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सावरकर पर एक सुर में बोली भाजपा-शिवसेना, राहुल गाँधी के विवादित बोल से दाँव पर महाराष्ट्र सरकार

महाराष्ट्र में अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए शिवसेना ने कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर सरकार भले बना ली हो, लेकिन वैचारिक फासला दूर नहीं हो पा रहा है। बीते दिनों नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर भी शिवसेना और कॉन्ग्रेस का मतभेद सामने आ गया था। अब कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी के बयान को लेकर दोनों दल आमने-सामने हैं। राहुल गॉंधी का मेरा नाम ‘राहुल सावरकर’ नहीं है, कहना शिवसेना को पसंद नहीं आया है। पार्टी सांसद संजय राउत ने कहा है कि सावरकर पूरे देश के आदर्श हैं और उनका अपमान नहीं किया जाना चाहिए।

राउत ने कहा है कि हिंदुत्व विचारक के प्रति श्रद्धा को लेकर कोई “समझौता” नहीं किया जा सकता है। उन्होंने ट्वीट कर कहा, “वीर सावरकर न सिर्फ महाराष्ट्र, बल्कि पूरे देश के लिए आदर्श हैं। सावरकर का नाम राष्ट्र और स्वयं के बारे में गौरव को दर्शाता है। नेहरू और गांधी की तरह सावरकर ने भी देश के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया। ऐसे प्रत्येक आदर्श को पूजनीय मानना चाहिए। इस पर कोई समझौता नहीं हो सकता।”

राउत ने कहा, “हम महात्मा गाँधी और पंडित नेहरू दोनों की इज्जत करते हैं। आप वीर सावरकर का अपमान मत करें। समझदारों को इशारा ही काफी है।”

राहुल गॉंधी ने सावरकर को लेकर टिप्पणी शनिवार को रामलीला मैदान में कॉन्ग्रेस की रैली के दौरान की थी। ‘रेप इन इंडिया’ वाली टिप्पणी पर भाजपा माफी की मॉंग पर पलटवार करते हुए उन्होंने कहा कि उनका नाम ‘राहुल सावरकर’ नहीं है। वह सच बोलने के लिए कभी माफी नहीं मॉंगेंगे। उन्होंने कहा, ‘‘संसद में शुक्रवार को भाजपा के लोगों ने कहा कि मैं अपने भाषण के लिए माफी मॉंगूॅं। मुझे कहते हैं कि सही बात बोलने के लिए माफी मॉंगो। मेरा नाम राहुल सावरकर नहीं है, मेरा नाम राहुल गॉंधी है। मैं सच्चाई के लिए कभी माफी नहीं मॉंगूॅंगा। मर जाऊँगा मगर माफी नहीं मॉंगूॅंगा औऱ न कोई कांग्रेस वाला माफी मॉंगेगा।’’

इस बयान को लेकर भाजपा नेता भी कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष पर हमलावर हैं। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा है कि अगर राहुल गाँधी अगर 100 जन्म भी ले लेंगे तो भी वो राहुल सावरकर नहीं बन पाएँगे। सावरकर वीर थे, देशभक्त थे और उन्होंने त्याग किया था। राहुल गाँधी ने आर्टिकल 370, एयर स्ट्राइक, सर्जिकल स्ट्राइक और नागरिकता संशोधन बल पर जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया, वह पाकिस्तान की भाषा है। वह वीर नहीं हो सकते या सावरकर के समान भी नहीं हो सकते। 

पात्रा ने राहुल गाँधी पर निशाना साधते हुए कहा कि अगर राहुल गाँधी नया नाम चाहते हैं तो भाजपा उन्हें अब ‘राहुल थोड़ा शर्म कर’ कहकर बुलाएगी। उन्हें यकीनन, रेप इन इंडिया वाले बयान पर शर्म आनी चाहिए। मेक इन इंडिया को रेप इन इंडिया कहकर उन्होंने शर्म और मर्यादा की सभी सीमाओं को लाँघ दिया है।

भाजपा प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्ह राव ने कहा है, “राहुल गॉंधी के लिए अधिक उपयुक्त नाम ‘राहुल जिन्ना’ है। मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति और सोच उन्हें मोहम्मद अली जिन्ना का वारिस बनाती है, सावरकर का नहीं।’’ भाजपा आईटी प्रकोष्ठ के प्रमुख अमित मालवीय ने ट्वीट किया कि कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने सही कहा कि वह कभी सावरकर नहीं बन सकते। उन्होंने कहा कि वीर सावरकर राष्ट्रीय प्रतीक रहे हैं और उनका पूरे देश पर प्रभाव रहा है।

महाराष्ट्र में हुई खींचतान के बाद इस मुद्दे पर जिस तरह भाजपा और शिवसेना ने एक सुर में बात की है उससे उद्धव ठाकरे की सरकार के भविष्य को लेकर भी कयास लगने शुरू हो गए हैं। बीते दिनों महाराष्ट्र के पूर्व सीएम और शिवसेना के वरिष्ठ नेता मनोहर जोशी ने भी दोनों दलों के भविष्य में साथ आने के संकेत दिए थे।

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JNU के VC पर छात्रों ने फिर किया हमला, सुरक्षाकर्मियों ने मुश्किल से बचाया

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में फीस वृद्धि को लेकर चल रहे छात्रों के आंदोलन के बीच एक बड़ी खबर आई है। जेएनयू के कुलपति जगदीश कुमार ने खुद दावा किया है कि छात्रों ने उनके ऊपर हमला किया।

