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‘रेप इन इंडिया’ पर घिरे राहुल गाँधी, स्मृति ईरानी बोलीं- बपौती नहीं देश की महिलाएँ

रेप इन इंडिया वाले बयान को लेकर कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी बुरी तरह फॅंस गए है। लोकसभा में उनके इस बयान पर शुक्रवार को काफी हंगामा हुआ। इसके बाद लोकसभा की कार्रवाई अनिश्चित काल के लिए स्थगित करनी पड़ी। इससे पहले केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी समेत कई महिला सांसदों ने राहुल गाँधी के बयान पर आपत्ति जताई और उनसे माँफी की माँग की। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी राहुल के बयान को आधार बनाकर पूछा है कि क्या ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करने वाले लोगों को सदन में आना चाहिए?

गौरतलब है कि झारखंड के राजमहल में गुरुवार को राहुल गाँधी ने चुनावी रैली को संबोधित करते हुए विवादित बयान दिया था। उन्होंने देश में बढ़ रही यौन उत्पीड़न की घटनाओं पर अपनी चिंता व्यक्त करते-करते प्रधानमंत्री पर आरोप लगाया था कि उन्होंने केंद्र की ‘मेक इन इंडिया’ को ‘रेप इन इंडिया’ बना दिया है। इससे वैश्विक स्तर पर देश की बदनामी हो रही है।

उनके इस बयान पर आज लोकसभा की कार्यवाही शुरू होते ही भाजपा सदस्यों ने आपत्ति जताई। प्रश्नकाल आरंभ होने से पहले ही भाजपा की कई महिला सदस्य अपने स्थान पर खड़ी हो गईं और राहुल गाँधी से माफी की माँग करने लगीं।

स्मृति ईरानी ने कहा, “गाँधी खानदान के सदस्य ने कहा है कि महिलाओं का बलात्कार होना चाहिए, देश में हर कोई बलात्कारी नहीं है। जो बलात्कारी है, उसे कानून सजा देता है। हर महिला को कलंकित नहीं किया जा सकता है, इस पर एक्शन लेना चाहिए।”

ईरानी ने कहा, “देश की महिलाएँ उनकी बपौती नहीं हैं, रेप इन इंडिया का बयान देने का जो दुस्साहस उन्होंने किया है, उस पर एक्शन होना चाहिए।”

राजनाथ सिंह ने भी जाहिर की नाराजी

राहुल गाँधी के रेप इन इंडिया के बयान को लेकर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सदन में अपना विरोध दर्ज कराते हुए कहा, “मैं आहत हूँ, पूरा देश आहत हुआ है, क्या ऐसे लोग सदन में आ सकते हैं जो ऐसे शब्द इस्तेमाल करते हैं? क्या उनको पूरा सदन ही नहीं, बल्कि पूरे देश से माफी नहीं माँगनी चाहिए?”

महिला सांसदों और रक्षा मंत्री के अलावा केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने भी इस बयान पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “राहुल खुलेआम कह रहे हैं कि रेप इन इंडिया, तो क्या वो दुनिया को भारत में आकर बलात्कार करने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं।”

वहीं, महिला भाजपा सांसद लॉकेट चटर्जी ने कहा,”मोदी जी ने कहा मेक इन इंडिया लेकिन राहुल गाँधी ने कहा रेप इन इंडिया, यानी वो स्वागत करते हैं उन लोगों का जो आएँ और बलात्कार करें। ये भारतीय महिलाओं और भारत माता का अपमान हैं।”

दरअसल, राहुल गांधी ने गुरुवार को झारखंड की मेहराना रैली में मोदी सरकार पर हमला बोलते हुए कहा था, “देश में नरेंद्र मोदी ने कहा था मेक इन इंडिया, अब जहाँ भी देखो वहाँ मेक इन इंडिया नहीं, बल्कि रेप इन इंडिया है। अखबार खोलो तो झारखंड में महिला से बलात्कार, यूपी में नरेंद्र मोदी के विधायक ने महिला का रेप किया…हर प्रदेश में हर रोज रेप इन इंडिया।”

गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी से पहले सदन में कॉन्ग्रेस नेता अधीर रंदन चौधपी ने भी ऐसा ही बयान दिया था। जहाँ उन्होंने भारत को रेप इन इंडिया बताया था। लेकिन काफी विरोध और आालोचनाएँ झेलने के बाद उन्होंने इस पर माफी माँग ली थी

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कानून बना CAB, बंगाल के बाद केरल और पंजाब ने भी कहा- लागू नहीं करेंगे

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा गुरुवार (12 दिसंबर) को ऐतिहासिक क़ानून को मंज़ूरी दिए जाने के बाद नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2019 अब एक क़ानून बन गया है। गुरुवार (12 दिसंबर) देर रात जारी अधिसूचना के मुताबिक़ यह क़ानून गजट प्रकाशन के साथ ही लागू हो गया। नया क़ानून नागरिकता अधिनियम 1955 में बदलाव करेगा। इसके तहत 31 दिसंबर, 2014 तक धर्म के आधार पर प्रताड़ना के चलते पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान से आए हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई शरणार्थियों को नागरिकता दी जाएगी।

विपक्ष के विरोध के बावजूद नागरिकता (संशोधन) विधेयक बुधवार (11 दिसंबर) को राज्यसभा द्वारा और सोमवार (9 दिसंबर) को लोकसभा द्वारा पारित किया गया। मौजूदा क़ानून के मुताबिक किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिकता लेने के लिए कम से कम 11 साल यहाँ रहना अनिवार्य था। नए कानून में पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों के लिए यह अवधि घटाकर 6 साल कर दी गई है। मौजूदा क़ानून के तहत भारत में अवैध तरीके से दाखिल होने वाले लोगों को नागरिकता नहीं मिल सकती थी और उन्हें वापस उनके देश भेजने या हिरासत में रखने के प्रावधान था।

