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परवेज मुशर्रफ के खिलाफ फैसला देने वाले जज पर कार्रवाई की तैयारी: मंत्री ने जज को बताया ‘मानसिक बीमार’

पाकिस्तान में पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को फाँसी की सजा सुनाए जाने के बाद से बवाल मच गया है। बता दें कि पूर्व राष्ट्रपति, सैन्य जनरल और मुल्क को कारगिल की शर्मनाक हार में झोंकने वाले पूर्व तानाशाह परवेज़ मुशर्रफ़ को पेशावर कोर्ट ने मौत की सज़ा सुनाई है। इसके बाद से सरकार और सेना एक तरफ खड़े नजर आ रहे हैं तो वहीं कोर्ट दूसरी तरफ। परवेज मुशर्रफ के खिलाफ सजा का ऐलान होने के बाद सेना ने इस फैसले की आलोचना की है। 

विशेष अदालत के फैसले से नाराज पाकिस्तान सरकार ने भी जज वकार अहमद सेठ को हटाने के लिए
सुप्रीम जूडीशियल कॉन्सिल का रुख करने का फैसला किया है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने गुरुवार (दिसंबर 19, 2019) को विशेष अदालत द्वारा दिए गए इस फैसले को देश में ‘अराजकता’ और ‘अशांति’ पैदा करने का प्रयास करार दिया।

इमरान खान ने गुरुवार को मीडिया रणनीति समिति की बैठक को संबोधित करते हुए कहा, “सरकार किसी भी स्थिति की अनुमति नहीं देगी, जो देश में अस्थिरता पैदा करती है या संस्थानों के बीच टकराव पैदा करती है।” इस बैठक में निर्णय लिया गया कि सरकार विशेष अदालत के चीफ जस्टिस वकार अहमद सेठ के खिलाफ सुप्रीम जूडीशियल कॉन्सिल का रुख करेगी। लीगल टीम ने विशेष अदालत के फैसले को ‘असंवैधानिक’, ‘अवैध’ और ‘अमानवीय’ बताया।

पाकिस्तान के कानून मंत्री फरोग नसीम ने कहा कि यह फैसला दिखाता है कि न्यायमूर्ति सेठ ‘मानसिक रूप से अस्वस्थ’ हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी सजा पाकिस्तान के किसी भी कानून के खिलाफ है। जस्टिस वकार अहमद सेठ द्वारा सुनाए गए निर्णय को देखते हुए सरकार ने फैसला किया है कि सुप्रीम जूडीशियल कॉन्सिल में रेफरेंस दायर किया जाएगा और उनसे अनुरोध किया जाएगा कि ऐसे जज को न तो पाकिस्तान के हाई कोर्ट के जज होने का अधिकार है और न ही सुप्रीम कोर्ट के जज होने का। उन्होंने आगे कहा कि इस तरह के फैसले से न सिर्फ कोर्ट का विशेषाधिकार धूमिल होता है, बल्कि यह न्याय व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है।

फरोग नसीम ने कहा, “हमारा अनुरोध है कि क्योंकि उन्होंने (वकार अहमद) खुद को मानसिक रूप से अयोग्य और अक्षम साबित कर दिया है, तो उन्हें तुरंत काम करने से रोका जाना चाहिए। हम सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से अनुरोध करते हैं कि वे उन्हें किसी भी प्रशासनिक या न्यायिक कार्य करने से रोकें।” नसीम ने कहा कि इस तरह की टिप्पणी करने वाला कोई भी जज न केवल कानून के खिलाफ काम कर रहा है, बल्कि खुद को इस विश्वास के प्रति प्रतिकूल साबित कर रहा है कि न्यायपालिका में विश्वास होना चाहिए।

गौरतलब है कि पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को वहाँ के सुप्रीम कोर्ट ने सज़ा-ए-मौत सुनाते हुए यह भी बताया कि मुशर्रफ के मरने के बाद उनके साथ क्या किया जाना है। पाक सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनाए गए फ़ैसले के पॉइंट नंबर 66 के अनुसार, फाँसी देकर मारे जाने के बाद मुशर्रफ की लाश को घसीटते हुए इस्लामाबाद के डेमोक्रेसी चौक (डी-चौक) तक लाया जाना चाहिए और वहाँ 3 दिनों तक उसे लटका कर रखा जाना चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि पाक सुप्रीम कोर्ट ने वहाँ की फौज को नीचा दिखाने के लिए ऐसा आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व पाक सेनाध्यक्ष जनरल मुशर्रफ को भगोड़ा बताते हुए कहा कि उसे सज़ा देना मुश्किल है क्योंकि वो काफ़ी ताक़तवर है। 167 पेज के फ़ैसले को कोर्ट ने लिखा है कि मुशर्रफ ने हमेशा अपनी बीमारी और सुरक्षा का हवाला देते हुए कोर्ट की कार्यवाही में हिस्सा नहीं लिया। वहीं पाक के फौज का कहना है कि 40 सालों तक देश के लिए लड़ने वाला इंसान कभी भी देशद्रोही नहीं हो सकता। पाक फौज ने कोर्ट की कार्यवाही को त्रुटिपूर्ण करार दिया।

खिसियाया रवीश ऑपइंडिया नोचे: न्यूज़लॉन्ड्री का लेख रवीश ने ही लिखवाया, एडिट किया, नहीं चला तो खुद शेयर किया

