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Tik-Tok के चलते मंजू-मनीषा की तवे से पीटकर हत्या: शोएब अहमद, गुलाम मुस्तफा गिरफ्तार

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पढ़ने आई दो बहनों को उनके कमरे में घुसकर बेरहमी के साथ दिनदहाड़े कत्ल कर दिया गया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, डबल मर्डर की ये सनसनीखेज वारदात रायपुर के टिकरापारा क्षेत्र की है। जहाँ गोदावरी नगर इलाके में रहकर रायगढ़ निवासी दो सगी बहनें पैरामेडिकल की पढ़ाई कर रही थीं। उनमें से मंजू पैरामेडिकल की छात्र थी तो दूसरी बहन मनीषा बीएससी नर्सिंग की पढ़ाई कर रही थी। दोनों वहाँ किराए के एक मकान में रहती थीं।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, एसएसपी आरिफ शेख ने हत्याकांड का खुलासा करते हुए बताया कि रायपुर के टिकरापारा थाना क्षेत्र अंतर्गत मोती नगर के गोदावरी नगर में एक निजी हॉस्टल में रहकर नर्सिंग की पढ़ाई कर रही दो बहनों की मंगलवार (10 दिसंबर 2019) की सुबह निर्ममतापूर्वक हत्या कर दी गई थी। इसमें हमलावरों ने दोनों बहनों पर तवे से ताबड़तोड़ प्रहार किया था।

मीडिया रिपोर्ट के हवाले से, एसएसपी आरिफ शेख के मुताबिक मृतक युवतियों में से एक ने सोशल मीडिया पर किसी दूसरे युवक से साथ टिक टॉक वीडियो बनाकर डाल दिया था। इस बात से मुख्य आरोपित सैफ (शोएब अहमद अंसारी) काफी नाराज हो गया। उसने युवती को उसी समय जान से मारने की धमकी भी दे दी थी। उन्होंने बताया कि इस डबल हत्याकांड के मुख्य आरोपित सैफ ने उसी समय युवती की हत्या की प्लानिंग कर ली थी।

रिपोर्ट्स के अनुसार, बताया जा रहा है कि मंगलवार को आरोपित सैफ अपने एक दोस्त के साथ युवती से मिलने पहुँचा था। इसी दौरान उन दोनों में इस टिकटॉक वीडियो को लेकर विवाद हुआ। झगड़ा इतना बढ़ गया कि आरोपी सैफ ने कमरे में रखे तवे से युवती पर ताबड़तोड़ हमला कर दिया। इस दौरान युवती की बहन भी कमरे में मौजूद थी। उसने बीच बचाव करने की कोशिश की। दोनों आरोपितों ने उस पर भी तवे से हमला कर दिया। कहा जा रहा है दोनों युवतियों को खून से लथपथ छोड़कर आरोपित फरार हो गए थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, शोर सुनकर हॉस्टल के अन्य कमरे में रहने वाली दूसरी छात्राओं ने घटना की जानकारी हॉस्टल मालिक इंद्रचंद साहू को दी। जब वह मौके पर पहुँचे तो दो हमलावर उस समय कमरे में ही मौजूद थे। उन्हें देखते ही वे दरवाजा खोलकर धक्का मारकर भाग निकले।

मकान मालिक ने आसपास के लोगों की मदद से घायल बहनों को आंबेडकर अस्पताल पहुँचाया गया। जहाँ डॉक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार दावा यह भी है कि मृतकों में से एक युवती ने आरोपी सैफ से शादी भी कर ली थी। शादी के बाद से वो युवती को परेशान करने लगा था। उसने इस बात की शिकायत रायपुर पुलिस से भी की थी। लेकिन इसके बाद दोनों को समझौता हो गया था। कहा तो यह भी जा रहा है कि पिछले एक साल से आरोपित युवक सैफ युवती को परेशान कर रहा था।

हत्या के बाद से ही पुलिस लगातार छापे-मारे कर रही थी। पुलिस को CCTV कैमरे से आरोपितों के हुलिया का पता लग गया था। और आज पुलिस ने तीनों आरोपितों को सतना से गिरफ्तार कर लिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, रायपुर में दो बहनों की हत्या करने के मामले में एक नाबालिग सहित तीन आरोपितों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। मुख्य आरोपित शोएब अहमद अंसारी (25) उर्फ सैफ पिता इकबाल अंसारी, गुलाम मुस्तफा (18) पिता शेख अब्दुल को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। उनसे पूछताछ जारी है।

CAB के बाद अहमदियों की चिंता में डूबे ‘लिबरल्स’ तब कहाँ थे जब ओवैसी ने उन्हें अपने मजहब का ही नहीं माना

आज नागरिकता विधेयक में अड़ंगा लगाने के लिए हर क़ानूनी, मज़हबी, राजनीतिक पैंतरा आज़मा रहे अकबरुद्दीन ओवैसी के इतिहास में झाँकें तो तस्वीर एकदम बदल जाती है। आज जिन पाकिस्तान के ‘बेचारे’, सताए जा रहे अहमदियों की उन्हें इतनी चिंता हो रही है, कल तक वे उन्हें मजहब का अनुयाई मानने के लिए भी तैयार नहीं थे।

भारत में मौजूद मुट्ठी-भर अहमदियों की इस्लामियों में गिनती को रोकने की उन्होंने हरसंभव कोशिश की, ताकि भारत में कथित अल्पसंख्यकों की आधिकारिक जनसंख्या कम होने का हवाला देकर अल्पसंख्यक राजनीति का खेल खेलने में आसानी हो।

जुलाई, 2008 में आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वाईएसआर राजशेखर रेड्डी से मिलने भी ओवैसी मुसलअपने मजहब के लोगों के एक झुण्ड के साथ गए थे। उनकी माँग थी कि उनके गढ़ हैदराबाद में अहमदियों को रैली करने की अनुमति न हो। न केवल उन्होंने मुख्यमंत्री से यह माँग रखी बल्कि खबरें यह भी दावा करतीं हैं कि उनकी पार्टी के मुख्यालय में हुई मुलाकात में मजहबी गुटों ने रैली स्थल पर भी हमले की तैयारी कर ली। अंततः वाईएसआर ने उनकी बात मान ली, और अहमदियों को पुलिस ने रैली की अनुमति नहीं दी।

इन घटनाओं से यह बात साफ़ हो जाती है कि भारत के समुदाय विशेष में अहमदियों के लिए ऐसी कोई ख़ास सहानुभूति, यानि उनके लिए ऐसा कोई भाईचारा है नहीं जैसा नागरिकता विधेयक के संदर्भ में दिखाया जा रहा है- ओवैसी में तो बिलकुल नहीं।

इसके अलावा भारत सरकार ने इस्लाम के भीतर के विभाजन और भेदभाव को दूर करने का नहीं ले रखा है। अहमदिया चाहे मजहब द्वारा जितने भी सताए हों, वे अंत में इस्लाम में बने ही रहना चाहते हैं, मजहबी ही कहलाना चाहते हैं।

(मूलतः अंग्रेजी में प्रकाशित के भट्टाचार्जी के इस लेख का हिंदी रूपांतरण मृणाल प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव ने किया है।)