यह क़ानून असम, मेघालय, मिज़ोरम और त्रिपुरा के आदिवासी क्षेत्रों पर लागू नहीं होगा जैसा कि संविधान की छठी अनुसूची में शामिल है। इसके अलावा, यह क़ानून इनर लाइन परमिट (ILP) के तहत आने वाले क्षेत्रों को भी कवर नहीं करेगा, जिसे बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन, 1873 के तहत अधिसूचित किया गया है। ILP शासन अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और मिज़ोरम में लागू है।

वहीं, पश्चिम बंगाल और केरल के बाद अब पंजाब ने भी कहा है कि यह क़ानून राज्य में नहीं लागू होगा। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने नागरिकता क़ानून को असंवैधानिक और देश को बाँटने वाला करार देते हुए इसे भारत की धर्मनिरपेक्षता पर सीधा हमला बताया। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार इस क़ानून को राज्य में लागू नहीं होने देगी।

केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन ने कहा कि केरल नागरिकता संशोधन विधेयक को स्वीकार नहीं करेगा। विजयन ने इस संशोधन को असंवैधानिक बताते हुए कहा कि केंद्र सरकार भारत को धार्मिक आधार पर बाँटने की कोशिश कर कर रही है। उन्होंने कहा कि वो इस क़ानून को राज्य में लागू नहीं होने देंगे।

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जली लाश प्रीति रेड्डी की ही, कपड़ों पर पाए गए सेमिनल मारे गए 4 दरिंदों के: DNA रिपोर्ट से पुष्टि

हैदराबाद में करीब 15 दिन पहले मिली जली हुई लाश की डीएनए रिपोर्ट आ गई। रिपोर्ट से पुष्टि हुई है कि जली लाश प्रीति रेड्डी (बदला हुआ नाम) की ही थी। लाश का डीएनए प्रीति रेड्डी के घरवालों से मैच कर गया है। साथ ही इस बात की भी पुष्टि हुई है कि उनके कपड़ों पर पाए गए सेमिनल के दाग उन्हीं चारों आरोपितों के थे, जिन्हें पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार डीएनए रिपोर्ट गुरुवार को आई। इसके बाद आधिकारिक रूप से इस बात का पुष्टि हो गई कि वो लाश प्रीति रेड्डी की ही थी। शव बरामद होने के बाद बॉडी की हड्डियों का DNA जाँच के लिए भेजा गया था। इसके अलावा पीड़िता के कपड़ों से सेमिनल सैंपल लिए गए थे। जाँच अधिकारियों को कुछ और रिपोर्ट का इंतज़ार है।

गौरतलब है कि 27 नवंबर को हैदराबाद के बाहरी इलाके शादनगर में एक युवती का अधजला शव बरामद हुआ था। उस शव की पहचान प्रीति रेड्डी के तौर पर हुई थी। प्रीति रेड्डी की गैंगरेप के बाद हत्या की गई और फिर लाश को जला दिया गया था। इस मामले में मोहम्मद पाशा, नवीन, चिंताकुंता केशावुलु और शिवा को गिरफ्तार किया गया था।

आरोपितों की गिरफ्तारी के बाद सोशल मीडिया पर लोग इन्हें जल्द से जल्द सजा दिलवाने की माँग कर रहे थे। घटना के 9 दिन के भीतर ही खबर आई कि हैदराबाद पुलिस ने इनका एनकाउंटर कर दिया है। आरोपितों को पुलिस घटनास्थल पर क्राइम सीन रिक्रिएट करने ले गई थी। वहाँ पुलिस का हथियार छीन आरोपितों ने भागने की कोशिश की और पुलिस कार्रवाई में मारे गए। सुप्रीम कोर्ट ने इस एनकाउंटर की जाँच के लिए तीन सदस्यीय आयोग का गठन किया है।

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नागरिकता संशोधन विधेयक कानून बन गया है। इसकी वजह से तीन देश पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान बहस के केंद्र में हैं। कभी सांस्कृतिक और वैचारिक तौर पर खुला मुल्क रहा अफगानिस्तान जब तालिबानी कठमुल्लों के शिकंजे में आया तो दड़बे में बदल गया। अल्पसंख्यकों की तो छोड़िए, बहुसंख्यकों पर भी तमाम तरह की बंदिशें थी। लेकिन, तालिबान के पतन के साथ ही अफगानिस्तान में बदलाव की हल्की-हल्की बयार बहने लगी है।

जिस देश में कुछ साल पहले तक संगीत हराम था, महिलाओं का बेपर्दा होना गुनाह था, आज वहॉं महिलाओं का एक पूरा ऑर्केस्ट्रा खड़ा हो गया है। लंदन से लेकर सिडनी तक उसकी धुनें सुनी जा रही है। यह ग्रुप है जोहरा।अफगानिस्तान नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ म्यूजिक ने 2015 में इसकी शुरुआत की थी। एक ऐसे देश में जहाँ औरतों को तालिबानी नियमों से हटकर कुछ भी करने पर पत्थर मार-मार कर खत्म करने का कानून रहा हो, ‘जोहरा’ की नींव बदलाव की बासंती बयार जैसी है।

तालिबान के डर से ऊपर उठी अफगान महिलाएँ

1996 से 2001 के बीच तालिबान के शासन में संगीत और लड़कियों को पढ़ाने, दोनों पर ही प्रतिबंध था। लेकिन, फिर भी अहमद सरमस्त ने लीक से परे हिम्मत जुटाई और अफगानिस्तान राष्ट्रीय संगीत संस्थान की स्थापना 2010 में की। इसकी सबसे पहली खासियत ये रही कि कट्टरता में जकड़े अफ्गानिस्तान में ये इकलौता संस्थान ऐसा है जहाँ लड़के और लड़कियाँ एक साथ पढ़ते हैं। इसी ने बाद में पहले महिला ऑर्केस्टा ‘जोहरा’ को जन्म दिया। इस समूह ने दावोस में विश्व आर्थिक मंच की बैठक के दौरान परफॉर्म कर अपने देश के कई मिथ्यों को तोड़ा। ग्रुप की 30 लड़कियों ने लंदन जाकर परफॉर्म किया।