पता चला है कि रवीश जी बहुत परेशान हैं। यह बात उन लोगों से पता चली है जिनसे उन्होंने अपनी परेशानी दूर करने के लिए मदद माँगी है। बताया गया कि रवीश जी का फ़ेसबुक देखिए। मैंने देखा तो वहाँ पर न्यूज़लॉन्ड्री नाम की एक कॉन्ग्रेसी प्रोपेगेंडा वेबसाइट का लिंक शेयर किया हुआ था। जिसमें ऑपइंडिया वेबसाइट के बारे में कुछ खुलासे जैसा किया गया था। क़रीब तीन किलोमीटर लंबा लेख था जिसका एक लाइन में मतलब यह है, “रवीश जी बहुत परेशान हैं क्योंकि ऑपइंडिया नाम की एक वेबसाइट उनके बारे में बहुत बुरा-बुरा लिख रही है।”

बताने वाले ने ही बताया, “वो रवीश जी ने ही पोस्ट करवाया है। उसका ड्राफ़्ट भी उनसे चेक कराया गया था। वेबसाइट पर जब अपलोड किया गया तो तीन दिन तक कोई रिस्पॉन्स नहीं आया तब रवीश जी ने परेशान होकर ख़ुद ही फ़ेसबुक पर शेयर किया ताकि ऑपइंडिया की पोल खुल जाए।” यह सुनकर मैं हैरान था कि पत्रकार का चोला ओढ़े इतना बड़ा दलाल ऑपइंडिया जैसी नई-नवेली न्यूज़ वेबसाइट से डर गया। डर भी उस लेख से जो दरअसल व्यंग्य (Satire) में लिखा गया है। जब कोई व्यक्ति व्यंग्य या मज़ाक को सीरियसली लेना शुरू कर दे तो फौरन समझ जाना चाहिए कि उसका मानसिक संतुलन ठीक नहीं है।

नक़ली आदमी चाहे जितना भी बड़ा हो जाए है उसका यह डर नहीं जाता कि कहीं लोग उसकी सच्चाई जान न जाएँ। जिस तरह से ऑपइंडिया ने पिछले कुछ दिनों में एनडीटीवी पर चलने वाले जिहादी और नक्सली समर्थक प्रोपेगेंडा को उजागर किया है वो अपने आप में एक मिसाल है। ऑपइंडिया कोई नया काम नहीं कर रहा। इससे पहले रवीश जी की पत्रकारिता की पोल तो चाँदनी चौक के कम पढ़े-लिखे दुकानदारों ने भी खोल दी थी, जब नोटबंदी के दौरान वो कॉन्ग्रेस के एक नेता को चाँदनी चौक का दुकानदार बताकर उससे नोटबंदी के ख़िलाफ़ बुलवा रहे थे। जब लोगों ने इसका विरोध किया तो रवीश जी ने भागते हुए बोलना शुरू कर दिया था कि ये सब बीजेपी के गुंडे हैं। रवीश जी के ऐसे स्वाँग के ढेरों उदाहरण हैं। न जाने कितने लोगों को उन्होंने फेक न्यूज़ और फेक नैरेटिव का शिकार बनाया। ऑपइंडिया बस ऐसे लोगों की ही आवाज़ बन गया, इसीलिए रवीश कुमार उससे डर रहे हैं।

रवीश जी ऑपइंडिया को आईटी सेल बोलकर ख़ारिज करने की कोशिश ज़रूर करते हैं। लेकिन खुद उनसे बेहतर कोई नहीं जानता कि वास्तव में ऐसा नहीं हैं। आईटी सेल वालों को तो वो कॉन्ग्रेस और आम आदमी पार्टी के आईटी सेल की मदद से कई बार पानी पिला चुके हैं। उन्हें क्या लगता है कि #ISupportRavishKumar जैसे जो हैशटैग ट्विटर पर ट्रेंड कराए जाते हैं वो कौन कराता है यह लोगों को पता नहीं चलता? ऑपइंडिया में कोई डेकोरेटेड और पुरस्कार प्राप्त पत्रकार नहीं हैं। ये सारे आम नौजवान हैं जिनके किसी और ज्यादा कमाई वाले पेशे में जाने की संभावना अधिक थी। लेकिन शायद कोई जुनून था जो उन्होंने यह वेबसाइट चलाई।

मुझे नहीं लगता कि इनमें कोई बड़े-बड़े मीडिया इंस्टीट्यूट से पढ़कर आया है। ये सभी लोअर मिडिल क्लास के लड़के हैं, जो बिहारी स्टाइल में ‘कहके लेते’ हैं। इन्होंने पत्रकारिता की बनी-बनाई भाषा नहीं अपनाई, बल्कि अपनी भाषा और शैली गढ़ी है। रवीश जी को लगता होगा कि ऑपइंडिया सिर्फ उनके नाम पर चल रहा है तो ये उनकी गलतफहमी है। यह वेबसाइट उनके अलावा 50 से ज्यादा प्रोपेगेंडा चैनलों, अखबारों, वेबसाइटों, पत्रकारों और उनके सियासी सरगनाओं से पंगा ले रही है। ये आसान काम नहीं है।

ऐसा नहीं है कि ऑपइंडिया वालों को पता नहीं होगा कि कॉन्ग्रेस की सरकार के समय मीडिया के इस माफ़िया से टकराने वालों का क्या अंजाम हुआ करता था। 26/11 के मुंबई हमलों के बाद ‘The Hoot’ नाम की एक मामूली वेबसाइट ने बरखा दत्त की भूमिका के बारे में पूरे सबूतों के साथ एक रिपोर्ट की थी। जिस पर बरखा दत्त ने उसे चलाने वाले को जेल के दरवाजे तक पहुँचा दिया था। ऐसे ही न जाने कितनी वेबसाइटों और ब्लॉग्स का दम घोंटने का श्रेय इस दलाल मंडली को जाता है। पहले अपनी सरकार थी तब जेल भिजवा देते थे, अब नहीं भिजवा पाते इसीलिए “डर का माहौल” है।

