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दंगाइयों की संपत्ति बेच कर होगी नुकसान की भरपाई: उपद्रवियों पर सख्त हुए CM योगी

उत्तर प्रदेश में क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस सख्त हो उठी है। वहीं सार्वजनिक संपत्ति को नुक़सान पहुँचाने वालों को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कड़ा सन्देश दिया है। नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के ख़िलाफ़ गुरुवार (दिसंबर 19, 2019) को विरोध प्रदर्शन करते हुए उपद्रवियों ने पुलिस के वाहनों को क्षतिग्रस्त कर दिया, मीडियाकर्मियों के OB वैन को फूँक दिया और राज्य परिवहन की बसों को भी जला डाला। मुख्यमंत्री योगी ने कहा है कि सार्वजानिक संपत्ति को नुक़सान पहुँचाने वालों की संपत्ति बेच कर इसकी भरपाई की जाएगी। उपद्रवियों की संपत्ति को नीलाम करके जो पैसे आएँगे, उससे उनके द्वारा सार्वजनिक संपत्ति को पहुँचाई गई क्षति की भरपाई होगी।

सीएम योगी ने मुख्य सचिव, गृह सचिव और डीजीपी से मुलाक़ात कर दंगाइयों से सख्ती से निपटने के आदेश दिए। बताया जाता है कि मुख्यमंत्री ख़ुद स्थिति पर पैनी नज़र रख रहे हैं। उन्होंने पुलिस से कहा है कि उपद्रवियों को चिह्नित कर उनपर कड़ी कार्रवाई करें। सीएम योगी ने कहा कि उनकी सरकार उपद्रवियों की संपत्ति नीलाम कर वसूली करेगी। अफवाह फैलाने वालों पर भी निगरानी रखने के आदेश जारी किए गए हैं। सीएम योगी ने जनता को सन्देश जारी करते हुए कहा:

लखनऊ और संभल में बवाल किया गया। संभल में भी कई गाड़ियाँ जलाई गईं। नागरिकता कानून किसी के खिलाफ नहीं है। विपक्ष भ्रम के हालात पैदा कर रहा है। उपद्रवियों से सख्ती से निपटा जाए। प्रदर्शन के नाम पर हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी। लखनऊ में दर्जन भर वाहनों में आग लगाई गई। उपद्रवियों की संपत्ति कुर्क कर भरपाई की जाएगी। हिंसा में लिप्त लोगों की संपत्ति जब्त की जाएगी। लोकतंत्र में हिंसा के लिए जगह नहीं है।

लखनऊ प्रशासन ने कहा है कि अब स्थिति नियंत्रण में है। सीसीटीवी फुटेज के आधार पर एक-एक उपद्रवी की पहचान की जा रही है। जो अब तक बच निकले हैं, ऐसे दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के लिए पुलिस कमर कस रही है। लखनऊ के कमिश्नर ने बताया कि सिर्फ़ सार्वजनिक संपत्ति को नुक़सान पहुँचाने वालों की ही नहीं, बल्कि इसके लिए भड़काने वालों की भी संपत्ति नीलाम की जाएगी। जिन्होंने विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया और जिनके चलते सरकार को क्षति हुई, उनपर भी शिंकजा कसा जाएगा।

राजधानी लखनऊ में प्रदर्शनकारियों ने 20 मोटरसाइकिलों, 10 कारों, 3 बसों और मीडिया की 4 ओबी वैन को आग के हवाले कर दिया। कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को आँसू गैस के गोलों का प्रयोग करना पड़ा। यूपी पुलिस ने उपद्रवियों को खदेड़ने के लिए लाठीचार्ज भी किया। लखनऊ में शुक्रवार को होने वाली सभी परीक्षाओं को रद्द कर दिया गया है। वाराणसी में पहले ही स्कूलों व कॉलेजों को बंद करा लिया गया था।

क्या मुस्लिमों के ख़िलाफ़ है NRC? प्रपंचियों के फैलाए अफवाहों से बचने के लिए जानें सच्चाई

NRC को लेकर कई तरह के कनफ्यूजन हैं मसलन, क्या समुदाय विशेष के प्रति जानबूझकर यह षड्यंत्र रचा जा रहा है? क्या पहले NRC फिर CAB लाकर बीजेपी की सरकार भारत से कथित अल्पसंख्यकों को निकाल देना चाहती है? क्या यहाँ रह रहे सारे मुस्लिमों से उनकी नागरिकता का प्रमाण माँगा जायेगा? क्या पहली बार ऐसा हो रहा है? तो ये लेख NRC से जुड़े ऐसे ही सवालों के बारे में है।

NRC अर्थात National Register of Citizens जिसका हिंदी मतलब होता है- राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर, ऐसा रजिस्टर जिसमें राष्ट्र के वैध नागरिकों का ब्यौरा दर्ज होता। अब प्रश्न ये है कि इसकी ज़रूरत क्यों है? आज के समय में विश्व के अधिकांश देश लोक कल्याणकारी देश हैं, जो अपने नागरिकों को कुछ मूलभूत सुविधाएँ देते हैं जिससे उनका जीवन स्तर को बेहतर होता है, उन्हें मानवोचित अधिकार मिलता है, संसाधनों का बँटवारा न्यायोचित ढंग से होता है। अत: एक राष्ट्र के पास उसके नागरिकों का ब्यौरा होना जरूरी है।

इसे यूँ समझिए कि आप एक पार्टी दे रहे हैं, जिसमें आपने 50 लोगों को न्योता दिया है लेकिन खाने के टाइम आस-पास के 50 लोग और आ जाएँ, जो बाखुशी अपने भोजन का इंतजाम कर सकते है तो आप क्या करेंगे? आप या तो अपने पास मौजूद 50 लोगों के राशन में से उन्हें खाना देंगे या आप अपनी लिस्ट से उपस्थित लोगों को मिलाएँगे और नाम मैच न करने पर उनलोगों को सादर विदा करेंगे। बस एक राष्ट्र की भी यही समस्या होती है और इसी समस्या के समाधान के लिए भारत में भी NRC तैयार हो रही है।