गवाही दी तो अंजाम उन्नाव कांड से भी भयंकर होगा: रेप पीड़िता को दी धमकी, आरोपित गिरफ़्तार

देश में बढ़ रही महिला उत्पीड़न और बलात्कार जैसी घटनाओं के बीच उत्तर प्रदेश के बागपत ज़िले से एक चौका देने वाली ख़बर सामने आई है। यहाँ एक बलात्कार पीड़िता को आरोपितों ने धमकी दी है कि अगर वो कोर्ट में गवाही देने आई तो उसका अंजाम उन्नाव कांड से भी भयंकर होगा। इस पोस्टर को लगाकर आरोपितों ने पीड़िता को डराने और उनके परिवार में दहशत का माहौल बनाने का काम किया है। 

पीड़िता के घर के बाहर आरोपितों ने चिपकाया धमकी भरा पोस्टर (तस्वीर सौजन्य: NDTV)

वहीं, पीड़िता ने इस धमकी भरे पोस्टर देखने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सुरक्षा की गुहार लगाई है। इसके बाद पुलिस प्रशासन की तरफ़ से पीड़िता की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। इस मामले पर जानकारी देते हुए एसपी प्रताप गोपेंद्र यादव ने बताया कि बड़ौत के बिजरोल गाँव में एक दुष्कर्म पीड़िता के घर पर पैम्पलेट चिपकाया गया। जिसमें लिखा था कि अगर तुमने बयान दिया तो उन्नाव जैसी घटना तुम्हारे साथ होगी। आरोपित को गिरफ़्तार कर लिया गया है, वो ज़मानत पर बाहर था।

ख़बर के अनुसार, पीड़िता का कहना है कि क़रीब एक साल पहले गाँव के सोहरन नाम का शख़्स बहाने से उन्हें दोस्त के कमरे में ले गया था। वहाँ पीड़िता को नशीला पेय पिलाया और फिर बलात्कार कर घटना का वीडियो भी बनाया। इसके बाद सोहरन ने उस वीडियो को वायरल करने की धमकी के नाम पर पीड़िता का कई बार बलात्कार किया और उसका अश्लील वीडियो भी बनाया।

बता दें कि पीड़िता दिल्ली के मुखर्जी नगर इलाक़े में कोचिंग करती थी। हालात से तंग आकर पीड़िता ने मुखर्जी नगर इलाक़े में ही सोहरन के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराया। इस मामले में 13 दिसंबर को दिल्ली की रोहिणी कोर्ट में गवाही होनी है। लेकिन, उससे पहले ही आरोपितों ने पीड़िता के घर के बाहर धमकी भरा पोस्टर लगाकर पूरे परिवार को दहशत में डाल दिया। इसके अलावा, आरोपित पक्ष पीड़िता को कई बार जान से मारने की धमकी दे चुका है। इसके चलते सीएम योगी आदित्यनाथ से सुरक्षा की माँग की गई। सूचना मिलते ही पुलिस भी पीड़िता के घर पहुँची, इसके बाद पीड़िता के घर पर सुरक्षा तैनात कर दी गई है।

दरअसल, उन्नाव कांड की धमकी देने वाला यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले यूपी के फतेहपुरी में भी पीड़िता को ऐसी ही धमकी दी गई थी। गाज़ीपुर थाना क्षेत्र में गैंगरेप की शिकार नाबालिग पीड़िता को आरोपितों के परिजनों ने धमकी दी थी कि उसका हश्र भी उन्नाव जैसा होगा। पुलिस के अनुसार, क़रीब 20-25 दिन पहले चार लड़कों ने दलित लड़की का अपहरण करके उसका बलात्कार किया था। इसके बाद इस मामले में सामूहिक दुष्कर्म से संबंधित मामला दर्ज हुआ और मुख्य आरोपित प्रदीप को जेल भेज दिया गया, जबकि बाकी तीनों अभी फ़रार हैं। उन्हें ढूँढने की तलाश अभी भी जारी है।

उन्नाव मामला

उन्नाव के बिहार थाना क्षेत्र के गौरा मोड के पास गुरुवार (5 दिसंबर) को सुबह तड़के एक गैंगरेप की पीड़िता अपने मुक़दमे की तारीख पर रायबरेली के लिए ट्रेन पकड़ने जा रही थी। इस बीच गैंगरेप के दो आरोपितों ने अपने तीन दोस्तों के साथ मिलकर अचानक पीड़िता पर हमला बोल दिया। उन्होंने पीड़िता पर लाठी-डंडे और चाकू से कई वार किए। हैवानियत के नशे में चूर आरोपित इतने पर भी नहीं रुके, उन्होंने पीड़िता पर मिट्टी का तेल डाला और आग लगा दी। आग लगने से पीड़िता चीखने-चिल्लाने लगी जिसके बाद घटना स्थल पर आसपास के लोग पहुँचे। लोगों की भीड़ को आता देख सभी आरोपित वहाँ से भाग निकले। पीड़िता को तुरंत अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया, लेकिन वो इतनी झुलस चुकी थी कि उसने दो दिन बाद ही अपना दम तोड़ दिया।

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IUML ने नागरिकता संशोधन विधेयक के ख़िलाफ़ SC का किया रुख़, इसे ‘अवैध’ घोषित करने की उठाई माँग

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) ने गुरुवार को सर्वोच्च न्यायालय में नागरिकता संशोधन विधेयक, 2019 को चुनौती दी है। इस विधेयक को संसद के दोनों सदनों द्वारा मंज़ूरी दे दी गई है। क़ानून बनने से पहले इस पर अब केवल राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने बाक़ी हैं। 

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का केस कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और सुप्रीम कोर्ट के वकील कपिल सिब्बल लड़ेंगे। IUML, जो केरल राज्य में कॉन्ग्रेस की सहयोगी है, उसने अपनी याचिका में SC से नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 को अवैध और शून्य घोषित करने का अनुरोध किया क्योंकि उन्होंने आरोप लगाया है कि यह विधेयक संविधान के मौलिक अधिकार समानता का उल्लंघन करता है।

ख़बर के अनुसार, भारतीय संघ मुस्लिम लीग ने नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध करते हुए संसद के चार अन्य सदस्यों, जिनमें पीके कुन्हालीकुट्टी (केरल का प्रतिनिधित्व करने वाले लोकसभा IUML सांसद), ET मोहम्मद बशीर (केरल का प्रतिनिधित्व करने वाले लोक सभा IUML सांसद), अब्दुल वहाब (केरल से राज्यसभा IUML सांसद) और के नवीस कानी (तमिलनाडु से लोकसभा IUML सांसद) शामिल हैं, उन्होंने नागरिकता संशोधन विधेयक के ख़िलाफ़ शीर्ष अदालत में एक याचिका भी दायर की है। इस याचिका का आधार यह है कि यह विधेयक  संविधान के अनुच्छेद-14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है।

बता दें कि लोकसभा के बाद बुधवार (11 दिसंबर) को राज्यसभा में लंबी बहस के बाद नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 पास हो गया है। इस विधेयक की वोटिंग में कुछ 230 वोट पड़े। जिसमें विधेयक के पक्ष में 125 और विरोध में 105 वोट पड़े थे।

