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CAA पर UP दंगों की 7 वीडियो: पत्थरबाजी, आगजनी सब है विरोध के नाम पर प्रदर्शन में शामिल

उत्तरप्रदेश के कानपुर, फिरोजाबाद, हापुड़, बुलंदशहर, अमरोहा समेत अन्य जिलों में आज नागरिकता कानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन के नाम पर दंगे हुए। अधिकांश जगहों पर दंगाई भीड़ ने पुलिस अधिकारियों को इस बीच अपना निशाना बनाया। जिसके चलते पुलिस पोस्ट और गाड़ियों को भी नुकसान पहुँचाया गया। इस बीच कई तरह की वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आईं। जिसमें पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव दिखाया गया। लेकिन इसी बीच कुछ जिलों से अलग-अलग घटनाओं पर वीडियो भी आईं। जिनसे स्पष्ट हो गया कि उत्तर प्रदेश में हो रहे विरोध प्रदर्शन का उद्देश्य अब नागरिकता कानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन नहीं है बल्कि पुलिस पर हमला और सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुँचाना हैं।

उत्तरप्रदेश के हमीर पुर में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ। वहीं फिरोजाबाद में 12 पुलिस वाहनों को आग लगा दी गई।

न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तरप्रदेश के हापुड में हिंसक भीड़ ने पुलिस पर हमला किया।

एएनआई के अनुसार, दंगाई ने नए कानून के ख़िलाफ चल रहे प्रदर्शन में गोरखपुर में भी पुलिसबलों पर पत्थर फेंके।

इसी तरह उत्तरप्रदेश के बुलंदशहर में भी पत्थरबाजी के कारण कई पुलिसवालों और प्रदर्शनकारियों को चोटें आईं। और पुलिस को हिंसा रोकने के लिए लाठी चार्ज करना पड़ा।

फिर, अमरोहा और बहराईच में भी सुरक्षाबल को दंगाईयों को रोकने के लिए लाठी चार्ज करना पड़ा।

इधर, कानपुर में भी अनियंत्रित मुस्लिमों की भीड़ द्वारा पुलिस जीप और सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया गया। उधर, मुजफ्फनजर में भी विरोध उस समय हिंसा में बदल गया जब प्रदर्शनकारियों ने गाड़ियों में आग लगा दी।

गौरतलब है कि ये केवल चंद वीडियो हैं। इनके अलावा सोशल मीडिया पर बहुत से प्रमाण हैं। जो इस कानून के ख़िलाफ़ हो रहे विरोध पर सवालिया निशान लगाते हैं। अब तक जानकारी के अनुसार यूपी में 3000 से ज्यादा लोगों के नाम पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली है और कईयों के ख़िलाफ़ आगे की कार्रवाई की जा रही है। इसके अलावा कई जिलों में इंटरनेट सेवा भी सुरक्षा कारणों से बंद कर दी गईं हैं।

पायल रोहतगी ने चिदंबरम को सुनाई खरी-खरी, कहा- मुझे भी पुलिस ने ही उठाया था, जब मैं अकेली थी

पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उनके पिता मोतीलाल नेहरू पर कथित तौर पर विवादस्पद टिप्पणी करने के कारण हाल ही में गिरफ्तार हुईं पायल रोहतगी कुछ दिन पहले बेल पर रिहा हो चुकी है। जेल से बाहर निकलते ही उन्होंने कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता पी चिदंबरम को निशाने पर लिया है। उन्होंने कॉन्ग्रेस नेता द्वारा इतिहासकार गुहा की गिरफ्तारी के बाद उनके समर्थन में बोलने के लिए उन्हें घेरा है और कहा है कि कॉन्ग्रेस सिर्फ़ अभिव्यक्ति की आजादी का ढिंढोरा पीट रही है।

दरअसल, नागरिकता संशोधन विधेयक के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने पहुँचे इतिहासकार रामचंद्र गुहा को कल गिरफ्तार किया गया था। जिसके बाद कॉन्ग्रेस दिग्गज नेता ने उनके समर्थन में लिखा, “रामचंद्र गुहा को जब गिरफ्तार किया गया, तब वह किसी प्रकार के कानून का उल्लंघन नहीं कर रहे थे, वे अकेले थे और उन्होंने धारा 144 का भी उल्लंघन नहीं किया था। उनके इर्द-गिर्द 4 पुलिस वाले खड़े, जिसे दिखाकर उन्हें इस धारा के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया।”

अब इसी ट्वीट को आधार बनाकर पायल रोहतगी ने पूर्व वित्त मंत्री को घेरा और लिखा, “मुझे भी गिरफ्तार किया गया था सर और मैंने किसी भी नियम-कानून का उल्लंघन नहीं किया थाl कॉन्ग्रेस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ढिंढोरा पीट रही हैl उसने मुझे मेरे घर से उठा लियाl मैं भी घर पर अकेली थीl”

बता दें, पायल के इस ट्वीट के बाद कई लोग उनके समर्थन में आए और कहा कि कॉन्ग्रेस के लिए अभिव्यक्ति की आजादी सिर्फ़ कॉन्ग्रेसी लाल सलाम और टुकड़े-टुकड़े गैंग को ही है। वरना ये लोग तो प्रधानमंत्री को चोर बोल के सुप्रीम कोर्ट में माफी माँग लेते हैं।

गौरतलब है कि इसके बाद पायल रोहतगी के मंगेतर संग्राम सिंह ने बताया कि जो इंसान देश में तोड़फोड़ कर रहे हैं, सरकारी संपत्ति को नुक़सान पहुँचा रहे हैं वो कभी भी देश हित में हो नहीं सकते। कैब या कोई भी बिल हो वो सिर्फ़ देश की एकता व अखण्डता को तोड़ना चाहते हैं ऐसे देशद्रोहियों पर सख़्त कार्रवाई होनी चाहिए।

कॉन्ग्रेस पार्षद शहजाद खान ने पुलिस को मारने के लिए भीड़ को उकसाया, कहा- एक भी पुलिस वाले को मत छोड़ना

अहमदाबाद पुलिस ने गुरुवार (दिसंबर 12, 2019) को शाह-ए-आलम में भड़की हिंसा मामले में शुक्रवार (दिसंबर 20, 2019) को कॉन्ग्रेस पार्षद समेत 48 लोगों को गिरफ्तार किया। कॉन्ग्रेस पार्षद शहजाद खान पठान पर आरोप लगा कि उन्होंने सीएए के विरोध प्रदर्शन में उमड़ी भीड़ को उकसाया और अति संवेदनशील माहौल में पुलिस वालों से बदला लेने की बात की। बता दें, प्रदर्शनकारियों से दंगाईयों में तब्दील हुई इस भीड़ ने इस दौरान पुलिसकर्मियों पर पत्थरबाजी की। जिसमें करीब 26 पुलिस वाले घायल हो गए। इसके अलावा पुलिस जीप को भी निशाना बनाया गया।