यह पहली बार नहीं है कि भारत के किसी राज्य में NRC तैयार हुआ है। दरअसल इससे पहले भी असम में 1951 में NRC तैयार किया जा चुका है जो स्वतंत्रता के बाद पहली बार जनगणना पर आधारित था। उसके बाद वर्ष 1971 में पश्चिमी पाकिस्तान एवं पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) के बीच युद्ध होने के कारण हजारों की संख्या में शरणार्थी भारत आने लगे जिस कारण भारत को भी युद्ध में भाग लेना पड़ा और बांग्लादेश का निर्माण हुआ। बांग्लादेश के स्वतंत्र होने के बाद कुछ शरणार्थी तो वापस गए लेकिन कुछ शरणार्थी यहीं रह गए और तब फिर से एक बार NRC को अपडेट करने की ज़रूरत महसूस हुई। लेकिन, ये काम सरकार को उसी वक्त करना चाहिए था जो तब की इंदिरा गाँधी और उनके बाद राजीव गाँधी की सरकार ने नहीं किया।

परेशानी तब और अधिक बढ़ने लगी जब नवनिर्मित बांग्लादेश से शरणार्थियों के रूप में अवैध प्रवासियों की संख्या में वृद्धि आने लगी जिसे लेकर ‘ऑल असम स्टूडेंट यूनियन’ और ‘ऑल असम गण संग्राम परिषद्’ के नेतृत्व में असमिया संस्कृति और पहचान की रक्षा के लिए जनांदोलन शुरू हुआ जिसे ‘असम आंदोलन’ के नाम से जाना गया। लगभग छह वर्ष तक चले इस आंदोलन की परिणिति ‘असम समझोते’ के रूप में सामने आया जो 15 अगस्त,1985 को राजीव गाँधी और असम के नेताओं के बीच हुआ।

इस समझौते में दो जो सबसे जरूरी बात थी, पहली कि 25 मार्च, 1971 को या इसके बाद असम में प्रवेश लेने वाले सभी विदेशियों की पहचान कर उन्हें देश से बहार किया जाएगा और दूसरी यह कि असम की संस्कृति और पहचान को बरकरार रखने के लिए सरकार द्वारा प्रयास किया जायेगा। और आज इस समझौते के 34 साल के बाद इसके प्रमुख शर्त को पूरा करने के लिए NRC को अपडेट किया गया है। अगर इस समझौते की शर्त उस वक़्त पूरी कर दी जाती तो न तो उसमे इतनी परेशानी आती न ही इतना कनफ्यूजन। इस चीज तब क्यों नहीं हो पाई इसका जवाब तब सत्ता में रही पार्टी ही दे सकती है कि वो कौन से कारण रहे जो काम उस वक़्त होना चाहिए था वो अब हो रहा है? आखिर कौन सा लालच था? क्या मंशा थी?

अब अगले सवाल पर आइए कि क्या किसी ख़ास समुदाय के खिलाफ यह षडयंत्र रचा जा रहा है? क्या पहले NRC बीजेपी की सरकार मजहब विशेष को निकाल देना चाहती है? क्या यहाँ रह रहे सारे मुस्लिमों से उनकी नागरिकता का प्रमाण माँगा जाएगा?

तो इसका जवाब है कि NRC का किसी भी जाति-धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है, ना ही इसका संबंध भारत के अन्य भागों में रह रहे मुस्लिमों से है। इनफेक्ट इसका संबंध असम के वैध नागरिक मुस्लिमों से भी नहीं है।

इसे तो 2014 में ‘असम सम्मलित महासंघ एवं अन्य बनाम भारत सरकार एवं अन्य’ मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय के बाद राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को अपडेट करने की प्रक्रिया शुरू हुई। पिछले साल जुलाई में NRC का अंतिम अपडेटेड ड्राफ्ट आया जिसमें 40 लाख लोगों के नाम नहीं पाए गए थे और उन्हें बाद में असम में उनका स्थायी निवास सिद्ध करने के लिए समय दिया गया। नागरिकता सिद्ध करने की प्रक्रिया में इस रजिस्टर में वे सभी लोग (या उनके वंशज) शामिल किये गये हैं जिनके नाम 1951 में जारी किये गए असम NRC या 24 मार्च, 1971 की मध्य रात्रि तक जारी किये गए किसी भी अन्य स्वीकार्य दस्तावेज में शामिल थे।

इन सारे नामों के आँकड़ों को ‘लिगेसी डाटा’ कहा जाता है। सारी प्रक्रिया पूरी करने के बाद 31, दिसम्बर 2019 को NRC की अंतिम सूची जारी की गई जिसमें सूची से बाहर रहे लोगों की संख्या 40 लाख से घटकर 19,06,657 हो गयी। अब चूँकि “नागरिकता“ संघ सूचि का विषय है इसलिए NRC के लिए फंडिंग और गाइडलाइंस केंद्र सरकार देती है लेकिन काम राज्य सरकार द्वारा किया जाता है और पूर्वोत्तर में इसे सबसे पहले लागू करने की एक सबसे बड़ी वजह ये है कि सबसे ज्यादा अवैध प्रवासी बांग्लादेश से पूर्वोत्तर के रास्ते ही भारत में घुसते हैं।

ध्यान देने वाली बात यह कि NRC का अपडेशन नागरिक अधिनियम,1995, 2003 और इसमें 2009, 2010 में हुए संशोधन के अनुसार पूरी तरह से कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए किया गया है। अब मुझे ये बताया जाए कि इसमें कहाँ मुस्लिमों के लिए दिक्कत आ रही है? कहाँ उन्हें टारगेट किया का रहा है? कहाँ उनके प्रति कोई दुर्भावना है? ये तो सिर्फ अवैध प्रवासियों को देश से बाहर करने कि प्रक्रिया है ताकि देश के वैध नागरिक को देश के संसाधन पर उचित अधिकार मिल सके।