कॉन्ग्रेस के दिग्गज़ नेता कपिल सिब्बल और ज़मानत पर बाहर आए नेता पी चिदंबरम, दोनों उच्च सदन के सदस्यों ने संसद में चर्चा के दौरान विधेयक की क़ानूनी वैधता पर मोदी सरकार से सवाल किए थे। ऐतिहासिक नागरिकता संशोधन विधेयक, राज्यसभा और लोकसभा दोनों द्वारा पारित होने के बाद, पिछले कई वर्षों से भारत में निवास कर रहे तीन पड़ोसी देशों के सैकड़ों और हज़ारों सताए गए अल्पसंख्यकों के लिए मार्ग प्रशस्त करता है।

कॉन्ग्रेस और समान विचारधारा वाले दलों ने इस विधेयक के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला था। शिवसेना, जो एक हिन्दुत्व पार्टी होने का दावा करती है, उसने लोकसभा में बिल के पक्ष में मतदान करने के बाद, यू-टर्न लेते हुए राज्यसभा में वोटिंग प्रक्रिया से दूर रहने का फ़ैसला लिया। अब नागरिकता विधेयक को संसद के दोनों सदनों से मंज़ूरी मिल गई है।

कुछ लोग इस विधेयक को मुस्लिम-विरोधी मानते हैं, हालाँकि इस विधेयक का भारत के मजहब विशेष से कोई लेना-देना नहीं था। वहीं, सोशल मीडिया पर विधेयक के पेश होने और अंतत: लोकसभा में पारित होने के बाद लिबरल गैंग लगभग नदारद ही था। आख़िरकार, विधेयक के ऐसे निराधार विरोध को संसद के दोनों सदनों ने ख़ारिज कर दिया है और राष्ट्रपति कोविंद जल्द ही ऐतिहासिक विधेयक पर हस्ताक्षर करेंगे, जिसके बाद यह विधेयक क़ानून बन जाएगा।

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शरणार्थियों को जगह भी देंगे, असम के हित भी सुरक्षित रहेंगे: PM मोदी का आश्वासन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने असम के लोगों को आश्वस्त किया है कि वह और उनकी सरकार असमिया लोगों के हितों की रक्षा करेंगे। असम समझौते (असम एकॉर्ड्स) की धारा 6 की मूल भावना के अनुरूप असमिया लोगों की पहचान और उनके राजनीतिक, भाषाई, सांस्कृतिक और ज़मीन से जुड़े अधिकारों को संवैधानिक संरक्षण के लिए वे प्रतिबद्ध हैं।

तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी और असम के नेताओं के बीच हुए असम समझौते की इस धारा में असमिया समुदाय के राजनीतिक, भाषाई, सांस्कृतिक और ज़मीन से जुड़े अधिकारों को सहेजने के लिए संवैधानिक, वैधानिक और शासकीय सुरक्षा की बात की गई है। दरअसल असमिया समुदाय 1951 से 1971 के बीच तत्कालीन पाकिस्तान से असम में बांग्लाभाषी मुस्लिमों ही नहीं, हिन्दुओं को भी नागरिकता देने के खिलाफ था, क्योंकि उन्हें इसका डर था कि बंगालियों की संख्या अगर ज़्यादा हो गई तो असमी भाषा और संस्कृति विलुप्त हो जाएगी, और असमिया लोग बंगालियों के भेदभाव का शिकार होंगे।

उनकी इसी आशंका को दूर करने के लिए धारा 6 में भारत सरकार ने वादा किया था कि असमिया सांस्कृतिक और ज़मीन से जुड़े अधिकारों को राज्य में संरक्षण दिया जाएगा।

इसी कारण असम समझौते का हिस्सा रही ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन समेत कई संगठन नागरिकता बिल का विरोध कर रहे हैं। उन्हें डर है कि अगर एनआरसी में नागरिकता से बाहर हुए बंगाली हिन्दुओं को दोबारा नागरिक बनने का मौका नागरिकता विधेयक से मिल गया तो असम में असमी-भाषी लोग और उनकी संस्कृति हाशिए पर आ जाएँगे। इसीलिए असम में इसका विरोध मज़हबी से ज़्यादा भाषाई आधार पर हो रहा है, और स्थानीय लोग बांग्लादेशी मुस्लिमों ही नहीं, बांग्लादेशी/बंगाली हिन्दुओं को भी नागरिकता मिलने के खिलाफ हैं।

दूसरी ओर उपमुख्यमंत्री हेमंत बिस्व शर्मा समेत भाजपा नेता असम के लोगों को यह समझाने का अनथक प्रयास कर रहे हैं कि यह विधेयक जनसांख्यिकीय संतुलन को बिगाड़ने नहीं, बल्कि संभाल कर रखने के लिए है। “मुझे दृढ़ विश्वास है कि अगर यह विधेयक नहीं पास हुआ तो असमिया हिन्दू महज़ अगले 5 साल में अल्पसंख्यक बन जाएँगे। यह उन तत्वों के लिए फ़ायदेमंद होगा जो असम को एक और कश्मीर बनाना चाहते हैं।”

CAB के खिलाफ़ सड़कों पर उतरे मदरसे के छात्र: हाईवे जाम करके पुलिस वाहनों पर किया पथराव, 144 लागू

नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ़ बुधवार को उत्तर प्रदेश के देवबंद में मदरसे के छात्र सड़कों पर नजर आए। इस बिल के विरोध में इन छात्रों ने सहारनपुर-मुजफ्फरनगर हाईवे पर जाम लगा दिया और जब पुलिस इन्हें रोकने गई तो इन्होंने (छात्रों) उनके साथ(पुलिस के साथ) धक्का-मुक्की कर उनके वाहनों पर पथराव किया। इस दौरान मुस्लिम समुदाय के लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और बीजेपी के खिलाफ नारेबाजी भी की। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि प्रशासन को सुरक्षा के लिहाज से वहाँ धारा 144 लगानी पड़ी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बुधवार शाम को मदरसा छात्र सहारनपुर जिले के सरसटा बाजार स्थित जामा मस्जिद पर इस बिल के विरोध में एकत्रित हुए और करीब साढ़े चार बजे तक उन्होंने यहाँ शांतिमार्च निकाला। लेकिन, कुछ देर बाद यह खानकाह पुलिस चौकी से होते हुए सहारनपुर-मुजफ्फरनगर हाईवे पर पहुँच गए और देखते-देखते ही यहाँ जाम लग गया। छात्रों पर आरोप हैं कि उन्होंने वाहनों को रोकने के लिए हाईवे पर पत्थरबाजी की। साथ ही बिल की कॉपी को जलाकर अपना विरोध जताया। इसके अलावा बताया जा रहा है कि शाम को मगरिब की नमाज का वक्त होते ही इन लोगों ने सड़क पर ही बैठकर नमाज अदा की।