अफगानिस्तान जैसे मुल्क में हुई ये बदलाव की हवा निश्चित ही आवश्यक थी। लेकिन कहा जाता है न कुरीतियों के प्रभाव से निकलने में बहुत कुछ झेलना पड़ता है, तो इस ऑर्केस्टा के शुरुआती समय में कुछ ऐसा ही हुआ। ग्रुप की कुछ लड़कियों को अपने ही परिवार का बहिष्कार झेलना पड़ा। इस सिम्फनी की दो कंडक्टरों में से एक नेगिन के पिता तो उनका साथ देते हैं। लेकिन उनके अलावा पूरा परिवार संगीत सीखने और ऑर्केस्ट्रा में शामिल होने के खिलाफ था। वह बताती हैं कि उनके कई रिश्तेदारों ने इसी वजह से उनके पिता से अपने संबंध तक तोड़ लिए।

संगीत में डूबी ‘जोहरा’ से जुड़ीं कलाकार

इन महिलाओं के मजबूत इरादों का प्रतिबिंब बन खड़ा हुआ ये ऑर्केस्टा टूटा नहीं। जैसा कि ऊपर जिक्र किया कि ‘जोहरा’ ने अपनी पहली विदेशी परफॉर्मेंस स्विट्जरलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक फोरम के दौरान दी। इसके बाद स्विट्जरलैंड और जर्मनी के चार अन्य शहरों में भी उन्होंने अपने संगीत का जादू बिखेरा। धीरे-धीरे पारंपरिक परिधानों में सजी इन लड़कियों के संगीत की महक पूरी दुनिया में फैल गई। ये ऑर्केस्टा पारंपरिक अफगान और पश्चिमी शास्त्रीय संगीत बजाता और लोग मुग्ध होकर इन्हें सुनते!

इस ऑर्केस्टा में 12 साल से 20 साल तक उम्र की 30 से ज्यादा लड़कियाँ हैं। इसका नाम “फारसी साहित्य में संगीत की देवी कही जाने वाले जोहरा के नाम पर रखा है।”

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि सरमस्त ने इस ऑर्केस्टा को खड़े करने के लिए बहुत जोखिम उठाए। प्रतिबंधों के बीच उम्मीद की लौ जलाने की लड़ाई बेहद मुश्किल थी। एक बार तालिबान के हमले में मरते-मरते बचे। दरअसल, 2014 में एक कंसर्ट के दौरान तालिबान के आत्मघाती हमलावर ने खुद को उड़ा लिया था। इस घटना में सरमस्त घायल हो गए थे, जबकि दर्शकों में शामिल एक जर्मन व्यक्ति की जान चली गई थी ।

इस ग्रुप की संयोजक जरीफा अबीदा भी यहाँ तक पहुँचने के बाद संघर्षों को याद करती हैं तो मन सिहर जाता है। जरीफा ने आपबीती बयां करते हुएबताया, “अफगानिस्तान एक ऐसा देश जहाँ औरतें जो संगीतकार, आर्टिस्ट या कंडक्टर हैं, उन्हें तालिबानी सड़कों पर जिंदा जला देते हैं या फिर पत्थरों से मार-मार कर हत्या कर देते हैं। मुझे हर रोज यह डर सताता था कि घर वाले मेरा स्कूल जाना बंद करवाकर मेरी शादी न करवा दें। 2014 में मैंने संगीत स्कूल एएनआईएम में दाखिला लिया। इस बारे में परिवार को भी नहीं बताया। हमारे यहाँ म्यूजिक सीखने वाली लड़कियों से लोग बेहतर सुलूक नहीं करते हैं।”

अफगानिस्तान की संगीत की विरासत 1000 साल पुरानी है। 1979 के सोवियत से लेकर 2001 तक के तालिबानी पहरे ने इस विरासत को जमींदोज करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इस दौरान इस मुल्क की महिलाओं ने, कलाकारों ने, संगीतकारों ने कई बार तालिबानी बर्बरता झेली। लेकिन आज अहमद, जरीफा और नेगिन के हौसले से इस विरासत की गूँज फिर से सुनाई पड़ रही है।

यकीनन, अफगानिस्तान में तालिबान का प्रभाव पूरी तरह खत्म अब भी नहीं हो पाया है। लेकिन उसके जख्मों पर ‘जोहरा’ का संगीत मरहम जैसा ही है। दुआ करिए बदलाव की बयार बनी जोहरा की बेटियों को फिर से कठमुल्लों की नजर न लगे।

13 दिसंबर: UP की बेटी के सामने आतंकी मंसूबे ढेर, HM की बेटी के लिए छोड़े 5 आतंकी

13 दिसंबर। इतिहास की कई बड़ी घटनाओं की गवाह है ये तारीख। भारत के नज़रिए से देखें तो आतंक की दो बड़ी घटना इसी तारीख से जुड़ी है। एक 13 दिसंबर 2001 को आतंक का साया लोकतंत्र के मंदिर की चौखट तक पहुँच गया था। वहीं, 13 दिसंबर 1989 को पॉंच आतंकी रिहा करने को सरकार मजबूर हो गई थी। दोनों घटना में एक और समानता है। 2001 में एक बेटी के कारण आतंकी अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो पाए थे, तो 1989 में एक बेटी की रिहाई की क़ीमत आतंकियों को आज़ाद कर चुकाई गई थी।

2001 में 13 अगस्त की सुबह देश की राजधानी के बेहद महफ़ूज़ माने जाने वाले इलाक़े में शान से खड़ी संसद भवन की इमारत में घुसने के लिए आतंकवादियों ने सफेद रंग की एम्बेसडर का इस्तेमाल किया। सुरक्षाकर्मियों को गच्चा दे अंदर दाखिल भी हो गए। लेकिन उनके क़दम लोकतंत्र के मंदिर को अपवित्र कर पाते उससे पहले ही सुरक्षा बलों ने उन्हें ढेर कर दिया।

1989 में आतंकवादियों ने जेल में बंद अपने कुछ साथियों को रिहा कराने के लिए देश के तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की पुत्री रुबिया सईद का अपहरण कर लिया था। सरकार ने 13 दिसंबर को आतंकवादियों की माँग को स्वीकार करते हुए पाँच आतंकवादियों को रिहा कर दिया।

संसद पर हमले के दौरान वीरगति को प्राप्त कमलेश कुमारी को उनकी बहादुरी के लिए अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। यह सम्मान प्राप्त करने वाली वो पहली भारतीय महिला कॉन्स्टेबल थीं। आइए जानते हैं जब देश की संसद पर आतंकियों की नापाक नज़र पड़ी तो कमलेश कुमारी ने उसे कैसे नाकाम किया।

13 दिसंबर 2001 को सुबह के 11:25 बजे थे। संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा था। सदन की कार्यवाही स्थगित हुए 40 मिनट बीते थे। तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी समेत क़रीब 200 सासंद संसद के अंदर थे। CRPF की महिला कॉन्स्टेबल कमलेश कुमारी गेट पर तैनात थीं। तभी अचानक सफेद अंबेसडर कार गेट नंबर-11 पर आ पहुँची। इसमें पाँच आतंकी AK-47 और हैंड ग्रेनेड से लैस थे। पाँचों आतंकियों ने चकमा देने के लिए सेना की वर्दी पहन रखी थी, लेकिन जैसे ही वो गेट नंबर-11 पर आए, वो कमलेश कुमारी की पैनी नज़र को धोखा नहीं दे पाए। पाँचों आतंकी जब गाड़ी से उतरकर संसद में घुसने लगे, तो कमलेश कुमारी को उनके आतंकी होने पर शक़ हो गया।

परंपरागत तौर पर संसद भवन में तैनात होने वाली महिला जवानों के पास हथियार नहीं होता। कमलेश के पास भी हथियार नहीं थे। हाथों में एक वॉकी-टॉकी था। उन्होंने बिना एक क्षण की देरी किए ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना शुरू कर दिया। अपने साथी कॉन्स्टेबल सुखविंदर सिंह अलर्ट कर दिया और आतंकियों के संसद में घुसने की जानकारी दे दी। कमलेश कुमारी की आवाज़ एक आतंकी के कान तक भी पहुँची। उसने कमलेश कुमारी पर गोलियों की बौछार कर दी। 11 गोलियों से ज़ख़्मी हुईं कमलेश कुमारी ने तब भी हिम्मत नहीं छोड़ी और अलॉर्म बजाकर सभी को आतंकी हमले से सचेत कर दिया। इसके बाद पूरे संसद की सुरक्षा मशीनरी अलर्ट मोड पर आ गई। 

वहीं, उनके साथी सुखविंदर सिंह ने दौड़कर संसद भवन के अंदर जाने के सभी गेट बंद कर दिए। तब तक पूरे संसद भवन में आतंकी हमले का हल्ला मच चुका था। इस दौरान आतंकियों और सुरक्षाबलों के बीच 45 मिनट तक मुठभेड़ हुई। इस दौरान, सुरक्षाकर्मियों ने पाँच आतंकियों को मार गिराया था। हमले के बाद 15 दिसंबर 2001 को दिल्ली पुलिस ने आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सदस्य और इस हमले के मास्टरमाइंड अफ़जल गुरू को जम्मू-कश्मीर से पकड़ लिया था।

कमलेश को गोली मारने वाले आतंकी को जवान सु​खविंदर सिंह ने मार गिराया था। एक मीडिया रिपोर्ट में सुखविंदर के हवाले से बताया गया है, “उन्होंने फिदायीन हमलावर को लेकर सिक्योरिटी को अलर्ट कर दिया। लेकिन वह निहत्थी थीं और खुले में होने के कारण उसकी आवाज़ आतंकी के कानों तक भी पहुॅंची। इससे पहले कि हमारी तरफ से कोई प्रतिक्रिया दी जाती उस आतंकी ने उनके पेट में गोली मार दी। यह आतंकी संसद के भीतर घुसने की फिराक में था।” यदि उस आतंकी पर कमलेश की नज़र नहीं पड़ती, उसे मार गिराया नहीं जाता और वह ख़ुद को उड़ा लेता तो नुक़सान कहीं ज़्यादा होता।

बहादुर कॉन्स्टेबल कमलेश कुमारी की ममता पर उनकी कर्तव्यपरायणता भारी पड़ गई। उन्होंने अपनी दो छोटी बेटियों की भी परवाह किए बिना आतंकियों से लोहा लिया। 11 गोलियाँ खाईं, मगर अपनी ज़िम्मेदारी को पूरी ईमानदारी और तत्परता से निभाया। जब संसद पर हमले की घटना हुई उस वक्त कमलेश की बड़ी बेटी ज्योति नौ साल की थी तो छोटी बेटी श्वेता महज डेढ़ साल की थी। इस समय उनकी दोनों बेटियाँ 24 और 17 साल की हो चुकी हैं। ज्योति ने फतेहगढ़ के महिला डिग्री कॉलेज से बीएससी किया है। कमलेश कुमारी का परिवार फर्रुखाबाद के आवास विकास कॉलोनी में रहता है। दोनों बेटियाँ अपने नाना राजाराम और पिता अवधेश के साथ रहतीं हैं।

बलिदानी कमलेश कुमारी के बारे में उनके परिजन बताते हैं कि उन्हें बचपन से ही वर्दी से प्यार था। उनका यह सपना शादी के बाद 1994 में पूरा हुआ, जब उन्हें रैपिड एक्शन फ़ोर्स में इलाहाबाद में तैनाती मिली। जुलाई, 2001 में संसद सत्र के दौरान उनकी तैनाती संसद की सुरक्षा में की गई थी।