जेएनयू के कुलपति एम. जगदीश कुमार ने कहा विश्वविद्यालय के परिसर में ही उन पर हमला किया गया। उन्होंने समाचार एजेंसी ANI को बताया, “मैं स्कूल ऑफ ऑर्ट्स ऐंड ऐस्थेटिक्स गया हुआ था। वहाँ 10-15 स्टूडेंट्स ने मुझे घेर लिया। उन्होंने मुझे नीचे खींचने की कोशिश की और हमले के मूड में थे। भाग्यवश, मुझे सुरक्षाकर्मियों ने बचा लिया और मैं बच गया।” इस दौरान छात्रों ने उनकी कार के शीशे को भी तोड़ने का प्रयास किया।

बता दें, साल 2016 में देश विरोधी नारे लगाए जाने के कारण चर्चा में आए जेएनयू का मुद्दा अब भी शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। पिछले कुछ समय से यहाँ फीस वृद्धि के मुद्दे पर छात्रों और जेएनयू प्रशासन के बीच तनातनी कायम है। बीते दिनों ने छात्रों ने प्रशासन के विरोध में राष्ट्रपति भवन तक मार्च करने की कोशिश की। पुलिस की सख्ती के कारण ऐसा हो नहीं पाया। लाठीचार्ज कर पुलिस ने छात्रों को तितर-बितर कर दिया।

गौरतलब है कि ऐसा पहली बार नहीं है जब जेएनयू के छात्रों ने वीसी पर इस तरह हमला किया हो। इससे पहले भी जेएनयू में प्रवेश परीक्षा कंप्यूटर आधारित होने पर यहाँ के छात्रों ने विरोध किया था और कुलपति जगदीश कुमार के घर में लगभग 400-500 छात्रों ने हमला किया था। इस घटना में उग्र छात्रों ने कुलपति के घर का गेट तोड़ दिया था। साथ ही कुलपति के घर का घेराव करके। ताले, खिड़कियाँ, शीशे तोड़ डाले गए थे और सुरक्षाकर्मियों से मारपीट भी की गई थी।

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नमामि गंगे पर कानपुर में मोदी की क्लास, स्टीमर पर बैठ कर लिया सफाई कार्यों का जायजा

साल 2014 में सत्ता संभालने के साथ गंगा नदी को प्रदूषण रहित करने का बीड़ा उठाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने दूसरे कार्यकाल में भी गंगा को निर्मल बनाने के लिए प्रयासरत हैं। इसी क्रम में उन्होंने शनिवार को कानपुर में राष्ट्रीय गंगा परिषद पर हुई बैठक में हिस्सा लिया। साथ ही इस बैठक में उन्होंने गंगा नदी की निर्मलता के लिए किए जा रहे कार्यों की समीक्षा भी की।

शनिवार (दिसंबर 14, 2019) को चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के सभागार में आयोजित इस बैठक में पीएम मोदी को नमामि गंगे परियोजना की प्रगति पर जानकारी दी गई। इसके बाद उन्होंने गंगा की सफाई के लिए किए जा रहे प्रयासों की सराहना की और परियोजना में तेजी लाने के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया।

इस दौरान उनके साथ राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत भी मौजूद रहे। इन्होंने अपने-अपने राज्यों में गंगा नदी की स्वच्छता के लिए किए जा रहे कार्यों की जानकारी प्रधानमंत्री को दी।

इसके अलावा समीक्षा बैठक में केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन, पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर, पर्यटन एवं सांस्कृतिक राज्यमंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल आदि भी उपस्थित रहे।

समीक्षा बैठक के बाद प्रधानमंत्री अन्य मंत्रियों और अधिकारियों के संग गंगा के दर्शन के लिए बैराज स्थित अटल घाट की ओर गए। स्टीमर पर सवार होकर वो सरसैया घाट के लिए रवाना हुए। इसके बाद गंगा में वे आधा घंटा तक स्टीमर पर रहे। जहाँ उन्होंने गंगा सफाई के लिए नालों और गंगा की सफाई का जायजा लिया।

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प्रियंका गाँधी की डांस टीचर लीला सैमसन पर CBI ने कसा शिंकजा, ₹7 करोड़ की हेराफेरी

केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) ने लीला सैमसन के खिलाफ सात करोड़ रुपए की हेराफेरी को लेकर मामला दर्ज किया है। इन पर चेन्नई कुथम्बलम सभागार के पुनरुद्धार काम में कथित अनियमितताओं का आरोप है। संगीत नाटक अकादमी की पूर्व अध्यक्ष सैमसन पद्मश्री से सम्मानित हैं। आरोप है कि उनकी निगरानी में कलकत्ता फाउंडेशन ने 7.02 करोड़ रुपए की अनुमानित परियोजना पर 62.20 लाख रुपए से अधिक खर्च किए।

लीला सैमसन गॉंधी परिवार की करीबी मानी जाती हैं। कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गॉंधी की नृत्य शिक्षिका भी रह चुकी हैं। लीला के अलावा फाउंडेशन के तत्कालीन मुख्य लेखा अधिकारी टीएस मूर्ति, लेखा अधिकारी एस रामचंद्रन, इंजीनियरिंग अधिकारी वी. श्रीनिवासन और सीआरडी के मालिक और चेन्नई के इंजीनियर्स के खिलाफ भी मामला दर्ज किया गया है।