हालाँकि, इन सबके बीच मामले की सूचना मिलते ही कई बड़े अधिकारी मौक़े पर पहुँचे और उन्होंने छात्रों को समझाने का प्रयास किया। लेकिन जब बहुत कोशिशों के बाद भी छात्र मानने को तैयार नहीं हुए, तो अधिकारियों ने देर शाम पूर्व विधायक माविया अली और मदरसों के मौलानाओं के साथ छात्रों को समझाया। जिसके बाद शाम 7 बजे के करीब हाईवे को खोला गया।

हिंदुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार पूरे वाकये के बाद इलाके के डीएम आलोक कुमार पांडे और एसएसपी दिनेश कुमार दारुल उलूम के मोहतमिम मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी से बात करने पहुँचे। जहाँ नोमानी ने देवबंद में शाम को नागरिकता संशोधन बिल को लेकर हुए प्रदर्शन पर नाखुशी जताई और कहा कि दारुल उलूम और देवबंद के किसी भी मदरसे से इस प्रदर्शन का कोई संबंध नहीं है। हम ऐसे विरोध की मुखालफत करते हैं, जिससे आमजन को परेशानी पहुँचे।

गौरतलब है कि नागरिकता संशोधन विधेयक पास हो जाने के बाद देश के कई हिस्सों में इसे लेकर प्रदर्शन किया जा रहा है। असम और देवबंद के अलावा एएमयू में भी इसका विरोध बड़ी तादाद में देखने को मिला है। जहाँ अब तक पुलिस ने इस मामले में 20 छात्रों को नामजद करते हुए, जबकि 500 लोगों पर अज्ञात नाम से मुकदमा दर्ज किया है।

मंदिर वहीं बनेगा, मस्जिद को भी मिलेगा 5 एकड़ – जन्मभूमि मामले में सभी 18 याचिकाएँ ख़ारिज

राम जन्मभूमि मंदिर में विघ्न डालने के आज आखिरी दरवाजे भी सुप्रीम कोर्ट ने बंद कर दिए हैं। जमीयत उलेमा ए हिन्द, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के इशारे पर याचिका डालने वालों, इरफ़ान हबीब-प्रशांत भूषण के लिबरल गिरोह समेत 18 याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट की नई संविधान पीठ ने ख़ारिज कर दी हैं। इसकी अध्यक्षता नए सीजेआई एस ए बोबडे कर रहे थे।

इसके अलावा हिन्दू महासभा की वह याचिका भी ख़ारिज कर दी गई, जिसमें बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बदले मुस्लिम पक्ष को राहत के तौर पर अयोध्या में कहीं और मस्जिद बनाने के लिए 5 एकड़ भूमि का विरोध किया गया था। इस आदेश पर आपत्ति जताते हुए अखिल भारत हिन्दू महासभा अदालत से इस आदेश पर पुनर्विचार करने की गुज़ारिश की थी

गौरतलब है कि 9 नवंबर, 2019 के अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यों वाली संविधान बेंच ने राम जन्मभूमि स्थल का पूरा मालिकाना हक हिन्दुओं दिया था। साथ ही मस्जिद बनाने के लिए अलग से 5 एकड़ ज़मीन देने के निर्देश केंद्र सरकार को दिए थे। इस पीठ की अध्यक्षता तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई ने की थी और इसमें मुस्लिम जज जस्टिस अब्दुल नज़ीर भी शामिल थे। पीठ ने अपना फैसला सर्वसम्मति से दिया था।

वहीं लिबरल गिरोह की बात करें तो उसकी ओर से याचिका दाखिल करने वालों में इरफ़ान हबीब, शबनम हाशमी, अपूर्वानंद झा, नंदिनी सुंदर और इस्लाम स्वीकार करने का ऐलान कर चुके और लम्बे समय से हिन्दू-विरोधी कार्यों में लिप्त हर्ष मंदर शामिल हैं। इनमें से एक भी व्यक्ति 1949-50 से 2019 तक चले मूल मुकदमे में पक्षकार नहीं था। इरफ़ान हबीब ने इस मुकदमे में हिन्दू पक्ष के साक्ष्यों को झुठलाने की कोशिश अवश्य की थी, लेकिन असफल रहे थे।

अपनी याचिका में इन लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के ऊपर ही मुकदमे की प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का आरोप लगा दिया था। उनके अनुसार सुप्रीम कोर्ट के फैसले में जमीन के मालिकाना हक से आगे बढ़कर मुक़दमे की परिधि में हिन्दू और मुस्लिम आस्थाओं के टकराव को शामिल कर लिया था।

इस याचिका को दायर करने वाले अधिवक्ता पूर्व आम आदमी पार्टी नेता, राफेल घोटाले के याचिकाकर्ता और जनमत संग्रह की आड़ में कश्मीर पाकिस्तान को सौंप देने की माँग का समर्थन कर इसके लिए पिटने वाले प्रशांत भूषण थे।

याचिका में यह भी कहा गया है कि हिन्दू पक्ष को जन्मभूमि की ज़मीन देने का आधार केवल आस्था को माना गया था, जबकि मस्जिद के पक्ष में पुरातात्विक साक्ष्यों को नज़रंदाज़ कर दिया गया। यह कोरा झूठ था। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ़ किया था कि वह हिन्दू पक्ष को यह ज़मीन आस्था के आधार पर नहीं, बल्कि पुरातत्व विभाग की खुदाई में मस्जिद के हज़ारों साल पहले तक मंदिर के साक्ष्य मिलने, मस्जिद बनने के बाद से 19वीं सदी के छठे दशक के बीच हिन्दू पक्ष द्वारा अपनी पूजा साबित करने और मुस्लिमों द्वारा इसी कालखंड में लगातार नमाज़ साबित न कर पाने के चलते दे रहा था।

इनके अलावा मुकदमे के समय आने वाले फैसले को मान लेने की बात करने वाले मुस्लिम पक्ष से भी जमीयत ने तो याचिका डाली ही, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के इशारे पर भी 4 लोगों ने निजी क्षमता में याचिका दायर की थी।

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8 बच्चों का बाप सपा नेता आफाक़ अहमद ने बंदूक के बल पर 5 साल तक किया महिला का यौन शोषण, FIR दर्ज

समाजवादी पार्टी के एक नेता पर एक महिला का यौन शोषण करने और उसे ब्लैकमेल करने का मामला दर्ज किया गया है। पीड़िता ने कहा, “आफाक़ ख़ान एक शादीशुदा व्यक्ति है जिसके आठ बच्चे हैं, लेकिन 2014 से वह मेरा यौन शोषण कर रहा है और मेरी प्रतिष्ठा को ख़राब करने की धमकी देता है। वह मुझे बंदी बना लेता है और मुझे मानसिक रूप से प्रताड़ित करता है। वह मुझे सोशल मीडिया पर बदनाम करने की धमकी भी दे रहा है।”

ख़बर के अनुसार, 36 वर्षीय पीड़िता ने कहा,

“मैं अब गंभीर रूप से बीमार हूँ और उसके चंगुल से मुक्त होना चाहती हूँ। आफाक़ ख़ान अपने साथ बन्दूक रखता है और उसने मुझे किसी भी तरह का विरोध करने पर जान से मारने की धमकी दी है।”

