की। सूर्या ने कहा कि लोग वरुण के साथ मज़बूती से खड़े हैं।

पुलिस ने बताया है कि वो सीसीटीवी फुटेज खँगाल कर दोषियों को धर-पकड़ने में लगी हुई है। जहाँ तक सीएए के समर्थन में हुई रैली की बात है, उसमें भारी संख्या में लोग तिरंगे के साथ दिखे। लोगों ने पीएम मोदी के समर्थन में नारे लगाए और विपक्षियों के भ्रमजाल की आलोचना की।

मुस्लिम मॉब ने मंदिर में की तोड़-फोड़ और आगजनी: पटना में स्थानीय लोग और पुलिस इनके सामने असहाय

काफिरों से आजादी, हत्यारों से आजादी… हम लेकर रहेंगे आजादी: भुवनेश्वर में लगे हिंदू और देश विरोधी नारे

25-30 पुलिस वालों को दुकान में बंद कर जिंदा जलाने का प्रयास: नमाज के बाद हापुड़ में उपद्रवियों का तांडव

मरीचझापी में जिन 7000 हिंदू शरणार्थियों का संहार हुआ वे भी दलित थे, जय भीम-जय मीम का नया छलावा है ‘रावण’

‘सभी मूर्तियों को हटा दिया जाएगा… केवल अल्लाह का नाम रहेगा’: IIT कानपुर में हिंदू व देश विरोधी-प्रदर्शन

बेटी से छेड़खानी की शिकायत की तो नूर आलम और तार मोहम्मद ने पीट-पीटकर मार डाला

बिहार के सीवान में एक बाप को अपनी बेटी के साथ हुई छेड़खानी की शिकायत करना भारी पड़ गया। बेटी की छेड़खानी की शिकायत करने पर उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। अहमद अली की बेटी 20 दिसंबर की सुबह 7 बजे टहलने निकली थी। इसी दौरान गाँव के ही नूर आलम के पुत्र जुबरे आलम और गुड्डू ने उसके साथ छेड़खानी की।

बेटी ने जब इस घटना के बारे में बताया तो अहमद शिकायत लेकर नूर आलम के घर गया। जब अहमद ने नूर से उसके बेटे जुबरे आलम की करतूत की शिकायत की तो वह आग-बबूला हो गया। नूर आलम ने तार मोहम्मद के साथ मिलकर अहमद के साथ गाली-गलौज की और फिर उसको मारने भी लगे। अहमद के बेटे अरशद ने इस घटना के बार में प्रभात खबर को बताते हुए कहा कि नूर आलम ने अहमद को जान से मारने की नीयत से उसकी गर्दन पर जानलेवा प्रहार किया। ये वार इतना तगड़ा था कि अहमद मूर्छित होकर जमीन पर गिर पड़ा।

अरशद ने बताया कि जब उसे इस बारे में पता चला तो वह भी मौके पर पहुँचा। उसके वहाँ पहुँचने पर उनलोगों ने अरशद की भी पिटाई करनी शुरू कर दी। अरशद का कहना है कि नूर आलम और तार मोहम्मद ने उसके सिर पर इतनी जोर से वार किया कि उसका सिर फट गया और वो घायल हो गया। इसके बाद स्थानीय लोग इकट्ठा होने लगे, जिसे देखकर दोनों वहाँ से फरार हो गए।

ग्रामीणों ने अहमद और अरशद को गुठनी पीएचसी में भर्ती करवाया। अरशद ने बताया कि दोनों की हालत देखते हुए सीवान सदर के लिए रेफर कर दिया गया। वहाँ पर भी हालत में सुधार न होने पर पटना पीएमसीएच में भर्ती करवाया गया। जहाँ अहमद की रात 8:30 बजे मौत हो गई।

कॉन्ग्रेस नेता उमर पठान ने पोस्ट किया था फर्जी वीडियो, शाह-ए-आलम हिंसा में 15 और दंगाई गिरफ़्तार