अगले सवाल पर आते हैं कि NRC से बाहर हुए लोगों का क्या होगा? भारत का रिकॉर्ड आज तक बेहतरीन रहा है। ना तो भारत ने कभी किसी पर पहले हमला किया, ना ही भारत ने कभी अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न किया, जिससे यहाँ के अल्पसंख्यकों को किसी और देश में शरण लेने की जरूरत हो और आज भी भारत ऐसा कुछ नहीं करने जा रहा है। हालाँकि, ये 19 लाख लोग दिए गए समय में सबूत नहीं दे पाए कि वो असम के नागरिक हैं फिर भी उन्हें और समय दिया जा रहा है। उनके सामने और भी रास्ते खुले हुए हैं, जैसे- NRC से बाहर हुए लोग पहले विदेशी अधिकरण के सामने अपील करेंगे, बताते चले कि इसके लिए आलरेडी 300 अधिकरण काम कर रहे हैं और जरूरत के अनुसार लगभग 400 अधिकरण के गठन पर बात चल रही है।

वहाँ भी ये लोग अगर अपनी नागरिकता साबित नहीं कर सके तो फिर इन लोगों के लिए पहले हाईकोर्ट फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खुला हुआ है। जब सारी कानूनी प्रक्रिया से गुज़रने के बाद भी इन 19 लाख लोगों में से जो अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाएँगे, उन्हें भारत अपने यहां क्यों रखे? ये सबसे बड़ा सवाल है। क्यों भारत अपने नागरिकों का हक मारकर किसी और देश के नागरिकों को परोस दे? भारत ना तो इतना विकसित हुआ है कि इतने लोगों को बेवजह पालता रहे ना ही भारत नागरिकों का हक मारना उचित है।

ये बता दें कि 19,06,657 लोगों में लगभग 14 लाख लोग हिन्दू धर्म से हैं और करीब 5 लाख लोग मुस्लिम धर्म के, जो कि बांग्लादेश के बहुसंख्यकों का धर्म है। अब बताइए कि इसमें कहाँ क्या गलत हो गया भारत के मुस्लिमों के साथ? छद्म बुद्धिजीवी, धूर्त वामपंथी, कट्टरपंथी, और हिन्दू-मुस्लिम की राजनीति से घर चलाने वाले लोगों ने ये चरस बोया कि “ओ जी ये तो मुस्लिम विरोधी है, संविधान की हत्या है, धार्मिक आधार पर पर है NRC के साथ CAB लाकर ये मुस्लिमों को निकाल देंगे देश से, बीजेपी तो हिन्दुओं कि पार्टी है, ये देश तोड़ रहे हैं ब्ला ब्ला ब्ला…”।

तो अब आते हैं CAB यानी नागरिकता संशोधन विधेयक पर। सबसे पहले NRC और CAB का आपस में कोई संबंध है ही नहीं। NRC पहले से चलता आ रहा है जिसका जिक्र ऊपर किया जा चुका है और इसमें नागरिकता संशोधन विधेयक का जिक्र तक कहीं नहीं है।

मुझे वाकई नहीं समझ आ रहा कि NRC का विरोध क्यों किया का रहा है? मुझे ये दिख रहा है कि जिस काम को असम समझौते के तहत 1985 के बाद जितनी जल्दी संभव हो इतनी जल्दी होना चाहिए था उस काम को होने में 34 वर्ष लग गए। मुझे ये दिख रहा है कि त्रिपुरा में बांग्लादेशी घुसपैठिए इतनी संख्या में आए कि वहाँ के मूल आदिवासी वहाँ अल्पसंख्यक हो गए और बांग्लादेशी घुसपैठिए उनके हिस्से के संसाधन, उनके हिस्से की सरकार पर कुंडली मारे बैठे हैं।

ये दिख रहा है कि कुछ लोग कैसे अपनी राजनीति की रोटी सेंकने के लिए इस मुद्दे को जबरदस्ती हवा में उछाल रहे हैं और लोगों को भड़काने कि कोशिश में लगे हुए हैं। हर जगह हिंसा को उकसा रहे हैं और सक्रिय रूप से हिंसा में शामिल भी हो रहे हैं। क्या हिंसा का सहारा लेकर, तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश करना संवैधानिक है? क्या संविधान और नियमों के अनुसार करीब चार दशक पुरानी समस्याओं को ठीक करना असंवैधानिक है? इसका फैसला इस लेख को पढ़ने वाले करें।

नोट- यह लेख नेहा चौधरी ने लिखा है।

जामिया हिंसा: दिल्ली हाईकोर्ट ने दंगाइयों को किसी भी तरह की अंतरिम राहत देने से किया इनकार

रविवार (15 दिसंबर) को जामिया मिलिया इस्लामिया में हिंसा की जाँच के लिए एक न्यायिक आयोग के गठन का अनुरोध करने वाली याचिकाओं की सुनवाई करते हुए, दिल्ली हाईकोर्ट की पीठ ने मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायमूर्ति सी हरिशंकर की खंडपीठ ने आज छात्र दंगाइयों को किसी भी तरह से अंतरिम संरक्षण प्रदान करने से इनकार कर दिया।

अदालत ने केंद्र, दिल्ली सरकार और पुलिस को एक नोटिस भी जारी किया, जिसमें जामिया मिलिया इस्लामिया की घटना पर जवाब दाखिल करने को कहा गया। अदालत इस मामले की सुनवाई आगामी 4 फरवरी को करेगी। इतनी लंबी तारीख़ मिलने पर याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से इसे और जल्दी देने की माँग की तो कोर्ट ने इससे इनकार कर दिया।

इससे पहले, दिल्ली हाईकोर्ट ने जामिया दंगाइयों को संरक्षण देने संबंधी याचिका ठुकरा दी थी। कोर्ट रूम में उस समय एक अजीब सा माहौल बन गया जब याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों ने जजों के समक्ष शेम-शेम के नारे लगाए।