रवीश जी बहुत कुढ़कर रह जाते होंगे। इसीलिए हर उस आदमी को गोदी मीडिया, आईटी सेल, व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी बोल देते हैं, जो उनके पाखंड की पोल खोलने की जुर्रत करता है। मुझे भरोसा है कि रवीश जी सबका नाम किसी कॉपी में लिखकर रख रहे होंगे कि जब राहुल गाँधी प्रधानमंत्री बनेंगे तो उनसे बोलकर सबको जेल भिजवाएँगे। उस कॉपी में ऑपइंडिया और उनके संपादक अजीत भारती का नाम सबसे ऊपर स्केच पेन से अंडरलाइन करके लिखा होगा।

रवीश जी को यह समझना चाहिए कि ऑपइंडिया के ख़िलाफ़ अपनी भड़ास निकालकर कुछ नहीं मिलेगा। उसके खिलाफ साजिशें बंद कीजिए। अपने चमचों से उसे डाउनग्रेड करवाने जैसी चिरकुटई से बाज आइए। ऑपइंडिया नहीं होगा तो कोई और नाम होगा। आपने पत्रकारिता के नाम पर नफ़रत की जो खेती की है उसकी प्रतिक्रिया न हो यह कैसे हो सकता है? आप न्यूज़लॉन्ड्री की आड़ लीजिए या वायर की, कोई न कोई मामूली आदमी आपकी झूठ की लंका में छुरछुरी लगाता रहेगा।

अच्छी भाषा की उम्मीद मत कीजिएगा, क्योंकि ज़रूरी नहीं कि हर किसी को चाशनी में डूबे ज़हरीले शब्द लिखने की ट्रेनिंग मिली हो। मैं एक पाठक के तौर पर ऑपइंडिया की पूरी टीम और अजीत भारती को बधाई दूँगा। रवीश कुमार जैसे ठगों औऱ दलालों की तिलमिलाहट इस बात का सबूत है कि वो बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। उन्हीं की फेसबुक वॉल पर किसी Anumeha Pandit का कमेंट याद दिलाना चाहूँगा, “आप शानदार काम कर रहे हैं। ध्यान रखिएगा अपने मानक का क्योंकि आप इतिहास दर्ज़ कर रहे हैं। इस समय की सबसे महत्वपूर्ण आवाज़ आप हैं।”

अजीत भारती का जवाब यहाँ देखें: https://www.youtube.com/watch?v=j9ietZ2CUvQ
यह भी पढ़ें: जामिया में मजहबी नारे ‘नारा-ए-तकबीर’, ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ क्यों लग रहे? विरोध तो सरकार का है न?

यह लेख चंद्र प्रकाश जी ने लिखा है।

कॉन्ग्रेस कॉरपोरेटर शहज़ाद ख़ान समेत 49 दंगाई हिरासत में: शाह-ए-आलम में पुलिस पर हुआ था जानलेवा हमला

अहमदाबाद के शाह-ए-आलम इलाक़े में मुस्लिम भीड़ द्वारा नागरिकता क़ानून के विरोध में हिंसा की गई। पुलिसकर्मियों पर जानलेवा हमला किया गया। इन आरोपों में अहमदाबाद पुलिस ने कॉन्ग्रेस कॉरपोरेटर शहज़ाद खान पठान समेत 49 दंगाईयों को हिरासत में लिया है।

देश गुजरात नामक न्यूज वेबसाइट के अनुसार, हिंसा भड़काने के आरोप में जिन लोगों हिरासत में लिया गया है, उन सभी को इसानपुर पुलिस स्टेशन ले जाया गया है।

पुलिस ने बताया कि अहमदाबाद के सभी विरोध-प्रदर्शन वाली जगहों से कुल 213 उपद्रवियों को हिरासत में लिया गया है। हिरासत में लिए गए लोगों में कॉन्ग्रेस नेता जिग्नेश मेवाणी भी शामिल थे।

इससे पहले, यह ख़बर भी आई थी कि नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) का विरोध करने वाली मुस्लिम भीड़ ने जिग्नेश मेवाणी के वडगाम निर्वाचन क्षेत्र में हिंसक प्रदर्शन किया और उसने छपी-पालनपुर राजमार्ग को भी अवरुद्ध कर दिया गया था। यहाँ जमा हुई भीड़ जल्द ही हिंसक हो गई और उसने एक पुलिस वैन पर हमला कर दिया।

शाह-ए-आलम में, मुस्लिम भीड़ ने उग्र प्रदर्शन किया और पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ अँधाधुँध पथराव किया। इस हिंसा से जुड़े कई हैरान कर देने वाले वीडियो भी सामने आए, इनमें मुस्लिम भीड़ ने न सिर्फ़ पुलिस पर पथराव किया था बल्कि भीड़ के एक हिस्से ने एक पुलिसकर्मी को गोली मारने की भी कोशिश की थी।

यहाँ इस बात पर ग़ौर किया जाना बेहद ज़रूरी है कि देश के कई क्षेत्रों में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ व्यापक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। धारा-144 लागू होने के बावजूद दंगाईयों की भीड़ ने विरोध-प्रदर्शनों के लिए पत्थर और औजार जुटाए। इससे पहले, आपइंडिया ने ख़ुलासा किया था कि पूरे देश में, विशेषकर विश्वविद्यालयों में नागरिकता क़ानून के विरोध में विरोध-प्रदर्शन आयोजन करने में NSUI एक सक्रिय भागीदार के तौर पर था। NSUI ने अहमदाबाद में ‘विरोध प्रदर्शन’ की योजना बनाई थी।