अधिकारियों ने बताया कि सैमसन 06 मई 2005 से लेकर 30 अप्रैल 2012 तक फाउंडेशन की निदेशक थीं। 2006 में फाउंडेशन द्वारा 1985 में बनाए गए ऑडिटोरियम के नवीनीकरण की जरूरत महसूस की गई। CBI की FIR में कहा गया है कि इस परियोजना का उद्देश्य 1985 में निर्मित कुथम्बलम ऑडिटोरियम की साउंड सिस्टम को अपग्रेड करना था। इसके अलावा सिविल इंजीनियरिंग कार्य, इलेक्ट्रिकल काम, एयर कंडीशनिंग और वास्तुशिल्प से जुड़े काम भी किए जाने थे।

CBI ने 2017 में संस्कृति मंत्रालय के तत्कालीन मुख्य सतर्कता अधिकारी महेश शर्मा की शिक़ायत के आधार पर इस मामले की जाँच शुरू की थी। शर्मा ने अपनी शिक़ायत में आरोप लगाया था कि फाउंडेशन के अधिकारियों ने जनरल फाइनेंस रूल्स का उल्लंघन करते हुए कंसल्टेंट आर्किटेक्ट CARD को रेनोवेशन के काम का ठेका दिया था।

2016 में एक जाँच के बाद संस्कृति मंत्रालय ने कहा था कि फाउंडेशन के अधिकारियों ने जनरल फाइनेंस रूल्स के उल्लंघन में कंसल्टेंट आर्किटेक्ट CARD को रेनोवेशन के काम का ठेका दिया और 7.02 करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट की अनुमानित राशि से 62.20 लाख रुपए से अधिक खर्च किए।

शिक़ायत में यह भी आरोप लगाया गया कि ठेकों को देने में खुली निविदा प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था और सैमसन जीएफआर मानदंडों के बारे में निर्माण समिति के गैर-आधिकारिक सदस्यों को अवगत कराने में विफल रहीं।

लीला सैमसन लुटियंस क्लब की सबसे प्रभावशाली शख़्सियतों में से एक मानी जाती हैं। उन्हें अप्रैल 2005 में कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने कलाक्षेत्र के निदेशक के रूप में नियुक्त किया था। बाद में वे संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्ष बनाई गईं। अप्रैल 2011 में वे सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष बनाई गईं।

कहा जाता है कि उन्होंने प्रियंका गाँधी वाड्रा को कुछ वर्षों तक भरतनाट्यम सिखाया था। यह आरोप भी लगा था कि गाँधी परिवार के साथ नज़दीकियों के चलते ही उन्हें 2011 में यूपीए सरकार ने सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया था।

सैमसन को 1990 में पद्मश्री, तमिलनाडु सरकार द्वारा संस्कृती, नृत्य चूडामणि, कलामीमणि (2005) और भरतनाट्यम में योगदान के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1999-2000) से सम्मानित किया गया।

लेकिन, साल 2012 में हिन्दू विरोधी सैमसन ने कलाक्षेत्र के निदेशक के पद से इस्तीफ़ा दे दिया। इसके बाद डेरा सच्चा सौदा के संस्थापक गुरमीत राम रहीम सिंह की मुख्य भूमिका वाली फ़िल्म पर हुए विवाद के चलते उन्होंने सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में भी अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था।

पिता का बनाया कानून ही फारूक अब्दुल्ला की मुसीबत, हिरासत 3 महीने और बढ़ी

जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत हिरासत में लिए गए पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रमुख फारूक अब्दुल्ला की हिरासत शनिवार को तीन महीने के लिए और बढ़ा दी गई। अधिकारियों ने बताया कि वह अपने घर में ही रहेंगे जिसे प्रशासन ने जेल घोषित कर रखा है।

गौरतलब है कि पब्लिक सेफ्टी एक्ट (PSA) के अंतर्गत हिरासत में लिए गए किसी भी शख्स को बिना कोर्ट में पेश किए 2 साल तक रखा जा सकता है। कश्मीर में यह पहला मौका है जब इस एक्ट के तहत मुख्य धारा के नेताओं को गिरफ्तार किया गया। आमतौर पर इस एक्ट का इस्तेमाल आतंकवादियों, अलगाववादियों और पत्थरबाजों के लिए किया जाता रहा है। दिलचस्प यह है कि यह कानून फारूक के पिता शेख अब्दुल्ला ने ही 1978 में लकड़ी तस्करों पर नकेल कसने के लिए बनाया था।

5 अगस्त के बाद इस एक्ट के तहत गिरफ्तार होने वालों में केवल फारूक अब्दुल्ला का नाम नहीं है। इस सूची में उमर अब्दुल्ला, पीडीपी लीडर महबूबा मुफ्ती सहित अन्य नाम शामिल थे, जिन्हें होटल से लेकर सरकारी बंग्लों में नजरबंद रखा गया है।

अभी हाल ही में पीडीपी के एक सांसद ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों समेत नजरबंद अन्य नेताओं को रिहा करने की माँग की थी। वहीं, सुप्रीम कोर्ट में एमडीएमके नेता वाइको ने याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि फारूक को अवैध तरीके से हिरासत में लिया गया।