इस बीच, दिल्ली हाईकोर्ट की सिंगल जज की बेंच ने जामिया छात्रों को हिरासत में लेने को चुनौती देने वाली याचिका को चीफ जस्टिस डीएन पटेल की बेंच में ट्रांसफर कर दिया है। ऐसे में इस याचिका पर भी अन्य पिटीशन के साथ डिवीजन बेंच में सुनवाई की जाएगी।

हाईकोर्ट के फ़ैसले से असंतुष्ट, वकीलों की लॉबी ने कथित तौर पर न्यायाधीशों पर ‘Shame on you’ के नारे लगाना शुरू कर दिया। 

पिछले कुछ दिनों से CAA के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन में घायल छात्रों के लिए चिकित्सा उपचार और मुआवज़े की माँग वाली छ: याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अदालत का फ़ैसला आया है।

इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि इस मुद्दे पर सभी याचिकाएँ संबंधित उच्च न्यायालयों के पास ले जाई जाएँ। जहाँ इस बात पर ग़ौर किया जा सके कि क्या इस मुद्दे की जाँच के लिए एक स्वतंत्र जाँच समिति का गठन किया जा सकता है!

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में रविवार को दिल्ली के जामिया इलाके में जमकर हिंसा हुई। रविवार (दिसंबर 15, 2019) शाम प्रदर्शनकारियों ने कई बसें और बाइक फूँक दी। उपद्रवियों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा और आँसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। इसके बाद पुलिसकर्मियों ने अराजक तत्वों के जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में घुसे होने के संदेह पर कैंपस से सभी छात्रों को बाहर निकाल दिया।

पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़प में कई पुलिसकर्मी घायल हो गए। प्रदर्शनकारियों ने बसों और वाहनों में आग लगा दी। जामिया में इस हिंसा के खिलाफ जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों के अलावा जेएनयू और दूसरे संगठनों के लोगों ने भी पुलिस मुख्यालय पर देर रात प्रदर्शन किया। देर रात पुलिस द्वारा 50 छात्रों को रिहा करने के बाद सोमवार (दिसंबर 16, 2019) सुबह 4 बजे प्रदर्शन खत्म हुआ। जामिया कैंपस में 5 जनवरी तक छुट्टी घोषित कर दी गई है।

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‘अनपढ़ मोदी और टकले शाह, CAA वापस लो नहीं तो जिहाद के लिए तैयार रहो: मौलाना ने उगला ज़हर

एमके इस्लामिक चैनल नाम के एक इस्लामवादी यूट्यूब चैनल ने हाल ही में एक मौलाना जरजिस अंसारी हाफिजुल्लाह का एक भड़काऊ भाषण अपलोड किया है। इस भड़़काऊ भाषण में मौलाना को कई जगह भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के ख़िलाफ़ अपमानजनक टिप्पणी करते और धमकी देते देखा और सुना जा सकता है। मौलाना ने नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (NRC) बिल को झूठा करार देते हुए इसे मुस्लिम-विरोधी ठहराया।

इस वीडियो को 18 दिसंबर 2019 को अपलोड किया गया था। इसे अब तक 4 लाख से अधिक बार देखा जा चुका है। एमके इस्लामिक यूट्यूब चैनल से पता चलता है कि इसे इस साल अक्टूबर में बनाया गया। इस यूट्यूब चैनल पर इसी मौलाना द्वारा बनाए गए अब तक 13 वीडियो को शेयर किया जा चुका है जिसे 27 लाख से अधिक बार देखा जा चुका है।

मौलाना अपने नफ़रत भरे भाषण में यह कहता है कि अगर मोदी या शाह उन्हें देश से बाहर फेंकने की कोशिश कर रहे हैं तो वह भारत के कोने-कोने में ‘जिहाद’ करेंगे। इस वीडियो में मौलाना को यह कहते हुए सुना जाता है कि “इनके बाप के बाप के बाप की भी ताक़त नहीं हैं कि हमें बाहर निकाल दें। हमें निकाल के तो दिखा मोदी, हम भी जिहाद करने से पीछे नहीं हटेंगे।”

हालाँकि, सरकार ने बार-बार स्पष्ट किया है कि CAA को लेकर भारतीय मुस्लिमों को बिल्कुल भी चिंता करने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन, मौलाना ने अपने श्रोताओं के बीच यह कहकर झूठ फैलाया कि सरकार देश से सभी अल्पसंख्यकों को बाहर निकालना चाहती है।

मौलाना ने पीएम मोदी को ‘अनपढ़’ और ‘नपुंसक’ कहा और गृह मंत्री को “मोटे” और “टकले” कहा। इसके अलावा, मौलाना ने गृह मंत्री को यह कहते हुए धमकी दी कि तुम आग से खेल रहे हो, तो हमें कमतर न आँके। इसके अलावा, दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल की भी तारीफ़ करते हुए मौलाना ने कहा कि यह केजरीवाल ही थे जिन्होंने उन्हें पीएम मोदी की शैक्षणिक योग्यता दिखाई थी।

इसके अलावा, अपने नफ़रत भरे भाषण में लगभग 3 मिनट 30 सेकेंड पर, मौलाना ने सरकार को CAA और NRC को वापस लेने या जिहाद के लिए तैयार रहने की धमकी दी। मौलाना ने कहा कि अगर यह क़ानून पर तुम अटल रहे तो इतना याद रखना की मरने और मारने से कोई नहीं चूकेगा।

मोदी सरकार द्वारा नागरिकता अधिनियम लाए जाने के बाद से देशभर में इसके विरोध में हिंसक विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। जबकि देश भर में कई पाकिस्तानी हिन्दू प्रवासियों ने ऐतिहासिक नागरिकता संशोधन अधिनियम को पारित करने का जश्न मनाया और इसकी सराहना की है। इससे उनकी खोई हुई आशा वापस आ गई है, लेकिन दूसरी तरफ़ मुस्लिम भीड़ हिंसा पर उतारू है और सार्वजनिक सम्पत्ति को नष्ट करने के साथ-साथ देशभर में अराजकता फैलाने में जुटी हुई है।