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कट्टरपंथी इस्लामी संगठन से चंदा लेने वाले जिग्नेश मेवाणी ने फैलाई फेक न्यूज़, लपेटा PM मोदी को भी

वायरल Whatsapp चैट से खुलासा: प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव गिरोह ने रची थी हिंसा की बड़ी साज़िश

जामिया हिंसा पर FIR: कॉन्ग्रेस का पूर्व MLA आसिफ खान भी था शामिल, दंगाइयों के साथ छात्रों ने भी की पत्थरबाजी

जामिया हिंसा: ‘Shame on you’ के नारे लगाने वाले वकीलों पर HC सख्त, होगी कार्रवाई, जाँच समिति गठित

जामिया मिलिया इस्लामिया में हिंसा की जाँच के लिए एक न्यायिक आयोग के गठन का अनुरोध करने वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान छात्र दंगाइयों को किसी भी तरह से अंतरिम संरक्षण प्रदान करने से इनकार करने वाले फैसले पर ‘शेम-शेम’ का नारा लगाने वाले वकीलों के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। 

हाई कोर्ट ने अदालत परिसर में नारेबाजी के प्रकरण की जाँच के लिए एक समिति बनाने का निर्देश दिया है। समिति गहराई से जाँच के बाद दोषी वकीलों के खिलाफ कार्रवाई पर उचित दिशा-निर्देश देगी। चीफ जस्टिस ने कहा कि मामले की जाँच के लिए एक कमिटी बनेगी जो कार्रवाई को लेकर उचित फैसला करेगी। इसके पहले कुछ वकीलों ने अदालत से गुजारिश की थी कि वह गुरुवार (दिसंबर 19, 2019) को अदालत परिसर में हुई नारेबाजी का स्वतः संज्ञान लेते हुए दोषी वकीलों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई करे।

बता दें कि अदालत ने गुरुवार को सुनवाई के दौरान केंद्र, दिल्ली सरकार और पुलिस को एक नोटिस भी जारी किया, जिसमें जामिया मिलिया इस्लामिया की घटना पर जवाब दाखिल करने को कहा गया। अदालत इस मामले की सुनवाई आगामी 4 फरवरी को करेगी। इतनी लंबी तारीख़ मिलने पर याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से इसे और जल्दी देने की माँग की तो कोर्ट ने इससे इनकार कर दिया। जिसके बाद हाईकोर्ट के फ़ैसले से असंतुष्ट, वकीलों की लॉबी ने कथित तौर पर न्यायाधीशों पर ‘Shame on you’ के नारे लगाना शुरू कर दिया। 

गौरतलब है कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में रविवार (दिसंबर 15, 2019) को दिल्ली के जामिया इलाके में जमकर हिंसा हुई थी। रविवार शाम प्रदर्शनकारियों ने कई बसें और बाइक फूँक दी। उपद्रवियों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा और आँसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। इसके बाद पुलिसकर्मियों ने अराजक तत्वों के जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में घुसे होने के संदेह पर कैंपस से सभी छात्रों को बाहर निकाल दिया।

पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़प में कई पुलिसकर्मी घायल हो गए। प्रदर्शनकारियों ने बसों और वाहनों में आग लगा दी। जामिया में इस हिंसा के खिलाफ जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों के अलावा जेएनयू और दूसरे संगठनों के लोगों ने भी पुलिस मुख्यालय पर देर रात प्रदर्शन किया। देर रात पुलिस द्वारा 50 छात्रों को रिहा करने के बाद सोमवार (दिसंबर 16, 2019) सुबह 4 बजे प्रदर्शन खत्म हुआ। जामिया कैंपस में 5 जनवरी तक छुट्टी घोषित कर दी गई है।

…जो सीलमपुर बवाल में बम फेंक भी नहीं पाया, हाथ भी गँवाया, उस रईस को पुलिस ने धर दबोचा

सीलमपुर में मंगलवार (दिसंबर 17, 2019) को हुए दंगों के बीच पेट्रोल बम फेंकने की कोशिश करने वाले युवक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। युवक की पहचान रईस के रूप में हुई। जानकारी के मुताबिक रईस मंगलवार को भीड़ के बीच से पेट्रोल बम पुलिस पर फेंकने जा रहा था, लेकिन हमला करने से पहले ही बम उसके हाथ में फट गया। जिसके कारण उसके हाथ के चीथड़े उड़ गए।

पुलिस के अनुसार, घटना के बाद से रईस ने अपनी पहचान छिपाई हुई थी और जीटीबी अस्पताल में अपना ईलाज करवा रहा था। लेकिन, तलाश में जुटी पुलिस को उसकी जानकारी मिल गई। जिसके बाद उसे गिरफ्तार किया गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रईस अब भी अस्पताल में ही है। लेकिन, पुलिस उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की तैयारी कर रही है। चूँकि बम फटने के कारण रईस के हाथ में काफी गंभीर चोट आई है, इसलिए पुलिस की ओर से उसे अभी कुछ नहीं कहा गया है। पुलिस का कहना है कि रईस को फिलहाल ईलाज मुहैया करवाया जा रहा है और ईलाज के बाद उस पर एक्शन लिया जाएगा।