पुलिस सूत्रों के अनुसार, इस मामले में 4 दिसंबर को FIR दर्ज की गई थी और उसके बाद से ही मामले की जाँच शुरू कर दी गई है।

कन्नौज़ ज़िले के छिबरामऊ पुलिस स्टेशन में आफाक़ अहमद ख़ान के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा-342 (ग़लत तरीके से कारावास), 376 (बलात्कार), 500 (मानहानि की सज़ा) और 508 (जो किसी व्यक्ति को ऐसा कार्य करने के लिए कहता है जिसके लिए वो व्यक्ति क़ानूनी रूप से बाध्य नहीं है) के तहत मामला दर्ज किया गया है।

पीड़िता के अनुसार, वह समाजवादी युवजन सभा के नेता आफाक़ ख़ान के सम्पर्क में तब आई थी जब उनके पति की मृत्यु हो गई थी और उन्हें नौकरी की तलाश थी। महिला के साथ परिवार का कोई अन्य सदस्य नहीं था।

इस मामले पर एक पुलिस अधिकारी ने कहा, “जैसे ही जाँच एक निर्णायक चरण में पहुँचेगी, हम तुरंत कार्रवाई करेंगे।” कन्नौज, 2019 के लोकसभा चुनाव तक, समाजवादी पार्टी का गढ़ था। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव ने कन्नौज से 2012 में और फिर 2014 में उपचुनाव जीता था। 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा भाजपा से हार गई थी।

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जिन्ना की वारिस, कॉन्ग्रेस की संगिनी ‘हरा वायरस’ मुस्लिम लीग ने नागरिकता बिल-2019 को दी चुनौती

नहीं। भाजपा वाले, “भक्त”, ‘फ़ासिस्ट’ जितना भी कहें, आप यह कतई मत मानिएगा कि ऊपर लगी तस्वीर पाकिस्तान के झंडे की है। यह उस राजनीतिक दल के झंडे की है, जिसे पाकिस्तान बनाने वाले मोहम्मद अली जिन्ना और उनकी जिहादी पार्टी ऑल इंडिया मुस्लिम लीग का वारिस कहा जाता है। यह वह पार्टी है जिसका तकनीकी तौर पर तो नाम ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग’ है, लेकिन अपनी पूर्वज जिन्ना वाली पार्टी की तरह अपने पूरे नाम की जगह केवल ‘मुस्लिम लीग’ कहलवाना पसंद करती है।

इसी पार्टी ने खुद और अपने 4 सांसदों के मार्फ़त नागरिकता विधेयक को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। गौरतलब है कि 9 घंटे तक चली बहस के बाद कल रात को राज्य सभा ने नागरिकता विधेयक को मंज़ूरी दे दी है, और इसके कानून बनने में केवल राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हस्ताक्षर भर की देर है। इस बिल से औपनिवेशिक काल से पहले के अखंड भारत में जिहादी बहुसंख्यकों के सताए हुए पंथिक/मज़हबी अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता के लिए तरजीह देने और इसकी प्रक्रिया को अन्य के मुकाबले सरल करने के प्रावधान हैं।

जिन्ना के साथ नूरा कुश्ती, लेकिन नीतियाँ भारत में पाकिस्तान बनाने वाली

इसे बनाने वाले मुहम्मद इस्माइल ने पहले तो जिन्ना के साथ गलबहियाँ कर पाकिस्तान आंदोलन और इसके लिए हुए हत्याकांड की साज़िशों में जम कर हिस्सेदारी की, लेकिन जिन्ना के दार-उल-इस्लाम में खुद जा कर नहीं बसे। उनके समर्थक इसे ‘हृदय-परिवर्तन’ बताते हैं, कहते हैं कि उन्हें ‘सेक्युलरिज़्म की ज़रूरत’ समझ में आ गई।

कितनी समझ में आई, इसका मुज़ाहिरा इस तथ्य से होता है कि एक तरफ़ इनके वेबसाइट पर खुद को परिभाषित करने में तीन बार ‘सेक्युलरिज़्म’ शब्द का प्रयोग हुआ है, और दूसरी ओर इस्माईल की ‘उपलब्धियाँ’ ऐसी हैं कि लगेगा किसी पाकिस्तानी नेता की बात हो रही है- शरीयत को जारी रखना, बाबरी मस्जिद के पक्ष में घेरेबंदी करना, शाहबानो मामले के फैसले के खिलाफ लड़ना, हिन्दुओं के मंदिरों को तोड़ कर बनी मस्जिदों की पैरवी आदि।

इन विरोधाभासों से इस मुस्लिम लीग और मुहम्मद इस्माईल की असलियत साफ़ है- गज़वा-ए-हिन्द के जिस जिहादी प्रोजेक्ट और 1200 साल के सपने का पाकिस्तान पहला कदम था (न कि परिणति और अंत), वह जारी रखने के लिए सेक्युलरिज़्म का धतूरा चाट धुत पड़े काफ़िरों के बीच अल्लाह का ‘सच्चा’ बंदा होना आवश्यक था, और यही भूमिका निभाने के लिए मुहम्मद इस्माईल ने मुस्लिम लीग बनाई। 2003 में हुए केरल के मराड में हुए सामूहिक हत्याकांड में इसका नाम हत्याकांड की जाँच के लिए बने थॉमस पी जोसेफ़ आयोग की रिपोर्ट में आया। आयोग के मुताबिक मुस्लिम लीग न केवल इसकी योजना बनाने, बल्कि उसे अमली जामा पहनाने में भी हिस्सेदार थी। इसके बाद 2017 में सीबीआई के हत्थे भी इसके दो नेता इसी मामले में चढ़े।

फ़िलहाल

फ़िलहाल इस पार्टी की याचिका में भारत के पड़ोसी मुस्लिम देशों के सताए हुए अल्पसंख्यकों को तरजीही शरण देने को ‘असंवैधानिक’ बताया गया है। इसे अनुच्छेद 14 के खिलाफ, मुस्लिमों के साथ भेदभाव और विधेयक की पीछे की मंशा को ‘बदनीयती’ बताया है।

साथ ही आपत्ति जताई है कि इन देशों के इस्लामी अल्पसंख्यकों जैसे अहमदिया, शिया, हज़रा, रोहिंग्या को बाहर क्यों रखा गया है। इसके अलावा ऐसे ही सवाल अन्य पड़ोसी देशों श्री लंका, नेपाल, भूटान, म्याँमार और चीन के अल्पसंख्यकों को बाहर रखने के बारे में उठाया गया है।

लेकिन इस याचिका में सबसे आपत्तिजनक बात अफ़ग़ानिस्तान को वृहद् भारतीय सभ्यता से बाहर बताना है। इस याचिका में कहा गया है कि अफ़ग़ानिस्तान कभी भी भारत का हिस्सा नहीं था, जो सौ फ़ीसदी झूठ है। अफ़ग़ानिस्तान केवल ब्रिटिश भारत का हिस्सा नहीं रहा, क्योंकि अंग्रेज़ कभी वहाँ के शासकों को हरा नहीं पाए। लेकिन इससे अफ़ग़ानिस्तान का ब्रिटेन के पहले के भारत से, आर्य और वैदिक सभ्यता से रिश्ता नहीं समाप्त हो जाता है।