अहमदाबाद पुलिस की अपराध शाखा ने कॉन्ग्रेस के स्थानीय नेता उमर ख़ान पठान को गिरफ्तार किया है। शाह-ए-आलम क्षेत्र में हुए हिंसक विरोध-प्रदर्शन के सिलसिले में उसकी गिरफ्तारी हुई है। पठान पर सोशल मीडिया पर फ़र्ज़ी वीडियो पोस्ट करने का आरोप है।

कॉन्ग्रेस के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के नगर सचिव उमर ख़ान पठान ने अपने फेसबुक अकाउंट पर एक फ़र्ज़ी वीडियो पोस्ट किया था। इसमें लखनऊ में हिंसक दंगाइयों के ख़िलाफ़ पुलिस की कार्रवाई की आलोचना करते हुए कहा गया था कि पत्थरबाज़ी की घटना से पहले अहमदाबाद पुलिस ने कार्रवाई की थी। 19 दिसंबर को नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में शाह-ए-आलम इलाक़े में हुई हिंसा के दौरान 26 पुलिसकर्मी घायल हो गए थे।

विशेष पुलिस आयुक्त अजय तोमर ने बताया था कि साइबर पुलिस ने इस मामले में FIR दर्ज की थी और पठान से जवाब माँगा गया था। इसके बाद भ्रामक वीडियो पोस्ट करने के आरोप में उसे गिरफ़्तार किया गया।

इससे पहले, पुलिस आयुक्त आशीष भाटिया ने बताया था कि CAA/ NRC का विरोध करने के लिए राज्य के कुछ हिस्सों में हालिया हिंसा के मद्देनज़र अफ़वाह फैलाने वाले दो सोशल मीडिया पोस्टों को ट्रैक किया गया है और उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे ऐसी भ्रामक ख़बरों पर ध्यान न दें। पुलिस आयुक्त ने कहा था कि फ़र्ज़ी वीडियो पोस्ट कर उन्हें वायरल करना अपराध की श्रेणी में आता है ऐसा करने वालों के ख़िलाफ़ पुलिस कड़ी कार्रवाई करेगी।

ख़बर के अनुसार, गुजरात में विशेष पुलिस आयुक्त अजय तोमर ने बताया कि अहमदाबाद शहर के शाह-ए-आलम इलाक़े में CAA/NRC के विरोध के दौरान हुई हिंसा के सिलसिले में 15 और लोगों को गिरफ़्तार किया गया है। उन्होंने कहा कि इस हिंसा में 15 नक़ाबपोश दंगाई सीधे तौर पर पथराव में शामिल थे। अब तक गिरफ़्तार किए गए कुल दंगाइयों की संख्या 64 हो गई है।

ग़ौरतलब है कि स्थानीय कॉन्ग्रेस पार्षद सहित कुल 50 नामजद अभियुक्तों कल गिरफ़्तार किया गया था। 19 दिसंबर को हुई हिंसा के मामले में 5000 अज्ञात दंगाइयों को भी आरोपित बनाया गया। मुस्लिम बहुल इलाक़े में उपद्रवियों द्वारा पथराव में डीसीपी, एसीपी, पीआई और पीएसआई रैंक के अधिकारियों सहित कुल 26 पुलिसकर्मी घायल हो गए थे। यहाँ बिना इजाजत के ही CAA/ NRC के ख़िलाफ़ रैली निकाली गई थी।

घटना के बाद उपद्रवियों ने पुलिस अधिकारियों पर निर्दयतापूर्वक पथराव किया था, इस घटना से जुड़े सीसीटीवी फुटेज सामने आ चुके हैं। इसानपुर पुलिस स्टेशन में आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था। इसमें हत्या, दंगा और सार्वजनिक सम्पत्ति अधिनियम और गुजरात पुलिस अधिनियम के तहत नुक़सान पहुँचाने का प्रयास भी शामिल था। दानिलिमदा से कॉन्ग्रेस पार्षद शहज़ाद ख़ान पठान को पहले ही गिरफ़्तार किया जा चुका है।