इधर, मुफ्ती मोहम्मद सईद का परिवार आज भी राजनीति में सक्रिय है। सईद अब इस दुनिया में नहीं रहे। उनकी राजनीतिक विरासत बेटी महबूबा मुफ्ती के हाथों में है। वे जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। उनकी बहन रूबिया सार्वजनिक चर्चाओं से दूर रहती हैं। दैनिक भास्कर की 2016 की एक रिपोर्ट के मुताबिक पेशे से डॉक्टर रूबिया चेन्नई में अपने पति और दो बेटों के साथ रहती हैं। उनके परिवार को वहॉं भी सुरक्षा मिली हुई है।

जहाँ से मुश्किल मोर्चे ले रहे अमित शाह, वहीं से मुफ्ती मोहम्मद सईद ने टेके थे घुटने!

नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक भारतीय सत्ता के दो सबसे मह​त्वपूर्ण केंद्र हैं। राष्ट्रपति भवन के दोनों ओर स्थित इन इमारतों में बैठे लोगों के पास सत्ता के तमाम सूत्र होते हैं। नॉर्थ ब्लॉक में ही गृह मंत्रालय है, जिसके मुखिया आजकल अमित शाह हैं। इसी साल मई में मंत्री पद की शपथ लेने वाले शाह ने जब से गृह मंत्रालय का कामकाज सॅंभाला है, यह महकमा लगातार सुर्खियों में बना हुआ है।

इसकी वजह है, उन मुद्दों पर फैसला लेना जो सालों से लंबित पड़े थे। मसलन, जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करना। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यक शरणार्थियों को नागरिकता देने का रास्ता प्रशस्त करना। रोहिंग्या या एनआरसी के मुद्दे पर स्टैंड लेना। वगैरह…।

इन फैसलों ने शाह को आजाद भारत का दूसरा सबसे चर्चित गृह मंत्री बना दिया है। रियासतों का विलय कराने के कारण देश के पहले गृह मंत्री सरदार पटेल आज तक याद किए जाते हैं। पटेल से शाह के बीच दो दर्जन से ज्यादा लोग नॉर्थ ब्लॉक के इस दफ्तर में बैठ चुके हैं, पर शायद ही आपको उनका नाम याद हो। मेरी इस मान्यता की एक बड़ी वजह एक हालिया घटना है। हाल ही में जब मनमोहन सिंह ने पूर्व प्रधानमंत्री न​रसिम्हा राव के गृह मंत्री के कार्यकाल का हवाला देकर 1984 में हुए सिखों के नरसंहार का दोष उनके मत्थे मढ़ा तो कई लोग यह जानकर ही भौंचक रह गए थे कि राव कभी देश के गृह मंत्री भी हुआ करते थे। वैसे यह जिम्मेदारी शास्त्री, इंदिरा, चरण सिंह, मोराराजी जैसे कद्दावर नेता भी सॅंभाल चुके हैं।

शिवराज पाटिल जैसे कुछ लोगों के कार्यकाल की चर्चा भी कभी-कभार होती है। लेकिन, उसका कारण मुंबई हमले के वक्त हर घंटे सूट बदलकर नजर आने का पाटिल का कारनामा रहा है। वीपी सिंह की सरकार में यह मकहमा जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे मुफ्ती मोहम्मद सईद के पास था। लेकिन, यह कार्यकाल उनके दामन पर ऐसे दाग लगा गया जो कभी नहीं धुला।

हुआ कुछ यूॅं था कि दो दिसंबर 1989 को प्रधानमंत्री बनते ही वीपी सिंह ने सईद को गृह मंत्रालय की बागडोर सौंपी। इसके 6 दिन बाद (8 दिसंबर 1989) को जेकेएलफ ने सईद की बेटी रूबिया को अगवा कर लिया। 122 घंटे बाद रूबिया रिहा की गईं। बदले में सरकार ने 13 दिसंबर को 5 आतंकियों को आजाद कर दिया। उसी रात विशेष विमान से रूबिया सईद को दिल्ली लाया गया था। इसके बाद सईद ने कहा था- एक पिता के रूप में मै खुश हूॅं, लेकिन एक राजनेता के रूप में मैं समझता हूॅं कि ऐसा नहीं होना चाहिए था।

पर उस वक्त अंदरखाने क्या चल रहा था इसके संकेत सईद के साथ वीपी सिंह की कैबिनेट में रहे आरिफ मोहम्मद खान के एक इंटरव्यू से लगाया जा सकता है। खान फिलहाल केरल के राज्यपाल हैं। उन्होंने इसी साल अगस्त में संडे गार्डियन को एक इंटरव्यू दिया था। इस साक्षात्कार में खान ने सईद की भूमिका पर सवाल उठाए थे।

इससे संकेत मिलते हैं कि सईद ने न केवल अपनी बेटी रूबिया को अगवा करने वाले आतंकियों को बचाया था, बल्कि उनके दबाव में ही सरकार को पॉंच आतंकी छोड़ने पड़े थे। बकौल खान रूबिया को अगवा करने की खबर मिलने के बाद उन्हें और उस सरकार के एक और मंत्री इंद्र कुमार गुजराल (जो बाद में पीएम भी बने) को श्रीनगर भेजा गया। खान ने बताया कि उस समय जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे फारूक अब्दुल्ला आतंकियों को छोड़े जाने के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने केंद्र सरकार को आगाह करते हुए कहा था कि यह भारी भूल साबित होगी। खान के अनुसार अपहरणकर्ताओं में से एक के पिता ने अब्दुल्ला को यकीन दिलाया था कि रूबिया को कुछ नहीं होगा। लेकिन, सईद ने जस्टिस एमएल भट्ट के मार्फत अपहरणकर्ताओं तक संदेशा भिजवाया कि केंद्र सरकार उनकी मॉंग मानकर पॉंच आतंकियों को रिहा करने के लिए तैयार है।

खान ने इंटरव्यू में बताया है, “मुफ्ती ने जस्टिस भट्ट के मार्फत सूचना क्यों लीक की? मुझे नहीं पता कि इसके पीछे उनका क्या मकसद था। लेकिन जब मैं कश्मीर से लौटा तो भट्ट को मुफ्ती के घर पर देखा। मुझे बताया गया कि वे यहॉं 5-6 दिन से हैं। रूबिया के अगवा होने के अगले दिन वे दिल्ली पहुॅंचे थे और अपहरणकर्ताओं के साथ लगातार संपर्क में थे।”

साभार: sundayguardianlive.com

खान के अनुसार उन्होंने सईद को इस घटना के बाद इस्तीफा देने की भी सलाह दी थी। साथ ही उन्होंने बताया कि रूबिया के छोड़े जाने से पहले ही पॉंचों आतंकी रिहा कर दिए गए थे। खान के अनुसार कश्मीर में हर किसी का मानना था कि अपहरणकर्ता रूबिया के साथ कुछ गलत नहीं करेंगे। ऐसा करने पर जनभावनाएँ उनके खिलाफ हो सकती थी। ऐसे में यह मानना है मुश्किल है कि सईद जो खुद कश्मीरी थे और युवावस्था से ही वहॉं की राजनीति में सक्रिय थे उन्हें इस बात का अंदाजा न रहा हो।

इन आतंकियों की रिहाई के बाद कश्मीर के आतंकवाद का कैसा दौर देखा, कश्मीर पंडितों को किस तरीके से पलायन करना पड़ा ये सब आप जानते ही हैं।

भाई के साथ स्कूल जा रही थी 15 वर्षीय छात्रा, कब्रिस्तान की झाड़ियों में घसीटकर ले गए 3 युवक

उत्तरप्रदेश के बरेली जिले के हाफिजगंज थाना क्षेत्र में गुरुवार (दिसंबर 12,2019) को स्कूल जा रही छात्रा से गैंगरेप की कोशिश की गई। हालाँकि, छात्रा के चिल्लाने के कारण आरोपित अपने मनसूबों में सफल नहीं हो पाए और गाँव वालों ने मौक़े पर पहुँच कर उनको पकड़ लिया। लेकिन, बावजूद इसके, मामला दो समुदायों से जुड़ा होने के कारण पूरे गाँव में तनाव का माहौल का है। मौक़े पर पहुँची पुलिस ने दो युवकों को गिरफ्तार कर लिया है। एक फरार है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 15 साल की बच्ची हाफिजगंज के ग्राम कमुआ में एक हाईस्कूल की छात्रा है। जो गुरुवार को अपने स्कूल जा रही थी। इस दौरान उसका भाई उसके साथ था, लेकिन वो पीछे चल रहा था। तभी गाँव के तीन युवकों की नजर उस पर पड़ी और वे उसे कब्रिस्तान की झाड़ियों में घसीट कर ले गए। यहाँ उन्होंने उसके साथ गैंगरेप करने की कोशिश की।

इसी बीच छात्रा ने शोर मचा दिया। जिससे उसके पीछे चल रहे भाई और अन्य ग्रामीणों ने उसकी आवाज सुन ली। लोगों को नजदीक आता देख, एक आरोपित वहाँ से भागने में सफल रहा, लेकिन अन्य दो को ग्रामीणों ने पकड़ लिया। मामले की सूचना तुरंत पुलिस को दी गई और मौक़े पर दोनों आरोपितों की गिरफ्तारी हुई। अब इस मामले में पुलिस तीसरे आरोपित को ढूँढने का प्रयास कर रही है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार हाफिजगंज थाना के एसएचओ सुरेश पाल ने इस संबंध में बताया, “हमने दो आरोपितों को हिरासत में ले लिया है, जिनकी उम्र 18 के करीब है। लड़की के परिवार वालों की लिखित शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामले में एफआईआर दर्ज कर ली है। हालाँकि, पहले अपनी शिकायत में परिवारवालों ने आरोपितों का नाम नहीं बतया था, लेकिन बाद में नामजद शिकायत दर्ज कराई गई।”

बता दें, इस मामले में अभी आरोपितों के नाम का खुलासा नहीं हो पाया है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि मामला दो समुदाय से संबंधित हैं। इसके कारण गाँव में तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

गौरतलब है कि पिछले 24 घंटों में ये ऐसा दूसरा मामला है, जहाँ एक स्कूल छात्रा को स्कूल जाते-आते समय उत्पीड़ित करने का प्रयास किया गया हो। इससे पहले बिहार के मीरगंज में भी मनचलों के समूह ने एक 9वीं कक्षा की छात्रा को घर आते समय पकड़ लिया था। जिसके बाद गाँव वालों की मदद से उसे छुड़ाया गया। इस मामले में भी पुलिस ने अज्ञातों के ख़िलाफ़ FIR दर्ज की थी और फिलहाल उन्हें ढूँढने का प्रयास जारी है।

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भारतीय पासपोर्ट पर कमल निशान देख भड़की कॉन्ग्रेस, कहा- भाजपा देश का भगवाकरण कर रही है

हम सब ने बचपन में “राष्ट्रीय पशु”, “राष्ट्रीय पक्षी”, “राष्ट्रीय नदी” आदि के साथ-साथ “राष्ट्रीय पुष्प” भी पढ़ा होगा। जिन्होंने पढ़ा होगा, उन्हें यह पता होगा कि कमल सत्तारूढ़ राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी का चुनावी निशान होने के पहले राष्ट्रीय पुष्प है।