इसके अलावा फारुक अब्दुल्ला पर आरोप है कि वो अपने भाषणों के ज़रिए अलगाववादी नेताओं और आतंकवादियों का महिमा मंडन कर रहे थे। उन पर आरोप है कि वो अनुच्छेद-370 और 35-A के नाम पर लोगों को देश के ख़िलाफ़ भड़का सकते थे, इससे देश की एकता-अखंडता ख़तरे में पड़ सकती थी। उनकी विचारधारा अलगाववाद और आतंकवाद को समर्थन देने की थी, जिससे आम लोगों का जीवन ख़तरे में पड़ सकता था। केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दिए जाने वाले अनुच्छेद-370 को निष्क्रिय किए जाने के बाद से ही फारूक अब्दुल्ला गुपकार रोड स्थित अपने घर में नज़रबंद हैं।

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पूरा नाम क्या है? जाति जानने के बाद प्रताड़ित करते हैं दिलीप मंडल: माखनलाल यूनिवर्सिटी के छात्र

“आपका नाम क्या है? जी मनोज, पूरा नाम? जी मनोज मिश्रा” या ऐसा कोई भी नाम जो सामाजिक खाँचे में सवर्ण के नाम से जाना जाता है और इस प्रकार जाति का पता चलते ही किसी प्रोफ़ेसर की शिक्षा देने की शैली ही नहीं बल्कि व्यवहार भी बदल कर अपने ही छात्र के साथ दोयम दर्जे का हो जाए या सौतेला व्यवहार करता हुआ, पढ़ाते-पढ़ाते आपकी जाति को लेकर फिकरे कसे, ताने दे, उसका मजाक बनाए तो कैसा लगेगा? उम्मीद है बुरा लगना स्वाभाविक है। शायद ऐसे शिक्षक के प्रति सम्मान भी पूरी तरह ख़त्म हो जाए तो भी आश्चर्य नहीं!”

ऐसा मैं नहीं कह रहा हूँ बल्कि ऐसा माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के उन छात्रों का कहना है जो न सिर्फ पत्रकारिता के छात्र हैं बल्कि संयोग से सवर्ण भी और ये सौतेला या नकारात्मक घृणित व्यवहार करने वाले हैं, स्वघोषित जाति के खिलाफ लड़ने वाले अनुबंध पर जुलाई में नियुक्त प्रोफ़ेसर दिलीप सी मंडल एवं मुकेश कुमार।

दिलीप सी मंडल एवं मुकेश कुमार

जाति की लड़ाई में शायद ये प्रोफ़ेसर इतने रसातल में चले गए है कि ये भूल गए हैं कि जिसकी जो भी जाति है वो उसने खुद नहीं चुनी बल्कि जहाँ, जिस घर में वह पैदा हुआ उसके नाम के साथ जुड़ गया और धर्म के साथ भी ऐसा ही है। लेकिन अगर कोई अपनी व्यक्तिगत कुंठा के कारण छात्रों से सौतेला व्यवहार करे तो क्या ऐसे किसी शिक्षक को शिक्षा देने का हक़ होना चाहिए? जब शिक्षा के मंदिर में ही छात्रों से भेदभाव हो। उनके बीच के आपसी सौहार्द को बिगाड़ने की कोशिश हो! जातिगत राजनीति हो तो भला छात्र पढ़ने कहाँ जाएँ? क्या पार्लियामेंट में या सड़क पर?

क्या है पूरा मामला:

मामला कुछ यूँ है कि माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में अनुबंध के आधार पर कुछ माह पहले ही नियुक्त दो प्रोफ़ेसर दिलीप सी मंडल एवं मुकेश कुमार द्वारा सोशल मीडिया के माध्यम से और कक्षाओं में भी जाति के आधार पर छात्रों के बीच विभाजन पैदा करने एवं भेदभाव किए जाने को लेकर पत्रकारिता के उन्हीं के छात्रों ने इन प्रोफेसरों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। छात्रों का आरोप है कि ये दोनों प्रोफ़ेसर पहले पूरा नाम के बहाने जाति पूछते हैं फिर सवर्ण जाति के छात्रों को प्रताड़ित करते हैं।

बता दें कि पत्रकारिता की पढ़ाई के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान रखने वाले विश्वविद्यालय में प्रोफेसर दिलीप मंडल और मुकेश कुमार को जुलाई में अनुबंध के आधार पर फैकल्टी के रूप में नियुक्त किया गया। सालों से दिन भर लोगों से उनकी जाति पूछते और जातिगत टिप्पणी करने वाले ये धुरंधर जातिवादी पुरोधा एक तरफ छात्रों से उनका पूरा नाम पूछकर भेदभावपूर्ण व्यवहार कर रहे हैं। तो दूसरी तरफ उन्हीं पर मनुवादी होने से कई आरोप मढ़कर खुद को विक्टिम दिखाने की भी कोशिश कर रहे हैं।

छात्रों के अनुसार, पिछले कुछ दिनों से खासतौर से दिलीप सी मंडल सोशल मीडिया में मीडिया के एक वर्ग विशेष (सवर्ण) को लेकर लगातार पोस्ट कर रहे हैं। उन्होंने जाति विशेष आधारित मीडिया को लेकर एक हैशटैग भी चला रखा है। मंडल के हिसाब से मीडिया में 70% से अधिक सवर्ण ही क्यों है? क्यों निचली जातियों को मीडिया में नौकरी नहीं मिलती? अपने ऐसे कुछ बेतुके प्रश्नों को सदी का महान प्रश्न बनाकर तथाकथित दलित-पिछड़ा अस्मिता की लड़ाई का प्रश्न बनाकर हर जगह जहर बोने वाले मंडल के कारनामों को प्रोफेसर मुकेश कुमार भो बढ़ावा देते हैं। उन्होंने भी सवर्णों को लेकर सोशल मीडिया में टिप्पणी की है। इस वजह से भी पत्रकारिता के छात्रों में उन्माद के स्तर तक घोर जातिवादी इन दोनों अनुबंध पर नियुक्त प्रोफेसरों लेकर नाराज़गी है।