हिंसक घटना में शामिल अन्य दंगाइयों की धर-पकड़ के लिए छापेमारी की जा रही है। अन्य दोषियों की पहचान के लिए सीसीटीवी फुटेज को FSL भेजा गया है। दंगाइयों की भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को आँसू गैस के गोले और लाठीचार्ज करना पड़ा। 49 आरोपितों को रिमांड पर लेकर पूछताछ की जा रही है।

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CAA के बारे में जानते ही नहीं मुस्लिम, वोट बैंक समझते हैं सियासी दल: शाही इमाम

जामा मस्जिद के इमाम सैयद अहमद बुखारी ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर मुस्लिमों को ही फिर से आईना दिखाया है। बुख़ारी ने कहा कि मुस्लिम ये समझ ही नहीं रहे हैं कि इस क़ानून का किसी भी भारतीय नागरिक से कुछ लेना-देना ही नहीं है, चाहे वो हिन्दू हो या मुस्लिम। बुखारी ने चीजें स्पष्ट करते हुए समझाया है कि नागरिकता संशोधन क़ानून तो उनलोगों के लिए है, जो पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से भारत में आकर शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं। साथ ही बुखारी ने सभी राजनीतिक दलों पर समान रूप से निशाना साधा। उन्होंने मुस्लिमों के बीच फ़ैल रहे अफवाह से बचने की सलाह दी।

सैयद अहमद बुखारी ने ‘दैनिक जागरण’ में प्रकाशित एक लेख में कहा है कि मुस्लिमों को मुल्क़ में अपनी आवाज़ बुलंद करते हुए 70 साल हो गए, लेकिन सभी राजनीतिक दलों ने उनका सिर्फ़ सत्ता के लिए इस्तेमाल किया। बुखारी ने कहा है कि राजनेताओं ने वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल कर, मुस्लिमों से झूठे वादे कर सत्ता तो पा ली लेकिन बाद में वादाखिलाफी पर उतर आए। शाही इमाम मानते हैं कि जो नेता आज तक मुस्लिमों के वोट लेते रहे, उन्होंने सत्ता मिलते ही मुस्लिमों से मुँह फेर लिया।

शाही इमाम ने बताया कि उन्होंने सीएए को लेकर काफ़ी लोगों से बात की और उनका अनुभव ये रहा कि अधिकतर लोगों को इसके बारे में कुछ पता ही नहीं है। सैयद अहमद बुखारी ने मुस्लिमों को समझाते हुए अपने लेख में कहा है;

कई लोग ऐसी अफवाहें फैला रहे हैं कि मुस्लिमों को हिंदुस्ताान से बाहर भेजा जा रहा है। हमें यह समझने की ज़रूरत है कि इस कानून में नागरिकता देने की बात हो रही है, लेने की नहीं। लेकिन, युवाओं को यह डर है कि उन्हें हिंदुस्तान से बाहर भेज दिया जाएगा। हकीकत में नागरिकता कानून एनआरसी से अलग है और भारत के मुस्लिमों से संबंधित नहीं है। लोगों को सीएए और एनआरसी के बीच का अंतर समझना चाहिए।

सैयद अहमद बुखारी ने लोगों को ये भी याद दिलाया कि पूरे देश में एनआरसी लागू करने जैसी कोई चीज अभी आई ही नहीं है। उन्होंने बताया कि सीएए तो एक्ट अर्थात क़ानून बन चुका है लेकिन एनआरसी के नियम-कायदे अभी तय ही नहीं हुए हैं तो विरोध क्यों? उन्होंने कहा कि पहले बैठकें होती थी, जिसमें इलाके के मौलाना, पार्षद, विधायक समेत आम लोग शामिल होते थे। सब कुछ तय किया जाता था कि उपद्रवी प्रदर्शन में शामिल न हों। लेकिन, अभी जब नमाज हो रही थी तो मैंने देखा कि एक तरफ नमाज हो रही थी दूसरी तरफ पीछे से नारे लग रहे थे। उन्होंने कहा है कि कोई भी तहरीर तब तक सफल नहीं होती जब तक कि जिम्मेदारों को ना जोड़ा जाए।उन्होंने सलाह दी कि विरोध संयमित तरीके से होना चाहिए। उन्होंने उनलोगों से भी आपत्ति जताई, जो जबरन दुकानें बंद करा रहे हैं।

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फर्जी आधार कार्ड और वोटर आईडी के साथ बांग्लादेशी मोहम्मद बिलाल धनबाद से गिरफ्तार

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण (NRC) को लेकर देश भर में हो रहे विरोध के बीच एक बांग्लादेशी शख्स को फर्जी आधार कार्ड और भारतीय मतदाता पहचान पत्र के साथ गिरफ्तार कर लिया गया है। बांग्लादेशी युवक को झारखंड के धनबाद से गिरफ्तार किया गया है। 

राजकीय रेलवे पुलिस (GRP) ने शनिवार (दिसंबर 21, 2019) को यह जानकारी दी। GRP इंस्पेक्टर हरिनारायण सिंह ने कहा कि बांग्लादेश के सिलहट जिले के तेजपुर निवासी मोहम्मद बिलाल को अमृतसर-कोलकाता दुर्गयाना एक्सप्रेस में बिना टिकट सफर करने के लिए गिरफ्तार किया गया।

उन्होंने कहा कि बिलाल को धनबाद रेलवे स्टेशन पर टिकट जाँच के दौरान शुक्रवार (दिसंबर 20, 2019) को गिरफ्तार किया गया। हरिनारायण सिंह ने बताया कि मोहम्मद बिलाल के पास से तीन बांग्लादेशी पासपोर्ट, बांग्लादेशी मुद्रा और अमेरिकी डॉलर जब्त किए गए हैं।

सिंह ने इंडिया टुडे को बताया, “आरोपित ने पहले दावा किया कि वह पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले का निवासी है लेकिन टीटीई ने उसके पास बांग्लादेशी पासपोर्ट देखे और आरपीएफ कर्मियों को सूचित किया जिन्होंने बिलाल को हिरासत में ले लिया।”

उन्होंने कहा कि बिलाल लखनऊ में ट्रेन पर चढ़ा था और कोलकाता जा रहा था, जहाँ से उसकी बांग्लादेश जाने की योजना थी। अधिकारी ने बताया कि मोहम्मद बिलाल का बड़ा भाई लखनऊ की जेल में बंद है। पूछताछ के दौरान आरोपित ने स्वीकार किया कि वह बांग्लादेशी नागरिक है और उसने पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले में फर्जी आधार और भारतीय मतदाता पहचान पत्र बनवाए थे।

इंस्पेक्टर हरिनारायण  सिंह ने कहा कि बिलाल को विशेष रेलवे न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया गया जिन्होंने उसे 14 दिनों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। साथ ही आरोपित के खिलाफ धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज किया गया है।

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साहित्य अकादमी पुरस्कार का विवादों से पुराना नाता रहा है। न सिर्फ़ पुरस्कार, बल्कि पुरस्कार इसे लेने वाले भी विवाद खड़ा करने में अव्वल रहे हैं। इस वर्ष भी कुछ ऐसा ही हुआ। साहित्य अकादमी पुरस्कार का इंतजार देश भर के लोगों को था और जब इसकी घोषणा हुई तो फिर विवाद हुए। विवाद की शुरुआत तभी हो गई थी, जब मैथिली भाषा के संयोजक प्रेम मोहन मिश्र ने इस्तीफे का मेल भेजा। उन्हें इस पुरस्कार को देने की प्रक्रिया पर संदेह था और उन्होंने जूरी पर ही सवाल खड़े कर दिए। उनका आरोप था कि जूरी के गठन को लेकर एक रैकेट सक्रिय है।

मिश्रा का आरोप था कि पुरस्कार किसे दिया जाना है, इस वर्ष यह सब पूर्व-निर्धारित था। उनकी माँग है कि जूरी के चयन और पुरस्कार की प्रक्रिया गोपनीय रखी जानी चाहिए। वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार अनंत विजय ने ‘दैनिक जागरण’ में रविवार (दिसंबर 22, 2019) को एक लेख लिखा, जिसमें इस पर विशेष रूप से प्रकाश डाला गया है। अनंत विजय ने इस लेख में बताया है कि साहित्य अकादमी में हर भाषा के प्रतिनिधि ही अब तक जूरी के सदस्यों के नाम प्रस्तावित करते रहे हैं। इसमें इसका ध्यान रखा जाता है कि एक ही सदस्य दो साल तक जूरी में न रहे। इसका अर्थ है कि आरोप लगाने वाले मिश्रा ने भी जूरी के एक सदस्य का नाम प्रस्तावित किया होगा।

प्रेम मोहन मिश्र कहते हैं कि उन्होंने आपत्ति जताई थी। लेकिन, उन्होंने तब आपत्ति जताई थी जब पुरस्कार के लिए चयन की प्रक्रिया पूरी हो गई थी। अनंत विजय कहते हैं कि वामपंथियों के दबदबे वाले जमाने में जूरी के गठन व पुरस्कार दिए जाने में एक रैकेट ज़रूर सक्रिय रहता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से ऐसा देखने को नहीं मिला है। उस वक़्त लोगों को महीनों पहले पता चल जाता था कि पुरस्कार किसे मिलेगा? तो क्या अब वामपंथियों और विपक्ष के इस आरोप में दम है कि मोदी सरकार स्वायत्त संस्थाओं को नष्ट कर रही है और तानाशाही भरे रवैये से उन्हें प्रशासित कर रही है?

इस आरोप की हवा निकालने के लिए एक उदाहरण देखते हैं। अगर ऐसा होता तो क्या इस वर्ष तिरुअनंतपुरम से सांसद और वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर को उनकी पुस्तक ‘एन एरा ऑफ डार्कनेस’ के लिए पुरस्कार मिलता? आप साहित्य अकादमी के पिछले 6 दशक का इतिहास उठाइए। आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी विपक्षी सांसद को अवॉर्ड मिला हो। अनंत विजय लिखते हैं कि आरएसएस से जुड़े लोगों या लेखकों को तो छोड़िए, भारतीयता की बात करने वालों तक के नामों पर भी इस पुरस्कार हेतु विचार नहीं किया जाता था। ऐसा हिन्दू कौन हुआ फिर? अपनी विचारधारा दूसरों पर कौन थोपता था, स्पष्ट दिख जाता है।

आपको 2015 बिहार विधानसभा चुनाव याद होगा। तब उदय प्रकाश, मंगलेश डबराल और अशोक वाजपेयी जैसे लेखकों ने अवॉर्ड-वापसी में हिस्सा लिया था। लेकिन, यही लेखक अकादमी अवॉर्ड्स मिलने की बात अपनी शान में गर्व से प्रस्तुत करते हैं। अनंत विजय लिखते हैं कि उनलोगों का एक ही लक्ष्य था- चुनाव से पहले भाजपा के ख़िलाफ़ माहौल बनाना। इस बार ऐसे सभी लेखक बेनकाब हो गए हैं। जैसे- सच्चिदानंद सिंह। उन्होंने तब विरोधस्वरूप सलाहकार समिति से इस्तीफा दे दिया था लेकिन इस वर्ष वो जूरी में शामिल रहे। सोचिए, इसी व्यक्ति ने तब ऐलान किया था कि वो साहित्य अकादमी से किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखेंगे।

जीएन देवी और सुकान्त चौधरी जैसे ऐसे और भी नाम हैं। एक और नाम है- नन्द भारद्वाज। इस आदमी ने पुरस्कार वापसी कर के रुपए भी लौटा दिए लेकिन बाद में जो चेक लौटाया था, उसे वापस भी ले लिया। ये सब गुपचुप तरीके से हुआ। अनंत विजय पूछते हैं कि जिन लेखकों को मोदी सरकार से डर लगता था, क्या उनका डर अब ख़त्म हो गया है? वो पूछते हैं कि क्या इन लेखकों के पास नैतिकता नहीं है या फिर उस नैतिकता को स्वार्थ और लोभ ने ढक लिया है?

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