योगी आदित्यनाथ ने कहा था ‘हरा वायरस’

राहुल गाँधी को जब अमेठी हाथ से छूटती दिखी तो वे मुस्लिम प्रभुत्व वाले केरल ही भागे। ऐसा उन्होंने इसलिए किया क्योंकि उनकी पार्टी का गठबंधन है मुस्लिमों की अच्छी-खासी जनसंख्या वाले केरल में चल रही मुस्लिम लीग से। और लीग का चाँद-सितारे वाला हरा झंडा ही लहराता नज़र आया उनके स्वागत में, जब वे वायनाड पहुँचे नामांकन दाखिल करने।

इसी पर उत्तर प्रदेश के सीएम और गोरखधाम मठ के पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ ने कह दिया कि कॉन्ग्रेस ‘हरे वायरस’ की चपेट में आ कर विलुप्त हो गई है, उनके नामांकन में कॉन्ग्रेस तो दिखी नहीं, केवल हरा-ही-हरा दिखा, तो इस पर मुस्लिम लीग नाराज़ हो गई थी।

इस झंडे और ‘मुस्लिम लीग’ नाम को लेकर एक बार पार्टी के कुछ ज़मीनी कार्यकर्ताओं ने चिंता जताई थी। उन्होंने साथ ही सुझाव दिया था कि झंडे का रंग बदल दिया जाए, और नाम में मुस्लिम की जगह ‘माइनॉरिटी’ कर दिया जाए। लेकिन कथित तौर पर पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व ने मना कर दिया। और सही भी है- यह वर्तमान झंडा जिहाद के पाक हुक्म, गज़वा-ए-हिन्द के सपने और दार-उल-इस्लाम व उम्मत के प्रति पहली वफ़ादारी संजो कर रखता है, बिन बोले याद दिलाता है। इतने ताकतवर प्रतीक को भला कौन हल्का करना चाहेगा?

हम मर जाएँगे पर कभी पाकिस्तान नहीं जाएँगे: कहानी उन हिन्दू शरणार्थियों की जो भारत में रहने के लिए सब छोड़ आए

“बच्चे जाते हैं पढ़ने के लिए तो पहले कलमा पढ़ाते हैं। मंदिर जाना तो कब का छोड़ चुके हैं वहाँ बचे ही कितने हैं सब तोड़ देते हैं। जमीनों पर कब्ज़ा कर लेते हैं। बहन-बेटियाँ सुरक्षित नहीं। कुत्तों से भी बद्तर व्यवहार। न दुकाने खोल सकते हैं न कोई काम, कोई आएगा ही नहीं लेने, मर जाएँगे लेकिन लौट के नहीं जाएँगे, हमने भारत आने के लिए बहुत कुर्बानी दी है…” ये तो बस बानगी है, ये कहानी है पाकिस्तान से आए उन हिन्दू शरणार्थियों की, जो ऑपइंडिया से वहाँ के मुस्लिमों द्वारा ढाए जा रहे अत्याचार की भयावह हालात को बयाँ कर रहे हैं।

नागरिकता संशोधन विधेयक राज्यसभा से भी लम्बी बहस के बाद पास हो गया है। अब इस कानून के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के गैर मुस्लिम प्रवासियों को भारतीय नागरिकता प्रदान करने का मार्ग प्रशस्त हो चुका है। जब संसद में बहस जारी था तो मैं उन शरणार्थियों से बात कर रहा था कि क्यों वे सभी भारत की नागरिकता चाहते हैं और क्यों उन्हें देना ज़रूरी है। इस बातचीत के दौरान उन लोगों ने ऐसा बहुत कुछ बताया जो आपको बेचैन कर सकता है।

हालाँकि, विपक्ष अंत तक लगा रहा कि बिल रुक जाए क्योंकि इसमें मुस्लिम शामिल नहीं हैं। और वामपंथी तो अब भी फर्जी मातम मना रहे हैं जबकि अमित शाह ने संसद के पटल पर कहा, “हम 6 धर्मों के लोगों को इस बिल में ला रहे हैं, तो कोई प्रशंसा नहीं है। मगर हमने मुस्लिमों को शामिल नहीं किया तो आप सवाल उठाए जा रहे हैं। इस बिल की वजह से कई धर्म के प्रताड़ित लोगों को भारत की नागरिकता मिलेगी लेकिन विपक्ष का ध्यान सिर्फ इस बात पर कि मुस्लिम को क्यों नहीं लेकर आ रहे हैं।”

मजनू टीला स्थित पाकिस्तान से आए हिन्दुओं का शरणार्थी कैंप

‘क्यों नहीं ला रहे हैं, उन्हें क्यों नहीं शामिल कर रहे’ इसका एक कारण तो गृहमंत्री अमित शाह बता चुके हैं। चलिए अब उन हिन्दू शरणार्थियों से मिलवाते हैं, जो पाकिस्तान के सिंध, कराची, हैदराबाद, मीरपुर आदि से जीने की आखिरी उम्मीद लेकर भारत आए हैं। और जानते हैं ‘वो कारण’ उन लोगों से, जो सही मायने में दहशत और खौफ की जिंदगी जी कर आए हैं यहाँ… एक खुशहाल, इज्जत भरी जिंदगी की उम्मीद लिए! विधेयक के पारित होने की सम्भावना ने ही मजनू टीला के पाकिस्तान से आए हिन्दू शरणार्थियों में कितनी ख़ुशी भर दी है।

हमने मजनू टीला में रहने वाले कई शरणार्थियों से बात की। उन सभी बिंदुओं पर जैसे पाकिस्तान से आप भारत क्यों आए हैं? वहाँ ऐसा क्या हुआ, जो यहाँ आना पड़ा? आपके परिवार के सब लोग यहीं हैं, या कुछ पीछे रह गए? क्या आपके पास कोई वीजा है, या आप किसी भी तरह भाग कर यहाँ आए हैं? यहाँ पर रहते हुए आपको क्या समस्या आ रही है? आप पूजा-पाठ कहाँ करते हैं? आपके कैंप में कोई मंदिर है? ये जो बिल पास होने वाला है, उसको ले कर आपकी क्या उम्मीदें हैं?