बता दें, सीलमपुर में हुए दंगों में पुलिस ने दंगाई समेत तोड़फोड़ करने वालों में 21 लोगों को गिरफ्तार किया है, जबकि बाकी लोगों की भी पहचान कर ली गई है। कहा जा रहा है कि आज इलाके में तनाव दोबारा फैल सकता है, लेकिन पुलिस स्थानीय लोगों से बातचीत करके भरोसा कायम करने की कोशिश कर रही है।

गौरतलब है कि सीलमपुर में हुई हिंसा से जुड़े कई वीडियो इस समय सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। लेकिन इसी बीच बम फोड़ने का ऐसा वीडियो भी सामने आया। जिसने दिल्ली पुलिस समेत जाँच एजेंसियों के कान खड़े दिए। हालाँकि भले ही बम फेंकने की मंशा से भीड़ में पहुँचे युवक की गिरफ्तारी हो चुकी है। लेकिन ये सोचने का विषय है कि क्या नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के नाम पर दिल्ली में कोई और साजिश रची जा रही है? जिसकी एक झलक हमें वीडियो में देखने को मिली।

पुलिस फिलहाल रईस से पूछताछ में जुटी है। साथ ही सीलमपुर, जाफराबाद और दयालपुर में हुई हिंसा पर भी अपनी नजर बनाए हुए है। इस बीच खूफिया एजेंसियों से कई इनपुट पुलिस को मिले हैं, जिस पर जाँच जारी है। इसके अलावा दिल्ली के कई इलाकों में धारा 144 लगी हुई है। लेकिन, पुलिस लगातार लोगों के बीच गश्त करके शांति व्यवस्था बनाने की तैयारी कर रही है।

सपा सांसद शफीकुर्रहमान के ख़िलाफ़ मामला दर्ज, 3000 दंगाई हिरासत में: योगी सरकार की सख़्त कार्रवाई

दरगाह में 3000 की भीड़, नमाज के बाद पुलिसकर्मियों पर बरसाए पत्थर: 19 पुलिसकर्मी घायल, 32 हिरासत में

दंगाइयों की संपत्ति बेच कर होगी नुकसान की भरपाई: उपद्रवियों पर सख्त हुए CM योगी

सपा सांसद शफीकुर्रहमान के ख़िलाफ़ मामला दर्ज, 3000 दंगाई हिरासत में: योगी सरकार की सख़्त कार्रवाई

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ हिंसक प्रदर्शन और सोशल मीडिया के माध्यम से अफ़वाह फैलाने वाले अराजक तत्वों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करने का मन बना लिया है। किसी भी तरह की अफ़वाह को रोकने के लिए राज्य के 20 ज़िलों में मोबाइल इंटरनेट सर्विस बंद कर दी गई है। वहीं, संभल क्षेत्र के समाजवादी पार्टी के सासंद शफीकुर्रहमान के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कर लिया गया है।

गुरुवार (19 दिसंबर) को उत्तर प्रदेश के संभल ज़िले में मुस्लिम प्रदर्शनकारियों ने उग्र होते हुए 2 सरकारी बसों को आग के हवाले कर दिया था। इसके बाद पुलिस ने कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में भी लिया। रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रदर्शन हिंसक होने के बाद संभल ज़िला कलेक्टर ने अगले आदेश तक ज़िले की मोबाइल सेवाएँ बंद कर दी गई थी। इस मामले में पुलिस ने सपा सांसद शफीकुर्रहमान बर्क, एसपी जिलाध्यक्ष फ़िरोज़ ख़ान, स्थानीय पार्षद के पति हाजी मोहम्मद शकील और मुशील ख़ान समेत 17 को नामज़द करते हुए सैकड़ों लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया है। यहाँ रोडवेज की तरफ़ से भी भीड़ के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज किया गया।

बता दें कि राजधानी लखनऊ में गुरुवार (19 दिसंबर) को हुई हिंसा में एक शख़्स की मौत हो गई थी, साथ ही 16 पुलिसकर्मी समेत 30 लोग घायल हो गए थे। इस मामले में पुलिस ने सात FIR भी दर्ज की है और कार्रवाई करते हुए 31 लोगों को गिरफ़्तार भी कर लिया गया। इसके अलावा, 112 लोगों को हिरासत में लेने के साथ-साथ कानपुर में सुरक्षा के मद्देनज़र 100 लोग हिरासत में लिए गए हैं।

इसके अलावा, 3000 अराजक तत्वों को हिरासत में ले लिया गया है। इससे पहले योगी आदित्यनाथ ने सार्वजनिक सम्पत्ति को नुक़सान पहुँचाने वालों को सख़्त संदेश दिया था। उन्होंने कहा था कि सार्वजानिक सम्पत्ति को नुक़सान पहुँचाने वालों की सम्पत्ति बेच कर इसकी भरपाई की जाएगी। उपद्रवियों की सम्पत्ति को नीलाम करके जो पैसे आएँगे, उससे उनके द्वारा सार्वजनिक संपत्ति को पहुँचाई गई क्षति की भरपाई होगी।

यूपी के मेरठ में भी हिंसा भड़काने वाले दंगाईयो के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की गई। मेरठ में खैरनगर के पार्षद समेत नौ लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया। इसके अलावा, तीन लोगों को गिरफ़्तार भी किया गया। शांतिभंग मामले में शामली में नौ दंगाईयों को हिरासत में लिया गया और नौ दंगाईयों को गिरफ़्तार किया गया।