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वीडियो: CAA विरोध के नाम पर उत्पात मचाने निकली थी दंगाई भीड़, यूपी पुलिस ने खदेड़-खदेड़ कर पीटा

उत्तर प्रदेश में सीएए के ख़िलाफ़ उपद्रव करने वालों पर पुलिस ने शिकंजा कसा है। वाराणसी और लखनऊ से लेकर आजमगढ़ तक, जहाँ भी दंगाइयों ने हिंसा का प्रयास किया, यूपी पुलिस ने उन्हें दौड़ा-दौड़ा कर मारा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पहले ही सभी जिलों के प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिया था कि क़ानून का उल्लंघन करने वालों को बख्सा नहीं जाए। नीचे हम वाराणसी के बेनियाबाग का वीडियो संलग्न कर रहे हैं, जिसमें आप देख सकते हैं कि कैसे योगी की पुलिस ने दंगाइयों की बखिया उधेड़ दी।

वाराणसी के बेनियाबाग में उपद्रवियों को पुलिस ने खदेड़-खदेड़ के पीटा

यहाँ तक कि यूपी पुलिस 2-3 दिन पहले हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा के आरोपितों को भी ढूँढ-ढूँढ कर गिरफ़्तार कर रही है। मंगलवार (दिसंबर 17, 2019) को उपद्रव करने वाले 11 लोगों को चिह्नित कर गुरुवार को धर-दबोचा गया। जमीयत-उल-अशरफिया के छात्रों ने उपद्रव किया था, जिसके बाद पुलिस ने ये कार्रवाई की। आज़मगढ़ में पुलिस सोशल मीडिया पर भी पैनी नज़र रख रही है ताकि हिंसा फैलाने की साज़िशों को पहले ही नाकाम किया जा सके

दंगा भड़काने की कोशिश में मुस्लिम बहुल इलाके में वामपंथी

वाराणसी की बात करें तो समाजवादी पार्टी के नेताओं ने विरोध प्रदर्शन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। ‘प्रतिरोध सभा’ में भाग लेने जा रहे आम आदमी पार्टी के नेताओं को भी पुलिस ने हिरासत में लिया। और अपनी सख़्त निगरानी में विरोध के नाम पर दंगा भड़काने के उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया। प्रशासन ने पहले ही स्कूलों व कॉलेजों को बंद करवा दिया था, जिससे बच्चों अथवा छात्रों पर दंगाइयों के विरोध प्रदर्शन का कोई असर ना पड़े। बाजार भी अधिकतर बंद ही रहे।

राजधानी लखनऊ में भी उपद्रवियों ने आगजनी की, जिसके बाद पुलिस ने आँसू गैस के गोले छोड़े और लाठीचार्ज किया। उपद्रवियों ने पुलिस व मीडिया के वाहनों में तोड़फोड़ मचाई, जिसके बाद पुलिस ने उनकी जम कर पिटाई की। प्रदेश कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष अजय लल्लू को भी पुलिस उठा कर ले गई। कई वामपंथी नेताओं की भी गिरफ़्तारी की गई। बलरामपुर में सपा के कई नेताओं को नज़रबंद कर लिया गया। शान्ति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कई पूर्व विधायकों तक को पुलिस ने हिरासत में लिया। संभल में दंगाइयों ने राज्य परिवहन के एक बस में आग लगा दी। झाँसी में तो सपा सांसद चंद्रपाल सिंह को भी पुलिस उठा कर ले गई।

CAA को लेकर 9 बड़े प्रश्न और उनके उत्तर: वामपंथियों के हर प्रपंची सवाल का जवाब जानें यहाँ

प्रश्न 1 – क्या पाकिस्तान में बलूचियों, अहमदिया और म्यांमार में रोहिंग्याओं को इस कानून के अंतर्गत रियायत नहीं दी जानी चाहिए?

नागरिकता अधिनियम-1955 के तहत नागरिकता संशोधन कानून किसी भी देश के किसी भी नागरिक को भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करने से नहीं रोकता है। बलूच, अहमदिया और रोहिंग्या कभी भी भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं बशर्ते वो नागरिकता अधिनियम-1955 से संबंधित वर्गों में प्रदत्त योग्यता को पूरा करें।

प्रश्न 2 – पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान, इन तीन देशों से आने वाले हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई शरणार्थियों को इससे कैसे फायदा होगा?

यदि इन तीन देशों से आए शरणार्थियों के पास पासपोर्ट, वीजा जैसे दस्तावेजों का अभाव है और वहाँ उनका उत्पीड़न हुआ हो तो वह भी भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं। नागरिकता संशोधन कानून ऐसे लोगों को नागरिकता का अधिकार देता है। इसके अलावा ऐसे लोगों को जटिल प्रक्रिया से मुक्ति मिलेगी और जल्द भारत की नागरिकता मिलेगी। इसके लिए भारत में 1 से लेकर 6 साल तक की रिहाइश की जरूरत होगी। हालाँकि, अन्य लोगों के लिए भारतीय नागरिकता हासिल करने के लिए 11 साल भारत में रहना जरूरी है।

प्रश्न 3 – क्या शरणार्थियों की देखभाल के लिए ‘संयुक्त राष्ट्र’ के तहत भारत का दायित्व नहीं है ?

हाँ, यह शरणार्थियों की देखभाल करता है और भारत इस कानून के तहत अन्य शरणार्थियों को दूर नहीं भेज रहा है। भारत सहित प्रत्येक देश के प्राकृतिकीकरण के अपने नियम हैं। भारत में 2 लाख से अधिक श्रीलंकाई तमिल और तिब्बती और 15,000 से अधिक अफगानी, 20-25 हजार रोहिंग्या और विदेशों से सैकड़ों अन्य शरणार्थी वर्तमान में भारत में रह रहे हैं। यह उम्मीद की जाती है कि किसी दिन जब वहाँ की स्थिति में सुधार होगा तो यह शरणार्थी अपने घर वापस लौट जाएँगे। लेकिन, इन 3 देशों के हिंदुओं के मामले में, यह कानून इस वास्तविकता को स्वीकार करता है कि इन 3 देशों में उत्पीड़न का माहौल कभी नहीं सुधरने वाला है।

प्रश्न 4- क्या इन तीन देशों से गैर-कानूनी रूप से भारत आए मुस्लिम अप्रवासियों को नागरिकता संशोधन कानून के अंतर्गत वापस भेजा जाएगा?

नहीं। नागरिकता संशोधन कानून का किसी भी विदेशी को भारत से बाहर भेजने से कोई लेना-देना नहीं है। किसी भी विदेशी नागरिक को देश से बाहर भेजने, चाहे वह किसी भी धर्म या देश का हो, की प्रक्रिया फॉरनर्स ऐक्ट 1946 और /अथवा पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) ऐक्ट 1920 के तहत की जाती है। ये दोनों कानून, सभी विदेशियों- चाहे वे किसी भी देश अथवा धर्म के हों, देश में प्रवेश करने, रिहाइश, भारत में घूमने-फिरने और देश से बाहर जाने की प्रक्रिया को देखते हैं।

इसीलिए, सामान्य निर्वासन प्रक्रिया सिर्फ गैरकानूनी रूप से भारत में रह रहे विदेशियों पर लागू होगी। यह पूरी तरह सोच-समझ कर बनाई गई कानूनी प्रक्रिया है जो स्थानीय पुलिस अथवा प्रशासनिक प्राधिकारियों द्वारा गैरकानूनी रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों की पहचान करने के लिए की गई जाँच के बाद तैयार की गई है। इस बात का ध्यान रखा गया है कि ऐसे गैरकानूनी विदेशी को उसके देश के दूतावास/उच्चायोग ने उचित यात्रा दस्तावेज दिए गए हों ताकि जब उन्हें डिपोर्ट किया जाए तो उनके देश के अधिकारियों द्वारा उन्हें सही प्रकार से रिसीव किया जा सके।

असल में, ऐसे लोगों को देश से बाहर भेजने की प्रक्रिया तभी शुरू होगी जब कोई व्यक्ति को द फॉरनर्स ऐक्ट, 1946 के तहत ‘विदेशी’ साबित हो जाएगा। इसलिए पूरी प्रक्रिया में स्वचालित, मशीनी या भेदभावपूर्ण नहीं है। राज्य सरकारों और उनके जिला प्रशासन के पास फॉरनर्स ऐक्ट के सेक्शन 3 और पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) ऐक्ट 1920 के सेक्शन 5 के तहत केंद्र सरकार द्वारा प्रदुत्त शक्तियाँ होती हैं, जिससे वे गैरकानूनी रूप से रह रहे विदेशी की पहचान कर सकता है, हिरासत में रख सकता है और उसके देश भेज सकता है।

प्रश्न 5- क्या नागरिक संशोधन कानून भारतीयों हिंदू, मुस्लिम, किसी को भी प्रभावित करता है ?

नहीं। इसका किसी भी भारतीय नागरिक के साथ किसी भी तरह से कोई लेना-देना नहीं है। भारतीय नागरिक भारत के संविधान द्वारा उन्हें प्रदत्त मौलिक अधिकारों का आनंद लेते हैं। कोई भी राज्य नागरिक संशोधन कानून को निरस्त नहीं कर सकता है। नागरिक संशोधन कानून से संबंधित गलत सूचना देने वाला अभियान चलाया जा रहा है। यह कानून मुस्लिम नागरिकों सहित किसी भी भारतीय नागरिक को प्रभावित नहीं करता है।

प्रश्न 6 – श्रीलंका के तमिलों का क्या होगा ?

1964 और 1971 में प्रधानमंत्री स्तरीय करार के बाद भारत ने 4 लाख 61 हज़ार तमिल लोगों को भारतीय नागरिकता प्रदान की है। वर्तमान में 95 हज़ार तमिल लोग तमिलनाडु में रह रहे हैं और केंद्र और राज्य से अनुवृत्ति ले रहे हैं। ये लोग अपनी पात्रता पूर्ण होते ही नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं।

प्रश्न 7 – ये तीन देश ही क्यों? और उपरोक्त अधिसूचित संप्रदाय का केवल धार्मिक उत्पीड़न ही क्यों?

नागरिक संशोधन कानून तीन पड़ोसी देशों में धार्मिक आधार पर हुए उत्पीड़न से संबंधित है, जहाँ संविधान एक विशिष्ट राज्य धर्म के लिए प्रदान करता है। इन तीनों देशों में अन्य धर्मों के अनुयायियों का धार्मिक उत्पीड़न किया गया है। यह कानून एक केंद्रित कानून है जो इन छह अल्पसंख्यक समुदायों के लिए एक विशेष स्थिति में एक उपाय के तौर पर कार्य करेगा ।

प्रश्न 8- क्या इसका मतलब यह है कि इन 3 देशों के मुस्लिमों को भारतीय नागरिकता कभी नहीं मिल सकती है?

नहीं, इन तीनों और अन्य सभी देशों के मुस्लिम हमेशा भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं, यदि वो इसके पात्र हैं। नागरिक संशोधन कानून ने किसी भी देश के किसी भी विदेशी को भारत की नागरिकता लेने से नहीं रोका है बशर्ते कि वह कानून के तहत मौजूदा योग्यता को पूरा करे। पिछले 6 वर्षों के दौरान, लगभग 2830 पाकिस्तानी नागरिकों, 912 अफगानी नागरिकों और 172 बांग्लादेशी नागरिकों को भारतीय नागरिकता दी गई है।

इनमें से कई लोग इन तीन देशों में बहुसंख्यक समुदाय से हैं। इस तरह के प्रवासियों को भारतीय नागरिकता प्राप्त होती रहती है और यह तब भी जारी रहेगी जब वे पंजीकरण या प्राकृतिककरण के लिए कानून में पहले से दी गई पात्रता शर्तों को पूरा करते हैं। 2014 में दोनों देशों के बीच सीमा समझौते के बाद बांग्लादेश के पचास से अधिक हिस्सों को भारतीय क्षेत्र में शामिल करने के बाद बहुसंख्यक समुदाय के लगभग 14,864 बांग्लादेशी नागरिकों को भी भारतीय नागरिकता प्रदान की गई।

प्रश्न 9- नागरिक संशोधन कानून किस पर लागू होता है ?

यह केवल हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई विदेशियों के लिए प्रासंगिक है, जो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत में 31.12.2014 तक धार्मिक उत्पीड़न के आधार पर पलायन कर चुके हैं। यह मुस्लिमों सहित किसी भी अन्य विदेशी पर लागू नहीं होता है, इन तीन देशों सहित किसी भी देश से भारत में पलायन कर रहे हैं।

(लेख साभार: PIB INDIA)

जिग्नेश मेवाणी के नेतृत्व में विरोध-प्रदर्शन करती मुस्लिमों की भीड़ हुई हिंसक, पुलिस वैन पर हमला

नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) का विरोध करने वाली एक मुस्लिम भीड़ ने जिग्नेश मेवाणी के वडगाम निर्वाचन क्षेत्र में हिंसक प्रदर्शन किया और उसने छपी-पालनपुर राजमार्ग को भी अवरुद्ध कर दिया। जल्द ही भीड़ हिंसक हो गई और उसने एक पुलिस वैन पर हमला कर दिया।

यह वही जगह है जहाँ गुजरात के विधायक जिग्नेश मेवाणी विरोध-प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे थे।

पहले वीडियो में, देखा जा सकता है कि ‘Taj Sweets & Bakers’ के बाहर विरोध में खड़ी मुस्लिम भीड़ के बीच एक पुलिस वैन खड़ी है जिसे आगे नहीं बढ़ने दिया जा रहा और लगातार उसे धक्का मारा जा रहा है। 

वीडियो में ‘Taj sweets and bakers’ जहाँ मुस्लिम भीड़ पुलिस वैन पर हमला कर रही है।

यह वीडियो पुराना नहीं बल्कि CAA के विरोध-प्रदर्शन का है क्योंकि इसी वीडियो को गुजरात के वडगाम के विधायक जिग्नेश मेवाणी ने भी शेयर किया है, जो लगभग 18 सेकंड का है। इसमें भी उसी ‘Taj Sweets & Bakers’ दुकान को देखा जा सकता है। इससे यह स्पष्टतौर पर पता चलता है कि यह वीडियो पुराना नहीं है। 

जिग्नेश मेवाणी द्वारा साझा किए गए वीडियो में ‘Taj sweets and bakers’

यह उसी जगह और उसी भीड़ का एक वीडियो है, जहाँ पुलिस वैन पर हमला किया जा रहा था। इस वीडियो को शेयर करते हुए जिग्नेश मेवाणी बड़ा गर्व महसूस कर रहे थे।

देशव्यापी विरोधों के चलते, देश के कई हिस्सों में प्रशासन की तरफ़ से धारा-144 लागू की गई। लेकिन, विपक्षी नेताओं के उकसाने पर लोगों ने क़ानून का उल्लंघन किया और क़ानून को हाथों में लेते हुए ‘शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन’ की आड़ में पुलिस पर हमला भी किया।

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CAA विरोधी मेधा पाटेकर को शरणार्थियों ने खदेड़ कर भगाया, कहा- हिम्मत है तो Pak में रह कर दिखाओ

नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर पाकिस्तान से भारत आए पीड़ित शरणार्थियों में ख़ुशी की लहर है। इस क़ानून से उन सभी शरणार्थियों को भारत की नागरिकता मिलने का राह प्रशस्त हो गया, जिन्हें अल्पसंख्यक होने की वजह से तीनों पड़ोसी इस्लामिक देशों अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में प्रताड़ित किया जा रहा है। इसके तहत ऐसे शरणार्थी आएँगे, जो दिसंबर 31, 2014 के पहले से भारत में रह रहे हैं। इस क़ानून को लेकर विपक्षी नेतागण पूरे देश में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। दिल्ली में कई मेट्रो स्टेशनों को बंद कर दिया गया है और उपद्रवियों व पुलिस के बीच कई जगह झड़प हुई है।

गुरुवार (दिसंबर 19, 2019) को वामपंथी नेताओं ने जगह-जगह निकल कर विरोध प्रदर्शन किया। कथित इतिहासकार रामचंद्र गुहा और ख़ुद को किसान नेता बताने वाले योगेंद्र यादव को पुलिस ने हिरासत में लिया। इसी क्रम में पर्यावरण एक्टिविस्ट मेधा पाटेकर भी विरोध करने पहुँचीं, लेकिन पाक से आए हिन्दू शरणार्थियों ने उन्हें खदेड़ दिया। शरणार्थियों ने मेधा पाटेकर को खदेड़ते हुए कहा कि जो लोग सीएए का विरोध कर रहे हैं, वो पाकिस्तान में रह कर दिखाएँ। नीचे संलग्न किए गए वीडियो में देखें:

यहाँ तक कि वहाँ उपस्थित एक बच्चे ने भी मेधा पाटेकर की बात नहीं सुनी और उन्हें ज़ोर से फटकारा। पाकिस्तान से प्रताड़ित होकर भारत आए शरणार्थियों के बीच मोदी सरकार के इस क़ानून को लेकर ख़ुशी का माहौल है क्योंकि उन्हें वही सारे अधिकार मिलने जा रहे हैं, जो एक आम भारतीय नागरिक को मिलता है।

मुशर्रफ की लाश को घसीटते हुए लाओ और D-चौक पर 3 दिन लटकाए रखो: पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को वहाँ के सुप्रीम कोर्ट ने सज़ा-ए-मौत दी है। पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट अपने फ़ैसले में यहीं नहीं रुका बल्कि उसने मरने के बाद भी मुशर्रफ के साथ क्या किया जाना है, इसे लेकर भी आदेश दिया। पाक सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनाए गए फ़ैसले के पॉइंट नंबर 66 के अनुसार, मरने के बाद मुशर्रफ की लाश को घसीट कर इस्लामाबाद के डेमोक्रेसी चौक तक लाया जाना चाहिए। बता दें कि इसे डी-चौक भी कहा जाता है, जो पाकिस्तान के राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री दफ्तर, संसद और सुप्रीम कोर्ट के नजदीक ही है।

पाक सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा कि फाँसी देकर मारे जाने के बाद मुशर्रफ की लाश को घसीटते हुए डी-चौक तक लाया जाना चाहिए और वहाँ 3 दिनों तक उसे लटका कर रखा जाना चाहिए। विशेषकों का मानना है कि पाक सुप्रीम कोर्ट ने वहाँ की फौज को नीचा दिखाने के लिए ऐसा आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व पाक सेनाध्यक्ष जनरल मुशर्रफ को भगोड़ा बताते हुए कहा कि उसे सज़ा देना मुश्किल है क्योंकि वो भी काफ़ी ताक़तवर है। 167 पेज के फ़ैसले को कोर्ट ने लिखा है कि मुशर्रफ ने हमेशा अपनी बीमारी और सुरक्षा का हवाला देते हुए कोर्ट की कार्यवाही में हिस्सा नहीं लिया।

पाक सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फौज के जिन लोगों ने मुशर्रफ को बचाने का प्रयास किया, वो सब भी इस मामले में बराबर के दोषी हैं। कोर्ट ने कहा कि यूनिफार्म और बूट पहने कुछ लोगों ने हमेशा मुशर्रफ का बचाव किया है। कोर्ट ने पाकिस्तानी एजेंसियों को निर्देश देते हुए कहा कि वो सज़ा की तामील के लिए मुशर्रफ को किसी तरह धर-दबोचें। पाकिस्तान की फौज इसीलिए भी सदमे में है क्योंकि ऐसा पहली बार हुआ है जब वहाँ के किसी सेनाध्यक्ष को फाँसी की सज़ा सुनाई गई है। पाक सेना के प्रवक्ता आशिफ गफूर पहले ही कह चुके हैं कि मुशर्रफ को मिली सज़ा को लेकर फौज में गम का माहौल है।

पाक फौज ने कहा कि 40 सालों तक देश के लिए लड़ने वाला इंसान कभी भी देशद्रोही नहीं हो सकता। फौज ने कोर्ट की कार्यवाही को त्रुटिपूर्ण करार दिया। फौज के प्रवक्ता ने कहा कि उन्हें अब भी उम्मीद है कि इस मामले में पाकिस्तान के संविधान के अनुसार न्याय किया जाएगा। मुशर्रफ फ़िलहाल यूएई के दुबई में हैं। इस महीने उनकी तबियत भी ख़राब हो गई थी, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। हॉस्पिटल बेड से ही जारी किए गए एक वीडियो में उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों को आधारहीन बताया था।

उग्र हुए मुस्लिम प्रदर्शनकारी: पत्थरबाजी के साथ लगाई कई बसों में आग, लखनऊ में पुलिस चौकी फूँकी

नागरिकता संशोधन एक्ट के खिलाफ कई राज्यों में उग्र प्रदर्शन हो रहे हैं। कई जगह हिंसक प्रदर्शन भी सामने आ रहे हैं। इसी बीच उत्तर प्रदेश में एक के बाद एक हिंसक प्रदर्शनों और आगजनी की खबरें सामने आईं हैं। प्रदर्शन करने वालों में ज़्यादातर को कपड़ों से पहचाना जा सकता है। ये बहुतायत में मुस्लिम प्रदर्शनकारी है। जो भारी मात्रा में नुकसान की मकसद से पूरी तैयारी के साथ निकले हैं ऐसा कई प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है।

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में मुस्लिम प्रदर्शनकारियों ने उग्र होते हुए 2 सरकारी बसों को आग के हवाले कर दिया। इसके बाद पुलिस ने कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में भी लिया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रदर्शन हिंसक होने के बाद संभल जिला कलेक्टर ने अगले आदेश तक जिले की मोबाइल सेवाएँ बंद कर दी हैं।

वहीं दूसरी ओर लखनऊ हसनगंज इलाके में भी CAA के खिलाफ प्रदर्शन उग्र हो गया। यहाँ के मुस्लिम बहुल हसनगंज में उग्र भीड़ ने कई वाहनों में तोड़फोड़ करते हुए उनमें आग लगा दी। मुस्लिमों की भीड़ ने इस दौरान जमकर पथराव भी किए। अलग-अलग गलियों से निकलकर ताबड़तोड़ पत्थरबाजी की है।

लखनऊ के मुस्लिम बहुल हसनगंज इलाके में मुस्लिम भीड़ ने विरोध प्रदर्शन के नाम पर कई पुलिस वाहनों को आग के हवाले कर दिया। यहाँ तक मुस्लिम प्रदर्शनकारियों ने पुलिस चौकी में भी आग लगा दी है। हालाँकि अभी तक घायलों और हुए नुकसान की पूरी रिपोर्ट नहीं आई है लेकिन भरी मात्रा में हिंसा और उत्पात मचने की कोशिश हुई है।

इस हिंसक घटना के बाद पूरे प्रदेश की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। हालाँकि, दूसरी ओर मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यूपी के डीजीपी ओ पी सिंह ने वर्तमान में हालात पूरी तरह से नियंत्रण में होने की बात कही है।

बता दें कि नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ देश के कई राज्यों में हिंसक प्रदर्शन किया जा रहा है। इस दौरान कई जगहों से भारी हिंसा होने की जानकारी भी सामने आ चुकी है। पूर्वोत्तर राज्यों के साथ ही पश्चिम बंगाल, बिहार, दिल्ली, उत्तर प्रदेश सहित कई अन्य राज्यों में भी प्रदर्शन किए जाने की घटनाएँ सामने आ चुकी हैं।

हिंसक विरोध प्रदर्शनों को हवा देने और लोगों को बहकाकर हिंसा के लिए उकसाने के कई नेता और कार्यकर्त्ता गिरफ्तार भी हो चुके हैं।