इनके जातिवादी व्यक्तिगत टिप्पणियों और भेदभाव से तंग आकर ऐसे घोर जातिवाद का जहर बोने वाले प्रोफेसरों के खिलाफ छात्र-छात्राओं को प्रदर्शन के लिए मजबूर होना पड़ा। जिसके लिए छात्र कुलपति ऑफिस के बाहर धरने पर बैठ गए।

छात्रों की बात सुनने की बजाय, शांतिपूर्ण तरीके से संविधान रख, रघुपति राघव राजाराम गाते हुए दिलीप सी मंडल और मुकेश कुमार जैसे प्रोफेसर्स के खिलाफ प्रदर्शन को देखते हुए विश्वविद्यालय ने पुलिस बुला लिया। जो शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन कर रहे है छात्र-छात्राओं को पाँचवे तल से घसीट कर बाहर ले जाने लगे। पुलिस के बल प्रयोग करने और लाठी भाजने के कारण कई छात्र-छात्राओं को चोटें भी आई है।

घायल छात्र ऐसे ही कई और छात्रों की तस्वीरें भी हमें भेजी गई हैं

प्रदर्शन करने वाले छात्रों ने ऑपइंडिया को बताया, “हमने इस बारे में कल कुलपति दीपक कुमार को ज्ञापन सौंपा है और कुलपति को अपनी शिकायत में बताया कि दिलीप सी मंडल और मुकेश कुमार सोशल मीडिया पर और क्लास में छात्रों की जाति पूछते हैं और उन लोगों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं जो उच्च जाति के हैं। इससे छात्रों में जाति विभाजन पैदा होता है। हमने उनके निलंबन की माँग की है। ऐसे दुराग्रही लोगों को शिक्षक होने का कोई हक़ नहीं है।”

छात्रों द्वारा कुलपति को सौपीं गई माँग -1

छात्रों द्वारा कुलपति को सौपीं गई माँग -2

हालाँकि, बात मीडिया में आने से मामला बिगड़ता देख कुलपति ने मामले की जाँच के लिए एक कमेटी बना दी है, लेकिन छात्र चाहते हैं कि इन दोनों प्रोफ़ेसरों की सेवाएँ तत्काल प्रभाव से निलंबित की जाएँ। साथ ही छात्रों ने कहा कि उनके विरोध प्रदर्शन के बारे में गलत अफ़वाहें भी उड़ाई जा रहीं हैं। उसका विश्वविद्यालय प्रशासन स्पष्टीकरण भी दे। कल को हम कहीं नौकरी के लिए जाएँगे तो हमें इस झूठ का खामियाजा न भुगतना पड़े।

अफवाह उड़ाना और झूठ बोलना वामपंथियों के मूल हथियार हैं तो मामला अपने खिलाफ जाता देख दिलीप मंडल ने खुद फेसबुक पोस्ट लिखकर ऐसे छात्रों को AVBP का घोषित कर दिया। साथ ही अपने ही छात्रों को मनुवादी कहने में भी नहीं हिचके तभी तो उन्हें साँची स्तूप पर शास्त्रार्थ का निमंत्रण दे डाला। इस सुझाव के साथ कि आप लोग मनुस्मृति लेकर आइए मैं संविधान और अपना पूरा पुस्तकालय ले आऊँगा। वहीं फैसला हो जाएगा। वह रे प्रोफ़ेसर लड़ाई और युद्ध का तरीका भी खुद ही तय कर दिए वो भी गैर बराबरी के स्तर पर। बहस या तर्क-कुतर्क करनी ही है तो इन छात्रों से क्यों? क्या इसलिए कि जाति के नाम पर आपने इन्हें कुछ पढ़ाया ही नहीं है तो ये आपकी बराबरी कहाँ से करेंगे? तभी तो छात्र माँग कर रहे हैं कि उन्हें पढ़ाने वाला प्रोफ़ेसर चाहिए जातिगत दुराग्रह फ़ैलाने वाला नहीं।

जबकि सच्चाई यह है कि ना ही इनमें से कोई छात्र वहाँ AVBP से जुड़ा है और न ही ऐसे किसी बैनर पोस्टर के साथ पत्रकारिता के छात्रों ने प्रदर्शन किया। अगर ऐसा होता तो अब तक मंडल खुद ही इनकी फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर डाल चुके होते। लेकिन जब चोरी पकड़े जाने पर झूठे आरोप ही लगा के चिल्लम-चिल्ली करना है तो किसी प्रमाण की जरुरत क्या है। आप कहो आम तो हम जामुन की बात करेंगे और इतनी जोर से करेंगे कि आप उसमे कूदो ही नहीं।

जबकि, पत्रकारिता के छात्रों ने ऑपइंडिया को यह भी बताया कि ABVP के लोग तब आए जब हम लोगों को पुलिस ने मारा-पीटा-घसीटा और गिरफ्तार किया। वो भी वे कैंपस में नहीं थे गेट के बहार से ही हमारा समर्थन कर रहे थे।

छात्रों ने ऑपइंडिया से बात करते हुए खुद ही ऐसे कई वीडियो फुटेज दिए हैं जिसमें मंडल और मुकेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों को पुलिस घसीट कर ले जा रही है। हाथापाई कर रही है।