ख़बर के अनुसार, गोरखपुर में समाजवादी पार्टी के क़रीब 34 नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया गया। इस बीच पुलिस और सपा कार्यकर्ताओं के मध्य आपसी झड़प भी हुई, जिसके चलते पुलिस ने विरोध-प्रदर्शन पर अड़े सपा ज़िलाध्यक्ष महेन्द्रनाथ यादव समेत दर्जनों कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया। देवरिया में क़रीब 400 उद्रवियों को हिरासत में लिए जाने की ख़बर है। 

उधर, मुज़्फ़्फरनगर में विरोध-प्रदर्शनों के चलते इंटरनेट सेवाएँ बंद कर दी गई। एसपी सिटी ने लगभग 150 सपाइयों को गिरफ़्तार कर डीएवी डिग्री कॉलेज में बंद किया। वाराणसी में भी तीखी नोंकझोंक की ख़बरें सामने आईं। पुलिस ने लाठीचार्ज करने के साथ 69 लोगों को गिरफ़्तार कर उन्हें जेल भेज दिया।

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उग्र हुए मुस्लिम प्रदर्शनकारी: पत्थरबाजी के साथ लगाई कई बसों में आग, लखनऊ में पुलिस चौकी फूँकी

वीडियो: CAA विरोध के नाम पर उत्पात मचाने निकली थी दंगाई भीड़, यूपी पुलिस ने खदेड़-खदेड़ कर पीटा

असम में मोबाइल इंटरनेट सेवा फिर से चालू, ब्रॉडबैंड पहले से ही था बहाल

असम में शुक्रवार (दिसंबर 20, 2019) को 10 दिन के बाद इंटरनेट सेवा बहाल कर दी गई। नागरिकता संशोधन कानून के कारण असम में हुए हिंसक प्रदर्शन के बाद सुरक्षा कारणों से इसे निलंबित किया गया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एयरटेल के वरिष्ठ अधिकारी ने इंटरनेट बहाली के बारे में सूचना देते हुए बताया कि शुक्रवार सुबह नौ बजे इंटरनेट पर लगा प्रतिबंध हटाया गया। उन्होंने कहा, चूँकि उन्हें हाल में प्रतिबंध जारी रखने के कोई निर्देश नहीं मिले, इसलिए उन्होंने मोबाइल इंटरनेट सेवा फिर से बहाल कर दी है।

गौरतलब है कि असम में ब्रॉडबैंड सेवा पहले से ही बहाल हो चुकी है। लेकिन मोबाइल इंटरनेट सेवा शुक्रवार से चालू की गई है। इससे पहले गुवाहटी उच्च न्यायालय ने गुरुवार को शाम 5 बजे ही इंटरनेट सेवा बहाल करने के आदेश दे दिए थे।

इधर, राज्य के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल भी अपनी ओर से जनता को समझाने की पूरी कोशिश रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्होंने असम के हालातों को इंगित करते हुए कहा कि कुछ लोग गलत सूचना और फर्जी खबरें फैला रहे हैं। ये लोग समाज के दुश्मन हैं। उन्होंने कहा कि असमिया भाषा को हमेशा के लिए राज्य भाषा के रूप में संरक्षित किया जाएगा और सरकार इसे करेगी।

सीएम ने लोगों को आश्वस्त किया है कि कोई भी असम की धरती के बेटों के अधिकारों को नहीं चुरा सकता, उनकी भाषा या उनकी पहचान को कोई खतरा नहीं है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि किसी भी तरह से असम का सम्मान प्रभावित नहीं होगा। वे लोगों के समर्थन में हमेशा रहेंगे और राज्य में शांति के साथ आगे बढ़ेंगे।

बता दें कि नागरिकता संशोधन कानून के बाद असम में कुछ गलतफहमियों के चलते बीते दिनों काफी आक्रोश देखा जा रहा था। जिसके कारण राज्य के कई हिस्सों में हिंसक प्रदर्शन हुआ और स्थिति को नियंत्रिण में रखने के लिए इंटरनेट बंद किया गया। लेकिन अब स्थिति सुधरता देख, दोबारा इन्हें बहाल कर दिया गया और लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की जा रही है।

दरगाह में 3000 की भीड़, नमाज के बाद पुलिसकर्मियों पर बरसाए पत्थर: 19 पुलिसकर्मी घायल, 32 हिरासत में

CAA-विरोध की आड़ में आंतकी कनेक्शन का खुलासा: घुसे इंडियन मुजाहिदीन और सिमी के आतंकी

मुस्लिम महिलाओं को रकम दोगुना करने का लालच, ठगे ₹1.2 करोड़: सिराज-उर-रहमान और बुशरा बेगम गिरफ्तार

हैदराबाद में पुलिस ने गुरुवार (दिसंबर 19, 2019) को 1.2 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी के आरोप में एक दंपती को गिरफ्तार किया है। आरोप है कि सिराज-उर-रहमान और उसकी बीबी बुशरा बेगम लोगों से पैसे दोगुने करने के नाम पर रकम ऐंठा करते थे। इस तरह सिराज-उर-रहमान और बुशरा बेगम ने लोगों के 1.2 करोड़ रुपए ठग लिए थे।

पुलिस द्वारा जारी की गई विज्ञप्ति में कहा गया है कि बुशरा यूनिवर्सल इस्लामिक रिसर्च सेंटर (UIRC) की इंचार्ज थी, वहीं उसका पति सिराज UIRC का संस्थापक और महासचिव है। पुलिस ने बताया कि बुशरा और सिराज ने उनके द्वारा चलाए जा रहे तीनों स्कीम में मुस्लिम महिलाओं को पैसा लगाने का लालच दिया। 

इसके साथ ही उन्होंने एक इस्लामिक पब्लिक स्कूल को उनके पैसे को दोगुना वापस करने का वादा करके उनसे 1.2 करोड़ रुपये ठग लिए। डेक्कन क्रॉनिकल के मुताबिक, सिराज-उर-रहमान और उसकी बीबी बुशरा बेगम ने कथित तौर पर हीरा ग्रुप कंपनियों के हीरा गोल्ड, हीरा फुडेक्स, हीरा रिटेल और आईपीएस जैसी कंपनियों में अपने पैसे का निवेश करने के लिए लोगों को यकीन दिलाया।

हालाँकि वो लोगों को किसी भी तरह का रिटर्न देने में असफल रहे। उन्होंने लोगों को उनके द्वारा जमा की गई राशि भी नहीं लौटाई। जिसके बाद उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता और वित्तीय प्रतिष्ठान अधिनियम के जमाकर्ताओं के तेलंगाना संरक्षण के संबंधित धाराओं के तहत दो मामले दर्ज किए गए। निवेशक अर्शिया सुल्ताना और उनके रिश्तेदारों ने पुलिस को शिकायत की कि उन्होंने 1.2 करोड़ रुपए का निवेश किया था, लेकिन उनके निवेश पर न तो उन्हें रिटर्न मिला और न ही उनके द्वारा जमा किए गए पैसे। 

इसके अलावा सुल्ताना और उनके रिश्तेदारों ने भी सैदाबाद पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराई थी। पुलिस ने शिकायत पर कार्रवाई करते हुए जाँच की। जाँच में बुशरा और सिराज के दोषी पाए जाने के बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया। आरोपितों के खिलाफ आईपीसी की धारा 406, धारा 420, धारा 506 और वित्तीय प्रतिष्ठान अधिनियम के जमाकर्ताओं के संरक्षण के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया था।

गौरतलब है कि इससे पहले भी हैदराबाद में धोखाधड़ी के कई मामले सामने आए थे, जिसमें हीरा गोल्ड हलाल पोंजी योजना भी शामिल है। इसने न केवल हैदराबाद के निवासियों, बल्कि पूरे भारत और विश्व के हजारों लोगों को ठगा है। 

दरगाह में 3000 की भीड़, नमाज के बाद पुलिसकर्मियों पर बरसाए पत्थर: 19 पुलिसकर्मी घायल, 32 हिरासत में

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में गुरुवार (दिसंबर 19, 2019) को गुजरात के अलग-अलग हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए। इन दौरान हिंसक प्रदर्शन की कई तस्वीरें गुजरात के अहमदाबाद से आईं। अहमदाबाद के शाह आलम इलाके में उपद्रवियों की भीड़ ने पुलिसकर्मियों को घेर लिया और उन पर पथराव शुरू कर दिया। वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि पुलिसकर्मी भागकर छिपने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन भीड़ के सिर पर खून सवार हो जाता है। इसमें लगभग 19 पुलिस वाले चोटिल हो गए। घटना के बाद पुलिस ने कुल 32 लोगों को हिरासत में लिया है।

एक अन्य विडियो में दिखता है कि उपद्रवियों की भीड़ पुलिस के वाहन के पीछे दौड़ती है। पुलिस की गाड़ियाँ तेजी से जाने लगती हैं। आस-पास खड़े पुलिसकर्मी गाड़ी में घुसने की कोशिश करते हैं, लेकिन एक पुलिसकर्मी बस में चढ़ नहीं पाता और फिसल कर गिर पड़ता है। इतने में ही उपद्रवियों की भीड़ उसे घेर लेती है और पीटने लगती है।

इस घटना को लेकर मणिनगर पुलिस स्टेशन के एक कर्मचारी ने बताया कि बड़ी संख्या में भीड़ दरगाह में इकट्ठी हुई और फिर बाद में भीड़ ने पुलिसकर्मियों पर भारी मात्रा में पथराव करना शुरू कर दिया। इशानपुर पुलिस स्टेशन के इंसपेक्टर जेएम सोलंकी ने बताया कि दरगाह में नमाज के बाद दो से तीन हजार उपद्रवियों की भीड़ सड़क पर आई और पथराव करना शुरू कर दिया। बता दें कि इसमें जेएम सोलंकी भी घायल हो गए हैं।

शाह आलम इलाके में हिंसक प्रदर्शन पर अहमदाबाद के पुलिस कमिश्नर आशीष भाटिया ने कहा, “32 लोगों को हिरासत में लिया गया है। हम FIR दर्ज कर रहे हैं। सीसीटीवी फुटेज के आधार पर अन्य उपद्रवियों की भी शिनाख्त की जा रही है। इस हिंसक घटना में 19 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं।”

इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए गुजरात के गृह राज्य मंत्री प्रदीप जड़ेजा ने कहा था, “आज अहमदाबाद में हिंसा की दो घटनाएँ सामने आईं हैं। इसके अलावा पूरे राज्य में शांति पूर्ण वातावरण है। करीब 50 लोगों को हिरासत में लिया गया है। विडियो फुटेज के जरिए हिंसा में शामिल लोगों की पहचान की जा रही है। उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।”

गौरतलब है कि गुरुवार को गुजरात बंद का ऐलान किया गया था। इस दौरान प्रदेश में अलग-अलग जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुए। हजारों की तादाद में प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर गए और सड़क जाम कर दिया। हालात काबू में करने के लिए पुलिस ने कुछ प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया। इसके बाद स्थिति और बेकाबू हो गई और प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की गाड़ी को धक्का दे दिया। पुलिस की गाड़ी पलटाने की भी कोशिश की गई। बाद में एहतियात बरतते हुए अहमदाबाद-पालनपुर हाइवे को बंद कर दिया गया।

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रामचंद्र गुहा को मुक्का किसने मारा? पुलिस ने धमकी दी या मार दिया? – शशि थरूर के Viral वीडियो का सच

नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के ख़िलाफ़ 19 दिसंबर को देशव्यापी विरोध-प्रदर्शन हुए। देश भर में लोग सड़कों पर उतरे, जबकि अधिकांश राज्यों में पुलिस ने विरोध-प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार कर दिया और धारा-144 लगा दी। बेंगलुरु के प्रदर्शनकारियों में कर्नाटक के इतिहासकार रामचंद्र गुहा भी शामिल थे, जिन्हे कई अन्य लोगों के साथ पुलिस ने हिरासत में लिया था। गुहा को हिरासत में लेने वाली पुलिस का एक वीडियो सोशल मीडिया पर बड़ी तेज़ी के साथ घूम रहा है। इस वीडियो को फैलाते हुए कुछ लोग यह दावा कर रहे हैं कि पुलिस ने हिरासत में लेते हुए उन्हें मुक्का मारने की धमकी दी थी, जबकि सच्चाई से इसका कोई लेना-देना नहीं है।

वायरल वीडियो का स्क्रीनशॉट

इस भ्रामक वीडियो को ट्वीट करते हुए कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर ने लिखा, “क्या यह पुलिसवाला अपने मुक्के से रामचंद्र गुहा को मारने की धमकी दे रहा है?” लेकिन, उन्होंने इस वीडियो की सच्चाई जानने की कोई ज़ेहमत नहीं उठाई। वो अब तक यही मानते हैं कि कर्नाटक पुलिस ने रामचंद्र गुहा को मुक्का दिखाया। इससे साफ़ पता चलता है कि वो शशि थरूर फर्ज़ी ख़बर के प्रचार-प्रसार के काम को कितनी मुस्तैदी के साथ करते हैं।

इसी तरह का भ्रम फैलाने की कोशिश पत्रकार रितुपर्णा चटर्जी ने भी की। उन्होंने अपने ट्वीट में मुंबई पुलिस, यूपी पुलिस और दिल्ली पुलिस को आड़े हाथों लेते हुए लिखा कि हर जगह पुलिस प्रदर्शनकारियों को परेशान कर रही है। उन्होंने लिखा कि दिल्ली पुलिस के पुलिसकर्मी ने रामचंद्र गुहा को एक तरफ़ खींचने से पहले मुक्का बनाकर उन्हें धमकाया (एकदम बकलोल पत्रकार हैं यह साबित हो गया क्योंकि गुहा को बेंगलुरु में हिरासत में लिया गया है और वहाँ दिल्ली पुलिस क्या कर रही है, इसकी जानकारी इनके सिवा शायद किसी को नहीं।)। लेकिन, जब उन्हें इस वीडियो की सच्चाई पता चली तो उन्होंने माफ़ी माँग ली।

वहीं, रूपा सुब्रमण्या ने कर्नाटक सरकार पर तंज कसते हुए भाजपा सरकार की आलोचना की। उन्होंने लिखा कि इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने बैंगलुरु में CAA और NRC के विरोध में धरना दिया। इस वीडियो में आप एक पुलिसकर्मी को उनके मुँह पर मुक्के मारने की मुद्रा में देख सकते हैं।

पत्रकार सैकत दत्ता ने ट्वीट कर लिखा कि एक पुलिसकर्मी रामचंद्र गुहा को मुक्का मारना चाहता है। लेकिन, बाद में जब इस वीडियो की सच्चाई उन्हें पता चली तो उन्होंने माफ़ी माँग ली।

इसी कड़ी में अनमोल रंजन ने भी रामचंद्र गुहा को दिल्ली पुलिस के पुलिसकर्मी द्वारा मुक्का मारे जाने का दावा किया। 

DMK के IT-विंग के डिप्टी सेक्रेटरी जो अपने ट्विटर हैंडल Isai से भ्रम फैलाते हैं, ने भी ट्वीट के ज़रिए भाजपा सरकार और पुलिस को बदनाम करने की कोशिश की।

आइए अब आपको भ्रामकता फैलाने वाले इस वीडियो की असलियत से अवगत कराते हैं। यह बात सच है कि इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने CAA और NRC का विरोध किया था और उन्हें पुलिस हिरासत में ले लिया गया था। लेकिन, इसके आगे का सच वो नहीं है जिसका दावा कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर और वामपंथी पत्रकार कर रहे हैं। दरअसल, जिस मूवमेंट (पुलिसकर्मी के मुक्के की पोजिशन) में इस वीडियो का स्क्रीनशॉट लिया गया, उस दौरान वो पुलिसकर्मी अपनी पॉकेट में हाथ डाल रहे थे। इसमें रामचंद्र गुहा को मुक्का बनाकर धमकी देने जैसी कोई बात नहीं थी। 

ऊपर दिखाए गए पूरे वीडियो में आप देख सकते हैं कि पुलिसकर्मियों का रामचंद्र गुहा को हिरासत में लेने का जब वीडियो बनाया जा रहा था, तो ठीक उसी समय एक पुलिसकर्मी अपनी जेब में हाथ डालने जा रहा था और इसी मुद्रा का स्क्रीनशॉट लेकर सोशल मीडिया पर यह भ्रम भैलाने की कोशिश की जाने लगी कि इतिहासकार रामचंद्र गुहा को विरोध-प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मी ने मुक्का मारने की धमकी दी, जबकि इसका सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं है।

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