जानकारी के अनुसार इस पूरे मामले में पुलिस ने 5000 लोगों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कर ली है। जिसमें से कुछ लोगों की पहचान होने का भी दावा किया जा रहा है। बताया जा रहा है दंगाईयों की इस भीड़ द्वारा 26 पुलिस वाले घायल किए गए हैं। जिसमें डीसीपी बिपिन अहिर, एसीपी आरबी राणा और जेएम सोलंकी के नाम भी शामिल हैं।

टाइम्स नॉऊ की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने खुद इस बारे में जानकारी दी है कि उन्होंने इस मामले में 5000 लोगों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कर ली है। जबकि कॉन्ग्रेस पार्षद समेत 50 लोग नामजद हैं। इनमें से पुलिस ने 48 लोगों को शुक्रवार को गिरफ्तार कर लिया है। जिनपर हत्या की कोशिश, दंगा भड़काने और पुलिस को प्रताड़ित करने के इल्जाम हैं।

इसके अलावा पुलिस ने इस बारे में भी बताया कि उन्होंने शहजाद पठान को गुरुवार को ही हिरासत में ले लिया था, लेकिन गिरफ्तारी शुक्रवार को हुई। पुलिस अधिकारी जेएम सोलंकी के मुताबिक पुलिस पठान को ले जा रही थी, तो उसने वहाँ मौजूद स्थानीय लोगों को पुलिस से बदला लेने की बात की और एक भी पुलिस वाले को न छोड़ने के लिए कहा। जिसके कारण पुलिस का मानना है कि इसी उकसाने की वजह से पुलिस पर हमला हुआ।

गौरतलब है कि इस हमले की वीडियो सोशल मी़डिया पर वायरल होने के बाद क्रिकेटर से राजनेता बने गौतम गंभीर ने भी इसपर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “मुझे लगता है कि मानवाधिकार के सभी लड़ाके, बॉलीवुड के लोग और फर्जी वामपंथी पत्रकार संयुक्त राष्ट्र गए हैं कि पुलिस वालों के मानवाधिकार होते हैं या नहीं।”

CAA विरोध के नाम पर देश की संपत्ति को नुकसान पहुँचाने पर सितारे चुप, कंगना ने कहा- कायर हैं सब

नागरिकता संशोधन कानून पर देश के कोने-कोने में विरोध की आवाजें उठती नजर आ रही हैं। दंगाई हर जगह प्रदर्शन के नाम पर सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुँचा रहे हैं। सोशल मीडिया पर कई लोग नए कानून के समर्थन में तो कई इसके विपरीत अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। लेकिन, इसी बीच बॉलीवुड के कई कलाकार ऐसे नोटिस किए गए हैं, जो इस पूरे विषय पर अपनी चुप्पी बनाए हुए है। जिसके कारण ट्विटर पर एक ट्रेंड भी चला #Shameonbollywood. हालाँकि इस ट्रेंड के बाद भी कलाकारों की प्रतिक्रिया मौन रही। लेकिन कंगना रनौत भड़क उठीं।

बीतें दिनों जयललिता फिल्म की शूटिंग में व्यस्त कंगना रनौत से जब ट्विटर पर चले इस ट्रेंड पर टाइम्स ऑफ इंडिया ने सवाल किया, तो उन्होंने कलाकारों को लताड़ते हुए कहा कि मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि बॉलीवुड डरपोकों और कायरों से भरा हुआ है।

कंगना बॉलीवुड कलाकारों को निशाना बनाते हुए कहती हैं कि जो खुद में ही खोए हुए हैं और दिन में 20 बार आईना देखते हैं। जब उनसे कुछ पूछो तो कहते हैं कि हमारे पास इलेक्ट्रसिटी और जरूरत की हर चीज मौजूद है। हमें विशेषाधिकार प्राप्त है हम देश की चिंता क्यों करें।

बॉलीवुड कलाकारों के ख़िलाफ़ चले ट्रेंड को बिलकुल सही बताते हुए कंगना कहती हैं कि उनकी नजर में सभी सेलेब्रिटीज डरे हुए इंसान हैं, वे हर चीज से डरते हैं, वे डरपोक हैं, कायर हैं और बिना रीढ़ के लोग हैं। जो बाहरी लोगों का मजाक उड़ाते हैं, लड़कियों का मजाक उड़ाते हैं।

ताना कसते हुए कंगना रनौत कहती हैं कि ऐसे कलाकार सिर्फ़ सोशल मीडिया पर मेकअप, कपड़ों, जिम की फोटो शेयर करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। उनके मुताबिक, “सोशल मीडिया का मंच उन्हें अपने विचार व्यक्त करने के लिए ही दिया गया है, ताकि वो लोगों के बारे में सोचें और उन्हें दिशा दिखाएं, ना कि सिर्फ इंस्टाग्राम पर पोस्ट लिखें। वे कायर लोग हैं, जो लोगों के बारे में बोलने से कतराते हैं। एक्टर्स को अपनी पोजीशन का जवाबदेह होना चाहिए। ये लोग फालतू फिल्में बनाकर असली सिनेमा को खत्म कर रहे हैं।”

कंगना कहती है कि बॉलीवुड के स्टार्स पर भरोसा कर उन्हें अपना आदर्श नहीं मानना चाहिए। हमें देखना चाहिए कि वो असल में क्या हैं। मैंने बॉलीवुड के लोगों से ज्यादा डरपोक लोग नहीं देखे हैं।

गौरतलब है कि एक ओर जहाँ सीएए पर चुप्पी साधकर अपना स्टैंड स्पष्ट न करने पर बॉलीवुड कलाकारों को कंगना ने बुरी तरह लताड़ा है, तो वहीं उनकी बहन रंगोली चंदेल लगातार इसके समर्थन में है और दंगाईयों की वीडियो शेयर करके बोल रही है कि ऐसे ही बदमाशों से देश को मुक्ति दिलानी है।

यूनिवर्सिटी दंगों के 6000 लोगों को रोकने के लिए जब कैनेडी ने 30,000 जवान उतार दिए थे

सितंबर 1962 की बात है। शहर था ऑक्सफोर्ड, जहाँ मिसिसिपी विश्वविद्यालय में एक अश्वेत युवक, जेम्स मेरेडिथ, को प्रवेश देने पर श्वेत अमरीकियों ने दंगा शुरु कर दिया। तीन कारें जला दीं, पुलिस के जवानों पर हमला किया, एक फ्रांसीसी पत्रकार और एक अन्य शहरी इस हिंसा में मारे भी गए। मेरेडिथ जब अपने हॉस्टल में पहुँचा तो यूनिवर्सिटी के 2500 विद्यार्थियों और स्थानीय लोगों ने कैम्पस की मुख्य बिल्डिंग लिसियम को घेर लिया।

इस हिंसा को गवर्नर रॉस बर्नेट रोक नहीं पाए तो राष्ट्रपति जेएफ कैनेडी ने उनसे बात की और कहा कि हिंसा पर काबू करने के लिए उन्हें जो करना होगा, वो करेंगे। गवर्नर ने कहा कि मेरेडिथ को बाहर कर दिया जाए, तो हिंसा रुक जाएगी। राष्ट्रपति ने कहा कि जब तक हिंसा खत्म नहीं होगी बातचीत का सवाल ही नहीं उठता। गवर्नर नहीं चाहते थे कि फेडरल पुलिस उनके अधिकार क्षेत्र में आए, इनसे उनकी भद्द पिट जाती।

लेकिन राष्ट्रपति कैनेडी के लिए उस दंगे को रोकना जरूरी था जिसे ‘ओले मिस रायट्स’ के नाम से जाना जाता है। शहर की जनसंख्या लगभग 6000 थी, और दंगाई शहर जो नस्लभेदी रूप में सड़कों पर था, उसे रोकने के लिए राष्ट्रपति ने 30000 जवानों को भेज दिया। उसके बाद दंगा करने वाले लोगों को पकड़ा गया। दंगाई विद्यार्थी सर पर हाथ रख कर बाहर निकले, उन्हें अपराधियों की तरह ही देखा गया, वैसा ही व्यवहार किया गया।

रवीश कुमार ने कुछ दिन पहले हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के कैनेडी स्कूल के छात्रों द्वारा जामिया के दंगाई छात्रों पर पुलिस की कार्रवाई के विरोध का जिक्र करते हुए, अमेरिका के 19 विश्वविद्यालयों के कुल 400 छात्रों के समर्थन का जिक्र किया था। उन्होंने सोचा कि अमेरिका का नाम लेने से इन दंगाइयों को लेजिटिमेसी यानी स्वीकार्यता मिल जाएगी कि देखो भइया, अंग्रेजी बोलने वाले भी इनके समर्थन में हैं।

उपरोक्त सारी तसवीरें Getty Images से ली गई हैं जो कि ओले मिस दंगों के बाद की हैं

जिस कैनेडी स्कूल की बात करते हुए रवीश ने लिखा था, “बंदूक के साये में जामिया मिल्लिया के छात्र अपने दोनों हाथ ऊपर उठाए चले आ रहे हैं। जब भी यह दृश्य आँखों के सामने से फार्वर्ड होता था मेरे ज़हन में सारा इतिहास रिवाइंड होने लगता था। जब भी यह दृश्य धुंधला (ब्लर) होता था अतीत का इतिहास साफ (क्लीयर) हो जाता था। जब अतीत का इतिहास धुंधला होता था, सामने बन रहा इतिहास साफ दिखने लगता था। अगर आपने व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी से इतिहास की पढ़ाई नहीं की है तो मेरी बात आसानी से समझ जाएँगे। उम्मीद है हाथ ऊपर कर लाए गए छात्र ख़ुद को अपमान के जाल में फँसने नहीं देंगे और समझ सकेंगे कि यह भारतीय स्टेट का नया चेहरा है। और उस चेहरे से नकाब हटना शुरू हुआ है।”

अब मैं अमेरिकी राष्ट्रपति कैनेडी के शब्दों को इसी परिप्रेक्ष्य में, राष्ट्र के नाम में दिए गए संबोधन में उन्होंने जो कहा था, वो रखना चाहूँगा, “अमेरिकी नागरिक यूँ तो कानून से असहमत होने के लिए स्वतंत्र हैं, पर उसकी अवज्ञा के लिए नहीं।” सीधे शब्दों में कैनेडी ने वही बात कही, जो इसी सप्ताह मुख्य न्यायाधीश बोबड़े ने कहा था कि छात्र अगर हिंसा करते हैं तो पुलिस को अपना काम करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि छात्रों को दंगा करने का अधिकार नहीं है।

कुछ तस्वीरें रोमेंटिक लगती हैं, लेकिन होती नहीं

इसीलिए, संवेदनशील होने से पहले आपको यह देखना और समझना होगा कि जो आप देख रहे हैं, वो परिणाम है, या फिर शुरुआत। ‘हाथ उठा कर बाहर आते बच्चे’ इस प्रकरण की पहली तस्वीर नहीं है, वो इसकी आखिरी तस्वीर है। जंतर-मंतर पर शांति प्रदर्शन करने वाली भीड़ इस प्रकरण की पहली तस्वीर नहीं है, वो इस घटनाक्रम की अंतिम तस्वीर है।

इस पूरी घटना और दुर्घटना पर इमोशनल होने से पहले हमें इस पूरे तथाकथित विरोध प्रदर्शन की वो तस्वीरें भी देखनी पड़ेंगी जहाँ पुलिस आईसीयू में है, उनका सर फटा हुआ है, आँख कटी है, हाथ में कट्टे से चली गोली लगी है, पत्थरों का ढेर कहीं लगा हुआ है, जलती हुई बसें हैं, ‘हिन्दुओं से आजादी’ के नारे हैं, दीवारों पर इस्लामी शासन के ख़िलाफ़त की इबारत लिखी हुई है, और अपनी ही लाइब्रेरी को तोड़ते वो छात्र-छात्राएँ हैं जो पुलिस पर इस तोड़-फोड़ का जिम्मा डालना चाहते हैं।

इन तस्वीरों की पेशी किस अदालत में होगी? जब तुमने हिंसा कर ली, दुनिया के सामने नग्न हो गए, पीटे गए, भगाए गए, मजहबी उन्माद से सनी बातें पब्लिक में बाहर आ गईं, तब तुम ये बता रहे हो कि भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और संविधान का कौन सा आर्टिकल क्या कहता है? मैं ये कैसे मान लूँ कि आज जो तुम ‘हम तो छात्र हैं, हम तो शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे’ वो सत्य है? क्योंकि तस्वीरें और वीडियो में मैं देख पा रहा हूँ एक राजनैतिक कानून के विरोध में मजहब के वर्चस्व के नारे लगाए जा रहे हैं!

तुम हमें बता रहे हो कि हम ये मान लें कि ‘अल्लाहु अकबर’ का मतलब ‘गॉड इज ग्रेट’ होता है? इतने मासूम तो मत ही बनो। दंगा करते वक्त ये नारा उतना ही साम्प्रदायिक है जितना ‘हिन्दुओं से आजादी’ और ‘हिन्दुत्व की कब्र खुदेगी’ है। राजनैतिक विरोध में ‘नारा-ए-तकबीर’ और ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ की जगह कैसे बन जाती है?

अगर ये तस्वीरें जामिया के कैम्पस की हैं, तो हाथ उठाए बाहर आते विद्यार्थियों की तस्वीर बहुत सुकूनदायक हैं। ये बताता है कि दिल्ली पुलिस ने एक मजहबी उन्मादी भीड़ को न सिर्फ नियंत्रण में लिया, बल्कि उन्हें अपनी ही लाइब्रेरी या कैम्पस को आग के हवाले करने से बचा लिया। जिस भीड़ में कट्टे से गोलियाँ चल रही हों, जिस भीड़ में जामिया नगर के हार्डकोर अपराधी शामिल हों, जिस भीड़ ने बसों में आग लगाई हो, जो भीड़ छात्रों के साथ पत्थरबाजी कर रही हो, जो भीड़ कैम्पस में बचने के लिए घुस जाती है, वो भीड़ अपने फायदे के लिए लाइब्रेरी को बच्चों समेत आग लगाने से बाज आ जाती क्या?

लाइब्रेरी में बैठे बच्चों का हो सकता है कोई दोष न हो, लेकिन बाहरी लोग उसी लाइब्रेरी में घुस कर अगर उन्हें चाकू की नोक पर किडनैप कर लेते, तेल छिड़ककर वहाँ आगजनी करते तो, उसके बाद हुए नुकसान के लिए कौन जिम्मेदार होता? क्या यही वामपंथी लम्पट और यही रवीश कुमार यह नहीं कहते कि गेट पर मूक दर्शक बन कर परमिशन का इंतजार करती रही पुलिस, और एक लाइब्रेरी आग के हवाले कर दी गई? तब क्या यह न कहा जाता कि अमित शाह ने सीधा आदेश दिया होगा कि लाइब्रेरी को जल जाने दो क्योंकि फासिवादियों का पहला निशाना पुस्तकालय ही होते हैं?

इसलिए तस्वीरों को देखिए, और ध्यान से देखिए। उन तस्वीरों को भी देखिए (ऊपर गैलरी में) जब अमेरिकी पुलिस ने दंगाइयों को सर पर हाथ रखवा कर बाहर किया था ताकि एक अश्वेत नागरिक को विश्वविद्यालय में पढ़ने की स्वतंत्रता मिले। यहाँ तो विरोध के कारण भी बेकार हैं। कल जिस तरह से जामिया की छात्राओं का अल्पज्ञान और उनकी कल्पनाशीलता जंतर-मंतर के प्रदर्शन में नजर आई, उससे जाहिर है कि उन्होंने न तो इस नागरिकता संशोधन कानून 2019 को पढ़ा है, न ही उन्हें यह पता है कि NRC है क्या।

NRC की नियम और शर्तें किसने देखी हैं?

NRC पर रवीश से बात करते हुए एक छात्रा कहती है कि आप यह देखिए कि महिलाएँ शादी के बाद दूसरे घर में चली जाती हैं, उनके पास डॉक्यूमेंट नहीं होता, वो बदलवा नहीं पाती। इसलिए इसके आने से भारत की सारी महिलाएँ अवैध नागरिक साबित हो जाएँगीं। आप सोचिए कि पढ़े-लिखे लोगों के ज्ञान का स्तर इतना बेकार है तो क्यों न मेरे कैब का ड्राइवर आदिल अली मुझसे पूछेगा, “सर आप तो पत्रकार हैं, आप ही बताइए कि 1951 से 1988 के बीच जन्मे मुस्लिमों को ही नागरिक माना जाएगा, ये गलत है कि नहीं?”

वो ड्राइवर तो उतना पढ़ा लिखा नहीं है। इंटरनेट पर खोज नहीं सकता। लेकिन ये छात्राएँ आखिर किस आधार पर ऐसी बातें बना रही हैं, और रवीश कुमार माइक लिए आनंद पा रहे हैं कि देश की लड़कियाँ आज अन्याय के ख़िलाफ़ खड़ी हो गई हैं! दुर्भाग्य है कि वो देश की लड़कियों का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहीं, वो एक अच्छे संस्थान से हैं और उस स्थान के सामूहिक ज्ञान पर प्रश्नचिह्न लगा रही हैं।

जब कोई, ऐसे कानून को ले कर विरोध करने लगे जो अभी अपने शुरुआती रूप में भी नहीं आया है, खुद ही उसके नियम और शर्तों का आविष्कार कर ले कि होगा तो यही, और ऐसे ही, फिर आप ऐसे लोगों को समझा नहीं सकते। ये लड़कियाँ या तमाम प्रदर्शनकारी, दंगाई और बुद्धिजीवी गिरोह किस आधार पर बोल रहा है, आग लगा रहा है, लेख लिख रहा है? असम वाले NRC का हालिया स्वरूप सुप्रीम कोर्ट के संरक्षण में सामने आया है।

आप जरा सोचिए कि भारत की आधी आबादी, लड़कियाँ और स्त्रियाँ, इस देश की अवैध नागरिक हो जाएँगी? ये कॉन्सपिरेसी थ्योरी तो समझ में आ रही थी कि NRC के जरिए मजहब विशेष को निकालने की साजिश हो रही है, लेकिन सारी औरतों को अवैध घोषित करके मोदी और शाह क्या पा जाएँगे? इतने मूर्ख हैं क्या हमारे प्रधानमंत्री और कैबिनेट?

प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द वायर’ ने तो बाकायदा ग्राफिक्स और चार्ट-वार्ट बना कर समझाया कि कैसे बीस करोड़ मुस्लिमों को एक झटके में अवैध बना दिया जाएगा। जाहिर-सी बात है कि जिनका विश्वास ‘वायर’ और रवीश जैसों में है, वो तो सच में परेशान हो जाएँगे कि बीस करोड़ लोगों को क्यों निकाला जा रहा है।

प्रधानमंत्री और गृहमंत्री, दोनों ने बार-बार यह आश्वासन दिया है कि लोग किसी भी तरह के बहकावे में न आएँ, लेकिन लोगों को भड़काने वाले अपने काम में लगे हुए हैं। कह रहे हैं कि नागरिकता कानून को NRC के साथ देखने की जरूरत है। अब ये लोग नागरिकता रजिस्टर भी खुद ही बना रहे हैं कि इसमें ऐसा होगा, वैसा होगा। जो ड्राफ्ट रूप में भी कहीं नहीं है, जिसका प्रयोग असम में सुप्रीम कोर्ट के कहने पर हुआ क्योंकि असम एक जनजातीय और अलग संस्कृति वाला इलाका है, जहाँ घुसपैठ से लोग परेशान थे, उसे पूरे भारत पर लागू करने की कल्पना के रूप में क्यों परोसा जा रहा है?