कल शास्त्रार्थ की फेसबुक पर चुनौती देने वाले मंडल ने अपने समर्थन में भी कुछ छात्रों को यह कहकर कि सवर्ण अनुवादी छात्र हमारा विरोध कर रहे हैं। आज अपने समर्थन में भी पाँच-छ छात्र बैठा दिए हैं। जो मंडल के समर्थन में नारे बाजी में लगे हैं। पत्रकारिता के छात्रों का कहना है कि चूँकि अन्य छात्रों को भी इनकी हरकत पता है इसलिए अलग-अलग विभागों से यही कुछ छाँट के OBC-SC-ST लाएँ हैं कि देखों मनुवादी यहाँ भी एक दलित प्रोफ़ेसर को पढ़ाने नहीं दे रहे हैं। जबकि हम आपस में ऐसे बाँट कर एक दूसरे को कभी नहीं देखते। इस तरह के भेदभाव के बीज यहाँ जब से आए हैं यही दिलीप मंडल डाल रहे हैं।

मंडल के समर्थन में बैठे छात्र

इस मामले में छात्रों ने पुलिस के व्यवहार और उनके मारपीट करने पर भी आपत्ति जताई। लेकिन पुलिस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। छात्रों के विरोध प्रदर्शन के बाद इन दोनों प्रोफेसरों के निलंबन की माँग पर एएसपी संजय साहू ने अपने बयान में कहा, कुलपति के चेंबर के बाहर छात्र विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। रजिस्ट्रार ने उनसे उनकी शिकायतों के बारे में भी बात की। वे दोनों प्रोफेसरों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई चाहते हैं। एक समिति बनाई गई है। कमेटी 15 दिनों के भीतर रिपोर्ट देगी।


छात्रों द्वारा कुलपति को सौपीं गई माँग -3

पहले छात्रों को जाँच कमेटी से दूर रखकर कुलपति की तरफ से यह कहा गया कि यदि जाँच कमेटी को उचित लगेगा तो परिणाम बता देगी। जब छात्रों ने इस पर हंगामा किया तो उन्हें भी जाँच कमेटी में रखने पर सहमति बनी है। इस मामले में छात्रों ने ही बताया कि रजिस्ट्रार दीपेंद्र बघेल ने कहा, “मैंने उनकी माँग स्वीकार कर ली है, जाँच के लिए बनाई गई समिति में उन्हें भी शामिल किया जाएगा। जाँच पूरी होने तक दिलीप मंडल और मुकेश कुमार विश्वविद्यालय में प्रवेश नहीं करेंगे।

हालाँकि, छात्रों की माँग है कि एक हफ्ते के भीतर इन दोनों प्रोफेसरों के खिलाफ कार्रवाई हो। लेकिन प्रशासन की तरफ से ऐसा कोई आश्वासन नहीं दिया गया है।

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मंदिर में पुलिस अच्छी बात नहीं: सबरीमाला में महिलाओं के सुरक्षित प्रवेश के लिए आदेश से SC का इनकार

केरल के सबरीमला मंदिर जाने से रोकी गईं बिंदु अम्मिनी और रेहाना फातिमा की याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने कोई आदेश देने से इनकार कर दिया है। दोनों महिलाओं ने याचिका दायर कर माँग की थी कि केरल सरकार की ओर से उन्हें पुलिस सुरक्षा मुहैया कराई जाए। इस पर चीफ़ जस्टिस एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली बेंच ने शुक्रवार (13 दिसंबर) को सुनवाई की। कोर्ट का कहना है कि यह बहुत ही भावनात्मक मुद्दा है और हम नहीं चाहते हैं कि किसी भी स्थिति में हालात क़ाबू से बाहर हो जाएँ।

बेंच ने कहा, ”कुछ मुद्दे ऐसे हैं जिनसे देश में हालात विस्फोटक हो सकते है, यह मुद्दा भी ऐसा ही है। हम कोई हिंसा नहीं चाहते, मंदिर में पुलिस की तैनाती बहुत अच्छी बात नहीं है। यह बेहद भावनात्मक मुद्दा है। हजार साल से वहाँ परम्परा जारी है।”

चीफ जस्टिस बोबडे ने कहा कि पिछले साल 28 सितंबर को आया 5 जजों का फैसला अंतिम नहीं है। कोई भी महिला जो मंदिर जाना चाहती है, वो जाए। लेकिन, अब फ़ैसला पुनर्विचार के लिए सात जजों की बड़ी बेंच के पास भेजा जा चुका है। वही बेंच अब इस भावनात्मक मुद्दे पर अंतिम निर्णय लेगी।

ख़बर के अनुसार, चीफ जस्टिस बोबडे, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि इस मामले में संतुलन बनाए रखने के लिए ज़रूरी है कि कोई आदेश नहीं दिया जाए। उधर, बिंदु की वकील इंदिरा जयसिंह ने कोर्ट से कहा कि हम यहाँ हिंसा को रोकने के लिए आए हैं। देश अहिंसा पर टिका है। हम हिंसा को बढ़ावा नहीं देना चाहते। उन्होंने कहा कि हम सात जजों की पीठ के फ़ैसले का इंतज़ार करेंगे।

ग़ौरतलब है कि केरल सरकार ने सबरीमाला मंदिर में प्रवेश का प्रयास करने वाली महिलाओं की सुरक्षा की गारंटी लेने से इनकार कर दिया था। इस कारण सीपीआई पोलित ब्यूरो की बैठक में मुख्यमंत्री पिनरई विजयन को अन्य वामपंथी नेताओं का कोपभाजन बनना पड़ा था। केरल देवस्वोम बोर्ड के मंत्री कदकामपल्ली सुरेंद्रन ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के लिए आंदोलन चला रहीं तृप्ति देसाई पर आरोप लगाते हुए कहा था कि तृप्ति देसाई और उनके नेतृत्व वाला गैंग केरल में शांति-व्यवस्था भंग करना चाहता है।

केरल के मंत्री ने तृप्ति देसाई के आंदोलन को एक बहुत बड़ी साज़िश करार दिया था। उन्होंने सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने के लिए हंगामा करने वाली अन्य महिलाओं पर भी गंभीर आरोप लगाए थे। इसके अलावा, उन्होंने एक्टिविस्ट बिंदु अम्मिणी पर हुए हमले को भी एक साज़िश करार दिया था। उन्होंने कहा कि ये सब पूर्व-नियोजित ड्रामा था। दरअसल, बिंदु सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने के लिए जा रही थीं, तभी किसी व्यक्ति ने उनपर मिर्ची स्प्रे से हमला कर दिया था। केरल के मंत्री ने इसे नाटक करार दिया।

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सिमी आतंकी इलियास और एजाज गिरफ्तार, मुंबई लोकल ब्लास्ट में 12 साल से थी तलाश

मुंबई आतंकवाद निरोधक दस्ते (ATS) और मध्य प्रदेश ATS ने शुक्रवार (13 दिसंबर) की रात प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) से जुड़े दो आतंकवादियों को गिरफ़्तार किया। 2006 में मुंबई के लोकल ट्रेन में हुए सीरियल ब्लास्ट में इनकी तलाश थी।

आतंकियों की पहचान एजाज अकरम शेख और इलियास अकरम शेख के रूप में हुई है। दोनों भाई हैं। आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन का प्रमुख अब्दुल सुभान कुरैशी इनका जीजा है। कुरैशी 2018 से दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की हिरासत में है। ख़ुफ़िया जानकारी मिलने के बाद दिल्ली स्पेशल सेल पुलिस और मुंबई ATS की टीम ने दिल्ली में ओखला के शाहीनबाग में छापा मारा। यहाँ से इलियास को गिरफ़्तार किया गया। वहीं, एजाज को मध्य प्रदेश के बुरहानपुर से गिरफ़्तार किया गया।

मुंबई ATS की टीम ऑपरेशन करने के लिए गुरुवार (12 दिसंबर) को दिल्ली पहुँची थी। इलियास को शनिवार को अदालत में पेश कर ATS तीन दिनों की ट्रांजिट रिमांड पर मुंबई ले गई।

ख़बर के अनुसार, दोनों आतंकवादी भाई मुंबई के कुर्ला के रहने वाले हैं और मुंबई में सीरियल ट्रेन ब्लास्ट के बाद शहर छोड़कर भाग गए थे। ATS महाराष्ट्र और एंटी टेरर एजंसियों ने दोनों को पकड़ने के लिए एक अभियान चलाया था, लेकिन वह सफल नहीं हो पाए थे।

दोनों भाई SIMI के महासचिव और आतंकी सफदर नागौरी, आतंकी एहतेशान सिद्दीकी और अब्दुल सुभान कुरैशी उर्फ ​​तौकीर द्वारा संचालित मॉड्यूल का हिस्सा थे, जिन्हें भारत के ओसामा बिन लादेन के नाम से भी जाना जाता है। सिद्दीकी को आतंकी गतिविधियों से संबंधित दो मामलों में दोषी ठहराया गया, जबकि तौकीर को पिछले साल दिल्ली से गिरफ़्तार किया गया था। वह 2007 और 2008 के बीच उत्तर प्रदेश, जयपुर, अहमदाबाद और दिल्ली में हुए सिलसिलेवार विस्फोटों के मामलों की सुनवाई का इंतज़ार कर रहा है।

झूठी पहचान का इस्तेमाल करने के संदेह में दोनों आतंकवादियों से 2006 और 2018 के बीच देश भर में हुए विभिन्न आतंकवादी बम विस्फोटों में उनकी संदिग्ध भागीदारी के बारे में पूछताछ की जा रही है।

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फतेहपुर के हुसैनगंज में 18 साल की युवती को रेप के बाद जिंदा जलाया, पैर का निचला हिस्सा ही बचा

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर के हुसैनगंज थाना क्षेत्र में उन्नाव जैसी घटना घटी है। पड़ोस में रहने वाले 22 वर्षीय चाचा ने पहले 18 वर्षीय भतीजी का बलात्कार किया और फिर अपने कुकर्मों को छुपाने के लिए उसे जिंदा जला दिया।

शनिवार की सुबह हुई इस घटना ने इलाके में सबको झकझोर के रख दिया। जानकारी के मुताबिक, पड़ोस में रहने वाले चाचा ने लड़की के साथ पहले दरिंदगी की और लड़की ने जब सारी बात घरवालों को बताने की बात कही तो आरोपित ने मिट्टी का तेल डालकर उसे आग के हवाले कर दिया।

घटना के दौरान 90 फीसदी झुलस चुकी पीड़िता को आनन-फानन में पहले जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। बाद में उसे गंभीर हालत में कानपुर के हैलट अस्पताल रेफर किया गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पीड़िता के साथ वारदात को उस समय अंजाम दिया गया जब शनिवार की सुबह वह घर पर अकेली थी और परिवार के लोग खेत में काम करने गए थे। इस दौरान पड़ोस में रहने वाला चाचा उसके घर पहुँचा और उसका बलात्कार किया। इसके बाद पीड़िता ने जब उसकी करनी का खुलासा घरवालों के सामने करने की बात की तो आरोपित उसे खींचता हुआ कमरे में ले गया और वहाँ रखे मिट्टी के तेल को उस पर उड़ेलकर आग लगा दी, फिर वह वहाँ से फरार हो गया।

लड़की इस बीच चीखती-चिल्लाती रही। कुछ देर बाद उसकी आवाज पड़ोसियों ने सुनी और उस पर जूट का बोरा डालकर किसी तरह आग बुझाई। साथ ही परिजनों को इसकी सूचना दी। आनन-फानन में लड़की को जिला अस्पताल पहुँचाया गया। लेकिन उसकी नाजुक हालत देखते हुए उसे कानपुर रेफर करना पड़ा।

हिंदुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार फतेहपुर जिला अस्पताल की इमरजेंसी में तैनात डॉ. नरेश विशाल ने बताया कि पीड़िता 90 फीसदी झुलस गई है। पैर के निचले हिस्से ही शेष बचे हैं। बाकि शरीर बुरी तरह जल गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक 90 प्रतिशत झुलस चुकी लड़की अस्पताल में चीखती रही और महिला इंस्पेक्टर के साथ उसका बयान लेने पहुँचे नायब तहसीलदार के सामने चिल्ला पड़ी। बयान देने के दौरान वह बार-बार कहती रही, “साहब मुझे बचा लो, मैं मरना नहीं चाहती।”

बेटी को इस हालत में देखकर उसके घरवाले भी खुद को सँभाल नहीं पा रहे थे। पुलिस ने उन्हें आश्वासन दिया है कि जल्द से जल्द आरोपित मूलचंद को गिरफ्तार कर सख्त से सख्त सजा दी जाएगी। घटना के बाद से आरोपित फरार है। उसके परिजन भी घर में ताला लगा गाँव से भाग गए हैं।

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चिलमखोर, दारूबाज, गुंडा… सुनिए किस जुबान में पीएम मोदी और अमित शाह को धमका रहा युवक

माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर एक यूजर ने टिक टॉक का एक वायरल वीडियो शेयर किया है। इसमें एक मजहब विशेष का युवक नागरिकता कानून और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजनशिप (NRC) का विरोध कर रहा है। वह पीएम नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ को न केवल धमकी दे रहा है बल्कि बेहद अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल भी कर रहा है।

वीडियो में युवक को यह कहते हुए सुना जा सकता है, “…तुम NRC और CAB लाकर हमें देश से बाहर नहीं कर सकते। उस समय सावरकर नहीं आए थे लड़ने के लिए, हमारे उलमाओं (इस्लामी विद्वानों) ने फाँसी का फंदा चूमा था।”

इसके बाद वो प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और उत्तर प्रदेश के सीएम को गाली देते हुए कहता है, “ये अमित शाह या मोदी के बाप का मुल्क नहीं है, जो NRC के जरिए हमें कह रहे हैं कि हम विदेशी हैं, घुसपैठिए हैं। 800 वर्षों तक हमने देश पर राज किया, लेकिन हमारी हड्डी में उबाल नहीं आया, लेकिन पाँच साल से तुम्हें सत्ता मिल गई है तो तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है।”

आगे वीडियो में वो भाषा की सारी गरिमा को लाँघते हुए यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को ‘चिलमखोर’ और पीएम मोदी और गृह मंत्री को ‘दारूबाज’ कहकर अपमानित करता है और कहता है, “अमित शाह देश का सबसे बड़ा गुंडा है, जो 6 महीने का तड़ीपार रहा है। इसलिए कोई बिल लाकर उसको देश से बाहर करना चाहिए…” फिर कहता है, “3000 से अधिक लोगों का नरसंहार करने वाले प्रधानमंत्री से क्या उम्मीद की जा सकती है। लेकिन बस एक ही संदेश देना चाहते हैं कि बहुत ज्यादे सनक में मत रहो, वरना अगर हम अपने पर आ गए तो भागने का रास्ता नहीं रहेगा…”

गौरतलब है कि नागरिकता (संशोधन) विधेयक बुधवार (दिसंबर 11, 2019) को राज्यसभा द्वारा और सोमवार (दिसंबर 9, 2019) को लोकसभा द्वारा पारित किया गया। गुरुवार (दिसंबर 12, 2019) को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा मंजूरी देने के बाद नागरिकता (संशोधन) विधेयक अब कानून बन गया है। इसके बाद पूरे देश में हिंदू शरणार्थी पीएम मोदी और अमित शाह को नागरिकता संशोधन विधेयक लाकर उनके अत्याचारों को समाप्त करने के लिए धन्यवाद दे रहे हैं, तो वहीं इन जैसे कट्टरपंथी देश भर में गलत सूचना और नफरत फैला रहे हैं। कुछ समूह द्वारा कई जगह पर हिंसा भी फैलाई जा रही है।

बता दें कि नागरिकता संशोधन बिल के कानून बनने के बाद पड़ोसी देश पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से धार्मिक उत्पीड़न के चलते आए हिन्दू, सिख, ईसाई, पारसी, जैन और बौद्ध धर्म को लोगों को भारतीय नागरिकता मिल पाएगी।

जामिया में मजहबी नारे ‘नारा-ए-तकबीर’, ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ क्यों लग रहे? विरोध तो सरकार का है न?