वहाँ रह रहे शरणार्थियों में जिनमें से लगभग सभी पाकिस्तान में मुस्लिमों द्वारा भयंकर रूप से प्रताणित हैं और किसी भी तरह से अपने मूल देश भारत में वैध तरीके से रहने के लिए आखिरी उम्मीद लेकर यहाँ पहुँचे हैं। सबसे पहले हमारी मुलाकात हुई उनसे, जो खुद के रहने के लिए ठौर बनाने को पत्थर तोड़ रहे थे। उन्होंने बताया कि आप हमारी समस्याओं पर बात करने आए हैं तो पहले मिल लीजिए उसी ‘नागरिकता’ से, जिसके लिए हम सब मोदी जी के ज़िन्दगी भर आभारी रहेंगे।

‘नागरिकता’ से मिला तो वहाँ उसकी माँ और दादी ने तो ‘भारत’ ‘भारती’ और ‘नागरिकता’ की एक अनोखी कहानी सुनाई। परिचय करते वक़्त जैसे ही मैंने ‘पाकिस्तानी हिन्दू’ कहा, वहीं उन्होंने मुझे टोक दिया कि नाम मत लीजिए उस देश का, ‘वो देश नहीं नरक’ है। ‘नागरिकता’ दरअसल इस कैंप के एक बच्ची का नाम है। उसकी दादी ने ऑपइंडिया को बताया कि उन्होंने अपने बेटे का नाम ‘भारत’ रखा था, तभी से उनके मन में था कि एक दिन वो भारत जरूर जाएँगी। उन्होंने अपनी बेटी का नाम ‘भारती’ रखा और अब अपनी पोती का नाम ‘नागरिकता’ रखा है। नागरिकता की माँ आरती से जब मैंने पूछा कि पाकिस्तान में रहने के दौरान उन्हें किस प्रकार की समस्याओं और परिस्थितियों का सामना करना पड़ा तो उन्होंने कहा कि उन्हें वहाँ पर कोई इज्जत नहीं मिलती थी। प्यास लगने पर उनके ग्लास में पानी नहीं दिया जाता था। वहाँ हिंदुओं की कोई इज्जत नहीं है।

नागरिकता ‘ अपनी दादी के साथ, रात को खाना बनाते शरणार्थी

कैंप के कई और लोगों से भी मुलाकात हुई। कुछ ने नाम बताया तो कुछ बचते रहे कि वीडियो पाकिस्तान पहुँच गया तो उनके परिजनों को, जिन्हें वो पाकिस्तान में ही छोड़ आए हैं, उनकी जान पर बन आएगी। भारत में आए हुए ज़्यादातर शरणार्थी किसान हैं, कुछ छोटे-मोटे दूकानदार जो फल वगैरह बेचते हैं। उनके परिजनों की सुरक्षा के लिए हमने कई नाम बदल दिए हैं।

दीनानाथ ने हमें बताया, “हम यहाँ आने के लिए बहुत क़ुरबानी दिए हैं, परिवार के कई लोग पाकिस्तान में ही हैं। भगवान उनको सुरक्षित रखे। हम यहाँ सरकार को बताने आए थे कि वहाँ हिन्दुओं के साथ क्या-क्या हो रहा है। पाकिस्तान के सभी हिन्दू भारत आना चाहते हैं, वहाँ कोई नहीं रहना चाहता। जिसे जब भी मौका मिलेगा, यहीं आ जाएगा, जो आएगा मर जाएगा लेकिन वापस जाएगा नहीं। अगर यहाँ आकर वहाँ गया तो मुस्लिमों द्वारा मार दिया जाएगा।”

एक और शरणार्थी मीराबाई और उनकी माँ मैगी से ऑपइंडिया ने पूछा तो उन्होंने बताया, “बहुत कम कपड़ों में हम भारत आए तीर्थयात्रा के बहाने ताकि किसी को शक न हो। हमारी तो वहाँ 100 ‘किले’ की जमीन थी, जिस पर मुस्लिमों ने कब्ज़ा कर लिया। हमारी बेटियों को मुस्लिम उठा ले जाते हैं। वहाँ हम पूजा-पाठ भी नहीं कर सकते। करते भी हैं तो घर में छिपकर बड़े मंदिर नहीं जाते वहाँ खतरा ज़्यादा है, मुस्लिम पीछा करते हैं। मारते-पीटते हैं, लड़कियों को उठा ले जाते हैं। लड़कियाँ घर में भी सुरक्षित नहीं। बाहर भेजना तो बहुत मुश्किल है।”

ताराचंद, बलदेवी और जमुना जैसे कई अन्य शरणार्थियों से भी बात हुई। ज़्यादातर वैलिड वीजा लेकर ही भारत आए हैं। उनके परिवार के बाकी लोगों को नहीं मिला, तो वे वहीं हैं। भारत आने के लिए सबने किसी तरह पैसे का जुगाड़ किया, कुछ सामान बेचे, कुछ ने गहने तो कुछ ट्रैक्टर भी बेचकर आए हैं कि जब जमीने ही अपनी नहीं रहीं तो ट्रैक्टर किस काम का।

कई लोगों ने बताया कि भारत में हिन्दू-मुस्लिम के बीच कोई भेदभाव नहीं है। जैसे कोई कहीं भी जा सकता है, साथ खा सकता है। लेकिन पाकिस्तान में तो हमको मुस्लिम साथ खाने भी नहीं देते। होटलों में अपने बर्तन-प्लेट में खाना नहीं देंगे। पॉलिथिन में देकर बाहर बैठकर खाने को कहेंगे। या किसी टूटे-फूटे कप में चाय देंगे। हमसे कुत्तों से भी ख़राब व्यवहार करते हैं। हिन्दुओं की वहाँ कोई इज्जत नहीं है।

महिलाओं-लड़कियों पर अत्याचार के बारे में पूछने पर बोला कि क्या-क्या बताएँ? पहले भी बहुत बोल चुके हैं, लड़कियों की इज्जत बिलकुल सुरक्षित नहीं, बच्चियों-महिलाओं को घरों से खींचकर उठा ले जाते हैं, रेप करते हैं। मार डालते हैं। न वहाँ हमारी कोई संपत्ति सुरक्षित है और न हम! कोई भी मुस्लिम कभी भी कब्ज़ा कर सकता है। थाने जाओ तो पुलिस सुनती नहीं। वो हमारे लिए थोड़े हैं, इस्लामी मुल्क है तो मुस्लिमों की ही सुनेंगे।

जब मैंने पूछा कि पाकिस्तान की सरकार क्या कर रही है तो शरणार्थियों का कहना था हम तो नहीं जानते वहाँ कोई सरकार है, होगी भी लेकिन वहाँ हम हिन्दुओं की सुनवाई थोड़ी है? वो तो हमें वहाँ से मिटा देना चाहते हैं। जैसे भारत में सभी को अधिकार है, सबकी सुनवाई होती है, वहाँ ऐसा कुछ नहीं है। जब वो आपस में ही एक-दूसरे की मस्जिद बम से उड़ा देते हैं तो हमारे मंदिर कहाँ छोड़ेंगे। घर में ही पूजा कर लेते हैं लेकिन अपना धर्म कभी नहीं छोड़ा हमने। कई बार हमारे धर्म को नष्ट करने के लिए जब हम होटल खाना लेने गए तो गाय का मांस दे दिया। हमारे मवेशी खोल ले जाते हैं। गायों को ले जाकर काट कर खा जाते हैं। उनकी हत्या का पाप तो हमें भी लगता होगा कि हम गौमाता को बचा नहीं सके। जब हम खुद को ही नहीं बचा पा रहे तो गाय को कैसे बचाएँ! देखिए भारत में गौशाला बनाए हैं। गऊ माता की हम सेवा कर रहे हैं। भगवान भी सब देख ही रहा है, वहाँ के लिए हमें माफ़ कर देगा।