इस सरकार को कॉन्ग्रेस द्वारा लाए गए विधेयकों को, जिसके पक्ष में मनमोहन सिंह से ले कर सीताराम येचुरी तक बोल चुके हैं, उसे दोनों सदनों में बहुमत से पास करा लेने के बाद, हर बार इन्हीं नेताओं की पार्टियों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में भी पास कराना पड़ता है। तीन जगह से अप्रूवल लेने के बाद, इसे यह कहा जाता है कि वो सब तो ठीक है, लेकिन लोग तो दंगे कर रहे हैं, उनका क्या।

एक लाइन में यह कह दिया जाता है कि सांसद तो मात्र 300 हैं भाजपा के, लेकिन असली आवाज तो उन्हीं लोगों की है जो दंगा कर रहे हैं। आखिर दंगा करने वाले कब से लोकतंत्र की सबसे बड़ी आवाज बन गए? विरोध प्रदर्शन का मतलब यह नहीं होता कि चूँकि विरोध हो रहा है तो जिस बात का विरोध हो रहा है, वो गलत है। आप खुद ही सोचिए कि इन दंगाइयों का तर्क और क्या है?

इन्होंने न तो नागरिकता कानून को पढ़ा है जो भारत के नागरिकों के लिए है ही नहीं, न ही NRC पर सरकार का कोई ड्राफ्ट उपलब्ध है जिसे निशाना बना कर ये लोग कुछ तार्किक बातें कर पाएँ, तो फिर इनके विरोध को बहुमत से चुनी हुई सरकार, और करोड़ों लोगों की सहमति (जिन्होंने भाजपा का मैनिफेस्टो पढ़ा, नेताओं के भाषण सुने और वोट दिया) कैसे छोटी पड़ जाएगी?

इसलिए, अंतिम तस्वीरों को मत देखिए। आप उन तस्वीरों को देखिए जो घटनाक्रम की हैं। आप उन तस्वीरों को देखिए जहाँ हिन्दुओं को कैलाश जाने के लिए कहा जा रहा है। आप उन आवाजों को सुनिए जो ‘हिन्दुओं से आजादी’ चाहते हैं, और उसके पीछे की उस विशाल भीड़ को देखिए जो एक आवाज में ‘आजादी’ चिल्ला कर सहमति दे रही होती है। बात यह नहीं है कि जामिया में कितने प्रतिशत छात्र गैरमुस्लिम हैं, बात यह है कि ‘हिन्दुओं से आजादी’ और ‘गलियों में निकलने का वक्त आ गया’ कहने वालों की भीड़ वहीं की है।

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NRC को लेकर देश के कई हिस्सों में लोग गुट बनाकर विरोध में उतर रहे हैं, प्रदर्शन कर रहे हैं। दरअसल वो प्रदर्शन कर रहे हैं हिंसा का, वो प्रदर्शन कर रहे हैं संख्या बल का। वो दिखा रहे हैं कि “देखो, जहाँ-जहाँ हम जैसे लोगों की संख्या थोड़ी भी अधिक है वहाँ-वहाँ हम तोड़-फोड़ कर सकते हैं, सार्वजनिक संपत्तियों में आग लगा सकते हैं, पुलिसकर्मी को मार सकते हैं, परिवहन और यातायात को रोक सकते हैं, जान-माल को नुकसान पहुँचा सकते हैं।” कुल मिलकर उनका स्पष्ट संदेश यह कि वो अगर संख्या बल में कहीं भी अधिक हैं तो उस स्थान पर पुलिस और लोक व्यवस्था को बर्बाद कर सकते हैं।

अव्वल तो इनका कोई नेता नहीं है फिर भी छिटपुट, सड़क छाप नेताओं की भी बात करें, जो इन हिंसक प्रदर्शनों को सपोर्ट कर रहे हैं तो आपको इसमें सबसे पहले बुद्धिजीवियों का वो धड़ा दिखेगा, जिनकी दुकान सरकार बदलने के साथ ही बंद होने के कगार पर पहुँच चुकी है। इसको समझने में बहुत मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। जैसा कि पूरा देश जानता है कॉन्ग्रेस और सपा जैसी पार्टियाँ पारिवारिक पार्टियाँ हैं, यहाँ उन्ही लोगों को पद या प्रतिष्ठा (?) मिलती है जो चाटुकार किस्म के होते हैं, जो राजा द्वारा दिन को रात कहने पर खुद भी ‘रात है, रात है’ की माला जपने लगने हैं।

अफ़सोस कि बीजेपी ‘नेपोटिज्म’ को सपोर्ट नहीं करती इसलिए बीजेपी की सरकार बनने के कारण उनकी चाटुकारिता की दुकान बंद होने लगी, सरकारी खर्चों पर पलना ख़त्म हो गया, उनके बेटे-बेटियों, सगे-संबंधियों को लाभ मिलना बंद हो गया और कोई व्यक्ति कब तक अपने लाभों से समझौता करते हुए अपने घर मुँह बंद करके बैठा रहे! लेकिन इनकी मजबूरी यह कि सरकार ऐसा कोई मौका दे नहीं रही जिसकी आड़ में ये अपना फ्रस्ट्रेशन निकाल पाएँ। तो इस बार इन्होंने अपने लिए मौका बनाया और NRC के बहाने लोगों में गलत प्रचार कर, चालाकी से सिर्फ एक पक्ष दिखाकर और दूसरे पक्ष को छुपा कर उन्हें भड़काना शुरू किया। न सिर्फ रियल लाइफ में बल्कि सोशल मीडिया पर भी इनका यह एक सूत्री कार्यक्रम चलता रहता है। इनके भड़काने की प्रक्रिया कुछ ऐसी है कि ये लोग गुट बनाकर दो धड़ों में बँट जाते हैं। जहाँ एक गुट सोशल मीडिया पर NRC/ CAB या अन्य बेहतर क़दमों पर सरकार के साथ दिखने वाले लोगों के बारे में झूठी बातें फैलाकर चरित्र हनन करते हैं, उन पर व्यक्तिगत आरोप लगाते हैं, उन्हें कुंठित, भक्त, आईटी सेल वाले, भाड़े पर बिकने वाले कहकर उनकी गरिमा को धूमिल करते हैं तो वहीं दूसरा धड़ा लोगों को मुद्दे के बारे में झूठी बातें गढ़कर भड़काने में लग जाते हैं। जब एक साथ इतने सियार मिलकर हुआ-हुआ करने लग जाएँ तो आम जनता जिन्हें कमाने-खाने से वक़्त नहीं मिल पाता, वो धीरे-धीरे इनकी बातों में आने लगते हैं।

अब दूसरे प्रकार के सपोर्टर पर आते हैं। ये वो हैं, जो इन हिंसक प्रदर्शनों को जनांदोलन का नाम देकर अपनी बुझ चुकी राजनीतिक करियर की राख में चिंगारी खोजते रहते हैं। ये वो लोग हैं जिनको राजनीति की मुख्यधारा में वापस लौटने के लिए किसी कंधे की जरुरत है क्योंकि ये अपनी योगता से खुद को कहीं स्थापित करने में कामयाब नहीं हो सके तो आम लोगों को गलत बातें बताकर सरकार के खिलाफ भड़का रहे हैं।

तीसरे तरह के सपोर्टर को देखें तो ये आपको एक धर्म विशेष के नज़र आएँगे और वो धर्म है- ‘इस्लाम’। लगभग सारे कथित अल्पसंख्यक NRC का विरोध कर रहे हैं और ये उपरोक्त दोनों प्रकार के लोगों से संख्या में कहीं ज्यादा हैं। मजहबी लोग ही इन हिंसक प्रदर्शनों के फ्यूल हैं। कुछ कट्टरपंथी क्यों इस रजिस्टर का विरोध कर रहे हैं इसके लिए उनके पास कोई तर्क नहीं है। उनके पास है तो केवल एक अंधी दौड़, एक झूठा डर, जो उपरोक्त दोनों प्रकार के लोगों द्वारा उनके मन में भरा गया है और निरंतर ये डर बेबुनियादी बातों और गलत तर्कों की सहायता से बढ़ाया जा रहा है। कुछ छद्म बुद्धिजीवी तो अयोध्या विवाद को हल करने और तीन तलाक जैसे स्त्री विरोधी एवं दकियानूसी प्रथाओं पर प्रतिबंध लगाने के नाम पर भी लोगों को भड़का रहे हैं। इसमें सिर्फ भड़काने वालों की ही गलती नहीं है बल्कि भड़कने वालों की भी गलती है। अगर आपसे कोई कहे कि कौवा तुम्हारा कान लेकर उड़ रहा है तो पहले अपना कान देखें न कि कौवे को गुलेल मारने में लग जाएँ।

अब फिर ये सवाल उठ जाएगा यहाँ कि NRC है क्या? कैसे ये समुदाय विशेष के विरुद्ध नहीं है? तो इस तरह के सारे सवालों के लिए हमारा ये लेख पढ़ें और फैसला करें कि NRC कितना किसी मजहब के खिलाफ है!

NRC को लेकर सरकार बार-बार बता रही है कि यह एक रजिस्टर मात्र है, जिसमें राष्ट्र के वैध नागरिकों के नाम दर्ज होंगे। ये सबसे पहले और अब तक सिर्फ असम में इसलिए लागू हुआ है क्योंकि पूर्वोत्तर में स्वतंत्रता प्राप्ति के समय, पाकिस्तान-बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) युद्ध के समय बड़ी संख्या में शरणार्थी तो आते ही रहे, साथ ही शरणार्थियों की आड़ में अवैध घुसपैठिए भी आते रहे। जिस कारण वहाँ की ‘डेमोग्राफी’ यानी आबादी के प्रकार में काफी बदलाव आता गया। पूर्वोत्तर में यही घुसपैठिए बहुसंख्यक बनते जा रहे हैं जबकि वहाँ के मूल निवासी अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं, उदाहरण के तौर पर- त्रिपुरा।

ये समझने की कोशिश कीजिए कि भारत जैसे देश में जहाँ पहले से ही विश्व की करीब 17.71 प्रतिशत जनसंख्या निवास कर रही है, जबकि भारत के पास विश्व की भूमि का केवल 2.4 प्रतिशत है वहाँ घुसपैठियों को या अवैध नागरिकों को जगह नहीं दी जा सकती। और तो और, भारत इस समस्या के कारण जब पहले ही एक युद्ध (पाकिस्तान-बांग्लादेश युद्ध, 1971) में भाग ले चुका है फिर क्यों भारत उसी समस्या को बेताल की तरह ढोते रहे? एक युद्ध के बाद भी ये समस्या अगर मौजूद है तो इससे निपटने के लिए भारत जैसे देश को कोई तो कदम उठाना ही पड़ता और यह सबसे बेहतर कदम इसलिए है क्योंकि NRC अपने नेचर में पूरी तरह से सेक्युलर है। दिसम्बर 2014 में सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद इसे तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। भारत के वैध नागरिकों को चाहे वो किसी भी जाति, धर्म, संप्रदाय के हों, NRC से कोई दिक्कत नहीं होने वाली है।

इस चीज को हमेशा याद रखा जाए कि मंदिर में दिया जलने से पहले घर में दिया जलाया जाता है। अत: ‘ग्लोबलाइजेशन’ या ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ अच्छी चीज हो सकती है, लेकिन स्थानीय पहचान को समाप्त करके नहीं। अपने घर में क्लेश करके पड़ोसियों को रोटी खिलाना किस स्थिति में अच्छा माना गया है? उस पर भी तब तो बिलकुल भी नहीं जब ये अवैध प्रवासी अपने हितों की पूर्ति के लिए स्थानीय लोगों को उनके धर्म, जाति, वर्ग के आधार पर भड़काना शुरू करे, बाँटना शुरू करे और सुरक्षा की दृष्टि से देश के लिए खतरा उत्पन्न करे, कुछ इस तरह से अपना तंत्र फैलाए कि जगह-जगह हिंसा होने लगे और जान-माल को हानि पहुँचे। इसलिए NRC का लागू होना देश के लिए, खासकर पूर्वोत्तर भारत के लिए बेहद जरूरी है। क्योंकि पूर्वोत्तर भारत सुरक्षा और सामरिक दृष्टि से भारत का महत्त्वपूर्ण भाग है।

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सनातन धर्म को नष्ट करने में लगे हैं वामपंथी: नेपाल के पूर्व डिप्टी पीएम की हिन्दुओं से एकजुट होने की अपील

नेपाल के पूर्व उप-प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय जनता पार्टी के नेता कमल थापा ने शुक्रवार (20 दिसंबर) को ‘सनातन धर्म को वामपंथियों द्वारा नष्ट करने की कोशिश’ के ख़िलाफ़ दुनिया के सभी हिन्दुओं से एकजुट होने का आह्वान किया है।

इस सन्दर्भ पर प्रतिक्रिया स्वरुप वैदिक स्कॉलर डॉ डेविड फ्रॉले, जो पंडित वामदेव शास्त्री के नाम से भी जाने जाते हैं, उन्होंने कहा कि भारत की तरह, वामपंथी दल, मीडिया और नेपाली कॉन्ग्रेस भी सदियों पुराने सनातन धर्म को नष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं।

फ्रॉले ने अपने ट्वीट में कहा कि सदियों से राजनीतिक और धार्मिक आधार पर हिन्दुओं को परेशान किया जा रहा है। भारत के वामपंथी मीडिया, शिक्षाविद और कॉन्ग्रेस से लेकर कम्युनिस्ट राजनीतिक दल हिन्दुओं के मार्ग पर अवरोध पैदा करने का काम कर रहे हैं। हिन्दुओं को अपनी प्रेरणाओं के बारे में किसी भी तरह का कोई भ्रम नहीं होना चाहिए और उन्हें दृढ़ रहना चाहिए।

डॉ फ्रॉले के ट्वीट का जवाब देते हुए नेपाल के पूर्व डिप्टी पीएम ने कहा, “यह नेपाल के सन्दर्भ में भी सच है। नेपाल के लेफ़्ट और नेपाली कॉन्ग्रेस के साथ-साथ कुछ मुख्यधारा की मीडिया, शिक्षाविद सदियों पुराने सनातन धर्म, संस्कृति, नेपाली मर्यादा, परम्परा और पहचान को नष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं।”

ख़बर के अनुसार, थापा ने दुनिया के हिन्दुओं को वामपंथ के ख़िलाफ़ खड़े होने और सनातन धर्म के गौरव की रक्षा करने का आह्वान किया है। थापा ने कहा, “आइए दुनिया के सभी हिन्दू सनातन धर्म की महिमा को संरक्षित करने के लिए एकजुट हों।”

पाकिस्‍तान से जुड़े जासूसी रैकेट का पर्दाफाश: हवाला ऑपरेटर समेत 7 नौसेना कर्मी गिरफ्तार

आंध्र प्रदेश पुलिस ने शुक्रवार (दिसंबर 19, 2019) को पाकिस्तान से जुड़े एक जासूसी रैकेट का पर्दाफाश करने का दावा करते हुए नौसेना कर्मियों और हवाला ऑपरेटर समेत 7 लोगों को गिरफ्तार किया है। आंध्र प्रदेश पुलिस ने मामला दर्ज कर पूरे रैकेट की जाँच शुरू कर दी है। गिरफ्तार किए गए सभी नौसैनिकों से पूछताछ की जा रही है।

आंध्र प्रदेश की खुफिया एजेंसी, केंद्रीय खुफिया एजेंसी और नौसेना की खुफिया एजेंसी ने संयुक्त अभियान चलाकर इस रैकेट का भंडाफोड़ किया। बताया जा रहा है कि इस रैकेट के तार पाकिस्तान से जुड़े हुए हैं। पुलिस की ओर से जारी विज्ञप्ति में कहा गया है पुलिस की खुफिया शाखा ने केन्द्रीय खुफिया एजेंसियों और नौसेना के खुफिया विभाग के साथ मिलकर ‘ऑपरेशन डॉल्फिन्स नोज’ चलाया और इस जासूसी रैकिट का पर्दाफाश किया। पुलिस ने कहा, “प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है। नौसेना के 7 कर्मचारियों और एक हवाला ऑपरेटर को देश के विभिन्न हिस्सों से गिरफ्तार किया गया है।”

पुलिस ने बताया कि कुछ अन्य संदिग्धों से भी पूछताछ की जा रही है। पुलिस ने कहा कि पूरे मामले की जाँच जारी है। पुलिस ने बताया कि गिरफ्तार किए गए लोगों को विजयवाड़ा के NIA कोर्ट के समक्ष पेश किया गया। जिसके बाद उन्हें 3 जनवरी तक के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।  

बेंगलुरु के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) गौतम सवांग ने बताया, “वे सभी देश के विभिन्न हिस्सों से आते हैं, लेकिन फिलहाल विशाखापत्तनम में हैं। हम इस बारे में और कोई जानकारी शेयर नहीं कर सकते। जाँच चल रही है।” पुलिस को शक है कि इन अधिकारियों ने पाकिस्तान में आतंकी समूहों को सूचनाएँ लीक की थीं। 

पुलिस के मुताबिक, गिरफ्तार नौसैनिकों ने भारतीय पनडुब्बियों और जहाजों की जानकारी पाकिस्तानी हैंडलर को दी थी। पुलिस ने तीन नेवी सेलर्स को विशाखापटनम से, दो को कारवार नेवल बेस और दो को मुंबई नेवल बेस से गिरफ्तार किया। खुफिया विभाग पिछले कई दिनों से इनकी गतिविधियों पर नजर रख रहे थे।

एक अधिकारी ने बताया कि सभी सातों आरोपित 2017 में नौसेना में शामिल हुए थे। सितंबर 2018 में से सोशल नेटवर्किंग साइट की मदद से तीन से चार महिलाओं के संपर्क में आए। इन महिलाओं ने बाद में उनका परिचय पाकिस्तानी हैंडलर से व्यापारी के तौर पर करवाया, जिसने उनसे नौसेना की गोपनीय सूचना लेनी शुरू कर दी। गिरफ्तार नौसैनिक जहाजों और पनडुब्बियों से लौटने के बाद इनके लोकेशन की जानकारी दिया करते थे। इन्होंने पिछले साल सितंबर-अक्टूबर के बीच नौसेना से जुड़ी कई संवेदनशील जानकारियों हैंडलर को दी। इन्हें इसके बदले एक हवाला ऑपरेटर की मदद से हर महीने पैसे भी दिए गए।

‘मुस्लिमों हमें आज कर्बला का किरदार निभाना होगा… नहीं तो मिट जाएगा 25 करोड़ मुस्लिमों का नाम’

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के नाम पर मोदी सरकार और उनकी नीतियों को घेरने वाले अब देश में हिंसा भड़काने पर खुलेआम उतर आए हैं। पहले इस कड़ी में केवल फोन, मेल, मैसेज के जरिए समुदाय विशेष के लोगों को समझाया जा रहा था कि ये सरकार उन्हें देश से निकालना चाहती है, उनके ख़िलाफ़ फैसले ले रही है, उनसे उनके अधिकार छीनना चाहती है आदि आदि। लेकिन अब ये कार्य खुलेआम पर्चे बाँटकर किया जाने लगा है। जिसमें कट्टरपंथियों द्वारा न केवल मुस्लिम समुदाय को सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ भड़काने के लिए गलत सूचना छापी जा रही हैं, बल्कि देश में हिंसा करने के लिए कर्बला का किरदार निभाने की भी बात स्पष्ट तौर पर लिखी दिखाई दे रही है।

इस समय ये पर्चा सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। जिसमें आज जुमे की नमाज के बाद चक्का जाम करने की गुजारिश समुदाय विशेष के लोगों से की गई है। साथ ही एनआरसी और सीएए के ख़िलाफ़ लोगों को भड़काने के लिए जमकर झूठ परोसा गया है।

इस पर्चे में शांत बैठे लोगों को घरों से बाहर आकर हड़कंप मचाने के लिए बताया गया कि एनआरसी लागू होने पर देश के हर नागरिक को पहले साबित करना पड़ेगा कि उनके दादा-परदादा भी भारतीय थे। जब लोग ऐसा करने में असफल हो जाएँगे तो उनसे नागरिकता छीन ली जाएगी। फिर बाकी सभी धर्मों के लोगों को सीएए के तहत नागरिकता मिलेगी और मुस्लिमों को घुसपैठिया करार दे दिया जाएगा और सभी मुस्लिमों को डिटेंशन कैंप में डाल दिए जाएँगे।

इसके अलावा इस पर्चे में खुलेआम ये तक दावा किया गया है कि भारत सरकार और आरएसएस चाहती है कि भारतीय मुस्लिमों को रोहिंग्याओं की तरह स्टेटलेस बना दिया जाए। जिसके कारण ही वे ऐसी नीतियाँ लाए हैं। अगर एक बार 30 करोड़ में से 25 करोड़ मुस्लिम नागरिकता साबित करने में फेल हो गए। तो उनसे मतदान करने का अधिकार ले लिया जाएगा। उनके लिए संपत्ति को खऱीदना-बेचना संभव नहीं हो पाएगा, सरकारी सुविधाएँ उन्हें नहीं मिलेंगी। जो कुछ उनपर होगा, उसे जब्त कर लिया जाएगा। सरकारी नौकरी वालों को उनकी नौकरी से बर्खास्त कर दिया जाएगा आदि आदि।

जाहिर है, ये सब पढ़कर कोई भी नागरिक अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतर आएगा और इंसानियत के नाते दूसरे समुदाय के लोग भी उनका समर्थन करने से नहीं चूँकेगे। देखते ही देखते बड़ा तबका सरकार के विरोध में हो जाएगा। जिन्हें सीएए से कोई लेना-देना भी नहीं होगा, वह भी मानवता की लड़ाई समझकर इसका विरोध करेंगे। लेकिन ये कोई नहीं समझेगा कि आखिर ऐसी जानकारी परोसने वाला कौन है और पर्चे में प्रकाशित जानकारी का मूल उद्देश्य क्या है? क्या इस पर्चे में लिखे अनुसार सड़कों पर उतरना और तथाकथित मजहबी ठेकेदारों की बातों में आना सरकार का या उनकी नीतियों का विरोध करना ही कहलाएगा या फिर भीड़ को इकट्ठा करके चक्का जाम के नाम पर सीलमपुर जैसी किसी घटना को अंजाम दिया जाएगा?

खुद पढ़िए, वायरल हुए इस पर्चे के अंत मुस्लिमों को उकसाने के लिए उन्हें करबला का किरदार निभाने तक के लिए कहा जा रहा है। साथ ही मोदी सरकार को दुश्मन बताकर इंगित किया जा रहा। जिसमें लिखा गया है, “दुश्मन हमें हमारे मुल्क से निकालना चाहता है। इस मुल्क को आजाद कराने के लिए हमारे बाप-दादा ने अपनी जानों की क़ुरबानी दी है। अब हमें दोबारा कुर्बानी देनी होगी।”

सैफ, सरवर आजम, सैफुर्रहमान और सलमान को फाँसी की सजा: जयपुर बम ब्लास्ट के थे ये दोषी

जयपुर में साल 2008 में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के चारों दोषियों को स्पेशल कोर्ट ने फाँसी की सजा सुनाई है। इन बम धमाकों में 71 लोगों की जान चली गई थी, वहीं 185 लोग घायल हो गए थे। गुरुवार (दिसंबर 19, 2019) को विशेष अदालत ने दोषियों की सजा को लेकर बहस सुनी थी। 13 मई, 2008 को पिंकसिटी को सीरियल बम ब्लास्ट से दहलाने वाले गुनाहगारों को विशेष कोर्ट के जज अजय कुमार शर्मा प्रथम ने शुक्रवार (दिसंबर 20, 2019) को फाँसी की सजा सुनाई।

बता दें कि स्पेशल कोर्ट ने बुधवार को मोहम्मद सैफ, मोहम्मद सरवर आजम, सैफुर्रहमान और मोहम्मद सलमान को दोषी करार दिया था। इस ब्लास्ट के 2 अन्य आरोपित दिल्ली के बटला हाउस में 2008 में हुए एनकाउंटर में मार गिराए गए थे। एक आरोपित शाहबाज हुसैन को अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया है। धमाकों के सि​लसिले में जयपुर पुलिस ने पॉंच आरोपितो को गिरफ्तार किया था। तीन आरोपित दिल्ली के तिहाड़ जेल में बंद हैं। ये तीनों देश के दूसरे हिस्सों में भी धमाकों के आरोपित हैं। लिहाजा इनके खिलाफ एटीएस जॉंच नहीं कर पाई है।

उल्लेखनीय है कि मामले में कुल 13 लोगों को पुलिस ने आरोपित बनाया था। इनमें से 3 अब भी फरार हैं। इस मामले की सुनवाई में बीते एक साल से तेजी आई थी। सुनवाई के दौरान 1,296 गवाहों के बयान दर्ज किए गए। जानकारी के मुताबिक दोषियों ने शहर में बम धमाके करने के लिए जिन जगहों व दुकानदारों से साइकिलें खरीदी थीं, उन दुकानदारों ने उनकी पहचान की थी। 13 मई 2008 की शाम परकोटा इलाके में 12 से 15 मिनट के अंतराल में चांदपोल गेट, बड़ी चौपड़, छोटी चौपड़, त्रिपोलिया बाजार, जौहरी बाजार और सांगानेरी गेट पर बम धमाके हुए थे। पहला ब्लास्ट खंदा माणकचौक, हवा महल के सामने शाम 7:20 बजे हुआ था। फिर एक के बाद एक 8 धमाके हुए थे।

इन धमाकों के बाद काफी देर तक जयपुर शहर की मोबाइल और टेलीफोन लाइनें जाम हो गईं थीं। जिससे दूसरे शहरों में मौजूद लोग अपने परिजनों और रिश्तेदारों की खैरियत जानने के लिए परेशान होते रहे थे। बताया जाता है कि हनुमान मंदिर के निकट बम निरोधक दस्ते ने एक बम को निष्क्रिय कर दिया था। लेकिन, जो धमाके हुए थे, वो इतने शक्तिशाली थे कि कुछ लोगों के जिस्म तो कुछ फुट ऊपर तक उड़ गए थे। हमले की साजिश काफी सावधानी से रची गई थी। राजस्थान के तत्कालीन पुलिस महानिदेशक ए.एस. गिल ने कहा था कि यह आतंकवादी हमला था।

पैगंबर मो. पर सवाल पूछने वाले प्रोफेसर का नजीब ने काटा था हाथ, NIA ने दोबारा किया गिरफ्तार