इसके बावजूद नागरिकता विधेयक जैसे महत्वपूर्ण विषय पर संसद में चल रही गंभीर चर्चा के बीच कॉन्ग्रेस के कोझिकोड सांसद एम के राघवन को संसद में इस बात पर चर्चा करना, प्रश्न पूछना बहुत ज़रूरी लगा कि कहीं भाजपा पासपोर्टों पर कमल छाप कर देश का भगवाकरण तो नहीं कर रही है।

राघवन ने यह मुद्दा कल (बुधवार, 11 दिसंबर, 2019 को) संसद के शून्यकाल में उठाया। यही नहीं, उनके सुर में सुर मिलाते हुए लोक सभा में कॉन्ग्रेस के संसदीय दल के अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने मामले पर सदन में मौजूद विदेश मंत्री एस जयशंकर से सफाई माँगनी भी शुरू कर दी। पार्टी साथ ही में इन वितरित पासपोर्ट बुकलेटों को वापस लिए जाने की भी माँग करने लगी।

लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला को चौधरी को यह याद दिलाना पड़ा कि ऐसे बिना किसी नोटिस के वे विदेश मंत्री से जवाब नहीं माँग सकते, और वरिष्ठ सांसद होने के नाते चौधरी को ये बात खुद से पता होनी चाहिए थी। इसके बाद भी चौधरी अड़े रहे।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इसके बाद चौधरी के रवैये की विपक्ष में ही आलोचना होने लगी। बीजू जनता दल (बीजद) के सांसद भर्तृहरि महताब ने उन्हें नसीहत दी कि कॉन्ग्रेस सदन को हाईजैक नहीं कर सकती। बीजद के एक अन्य सदस्य ने कहा कि ऐसे झटके में बिना नोटिस के जवाब देने के बारे में विदेश मंत्री से केवल निवेदन हो सकता है, ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं।

उस समय तो जयशंकर ने जवाब नहीं दिया, लेकिन अगले दिन यानि आज (12 दिसंबर, 2019 को) विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने तसल्ली से इस मुद्दे पर वक्तव्य जारी किया। रवीश कुमार ने याद दिलाया कि देश का इकलौता प्रतीक चिह्न अशोक स्तम्भ ही नहीं है। मंत्रालय की नियमित प्रेस ब्रीफिंग के दौरान इस विषय को सम्बोधित करते हुए कहा, “यह प्रतीक हमारा राष्ट्रीय फूल है और फर्जी पासपोर्ट को पहचानने के लिए सिक्यॉरिटी फीचर मजबूत करने का एक कदम है।”

उन्होंने यह भी कहा कि यह सिक्योरिटी फीचर अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (आईसीएओ) के दिशानिर्देश पर पेश किया गया है, और देश के सभी प्रतीक चिह्नों का बारी-बारी से प्रयोग किया जाएगा।

नागरिकता विधेयक के विरोध में हिंसा: भाजपा नेता का घर फूँका, गुवाहाटी की आग शिलॉन्ग पहुँची

नागरिकता विधेयक संसद के दोनों सदनों से पास हो जाने के बाद इसके विरोधियों ने हिंसात्मक रुख अख्तियार कर लिया है। विशेषतः पूर्वोत्तर में जातीय, भाषाई और जनजातीय अलगाववादी कारणों से हो रहा विरोध इतना तेज़ हो गया है कि असम के गुवाहाटी में लोग कर्फ़्यू तोड़कर हिंसा और आगजनी पर उतारू हैं। सेना को भी फ्लैग मार्च करना पड़ रहा है।

हिंसा के निशाने पर मुख्यतः भाजपा, असम गण परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हैं, जिनके कार्यालयों पर आज (गुरुवार, 12 दिसंबर, 2019 को) हमले हुए। दंगाईयों ने भाजपा विधायक और नेता बिनोद हज़ारिका के घर पर भी आगजनी की। डिब्रूगढ़ जिले के चबुआ विधानसभा क्षेत्र के प्रतिनिधि हज़ारिका के घर के आसपास खड़ी सभी गाड़ियों को भी आग के हवाले कर दिया गया है।

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इसके अलावा गुवाहाटी में पुलिस को भीड़ को काबू में करने के लिए गोलीबारी भी करनी पड़ी है, जिसके चलते दो हिंसक प्रदर्शनकारियों की मौत भी हो गई। गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज के एक अधिकारी के हवाले से पीटीआई ने दावा किया है कि मृतकों में से एक की मौत अस्पताल पहुँचने के पहले ही हो चुकी थी, जबकि दूसरे ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया है। दोनों की शिनाख्त की सूचना खबर लिखे जाने तक नहीं मिली है।

लोगों की उत्तेजना शांत करने के लिए मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने वीडियो संदेश जारी कर लोगों से अपील की कि वे असमिया संस्कृति, ज़मीनी अधिकार, भाषा आदि पर किसी तरह के खतरे की चिंता न करें, क्योंकि इन सब को सुरक्षित करने के लिए असम समझौते की धारा 6 है। कुछ लोग इसके बारे में झूठ फैला रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी आज सुबह से ही ट्वीट कर लोगों से यही कहा। मोदी ने असम के लोगों को आश्वस्त किया है कि वह और उनकी सरकार असमिया लोगों के हितों की रक्षा करेंगे।

असम के उपमुख्यमंत्री हेमंत बिस्व शर्मा भी असम के लोगों को यह समझाने का अनथक प्रयास कर रहे हैं कि यह विधेयक जनसांख्यिकीय संतुलन को बिगाड़ने नहीं, बल्कि संभाल कर रखने के लिए है। “मुझे दृढ़ विश्वास है कि अगर यह विधेयक नहीं पास हुआ तो असमिया हिन्दू महज़ अगले 5 साल में अल्पसंख्यक बन जाएँगे। यह उन तत्वों के लिए फ़ायदेमंद होगा जो असम को एक और कश्मीर बनाना चाहते हैं।”

शिलॉन्ग में भी आज शाम अराजक प्रदर्शनकारियों ने मोटफ्रान के बीचोंबीच टायर जलाए और पुलिस पर पत्थरबाज़ी की। वहाँ भी कर्फ़्यू लगने के आसार पैदा हो रहे हैं।

’93 के बम धमाके में शरद पवार ने आतंकियों को बचाने के लिए बोला था एक झूठ, बम को ‘साउथ इंडियन आतंकियों’ वाला भी बताया’

भारत के वरिष्ठतम नेताओं में से एक शरद पवार ने 1993 मुंबई बम ब्लास्ट के दौरान कुछ ऐसा किया था, जो आप सोच नहीं सकते। उस दौरान उन्होंने झूठ बोला था, वो भी सिर्फ़ कथित तौर पर सांप्रदायिक सौहार्द्र को बरकरार रखने के लिए। उस समय महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे पवार ने मजहब विशेष को भी पीड़ित दिखाने के लिए बम ब्लास्ट्स की संख्या बढ़ा दी थी। दूसरे शब्दों में कहें तो उन्होंने एक अतिरिक्त बम ब्लास्ट की ‘खोज’ कर ली थी, जो असल में हुआ ही नहीं था। भले ही आपको यह अविश्वसनीय लगे लेकिन यही सच है। 12 मार्च 1993 को मुंबई को दहलाने वाले 12 सीरियल बम धमाके हुए, जिसके बाद महानगर में अराजकता फ़ैल गई और लोगों में भारी खलबली मच गई।

ये ऐसा पहला आतंकी हमला था, जब भारत में आरडीएक्स का इस्तेमाल किया गया हो। 26/11 तरह ये हमले भी पूर्व नियोजित थे और इन्हें काफी प्लानिंग के बाद अंजाम दिया गया था। उन ब्लास्ट्स में 300 के क़रीब लोग काल के गाल में समा गए थे, वहीं 1400 के क़रीब लोग घायल हुए थे। यह भारत की ज़मीन पर आतंकी हमलों में हुई अब तक की सबसे बड़ी क्षति है। इस घातक आतंकी हमले में शिवसेना दफ़्तर को भी निशाना बनाया गया था।

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार ने हमलों के तुरंत बाद दूरदर्शन स्टूडियो में जाकर बोला था और घोषणा की थी कि कुल 13 धमाके हुए हैं। उन्होंने न जाने कहाँ से एक अतिरिक्त विस्फोट की ‘खोज’ कर ली थी। पवार ने कहा था कि मस्जिद बंदर में 13वाँ विस्फोट हुआ था। चूँकि इस हमले में हिन्दू बहुल क्षेत्रों को निशाना बनाया गया था, ऐसे में पवार ने मस्जिद में विस्फोट की कहानी गढ़ी ताकि कथित अल्पसंख्यक समुदाय को भी पीड़ित की तरह पेश किया जा सके। वास्तव में, सभी 12 धमाके हिन्दू बहुल इलाक़े में किए गए थे। पवार ने ऐसा झूठ इसलिए भी बोला था ताकि आतंकियों को बचाया जा सके, बल्कि बम को ‘साउथ इंडियन आतंकियों’ वाला भी बताया।

पवार ने दावा किया था कि उनके इस झूठ के लिए उनकी प्रशंसा की गई थी। एनसीपी सुप्रीमो ने इस हमले में मजहब विशेष को बराबर पीड़ित दिखाने व सच्चाई को दबाने के लिए झूठ का सहारा लिया था। ऐसा स्वयं पवार ने स्वीकार किया था। उन्होंने इसे ‘संतुलन’ के लिए किया गया प्रयास बताया था। हमले के 22 वर्षों बाद पवार ने पुणे में आयजित 89वीं मराठी साहित्यिक बैठक को सम्बोधित करते हुए स्वीकार किया था कि उन्होंने जानबूझ कर एक अतिरिक्त बम ब्लास्ट की कहानी गढ़ी ताकि समुदाय विशेष को पीड़ित दिखा कर सांप्रदायिक तनाव से बचा जाए क्योंकि ‘पाकिस्तान ऐसा ही चाहता था’। उन्होंने कहा कि उन्हें भी यह पता था कि ये सभी धमाके हिन्दू बहुल क्षेत्रों में हुए थे।

पवार ने कहा कि उन्होंने दूरदर्शन स्टूडियो जाकर ऐसा कहा क्योंकि यह सांप्रदायिक तनाव की स्थिति को बचाने के लिए सही था। वे लोगों को इस बात का एहसास दिलाना चाहते थे कि मजहब विशेष वाले भी इस विस्फोट के शिकार हुए हैं। उन्होंने दावा किया कि न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण आयोग द्वारा उनके इस क़दम की सराहना की गई थी। यहाँ तक की पवार ने उस हमले का दोष लिट्टे पर भी मढ़ा था। उन्होंने साम्प्रदायिक दंगे रोकने के लिए ऐसा करने का दावा किया। 78 वर्षीय पवार भारत सरकार में केंद्रीय रक्षा व कृषि मंत्री रह चुके हैं। अभी हाल ही में उन्होंने आगामी लोकसभा चुनाव न लड़ने का ऐलान किया है।

12 मार्च 1993 में इन स्थानों पर धमाके हुए थे- मुंबई स्टॉक एक्सचेंज, नरसी नाथ स्ट्रीट, शिव सेना भवन, एयर इंडिया बिल्डिंग, सेंचुरी बाज़ार, माहिम, झावेरी बाज़ार, सी रॉक होटल, प्लाजा सिनेमा, जुहू सेंटॉर होटल, सहार हवाई अड्डा और एयरपोर्ट सेंटॉर होटल। इस धमाके का साज़िशकर्ता दाऊद इब्राहिम और टाइगर मेमन था। इसकी पूरी साज़िश पाकिस्तान में रची गई थी। उस दिन को आज भी ब्लैक फ्राइडे के नाम से जाना जाता है।