“हम तो कहते हैं कि हमें भारत की नागरिकता मिल जाए तो कम से कम हमारे बच्चे तो एक अच्छी ज़िन्दगी देख लें। वहाँ तो बच्चियों को हम पढ़ने भी नहीं भेजते, वो उठा ले जाएँगे। जो बच्चे जाते भी हैं तो उन्हें कलमा और कुरान पढ़ाते हैं ताकि इस्लाम कबूल कर ले, नहीं तो जबरदस्ती करते हैं। हम पाकिस्तान में होली-दीवाली क्या कोई भी त्यौहार नहीं मना सकते। मनाते भी हैं तो घरों में छिपकर या अपने मोहल्ले में ही, जहाँ मुस्लिम नहीं होते वहाँ। शादीशुदा औरतें भी विधवा की तरह रहती हैं, सिन्दूर लगाने से उन्हें पता चल जाता है कि हिन्दू है तो भी उठा ले जाते हैं।”

लोग अपने घरों में भी मंदिर बना कर रोज पूजा-पाठ कर रहे हैं

कई महिलाओं ने बताया कि किसी तरह जान बचाकर भारत आए हैं। यहाँ पासपोर्ट से बेटा-बेटी दोनों को स्कूल भेज रही हूँ। यहाँ कुछ बन जाएगा तो इनका भविष्य अच्छा रहेगा। पाकिस्तान में तो हमारे बच्चे न कोई नौकरी पा सकते हैं और न ही कायदे से डॉक्टर या किसी बड़े पोस्ट पर जा सकते हैं। वहाँ तो जहाँ हम रहते हैं, कोई हिन्दू डॉक्टर भी नहीं है। इलाज में परेशानी होती है। महिलाओं को भी मजबूरी में मुस्लिम पुरुष डॉक्टर से ही इलाज कराना पड़ता है। भारत में तो कोई कुछ भी बन सकता है। लेकिन पाकिस्तान में ऐसा नहीं है।

ज़्यादातर शरणार्थी बस किसी तरह अपना सब कुछ छोड़कर थोड़े से पैसों और चंद कपड़ों में किसी तरह भारत आए और अब यहीं के होकर रह गए। सबकी उम्मीद यही है कि भारत की नागरिकता मिल जाए तो इज्जत की ज़िन्दगी क्या होती है, कम से कम यह तो जान जाएँ। एक ने तो यहाँ तक कहा कि भारत आकर हमें माता-पिता का प्यार मिल गया। ज़्यादातर हिन्दू शरणार्थी पाकिस्तान में पढ़-लिख नहीं पाए हैं। उनके अंदर भारत का नागरिक बनने की सम्भावना दिखने पर ख़ुशी भी थी लेकिन एक बड़ा दर्द अपने बिछड़े हुए उन परिजनों के लिए जो पाकिस्तान में छूट गए। जो भारत में हैं, वो चाहते हैं कि पाकिस्तान के उनके परिजन अपने पुरखों की गलती सुधारते हुए भारत आ जाएँ क्योंकि हम यहीं के हैं। वो अपना सब कुछ मुस्लिमों को देकर भी यहाँ आने को तैयार हैं बस जान बच जाए और जो भारत में हैं उनका कहना है कि मर जाएँगे लेकिन पाकिस्तान नहीं जाएँगे।

हालाँकि, जहाँ ये शरणार्थी रह रहे हैं, वहाँ भी कोई बहुत सुखद स्थिति नहीं है। लेकिन जो नरक भोग कर पाकिस्तान से ज़िंदा भारत आ गए हैं वो बेहद खुश हैं। सभी का कहना है यहाँ कैसे 5-10 साल बीत गए, पता ही नहीं चला। कई संस्थाओं ने हमारी थोड़ी मदद की। आरएसएस के लोग आते हैं, कभी-कभी मदद के लिए। हमें तो पता भी नहीं था कि कहाँ रहें। उन लोगों ने कहा कि यमुना किनारे जहाँ जगह मिले बस जाओ, तो यहीं मजनू के टीला के पास बस गए। पर ये जगह तो शायद कभी कब्रिस्तान रही होगी। क्योंकि जब हमने अपने आशियाने बनाने को जहाँ-जहाँ गड्ढा खोदा, हर जगह से कहीं कंकाल तो कहीं हड्डियाँ निकलती थे। लगभग हर दिन बड़े-बड़े सांप हमारे घरों-टेंटों में घुस आते हैं। हमने पूजा-पाठ करके भंडारा किया, तो सब भूत भाग गए। शायद उन्हें लगा होगा कि सताए हुए लोगों को और कितना सताएँ! पहले डर लगता था लेकिन अब खुश हैं कि नागरिकता मिलने वाली है हमारे दुःख दूर होंगे। हमें कहीं बसा दिया जाए, एक छोटा सा मकान मिल जाए तो हम बहुत मेहनती हैं, काम करके खा लेंगे, जी लेंगे।

कैंप में स्थापित मंदिर में विराजमान देवता

शरणार्थियों ने वहाँ पर एक छोटा सा मंदिर भी बना लिया है। जिसमें हनुमान जी की मुख्य प्रतिमा है, साथ ही दुर्गा जी, शिवलिंग आदि भी स्थापित है। पूछने पर बताया कि अब यही बेड़ा पार लगाएँगे। हम भगवान की शरण में हैं। कइयों ने तो नरेंद्र मोदी को ही भगवान कह दिया। पूछने पर बताया कि बस वही आखिरी उम्मीद हैं। जब हमने उनके बारे में सुना तो भारत आए, अब वो हमारे लिए ये बिल लाए हैं, जिससे हमें बहुत ख़ुशी है। हम उन्हें कभी नहीं भूल सकते। ज़्यादातर शरणार्थी आस-पास ही छोटे-मोटे कारोबार कर, मोबाइल कवर आदि बेच अपना गुजारा कर रहे हैं।

शरणार्थियों की दुकानें

शाम होते-होते आरती का समय हो चुका था। शरणार्थी अब अपने छोटे-छोटे मंदिरों में आरती में शामिल हो रहे थे। चलते-चलते उन्होंने एक निवेदन यह भी किया कि हमारा वीडियो पाकिस्तान पहुँच गया तो परिजनों को खतरा हो सकता है। लेकिन अभी तक छिपकर रह रहे थे, पर आज बोलने का दिन है, इसलिए अब जो होगा सो होगा। इतना कुछ झेला-क़ुरबानी दी तो अब क्या डरना। फिर भी कई शरणार्थी, जिनके ज़्यादातर परिजन पाकिस्तान ही छूट गए हैं, उनकी सलामती के लिए चिंतित दिखे, उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए हमने कुछ बातों का यहाँ जिक्र भर किया है।

कुल मिलाकर पाकिस्तान जो एक इस्लामी देश है, वहाँ हिन्दुओं के हालात को बहुसंख्यक मुस्लिमों ने बद से बद्तर कर दिया है। वे वहाँ नरक में हैं और उनकी बस एक आखिरी उम्मीद भारत ही है। और नागरिकता संशोधन बिल के माध्यम से उनकी आवाज अगर किसी ने सुनी है, तो वह मोदी सरकार है। जिसके नाम का जाप ये सभी शरणार्थी मन्त्र की तरह करते हैं।

देखें ग्राउंड रिपोर्ट का वीडियो: